Tuesday, 1 November 2016

क्या उत्तराखंड के दलित हित संवर्धन का इकला रास्ता सीमावर्ती गांवों को रक्षा मंत्रालय के घेरे में?
असली उत्तराखंड के वर्तमान तेरह जिलों वाले देहरादून से शासित होने वाले पूरी तरह से पहाड़ी इलाकों वाले देहरादून जिले के मसूरी सहित पूर्णतः पर्वतीय इलाके टेहरी, चमोली, उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग तथा पौढ़ी (पौढ़ी जिले के भाबर व तराई इलाके छोड़ कर) तथा असली उत्तराखंड के नौ हजार गांव पधान और थोकदारों का जमावड़ा उत्तरायणी मकर संक्रांति विक्रम संवत 1978 शक संवत 1843 पौष मासांति ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार 13 जनवरी 1921 की शाम बागनाथ बागेश्वर (सरयू और गोमती संगम) पर कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे उनके अद्वितीय सहयोगी हरगोविन्द पंत तथा चिरंजी लाल साह के संयुक्त नेतृत्व में अल्मोड़ा के तत्कालीन कलक्टर मिस्टर डाइविल ने बदरी दत्त पांडे ओर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए कुली उतार का संकल्प लिये कुमांऊँ तथा ब्रिटिश गढ़वाल (वर्तमान पौढ़ी गढ़वाल) के सभी गांव पधान व थोकदार किसी भी कष्ट को सहने के लिये तैयार थे। बदरी दत्त पांडे अपने 51 साथियों सहित उत्तरायणी के पच्चीस दिन पहले नागपुर कांग्रेस में महात्मा गांधी से मिलने गये थे। उन्होंने अहिंसक कुली उतार का संकल्प महात्मा को सुनाया। महात्मा ने उन्हें मकर संक्रांति के उत्तरायणी पर्व में सफल आंदोलन के लिये प्रोत्साहित किया। जब नौ हजार लोग जो सरयू में स्नान कर सुबह हाथ में जल लेकर संकल्प कर रहे थे रानीखेत की गोरा फौज ने कलक्टर का हुक्म मानने से इन्कार कर दिया। महात्मा गांधी ने बदरी दत्त पांडे के कुली उतार अभियान की तुलना अब्राहम लिंकन के दास प्रथा समाप्ति से कर यंग इंडिया में लिखा - बागेश्वर कुमांऊँ का अहिंसक कुली उतार आंदोलन अब्राहम लिंकन के दास प्रथा समाप्ति अभियान से अत्यंत उत्कृष्ट है। अब्राहम लिंकन को दास प्रथा  समाप्ति के लिये जहां हजारों जवानों की जिन्दगी लील गई स्वयं अब्राहम लिंकन को भी गोली का शिकार होना पड़ा। बदरी दत्त पांडे के अहिंसक आंदोलन ने कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़वाल के लोगों का कुली बरदायश देने से इन्कार करना एक बहुत श्रेयष्कर उपलब्धि है। 1921 में बदरी दत्त पांडे उनतालीस वर्ष के प्रौढ़ थे। उन्होंने कुमांऊँ के गांव गांव घूम कर कुली बरदायश के खिलाफ लगातार दस वर्ष लोक जाग्रति का माहौल बनाया। आज लोगों को यह मालूम नहीं कि उनके पूर्वजों ने कुली बरदायश में कैसी कठिनाईयां मिलीं, हर बर्तानी अफसर बिना गोमांस खाये नहीं रहता था। उन्हें अपने साजो सामान के साथ गोमांस के बक्से, कमोड के डब्बे, कुत्तों तथा उनके छोटे छोटे शावकों को भी कंधे का बोझ बना कर एक स्थान से दूसरे स्थान जहां डाक बंगला हो अगले डाक बंगले तक पहुंचाना पड़ता था। साथ ही खानपान की रसद, दूध, दही, घी भी हर परिवार  को देना होता था जिसका कोई दाम भुगतान नहीं होता था। यह सिलसिला सन 1816 कुमांऊँ में गुर्खा राज की गोरख्योल की समाप्ति से शुरू होगया था। ज्यों ज्यों बर्तानी राज व्यवस्था मजबूत होती रही त्यों त्यों कुली बरदायश भी बढ़ती रही। बीसवीं शती के पहले दो दशकों में तो कुली बरदायश असहनीय ही हो गयी थी। कूर्मांचल केसरी ने इस अन्याय से छुटकारा पाने के लिये निरंतर प्रयास किया। सन 1918 में जब महात्मा गांधी कोलकाता से चंपारण जाने वाले थे कूर्मांचल केसरी ने यह प्रसंग इलाहाबाद से कोलकाता जाकर महात्मा गांधी के संज्ञान में पहली बार प्रस्तुत किया। तब वे इलाहाबाद के अंग्रेजी अखबार लीडर से जुड़े थे। इलाहाबाद से तब अंग्रेजी अखबार अमृत बाजार पत्रिका भी छपता था। इलाहाबाद हिन्दुस्तान की आजादी संघर्ष का मुख्य केन्द्र भी था। महात्मा से कूर्मांचल केसरी ने कोलकाता में कहा - आप एक बार कुमांऊँ आकर स्वयं अपनी आंखों से वहां के हाल देखें। महात्मा ने बदरी दत्त पांडे को आश्वासन दिया कि वे कुमांऊँ आयेंगे। महात्मा की महत्वपूर्ण कुमांऊँ यात्रा का प्रबंधन पंडित नेहरू ने जून 1929 में किया। वे बदरी दत्त पांडे की देशभक्ति से प्रभावित तो थे ही, उन्होंने जब अल्मोड़ा म्यूनिसिपल बोर्ड के अध्यक्ष फादर ओकले का हिन्दी भाषण सुना वे अत्यंत आह््लादित हुए। फादर ओकले म्यूनिसिपल बोर्ड अल्मोड़ा के अध्यक्ष होने के साथ साथ रामजे हाईस्कूल के अंग्रेजी अध्यापक भी थे। विक्टर मोहन जोशी दूसरे स्वतंत्रता सेनानी थे जिनसे महात्मा गांधी प्रभावित हुए। महात्मा ने फादर ओकले से अनुरोध किया कि वे अपने विद्यार्थियों में ऐसा योग्य छात्र बतायें जिसे पंडित मोतीलाल नेहरू के सहायक के रूप में विकसित किया जा सके। द्वाराहाट के वमन गांव के शिव दत्त उपाध्याय को फादर ओकले ने चुन कर महात्मा को कहा - यह युवक पंडित मोतीलाल नेहरू के सहायक के रूप में रखिये। महात्मा गांधी ने स्वयं शिव दत्त उपाध्याय की कठोर परीक्षा अंग्रेजी स्टेनोग्राफरी में ली तथा पंडित मोतीलाल नेहरू को कहा - पंडित जी यह युवक शिव दत्त आपके काम का नौजवान है। पंडित मोतीलाल नेहरू के पश्चात शिव दत्त उपाध्याय पंडित नेहरू को सहयोग देते रहे। आजादी के पश्चात वे तीन बार सतना म.प्र. से सांसद तथा कालांतर में राज्यसभा सदस्य रहे। 
पहाड़ों के गांवों की वर्तमान दुर्दशा से व्यथित डाक्टर अनिल जोशी केदारखंड और मानसखंड के गांवों में घूम रहे हैं। उन्हें गांवों के निर्जन होने का दर्द सता रहा है। वे असली उत्तराखंड के गांवों में वह चमक देखना चाहते हैं जिसे बदरी दत्त पांडे ने अपने प्रयास से जागरूक किया तथा कुमांऊँ को हिन्द की आजादी का एक जागरूक पड़ाव बना डाला। महात्मा गांधी जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा प्रस्तावित कुमांऊँ प्रवास पर आये उन्होंने भवाली, ताड़ीखेत, अल्मोड़ा, कौसानी व बागेश्वर में कुमांऊँ की सुन्दर घाटियों को देख कर कहा - कुमांऊँ भारत का स्विट्जरलैंड है। उन्होंने अपनी अद्भुत कृति अनासक्ति योग भगवद्गीता का गुजराती भाष्य का प्राक्कथन कौसानी में लिखा। 
उत्तराखंड या उत्तरांचल राज्य को गठित हुए सोलह वर्ष संपन्न होगये। इन सोलह वर्षों में उत्तराखंड का शासन वर्तमान मुख्यमंत्री सहित सात महानुभाव संपन्न कर चुके हैं पर असल उत्तराखंड के हालात बद से बदतर होते जारहे हैं। लगभग साढ़े तीन हजार गांव निर्जन हो चुके हैं। निर्जन होने वाले गांवों में ज्यादातर गांव केदारखंड व मानसखंड इलाकों के हैं। पिथौरागढ़ जिले के आठ विकास खंडों के 1660 गांवों में से 1100 गांव निर्जन होगये बताये गये हैं। केदारखंड व मानसखंड ही असल उत्तराखंड है। दून घाटी हरिद्वार तथा नैनीताल की तराई जिसे अब ऊधमसिंह नगर जिले के रूप में पहचाना जाता है इनकी प्रति व्यक्ति आमदनी के ऊँचे स्तर पर होने के कारण उत्तराखंड भारत के समृद्ध राज्यों की श्रेणी में भी गिना जाता है। उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री डाक्टर संपूर्णानंद तथा उ.प्र. की राजनीति के लौहपुरूष चंद्रभानु गुप्त पर्वतीय इलाकों के लिये उदार दृष्टि रखते थे। डाक्टर संपूर्णानंद ने 1960 में तत्कालीन उ.प्र. के टेहरी जिले की उत्तरकाशी तहसील, पौढ़ी जिले की चमोली तहसील तथा अल्मोड़ा जिले की पिथौरागढ़ तहसीलों को जिला बनाया याने उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ तीन नये जिले बने। इनको डाक्टर संपूर्णानंद ने उत्तराखंड डिवीजन का नाम दिया। कालांतर में गढ़वाल व कुमांऊँ के मूल निवासी जननेता हेमवती नंदन बहुगुणा तथा नारायण दत्त तिवारी उ.प्र. के मुख्यमंत्री रहे। उन्हांेने अपने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में क्रमशः नैनीताल की तराई व देहरादून घाटी का उत्कर्ष संपन्न किया। बहुगुणा जी ने मेरठ कमिश्नरी से देहरादून को हटा कर गढ़वाल कमिश्नरी का महत्वपूर्ण जिला घोषित कर डाला। बहुगुणा व ब्रह्म दत्त शर्मा ने देहरादून का उत्कर्ष किया। पंडित नारायण दत्त तिवारी ने अपने उ.प्र. के मुख्यमंत्रित्व काल में नैनीताल की तराई को ही पहाड़ मान कर उसका विकास संपन्न किया। चार बार उ.प्र. के मुख्यमंत्री रहे विकास पुरूष तिवारी जी ने अपने उत्तराखंड के मुख्यमंत्रित्व काल में भी सिडकुल से पिटकुल तक तीस हजार करोड़ से ज्यादा रकम का विनिवेश कराया और अपनी यशोगाथा में चार चांद लगाये पर कुमांऊँ व गढ़वाल के पूर्णतः पर्वतीय इलाके के लिये उनके मन में दया नहीं आयी। बहुगुणा जी व तिवारी जी की विशेष कृपा के कारण ही आज ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार तथा देहरादून की प्रति व्यक्ति आमदनी ज्यादा होने के कारण उत्तराखंड भारत के समर्थ व संपन्न राज्यों की सूची में है परंतु जो लोग तथाकथित सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य) तथा दलित महादलित अथवा दूसरे पिछड़े वर्ग के जो लोग आज भी उत्तरकाशी, टेहरी, चमोली, रूद्रप्रयाग, पौढ़ी व देहरादून के पूर्णतः पहाड़ी गांवों में रह रहे हैं साथ ही कुमांऊँ मंडल के पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत तथा अल्मोड़ा जिलों के पहाड़ी गांवों व नैनीताल जिले के छखाता इलाके के गांवों में जो लोग रह रहे हैं, सड़कों के किनारे वाले गांवों के हालात फिर भी अत्यंत शोचनीय नहीं हैं पर जो लोग मोटर सड़क से पांच मील से ज्यादा दूर के गांवों में रहते हैं उन गांवों से सभी समर्थ नौकरीपेशा लोग पहाड़ से नीचे उतर चुके हैं। अपनी सेहत तथा बच्चों की शिक्षा के लिये पहाड़ छोड़ने का कारण बताते हैं। दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने देहरादून से खबर छापी है कि उज्ज्वलपुर में भाजपा अनुसूचित मोर्चा का स्वाभिमान सम्मेलन संपन्न हुआ। केन्द्रीय राज्यमंत्री कपड़ा मंत्रालय अजय टम्टा महाशय ने स्वाभिमान सम्मेलन में कहा - दलितों के उत्थान को विशेष प्रयास कर रहा केन्द्र जो लोग अब भी उत्तराखंड के गांवों में रह रहे हैं वे चाहे दलित हों या सवर्ण उनकी आर्थिकी दशा का विश्लेषण राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत जरूरी है। दलितों व आदिम जातियों (शेड्यूल्ड ट्राइब लोगों में जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया है) उन्हें यदि वे अपने मौरूसी गांव को छोड़ कर अन्यत्र नहीं गये हैं उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा पेटे माहवारी न्यूनतम आवश्यकता को देखते हुए सीमा प्रांत के गांव में सीमा रक्षक के रूप में तब तक वित्त पोषण किया जाये जब तक उनके परिवार के कम से कम दो लोगों को नौकरी या रोजगार नहीं मिल जाता। यह उत्तरदायित्त्व रक्षा मंत्रालय को लेना चाहिये तथा उन लोगों में जो सेना में भर्ती होने के काबिल हैं उन्हें प्राथमिकता देकर सेना में भर्ती किया जाना चाहिये। पहले चरण में दलित तथा अनुसूचित जनजाति दूसरे चरण में गांव में रह रहे गरीब सवर्ण जिनकी आमदनी रोजाना बीस रूपये से कम है उन सबको सीमा सुरक्षा पेटे गुजारा करने के लिये वित्त पोषण किया जाये। महिला श्रम शक्ति को हाथ बिनाई के जरिये स्वेटर पुलोवर ऊनी टोपी दस्ताने तथा मोजे निर्मित करने की दिशा में प्रयत्न किया जाये। रक्षा मंत्रालय जो वित्तीय प्रावधान उनके हितार्थ राष्ट्रीय सुरक्षा पेटे करे उसे रोजगार से भी जोड़ा जाये। लोगों के दिमाग में यह न पैठाया जाये कि उन्हें मुफ्त रूपये मिल रहे हैं उन्हें बताया जाये कि उनको हाथ से भी काम करना होगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में आंगनबाड़ी मध्याह्न का भोजन आदि कार्यक्रमों को अलग अलग संपन्न किये जाने के बजाय सीमावर्ती गांव की गांव पंचायत के माध्यम से ही संपन्न किया जाये तथा जिन सीमा गांवों की जमीनें बंजर हैं उन नापशुदा जमीनों का बन्दोबस्ती मालिक कौन है अभी कहां रह रहा है आदि ये सारी जानकारियां पंचायत को हों। पंचायत को उनकी जमीन किराये पर लेने का अधिकार दिया जाये। बंजर जमीन में पंचायत द्वारा नियुक्त कार्मिकों द्वारा खेतीबाड़ी हो। सीमा क्षेत्र के सभी गांवों का योगक्षेम रक्षा मंत्रालय की देखरेख में चले तभी हमारा देश अरूणाचल प्रदेश में चीन की धमकी व भभकी का सामना कर सकता है व तभी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर गिलगित व बाल्टिस्तान का योगक्षेम भारत सरकार संकल्पित कर सकती है। वहां जहां सीमा क्षेत्र हैं उन्हें Union terretary under deffence Orgnisation का कानूनी स्तर मिलना अत्यंत आवश्यक है। 
9 नवंबर 2000 के पश्चात उत्तरांचल उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के पश्चात पिछले सोलह वर्षों में सीमावर्ती गांवों में मदिरा सेवन का बोलबाला हुआ है। अकेले पिथौरागढ़ जिले में जहां 1951-52 में देसी शराब का व अंग्रेजी शराब का सालाना ठेका क्रमशः 39,000/- तथा 14,000/- रूपये होता था, बदायूं के देशी शराब विक्रेता अशर्फीलाल और पिथौरागढ़ शहर में अंग्रेजी शराब विक्रेता किशन सिंह महरा सरकारी खजाने में शराब की किश्त जमा नहीं कर पाते थे, तब पिथौरागढ़ तहसील मुख्यालय था। शराब की केवल एक दुकान देसी शराब और एक दुकान अंग्रेजी शराब की थी। जहां वर्ष 2015-16 में आबकारी राजस्व के रूप में पांच लाख आबादी वाले पिथौरागढ़ जिले में प्रति व्यक्ति रूपया चार रोजाना की दर से उत्तराखंड सरकार के खजाने में जमा होरहा है। पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चंपावत व बागेश्वर जिलों का ज्यादा कर्मचारी सुबह से शाम तक नशे में रहता है। सीमावर्ती गांवों की हालत अत्यंत दयनीय है। जो लोग मजदूरी का कार्य कर कमाई करते हैं उनका ज्यादा रूपया शराब पीने में ही खत्म होता है। पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चंपावत तथा बागेश्वर जिलों के हर गांव से भारत की फौज में हजारों लोग हैं। रिटायरी पेंशन व परिवार पेंशन बांटना ही यहां के खजानों और बैंकों का मुख्य काम है। जो लोग पेंशन पर जाकर अपना मूल गांव छोड़ कर नैनीताल की तराई तथा ऊधम सिंह नगर में बस गये हैं वे एक दफा अपना जिन्दा होने का प्रमाण पत्र देने अपने गांव के नजदीक के बैंक अथवा ट्रेजरी में जाते हैं। उत्तराखंड की सरकार के आंकड़े ऊधम सिंह नगर नैनीताल की शेष तराई हरिद्वार व देहरादून एवं पौढ़ी के भाबर के बारे में विश्वसनीय हो सकते हैं पर सीमावर्ती गांवों के संबंध में सरकारी आंकड़ों पर विश्वास नहीं किया जा सकता इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि 1. उत्तरकाशी 2. चमोली 3. रूद्रप्रयाग 4. बागेश्वर 5. पिथौरागढ़ 6. चंपावत जिलों के जो गांव चीनी वास्तव में तिब्बती सीमावर्ती है अथवा तिब्बत भारत सीमा से भारत की ओर सड़क मार्ग से 50 किलोमीटर अंदर है सड़क मार्ग अथवा वायु मार्ग जो भी दूरी कम हो उसके अन्दर के सभी गांवों शहरों वन पंचायतों आरक्षित वनों तथा चारों ओर जंगल से घिरे गांवों को राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी देते हुए रक्षा मंत्रालय डी आर डी ओ या रक्षा मंत्रालय के ऐसे संगठन की देखरेख में केन्द्र शासित क्षेत्र का स्वरूप दिया जाये ताकि तिब्बत तथा नैपाल सीमा से सटे हुए इलाकों का राष्ट्रीय योगक्षेम सुनिश्चित हो। उत्तराखंड की सरकार चाहे उसका संचालन अ.भा. कांग्रेस करे अथवा भाजपा करे दोनों दलों में यह कूवत नहीें है कि वे सीमावर्ती गांवों व उनके रहने वाले लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार कर सकें। इसका मुख्य कारण यह है कि उत्तराखंड सरकार में देहरादून व दून घाटी हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर के तीन जिलों के लगभग साठ लाख लोगों का सुगम स्थानीय बहुमत है। दुर्गम क्षेत्रों के लिये उत्तराखंड शासन उदारतापूर्वक सोच ही नहीं सकता। उत्तराखंड का लोक बहुमत दुर्गम क्षेत्रों के हित में संभव ही नहीं है क्योंकि उन क्षेत्रों के लोक प्रतिनिधि भी अपना आशियाना दून घाटी हरिद्वार ऊधम सिंह नगर या नैनीताल व पौढ़ी की तराई व भाबर इलाके में ही बनाना श्रेयस्कर मानते हैं। उनकी सहानुभूति भी सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों के साथ नहीं है। इसलिये केन्द्रीय कपड़ा राज्यमंत्री महाशय से नम्र विनती है कि वे सीमावर्ती गांवों के दलित परिवारों का आगणन करायें। जिस परिवार से एक भी व्यक्ति सरकारी अर्ध सरकारी सेना रेल आदि में रोजगार याफ्ता नहीं है ऐसे परिवारों को रक्षा मंत्रालय सीमा सुरक्षा निधि से गुजारा राशि दिलाये जाने का प्रस्ताव करे। उनका अपना मंत्रालय निटिंग यार्न कताई निटिंग याने बुनाई पेटे हर दलित परिवार की महिलाओं के Rural Employment Guarantee Scheme के अंतर्गत 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करे तथा दलित परिवारों से जिन नौजवानों और नवयुवतियों को सेना में भर्ती करने योग्य माना जाये उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सेना में प्रवेश का संकल्प रक्षा मंत्रालय ले। दूसरी ओर सीमावर्ती जनपदों में नशाखोरी दिन प्रतिदिन बढ़ती जारही है। बिहार की नशाबंदी का उदाहरण सामने है। उत्तराखंड के ऐसे लोगों को चिह्नित किया जाये जो बिना शराब जिन्दा नहीं रह सकते। संविधान के अंतर्गत ऐसे लोगों को जिन्दा रहने के लिये शराब आवंटन का संकल्प लिया जाये। सीमावर्ती क्षेत्र के सभी राज्य कर्मचारियों को यदि उनकी पात्रता हो प्रति नियुक्ति पर रक्षा मंत्रालय ले। उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत के सभी राजकर्मियों को रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रति नियुक्ति पर लिया जाकर ही सीमावर्ती शासन व्यवस्था पूर्णतः रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत संकल्पित हो। इस विकल्प के अपनाने से उत्तराखंड सरकार में विधायक संख्या उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत जिलों के विधायक संख्या कम हो जायेगी। उसकी प्रतिपूर्ति बिजनौर जिले के सभी विधान सभा क्षेत्रों को उत्तराखंड में सम्मिलित कर दोहरा लाभ मिल सकता है। 1. बिजनौर के पिछड़ापन का समापन 2. देहरादून से हल्द्वानी तक उत्तराखंड सड़क मार्ग तथा कोटद्वार से टनकपुर तक रेलवे लाइन निर्माण उत्तराखंड से केन्द्र सरकार में राज्यमंत्री अजय टम्टा महाशय उत्तराखंड के दलित समाज का हित संवर्धन करने के लिये समर्थ भूमिका निर्वाह कर सकते हैं। ज्ञातव्य है कि उत्तराखंड के कुमांऊँ मंडल में मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने जिन्हें लोग दलित कह रहे हैं उन्हें शिल्पकार कहा। कुमांऊँ के शिल्पकार समाज में कई निष्णात पुछेरे हैं जो अपने पास पहुंचने वाले दुखी व्यक्तियों का कष्ट दूर करने में अपनी योग्यता प्रदर्शित करते हैं। कुमांऊँ में ढोली (ढोल बजाने वाले लोग) डंगरिया में ईश्वरावतरण आंशिक समय के लिये संपन्न करते हैं। शिल्पकला में दक्ष श्रौत परंपरा का अनुसरण करने वाले कुमांऊँ के शिल्पकारों में मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने एक नयी शक्ति का संपात किया। केन्द्र में नवनियुक्त कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा को चाहिये कि वे गांवों में जो शिल्पकार रह गये हैं उनका योगक्षेम सुनिश्चित करने के लिये रक्षा मंत्रालय की सीमा सुरक्षा निधि से पोषण करने के लिये तात्कालिक उपाय किये जायें कुमांऊँ केे शिल्पकारों की आस्थाजन्य शक्ति संपात को भी उजागर करने की तात्कालिक आवश्यकता है।
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