राजनैतिक शत्रुता का सबसे बड़ा उदाहरण पंचम वेद महाभारत वर्णित द्रुपद-द्रोण द्वेष है। प्रतर्दन नंदन द्रुपद राजपुत्र थे। द्रोण, भारद्वाज नंदन ब्राह्मण कुमार थे। दोनों की शास्त्र, शस्त्र, शिक्षा साथ-साथ हुई थी। दोनों दीक्षाकालीन मित्र भी थे। वास्तविक व्यावहारिक जीवन में द्रुपद पांचाल नरेश थे, द्रोण एक ऐसे निर्वासित विवाहित ब्राह्मण जिनकी पत्नी कृपी अपने पुत्र अश्वत्थामा को चावल पीस कर उसे पानी में मिला कर फिर कढ़ाई में उबाल कर दूध बता कर उसे पिलाती थी। द्रोण विद्वान थे, समर्थ योद्धा थे पर दरिद्रता ने उन्हें घेर रखा था। वह बाल दीक्षा सखा पांचाल नरेश द्रुपद राजधानी गये। उद्देश्य राजा द्रुपद से एक गाय का गौदान मांगना था। पांचाल नरेश ने अभ्यागत द्रोण से कहा - राजा की मित्रता केवल राजा से ही हो सकती है, भिखारी ब्राह्मण से नहीं। द्रोण निराश होकर पांचाल राज्य से कुरू राज्य की ओर बढ़े। उनकी मुलाकात कुरू राज्य के संरक्षक भीष्माचार्य से हुई। भीष्माचार्य दुर्योधनादि धार्तराष्ट्रों व पांच पांडवों के लिये योग्य शस्त्र-शास्त्र विशारद गुरू की तलाश में थे। उन्हें जब द्रोणाचार्य दिखायी दिये द्रोण के तेज को भांप कर भीष्माचार्य ने उनका परिचय जानना चाहा। द्रोण ने अपना परिचय देते हुए कहा - जामदग्न्य राम का शिष्य हूँ। भीष्म स्वयं जामदग्न्य राम के चहेते शिष्य थे। उन्होंने पूर्ण सम्मान देते हुए गुरू द्रोणाचार्य को अपने पौत्रों धार्तराष्ट्रों-पांडवों का आचार्य नियुक्त कर हस्तिनापुर में द्रोण की संस्तुति पर द्रोण पत्नी कृपी के अग्रज कृपाचार्य को भी कौरव-पांडवों का आचार्य सुनिश्चित कर लिया।
सत्य-असत्य, अहिंसा-हिंसा, अपरिग्रह-परिग्रह, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, दया-निर्दयता, ज्ञान-अज्ञान इन सातों का अपने समुच्चयी से चोली-दामन सरीखा साहचर्य है। इन सातों गुणों के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। कुरूराज पाण्डु के निधन के पश्चात हस्तिनापुर की राजनीति में दुर्योधन-शकुनि भागिनेय व मामा का षडयंत्र प्रभावी होगया। प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र अंधता के कारण कुरू पंचायत द्वारा सिंहासनस्थ नहीं किये गये थे। राज्याधिकार पाण्डु को दिया गया था। पाण्डु की मृत्यु के पश्चात आपद्-धर्म के रूप में धृतराष्ट्र को राज सिंहासन पर इस शर्त्त पर अधिष्ठित किया गया था कि धृतराष्ट्र व पाण्डु पुत्रों में ज्येष्ठ राजकुमार को सोलह वर्ष की उम्र पर राज सिंहासन पर आसीन किया जायेगा। धृतराष्ट्र के पुत्र मोह तथा षडयंत्रकारी गांधार नरेश सुबल राजकुमार शकुनि ने अपने भागिनेय दुर्योधन के कुरूराज बनाने के लिये जो रास्ता अपनाया उस पर राजा धृतराष्ट्र की भी मौन सहमति थी। यही कारण था कि वारणावत में लाक्षागृह निर्मित करने व पुरंजन नाम के शकुनि के विश्वस्त व्यक्ति को लाक्षागृह का अधिष्ठाता नियुक्त किये जाने में षडयंत्र की जानकारी महामात्य विदुर को होगयी। उन्होंने षडयंत्र से पाण्डु पुत्रों को बचाने के उपाय कर महाराज धृतराष्ट्र के द्वारा समर्थित शकुनि-दुर्योधन युति वाले षडयंत्र का प्रति षडयंत्र खोज डाला, राजा धृतराष्ट्र के महामात्य विदुर ने। विदुर के लिये धृतराष्ट्र व पाण्डु दोनों समान थे। धृतराष्ट्र इसलिये ज्यादा महत्त्व रखते थे क्योंकि धृतराष्ट्र की माता अंबिका जिसका दूसरा नाम कौसल्या भी था, उस विचित्रवीर्य की रानी काशिराज सुता अंबिका ने स्वयं सत्यवती नंदन पाराशर्य कृष्ण द्वैपायन के पास अपनी अति सुन्दरी दासी को अपने वस्त्राभूषण पहना कर भेजा। सत्यवती नंदन पाराशर्य कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने इस कृत्य को ‘‘मात्रोक्ता बादरायण’’ यह कर्म उन्होंने माता-जननी की आज्ञा से किया। विदुर महामति तथा प्रजागर व्यक्तित्त्व थे। उन्हें धर्माधर्म का सूक्ष्म ज्ञान था। उन्होंने शकुनि-दुर्योधन के षडयंत्र कुंती सहित पाण्डु पुत्रों को समाप्त करने के लिये जो गुप्त योजना पुरंजन के माध्यम से वारणावत के लाक्षागृह में रचित की वह महात्मा विदुर को मालूम होगयी। उन्होंने षडयंत्र को विफल करने के उपाय खोजे। अपने विश्वस्त व्यक्तियों खनक एवं नाविक को तैयार किया। चूंकि विदुर अपने आपको दासी पुत्र होने के कारण शूद्र मानते थे इसलिये उनका व्यवहार समाज के दुर्बल वर्गों के लिये मददगार होता था। खनक ने लाक्षागृह के अंतर्गत सुरंग बना डाली। सुरंग तैयार होने पर सुरंग का प्रवेशद्वार कौंतेय युधिष्ठिर को बता दिया और अच्छी तरह समझा दिया कि सुरंग गंगा तट पर निकलती है। वहां भी एक ऐसा दरवाजा खड़ा किया जिसकी जानकारी केवल खनक एवं युधिष्ठिर को ही थी। कुंती और पाण्डु नंदन वारणावत के लोगों में घुलमिल गये। युधिष्ठिर सरीखे अजातशत्रु का वारणावत में रहना राजधर्म में एक नया निखार लाया।
शकुनि-दुर्योधन युति षडयंत्र जिसे पुत्र मोहग्रस्त अंबिका-कौसल्या नंदन धृतराष्ट्र का मौन व हार्दिक समर्थन था। उस षडयंत्र को नीति विशारद प्रजागर विदुर ने अपने प्रति षडयंत्र से विफल कर डाला। धृतराष्ट्र, शकुनि व दुर्योधन समझते थे कि राजकुमार दुर्योधन का कुरूराज पद निष्कंटक होगया। कुंती सहित पांचों पाण्डव लाक्षागृह के अग्निकांड में भस्मिभूत होगये पर बात ऐसी नहीं थी। कुंती व पाण्डव एकचक्रा नगरी पहुंच गये थे जहां वे एक ब्राह्मण परिवार के साथ टिक गये। कुंती के आदेशानुसार भीम ने ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर किया। कुंती ने भीम को ब्राह्मण के बदले राक्षस के पास भेजने का निर्णय युधिष्ठिर से परामर्श करने के पश्चात ही किया। युधिष्ठिर संशयग्रस्त थे। मां कुंती ने उन्हें भीम के बाहुबल का सामर्थ्यवान व्यक्तित्त्व बताया। जिस घर में कुंती व उसके पांच बेटे ठहरे थे वह भी अपने बदले अतिथि को बलि का बकरा बनाने का पक्षधर नहीं था। ब्राह्मण व ब्राह्मणी को कुंती ने अपने द्वितीय पुत्र द्वारा हिडिम्ब नामक महाबली राक्षस को धराशायी करने की घटना सुनायी व ब्राह्मण परिवार को आश्वस्त किया कि उसका द्वितीय पुत्र वृकोदर राक्षस को ठिकाने पर पहुंचा देगा। जो भोज्य सामग्री राक्षस के लिये तैयार की है वह भीम को सौंप दो। भीम भोजन सामग्री लेकर वन में गया व छक कर खाया। राक्षस देखता रहा फिर राक्षस को मार गिराया। केवल ब्राह्मण परिवार के ही कष्ट दूर नहीं हुए अपितु सारी एकचक्रा नगरी सुख व चैन की वंशी बजाने लग गयी। हिडिम्ब राक्षस की बहिन हिडिम्बा से भीम को घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पाण्डु पौत्रों में घटोत्कच ज्येष्ठ व श्रेष्ठ था। भीम द्वारा बकासुर के मारे जाने से राक्षस लोग भयभीत होकर पलायन करने लगे। भीम ने त्रस्त राक्षस समूह को अहिंसा का मार्ग दिखाया। उन्हें कहा - अब से तुम लोग मनुष्यों को मार कर अपना भोजन न बनाओ। हिंसा का सहारा लेने वालों की वही गति होगी जो बकासुर की हुई है। भीम की अहिंसा की बात राक्षसों ने समझी व एवमस्तु कह कर शर्त्त स्वीकार कर ली। भीम ने बकासुर की लाश नगर के मुख्य फाटक पर गिरा दी ताकि लोग मृत बकासुर को देख सकें। स्वयं दूसरों की नजर से अपने आपको बचा कर भीम माता कुंती के पास ब्राह्मण परिवार में वापस आगये। लोग ब्राह्मण के घर आकर पूछने लगे कि यह क्या हुआ तथा कैसे हुआ ? एकचक्रा नगर के चारों वर्ण व चारों आश्रमों के लोग बकासुर भय से अंत्यत मुदित होगये। पाण्डव लोगों का परिचय ब्राह्मण ने नहीं दिया। वह अतिथि, अभ्यागतों का सदैव स्वागत-सत्कार किया करता था। एक यति उसके निवास स्थान में आया और उसने ब्राह्मण से कहा - पांचाल देश में याज्ञसेनी द्रौपदी का स्वयंवर होने जारहा है। पार्थों ने उस ब्राह्मण से पूछा - दृष्टद्युम्न तथा याज्ञसेनी कृष्णा का जन्म यज्ञ वेदी से किस तरह हुआ ? उस आगंतुक ब्राह्मण ने द्रौपदी उत्पत्ति का सारा विवरण उन्हें सुनाया। भारद्वाज नंदन द्रोण की उत्पत्ति दोने से हुई इसलिये भारद्वाज ने बेटे का नाम द्रोण ही रख दिया। भारद्वाज के एक सखा पृषत नाम के राजा थे। उस राजा के पुत्र का नाम द्रुपद था। पृषत के देहावसान के पश्चात पांचाल राज्य दु्रपद नरेश के सार्वभौम राज्य के तौर पर प्रतिष्ठित हुआ। जामदग्न्य राम के बारे में जब द्रोण को ज्ञात हुआ तो द्रोण ने उनके पास जाकर बताया कि मैं भारद्वाज पुत्र द्रोण हूँ। विद्या धन की कामना से आपके पास आया हूँ। जामदग्न्य ने द्रोण से कहा - अब तो मेरा शरीर मात्र ही परिग्रह है अतः तुम मेरे शरीर अथवा अस्त्र में से किसी को मांग लो। द्रोण ने जामदग्न्य राम से कहा - भगवन्! आप मुझे संपूर्ण अस्त्र तथा उनकी प्रयोग विधि के साथ-साथ उपसंहार विधि भी प्रदान करें। भार्गव परशुराम ने तथास्तु कहते हुए अपने सभी अस्त्र तथा अस्त्रज्ञान का दान द्रोणाचार्य को कर दिया।
आजकल दुनिया के लोग जिस भूखंड को अफगानिस्तान नाम से पुकारते हैं उसका प्राचीन संस्कृत नाम उपगंधर्व स्थान है। गंधर्वों को उपदेव भी कहा जाता है। उपगंधर्व देश में गांधार नामक सुबल राज्य था जिसकी राजकुमारी गांधारी का विवाह कुरूराज धृतराष्ट्र से हुआ था। गंधर्वों को नेतृत्त्व प्रदान करने वाले अंगारपर्ण को चित्ररथ भी कहा जाता था। वह अप्सराओं के बीच गंगा में जलविहार कर रहे थे। अर्जुन के साथ उनका विवाद होगया और बढ़ते-बढ़ते युद्ध में बदल गया। चित्ररथ अंगारपर्ण कौंतेय अर्जुन से युद्ध में हार गया। पराजित गंधर्व ने अर्जुन से दोस्ती का हाथ बढ़ाया। अर्जुन को गंधर्वों व अप्सराओं की विशेषज्ञता से परिचय था । अर्जुन ने अंगारपर्ण चित्ररथ से कहा - हमें एक सुयोग्य पुरोहित की जरूरत है। गंगा तट में महर्षि देवल के अनुज महर्षि धौम्य तपस्या करते थे। अंगारपर्ण ने महर्षि धौम्य से पाण्डवों की मुलाकात करायी। धौम्य पांचाल यात्रा में पाण्डवों के आचार्य के रूप में साथ होगये। अर्जुन की युद्धविजय कौशल तथा पराजित योद्धा से दोस्ती का हाथ बढ़ाना, गंधर्व तो उपदेव हैं उनकी स्थिति बहुत उच्च है। वे समूचे जगत की जानकारी रखते हैं। साथ ही साथ अंगारपर्ण चित्ररथ कुबेर का लंगोटिया यार भी था। उसकी राय का बहुत महत्त्च था। अर्जुन को यह पता था कि सनत्कुमार, नारद, असित, देवल तथा कृष्ण द्वैपायन बादरायण वेदव्यास उच्चकोटि के चिंतक तथा परोपकारी यती थे। देवल के अनुज आचार्य धौम्य ने कुंतीनंदन युधिष्ठिर का पौरोहित्य स्वीकार कर पाण्डवों को समृद्धि तथा विजय की नयी राह दिखायी। आधुनिक संदर्भ में राष्ट्र राज्य में राज्य करने वाले नेतृत्त्व के लिये जो महल राजनीतिक दल के प्रमुख का है वही महत्त्व पूर्वकाल में सार्वभौम राज्य की कामना करने वाले चक्रवर्ती सम्राट के लिये पुरोहित का होता था। पुरोहिताई पंक्ति में देवराज इन्द्र के पुरोहित बृहस्पति, दैत्यराजाओं के पुरोहित शुक्राचार्य, सूर्यवंशी अयोध्या नरेशों के पुरोहित वशिष्ठ ज्ञान संपन्न व्यक्ति थे। भीष्माचार्य ने धृतराष्ट्र व पांडु कुमारों के लिये द्रोणाचार्य एवं कृपाचार्य को पुरोहिताई सौंपी थी। यहां तक कि आचार्य विष्णु शर्मा चन्द्रगुप्त मौर्य के निर्माता होने के समानांतर उनके राजपुरोहित भी थे। आधुनिक वयस्क मताधिकार वाले लोकतंत्र के संदर्भ में राजनीतिक दलों के चिंतन पोखर तथा नीति निर्माता राजनीतिक दल का जब मुखिया चुनते हैं उस मुखिया की भूमिका भी पुरोहिताई किस्म की ही होती है। भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह को पार्टी प्रमुख नियुक्त कर भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हाथ मजबूत किये हैं। अमित शाह नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के लिये उसी तरह सफलता के अग्रदूत बन कर आगे आ सकते हैं जिस तरह आचार्य धौम्य ने पाण्डवों की पुरोहिताई कर शंखनाद कर पांचाल देश में एकत्र राजा महाराजा राजकुमारों में अर्जुन की प्रतिष्ठा को सुनिश्चित कर डाला। ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य व उत्तर की आठ दिशाओं तथा भारतीय मनीषा की उर्ध्व व अधो दो दिशाओं को लेकर जो दस दिशाऐं कल्पित हैं, अर्जुन ने उन सभी दसों दिग्पालों व लोकपालों का आशीर्वाद पाया था। गंधर्वराज जब अर्जुन से पराजित होगया तब उसने पूरे मनोयोग से अर्जुन की सहायता की क्योंकि वह मालूम कर चुका था कि अर्जुन देवराज इन्द्र का प्रतिनिधि है। पाण्डव, कुंती व धौम्य सहित कुम्भकार कार्यशाला में ठहरे थे। यह कार्यशाला पांचालधानी के किनारे थी। तब से सोलहवें दिन पांचाली का स्वयंवर होना था। लोग पांचाल देश की ओर बढ़ रहे थे। नट, नर्तक, विद्याधर, रायचारण चारों वर्णों के लोग अपनी-अपनी व्यक्तिगत योग्यता तथा जातीय गुण व कर्मकौशल दिखाना चाहते थे। राजा-राजकुमार तो आमंत्रित थे ही उनके लिये विशेष मंच बने थे। राजपुरोहित भारत के अनेकानेक राजाओं के प्रशस्ति गान के लिये चारण-विद्याधरों का आह््वान कर रहे थे। ब्राह्मणों के लिये अलग से मंच बना हुआ था स्वस्तिवाचन कर रहे थे। पुण्याहवाचन के साथ शंख वाद्य बज रहे थे। चैत्ररथ अंगारपर्ण गंधर्वराज धनद सखा द्वारा अर्जुन को सुझाये पुरोहित धौम्य सहित युधिष्ठिरादि पांचों पाण्डु पुत्र ब्राह्मण समाज के बीच में बैठे थे। निर्धारित सोलहवां दिन था अनेकानेक राजा-राजकुमार स्वयंवर मंच में विराजमान थे। अयोनिजा याज्ञसेनी जिसका एक नाम कृष्णा भी था अपने अयोनिज भाई द्रौपदेय धृष्टद्युम्न की दायीं ओर थी। धृष्टद्युम्न ने घोषणा की -
आजकल दुनिया के लोग जिस भूखंड को अफगानिस्तान नाम से पुकारते हैं उसका प्राचीन संस्कृत नाम उपगंधर्व स्थान है। गंधर्वों को उपदेव भी कहा जाता है। उपगंधर्व देश में गांधार नामक सुबल राज्य था जिसकी राजकुमारी गांधारी का विवाह कुरूराज धृतराष्ट्र से हुआ था। गंधर्वों को नेतृत्त्व प्रदान करने वाले अंगारपर्ण को चित्ररथ भी कहा जाता था। वह अप्सराओं के बीच गंगा में जलविहार कर रहे थे। अर्जुन के साथ उनका विवाद होगया और बढ़ते-बढ़ते युद्ध में बदल गया। चित्ररथ अंगारपर्ण कौंतेय अर्जुन से युद्ध में हार गया। पराजित गंधर्व ने अर्जुन से दोस्ती का हाथ बढ़ाया। अर्जुन को गंधर्वों व अप्सराओं की विशेषज्ञता से परिचय था । अर्जुन ने अंगारपर्ण चित्ररथ से कहा - हमें एक सुयोग्य पुरोहित की जरूरत है। गंगा तट में महर्षि देवल के अनुज महर्षि धौम्य तपस्या करते थे। अंगारपर्ण ने महर्षि धौम्य से पाण्डवों की मुलाकात करायी। धौम्य पांचाल यात्रा में पाण्डवों के आचार्य के रूप में साथ होगये। अर्जुन की युद्धविजय कौशल तथा पराजित योद्धा से दोस्ती का हाथ बढ़ाना, गंधर्व तो उपदेव हैं उनकी स्थिति बहुत उच्च है। वे समूचे जगत की जानकारी रखते हैं। साथ ही साथ अंगारपर्ण चित्ररथ कुबेर का लंगोटिया यार भी था। उसकी राय का बहुत महत्त्च था। अर्जुन को यह पता था कि सनत्कुमार, नारद, असित, देवल तथा कृष्ण द्वैपायन बादरायण वेदव्यास उच्चकोटि के चिंतक तथा परोपकारी यती थे। देवल के अनुज आचार्य धौम्य ने कुंतीनंदन युधिष्ठिर का पौरोहित्य स्वीकार कर पाण्डवों को समृद्धि तथा विजय की नयी राह दिखायी। आधुनिक संदर्भ में राष्ट्र राज्य में राज्य करने वाले नेतृत्त्व के लिये जो महल राजनीतिक दल के प्रमुख का है वही महत्त्व पूर्वकाल में सार्वभौम राज्य की कामना करने वाले चक्रवर्ती सम्राट के लिये पुरोहित का होता था। पुरोहिताई पंक्ति में देवराज इन्द्र के पुरोहित बृहस्पति, दैत्यराजाओं के पुरोहित शुक्राचार्य, सूर्यवंशी अयोध्या नरेशों के पुरोहित वशिष्ठ ज्ञान संपन्न व्यक्ति थे। भीष्माचार्य ने धृतराष्ट्र व पांडु कुमारों के लिये द्रोणाचार्य एवं कृपाचार्य को पुरोहिताई सौंपी थी। यहां तक कि आचार्य विष्णु शर्मा चन्द्रगुप्त मौर्य के निर्माता होने के समानांतर उनके राजपुरोहित भी थे। आधुनिक वयस्क मताधिकार वाले लोकतंत्र के संदर्भ में राजनीतिक दलों के चिंतन पोखर तथा नीति निर्माता राजनीतिक दल का जब मुखिया चुनते हैं उस मुखिया की भूमिका भी पुरोहिताई किस्म की ही होती है। भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह को पार्टी प्रमुख नियुक्त कर भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हाथ मजबूत किये हैं। अमित शाह नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के लिये उसी तरह सफलता के अग्रदूत बन कर आगे आ सकते हैं जिस तरह आचार्य धौम्य ने पाण्डवों की पुरोहिताई कर शंखनाद कर पांचाल देश में एकत्र राजा महाराजा राजकुमारों में अर्जुन की प्रतिष्ठा को सुनिश्चित कर डाला। ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य व उत्तर की आठ दिशाओं तथा भारतीय मनीषा की उर्ध्व व अधो दो दिशाओं को लेकर जो दस दिशाऐं कल्पित हैं, अर्जुन ने उन सभी दसों दिग्पालों व लोकपालों का आशीर्वाद पाया था। गंधर्वराज जब अर्जुन से पराजित होगया तब उसने पूरे मनोयोग से अर्जुन की सहायता की क्योंकि वह मालूम कर चुका था कि अर्जुन देवराज इन्द्र का प्रतिनिधि है। पाण्डव, कुंती व धौम्य सहित कुम्भकार कार्यशाला में ठहरे थे। यह कार्यशाला पांचालधानी के किनारे थी। तब से सोलहवें दिन पांचाली का स्वयंवर होना था। लोग पांचाल देश की ओर बढ़ रहे थे। नट, नर्तक, विद्याधर, रायचारण चारों वर्णों के लोग अपनी-अपनी व्यक्तिगत योग्यता तथा जातीय गुण व कर्मकौशल दिखाना चाहते थे। राजा-राजकुमार तो आमंत्रित थे ही उनके लिये विशेष मंच बने थे। राजपुरोहित भारत के अनेकानेक राजाओं के प्रशस्ति गान के लिये चारण-विद्याधरों का आह््वान कर रहे थे। ब्राह्मणों के लिये अलग से मंच बना हुआ था स्वस्तिवाचन कर रहे थे। पुण्याहवाचन के साथ शंख वाद्य बज रहे थे। चैत्ररथ अंगारपर्ण गंधर्वराज धनद सखा द्वारा अर्जुन को सुझाये पुरोहित धौम्य सहित युधिष्ठिरादि पांचों पाण्डु पुत्र ब्राह्मण समाज के बीच में बैठे थे। निर्धारित सोलहवां दिन था अनेकानेक राजा-राजकुमार स्वयंवर मंच में विराजमान थे। अयोनिजा याज्ञसेनी जिसका एक नाम कृष्णा भी था अपने अयोनिज भाई द्रौपदेय धृष्टद्युम्न की दायीं ओर थी। धृष्टद्युम्न ने घोषणा की -
इदम् धनुर्लक्ष्य मिमे च वाणाः श्रण्वन्तु मे भूपतयः समिता।
छिद्रेण यंत्रस्य समर्पयध्वम् शरैः शितैर्व्याम चरैर्दशर्धैः।।
इस महतकर्म संपन्न करने वाले कुलीन, बलशाली राजकुमार मेरी इस भगिनी को भार्या के रूप में प्राप्त कर सकता है। यह सत्य प्रतिज्ञा है इसलिये पधारो एवं विजयी बनो, कृष्णा का पाणिग्रहण करो। धृष्टद्युम्न ने अपनी भगिनी कृष्णा को संबोधित करते हुए कुलीन राजपुत्रों का वर्णन करते हुए कहा - कुरूकुल के महाराज कुमार सुयोधन अपने निन्यानवे भाईयों सहित राघेय-कर्ण-अग्रणी वीर सहित तुम्हें पाने के लिये कुरूकुलों के मंच की पहली पंक्ति में बैठे हैं। यहां गांधार नरेश सुबल के राजकुमार शकुनि, वृषथ व वृहद्बल भी मंचासीन हैं। द्रोणि, अश्वत्थामा व भोज भी राजा विराट अपने राजकुमारों सहित मंचासीन हैं। सुशर्मा, सुकेतु, समुद्रसेन, चंद्रसेन, भद्रराज शल्य, पौंड्रक व मगदत्त कलिंग नरेश भीष्मक पुत्र रूक्म, संकर्षण-बलराम, वासुदेव श्रीकृष्ण, रूक्मिणी नंदन कार्ष्णि - प्रद्युम्न सांब, चारूरेखा, प्रद्युम्न नंदन अनिरूद्ध, उशीनर नरेश, वृष्णिवंशी अनेकानेक यादवगण तथा चेदिराज शिशुपाल व जरासंध, अनेकानेक राजा, राजकुमार कृष्णा को पाने के लिये अपना बाण कौशल प्रदर्शित कराने के लिये तत्पर थे। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों के बीच ब्रह्मचारी वेशधारी शरीर में भस्म लगाये पाण्डवों को ज्यों ही देखा पहचान भी लिया। वैशम्पायन ने उसका वर्णन करते हुए कहा था -
सशंस रामाय युधिष्ठिरम् च भीमम् सजिष्णुम् यमौ च वीरौः
शनैः शनैः तान् प्रसमीक्ष रामो जनार्दनम् प्रीत मना ददर्श हे।
अनेक राजा-राजकुमार जब विफल प्रयत्न होगये, राधेय कर्ण जिन्हें सुयोधन ने अंग नरेश की मान्यता देकर राजाओं की श्रेणी में प्रतिष्ठित किया था। कर्ण अपने आसन से उठ कर धनुष प्रत्यंचा चढ़ायी ही थी कि याज्ञसेनी दु्रपदनंदिनी कृष्णा ने ऊँची आवाज कर कहा - मैं सूत (राधेयनंदन कर्ण) का वरण नहीं करूँगी। यह सुनते ही कर्ण ने धनुष बाण छोड़ अपने आसन की ओर प्रस्थान कर लिया। धार्तराष्ट्र सुयोधन धनुष के समीप गया धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में उसकी अंगुलियों में झटका लगने से चोट लग गयी। वह लज्जित होकर अपने आसन पर वापस चला गया। जब सभी राजा-राजकुमार थक गये, हार गये ब्राह्मणों के बीच से कौंतेय अर्जुन ने मंच पर आकर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायी। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने अपने अग्रज संकर्षण बलराम का हाथ दबाते हुए कहा - द्रौपदी पाण्डु नंदन अर्जुन के हाथ आगयी। ब्राह्मणों में एक नयी आशा का उत्कर्ष हुआ। वे कहने लगे, बुद्धिजीवी ब्राह्मणों ने हम जीत गये, हम जीत गये होहल्ला करना शुरू कर दिया। शत्रुसूदन द्रुपद कौंतेय अर्जुन को देख कर हर्ष गद्गद होगये। उन्होंने अपनी सेना सहित पार्थ अर्जुन की सहायता करने की प्रतिज्ञा कर ली। द्रौपदी ने जयमाला ले कौंतेय अर्जुन की तरफ बढ़ी। केवल दृष्टि वार्ता करने वाली उस कृष्णा ने अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी। विनयनी खड़ी होकर वह वैसी जंच रही थी जिस तरह शची ने शक्र का वरण किया था। स्वाहा ने अग्नि का, लक्ष्मी ने महाविष्णु का, ऊषा ने सूर्य का, रति ने कामदेव का, हिमराज कन्या पार्वती ने भगवान शंकर का, वैदेही मैथिल कुमारी जानकी ने दाशरथि राम तथा भीष्मक नंदिनी दमयंती ने नृपश्रेष्ठ राजा नल का वरण किया था। उसी तरह याज्ञसेनी कृष्णा ने पार्थ अर्जुन का वरण कर लिया। जब द्रौपदी अर्जुन के साथ-साथ चलने लगी उपस्थित ब्राह्मणों ने मंगलाचार, स्वस्तिवाचन तथा पुण्याहवाचन वेदध्वनि से किया। वैशम्पायन ने कहा - दित्सति कन्याम् तु ब्राह्मणाय तदा नृपे कोप आसीन् महीपानाम् आलोक्यान योन्य मेतिकान्।
राज समाज में आक्रोश बढ़ा। वे कहने लगे - हमारा अपमान कर द्रुपद अपनी कन्या ब्राह्मण को ब्याह रहे हैं अतः दुरात्मा द्रुपद मारने योग्य हैं। उन्होंने कहा - स्वयंवर तो केवल क्षत्रियों के लिये है। यदि यह कन्या द्रौपदी हम राजाओं में से किसी एक का वरण नहीं करना चाहती हम इसे जलती हुई आग में झोंक कर अपने अपने राज्यों को चले जायें। राज समाज के सामूहिक क्रोध से व्यथित राजा द्रुपद ब्राह्मणों की शरण में गये। यह देख कुंती के बलशाली पुत्र भीम और धनुर्धर अर्जुन राजा द्रुपद की रक्षा के लिये आगे आये। महाबली भीम ने एक बड़े वृक्ष को उखाड़ कर दण्डधारी यमराज की तरह अपने अनुज अर्जुन के समीप खड़े होकर अर्जुन ने धनुष प्रत्यंचा चढ़ा राजाओं से युद्ध के लिये सन्नद्ध होगये।
दामोदरो भ्रातरमुग्र वीर्यम् हलायुधम् वाक्य मिदम्व भाषे, यही अर्जुन है। वृक्ष उखाड़ने वाले शक्तिमान भी समान राजाओं का सामना करने उद्यत हैं। बलराम ने कृष्ण से कहा - मुझे खुशी इस बात की है कि पितृस्वसा कुंती व पांडव लाक्षागृह से बच कर यहां पहुंचे हैं। कर्ण ने अर्जुन से युद्ध किया, अर्जुन के बाणों से तिलमिलाये कर्ण ने पूछा - क्या आप जामदग्न्य राम तो नहीं हैं ? इन्द्र अथवा विष्णु ब्राह्मण के वेश में लड़ने तो नहीं आये। कर्ण ने कहा - किरीटधारी अर्जुन के अलावा मेरे से युद्ध करने की किसी में क्षमता नहीं। फाल्गुन जिष्णु ने कर्ण से कहा - मैं ब्राह्मण हूँ। गुरू की कृपा से लड़ रहा हूँ। मैं तुम्हें जीत सकता हूँ। वीर कर्ण स्थिर तो होओ। अर्जुन व भीम ने सभी राजाओं को परास्त कर दिया। विजयी अर्जुन ने कुंभकार कार्यशाला में प्रवेश किया। बलराम व कृष्ण से पांडवों की भेंट कुम्हार की कार्यशाला में ही हुई। कुंती ने अपने बेटों से कहा - भिक्षा में जो पाया है उसे आपस में बांट लो। बलराम व कृष्ण भी कुंती व पांडवों से मिलने कुंभकार कार्यशाला में गये। कृष्ण ने कहा - को न्यः कर्त्ता विद्यते मानषेषु। बलराम व कृष्ण को यकीन होगया कि लाक्षागृह में पांडव जले नहीं सुरक्षित बाहर आगये। धृष्टद्युम्न कुम्हार कार्यशाला की तरफ बढ़े उन्होंने पृथा कुंती तथा उनके पांचों पुत्र एवं आचार्य धौम्य के बारे में जानकारी ली फिर अपने पिता पांचाल नरेश द्रुपद महाराज को सारा ब्यौरा सुनाया। द्रुपद बहुत चिंतित थे कि उनकी अयोनिजा कन्या को कौन जीत लेगया ? धृष्टद्युम्न ने कहा -
निःसंशयम् क्षत्रियपुंगवास्ते यथा हि युद्धं कथयति राजन्।
आशा हि नो व्यक्त मियम् समृद्धा मुक्तान् हि पार्थान् श्रणुमोऽग्रिदाहात्।।
सुना है कि कुंती व उनके पांच पुत्र लाक्षागृह में जलने से बच गये। हमारे मन में पांडवों से संबन्ध होने की जो अभिलाषा थी वह अवश्य ही सफल हुई लगती है। राजा द्रुपद ने अपने राजपुरोहित को कुंभकार शाला भेजा। पुरोहित ने पांडवों से कहा -
विज्ञातुमिच्छयति अवनीश्वरो वः पांचाल राजो वरके वराहोः।
लक्षस्य वेद्धारमिम् हि दृष्ट्वा हर्षस्य नान्तम् प्रतिपद्यते सः।।
पांचाल राज पुरोहित जब अपनी बात पूरी कर चुके, युधिष्ठिर ने अपने अनुज भीम से कहा - ‘मान्य पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञः तस्मै प्रयोज्याधिका हि प्रजा’ पुरोहित के पादपूजन अर्घ्यदान के पश्चात राजमहल पहुंचने पर युधिष्ठिर ने पांचाल नरेश द्रुपद से कहा -
वयम् हि क्षत्रिया राजन् पाण्डोः पुत्रा महात्मनः ज्येष्ठाम् माम् विद्धि कौन्तेयम् भीमसेनार्जुना विभौ।
आभ्याम् तव सुता राजन् विर्जिता राज संसदि यमौ च तत्र कुंती च यत्र कृष्णा व्यवस्थिता।।
वहां कृष्ण द्वैपायन - बादरायण वेदव्यास से राजा द्रुपद ने पूछा। एक स्त्री बहुत पुरूषों की भार्या कैसे हो सकती है ? व्यास जी ने कहा - हर व्यक्ति अपनी अपनी राय बताये, उसे सुनाइये ताकि किसी निर्णय पर पहुंचा जा सके। राजा द्रुपद की राय में याज्ञसेनी का पांच भाइयों से ब्याहा जाना धर्मसम्मत नहीं था। धृष्टद्युम्न की राय में कृष्णा का पांच भाईयों की भार्या होना किसी भी तरह से धर्मसम्मत नहीं है। युधिष्ठिर की राय में यह विवाह अधर्म नहीं। युधिष्ठिर ने जटिला गौतमी का उदाहरण दिया जिसके सात ऋषि पति थे। इसी प्रकार कण्डु ऋषि कन्या दस प्रचेताओं को पति रूप में वरण किया था। ये सभी सहोदर भाई थे। युधिष्ठिर ने व्यास जी से कहा - माता परम गुरू है उसने आज्ञा दी है कि भिक्षा की भांति इसका उपयोग करो। इसलिये मात्रोक्ता मां ने कहा है यह समझते हुए कृष्णा का पांचों भाईयों से विवाह धर्मसम्मत है। तत्पश्चात पृथा बोली - युधिष्ठिर की बात ठीक है। मैं असत्याचरण नहीं करना चाहती, असत्य से बड़ा दुष्कर्म कोई नहीं। मैं असत्याचरण के पाप से कैसे मुक्त होऊँ ? बादरायण व्यास ने राजा द्रुपद से कहा - पांचाल नरेश आप एकांत में मुझसे सुन लो क्योंकि इस महत्त्वपूर्ण बात को सबके सामने व्यक्त नहीं किया जा सकता। बादरायण व्यास ने प्रतर्दन नंदन राजा द्रुपद का हाथ पकड़ कर उन्हें राजमहल की तरफ लेगये। उन्होंने राजा द्रुपद से कहा - नैमिषारण्य में देवता यज्ञ कर रहे थे वहां उस समय सूर्य पुत्र यम कार्यरत थे। यम ने अपना कार्य प्रजामृत्यु बंद कर दिया था। मृत्यु न होने से प्रजा बढ़ती रही। चंद्रमा, इंद्र, वरूण, कुबेर, साध्यगण, रूद्रगण, वसुगण, दोनों अश्विनी कुमार सहित सभी देवता सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी से जाकर मिले और बोले - मनुष्य जनसंख्या बढ़ रही है। हम व्याकुल हैं और आपकी शरण हैं। मरणधर्मा मनुष्यों से क्यों डर रहे हो ? देवता बोले - अब हममें व मनुष्यों में अंतर नहीं रहा। व्यास जी ने राजा द्रुपद को अनेक उदाहरणों के साथ अंत में यह कहा -
द्रुपदैषा सा जज्ञे सुता वै देव रूपिणी पंचानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता।
अर्जुन ने अपने जीवन में कायरता को घुसने ही नहीं दिया। आसन्न समस्या के समाधान करने से पलायन वादी रूख भी नहीं अपनाया इसलिये लोकप्रसिद्धि में अर्जुन की दो प्रतिज्ञायें - कायरता न करना व समस्या से पलायन नहीं करना। अर्जुन की यह मानसिक सत्ता भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री की जिजीविषा है। वे प्रत्युपन्न मति हैं। उन्हें समस्या दीखते ही उसके समाधान का रास्ता स्वयं सूझ जाता है। जिस तरह अर्जुने ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जो रास्ता अपनाया था जिस विधि से उन्होंने अपने अग्रज राजा युधिष्ठिर के धर्मराज्य को स्थापित करने में योगदान दिया। नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान का नया राजनैतिक प्रशासनिक तथा औद्योगिक रोडमैप तैयार करने में लगे हुए हैं। हम भारतवासी उनको अपनी क्षमतानुसार सहयोग दें ताकि भारत का माथा संसार में ऊँंचा हो। द्वेष बुद्धि के बावजूद राजा द्रुपद व द्रोणाचार्य की पारस्परिक शत्रुता ने महाभारतकालीन लगभग सवा पांच हजार वर्ष पूर्व राजनैतिक स्थिरता का जो उदाहरण धर्मराज युधिष्ठिर के नेतृत्त्व में उपलब्ध किया नरेन्द्र मोदी उस राजधर्म के नये प्रवर्तक हैं।
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