प्राणी की जाति
मरने के बाद प्राणी केवल जीवात्मा ही रहता है न सवर्ण न अवर्ण न ब्राह्मण न दलित न स्त्री न पुरूष
इसलिये बिना परंपरा समझे श्राद्ध में महापात्र या महाब्राह्मण प्रसंग जोड़ना विवेकपूर्ण सोच नहीं है।
हिन्दू दैनिक ने अपने गुरूवार नौ मार्च 2017 के दूसरे पन्ने के उत्तर पृष्ठ में कविता उपाध्याय की रपट छापी। शीर्षक है ’इन हरिद्वार टेंपल कास्ट डिक्टेटस लास्ट राइट्स आफ डिसीज्ड’ याने मृत व्यक्ति की अन्त्येष्टि (शव के अग्निदाह के पश्चात बारह दिनोें वाली प्रेत मोक्ष वाली प्रक्रिया) हिन्दुस्ताान के स्मार्त शैव शाक्त तथा वैष्णव ये चार मुख्य सम्प्रदाय चार वर्णों सहित आगणित होते हैं। शव के अग्निदाह तक मृत व्यक्ति के मोक्ष का उच्चारण करते हुए उसे शव कहा जाता है ज्योंही अग्निदाह संपन्न होजाये मृत व्यक्ति प्रेत कहा जाता है। उसे शर्म, वर्म, गुप्त तथा दास विशेषण उसकेेे नाम व गोत्र के साथ जोड़े जाते हैं। मृत्यु दिन से दसवें दिन पर्यन्त मृत व्यक्ति को अंजलि दी जाती है और जहां पर घट स्थापना हुई है अंजलि देने वाले मृत व्यक्ति के पाटीदारों में से ही पुरूष और स्त्रियां अंजलि देने की पात्रताधारक होते हैं। जिनके माता पिता दिवंगत होगये हैं मृत व्यक्ति को अंजलि देते हुए पुरोहित अथवा वह व्यक्ति जो क्रिया करा रहा है वह उद्घोष करता है अनादि निधनं देवः शंख चक्र गदाधरः अव्यय पुण्डरीकाक्ष प्रेत मोक्ष प्रदो भव। दस दिन का अंजलि दान इस मंत्र पर आधारित रहता है जहां यह प्रक्रिया संपन्न होती है उसे मंदिर नहीं कहा जाता। हरिद्वार में वह स्थान कुशावर्त घाट नाम से जाना जाता है हिन्दू अखबार ने जो फोटो छापी है वह कुशावर्त घाट की है। हरिद्वार का यह स्थान हरिद्वारे कुशावर्ते भिल्लके ऋक्ष पर्वते स्नात्वातु कर्णखले तीर्थे पुनर्जन्मम् न विद्यते यह श्लोक कुशावर्त और कनखल का विवेचन करता है। दस दिन अंजलि महापात्र द्वारा संपन्न होता है। महापात्र के लिये ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सब समान हैं। यहां तक कि बरहवौ या तेरहवीं मृत व्यक्ति जीवात्मा कहलाता है उस दशा में पुरूष या स्त्री का भेद भी अग्राह््य है। रिपोर्टर कहती हैं कि सवर्ण लोगों के लिये पुरोहिताई प्रक्रिया ब्राह्मण द्वारा की जाती है और दलित की प्रेतत्व निवृत्ति महाब्राह्मण करता है। यह सारा प्रसंग हिन्द के मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक का भयावह व्यामोह है जो उन लोगों को भी भ्रमित करता है जो स्वयं को दलित कहते हैं। पिछले सत्तर वर्षों में आजाद हिन्द की वे परंपरायें लुप्तप्रायः होगई हैं जो श्रौत परंपरा कहलाती थी। पिता पुत्र को गुरू शिष्य को माता पुत्री को सास बहूू को उन परंपराओं को बचपन से ही बताते रहते थे। इस ब्लागर की मां का जन्म सन 1913 मंे हुआ मृत्यु 1991 में हुई जब वे अठहत्तर वर्ष की थीं। वह निरक्षर थीं पर उन्हें सप्तशती गीता रूद्राध्यायी के श्लोक बचपन से याद थे। इस ब्लागर की पत्नी लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर आफ आर्ट की उपाधिधारक थी। संस्कृत में बोल सकती थी पर उन्हें अपनी माताजी तथा मेरी माता से श्रौत विद्या प्राप्त नहीं थी। यही वह बिन्दु है जहां भारत के लोगों की परंपरायें आजादी के बाद लुप्त होगईं। कोई युवक युवती जिसका ज्ञान सागर अंग्र्रेजी भाषा के माध्यम से विद्या अविद्या का ज्वारभाटा उछलकूद मचाता हो वह व्यापक जानकारी नहीं लेना चाहता। यही वह बिन्दु है जहां हिन्दुस्तान के लोग यूरप की औद्योगिक क्रांति केे मोहजाल में फंसे हुए हैं। महात्मा गांधी ने अपनी पहली पुस्तक रचना हिन्द स्वराज के बीस अध्यायों में हिन्दुस्तान की पारंपरिकता तथा यूरप की आधुनिकता का युगांतरकारी विश्लेषण किया। रूसी विद्वान लियो टाल्स्टाय ने महात्मा गांधी को हिन्दू संबोधित कर गांधी विचार को यूरप के लिये रामबाण औषध बताया। समय पीछे मुड़ कर देखता नहीं।
कुरूक्षेत्र के रणांगण में योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने प्राणिमात्र की बराबरी बताते हुए कहा -
विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि, शुनि चैव श्वपाके च पंडिता समदर्शिनः।
महात्मा गांधी ने गीता के कथन - चातुवर्ण्य मया सृष्टम् गुण कर्म विभागश्चः को उद्धृत करते हुए ऊर्ध्वबाहु होकर कहा मैं चातुवर्ण्य व्यवस्था का पक्षधर हूँ। अपने आपको हिन्दू कहने वाले किसी दूसरे नेता ने कभी इतना साहस नहीं दिखाया और वर्णाश्रम व्यवस्था को महात्मा गांधी ने अपने स्वजीवन में उतारा। वे गृहस्थी भी थे, जब छप्पनवां जन्मदिन मना रहे थे उन्होंने कदमकुआं पटना में स्वयं को वानप्रस्थी घोषित कर डाला। पैंसठ वर्ष की उम्र में उन्होंने कांग्रेस की चवन्नी सदस्यता का भी त्याग कर दिया यह सन्यास का लक्षण था।
कविता उपाध्याय महाशया तीर्थश्राद्ध के बारे में गुलाब दास जी के पिता बख्तावर सिंह का तीर्थश्राद्ध तिल कुश द्वारा संपन्न किये जाने का उदाहरण देरही हैं। तीर्थश्राद्ध तिल कुश जौ चावल लेकर अपने अपने पितरों का तर्पण किया जाता है तथा पिंडदान सहित संक्षिप्त श्राद्ध संपन्न होता है। वे कहती हैं यदि किसी व्यक्ति का तीर्थश्राद्ध नारायण शिला में संपन्न हो वह मोक्ष पा जाता है। यह तो विज्ञापन नमूने का कथन है। लोग श्राद्ध करने को आयेंगे उन्हें ललचाने का तरीका है। रिपोर्टर कहती हैं कि तीर्थश्राद्ध करने के आकांक्षी महाशय गुलाब दास अपने दिवंगत पिता का तीर्थश्राद्ध संपन्न करने के लिये ब्राह्मण समुदाय मेरू एक महाब्राह्मण को ही संपर्क कर पाये। जहां तक महापात्र (जिसे दास व कविता उपाध्याय) महाब्राह्मण कह रहे हैं वे केवल एक मृतक के क्रियाकर्म के ग्यारहवें दिन ही बुलाये जाते हैं या अपने आप पहुंच जाते हैं। अपने पिता माता का क्रियाकर्म करने वाला व्यक्ति जिसे कर्ता कहा जाता है उन महापात्र को अपनी सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देता है। तीर्थश्राद्ध या तीर्थतर्पण में महापात्र अथवा महाब्राह्मण की कोई भूमिका नहीं होती। गंगा यमुना के मैदान में महापात्र का सम्मान दान दक्षिणा केवल एक ही दिन दी जाती है, अन्य अवसरों पर महापात्र यजमानों के घर नहीं जाते हैं। कविता उपाध्याय कहती हैं यह इसलिये हुआ क्योंकि बख्तावर सिंह दलित थे। उनके पुत्र गुलाब दास या हिन्दू को रपट भेजने वाली रिपोर्टर कविता उपाध्याय ने भी नहीं लिखा कि मुजफ्फरनगर में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले बख्तावर सिंह का निधन कब हुआ ? हिन्द में दलित साहित्य तथा दलित विशेषण अनुसूूचित जातियों पर लगाने का रिवाज काफी नया मालूम पड़ता है। भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर सहित अनेक महापुरूषों को महात्मा गांधी द्वारा अछूतों को हरिजन कहना पसंद नहीं हुआ। महाकवि तुलसीदास ने सुंदरकांड में रामचरित मानस महाकाव्य के महत्वपूर्ण अंश में कहा -
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।
भक्तिकालीन कवियों की गरीब दरिद्र तथा निस्सहाय व्यक्तियों के लिये सहानुभूति रहना भक्तिकाव्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भगत पूरनमल हो या सदनकसाई अथवा मीराबाई जो गिरधर गोपाल की भक्ति में तल्लीन थीं - कहती रहीं म्हाणे चाकर राखोजी चाकर रखस्यूूं बाघ लगास्यूं नित नित नवफल खास्यूं। म्हाणे चाकर राखोजी। कविता उपाध्याय लिखती हैं छोटी जात के लोगों के लिये कर्म महाब्राह्मण ही करते हैं। हिन्दू सरीखा राष्ट्रीय अखबार जिसके संस्थापक कस्तूरी रंगम सरीखे अयंगर ब्राह्मण संपादक रहे हों जिन्हें सोलह संस्कारों में मृत्यु उपरांत संस्कार के बारे में वैदिक रीति रिवाजों के अलावा आसेतु हिमाचल जो परंपरायें हैं तीर्थ में केवल पंडा व जजमान रहते हैं जजमान ब्राह्मण है या हरिजन इससे तीर्थश्राद्ध में कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़ा सवाल वहां तीर्थयात्रा कर रहे व्यक्ति को सोचना है -
पित्रादि त्रयं सपत्न जननी माता महात्रितयम् ।
तीर्थ में पंडा और जजमान दो ही मुख्य हैं। इलाहाबाद काशी गया रावणेश्वर गंगा सागर नासिक पुरी बदरी नारायण केदारनाथ सहित सब जगह पंडोें को इलाके बंटे हैं। उनके पास जजमान बही रहती है। महात्मा गांधी हिन्द के महत्वपूर्ण मंदिर रावणेश्वर महादेव गये वहां के पंडा परिवार के एक व्यक्ति खादी ग्रामोद्योग से जुड़े थे। उन्होंने महात्मा को कहा - आपको रावणेश्वर महादेव के दर्शन करा लाऊँ। महादेव के मंदिर के पंडा ने महात्मा जी को पिता करमचंद कबा गांधी व पितामह कबा गांधी केे हस्ताक्षर उन्हें दिखाते हुए कहा - महात्मा जी आप सन्यासी नहीं गृहस्थी हो आपको मुझे दक्षिणा देनी होगी। अगर आप सन्यासी होते मैं आपको दक्षिणा देता। पंडा ने महात्मा जी से कहा - मेरी बही में अपने दस्तखत कर दीजिये मैं लिखूंगा महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी पधारे और उन्होंने मुझे एक पैसा दक्षिणा दी। महात्मा ने हिन्द के पंडा समाज को हिन्द की ऐतिहासिक गाथा का उद्गाता बताया। कविता उपाध्याय समानता का प्रश्न उकेर रही हैं। तीर्थों में बहुत से ऐेसे लोग भी पंडा वेष बना कर अपनी जीविका चलाते हैं जिन्हें तीर्थ कर्म का ज्ञान है ही नहीं। नया नया आदमी जब तीर्थ में जाता है वह ऐसे बनावटी पंडों के चक्कर में पड़ जाता है। हिन्द जिसकी आबादी आज 130 करोड़ है उनमें अठारह करोड़ मुसलमान हैं। इसाई, सिख, जैन, बौद्ध धर्मावलंबी भी हैं जो लोग श्राद्ध पर यकीन नहीं करते उनकी भी संख्या अच्छी खासी है। श्राद्ध पर यकीन करने वालों की संख्या एक अरब पांच करोड़ से ज्यादा है। जैनी व बौद्ध धर्मी भी श्राद्ध करते हैं अलबत्ता आर्यसमाजी लोग श्राद्ध पर यकीन नहीं करते। जो लोग श्राद्ध तर्पण तीर्थश्राद्ध पर यकीन करते हैं विषय वस्तु तथा तीर्थ की परंपरा से ज्ञात कर अपना रास्ता तय करते हैं। महाब्राह्मण या महापात्र का तीर्थश्राद्ध से कोई सरोकार नहीं है मृत व्यक्ति के ग्यारहवें दिन के श्राद्ध के लिये ही महापात्र की उपस्थिति आवश्यक समझी जाती है। तीर्थतर्पण तीर्थश्राद्ध में महापात्र की कोई भूमिका नहीं है। पिछले 139 सालों से राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक दैनिक अखबार हिन्दू के दिल्ली से प्रकाशित नादर्न ऐडीशन के संपादक महाशय मुकुन्द पद्मनाभन का ध्यानाकर्षण करना इस ब्लागर का स्वधर्म है।
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