स्कन्दपुराणानुसार पाँच भौगोलिक क्षेत्रों में विभक्त भारत का व्यापक हिमालयी क्षेत्र
खण्डाः पञ्च हिमालयस्यकथिताः नैपालकूर्मांचलौ।
केदारोअथ् जालन्धरोअथ् रुचिर काश्मीर संज्ञोअन्तिमः।।
उत्तराखंड त्रासदी का स्थायी समाधान, सीमावर्त्ती स्थानों को संघ शासित क्षेत्र तय करना।।
खण्डाः पञ्च हिमालयस्यकथिताः नैपालकूर्मांचलौ।
केदारोअथ् जालन्धरोअथ् रुचिर काश्मीर संज्ञोअन्तिमः।।
अर्थात हिमालय के अति दुर्गम क्षेत्र पांच रमणीय भागों में विभक्त हैं जो काश्मीर, जालन्धर(हिमांचल), केदारखंड (गढ़वाल), मानसखंड (कूर्मांचल या कुमाऊँ) तथा नैपाल के नाम से जाने जाते हैं।
पौराणिक ग्रंथों के वर्णनानुसार हिमालय के रमणीय भू-भागों में देवताओं की विहार स्थलियों के अलावा सिद्ध, ऋषि-मुनियों, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नागों का निवास स्थल था तथा इनके अलावा अन्य मानव जातियां यथा हूण, खस आदि की भी विभिन्न जातियां निवास करती थीं जिन सभी के राजा धन के देवता कुबेर थे। कूर्मांचल या कुमाऊँ का यह समस्त भू-भाग प्राचीन काल में मानसखंड के नाम से प्रसिद्ध था।तब कुबेर की राजधानी अलकापुरी थी जो कि वर्तमान में श्री बद्रीनाथ धाम से आगे स्थित भू-भाग है किन्तु कतिपय विद्वज्जन अलकापुरी को वर्तमान में प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा का होना मानते हैं। अल्मोड़ा नाम का सांस्कृतिक शहर विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण के अनुसार कुबेर धानी है। विष्णु पुराण का कथन है - कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्य काषाय पर्वतः। यही काषाय पर्वत - कसार देवी का जंगल भी कहा जाता रहा है। जब विश्रवा के ज्येष्ठ पुत्र कुबेर को रावण ने लंका से भगा दिया तब कुबेर ने हिमालय को अपना निवास बनाया। मेघदूत, कुबेर के विश्वस्त सहयोगी एवं देश निकाले का दंड भोग रहे यक्ष ने मेघों के द्वारा अपना प्रणय दिग्दर्शन सन्देश अलकापुरी-अल्मोड़ा में पति वियोग पीड़िता याक्षायणी को भेजा। कुमइयाँ बोली में याक्षायणी को जाखनदेवी के नाम से जाना जाता है। अल्मोड़ा शहर में जाखनदेवी का ऐतिहासिक मंदिर भी है। इसी केदारखण्ड एवं मानसखण्ड में विगत जून २०१३ को भयभीत करने वाली प्राकृतिक आपदा का विध्वंसकारी ताण्डव हुआ जिसने भारत ही नहीं वरन् विश्व के मानव समाज को हतप्रभ कर दिया। इस दारुण घटना ने मनुष्यों को प्रकृति एवं मानव के प्रगाढ़ सम्बन्धों के बारे में पुनः सोचने पर विवश कर दिया। वर्तमान में मानव प्रकृति के साथ जिस प्रकार की मनमानी एवं स्वेच्छाचारिता का व्यवहार कर रहा है वह निश्चय ही धरती के समस्त प्राणियों को इसी प्रकार संकट में डालने वाला सिद्ध होगा। आज मानव समाज को प्रकृति के साथ उसके निर्दयतापूर्ण व्यवहार के बारे में पुनर्मूल्यांकन करने एवं अपनी निष्ठुर सोच को बदलने की महती आवश्यकता आ पड़ी है। इसी सम्बन्ध में यह आलेख प्रस्तुत है।
१- जून २०१३ में केदारघाटी सहित सम्पूर्ण उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग (केदारघाटी जिसका एक भाग है) केदारखंड के इन तीन जनपदों में तथा मानसखंड के बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ जनपदों में जो प्राकृतिक विपदा लगभग चार सौ गावों में आयी उससे इन जनपदों की जनता पहले भी संत्रस्त होती रही है। महाकवि कालिदास जिनका एक मुख्य काव्यग्रन्थ ''मेघदूत'' है उसका आरम्भ ही ''आषाढ़स्य प्रथम दिवसे'' से हुआ है। गढ़वाल के स्वनामधन्य राजनीतिज्ञ तथा साहित्यसेवी डाक्टर शिवानंद नौटियाल ने गढ़वाल हिमालय को संस्कृत के महान कवि कालिदास की जन्म व कर्मभूमि माना है। छत्तीसगढ़ के रामगिरि पर्वत पर खरोष्ट्री लिपि में यक्ष द्वारा अपनी प्रेयसी यक्षिणी को मेघों के द्वारा भेजा गया सन्देश अंकित है। आषाढ़ मास को संस्कृत व ज्योतिष शास्त्र में 'मिथुनाई' भी कहा जाता है। मिथुन संक्रांति आम तौर पर प्रतिवर्ष १५ जून को होती है और सौर आषाढ़ मास ३१ या ३२ दिन का होता है। आषाढ़ मास से चातुर्मास्य अथवा चौमासा भी आरम्भ हुआ माना जाता है। संन्यासी भिक्षु श्रमण तेरापंथी जैन तथा भारत का यति पर्व पड़ाव समाज चातुर्मास्य एक ही जगह पर मनाने का संकल्प लेता है। चान्द्रमास के अनुसार चौमासा आषाढ़ सुदी एकादशी, आषाढ़ी हरिशयनी एकादशी से कार्त्तिक देवोत्थानी एकादशी तक मनाया जाता है।

नदियों में गिराये जाने वाले सडकों के मलवे के कारण नदी के उथले हो जाने से नदी के तट से सटा कर बनाये गये बहुमंजिले भवन को फलस्वरूप धराशायी होना ही पड़ेगा। वर्ष २०१० में भागीरथी की बाढ़ ने उत्तरकाशी के लोगों के जीवन को सांसत में डाल दिया। जिन लोगों ने नदी के प्रवाह क्षेत्र तक अपने रिहायशी भवन अथवा व्यापारिक होटल, मोटेल या रेस्तरां निर्मित कर लिये थे, उन सभी अनधिकृत निर्माणों को भागीरथी की बाढ़ ने बहा डाला। उत्तराखंड की सरकार एवं जनता ने विगत काल के भूकम्पों, भूस्खलनों तथा बाढ़ व वारणावत प्रकोप से सीख ली होती तो इस प्राकृतिक आपदा के कुप्रभाव को कुछ सीमा तक तो कम किया ही जा सकता था पर मनुष्य यह मान बैठा है कि वह सामर्थ्यवान है, सारी प्रकृति उसकी वशवर्ती है, वह जो चाहेगा वही होगा। व्यक्ति के स्वार्थ और केवल मैं ही उन्नति करूँ, मैं ही खाऊं की सोच व प्रवृत्ति के मनमाने आचरण ने उस हिमालय को नाराज कर डाला जिस हिमालय को योगेश्वर वासुदेव श्री श्रीकृष्ण ने महाविभूति बताते हुए कहा था - ''यक्षों में मैं जय यक्ष तथा स्थावरों में मैं हिमालय हूँ। उन्होंने द्वारिका के अपने अत्यंत स्नेही सखा व भृत्य उद्धव से कहा - ''उद्धव मैं ही तो घिष्णुओं में मेरु पर्वत तथा गहन शिलाओं में हिमालय हूँ। उसी हिमालय ने केदारखंड एवं मानसखंड की भूमि में मनुष्य की लोभी एवं मनमानी की प्रवृत्ति को यह चेतावनी दी कि गिरिराज हिमालय, गिरिराज कन्याओं तथा गिरिराज के स्थावर समाज के साथ ज्यादती करोगे तो अपना ही नुकसान करोगे। अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को स्वयं ही नष्ट करोगे तो अपना ही जीवन दूभर बना लोगे। भारत स्वतंत्र हुआ तथा स्वतंत्रता का सुख भोगने के लिए पाश्चात्य संस्कृति का अंधाधुंध अनुकरण करते हुए मोटर सड़कों के निर्माण एवं निर्माण हेतु पत्थर तोड़ने के लिए डायनामाइट विस्फोटों के अविवेकशील प्रयोग ने हिमालय की जड़ें हिला दीं। कहा जा सकता है कि सड़कों का निर्माण आवश्यक है किन्तु यह तो किया जा सकता था कि डायनामाइट के प्रयोग स्थान पर मानवीय शक्ति का ही उपयोग किया जाता जैसाकि अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में पहाड़ों में जब सड़कों का निर्माण आरम्भ किया तो उन्होंने मनुष्यों की प्रकृति प्रदत्त शक्ति का ही उपयोग किया। उन्होंने सडकों का निर्माण हाथों से सड़क खुदाई करवा कर किया जिस कारण उनकी बनवायी सड़कें आज भी बरसात के दिनों में भी यदा-कदा ही बंद होती हैं वह भी अल्प समय के लिए। सड़क की भार सहन करने की क्षमता के अनुसार वाहनों की भार क्षमता निश्चित की जानी चाहिये थी। सड़क की भार सहन करने की क्षमता के अनुसार वाहनों की भार क्षमता की ओर ध्यान न तो विकास में लगे लोगों दिया न ही सरकार के परिवहन विभाग ने वाहन भार मर्यादा काका ख्य़ाल रखा। सड़कों का जाल बिछाने की कोशिश में नदी, पहाड़, गांव तथा जंगल की प्राकृतिक आवश्यकताओं को भी किनारे कर दिया गया। हर आदमी चाहने लगा कि सरकारी खजाने से सड़क उसके दरवाजे तक नहीं भी तो कम से कम उसके गांव तक तो बन ही जाये। बात यहीं पर नहीं रुकी बल्कि जो-जो आदमी पढ़-लिख कर पहाड़ से नीचे उतरा फिर मुड़कर उसने अपनी जननी, जन्मभूमि की ओर झाँका भी नहीं।पहाड़ से उसे विरक्ति हो गयी। शायद मैदानों के शहरों की सुख-सुविधाओं के सम्मोहन ने उसे पहाड़ को भूलने पर विवश कर दिया। बड़ी संख्या में पहाड़ के लोग भारत के विभिन्न बड़े-बड़े शहरों के वासी बन गये तथा जो दूर शहरों में न जा सके या जिनके पास कम सम्पदा थी उन्होंने तराई-भाबर के शहरों तथा दून घाटी की ओर रुख किया ताकि वे भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला सकें एवं अपनी व अपने परिजनों की सेहत की सुरक्षा के बहाने पहाड़ का परित्याग कर तराई-भाबर में बसने का उपक्रम किया। विकास की इस अंधी दौड़ ने वे हालात पैदा किये जिनका माह जून २०१३ के तीसरे सप्ताह में हुए जलप्लावन ने उत्तराखंड के आबाल-वृद्ध सभी नर-नारियों को चेतनाशून्य कर डाला।

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