वैजयन्त जय पंडा बीजद के युवा सांसद हैं। मूडीज - ग्लास हाफ फुल स्तंभ टाइम्स आफ इंडिया मंगलवार 21 नवंबर 2017 के स्तंभ में वे फरमाते हैं आर्थिकी के मजबूत पाये खड़े करने केे लिये कुछ मौलिक उपाय खोजने होंगे। सुधारों के लिये क्या क्या कदम उठाये जायेें इस पर भी वे बता रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह ही वे भी लोकसभा सांसद हैं। उनही दृष्टि दो बड़ी विशाल बाधाओं में मुल्क में रोजगार सृजन व आर्थिक सुधारों को चालू रखने को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। भूमि अधिग्रहण तथा श्रमिक कल्याण कानून आर्थिकी उत्थान की बुनियादी बाधा है। इन बाधाओं से छुटकारा पाना आवश्यक है। वे यह भी फरमाते हैं कि नेतृत्व आगे क्या रास्ता अपनाता है ? उनकी बातों में एक अच्छी लगने वाली बात यह है कि वे मोदी के व्यक्तित्त्व को सकारात्मक रूप से देख कर गिलास के आधा भरा होने का प्रसंग उठाते हैं। वे यह भी कह सकते थे कि गिलास आधा खाली है लेकिन यह कहना नकारात्मक होता। उन्होंने सकारात्मक रास्ता अपनाया और गिलास के आधा भरा होने का प्रसंग उठाया। दोष निवारण के लिये मौलिक सत्य ही सख्त आर्थिक सुधारों के लिये जो कदम उठाये जाने जरूरी हैं वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बखूबी उठा रहे हैं। महाशय जयंत पंडा तथा प्रधानमंत्री के सोच कथ्य में भी अंतर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच शैली में लोच है जबकि जयंत पंडा अपनी सोच में बदलाव लाना नहीं चाहते। खुशी की बात यह है कि पंडा महाशय नकारात्मक सोच वाले नहीं हैं। उनके अपने राज्य ओडिशा की जो आर्थिक स्थितियां हैं गरीबी की जो मार वहां के लोग सह रहे हैं उनके लिये उनकी सोच शैली ओडिशा के लिये माकूल हो सकती है पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सन 2001 से 2014 तक गुुजरात राज्य को जो आर्थिक एवं वैचारिक स्थायित्व का रास्ता दिखाया है उसके बारे में वैजयंत पंडा इसलिये सोच नहीं पारहे हैं क्योंकि उनकी जमीनी हालातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के गुजरात राज्य की हालातों से बहुत ज्यादा संत्रासदायक हैं इसलिये वैजयंत जय पंडा महाशय भरत झुनझुनवाला की तरह मुफ्त सहायता के पक्षधर हैं। झुनझुनवाला यह मानते हैं कि हिन्द का जन जन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर विश्वास करता हैै। उसे यकीन है कि प्रधानमंत्री जो कुछ करेंगे वह मुल्क के हित का मार्ग ही होगा। जब एक बार हम हिन्दुस्तानी मुफ्त मदद के घेरे में घिर जायेंगे हाथोेें से परिश्रम करने से परहेज करेंगे मुल्क का गरीबी के संत्रास उबरना मुश्किल होगा इसलिये मुल्क हिन्द को सही दिशा में आगे बढ़ा रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो निर्णय लेते हैं वे कभी कभी दूसरे लोगों को अप्रत्याशित लगते हैं। वे निर्णय पर प्रश्न चिह्न लगाने को प्रयास करें पर इतना तो तय है कि भारत के किसी राजनीतिज्ञ अथवा राजनीतिक सुप्रीमो में वह कुव्वत नहीं है जिसका प्रयोग नरेन्द्र दामोदरदास मोदी अपने ‘अहर्निश सेवामहे’ के गुरूमंत्र से संपन्न कर रहे हैं। वैजयंत जय पंडा ने अपने पंद्रह सूत्रों के जरिये अपनी बात रखी। वैजयंत पंडा का सोचना है कि जहां हिन्द अभी पहुंचा है अभी आगे संघर्ष का रास्ता है। मुल्क के आर्थिक और मानव संसाधन क्षेत्र में बहुत कुछ करना जरूरी है। लगभग चौदह वर्ष भारतीय राजनीति में विभाजक तत्व ऊर्जा पाते रहे। मुल्क केे विरोध पक्ष के राजनीतिक दलों में दलीय पार्थक्य बढ़ता रहा। पारस्परिक विश्वास न होने के कारण हर राजनीतिक दल दूसरे समूह को शंका भरी नजरिये से देखता था। वह सब 2014 के पश्चात अकस्मात बदल गया। देश में विश्वास, जनविश्वास की नयी राह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में स्थापित की। गुजरात ही नहीं भारत के ज्यादा से ज्यादा राज्यों में नरेन्द्र मोदी की तूती बोलती रही और लोक विश्वास बनता रहा, नतीजा सामने है। 2014 में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ने लोकसभा चुनावों में विजयश्री हस्तगत की, मुल्क का नक्शा एकदम बदल गया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कांग्रेस शताब्दी 1985 में मुंबई में घोषित किया कि दिल्ली से जो एक रूपया गांव की तरफ जाता है उसमें से केवल पंद्रह पैसे ही गांव तक पहुंचते हैं, शेष 85 पैसे रास्ते में ही रह जाते हैं। प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इस साफगोई का पूरा पूरा राजनीतिक लाभ 2014 में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने उठाया और साफ साफ कहा कि अब सौ रूपये में पूरे सौ पैसे गांव तक पहुंचेंगे, पिचासी पैसे अब तक पंजे में फंसे रह जाते थे आगेे से ऐसा नहीं होगा। प्रधानमंत्री राजीव गांधी केे अलावा किसी कांग्रेसी नेता ने पंद्रह पैसे वाली बात कभी भी नहीं व्यक्त की। उनका पारा तब सातवें आसमान पर पहुंच गया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने कहा - दिल्ली से जाने वाला रूपये का पूरा पूरा 100 पैसे गांव जारहा है। पंजे में फंसा 85 पैसे वाली बात कांग्रेसी नेेता हजम नहीं कर पाये। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अलावा पंद्रह पैसे वाला किस्सा - सौ पैसों में पिचासी पैसे पंजे में फंस जाने वाला प्रसंग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी प्रत्युपन्न मति से कांग्रेस के लिये जानलेवा बना डाला। वे भर्रा गये, बहक गये और कहने लगे - प्रधानमंत्री कांग्रेस को मटियामेट करने पर तुले हैं। प्रधानमंत्री ने जिस मुद्दे को उछाला वह तो 29 वर्ष पूर्व राजीव गांधी स्वीकार कर चुके थे। कांग्रेस नेता इस कटु प्रसंग को कभी बोलते नहीं थकते थे। 2014 के चुनावों के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस की असलियत जनता को बता दी। कांग्रेसी बौखला गये पर बात तो सोलह आना सही थी कि दिल्ली से चलने वाला एक रूपया याने सौ पैसे में से केवल पंद्रह पैसे ही गांव पहुंच पाते। शेष पिचासी पैसे कांग्रेस के पंजे में फंस कर रह जाते थे। यह सही आरोप पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह सहित अन्य कांग्र्रेस नेताओं को अखर गया। सही बात वे पचा नहीं पाये। जो बात दरअसल उनके ही प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकारी थी उसे झुठलाना यद्यपि बहुत कठिन था पर महाशया सोनिया गांधी गुजरात के मुख्यमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी को मौतों का सौदागर कह गयीं। उन्होंने अपनी पार्टी की शर्मनाक हार पर जो रास्ता अपनाया वह भी अंततोगत्वा सोनिया गांधी के लिये यश दाता नहीं रह पाया। उन्होंने भारत की जनता को बताना चाहा कि वे पद की भूखी नहीं हैं पर प्रतिनिधि प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह के जरिये वे मुल्क पर 2004 से 2014 तक शासन करती रहीं। इस सारी प्रक्रिया का भंडाफोड़ 2014 के लोकसभा चुनावों में सामने आगया। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ने बहुमत पाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार अस्तित्व में आयी। तीस वर्ष पश्चात किसी दल को बहुमत मिला। विरोधी दलों के एका में भी एक नयी खोट आगयी। वंशवादी सोनिया-राहुल के समानांतर मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, बंगनेत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी हुई थी पर वंशवाद व परिवारवाद को हिन्द की जनता ने नकार दिया। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट को बहुमत मिल गया। नयी सरकार अस्तित्व में आगयी। वंशवादी कांग्रेस सहित परिवारवादी मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, बंगनेत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के अलावा जनता दल सेकुलर के नेता देवगौड़ा ने पी.वी. नरसिंह राव सरकार के पतन के पश्चात अपना अपना राग अलापना शुरू किया। महाशय अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस का झंडा खड़ा किया। अंततोगत्वा खींचतान की राजनीति को अटल बिहारी वाजपेयी ने धकिया डाला। वाजपेयी सरकार ने साझा राजनीतिक विचार विमर्श कर 1998 से 2004 तक सुशासन का श्रीगणेश किया। 2004 में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट कांग्रेस से पिछड़ गया, यूपीए 1 के तहत साझा सरकार का मुखिया डा. मनमोहन सिंह को नियुक्त कर सोनिया गांधी की मर्जी की सरकार अस्तित्व में आगयी। देश का मतदाता जागरूक था मतदाताओं ने यूपीए 2 को 2014 में अपदस्थ कर दिया। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में सत्तानशीन होगयी। मुल्क का राजनीतिक भाग्योदय होगया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को हिन्द के जन जन का समर्थन है। हिन्द का लोकमत मानता है कि मोदी जो कुछ करेंगे वह राष्ट्रहित में ही होगा।
सारी बाधाओं के बावजूद नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जो फैसले लेरहे हैं, जो लोकसंग्रह उन्हें उपलब्ध है वही उनकी पूंजी है। उनके प्रत्यक्ष व परोक्ष विरोधी प्रधानमंत्री में कोई दोष या अवगुण नहीं खोज पारहे हैं इसलिये आज की सबसे बड़ी जरूरत प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को निरंतर समर्थन देने की है। आइये, सभी हिन्दवासी एक स्वर से कहिये -
नमो नमो प्रतिज्ञे द्वै न दैन्यम् न पलायनम्
अर्थात
‘नमन है नरेन्द्र मोदी की दो प्रतिज्ञाओं को, भष्ट्राचार के विरूद्ध न झुकेंगे न ही पलायन करेंगे।’
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