Sunday, 7 September 2014

उत्तराखंडी अस्सीसाला बंदोबस्त का 
नया अवतारी बंदोबस्त 

उत्तराखण्ड के आठवें, सांख्य दृष्टि से सातवें मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत ने नया भू बन्दोबस्त करने का ऐलान करते हुए हर मालगुजारी गांव का डाटा बेस, जिलाधिकारियों को बन्दोबस्त व्यवस्था लक्ष्य बी.पी.एल. अंत्योदय व कमजोर वर्ग को 180 वर्ग गज या 1620 वर्ग फीट भूमि आवंटन, सरकार का भूमि बैंक गठन, प्रत्येक गांव के व्यक्ति का भूमि-स्वामित्त्व विवरण पैमाइश के बाद वास्तविक भूमिहीन चिह्नांकन बन्दोबस्त, राष्ट्रीय भूमि आधुनिकीकरण कार्यक्रम हेतु 23 करोड़ रूपये प्रावधान करना, अखबार के अनुसार मुख्यमंत्री जी का कहना है कि जमीन का पूरा खाका साफ होगा। भूमि स्वामित्त्व विवरण, वैयक्तिक हकधारिता, भूमि का सामाजिक स्वामित्त्व, सरकार के कब्जे वाली जमीन भी ग्रामीणों को मिल सकती है। घोषणा यह भी कहती है कि राज्य में 13 प्रतिशत ही निजी क्षेत्र की जमीन है। श्री रावत उत्तराखण्ड के पहले मुख्यमंत्री हैं जिनका जन्म गांव में हुआ। गांव में ही बचपन बीता, पढ़ाई लिखाई हुई और राजनीतिक कर्मकौशल कुमांऊँ की राजनीतिक पुरी अल्मोड़ा सरीखी सांस्कृतिक नगरी से शुरू किया। उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री रहे वर्तमान में नैनीताल संसदीय क्षेत्र के सांसद भगत सिंह कोश्यारी भी यह दावा कर सकते हैं कि वे पहाड़ से सही प्रतिनिधि हैं। पाली पछांऊँ - भिकियासैंण का इलाका जहां से श्री रावत आते हैं कुमांऊँ भर के समृद्ध इलाकों में गिना जाता है। यहां की जमीन भी उपजाऊ है। बकरी, गाय और भैंस पालन की दृष्टि से यह इलाका समृद्ध है। इतिहास के गर्त में डुबकी लगायें तो यही विराट का क्षेत्र है। यहां के राजा विराट नरेश ने अपनी कन्या उत्तरा का कन्यादान कौंतेय अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से करते समय सवा लाख गौवें कन्यादान में दहेज के रूप में दी थीं।
          भारतीय गणतंत्री संघात्मक सार्वभौम राष्ट्र राज्य का अट्ठाईसवां घटक उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र के नैपाल खंड के पश्चिम में भारतीय हिमालय का मानस खंड जिसकी उर्ध्व शिरा मेरू सुमेरू मन्दराचल के समानांतर शिव तपस्यास्थली कैलास पर्वत तथा मानसरोवर व राकसताल हिमनदों का आगार है। हिमालय की नन्दा देवी, नंदा कोट, पंचचूली, त्रिशूल से दक्षिण क्षेत्र मानसखंड या कुमांऊँ नाम से विख्यात है। उत्तराखंड में हिमालय का द्वितीय हिमालय क्षेत्र केदार खंड है जिसमें हिमालयी केदार ज्योतिर्लिंग, नर नारायण आश्रम, बदरीनाथ, पुण्यसलिला भागीरथी का उद्गम स्थल गोमुख-गंगोत्री और यमुनोत्री के चार धाम हैं। भूमि तत्त्व के नजरिये से 1. वर्तमान कुमांऊँ डिवीजन के नैनीताल जनपद के छखाता परगना, वर्तमान अल्मोड़ा जनपद, बागेश्वर व पिथौरागढ़ जनपदों के साथ साथ स्वतंत्रता से पूर्व ब्रिटिश गढ़वाल नाम से संबोधित पौढ़ी गढ़वाल उससे निसृत रूद्रप्रयाग व चमोली जिले कुमांऊँ के तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रामजे (1804-1856) के तत्त्वावधान में पहला अस्सीसाला बन्दोबस्त सन 1823 में संपन्न हुआ। उसका नाम अस्सीसाला बन्दोबस्त कहा जाता है। जरूरत इस बात की है कि मिस्टर ट्रेल को कुमांऊँ का असली प्रशासक माना जाता है। कुमांऊँ इतिहासकार कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे (1882-1965) के अनुसार ट्रेल के सिद्धांत कि कुमांऊँ की सारी जमीन की मिल्कियत या मालिक ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर की है पर उनके द्वारा निर्देेशित अस्सीसाला बन्दोबस्त न्यायोचित तथा सर्वोत्तम माना गया था। जब उत्तराखंड सरकार जमीन का न्यायोचित बन्दोबस्त अपनाना चाहती है उसका पहला कदम यह होना चाहिये कि अस्सीसाला बन्दोबस्त में तत्कालीन कुमायूं - कुमांऊँ मंडल का वर्तमान पूर्णतः पर्वतीय क्षेत्र तथा ब्रिटिश गढ़वाल का वर्तमान पौढ़ी, रूद्रप्रयाग व चमोली जिलों के कुल नौ हजार गांवों का जो बन्दोबस्त हुआ जिन नौ हजार गांवों में 1929 से 1945 तक महात्मा गांधी द्वारा 1928 में अल्मोड़ा भेजे गये श्री शांतिलाल त्रिवेदी ने पंद्रह हजार मील पैदल घूम घूम कर हर गांव में ऊन कताई की उद्यमिता तथा ऊनी कपड़ों की बुनाई का कारोबार शुरू किया, इन सभी गांवों की चौहद्दी, उन गांवों की नाप, बेनाप-पड़त बेपड़त जमीन अव्वल दोयम इजरान के रूप में श्रेणी बद्ध की गयी थी, जमीन की नापजोख करने वाले अमीन जमीन का नक्षा तैयार करने वाले वर्तमान में उत्तराखंड सरकार के अमीनों सेवा निवृत्त उन अमीनों की भी सेवा नये बन्दोबस्त के लिये लेनी चाहिये जिन्हें जमीन के नक़्शे बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त है। इस जिले का छखाता परगना (पूरा नैनीताल पर्वतीय जिला) अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ तथा चंपावत एवं पौढ़ी गढ़वाल, रूद्रप्रयाग व चमोली जिलों के सभी गांवों का अस्सीसाला बन्दोबस्त दस्तावेज यदि उन गांवों में जमीन संबंधी दीवानी मुकदमों में सबडिवीजनल मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट तथा कमिश्नरों द्वारा किन्हीं मुकदमों के फैसलों से जमीन की हदें बदली हैं राजस्व परिषद (तब राजस्व परिषद इलाहाबाद-लखनऊ था) के निर्णयों सहित पूरा खाका तैयार हो। उसके लिये सेवानिवृत्त अमीन, पटवारी तथा पटवारी से पदोन्नत कानूनगो-राजस्व निरीक्षक, नायब तहसीलदार एवं तहसीलदार जिन्हें जमीन संबंधी व्यावहारिक जानकारियां हों, यदि शरीर-दिमाग से वे सही हों उनकी सेवायें ली जानी चाहिये ताकि मुख्यमंत्री महोदय को अस्सीसाला बन्दोबस्त संबंधी सटीक जानकारी प्राप्त हो। उत्तराखंड राज्य के इन नौ जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, पौढ़ी, रूद्रप्रयाग, चमोली का क्षेत्रफल 30,718 वर्ग किलोमीटर है। तात्पर्य यह कि पूरे उत्तराखंड जिसका क्षेत्रफल 53,484 वर्ग किलोमीटर है अस्सीसाला बन्दोबस्त वाला क्षेत्र राज्य के सर्वाधिक दुर्गम क्षेत्र हैं तथा क्षेत्र के नजरिये से सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला इलाका है।
2. टेहरी रियासत वाला क्षेत्र- वर्तमान उत्तरकाशी जनपद क्षेत्रफल 8016 वर्ग किलोमीटर तथा टेहरी गढ़वाल क्षेत्रफल 3796 वर्ग किलोमीटर वाला दूसरा बड़ा दुर्गम क्षेत्र है। जिसकी जमीन संबंधी जानकारी टेहरी राज्य के उ.प्र. में विलय होने के पश्चात पिछले 67 वर्षों का भू भौगोलिक इतिहास तथा टेहरी राज दरबार की भूमि व्यवस्था का आधिकारिक विश्लेषणात्मक अध्ययन अत्यंत आवश्यक विधा है। इन दोनों जनपदों का क्षेत्रफल 10,812 वर्ग किलोमीटर है। इस प्रकार उत्तराखंड राज्य के पूर्णतः पर्वतीय प्रकृति वाली भूमि का सकल क्षेत्रफल 41,520 वर्ग किलोमीटर है जबकि देहरादून, हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर के तीन जिलों का क्षेत्रफल 11,964 वर्ग किलोमीटर है। इन तीन जनपदों में भी देेहरादून व हरिद्वार रैयतबाड़ी रकबे वाले जनपद हैं जबकि नैनीताल की तराई व वर्तमान ऊधम सिंह नगर जिले की भूमि व्यवस्था सर्वाधिक पेचीदगी वाला प्रसंग है। तराई की जमीन के बाबत उ.प्र. सरकार ने कई कमेटियां नियुक्त कीं। उनकी सिफारिशें  ठंडे बस्ते में पड़ी रहीं। प्रदेश  के मुख्य सचिव रहे मूलतः अल्मोड़ा निवासी स्व. भैरव दत्त सनवाल आई.सी.एस. थारू, बोक्सा जनजातियों के जमीनी हक हकूकों पर हुए प्रहारों से सनवाल जी अत्यंत व्यथित व्यक्ति थे। तराई की राजनयिक हकीकतों से वाकिफ वह सजग व्यक्ति अपने मन की पीड़ा मन में ही रखते दिवंगत होगया। जरूरतमंदों को न्याय नहीं मिला। तराई जमीन वाला प्रसंग उत्तराखंड सृजन के पश्चात भी सिडकुल में हुए भारी निवेश वाला प्रसंग एक न एक दिन उघड़ेगा ही इसलिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड सरकार जिसकी धरती की सीमायें दो सार्वभौम राज्यों से लगती हैं, भारतीय संघ के घटक राज्य उत्तराखंड की भूमि संबंधी सटीक जानकारियां सरकार के संज्ञान में आवें एतदर्थ सर्वप्रथम High Power Uttarakhand Land Settlement and Land Development Enquiry Commission का गठन राज्य के 1. नौ जनपदों जहां अस्सीसाला बंदोबस्त हो चुका है उसके बाद दो बंदोबस्त हुए हैं उस बंदोबस्त की ताजा स्थिति जानने 2. उत्तरकाशी व टेहरी जनपद जो टेहरी रियासत के हिस्से थे वहां की भू व्यवस्था का सटीक आकलन 3. देहरादून तथा हरिद्वार के रैयतबाड़ी भू प्रबंध के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों का भूमि सुधार - भूमि व्यवस्था पर अपनी संस्तुतियां उत्तराखंड सरकार को प्रस्तुत करने के लिये उच्चसत्ताक आयोग का गठन कर उसके अंतर्गत उच्चसत्ताक वर्किंग ग्रुप भी गठित करें। ऐसे इनक्वायरी कमीशन से अपनी रपट एक वर्ष भीतर प्रस्तुत करने हेतु अपेक्षा करनी चाहिये। मुख्यमंत्री जी को यह भी चाहिये कि वे उत्तराखंड की राजनीति में दखल रखने वाले राजनीतिक दलों, गैर राजनीतिक, समाज चिंतकों, सड़क निर्माण, पुल निर्माण विशेषज्ञों द्वारा डाइनामाइट प्रयोग से पहाड़ियों के दरकने खिसकने तथा सड़कों के धंसने वाले प्रसंगों पर भी उच्चसत्ताक आयोग के विचारणीय बिन्दुओं में सम्मिलित किया जाना चाहिये। सड़क के किनारों पर जो अतिक्रमण वाला कब्जा जहां कहीं भी हुआ है, सड़कें टूटने की जो घटनायें आये दिन हो रही हैं, नदियों में जो मलवा गिराया जारहा है, नदियों के किनारे बसासत, नदियों में विभिन्न किस्म के अपशिष्ट गिराये जाने से जल प्रदूषण बढ़ रहा है उसे रोकने के कारगर उपायों सहित भू प्रबंधन विशुद्ध देहाती, सड़कों के किनारे के अघोषित शहरी विसंगतियां, शहरों का साफ सुथरा रखने का उत्तरदायित्त्व 73वें संविधान संशोधन के अनुसार नगर प्रशासन का है इसलिये नगर परिषद, नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगमों वित्तीय तथा कार्यकारी अधिकारों के प्रतिनिधायन की तात्कालिक जरूरत है। यह भी विवेचनीय विषय हो कि प्रधानमंत्री ग्राम संपर्क सड़क योजना में उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों के लिये ग्राम संपर्क सड़क के बजाये ग्राम संपर्क रज्जुमार्ग तथा रज्जुमार्ग हेतु उत्तराखंड के 20 हजार बारहमासी, चौमासी, छःमासी घराटों जिनमें गांव संजायत घराट व भगार घराट सम्मिलित हैं उनके जीर्णोद्धार के लिये भी उत्तराखंड सरकार उच्चसत्ताक आयोग से संस्तुति देने का आग्रह करे। भूमि प्रबंधन में एक दुखती रग भारतीय वन अधिनियम 1927 के अनुसार विशुद्ध जंगलात, अस्सीसाला बंदोबस्त में गांव के लोगों को जंगलात, सिविल जंगल में गौचर पनघटों के अधिकार दिये गये थे। इस प्रसंग को अल्मोड़ा जनपद के तत्कालीन जिलाधिकारी मिस्टर डाइविन को 14.1.1921 उत्तरायणी के दिन सरयू-गोमती संगम में एकत्रित पच्चीस हजार कुमइयां गांव प्रधान, थोकदार, राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे के नेतृत्त्व, हरगोविंद पंत व चिरंजीलाल साह जैसे अग्रणी नेताओं के मार्गदर्शन में अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया जिसका महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में बड़े उत्साह के साथ कुली बेगार हटाओ की तुलना अमरीका की दास प्रथा को हटाने वाले अब्राहम लिंकन से की थी। बदरी दत्त पांडे ने गौचर पनघट के अधिकार मांगे थे। गौचर पनघट के अधिकार के साथ साथ वन अधिनियम 1080 के द्वारा उत्तराखंड की बात न तो रखी गयी बदले में खेत की मेंड़ को जंगलात का हिस्सा बताया गया। वन अधिनियम 1927, 1980 तथा 2006 में जो सुविधायें वन से घिरे गांवों के लोगों के लिये उपलब्ध की गयीं उत्तराखंड सरकार ने उस पर जंगलों से घिरे गांवों का रोडमैप भी नहीं तैयार किया अतएव तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड सरकार High Power Uttarakhand Land Settlement, Reforms and Land Development Enquiry Commission  का गठन कर उसकी संस्तुतियों के आधार पर ही नया बंदोबस्त संबंधी कार्यवाही का श्रीगणेश करे तथा वन पंचायतों को जंगलात के घेरे से बाहर निकाल कर त्रिस्तरीय पंचायत राज को जिला प्रखंड तथा गांव सभा से जोड़ कर व्यवस्थित करे।     

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