पंचगव्य - कायशोघन की अचूक दवा?
भारत सरकार पंचगव्य निर्माणी भव्य गौशाला के बारे में सोचे
ताकि मानव पंचगव्य से शारीरिक रोगों से मुक्ति पाने की क्षमता अर्जित कर सके।
अरूण पुरी महाशय ने विनोद खन्ना की यादगार में इंडिया टुडे के 26 जून 2017 के अंक को समर्पित करते हुए कर्कव्याधि केकड़ा कष्ट का खात्मा करने की जुगत पर जुगाड़ लगाया। पहले हम अरूण व पुरी उनके नाम के प्रथम नाम तथा उपनाम या गोत्र नाम से ही शुरूआत करते हैं। संस्कृत वाङमय केे अरूण शब्द से दिशाओं का वितिमिर होना दिशा खुलना कहलाता है। उसे अरूणोदय अथवा प्रकाश बेला भी समझा जा सकता है। तात्पर्य यह है कि अरूणोदय अन्धकार समाप्ति की बेला है। सूर्योदय से एक घड़ी पहले की स्थिति अरूणोदय है। अब आया जाये उनके गोत्र नाम पुरी पर जिसे वे रोमन लिपि में PURIE रोमन पंचाक्षरी में व्यक्त कर रहे हैं। हिन्द में गुरू गोरखनाथ के नाथ पंथ के समानांतर गृहस्थ गोस्वामियों - गुसाइयों के समानांतर तीर्थ, पुरी, भारती, सरस्वती, गिरि, गोस्वामी इन सात पंथों के अलावा ऋषभ व शुकदेव की तरह दिशायें ही जिनके वस्त्र हैं ऐसे अवधूत लोग नगा साधु कहलाते हैं। उन्हें जोड़ कर स्मार्त, शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन, बौद्ध, गुरूग्रंथ साहब के रचनाकार गुरू नानकदेव के अनुयायियों की एक विशाल पंगत है। नानक पंथियों जिनकी बहुतायत पंजाब व पंजाब से ज्यादा अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में थी वे नानकपंथी कहलाते थे पर गुरू गोविन्द सिंह द्वारा स्थापित सिख धर्म से स्वयं को अलग मानते रहे हैं। इन सभी लोगों में प्रणव या ओंकार की महत्ता है। ये सभी गंगा को पुण्य सलिला मान कर गंगा नहान भी करते हैं। इनमें से ज्यादातर समूह हिन्द की साठ नस्लों वाली गायों, बछड़ों व बैलों को भी वही महत्ता देते हैं जो ओंकार और गंगा को देते हैं। अथर्ववेद कहता है - मूत्रं हि नील वर्णायाः कृष्णाया गोमयम् स्मृतम्, दुग्धम् तु ताम्र वर्णायाः श्वेतायाः दधि मुच्यते, कपिलायां घृतम् ग्राह््यम् कुशोदकम् सन्मीलायतत्। एतत् कायशोधनम्। तात्पर्य यह है कि नील गाय जिसे पश्चिम के लोग ब्लू बुल कहते हैं उसका गोमूत्र, पूर्णतः काली गाय का गोबर, पूर्णतः तांबे के रंग की गाय का दूध, पूर्णतः सफेद रंग की गाय का दही, कपिला गाय का घी और कुशोदक मिला कर विधिपूर्वक पंचगव्य यदि बनाया जाये तो वह कायशोधक है। कर्कव्याधि जिसे अंग्रेजी में कैंसर कहा जाता है उसका शमन करने वाला तथा एचआईवी से ग्रस्त रोगियों को यह पंचगव्य निरोग बनाने की क्षमता रखता है। हिन्द में बारह राशियां यथा मेष (मेढ़ा), वृष (बैल), मिथुन (एक पुरूष और एक स्त्री का जोड़ा), कर्क (केकड़ा - कर्क व्याधि का कारक), सिंह (व्याघ्र), कन्या (कुमारी कन्या जिसका विवाह न हुआ हो), तुला (तराजू लिये हुए व्यापारी या तुलाधर), वृश्चिक (बिच्छू), धनुर्धर (धनुष धारण किया हुआ योद्धा), मकर (नाका या ग्राह), कुंभ (कंधे में जलपूर्ण कंुभ रखा हुआ व्यक्ति), मीन (मछली) है। मेष संक्रांति को पंजाब में वैशाखी, असम में बिहू, समूचे दक्षिण भारत में संवत्सर पड़वा, गुडि पड़वा, उगादि, युगादि के पश्चात वर्ष का दूसरा महत्वपूर्ण दिन हिन्द के महीनों के नाम भी पहला महीना वैशाख, दूसरा महीना ज्येष्ठ, तीसरा महीना आषाढ़, चौथा महीना श्रावण, पांचवां महीना भाद्रपद, छठा महीना आश्विन, सातवां महीना कार्तिक, आठवां महीना अगहन, नौवां महीना पौष, दसवां महीना माघ, ग्यारहवां महीना फाल्गुन तथा बारहवां महीना चैत्र कहलाता हैै।
विधिविधानपूर्वक पंचगव्य निर्माण के लिये नीलगाय का गोमूत्र दो पल, कृष्णा गाय का गोबर एक पल, ताम्रवर्णा गाय का दूध चौदह पल, श्वेतवर्णा गाय का दही सात पल, कपिला गाय का घी दो पल, एक पल कुशोदक कुल मिला कर 27 पल सत्ताईस नक्षत्रों के लिये पंचगव्य निर्माण की सही विधि है। गौ उत्पादों को सम्मीलन करते समय वैदिक मंत्रों के उच्चारण से यदि जपा नंदा, पूर्णा तिथियोें विशेषतया शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी तथा पूर्णिमा के पूर्वाह्न में पंचगव्य सम्मीलन हो तो वह व्यक्ति के शरीर में लेप करने के एक घटी पश्चात स्नान करने पर शरीर को आधि व्याधि से मुक्त करने की क्षमता रखता है। महाशय अरूण पुरी से अनुरोध है कि वे अपने अभिन्न मित्र दिवंगत विनोद खन्ना की स्मृति में पंजाब के गुरूदासपुर जहां से विनोद खन्ना लोकसभा सांसद थे वह इलाका सरस्वती क्षेत्र भी है। वहां पंजाब की महत्वपूर्ण नदियों के बीच नीलगायों का बाड़ा बना कर कम से कम पांच एकड़ जमीन में पूर्णतः काले रंग की पांच गायें, उनके बछड़े पूर्णतः तांबे के रंग की पांच गायें उनके बछड़े पूर्णतः सफेद रंग की पांच गायें उनके बछड़े कपिला गाय को उनके बछड़ों सहित गौशाला जिसमें नीलगायों के बाड़े याने पांच ब्लू बुल याने नीलगायों के नर बछड़े चालीस गायें बछड़े एक साथ तथा दस अलग बाड़े में रख कर विधिपूर्वक पंचगव्य बनाया जाये और गुरदासपुर के लोकसभा क्षेत्र के सभी निवासियों को पंचगव्य का लाभग्राही सुनिश्चित किया जाये। अखबारों की खबरों से पता लगा कि दिवंगत विनोद खन्ना की धर्मपत्नी गुरूदासपुर से लोकसभा सदस्यता आकांक्षी हैं तो यह सोने में सुहागे का काम करेगा। यदि अरूण पुरी महाशय अपने दिवंगत स्नेही मित्र की यादगार में पंचगव्य अभियान का संकल्प लेने का उपक्रम करते हैं, यह ब्लागर उन्हें गुरदासपुर पहंुच कर विधिपूर्वक पंचगव्य निर्माण प्रक्रिया में सहयोग देगा तथा स्थानीय गो भक्तां एवं सही मायने में गोसेवा समझने वाले लोगों केे बीच रहने का प्रयास भी करेगा। एक ओर जहां स्वामी रामदेव सरीखे महानुभाव अपने कृत्य को दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रहे हैं, विधिपूर्वक पंचगव्य शोधन के रास्ते पर चलने से देहाती हिन्दुस्तान के लोगों में एक नयी ज्योति जाग्रत हो सकती है। शहरों में रहने वाले लोग भी पंचगव्य से कायशोधन का मार्ग अपना सकेंगे। यदि दिवंगत विनोद खन्ना की धर्मचारिणी तथा उनके प्रशंसक अपना सहयोग देंगे तो कर्क व्याधि तथा एचआईवी से निजात पाने का रास्ता खुल सकता है। पंजाब सरकार का सहयोग नीलगाय बाड़ा खड़ा करने में चाहिये। दूसरी ओर गुरूदासपुर के गांवों में पूर्णतः काली, ताम्रवर्णा तथा सफेद वर्णा गायों की भी खोज करनी होगी। यदि दिवंगत विनोद खन्ना के कार्यक्षेत्र से पंचगव्य के द्वारा कर्कव्याधि शमन का मार्ग प्रशस्त हुआ तो कम खर्चे में एक अद्भुत कार्य संपन्न हो सकेगा।
विधिविधानपूर्वक पंचगव्य निर्माण के लिये नीलगाय का गोमूत्र दो पल, कृष्णा गाय का गोबर एक पल, ताम्रवर्णा गाय का दूध चौदह पल, श्वेतवर्णा गाय का दही सात पल, कपिला गाय का घी दो पल, एक पल कुशोदक कुल मिला कर 27 पल सत्ताईस नक्षत्रों के लिये पंचगव्य निर्माण की सही विधि है। गौ उत्पादों को सम्मीलन करते समय वैदिक मंत्रों के उच्चारण से यदि जपा नंदा, पूर्णा तिथियोें विशेषतया शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी तथा पूर्णिमा के पूर्वाह्न में पंचगव्य सम्मीलन हो तो वह व्यक्ति के शरीर में लेप करने के एक घटी पश्चात स्नान करने पर शरीर को आधि व्याधि से मुक्त करने की क्षमता रखता है। महाशय अरूण पुरी से अनुरोध है कि वे अपने अभिन्न मित्र दिवंगत विनोद खन्ना की स्मृति में पंजाब के गुरूदासपुर जहां से विनोद खन्ना लोकसभा सांसद थे वह इलाका सरस्वती क्षेत्र भी है। वहां पंजाब की महत्वपूर्ण नदियों के बीच नीलगायों का बाड़ा बना कर कम से कम पांच एकड़ जमीन में पूर्णतः काले रंग की पांच गायें, उनके बछड़े पूर्णतः तांबे के रंग की पांच गायें उनके बछड़े पूर्णतः सफेद रंग की पांच गायें उनके बछड़े कपिला गाय को उनके बछड़ों सहित गौशाला जिसमें नीलगायों के बाड़े याने पांच ब्लू बुल याने नीलगायों के नर बछड़े चालीस गायें बछड़े एक साथ तथा दस अलग बाड़े में रख कर विधिपूर्वक पंचगव्य बनाया जाये और गुरदासपुर के लोकसभा क्षेत्र के सभी निवासियों को पंचगव्य का लाभग्राही सुनिश्चित किया जाये। अखबारों की खबरों से पता लगा कि दिवंगत विनोद खन्ना की धर्मपत्नी गुरूदासपुर से लोकसभा सदस्यता आकांक्षी हैं तो यह सोने में सुहागे का काम करेगा। यदि अरूण पुरी महाशय अपने दिवंगत स्नेही मित्र की यादगार में पंचगव्य अभियान का संकल्प लेने का उपक्रम करते हैं, यह ब्लागर उन्हें गुरदासपुर पहंुच कर विधिपूर्वक पंचगव्य निर्माण प्रक्रिया में सहयोग देगा तथा स्थानीय गो भक्तां एवं सही मायने में गोसेवा समझने वाले लोगों केे बीच रहने का प्रयास भी करेगा। एक ओर जहां स्वामी रामदेव सरीखे महानुभाव अपने कृत्य को दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रहे हैं, विधिपूर्वक पंचगव्य शोधन के रास्ते पर चलने से देहाती हिन्दुस्तान के लोगों में एक नयी ज्योति जाग्रत हो सकती है। शहरों में रहने वाले लोग भी पंचगव्य से कायशोधन का मार्ग अपना सकेंगे। यदि दिवंगत विनोद खन्ना की धर्मचारिणी तथा उनके प्रशंसक अपना सहयोग देंगे तो कर्क व्याधि तथा एचआईवी से निजात पाने का रास्ता खुल सकता है। पंजाब सरकार का सहयोग नीलगाय बाड़ा खड़ा करने में चाहिये। दूसरी ओर गुरूदासपुर के गांवों में पूर्णतः काली, ताम्रवर्णा तथा सफेद वर्णा गायों की भी खोज करनी होगी। यदि दिवंगत विनोद खन्ना के कार्यक्षेत्र से पंचगव्य के द्वारा कर्कव्याधि शमन का मार्ग प्रशस्त हुआ तो कम खर्चे में एक अद्भुत कार्य संपन्न हो सकेगा।
पहली जरूरत यह महसूस होती है कि गुजरात के जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क साधा जाये। मुल्क में आज जरसी गाय व संकर गाय का बाहुल्य है। इन दोनों किस्म की गौओं के गो उत्पाद की रासायनिक परीक्षण हेतु जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से अनुरोध किया जाये साथ ही गिर गौओं की जो पंदह से अठारह हजार देसी गायें गुजरात में आज भी मौजूद हैं उनके भी गो उत्पादों का रासायनिक परीक्षण कराया जाये। दूसरी ओर पंजाब के गुरदासपुर जिले में जितनी भी देसी नस्ल की गौ हैं उनके उत्पादों पर विश्लेषण करने का जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से कराया जाये। समाज राज्य सरकारों व केन्द्रीय सरकार से यह अनुरोध करे कि विभिन्न राज्यों के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की देसी नस्ल की गायों की कौन कौन किस्में आज भी जीवित हैं। यदि लुप्त होगयी नस्लों के बारे में पशुपालन विभाग से कोई सटीक जानकारी मिल सके लुप्त नस्लों की गायों के फोटो अथवा स्थानीय भाषाओं में लुप्त नस्लों की गायों की कोई सुझाव गाथा मिल सके उसे भी प्रयोग में लाया जाना चाहिये। बर्तानी राज के हिन्द में प्रभावी होने बर्तानियां केे लोगों का गौमांस भोजन की अनिवार्यता तथा अंग्रेज अफसरों उनके परिजनों के लिये आसेतु हिमाचल जहां जहां बर्तानी हुक्मरान थे उनके लिये नित्य गौमांस के लिये क्या व्यवस्था अपनायी गयी, जो रियासतें हिन्दू राजाओं के शासन में थीं क्या राजपूताना के हिन्दू राजाओं के यहां भी गोवध को वरीयता दी जाती थी या पड़ोस के बर्तानी हुक्मरान के लिये जो गोेमांस आता था उसमंे से रियासत के रेजिडेंट के लिये भी गोमांस की व्यवस्था की जाती थी। ये सारे सवाल समग्र रूप से विवेचित होने इसलिये जरूरी हैं क्योंकि गोमांस उपलब्धि के लिये ही बर्तानी अफसरों ने हिन्दू मुस्लिम विभाजन की खाई चौड़ी बनाई। फूट डालो राज करो उनका मंतव्य था इसलिये जिस मुल्क में आज भी अठारह करोड़ मुसलमान रहता है उनके मध्य सौमनस्यता कायम करना निहायत जरूरी है। भारत में कार्यरत विभिन्न कर्कव्याधि निवारक प्रवृत्तियों के लिये अरूण पुरी महाशय अत्यंत अंधविश्वास से भरपूर हैं कि एक दिन हिन्द की कैंसर मारक शक्ति से मुल्क को बचा लिया जायेगा परंतु उन्होंने विभिन्न चिकित्साओं का जो हवाला प्रस्तुत किया है वह अत्यंत व्यय साध्य है। क्या हिन्द का वह गरीब जो रोजाना बीस रूपये भी जुगाड़ करने की क्षमता अर्जित नहीं कर पाया है इतनी महंगी चिकित्सा से लाभान्वित हो सकेगा ? गरीबों की पंगत में आखिरी व्यक्ति के लिये अगर कोई वैकल्पिक रास्ता अपने अभिन्न स्नेही रहे विनोद खन्ना की पुण्यस्मृति में अरूण पुरी महाशय सोच सकें तो वह तरीका हिन्दुस्तानी गौओं के गो उत्पाद जन्य पंचगव्य से कम खर्च में इलाज का वैकल्पिक मार्ग खोज कर कर्क व्याधि से दिवंगत विनोद खन्ना के लिये एक अद्भुत स्मृति चिह्न का आकार ले सकता है। इसलिये भारतीय जनता पार्टी व पंजाब के महत्वपूर्ण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र जहां से विनोद खन्ना अनेक बार लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए वहां एक सक्षम हिन्द की देसी नस्ल वाली गायों की गौशाला युग की पुकार है। इस शिवसंकल्प को अरूण पुरी महाशय को आजमाना चाहिये। अपने अभिन्न मित्र की स्मृति में पंचगव्य से कैंसर तथा एचआईवी व्यक्तियों पर रोक का रास्ता प्रशस्त हो सकता है। कम खर्चे मंे कर्क व्याधि से निजात पाई जा सके तो हिन्द के गरीब लोगों की सेवा होगी। एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है कि क्या मेडिकल या मेडिसिन साइंस है या औषध का प्रयोय औषधवेत्ता की कला है ? एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ उत्तराखंड में एक रमणीक जगह का नाम चंपावत है। अब यह जिला हेडक्वार्टर है। यहां कुमांऊँ के चंद राजाओं की राजधानी थी। यह स्थान हिन्द व नैपाल सीमा से मात्र पंद्रह मील दूर पश्चिम की ओर की सुन्दर वादी है। यहां की चंदवंशी राजपूत महारानी अस्वस्थ थी। वैद्य स्त्री स्पर्श नहीं करते थे इसलिये उन्होंने एक तरीका खोजा। महारानी की नाड़ी में सूत्र बंधवाया और उस सूत के जरिये महारानी के रोग का निदान कर वैद्य ने महारानी को रोगमुक्त कर डाला। यह घटना केवल सवा सौ साल पुरानी है। ऐसे वैद्यों को तब नाड़ी वैद्य कहा जाता था। पंडित नेहरू के समवयस्क उनके साथ स्वतंत्रता के लिये जेलों में रहे काशी के प्रख्यात वैद्य शिव त्रिपाठी पंडित नेहरू के अत्यंत प्रिय साथी थे। जब जवाहरलाल 1946 में अंतरिम प्रधानमंत्री बने 15 अगस्त 1947 को मुल्क आजाद हुआ। पंडित जी के घने दोस्त शिव त्रिपाठी दिल्ली पहुंचे। पंडित नेहरू से कहा - पंडित जी अब आप हिन्द के राजा हो। यह गरीब वैद्य आपसे भीख मांगने आया है। आयुर्वेद की भीख मुझे दीजिये। पंडित जी डेमोक्रेट थे उनकी स्वास्थ्यमंत्री राजकुमारी अमृत कौर थीं। उन्होंने अपने लंगोटिया यार रहे दोस्त वैद्य शिव त्रिपाठी से कहा - शिव, राजकुमारी अमृत कौर का महकमा है उनसे बात करो। वैद्य शिव त्रिपाठी ने कहा - पंडित जी भीख तो आपसे मांग रहा हूँ किन्तु आप मुझे क्रिस्तान के पास भेज रहे हो। भीख नहीं मिली कोई बात नहीं अब आपके दरवाजे कभी नहीं आऊँगा। पंडित नेहरू शिव त्रिपाठी प्रकरण विस्तार से जानना हो तो ‘हिमकर’ वेब ऐड्रेस ideal1idea.blogspot.com ब्लाग का अवलोकन करें। वैद्यों, डाक्टरों, हकीमों में सहानुभूति वाली महाविभूति क्यों जरूरी है यह जानने के लिये कृपया ब्लाग ‘हिमकर’ पढ़ें तो बात स्पष्ट होगी। आज विश्व की पहली जरूरत खर्चीली डाक्टरी नहीं रहीम खानखाना की उक्ति - रहिमन बहु भेषज करत व्याधि न छाड़त साथ का अनुशीलन करने की हैै। रोगी और वैद्य में समझबूझ की पहली जरूरत है। भेषज या औषध प्रयोग विज्ञान नहीं कला है इसलिये जो चिकित्सक इस कला का माहिर है वही रोग निवारण करा सकता है। अरूण पुरी महाशय नये नये वैज्ञानिक मेडिसिनता अनुसंधानों के समानांतर सहानुभूति पक्ष का भी विवेचन करें ताकि विनोद खन्ना की स्मृति में से एक नया रास्ता खोज ले। पंचगव्य निर्माण विधि भी ब्लाग ‘हिमकर’ वेब ऐड्रेस ideal1idea.blogspot.com के सन 2014 की पोस्टों में पढ़ी जा सकती है।
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