एम्स के आचार्य आनंदकृष्णन की सोच मेडिकल शिक्षा में भी मानवीय सहानुभूति
चिकित्सा व्यवसाय में अत्यंत उपादेय क्यों है ??
मैथिलीशरण गुप्त भारत भारती में कहते हैं - हम कौन थे ? क्या होगये ? और क्या होंगे अभी ???
तीन उदाहरण प्रस्तुत करते हुए - पहला मेरठ जिले में परीक्षित गढ़ नामक एक कस्बा है जिसे उत्तरा अभिमन्यु पुत्र, अर्जुन-सुभद्रा के पौत्र तथा अजातशत्रु धरमराज युधिष्ठिर के पश्चात कुरूराज के सार्वभौम नरेश को श्रंगी ऋषि के तेजस्वी किशोर पुत्र कुशिक ने अभिशप्त कर डाला, आज से सातवें दिन परीक्षित को तक्षक डस डालेगा। इस शाप की जानकारी जब तत्कालीन प्रमुख वैद्य धन्वन्तरि को मालूम पड़ी तो वे राजा परीक्षित को तक्षक विष से बचाने चल पड़े। रास्ते में उनकी मुलाकात तक्षक (जो तब सांप नहीं ऋषि के वेष में अपना कर्त्तव्य पूरा करने जारहे थे) से हुई। पारस्परिक परिचय के पश्चात तक्षक ने अपने मौलिक रूप में उपस्थित होकर धन्वंतरि से कहा - क्या आप तक्षक के विष निवारण की सामर्थ्य रखते हैं ?सामने पीपल का पेड़ है इसमें पक्षी चहचहा रहे हैं। मैं तक्षक अपने विष से इस वृक्ष को भस्म करता हूँ, तुम में ताकत है तो क्या तुम इसे पूर्ववत बना सकते हो ? धन्वंतरि ने तक्षक नाग से कहा - सर्पराज आप अपना काम करो मैं अपना कर्त्तव्य निर्वाह करूँगा। राजा परीक्षित मुझे प्रभृत दक्षिणा देंगे। उस वृक्ष में पक्षियों के अलावा एक आदमी भी था जिसने तक्षक-धन्वंतरि संवाद को आंखों देखे हाल की तरह राजा परीक्षित के बेटे जन्मेजय को कहा था। तक्षक ने पीपल के वृक्ष को राख में बदल डाला। धन्वंतरि ने अपने वैद्यक बल से वृक्ष को पूर्ववत कर डाला। तक्षक को धन्वंतरि की योग्यता के बारे में यकीन होगया। वह सर्पराज था उसके पास रत्न जवाहरात राजा परीक्षित से ज्यादा थे। उसने परीक्षित को बचाने जारहे धन्वंतरि को अपार धन संपदा भेंट कर उन्हें उनके लक्ष्य से च्युत कर डाला। आज के चिकित्सकों का आदर्श भी धन्वंतरि का धन लोभ है। आज के सभी डाक्टर वैद्य हकीम धन्वंतरि के बताये रास्ते पर चल रहे हैं। यह उदाहरण पंचम वेद महाभारत काल का आज से सवा पांच हजार वर्ष पुराना है।
दूसरा ताजा उदाहरण पेश है - पंडित नेहरू भारत के प्रधानमंत्री 1946 में हुए। उनसे मिलने उनके पुराने मित्र काशी के यशस्वी वैद्य श्री शिव त्रिपाठी आये। उन्होंने पंडित नेहरू से कहा - पंडित जी अब तो आप हिन्द के राजा हैं। मैं आपसे एक भीख मांगने आया हूँ। पंडित जी ने कहा - शिव, कहो कहो क्या चाहते हो ? वैद्यराज शिव ने कहा - आप आयुर्वेद का पुनर्रूद्धार करें। पंडित जी तो डेमोक्रेट थे उनकी स्वास्थ्य मंत्री पटियाला राजकुमारी अमृत कौर थीं जिन्होंने ख्रिस्ती धर्म अपना लिया था। पटियाला के राजवंश के वर्तमान लोकनेता कैप्टेन अमरेन्द्र सिंह हैं जो थोड़े दिन पूर्व तक लोकसभा सदस्य थे अभी कांग्रेस के पंजाब के मुख्यमंत्री पद के घोषित दावेदार। वैद्य शिव त्रिपाठी को पंडित जी ने कहा - शिव तुम राजकुमारी अमृत कौर के पास जाओ यह उनका महकमा है। वैद्य शिव त्रिपाठी बोले - पंडित जी भीख तो आपसे मांग रहा हूँ आप मुझे क्रिस्तान के पास जाने को कह रहे हैं। भीख नहीं मिली तो कोई बात नहीं किन्तु अब कभी आपके दरवाजे पर नहीं आऊँगा। दिवस जात नहिं लागत बारा। सन 1964 में पंडित नेहरू अस्वस्थ थे, उन्हें अपने पुराने मित्र वैद्य शिव त्रिपाठी की याद आई। उन्होंने कमलापति त्रिपाठी को कहा - कमला शिव को बुला लाओ। कमलापति वैद्य शिव त्रिपाठी के पाटीदार थे वे शिव त्रिपाठी से घबराते भी थे। उन्होंने पंडित नेहरू को कहा - वाराणसी के जिलाधिकारी को कहिये कि वे शिव त्रिपाठी को देहरादून ले आयें। जिलाधिकारी नया नौजवान था वह कभी भी वैद्य शिव त्रिपाठी की हवेली में गया ही नहीं था जानता भी नहीं था कि शिव त्रिपाठी कौन है ? वैद्य शिव त्रिपाठी ने जिलाधिकारी को कहा - जवाहर हिन्द का राजा है और मैं वैद्य हूँ तथा इलाज करना मेरा स्वधर्म है। जाकर पंडित जी से कहिये कि मुझे गिरफ्तार कर लें। मैं उनका इलाज वैसे ही करूँगा जैसे सुषेण वैद्य ने लक्ष्मण की मूर्छा शांत की थी। मैं अपने आप पंडित नेहरू से मिलने नहीं जाऊँगा। जिलाधिकारी की समझ में बात तब आयी जब उन्होंने पंडित कमलापति त्रिपाठी की बात सुनी और सारा वृत्तांत देहरादून जाकर पंडित नेहरू के समक्ष बयान कर दिया। पंडित जी ने शिव त्रिपाठी को गिरफ्तार करने की इजाजत नहीं दी। पंडित जी ने कमलापति त्रिपाठी को कहा - कमला, काशी में और वैद्य भी तो होंगे तुम किसी और जानकार वैद्य को बुला लाओ। कमलापति त्रिपाठी एक अन्य वैद्य जो उन्हीं की तरह सामवेदी था उसे पंडित नेहरू को देखने के लिये देहरादून ले गये। जब कमलापति त्रिपाठी काशी लौटे शिव त्रिपाठी ने कमलापति त्रिपाठी से पूछा - कमला वैद्य कब पंडित नेहरू को देखने गया था ? शिव त्रिपाठी वैद्यकी ज्योतिष के जानकार थे, उन्होंने कमलापति को कहा - जवाहरलाल 27 मई से आगे नहीं चल पायेंगे। हिन्द की पुरानी वैद्यक ज्योतिष को ऐस्ट्रोलाजिकल मैगजीन के यशस्वी संपादक बी.बी. रमन ने अंग्रेजी के माध्यम से मेडिकल ऐस्ट्रालाजी का विशद भारतीय संकलन अंग्रेजी के माध्यम से भी प्रस्तुत किया। पंडित नेहरू वैद्य शिव त्रिपाठी प्रकरण हिन्दुस्तान की मेडिकल शिक्षा के लिये बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है। हिन्द का आयुर्वेद विज्ञान पश्चिम की ऐलोपैथी होमियोपैथी तथा मध्य दक्षिण एशिया के यूनानी और तिब्बी इलाज विधि से बहुत पुराना है। उतना ही पुराना जितना ऋग् यजु सामवेद के साथ साथ चौथा वेद अथर्ववेद है जो आयुर्वेद धनुर्वेद के अलावा खगोल व ज्योतिष शास्त्र के साथ साथ अंतरिक्ष संबंधी ज्ञान का भी आधार है। पौराणिक तथा हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई के दो महत्वपूर्ण व्यक्तित्त्व पंडित नेहरू व वैद्य शिव त्रिपाठी अनेक बार जेल में साथी भी थे। एक दूसरे के अभिन्न मित्र तथा समवयस्क होने के कारण संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के अवध व काशी क्षेत्रों के लिये अत्यंत महत्वशील चिंतक थे। उपरोक्त दो उदाहरणों के अलावा तीसरा उदाहरण इस ब्लागर की आपबीती है।
बात सन 1963 की है। यह ब्लागर लोदी रोड से सटे प्रेमनगर मार्केट के एक दुकानदार का किरायेदार था। मकान मालिक स्वयं न तो दुकान करता था न ही वहां दुकान के पिछले आवासीय हिस्से की किरायेदारी यह ब्लागर करता था। इसके परिवार में पति पत्नी के अलावा अल्पवयस्क छोटा भाई व एक कन्या तथा एक पुत्र थे। कन्या की उम्र छः वर्ष तथा पुत्र की आयु तीन वर्ष थी। कन्या मई 1963 में बीमार पड़ गयी। जिस बंगाली डाक्टर के पास इस ब्लागर की पत्नी बच्चों को दिखाती थी, उसने कहा - लड़की की हालत बहुत खराब है इसे डाक्टर घोषाल को दिखाओ। डाक्टर घोषाल उस इलाके के प्रतिष्ठित डाक्टर थे कोई फीस नहीं लेते थे केवल टैक्सी भाड़ा ही लेते थे। उन्हें इस ब्लागर के परिचित श्री कृष्णानंद पांडे जानते थे। वे डाक्टर घोषाल को लेकर आये रात के दस बज चुके थे। डाक्टर ने कहा - दवा की कोई जरूरत नहीं बच्ची को बर्फ की सिल्ली में चादर रख कर सुला दो जब चिल्लाये तब उठाना। डाक्टर घोषाल ने कहा अगर लड़की सुबह चार बजे तक बच गयी तो ठीक हो जायेगी। उन्होंने इस ब्लागर को कहा - इस बच्ची का बुखार दूसरा मामला है जिसने उन्हें (डाक्टर घोषाल) अचंभे में डाला है कि 108 डिग्री बुखार होने के बावजूद बीमार जिन्दा है। उन्होंने अपनी आपबीती इस ब्लागर को सुनाई। उनका 18 वर्षीय बेटा ऐसे ही बुखार से मर गया तब से उन्होंने एलोपैथी के डाक्टर होने के बावजूद ऐलोपैथी का इलाज करना छोड़ दिया। वे दिल्ली के उतने ही प्रतिष्ठित डाक्टर थे जितने भारत विभाजन के दर्मियान डाक्टर नीलांबर जोशी और डाक्टर फरीदी। वे हर रोज शाम को इस ब्लागर की कन्या बेबी को देखने आते। उनका कहना था कि इस लड़की को परमात्मा ने ही जिन्दा रखा है। डाक्टर घोषाल का उदाहरण सहानुभूति तथा रोगी के निरोग होने के उनके अद्भुत तरीकों का नमूना है।
अपने कथन को बताते हुए महाशय आनंद कृष्णन कहते हैं अनोखे किस्म का परामर्श राय मशविरा दस मिनट से कम समय लगा कर जल्दबाजी में सवाल पूछना और सवालों के समानांतर जांच पड़ताल व दवाइयों की सूची पकड़वाना तथा क्यों और कैसे सवालों का अत्यंत अस्पष्ट अभिव्यक्ति मरीज की डाक्टर के प्रति शंका को बढ़ाती है। प्रतीति होती है कि चिकित्सा व्यवसाय में मानवीय सौहार्द का निरंतर क्षरण होता जारहा है। महाशय आनंद कृष्णन ने तेरह बिन्दु तय किये पहले में उनका कहना है औषध विज्ञान नहीं कला है। आज दुनियां भर में मेडिसिन को विज्ञान का दर्जा दिये जाने की भरपूर कोशिश होरही है पर औषध, दवा विज्ञान नहीं व्यक्ति को रोग के कष्ट से उबारने की कला है। दवा कब दी जाये ? कैसे दी जाये ? क्या एक ही दवा एक किस्म के सभी बीमारों को निरोग करेगी ? या रोग शमन के लिये चिकित्सक, डाक्टर, वैद्य अथवा हकीम की निरोग करने की व्यक्तिगत योग्यता अथवा कला दवा से ज्यादा कारगर है ? हम हिन्द की पारंपरिकता का सहारा लें जहां एक कहावत प्रचुरता से प्रचलित है - औषधम् जाह्नवी तोयम् वैद्यो नारायणो हरिः अर्थात गंगाजल औषध है वैद्य याने वेत्ता या जानने वाला जो आपके शरीर की व्याधि को समझता है और निरोग करने के उपाय खोजता है। महाशय आनंद कृष्णन ने मेडिकल करिक्युलम में केवल ऐलोपैथी का ही चिंतन किया है। दरअसल में हिन्द में आज जो रास्ते अपनाये जारहे हैं ऐलोपैथीजन्य मेडिकल शिक्षण पंगत का पहला आयुर्विज्ञान (मेडिकल साइंस) है। यद्यपि इस पुरातन देश में वैद्यक (आयुर्वेद) सबसे पुरानी कला है जो स्वास्थ्य व निरोग शरीर को अपना मुख्य उद्देश्य मानती आयी है। आयुर्वेद की महत्ता के बावजूद आजाद हिन्द ने आयुर्वेद के लिये वही तरीका अपनाया जो हिन्द की कहावत - घर का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध। अगर पंडित नेहरू ने अपने अनन्य मित्र शिव त्रिपाठी को वह भीख दे दी होती जो शिव त्रिपाठी पंडित नेहरू से मांग रहे थे आयुर्वेद को पहली पंगत में खड़ा नहीं भी करते पर ऐलोपैथी की बराबरी का दर्जा तो दे देते। पंडित नेहरू डैमोक्रेट थे उन्हें केबिनेट मंत्री राजकुमारी अमृत कौर केे कार्य में हस्तक्षेप उचित नहीं लगा और शिव त्रिपाठी से वर्षों की घनी दोस्ती को उन्होंने महत्व नहीं दिया। अगर 1947 में ही आयुर्वेद को ऐलोपैथी के समानांतर स्थान मिल जाता तो संभव था कि आज चिकित्सा क्षेत्र में मनमानी चल रही है तो वह उतनी उग्र नहीं होती जितनी आज है। देश में अनेक आयुर्वेदिक कालेज हैं गुरूकुल कांगड़ी सरीखा विश्वविद्यालय है पर समूचे मेडिकल करिक्युलम पर ऐलोपैथी हावी है। इलाज सस्ता हो एवं दवाइयां निर्माण करने वाली कंपनियां अत्यंत अधिक मुनाफा कमाने के लिये हर डाक्टर को कमीशन देती हैं कि वे उनके उत्पाद को बढ़ावा देने में सहायक हों। अगर आज कोई सरकार यह सोचने लगे कि वह चिकित्सा व्यवसाय के धुरंधर महारथियों पर अंकुश लगाये वह इसलिये संभव नहीं लगता क्योंकि भारत का राजनीतिक व प्रशासनिक तंत्र पूरी पूरी तौर पर मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक की गिरफ्त में है।
हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई केे दौर में बुंदेलखंड के गिरगांव के रहने वाले मैथिली शरण गुप्त ने भारत भारती काव्य रच कर हिन्द के उन लोगों का उत्साहवर्धन किया जो हिन्दी बोलते थे, हिन्दी समझते थे। ऐेलोपैथी चिकित्सा व्यवसाय में आज जो राष्ट्रव्यापी हालात हैं उन्हें पहले समझना जरूरी है समझने के बाद सवाल उठता है - हम कौन थे ? क्या होगये ?? और क्या होंगे अभी ??? मैथिली शरण गुप्त के ये तीन सवाल आज भी मुंह बाये खड़े हैं। लोकतंत्र या डैमोक्रेसी में हर नागरिक का अधिकार बराबर है पर हिन्द का अर्थतंत्र आज हिन्द की राजनीति पर भी हावी है, उद्यमिता में हावी है। लाभग्राहिता में जो लोग पहली पंगत में खड़े हैं वे लोकसंपदा के सबसे बड़े काबिज हैं धनार्जन की उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कोई रूकावट ही नहीं है सभी कुछ उनके ही हाथों में है। हिन्द के लोग दाशरथि राम को मर्यादा पुरूषोत्तम मानते हैं ऐसा व्यक्तित्त्व जिसने स्थापित मर्यादाओं का कभी भी उल्लंघन करने का दुस्साहस नहीं किया। आज के हिन्द में मर्यादाओं का उल्लंघन एक सामान्य घटना होगयी है। आर्थिकी तथा भोगवादी क्षेत्र में मर्यादायें अमर्यादित स्थिति तक पहुंच गयी हैं। इससे सबसे ज्यादा प्रभाव उन व्यक्तियों पर पड़ा है जो व्यावसायिक हैं। उनका लक्ष्य येन केन प्रकारेण ज्यादा से ज्यादा लाभार्जन करना है। लाभार्जन केे क्षेत्र में आज की अहम् जरूरत आत्मनियंत्रण की है। वैज्ञानिक उपलब्धियों केे समानांतर आधि व्याधि भी उसी अनुपात से बढ़ रही हैं। जिस तरह वैज्ञानिक उपलब्धि मनुष्य प्रकृति से अपनी दूरी बढ़ाता जारहा है जिस औषध शास्त्र की पुराने हिन्दुस्तानी लोग निसर्ग या प्रकृति के नजदीक रह कर उपलब्ध करते थे, प्रकृति या कुदरत उसे जिस नाम से बोलें उस पर मनुष्य के वैज्ञानिक अन्वेषणों ने इतना भार बढ़ा दिया है कि पर्यावरण विद कहने लगे हैं कि जिस हवा में मनुष्य श्वास लेता है वह इतनी जहरीली होगई है कि श्वास प्रश्वास प्रक्रिया में भयावह रूकावटें महसूस होने लग गई हैं। वित्तम् यावत् प्रयोजनम् - धन कितना हो जितना जीवन जीने के लिये आवश्यक है। इसी हिन्दुस्तान के भड़ौच (भृगुकच्छ) में वामन ने बलि से कहा था - भीख उतनी ही चाहिये जितनी नितांत जरूरी है इसलिये केवल तीन पग भूमि की याचना कर रहा हूँ। आज हिन्द के समूचे व्यवसायी वर्ग को वित्तम् यावत् प्रयोजनम् की सीख देनी जरूरी है। ज्वर ताप सहित ज्वर के जितने भी स्वरूप हैं उनसे निजात पाने के लिये लंघनम् परम औषधम् लंघन करना या भोजन न करना ज्वर की सबसे बड़ी औषध है। आज हिन्दुस्तान का पारंपरिक वैद्य भी लंघन का मशविरा अपने रोगी को नहीं देता। धनतेरस - दिवाली का महत्वपूर्ण त्यौहार है। इसका मूल नाम तो धन्वंतरि त्रयोदशी याने धन्वंतरि जयंती है, सोचने परखने की जरूरत है। इतिहास के बारे में कहावत है - इतिहास दुहराता है। वैद्य धन्वंतरि को तक्षक ने लालची बना डाला। धन्वंतरि गये तो थे राजा परीक्षित की सुरक्षा के लिये अपनी योग्यता की परीक्षा करने पर धन के लालच ने उन्हें कर्त्तव्यच्युत कर डाला अपने संकल्प से विमुख होगये धन्वंतरि। काशी का प्रतिनिधित्व भारत की संसद में भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी कर रहे हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वैद्य शिव त्रिपाठी पंडित नेहरू के अभिन्न मित्र थे कि जिसे आम हिन्दुस्तानी के लहजे में लंगोटिया यार भी कहा जा सकता है। वैद्य शिव त्रिपाठी ने आजाद हिन्द के पहले राजा पंडित नेहरू से भीख मांगी आयुर्वेद की। दिल्ली शाहदरा से जो सड़क बड़ौत होकर सहारनपुर जाती है आगे देहरादून पहुंचती है उसमें खेकड़ा नाम का एक गांव है। पंडित नेहरू देहरादून जारहे थे खेकड़ा में जाट किसान धोती कुर्ता सफेद टोपी पहले पंडित नेहरू का स्वागत दर्शन करने सड़क के दोनों किनारे खड़े थे। एक किसान ने कहा - पंडत जी आप हिन्द के राजा हो आपका ताज कहां है ? पंडित नेहरू ने जाट किसान से कहा - चौधरी मेरे और तुम्हारे सिर में जो टोपी है वही तो हिन्द का ताज है। पंडित नेहरू ने वैद्य शिव त्रिपाठी को भीख नहीं दी कहा - राजकुमारी अमृत कौर से बात करो। यह बात तो सत्तर वर्ष पुरानी है। अब वैद्य शिव त्रिपाठी व पंडित नेहरू इस धरती में नहीं हैं किसी अन्य ही लोक में होंगे किन्तु आयुर्वेद की भीख अटक गयी है। इस भीख का सही सही निवारण काशी के लोकप्रतिनिधि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हाथ में है।
धन्वंतरि और शिव त्रिपाठी के उदाहरण ऐतिहासिक हैं पर डाक्टर घोषाल का रोगी के रोग निदान का तरीका बहुत पुराना नहीं आधी शताब्दी से मात्र चार साल अधिक समय वाला ऐसा उदाहरण है जिसे हिन्द के रोग निवारण का व्यावहारिक मार्ग घोषित करने का संकल्प लिया जा सकता है। कुदरती अथवा ईश्वरीय नियम है दुनियां में सृष्टि का आठवां हिस्सा उत्कृष्ट सदाचारी तथा आठवां हिस्सा घोर दुराचारी होता है। शेष तीन चौथाई वे लोग हैं जिन्हें आधुनिक डैमोक्रेसी का मुख्य रास्ता चुनाव प्रबंधन में फ्लोटिंग वोट तरीके के मानस वाला समाज कहा जाता है। अच्छे और बुरे हालात लाने में यही अनिर्णीत सिद्धांत वाला समूह जिस तरफ बढ़ता है वही राज करता है। इसलिये इस कुदरती न्याय का सहारा उसी नेतृत्व को मिलता है जो छिन्नसंशय हो। राजधर्म का मुख्य सूत्र -
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समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो तुल्य निन्दा स्तुतिः संतुष्टो येन केनचित्।
हिन्द का सौभाग्य है कि आजादी के सत्तर वर्ष बाद ही सही उसे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का स्थितप्रज्ञ नेतृत्व मिला है। दिल्ली के डाक्टर घोषाल सरीखे डाक्टर रोग शमन के क्षेत्र में अपनी योग्यता और मानवीय सहानुभूति की महाविभूति का प्रसार करेंगे। रोग निवारण के क्षेत्र में धन बल हावी नहीं हो यही शिव संकल्प है।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

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