गांधी भारत के आमुख हैं। स्वतंत्र भारत के चेहरे की सही पहचान तभी हो सकती है जब सवा अरब भारतीय मनसा, वाचा, कर्मणा स्वतंत्रता पाने के महात्मा गांधी का अहसान तहे दिल से स्वीकार करें। महात्मा ने चालीसवें व साठ वर्ष की आयु में अपनी मातृभाषा गुजराती में जो दो रचनायें करीं उन्हें भारत के लोग हिन्द-स्वराज तथा अनासक्ति-योग के नाम से जानते हैं। भारत की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आस्थामूलक स्वतंत्रता तथा आचार-व्यवहार का अनुशीलन इन दो लघु ग्रंथों को अपने नित्य प्रति व्यवहार में लाने से जहाँ हम भारतीय लोग महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अभय, अस्वादु, शरीर श्रम, सर्वधर्म समभाव, अस्पृश्यता निवारण तथा स्वदेशी इन ग्यारह व्रतों के बारे में सतत मनन करते रह सकेंगे वहीं इनमें से जो-जो व्रत अपनाने में हम अपने आपको समर्थ पाते हैं उनका पालन करने की प्रतिज्ञा शीघ्र करें। धीरे-धीरे अपने आपको कम से कम सत्याग्रह, अहिंसा परमो धर्मः, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना), सदा सर्वदा निर्भय बने रहना, सदाचार का यह शाश्वत सिद्धांत व्यवहार में लाना कि शरीर की आवश्यकता से अधिक भोजन करना दूसरे का हिस्सा खाने के बराबर है अर्थात भोजन की चोरी करने जैसा है।
फेसबुक में उकेरी जाने वाली गांधी जीवन-दर्शन की सभी बातों को अपनाने में यदि कोई व्यक्ति कठिनाई अनुभव करे तो भी कम से कम सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, शरीर-श्रम, स्वदेशी एवं सर्वधर्म समभाव के साथ-साथ अश्पृश्यता निवारण सरीखे कर्त्तव्यों को प्राथमिकता देना शुरू करें। हम हर भारतीय मानुष को गांधी-विनोबा सरीखा उत्कृष्ट मानव तो नहीं बना सकते किन्तु फिर भी राष्ट्रीय, सामाजिक एवं कायिक परिप्रेक्ष्य में गांधी प्रणीत जीवन शैली का अध्ययन करने की मानसिकता तो विकसित कर ही सकते हैं। आने वाली इक्कीसवीं शती के दूसरे दशक के अंतिम वर्ष २०१९ में २ अक्टूबर को भारत राष्ट्र गांधी जयंती मनायेगा इसलिये हिन्द-स्वराज एवं अनासक्ति-योग में गांधी वाङ्मय के सर्वोत्कृष्ट शब्द समुच्चय का, महात्मा गांधी मौन दिवस प्रत्येक सोमवार को गांधी के राजनीतिक दर्शन तथा गांधी अध्यात्म दर्शन की कृतियों का क्रमिक आमुख जारी किया जाना संकल्पित है। महात्मा गांधी प्रत्येक सोमवार को मौन व्रत रखते थे इसलिये उनकी मौन साधना को उजागर कर भारत की वर्तमान पीढ़ी के संज्ञान में लाना इसलिए आवश्यक क्योंकि पिछले साढ़े छः दशकों में भारत की स्वतंत्र शासन यात्रा में जो विसंगतियां उपजी हैं उनके राजनीतिक समाधान पर राष्ट्रीय बहस जारी हो ताकि गांधी जी ने पार्लियामेंटरी स्वराज की अपने देशवासियों के लिए वैचारिक पहल की वह पार्लियामेंटरी स्वराज की महात्मा गांधी के पंचायती राज संकल्प को मुखरित कर सके। हिन्द स्वराज के गहन चिंतन मनन तथा हिन्द स्वराज में व्यक्त गांधी विचार भारत की राजनीतिक चेतना को मुखरित करने की बहुत बड़ी सामर्थ्य वाला, वाचक के प्रश्न अधिपति के उत्तर, साथ में यत्र-तत्र अधिपति के वाचक से किये गए प्रतिप्रश्न। इस संवाद को यूरोप के कई विद्वानों ने हिन्द की राजनीतिक विचारधारा, महात्मा गांधी के रामराज्य की संकल्पना जिसे ऐसी कल्पना मानने वाले विद्वज्जनों की कोई कमी नहीं है जो गांधी विचार को अव्यावहारिक स्वर्णिम सुख कल्पना (Utopian) की काल्पनिकता का आवरण चढ़ा कर उसे निरस्त करने के पक्षधर हैं। दूर क्यों जायें, महात्मा गांधी के तीन आचार्यों में से एक दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर जिन्हें भारत के लोग काका साहेब कालेलकर कह कर पुकारते हैं, गांधी के हिन्द स्वराज को आधुनिक विकास पंथ का बाधक तत्त्व को राजकरण के लिए उन्होंने १-८-१९५९ के अपने प्राक्कथन में लिखा "यह नयी निष्ठा केवल नेहरू जी की नहीं अपितु लगभग सारे राष्ट्र की है। - - - -विनोबा भावे गांधी जी के आत्मवाद का सर्वोदय और अहिंसक शोषणविहीन समाज रचना का जोरों से पुरस्कार कर रहे हैं। - - - -उन्होंने भी देख लिया है कि पश्चिम के विज्ञान व यंत्र कौशल के बिना सर्वोदय अधूरा ही रहेगा।"
बरेली के एक समाचार में कहा गया था कि भूख से केवल निर्धन ही नहीं अपितु धनवान भी मरता है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् भारत संचार निगम लिमिटेड का एक वरिष्ठ इंजीनियर बरेली में अपनी धर्मपत्नी के साथ अकेला रहता था। वृद्धावस्था के कारण दोनों ही इस स्थिति में नहीं थे कि स्वयं भोजन बना कर खा सकें। भोजन के अभाव में पुरुष के प्राण पखेरू उड़ गए। इस समय देश में आर्थिक दृष्टि से निर्बल वर्ग के लिये संविधान सम्मत भोजन उपलब्धि का शिगूफ़ा छोड़ा गया है। भूख तो केवल प्रकृति के कानून को जानती है।राजव्यवस्था के कानून भूख से छुटकारा नहीं दिला सकते। भूख से मुक्ति पाने के लिये समाज में दया व सेवा भाव से ही भूखे के लिये भोजन कि व्यवस्था हो सकती है। वर्तमान में संयुक्त परिवार टूट गये हैं। कामकाजी दम्पत्ति अपने-अपने काम एवं भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। वृद्ध माता-पिता की चिंता उन्हें नहीं सताती, न ही वृद्ध माता-पिता पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ रहने की मानसिकता रखते हैं। वे भी अपनी निजता की संरक्षा के लिये अलग ही रहना चाहते हैं। प्राचीन काल में धनी व दानी लोग वाराणसी, मथुरा, वृन्दावन, अयोध्या, हरिद्वार, द्वारिका आदि तीर्थ स्थलों में सदावर्त व भोजनालय चला कर भूखे लोगों को भोजन कराते थे। जगह-जगह अनाथालयों, यतीमखानों में अनाथ लोगों के लिये भोजन व रहने का सहारा था। धर्मशालायें थीं जहाँ लोग आकर ठहर सकते थे। आज पर्यटन व्यवसाय ने रहने व खाने के प्रबंधन को इतना महंगा कर दिया है कि भूखे को भोजन विज्ञापन जगत की "वाहवाही" लूट का साधन सा बनता दिखायी दे रहा है। भूख और प्यास निवारण जीव मात्र की पहली जरूरत है। अंधाधुंध बढ़ रही जनसंख्या का दबाव झेल रहे शहरों में प्यास बुझाने तथा भोजन करने के लिये जेब में पैसा चाहिये। शरीर असमर्थ है, वृद्धावस्था है, रहने-खाने की ठौर नहीं है, ऐसे आबाल, वृद्ध नर-नारी शहरों में रह रहे हैं और टुकुर-टुकुर देख रहे हैं उनके योगक्षेम के लिये कानून व्यवस्था अथवा कानून का राज रत्ती भर भी मददगार नहीं हो सकता। समाज के ऐसे वंचित लोगों के लिये संपन्न लोगों के मन में दयाभाव हो, जीवों के प्रति दया दृष्टि हो तभी ऐसे लोगों को भूख व प्यास के संकट से उबारा जा सकता है। जो लोग यह सोचते हैं कि कानून व सरकार हर समस्या का समाधान है, कानून व सरकारी मशीनरी में जीव दया के लिये कोई माकूल कोना है ही नहीं तो सरकार दारिद्र्य दुःख पीड़ित व्यक्तियों के हितार्थ कानून, नियम, उपनियम बना ले किन्तु मानवीय दृष्टिकोण के अभाव में पीड़ितों की पीड़ा बढ़ने ही वाली है। राहत तो उसे तब मिल सकती है जब प्रबंधन में करुणा का भाव जाग्रत हो। केदारघाटी सहित समस्त केदारखंड (गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग व चमोली जिले) के सैकड़ों गावों के हजारों परिवार अपने पैतृक घर-गावों से बाहर राहत शिविरों के तम्बुओं में अथवा एस्बेस्टिस चादरों के खोखों में रह रहे हैं, उनके पास पहनने, ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों का भी अत्यंत अभाव है। उत्तराखंड सरकार उन्हें राहत के नाम पर आश्वासन देती जारही है, उनके मकान बनाने के लिये आर्थिक सहायता देने की घोषणायें करती तो है किन्तु जमीनी स्तर पर वास्तविक राहत का कहीं नामोनिशान तक नज़र नहीं है। नग्न को कपड़ा, भूखे को भोजन व प्यासे को पानी दिलाने के लिये कानून, नियम, उपनियम तथा विभिन्न प्रकार की नियमावलियां काम नहीं आयेंगी। आपदा से निपटना राजनीतिक तथा प्रशासनिक आपद्धर्म के जरिये स्थानीय संपन्न, श्रीमंत व भूत दया करने वाले महानुभावों एवं ममतामयी मातृ शक्ति के सहयोग से ही राहत का मार्ग खोजा जा सकता है। जिस तरह सांप्रदायिक, भाषायी एवं अन्य प्रकार के दंगों के समय शांति समितियां गठित की जाती हैं, उत्तराखंड सरकार को चाहिए था कि उजड़े हुए गावों लोगों के लिये पुनर्स्थापन हेतु राहत व पुनर्स्थापन कमेटी जिला, ब्लाक तथा नगर या ग्राम पंचायत स्तर तक गठित की जातीं। राहत बाँटने के काम में अकेला जिला प्रशासन कुछ नहीं कर सकता। उसे जन सहयोग आपद्धर्म के रूप में लेना ही होगा। वर्त्तमान सरकार यदि उत्तराखंड की आपदा राहत को रास्ते पर नहीं ला सकती, चुनावी वर्ष होने के कारण राजनैतिक व प्रशासनिक अमला यदि अत्यंत व्यस्त है तथा उसे पीड़ित की सुध लेने का अवसर ही नहीं मिल रहा हो तो दिल्ली के तख़्त में २०१४ के सामान्य चुनाव के परिणामों के पश्चात जो भी नयी सरकार आती है उसे उत्तराखंड को त्रासदी से परित्राण दिलाने के तौर-तरीके तय करने चाहिये।
नान्दीमुख गांधी चिंतन के अंतर्गत हिन्द स्वराज तथा अनासक्ति योग में अभिव्यक्त गांधी विचार पुष्करिणी में सत्याग्रह, अहिंसा, अभय, अस्तेय, अस्वाद, शरीरश्रम, स्वदेशी, सर्वधर्म समानत्त्व तथा छुआछूत से छुटकारा पाने की सामूहिक मनोवृत्ति एवं वंचित, दलित, दमित, शोषित समाज को भी राजा-रईस व सत्ताधारी के सामानांतर छाती फुला कर खड़े होने का साहस मिले इस आलेख का यह महत्त्वपूर्ण पहलू है। गांधी आचरित सत्याग्रह, निरायुध अहिंसक समाज सृजन, गांधी आर्थिकी के द्वारा संयुक्त राष्ट्र में गांधी अहिंसा दर्शन, गांधी आर्थिकी की शरीरश्रम वाली माइक्रो उद्यमिता से हर हाथ को काम मिले। भारत सरकार से यह अपेक्षा की जाये कि जिस तरह संयुक्त राज्य अमेरिका ने अब्राहम लिंकन को दास प्रथा मुक्तिदूत के रूप में प्रतिष्ठित किया है उसी तरह महात्मा गांधी की अहिंसा को राष्ट्र संघ भारतीय दूतावासों, भारत संघ के घटक राज्यों सहित प्रत्येक जनपद, नगर निकाय जिला पंचायत, क्षेत्र-तालुका पंचायत तथा ग्राम पंचायत में महात्मा गांधी अहिंसा स्थलों की स्थापना की जाये। ऐसा करने के लिये भारत सरकार भारतीय संसद की अनुमति से "राष्ट्रीय महात्मा गांधी अहिंसा न्यास" की स्थापना कर वैश्विक अहिंसा को स्थापित करने में राष्ट्र संघ का भरपूर सहयोग करे। संसार के संपन्न समाज व विपन्न मानवीय संवेदना, सहानुभूति एवं समग्र वैश्विक मानव समाज में अहिंसा का मार्ग अपनाने की पहल इस आलेख की प्राथमिकता है। ब्लॉग के द्वारा सामयिक सरोकारों पर बहस, जुवेनाइल जिसे भारतीय वाङ्मय नाप्तयौवन कहता है, आज कानून के क्षेत्र में यत्र-तत्र चर्चित बिंदु है। नाप्तयौवन-जुवेनाइल कौन है ? उम्र का कौन सा पड़ाव पुरुष अथवा स्त्री को युवा या आप्तयौवन मानता है, इस पर भी वैश्विक बहस के समानांतर मुष्टिक व चाणूर सरीखे मल्लों के साथ नंदनंदन श्रीकृष्ण व बलराम का मल्लयुद्ध जुवेनाइल कानून के सन्दर्भ में तात्कालिक विचार योग्य बिंदु है।
शब्द नाप्तयौवन का "जुवेनाइल" अवतार।।
शब्दों व ध्वनियों का मूल स्त्रोत ध्वन्यालोक और भारत का नटराज नृत्य के सम्बन्ध में वैयाकरण पाणिनी ने भी कहा - "नृत्यावसाने नटराज राजोननाद ढक्का नवपंचवारम"। शब्द यात्रा के इस शब्दाटन को भाषा विज्ञानी सुनीति कुमार चाटुर्ज्या और डॉक्टर हेम चन्द्र जोशी ने भारतीय वाङ्मय शब्द शक्ति को यूरोप के उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोणस्थ) इंग्लिश स्थान पहुँचने पर मातृ को मदर, पितृ को फादर, भ्रातृ को ब्रदर तथा स्वषा को सिस्टर के रूप में देखा। आज भारत में यत्र तत्र जुवेनाइल शब्द लोगों की जुबान पर है। मथुरा में भोजेन्द्र उग्रसेन के राजकुमार कंस ने अपने पिता को गद्दी से उतार कर वह स्वयं वृष्णि, अंधक, कुंकुर व भोज समुदायों का राजा बन गया। आज भी मथुरा के कंसथार मोहल्ले को कंस का राजमहल माना जाता है। भोजेन्द्र कंस ने अपनी चचेरी बहन के पुत्र देवकी नंदन तथा नन्द यशोदा द्वारा पालित पुत्र को मुष्टिक व चाणूर नाम के मल्लों द्वारा मारे जाने के लिये मल्ल युद्ध रंगमंच का निर्माण किया था। देवकी व रोहिणी पुत्र कृष्ण बलराम का मुष्टिक व चाणूर से मल्ल युद्ध आयोजित किया। मथुरा के आबाल वृद्ध नर-नारियों ने कहा - कृष्ण बलराम नाप्तयौवन हैं अर्थात अभी जवान नहीं हुए अतः उन्हें मुष्टिक-चाणूर सरीखे पहलवानों से लड़ाना न्याय संगत नहीं है। तब कृष्ण बलराम दोनों ही सोलह वर्ष से कम उम्र के थे। कृष्ण बलराम के अलावा भारतीय पारम्परिकता में दूसरा उदाहरण पंगु मुनि पराशर-सत्यवती पुत्र कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास व वतिका के सोलह वर्षीय पुत्र ज्ञानसिंधु शुकदेव का है जिन्होंने नाप्तयौवन याने जुवेनाइल उम्र में पारमहंस्य ज्ञान गंगा का प्राकट्य किया। आज हिंदुस्तानी विज्ञ समाज जुवेनाइल की जो व्याख्या कर रहा है, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने जब हथियार उठाये थे एवं रणांगण में युद्ध की बिसात बिछायी थी तब वह षोडशी ही तो थी।
आज भारत में प्राकृतिक जल प्लावन, नदियों की बाढ़, समुद्र तटीय क्षेत्रों में चक्रवात किस्म की सुनामी के समानांतर मानव समाज में भी अनेक प्रकार की भीषण बाढ़ें आयी हुई हैं। पहले हम भारत के आस्थामूलक बहुसंख्यकों में आयी तथाकथित धार्मिकता की बाढ़ को देखें। यत्र-तत्र भारत भर में मंदिरों, तीर्थों तथा विभिन्न भारत धर्मी सम्प्रदायों के गुरुओं और धर्माचार्यों के उपदेशों, प्रवचनों और आशीर्वचनों की भी भयंकर बाढ़ आयी हुई है। अध्यात्म व भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की त्रिवेणी जगह-जगह अपनी नवनूतन धर्म व्यापार के रूप में बढ़ रही है। धर्मगुरुओं में मध्य यूरोप में फ़ैली मध्ययुगीन पोप लीला का संचरण सर्वव्यापी दिख रहा है। यहाँ तक कि वैश्विक बाज़ार संस्कृति ने योगाचार्य महर्षि पतंजलि के योगपथ को चौराहे पर खड़ा कर बिकाऊ माल बना डाला है। कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर धर्मगुरुत्व करने वाले महानुभावों ने सर्वधर्म समानत्व, अपरिग्रह, अनासक्ति, अस्वाद, शरीरश्रम, ब्रह्मचर्य के अलावा गांधी मूल व्रत सत्य का अवलम्बन या सत्याग्रह तथा अहिंसा परमो धर्म के मर्यादामूलक आचरण करना छोड़ कर अहम् पूर्वम्-अहम् पूर्वम् की होड़ तथा दौड़ में भागीदारी कर ली है। आस्था आज बाजारू विज्ञापन की सूत्रधार बन गयी है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
2. बालविजय जी यह भी व्यक्त करते हैं कि आज हर व्यक्ति किंकर्त्तव्यविमूढ़ है कि वह मल्टीनेशनल ब्रांड खादी और महात्मा गांधी की राष्ट्रीय विरासत वाली खादी इन दोनों में से किस खादी को अपनाये। यही भारतीय समाज को भ्रमित करने वाला यक्ष प्रश्न है। चर्खा द्वादशी, जो महात्मा गांधी की छप्पनवीं जयंती के अवसर पर 24 सितंबर 1924 को थी तब से अगले दस वर्ष तक महात्मा गांधी ने बजरिये चर्खा संघ भारत भर में खादी के फैलाव का अहर्निश प्रयास किया। उन्हें अपार जन सहयोग भी मिला। खादी हिन्दुस्तान की आजादी के दीवानों की वर्दी थी। आबाल वृद्ध हर कोई, खादी के लिये अपना योगदान देने में महात्मा गांधी को भारतीय राष्ट्र का परित्राता समझता व मानता भी था। सेवा ग्राम वार्धा में सन् 1935 में परमहंस योगानंद ने महात्मा गांधी से भेंट की और सूत कताई व हाथ कताई को अद्वितीय योग मार्ग बताया। पांच हजार वर्ष पहले सत्यवती पाराशर नंदन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने नारायण कवच का जो उद्गान किया था, करन्यास - हाथ का योग, दोनों हाथों की दसों अंगुलियों का पोर स्पर्श योग मार्ग की उद्भट क्रिया है। गांधी के चर्खे में अंगूठा, तर्जनी व मध्यमा अंगुलियों का निरन्तर सूत कातते जाना एक ऐसी यौगिक क्रिया है जो शरीर को स्वस्थ्य रखने का काम करने के साथ-साथ हाथ-पांव हिलते रहें तथा शरीर श्रम होता रहे। तकली अथवा हर किस्म के चर्खे में कताई करने में व्यक्ति के स्वास्थ्य का बहुत बड़ा खजाना महात्मा गांधी ने उपलब्ध कराया था।
कुल्लू-मनाली हिमाचल प्रदेश से जारी अपने पथ प्रदर्शक नौ परिच्छेद वाले परिपत्र में बाल विजय ने गांधी की राष्ट्रीय विरासत वाली खादी से जुड़े लोगों का आह्वान किया है। उन्हें ललकारा है कि अपना रास्ता स्वयं खोजो, सामूहिक मेधा व विवेक का सहारा लो। आदि शंकर की तरह तत्त्वबोध का मार्ग खोजने के लिये निरन्तर विमर्श करते रहो, हारो मत। महात्मा गांधी की स्थितप्रज्ञता तक पहुँच रखो तथा गांधी प्रार्थना फिर शुरू करो। यदि गांधी जीवन दर्शन की बुनियादी बातों को अपनाना है तो केवल सादा रहन-सहन व ऊँचे विचार, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, शरीर श्रम, अस्वादु भोजन उतना ही करना जितनी पेट की जरूरत हो। सदाचार का सबसे बड़ा स्त्रोत पेट की जरूरत से ज्यादा भोजन न करना है। यह सवाल अपनी षष्टि पूर्ति के वक्त राजा बलदेव दास बिड़ला ने पितृभक्त बेटों को नसीहत दी थी। एक सामान्य जन के रूप में काशी वास पसंद किया था। गांधी विरासत वाली खादी का रास्ता अपनाने वाले लोगों को अपनी नजर में हिन्दुस्तान के गांव के गरीबों व महानगरों के झुग्गी, झोपड़पट्टी में अपने दिन बिताने वाले गरीबों के जीवनयापन के स्तर को ऊँचा उठाने में एक विचार-विशेषज्ञ समिति के रूप में कार्य करना होगा। सद्विचार व ऊँचा आदर्श अपनाने वाले लोग जो खादी, महात्मा गांधी की विरासत वाली खादी से जुड़े रहना पसंद करते हैं उन्हें वाल स्ट्रीट, मल्टी नेशनल खादी ब्रांड वालों के साथ सहअस्तित्त्व का, सहभोज का, सह वीर्य का, साथ-साथ चलने का प्रयास तो करना ही होगा पर अपने आपको स्वामी मान कर नहीं अपितु ग्वाला, रखवाला, अमानत की देखरेख करने वाला, कार्यक्रम को सही दिशा बोध देने वाले विचार-विशेषज्ञों के रूप में स्थापित करना होगा। जिन खादी वालों को तड़क-भड़क वाली जिन्दगी पसंद है उन्हें चाहिये कि वे मल्टी ब्रांड, मल्टी नेशनल, अंतर्राष्ट्रीय खादी की पंगत में वर्तमान खादी कमीशन व एम.एस.एम.ई. मंत्रालय की गणेश-प्रदक्षिणा शुरू कर अपने लिये वाजिब जगह मल्टी ब्रांड खादी सेक्टर में सुनिश्चित कर लें।वह एक ऐसा ही बंटवारा होगा जो 1905 में बंग भंग तथा 1947 में भारत विभाजन के समय हुआ। भारत के उस सपूत रत्न को चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री जिसने भारतीय मुद्रा में महात्मा गांधी का आमुख (Face of Mahatma Gandhi) तय किया वह वास्तव में भारतीय राष्ट्र की नींव का वह पत्थर है जिसे हजारों साल पहले महाविष्णु के मशविरे से "कश्यपदायादों" (देव- दानवों) ने समुद्र-मंथन का संविद तय होने पर जिसमें महाविष्णु ने स्वयं कच्छप बन कर समुद्र मंथन को मूर्त्त रूप देकर गढ़ा था। उत्तर भारत में रामलीलायें यत्र-तत्र-सर्वत्र आज भी होती रहती हैं। राम के एक्टर को लीला अवधि में राम पद मिलता है पर वह राम नहीं मात्र राम का एक्टर होता है। वह यह विवेक रखे कि उसने राम का स्वांग किया, वह स्वयं राम नहीं। राम सरीखा बनने के लिये उसे जन्म जन्मांतर तक मनोयोग पूर्वक जीवन जीना होगा जिससे उसके व्यक्तित्त्व में राम का मर्यादा पुरूषोत्तम गुण प्रकट हो सके। वैयाकरण पाणिनि ने दाशरथि राम में वह शक्ति खोजी जो "येषाम् योगिनः रमन्ते सः रामः सैव दाशरथि रामः" के रूप में विद्यमान थी। महात्मा गांधी ने इसी दाशरथि-राम-तत्त्व से बंध कर भारत की आजादी के संघर्ष का सूत्रपात किया। आसेतु हिमाचल महात्मा गांधी रातोंरात भारतीय जन-जन के हृदय सम्राट बन गये। आदि कवि वाल्मीकि ने राम वनवास के अवसर पर श्रंगबेरपुर में साकेत-अयोध्यावासियों के जनसमूह से कहलाया था - "वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथि यथा"।
11. कबीर की सधुक्कड़ी या दखिनी ‘भारत की लिंगुआ फ्रांका’ थी। आसेतु हिमाचल सन्यासियों व व्यापारियों के पारस्परिक संपर्क की बोलचाल थी। संस्कृत के विद्वान संस्कृत भाषा में विमर्श करते। इस्लाम के भारत आगमन से पहले खासदारों की भाषा संस्कृत, आमदारों की भाषा प्राकृत थी। प्राकृत व संस्कृत में चोली दामन का संबंध इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात सिंध सरीखे प्रदेशों में अरबी व उत्तर भारत में पारसी राजदरबार की भाषा बन गयी थी। सरकारी हुक्मनामे फारसी में जारी होते। जहां हिन्दू राजा शासक थे वे संस्कृत व तद्भव स्थानीय भाषा में राजकाज चलाते थे पर बाजार में बोली जाने वाली लश्करी-रेखता या उर्दू के समानांतर सधुक्कड़ी ही जन जन के बीच विमर्श व व्यापार का माध्यम थी। महात्मा गांधी जब 1918 में कोलकाता से मुजफ्फरपुर होते हुए चंपारण के गांवों के लोगों की दिशा-दशा देखने उत्तर बिहार जिसे तब तिरहुत कहा जाता था वहां पहुंचे, उनका जो संवाद गांव के निरक्षर पर गुणी लोगों से हुआ उसमें उन्होंने पाया कि तिरहुत के गांवों के हिन्दू मुसलमान एक ही भाषायें बोलते हैं। वह वज्जिका है। बिहार प्रदेश की दूसरी जन भाषायें मैथिली, मगही, अंगिका व भोजपुरी थीं। जिसे अब हम झारखंडी के नाम से जानते हैं वहां संथाली तथा छोटा नागपुरी उप भाषायें जन सामान्य द्वारा बोली जाती थीं पर व्यापारियों व साधु-संतों की भाषा सधुक्कड़ी समूचे भारत की संपर्क भाषा थी। यही कारण है भारत भ्रमण के द्वारा हर इलाके की जनभावना हृदयंगम करने के पश्चात महात्मा गांधी भारती लोक नाड़ी वैद्य का मानव सेवा का अद्वितीय कार्य संपादन किया। हिन्दुस्तान की पुरातन संस्कृति को महात्मा ने राष्ट्रीय परिवेश दिया।
12. खादी को वह महत्ता क्यों मिली ? गांधी ने जब चंपारण के गांवों की गरीबी को नजदीक से हृदयंगम किया तब उन्होंने भी अपने लिये न्यूनतम कपड़ों की जरूरत तय की। उनका यही आदर्श जहां भारत के आम लोगों को भा गया वहीं गांधी का अंतर्मन हर हिन्दुस्तानी का जीवनादर्श बना। यही जीवनादर्श गांधी विरासत वाली खादी है। गरीबी का प्रकोप इस देश में तब भी था जब बर्तानी शासक राज करते थे। आज भी अपना स्वराज होने के बावजूद भारत में गरीबी का कहर है। महात्मा गांधी ने अपनी निजी कपड़ा जरूरत को उस सीमा तक मर्यादित रखा जहां आबाल वृद्ध नर नारियों को तन ढकने के कपड़े की जरूरत थी। गांधी ने जहां स्वयं गरीबी को ओढ़ा हिन्दुस्तान के खुशहाल लोगों को भी ओढ़ी हुई गरीबी अपनाने के लिये प्रेरित किया। ओढ़ी हुई गरीबी को पश्चिमी विचारकों ने (Adopted Poverty) कहा। राजा, रईस व रंक में मानवीय भेदभाव न रहे, गरीब में भी वह साहस पैदा हो कि वह राजाओं रईसों के सामने सीना तान कर खड़ा हो सके। गांधी की आजादी की मुहिम हाथ कते, हाथ बुने परिधान के जरिये देश में एक ऐसा वातावरण तैयार करने में सफल हुई जिसने खादी का माहौल बनाया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की खादी के लिये श्रद्धा, सहानुभूति थी। जब तक पंडित नेहरू रहे उन्होंने खादी वालों की हर मांग को ग्रामीण औद्योगीकरण के परिप्रेक्ष्य में लिया। खादी के मूर्धण्य नेताओं से पंडित नेहरू की वैयक्तिक भिन्नता थी। पंडित नेहरू के पश्चात सरकार व खादी वालों में खींचतान शुरू हो गयी। खादी को भी दलीय राजनीति का कोपभाजन बनना पड़ा। राजनीतिक हितों की टकराहट ने उछंगराय नवलशंकर ढेबर सरीखे राजनेता रहे व्यक्ति को वैकुंठ भाई के पश्चात नौ वर्ष तक खादी आयोग का सदर रहने पर भी मार्मिक पीड़ा थी कि उन्हें केन्द्रीय सचिवालय में अनुसचिव स्तर के अधिकारी की चिरौरी मनौती करनी पड़ रही है जबकि उनके पूर्वाधिकारी रहे वैकुंठ लल्लू भाई मेहता जब भी मुंबई से दिल्ली आते पंडित नेहरू व पंडित पंत से मिलने का समय लेते जो उन्हें एक ही बार फोन करने पर मिल जाता। वे कहते कि लालबहादुर जी को कह दो कि वैकुंठ भाई आये हैं। वाणिज्य मंत्री लालबहादुर शास्त्री स्वयं वैकुंठ भाई से मिलने कोटा हाउस के कमरा नं. 6 में जाकर खादी ग्रामोद्योग आयोग के पहले सदर से मिलते थे। जब भारतीय संसद ने खादी ग्रामोद्योग अधिनियम L.X.I.1956 पारित किया, राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक कानून उसी अवधि में बने थे। खादी ग्रामोद्योग आयोग तब तक फलता फूलता रहा जब तक वैकुंठ मेहता उसके सदर रहे। वैकुंठ भाई की विशेषता यह थी कि वे आम सहमति के कार्यक्रमों को ही बढ़ावा देते थे। उनका जीवन दर्शन विकेन्द्रित अर्थांग था। उनमें कार्यकर्त्ता मात्र से सीधा संपर्क रखने का महामानवीय गुण था। वे जब तक आयोगाध्यक्ष रहे, आयोग मुख्यालय व आयोग के चारों जोनल कार्यालय व नयी दिल्ली के सघन क्षेत्र विकास कार्यालय के हर कार्मिक को सुनते थे। उनका मार्गदर्शन करते थे। सघन ग्राम विकास व ग्रामीण प्राथमिकताओं को मजबूत करना उनकी प्राथमिकता थी। वैकुंठ भाई के आयोग से रूखसत होने के पश्चात पहली अप्रेल 1963 से खादी आयोग में बौसिज्म ने दस्तक दी। पिछले पचास वर्ष में खादी संस्थाओं में भी बौसिज्म ने अपने पांव पसार लिये जिसका परिणाम सामने है। हैरिटेज खादी वाले गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं उन्हें खादी कमीशन व एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के शाही फरमानों को नहीं मानना है। वे अपनी उस स्वायत्तता के आकांक्षी हैं जो उन्हें वैकुंठ लल्लू भाई मेहता, प्राणलाल कापडि़या, श्रीमन्नारायण, आर. श्री निवासन, द्वारकानाथ लेले एवं अण्णा सहाय बुद्धे के आयोग सदस्यतावधि पहली अप्रेल 1957 से 31 मार्च 1963 पर्यन्त व्यावहारिक व क्रियात्मक रूप से उपलब्ध थी। वैकुंठ मेहता व उनकी टीम के सभी पूर्णकालिक सदस्य आयोग द्वारा सीधे वित्त पोषित संस्थाओं को वही रूतबा देती थीं जो विभिन्न राज्यों के कानून सम्मत स्वायत्तशासी राज्य खादी ग्रामोद्योग मंडलों को उपलब्ध था। वार्षिक बजट प्रबंधन का जो सिलसिला वैकुंठ मेहता ने आयोग बनने पर 1957 में निश्चित किया था वह पूरे 6 वर्ष विधिवत चलता रहा। खादी फंड व ग्रामोद्योग फंड से राज्य खादी ग्रामोद्योग मंडलों व सीधी वित्त पोषित संस्थाओं का वित्तीय सहायता तकनीकी सहायता तथा संगठनात्मक ढांचा बदस्तूर मिलता रहा। ढेबर कमीशन, रामचंद्रन कमीशन, घनश्याम ओझा कमीशन, थामस कमीशन, सोमदत्त कमीशन फिर थामस कमीशन में वैकुंठ भाई द्वारा बराबरी का दर्जा साझा होता रहा। जब तक खादी ग्रामोद्योग आयोग में चर्खा संघ व विभिन्न खादी संगठनों से जुडे़ कार्यकर्त्ता काम करते रहे आयोगाध्यक्षों के बदलने के बावजूद वैकुंठ भाई का विकेन्द्रित अर्थांग अपनी पकड़ बनाये रखा। वैकुंठ भाई खादी प्रबंधन के आखिरी सदर एम.एस.थामस को परिदृश्य से उनके ओझल हो जाने के पश्चात खादी कमीशन महाजन और खादी संस्था ‘कर्जदार’ होगयी। साहूकार व कर्जदार इस राम कहानी ने जवाहरलाल नेहरू के उस वक्तव्य की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी जो उन्होंने अक्टूबर 1956 में खादी ग्रामोद्योग आयोग प्रदर्शनी के उद्घाटन के वक्त ग्रामीण औद्योगीकरण की पृष्ठभूमि बताते हुए व्यक्त किये थे। उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने के.वी.आई.सी. विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत करते समय राष्ट्र राज्य के 6 लाख से ज्यादा गांवों का औद्योगीकरण का पथप्रदर्शक बताया था।
15. गांधी विचार, गांधी दर्शन व गांधी के निजी वैयक्तिक आदर्श वाला गंवई गांव से लेकर भारत के सत्ता केन्द्र दिल्ली तक राज-राजतंत्र व तंत्र की विविध व्यवस्था प्रविधियों के समानांतर गांधी से जुड़े लोगों ने भी एक नया संसार रचा। गांधी की आध्यात्मिक एवं सत्याग्रह आधारित जीवन शैली की बुनियाद आसेतु हिमाचल गांधी की अनेकानेक प्रस्तर प्रतिमाओं की स्थापना करते करते अनेक गांधी विरासत मेढियां भारत में यत्र तत्र सर्वत्र आज भी देखने में आरही हैं। गांधी जीवन काल में ही गांधी सेवा संघ गांधी आश्रम सरीखी संस्थाऐं अस्तित्त्व में आगयी थीं। भारत में आयी आधुनिकता के समानांतर गांधी के सान्निध्य में मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है। इस वैचारिक सिद्धांत के आधार पर भारतीय वाङ्मय में - साबरमती अहमदाबाद में आश्रम स्थापित करने के पश्चात ही महात्मा गांधी 1914-15 से भारतीय जनमानस में छा गये। जब उन्होंने दूधा भाई के कुटुंब को कोचरब आश्रम का एक हिस्सा बनाया, अस्पृश्यता निवारण का बीड़ा उठाया। गुजराती वैष्णव समाज जो उन्हें अपना मानता समझता था तथा आश्रम चलाने के लिये स्वैच्छिक वित्त पोषण भी करता था, महात्मा गांधी से एकदम बिफर गया। गुजरात के वैष्णव संप्रदायी हिन्दुओं ने महात्मा गांधी से असहयोग कर डाला। कोचरब आश्रम की दिनचर्या पर जब असर पड़ने लगा, ‘‘अहिंसा परमोधर्मः’’ के निष्णात जैन धर्मावलंबी मिल मालिक सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के अस्पृश्यता निवारण यज्ञ के लिये तेरह हजार रूपये की थैली सौंप कर आश्रम के चलते रहने का प्रबंध किया। वैष्णव बनिया समूह की असहयोगकारी हरकतों से महात्मा गांधी ने अपने कदम पीछे नहीं किये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये वसंत पंचमी पन्द्रह फरवरी 1915 को महात्मा जी ने अपनी आत्मिक पीड़ा वड़ील महामना मदन मोहन मालवीय को बतायी। महात्मा मालवीय जी से जानना चाहते थे कि क्या छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? यदि हां तो प्रमाण क्या हैं ? महामना मालवीय जी उस समाज से आते थे जो परंपराओं का परिपालन करते थे। मालवीय जी ने महात्मा जी की शंका निवारण करने में शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करने में अपनी निजी असमर्थता व्यक्त की पर महात्मा गांधी को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापना दिवस की भरी सभा में आश्वासन दिया कि वे काशी विद्वत् समाज की राय मालूम कर महात्मा जी की शंका का समाधान करेंगे। मालवीय जी महात्मा जी को साथ लेकर सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन के घर गये। उनके सामने गांधी जी की समस्या उठायी। राधाकृष्णन ने महामना-महात्मा द्वय को एक पखवाडे़ में सनातन शास्त्र सम्मत राय बताने का वादा किया। डा. राधाकृष्णन ने महामना मालवीय व महात्मा गांधी की विशाल मानवीय हृदयता का उल्लेख किया कि उनके सरीखे साधारण अध्यापक के घर आकर महात्मा गांधी व मदन मोहन मालवीय ने उन्हें कृतार्थ किया। जब राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को यह बताया कि अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है, मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता तो महात्मा गांधी ने छाती फुला कर उद्घोष किया कि हिन्दू समाज से अस्पृश्यता निवारण उनकी पहली प्राथमिकता है।
16. आज के हिन्दुस्तानी समाज की मूर्धण्य आवश्यकता ही यह है कि गांधीवादियों को सिलसिलेवार गांधी विचार से अवगत कराया जाये। गांधी विरासत को अपना आदर्श मानने वाले गांधीवादियों को सबसे पहले उनके अपने बीच घुस गये प्रचंड पाखंड का निवारण करना होगा। महात्मा गांधी की साफगोई अपनानी होगी। महात्मा जब दिल्ली आते, सेठ घनश्यामदास बिड़ला उन्हें हरिजन सेवक संघ किंग्जवे कैंप लाना नहीं भूलते। गांधी जी हरिजन सेवक संघ की प्रार्थना सभा में बिना नागा सम्मिलित होते थे। पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट के पास चिटगल नामक गांव के मित्रदेव पंत हरिजन सेवक संघ के लेखाकार थे। पूरी तरह गांधी जीवन शैली को समर्पित मित्रदेव के हिसाब व उनकी लिखावट की महात्मा गांधी जहां जाते प्रशंसा करते रहते। मित्रदेव पंत के वृद्ध पिता प्रयाग दत्त विधुर थे, बेटे के साथ रहते थे। छुआछूत पर यकीन भी करते थे। वैयक्तिक आचरण में छुआछूत मानते भी थे। लकड़ी धोकर खाना बनाने वाले ब्राह्मणों में से थे। यद्यपि प्रयाग दत्त पंत ज्यादा समय घर के अंदर ही रहते तथापि उनका सामाजिक दायरा अपनी पीढ़ी के कुछ ब्राह्मणों व बुजुर्गों तक ही सीमित था। प्रार्थना सभा से पहले किसी मनचले युवा ने मित्रदेव पंत के घर में छुआछूत मानने की बात महात्मा जी के संज्ञान में ला दी। उन्होंने मित्रदेव को संबोधित कर कहा - उसके घर में छुआछूत मनायी जाती है। मित्रदेव ने महात्मा को सफाई दी कि वे स्वयं छुआछूत पर यकीन नहीं करते पर अपने वृद्ध पिता को अनुशासित करना उनके स्वधर्म का अंग नहीं बन सकता। महात्मा मित्रदेव की काबिलियत व परिश्रमशीलता के प्रशंसक थे पर उन्होंने फैसला लिया कि मित्रदेव हरिजन सेवक संघ के परिसर में नहीं रह सकते। महात्मा गांधी ने घनश्यामदास बिड़ला से कहा - मित्रदेव के लिये आवश्यक इंतजाम बिड़ला मिल में करो।
17. छुआछूत वाली उपरोक्त घटना मैंने इसलिये लिखी क्योंकि आज भी पूरे पाश्चात्य रंग में रंग जाने के बावजूद अपने को सवर्ण कहने वाले हिन्दू छुआछूत मानते हैं। गांधीवादियों में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो छुआछूत मानते हैं तथा दलित समाज को हिकारती नजर से देखते हैं। मौका आने पर उनका सामाजिक अपमान करने से भी नहीं चूकते इसलिये प्रचंड पाखंड का परित्याग करने, गांधी-प्रार्थना सहित गांधी एकादश व्रत गांधीवादी अपनी नित्य नैमित्तिक जीवनचर्या का अनिवार्य अंग बनाने आगे आयें। आजादी के संघर्ष युग में जो समता दिखती थी वह फिर समाज में जाग्रत हो, गांधीवादियों का यह नैतिक कर्त्तव्य है कि वे भारत के सामाजिक जीवन को पुनः संवेदनशील बनाने के लिये पुरजोर तरीके से आगे आयें। श्रीमद्भगवद्गीता में अठारहों अध्यायों के श्लोक सात सौ हैं, उवाच (वचन) धृतराष्ट्र एक, संजय नौ, अर्जुन 21 तथा श्री भगवान 28 हैं। सांख्ययोग के ५४ वें श्लोक से ७२ वें श्लोक के अठारह समुच्चय जिनमें दो उवाच हैं स्थितप्रज्ञता का परम आदर्श है। महात्मा गांधी को यही स्थितप्रज्ञता भाती थी। वे अपनी नित्य प्रार्थना में सांख्ययोग के इन अठारह श्लोकों के जरिये ही स्तुति प्रार्थना की महत्ता के बल पर गांधी विरासत को हिन्दुस्तानियों को उपलब्ध करा सके।
18. गांधी एकादश व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, अपरिग्रह, अस्वाद, शरीर श्रम, सर्वधर्म समभाव, स्पर्श भावना तथा स्वदेशी व ब्रह्मचर्य का अपने अपने क्षेत्र में कायिक, वाचिक व मानसिक महत्त्व है। गांधी युग में अनेक ऐसे गांधी साधक हुए जो उपरोक्त सभी एकादश व्रतों के लिये समर्पित थे। महात्मा गांधी ने अपने व्यक्तित्त्व स्तर पर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, अस्वाद, शरीर श्रम, स्पर्श भावना तथा स्वदेशी के महत्त्व को उजागर किया। ब्रह्मचर्य उनका वैयक्तिक आचरण था। उनके अनुयायियों से यह आशा तो नहीं की जा सकती कि वे दूसरे गांधी बनें पर इन व्रतों में जितने भी अपनाये जा सकें उसकी ओर प्रवृत्त हों। देखने वाले को लगे कि गांधी विरासत की खादी पहनने वाला, गांधी विरासत का काम करने वाला गांधी आदर्शों के प्रति कितना संवेदनशील है। आज जरूरत इस बात की भी है कि गांधी हैरिटेज से जुड़े लोग पारस्परिक विचार विमर्श करते रहें। भारतीय समाज को गांधी आदर्श की ओर प्रेरित करें। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार की जो गहरी पैठ होगयी है उसके प्रभाव को कम करने के लिये एक ही उपाय है। हिन्द स्वराज में गांधी जी ने 103 वर्ष पहले जो कहा जो लिखा उसकी पहली पाठशाला गांधी हैरिटेज खादी संस्थानों के विमर्श केन्द्र हों। कितना भी सख्त कानून हो वह भ्रष्टाचार व कदाचार को निर्मूल नहीं कर सकता। कदाचार व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिये सदाचार विमर्श करना होगा। भ्रष्टाचारी व्यक्ति से हमें सहानुभूति रखनी होगी। भ्रष्टाचार नेस्तनाबूद हो ऐसे तौर तरीके ईजाद करने होंगे। गांधी हैरिटेज वाले लोग आज भी इस स्थिति में हैं कि वे अपने बीच के भ्रष्टाचार को रोक सकें तथा पार्श्ववर्त्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ लोक भावना जाग्रत कर सकें।
19. गीता के सवाल कि ‘‘कर्मम किम् अकर्मेति कवयोप्यत्रमोहिता’’ का पुनराभ्यास करना होगा।सामाजिक तौर पर वे तभी निश्चय कर सकेंगे जब उनमें सहज संवाद कायम होगा। भक्त प्रह्लाद व महात्मा गांधी सरीखे निर्वैर भाव से अपने विचार का मंडन करते समय सामने वाले के विचार का खंडन करने से पहले मनन करना होगा। विमर्श करना होगा कि अगले व्यक्ति की वाणी की विशेषता क्या है ? संत विनोबा का वह सिद्धांत अपनाना होगा कि पहले समान विचार वाले बिन्दुओं का निर्धारण कर सामूहिक मेधा से सामूहिक चिंतन करो तब निर्णय लो। मतभेद वाले बिन्दुओं को पृष्ठभूमि में रखो। अगर आपका साथी सहयोगी आपकी कटुतम आलोचना कर रहा हो तो धैर्य से काम लो। मतभेद के खात्मे के लिये मध्यम मार्ग का अनुसरण करने पर ही सामाजिक दोषों का निवारण किया जा सकता है। भारतीय वाङ्मय में 'एवं' शब्द संस्कृत सहित अधिकांश भाषाओं में उपयोग में आता है जिसे धूर्त संज्ञा दी जाती है। महात्मा गांधी ने अपने अभिव्यक्त विचारों में यह स्वीकार किया कि अपने आदर्श की प्राप्ति के लिये वे धूर्तता के स्तर तक भी जाने के लिये तैयार हैं पर महात्मा द्वारा अपनायी जाने वाली धूर्तता परपीड़ाकारक नहीं थी। इसलिये विरासत वाली गांधी परंपरा को निरंतरता देने के लिये हैरिटेज वादी गांधी विचारकों को सतत पारस्परिक संवाद की शुरूआत करनी ही होगी। वे न तो राजा हैं न दस्यु। राजा व दस्यु दोनों के पास राजसत्ता व दस्युसत्ता के बाहुबल हैं पर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, अपरिग्रह, अस्वाद, शरीर श्रम, सर्वधर्म समभाव तथा अस्पृश्यता निस्तारण के संकल्पकर्त्ताओं को वैयक्तिक श्रद्धा तथा सामूहिक साधना से ही अपने मार्ग को तय करना होगा तथा सामने वाले के अस्तित्त्व को स्वीकार करके ही लक्ष्यभेद के तरीके तय करने होंगे।
20. बाल विजय ने जो सवाल किया है Survive or Perish उसके बारे में वाल मार्ट में कौन खादी बिके ? मल्टी नेशनल खादी को हैरिटेज खादी अंतर्राष्ट्रीय मानवीय स्तर में बढ़ने से रोके या उसकी बढ़त को विकासशील राष्ट्र राज्यों की जरूरत से जोड़ कर देखा जाये। गांधी के भारतीय दरिद्रनारायण को विश्व पटल से दारिद्र्य दुःख निवारण के प्रमुख कारक के रूप में स्थापित कर हैरिटेज खादी वाले मल्टी ब्रांड खादी से सहअस्तित्त्व का नया तोरण बना सकते हैं। स्वयं स्वावलंबी बने रह कर स्वावलंबन का आदर्श दुनियां भर के गरीब राष्ट्रों के सामने रखना गांधी की हैरिटेज खादी का आदर्श हो। भारतीय संसद सहित समूचे शासन तंत्र में गांधी विरासत पुनर्जीवित की जाये। लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के समानांतर गांधी अनुयायी समूह स्वयं सेवी लोकाधारित राष्ट्रीय चौकसी तंत्र का संवर्धन करे। लोकतंत्र, एकतंत्र या सैन्यजुण्टा तंत्र में तब्दील न हो इसके लिये पार्लियामेंटरी राजव्यवस्था में अथवा वेस्ट मिनिस्टर शासन तंत्र के समानांतर एक-एक सतर्कता संगठन की जरूरत है जिसमें समाज के वे लोग जो शासन तंत्र की चौकसी स्वयं सेविता के आधार पर कर सकें जिसे कुछ लोग सिविल सोसाइटी भी कहते हैं। ऐसा स्वयं सेवी तटस्थ विचारकों का समूह लोकतंत्रात्मक, राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक स्तम्भों पर तटस्थ नजर रख कर व्यापक सामाजिक हित को दृष्टि में रखते हुए राजव्यवस्था के समानांतर जो नीति सम्मत मंत्रणा दाता समान हो वह भारत सरीखे देश में गांधी मार्गी समाज संपन्न कर सकता है। भारत इस समय विश्व का सबसे बड़े आकार वाला लोकतंत्र है। आजादी के बाद विभिन्न झंझावतों के बावजूद भारत ने अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता को बरकरार रखा है। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में एक शताब्दी पहले जो चेतावनियां दीं उसका चिंतन मनन करने तथा सत्याग्रह व अहिंसा के मार्ग से समय समय पर उपस्थित होने वाली समस्याओं का समाधान गांधी विचार में निहित है। जरूरत है उस पर सोद्देश्य बहस शुरू कर आसन्न समस्याओं का समाधान खोजना। लोकतंत्र में संवाद ही एक ऐसा साधन है जो आसन्न कठिनाइयों से समाज को संरक्षण दे सकता है इसलिये गांधी मार्ग के बटोही जो स्वयं को गांधी दायभाग की विरासत पर खड़ा बता रहे हैं उनमें से हर एक के हाथ में गांधी हिन्द स्वराज (1906-1909) के गुजराती संस्करण के साथ साथ नागरी लिपि में इंगित गुर्जर वाणी हिन्द स्वराज व भारतीय लोकभाषाओं में हिन्द स्वराज के अनुवाद को हर गांधी वादी के हाथ में थमाया जाये। भारत आगमन के पश्चात महात्मा गांधी वाङ्मय का महत्त्वपूर्ण परिदृश्य अनासक्ति योग है। यह भी गुजराती वाङ्मय में है। गांधी विचार को हृदयंगम करने के लिये गांधी रचनायें हिन्द स्वराज व अनासक्ति योग का पुनराभ्यास आज युग की जरूरत मालूम पड़ती है। बालविजय को अपने अनुयायियों को यह समझाना ही होगा कि गांधी संवाद के बिना हैरिटेज गांधीवादी दृष्टिकोण को भारतीय समाज की आज दिशाहीनता की स्थिति से उबारना ही होगा।
महात्मा गांधी का मानना था कि सद्विचार व सत्य मार्ग के जरिये अहिंसा का रास्ता अपना कर व्यक्ति परिवार व समाज व्यवस्था का तंत्र मनुष्य सरीखे जीव के लिये अपने अस्तित्त्व को बरकरार रख कर दूसरे व्यक्ति या दूसरे जीव के साथ सह अस्तित्त्व का वातावरण बनाया जा सकता है। हिन्दुस्तानी आजादी के संघर्ष में महात्मा गांधी का अहिंसा कायरपन का प्रतीक नहीं निर्भय होकर छाती फुला कर चलने का, परपीड़ा से क्षुब्ध होने का रास्ता था। महात्मा का अतिप्रिय भजन - वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे। पराई पीड़ा की अनुभूति ही वैष्णवता का परम आदर्श है। महात्मा गांधी भारतीय वैष्णवों में अग्रणी थे पर मानव मात्र में बंधुता के उद्गाता रहने के बावजूद मनुष्य मात्र में समानता समभाव का आदर्श प्रस्तुत करने वाले व्यक्तित्त्व थे। महात्मा गांधी की अहिंसक मानवता को विश्व समुदाय के प्रतीक संयुक्त राष्ट्र संघ ने गांधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस Global Non-Violence Day के तौर पर मनाने का फैसला किया तथा गांधी अहिंसा शास्त्र को राजकाज के स्थायित्त्व के लिये आवश्यकता अर्हता माना है। भारत सरकार, भारत के सवा अरब लोग तथा भारतभर में फैले यत्र तत्र गांधी विचार से संबंधित संस्थानों को अब आगे आकर संयुक्त राष्ट्र संघ में अहिंसामूलक गांधी विचार दीर्घा की स्थापना करने के लिये आगे आना चाहिये। विश्व के संपन्न तथा सत्ता शिखरस्थ राष्ट्र अपने अपने राष्ट्र का हित चिंतन में लगे हैं। जहां जहां हिंसा व्यापक रूप से मानवता को त्रस्त करने के साथ साथ मानवीय उदात्त दृष्टि के लिये माथे पर कलंक का टीका लगा रही है दुर्बल के प्रति संख्या की दृष्टि से कमजोर समूह तथा गृह कलह व राष्ट्र अशांति से घिरे मानव समूह हिंसा प्रतिहिंसा में लिप्त हैं विश्व भर की समर्थ राजसत्तायें अपना प्रभुत्त्व स्थापित करने, कमजोर को अपने अधीन करने एवं संख्या बल पर अपनी सांस्कृतिक प्राधान्यता अपेक्षाकृत सांस्कृतिक दृष्टि से दुर्बल समूहों को अपने हिंसाजन्य सत्ता संवर्धन में सक्रिय हैं ऐसे सभी सत्ता स्त्रोतों को गांधी सद्विचार ही नियंत्रित करने की नैतिक क्षमता रखता है। इसलिये भारत सरकार को भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात आगामी 26 जनवरी 2014 को जब भारतीय जनतंत्र अपने संविधान की परिस्थिति की चतुषष्ठी पूर्ति चौंसठ वर्ष पूरे करने की शुभ बेला में यह घोषणा करे कि विश्व समाज द्वारा गांधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाये जाने के उपलक्ष्य में भारत के लोग अपनी सरकार में गांधियन मंत्रालय की घोषणा करें। यह मंत्रालय गांधी विचारधारा आधारित सामाजिक समता के स्वयं सेवी स्त्रोतों को प्रोत्साहित करने के लिये सरकार व जनता में संसदीय लोकतंत्र के मूर्धण्य सदस्यों और भारत के जनसामान्य में एक ऐसे सेतु का काम करे जो सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, अपरिग्रह व समभाव के छःमुखी गांधी पथों को अपनाये ताकि राजा व प्रजा में बाघ बकरी एक साथ सह अस्तित्त्व से रह सकें। क्यों नहीं भारत सरकार सामाजिक कल्याण गरीबी निवारण नागरिक को उसका संवैधानिक अधिकार संपन्न करने के लिये कानून के दंड के बल पर नहीं सभी सामाजिक सेवाओं को मानवीय आधार पर स्वयं सेवा का उत्कृष्ट प्रकल्प बनाने के लिये 1. मनरेगा 2. प्रस्तावित भोजन अधिकारिता 3. सूचना स्वाधिकार 4. जिसे अंग्रेजीदां भारतीय तथा विश्व समाज कारपोरेट गवर्नेंस कह कर पुकारता है कारपोरेट गवर्नेंस को हम हिन्दुस्तानी परिवेश में नैगम (निगमीय) स्वायतत्ता वाला लोक प्रबंधन जिसमें पंक्ति में खडे़ अंतिम व्यक्ति का भी अस्तित्त्व संरक्षा के समानांतर हित संवर्धन भी हो। गांधी मार्ग का सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक स्त्रोत सर्व धर्म समानता है। संत विनोबा भावे ने सर्व धर्म समानता सिद्धांत की बहुत सुन्दर व्याख्या उद्धव गीता, एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंगों के उस सूत्र को पकड़ कर ली है जिसमें कवि, हरि, प्रबुद्धादि नौ विद्वानों ने राजा जनक को विदेह दर्शन दिया। प्रबुद्ध ने कहा - ‘‘श्रद्धा भागवते शास्त्रेऽनिन्दा मन्यत्र चापि हि’’ भागवत शास्त्र में श्रद्धा पर अन्य किसी भी धर्म शास्त्र के लिये अनिंदा भाव याने पूर्ण सम्मान दूसरे धर्म शास्त्र पंथ को देना, भारतीय सेक्युलर सोशलिस्ट रिपब्लिक को समृद्ध बनाने के लिये सेकुलरिज्म के समानांतर महात्मा गांधी के सर्व धर्म समानता का आदर्श ही सामाजिक समरसता का उद्दीपन कर सकता है। इसलिये दलीय राजनीतिक सांगठनिकता में भारत के हर एक राजनीतिक दल को गांधी विचार दर्शन का शरणागत होना ही पडे़गा तभी उनका अस्तित्त्व बना रह सकता है। राजनीतिक अस्तित्त्व की संरक्षा के लिये सभी राजनीतिक दलों को आपस में मिल बैठ कर राजनीतिक संहिता सुनिश्चित करनी ही होगी। बहु भाषी विभिन्न आस्थाओं के अनुयायियों विभिन्न व्यवसायों से जुडे व्यक्ति समूह तथा कारपोरेट सेक्टर उद्योग व्यापार सहित वाणिज्य के शीर्ष स्टाक एक्सचेंज, शेयर बाजार तथा देश के कानून अनुमोदित सट्टा बाजार सहित कानून की दृष्टि में अभद्र सट्टा बाजार भी समाज के सभी वर्गों के सामाजिक बाध्यताओं के अनौपचारिक परन्तु समाज के सभी तबकों की जरूरतों को समझने वाले नैतिक विचार पोखरों की जरूरत है। कहीं कहीं सिविल सोसाइटी के रूप में ऐसे संगठन भी दिखते हैं पर जरूरत इस बात की है कानूनी शासन तंत्र के विधिक प्रावधानों में व्यवस्था प्रबंधन के समानांतर भारतीय परिवेश में विभिन्न वर्गों के विचारक लोगों को लोकतंत्र को मजबूती देने के लिये अनौपचारिक तौर पर नैतिकता के सूत्र में बांधने की जरूरत है। यह एक प्रकार का राखी का सूत सरीखा कमजोर तागा है जो एक झटके में टूट तो सकता है पर इस तागे को समाज को जोड़ने वाला विचार-सूत्र माना जा सकता है। महात्मा गांधी की जीवन शैली को अगर भारतवासी एक आदर्श के रूप में अपनायें तो हमारी आज की समस्याओं का समाधान संभव है।
नकुलेश्वर तीर्थ, भारत में नर्मदा नदी जहां अपने पति सागर से समागम करती है उस जगह को आजकल लोग भड़ौच नाम से पुकारते हैं। भारत के संस्कृत वाङ्मय में इस जगह को भृगुकच्छ कहा जाता है। यहीं पर दैत्यराज प्रह्लाद के पौत्र महाबली विरोचन के पुत्र, इन्द्र के शत्रु बलि ने यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ की पुरोहिताई उशना शुक्राचार्य कर रहे थे। वे वैत्पेश्वर के पूज्य गुरू भी थे। बलि की समूची शिक्षा-दीक्षा तथा आचार अनुष्ठान का अभ्यास शुक्राचार्य ने ही किया था। शुक्राचार्य मृत संजीवनी विद्या के अधिष्ठाता होने के साथ-साथ गुरू समाज में अकेले ऐसे व्यक्तित्त्व थे जिनमें और्वोपदिष्ट मार्ग तथा और्वोपदिष्ट योग साधना का निरंतर अभ्यास था। राजा बलि जन्म जन्मान्तर से सत्यनिष्ठ व्यक्ति होने के साथ-साथ अपने पितामह प्रह्लाद के सान्निध्य में रहने के कारण पूर्व जन्म की स्मृति भी रखते थे। यद्यपि उन्हें दीक्षा तथा विविध उपाख्यान दैत्यगुरू शुक्राचार्य सुनाते थे बलि ने गुरू शुक्राचार्य से पूछा - गुरूदेव क्या आपने मलयाचल में कोशकार पुत्र के संबंध में जो घटना घटी उसके बारे में सुना है ? भार्गव शुक्राचार्य ने अपने शिष्य से कहा - यह कोशकार उपाख्यान मुझे याद नहीं आरहा है। मुझे इस आख्यान को जानने का कौतुहल है। दैत्येश्वर ! आपको जो ज्ञात है कृपया बताइये। विरोचननंदन राजा बलि ने अपने पूर्व जन्मों की याददाश्त को कुरेदते हुए कोशकार आख्यान सुनाना शुरू किया। उसे दैत्येश्वर ने उशना भार्गव कवि से कहा - महर्षि मुद्गल के कोशकार नाम से विख्यात पुत्र थे। कोशकार की भार्या महर्षि वात्स्यायन की कन्या सती साध्वी धर्मिष्ठा थी। धर्मिष्ठा ने जड़ प्रकृति के पुत्र को जन्म दिया जो दृष्टिहीन व गूंगा भी था। पुत्र जन्म के छठे दिन छठ करने के बजाय धर्मिष्ठा ने उस बालक को घर से बाहर रख दिया। जब धर्मिष्ठा अपने बच्चे को बाहर रख रही थी शूर्याक्षी नाम की जातहारिणी निशाचरी अपने कमजोर बालक को लेकर वहां से गुजर रही थी। उसने देखा नवजात शिशु बाहर पड़ा है व निश्चेष्ट है। उसने अपने बच्चे को कोशकार के दरवाजे पर रख उस गूंगे बहरे अंधे बालक को अपनी गोदी में रख जातहारिणी शूर्याक्षी अपने घर को चल दी। उसे बच्चे को गोद में लाती देख कर उसका पति घटोदर बोला - प्रिये शूर्याक्षी यह तुम क्या ले आयी हो। शूर्याक्षी जातहारिणी ने अपने भर्ता घटोदर को कहा - अपने बेटे को कोशकार के दरवाजे रख उसका पुत्र ले आयी हूँ। अपनी भार्या की बात सुन कर घटोदर ने कहा - यह काम ठीक नहीं हुआ है। महाज्ञानी ब्राह्मण कोशकार हम पर कुपित होकर हमें अभिशप्त कर देंगे। रौद्रचारिणी निशाचरी शूर्याक्षी अपने पति की बात सुन कर आकाश मार्ग गामिनी होकर मुद्गल नंदन कोशकार के बालक को उसके दरवाजे पर छोड़ दो तथा अपने भोजन के लिये किसी अन्य नवजात बालक को उठा लाओ। शूर्याक्षी ने जल्दबाजी में कोशकार नंदन को छोड़ दिया पर अपने बेटे को वह नहीं पकड़ पायी। बाल रोदन ध्वनि सुन कर धर्मिष्ठा दरवाजे पर आयी। उसने देखा कि वहां दो नवजात शिशु पड़े हैं। शूर्याक्षी के नवजात शिशु को कोशकार ने अपनी भार्या धर्मिष्ठा से कहा - धर्मिष्ठा इस शिशु के शरीर में भूत आवेश हुआ लगता है। कोशकार ने राक्षसी शूर्याक्षी जो जातहारिणी(नवजात शिशुओं को उठा ले जाने का ही काम करती थी) थी शिशु अपने अंगूठे को मुंह में डाल कर रोदन भी कर रहा था। धर्मिष्ठा ने दोनों बालकों को पालना-पोषना शुरू किया। कोशकार ने धर्मिष्ठा पुत्र को निशाकर नाम दिया। शूर्याक्षी जातहारिणी पुत्र का नाम दिवाकर रखा। दोनों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया। शूर्याक्षी राक्षसी नंदन दिवाकर वेदपाठ करने लग गया। निशाकर जड़ बुद्धि था इसलिये वेदपाठ सामर्थ्य अर्जित नहीं कर पाया। निशाकर दिवाकर नाप्तयौवन(जुवेनाइल) कुख्याति और विख्याति की गाथा चारों दिशाओं की ओर वायुवेग से बढ़ गयी। निशाकर की कुख्याति से संतप्त पिता कोशकार ने गुस्से में आकर निशाकर को एक सूखे कुऐं में धकेल दिया और कुऐं के मुंह पर एक पत्थर रख दिया। निशाकर अंधे कुऐं में लंबे अरसे तक पड़ा रहा। वहां पर कुऐं के जगत के पास आंवले का एक पेड़ था। उस पेड़ पर आंवला फल पकने लगे। दसों वर्ष बीत गये। धर्मिष्ठा निशाकर जननी कुऐं के निकट गयी। निशाकर ने जननी धर्मिष्ठा की आवाज सुनी तो वह बोला - अंब ! पिता कोशकार कुऐं के जगत में यह शिला रख गये हैं। कुऐं में पड़े रहने के कारण निशाकर में नवचेतना का उदय हुआ। वह अपनी जननी धर्मिष्ठा से बोला - अंब मैं आपका पुत्र निशाकर हूँ। धर्मिष्ठा ने कुऐं के अंदर से बोलने वाले निशाकर से कहा - मेरे पुत्र का नाम तो दिवाकर है और वह वेदपाठी विद्वान है। निशाकर नाम की मेरी कोई संतान ही नहीं है। यह सुन कर कुऐं के अंदर से निशाकर ने पूर्व का सारा वृत्तांत अपनी जननी धर्मिष्ठा को सुना डाला। निशाकर की अपने मुख से कही अपनी रामकहानी सुन कर जननी धर्मिष्ठा ने कुऐं के जगत से शिला को एक तरफ खिसका दिया। कुऐं से बाहर निकल कर निशाकर ने अपनी समूची आपबीती जननी धर्मिष्ठा को सिलसिलेवार सुना डाली। वह नाप्तयौवन निशाकर को लेकर अपने पति कोशकार के पास आयी। कोशकार के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा उसने कौतूहल से निशाकर से पूछा - तात, तुम तो गूंगे-बहरे व अंधे थे। यह बदलाव तुम्हारे चरित्र में कैसे आया। निशाकर के असली मां बाप तो धर्मिष्ठा व कोशकार ही थे जो महर्षि मुद्गल की संतति थे। निशाकर ने अपने माता पिता को कहा - पूर्वजन्म में मैं वृन्दारक के वंश में वृषा कपि माला दम्पत्ति के पुत्र रूप में जन्मा था। पिता वृषा कपि ने मुझे चतुर्दिक् ज्ञान उपलब्ध किया। निशाकर ने कहा - तब मैं महाज्ञानी सर्वशास्त्र विशारद होगया। मदान्ध एवं अनेकानेक दुष्कर्मों में लिप्त रहने के कारण मद से लोभ हुआ। लोभ ही तो पाप का बाप है। जो ज्ञानार्जन किया था वह सब निष्फल होगया। पराई स्त्री से संसर्ग तथा पराये धन पर कब्जा करना कर्मण्येवाधिकारस्ते के इस कर्मयोग जगत में सबसे ज्यादा दुष्कृत्य हैं। निशाकर ने जन्मजन्मातरों की आपबीती अपने पिता कोशकार व माता धर्मिष्ठा को बतायी थी। इस आख्यान को राजा बलि ने भृगुकच्छ के महान यज्ञ में कश्यप अदिति के नंदन वटुक वामन के आगमन से पूर्व अपने कुल गुरू दैत्याचार्य भार्गव शुक्राचार्य को वर्णन की। जातहारिणी प्रकरण एक अति विचित्र आख्यान है। मौजूदा युगधर्म के संदर्भ में जातहारिणी जच्चा-बच्चा केन्द्रों से नवजात शिशुओं को उठा कर ले जाने वाली शिशु चोर और शिशु खोर शिशु अपहरण में दक्षता प्राप्ता परिचारिकाओं छद्म परिचारिकाओं के आचरण में देखा परखा जा सकता है। नवजात शिशु अपहरण सृष्टि के प्रारंभिक वर्षों में भी था जब दैत्यराज प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि ने भड़ोच में अपने कुलगुरू शुक्राचार्य को जातहारिणी शूर्याक्षी व उसके पति घटोदर की कहाने के साथ-साथ मुद्गल वंशीय कोशकार-धर्मिष्ठा दंपत्ति के जड़ पुत्र का आख्यान अपने गुरू को सुनाया। ऐसे आख्यानों को जन्मजन्मातर सृष्टि मूलक कहा जाता है। गज व ग्राह जब जल भीतर लड़ रहे थे और लड़ते-लड़ते गज हार रहा था तब उसे मगर ने पकड़ लिया था। उस समय उसने जो स्तुति पूर्वाभ्यास से की वही गजेन्द्र स्तुति कही जाती है। वामन तो बलि के अश्वमेध यज्ञ में अधिष्ठाता बनने आ ही रहे थे तथा बलि उनके स्वागत की तैयारी में लगे हुए थे। दैत्याचार्य ने उस दैत्येश्वर को कहा - नर्म विवाहेषु वृत्यर्थे प्राण संकटे गो ब्राह्मणार्थे हिंसायाम् नानृतम् स्यात् जुगुप्सिताम्। दैत्येश्वर बलि को वचन भंग का दोष स्वीकार्य नहीं था। गुरू अवमानना को उस सत्यवादी ने सहना स्वीकारा पर सत्यवचन त्याग नहीं किया। दानवीर सत्य संध राजा बलि का अनुसरण गांधी युग में भारत में गांधी दायभाग के पहले अधिष्ठाता संत विनोबा भावे ने भारत की भूमि समस्या के अहिंसक समाधान का रास्ता भूदान के जरिये संकल्पित किया। राजनीति की दुनिया के लोग एक कहावत दुहराते रहते हैं - अति दान बलि राजा, अति अहंकार रावणः अति रूपवती सीता अति सर्वत्र वर्ज्यते। इस लोकोक्ति के बावजूद बलि द्वारा वामन को तीन कदम भूमि दान का असर कम नहीं हुआ। दैत्येश्वर बलि ने अपने लिये आठवें मन्वन्तर के लिये इन्द्रसेनत्व प्राप्त कर लिया। आज के वर्तमान हिन्दुस्तान के लिए भड़ौच में स्वायंभुव मन्वन्तर में संपन्न बलि के अश्वमेध यज्ञ के गूंज नरेन्द्र मोदी के नवीन नेतृत्त्व में भारत को विश्व का गुरूत्त्व पुनः उपलब्ध कराने की अद्वितीय क्षमता रखता है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
सौतिया डाह हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक खासियत है। प्रजापति कश्यप की तीन प्रमुख भार्याओं में अदिति, दिति और दनु इन तीनों की सन्तानें आदित्य, दैत्य व दानव कहलाती थीं। ये तीनों सहोदर भगिनियां भी थीं साथ ही एक ही भर्ता कश्यप को ब्याहे जाने के कारण ये सौतें भी थीं। ऐसा लगता है तब हिन्दुस्तान मातृ प्रधान परिवारी समाज था। भारत के केरल राज्य में आज भी मातृ सत्ता वाले परिवार हैं। कश्यप बारी-बारी से अपनी प्रमुख भार्याओं के भर्ता धर्म का निर्वाह किया करते थे। अदिति के बेटे आदित्य अथवा देव कहलाते। दिति के पुत्रों को दैत्य कहा जाता। दनु की संतान दानव कहलाती थी। देव समूह से दैत्य-दानव समूह ज्यादा बलशाली तथा परिश्रमी था। दैत्येश्वर हिरण्यकश्यप ने गंगा-यमुना के बीच हरिद्रोही(वर्तमान में हरदोई नाम से पुकारा जाने वाला स्थान) को अपनी राजधानी बनाया। दनु के दो प्रमुख पुत्र शुंभ व निशुंभ हिमालय में वर्तमान उत्तराखंड राज्य में बागेश्वर जनपद के शुंभगढ़(आजकल इस गांव को लोग सुमगढ़ कहते हैं) में अपनी दानवधानी निर्मित कर रहे थे। हरिद्रोही दैत्येश्वर हिरण्यकश्यप के अनुज हिरण्याक्ष का वराह अवतारी विष्णु ने वध कर दिये जाने से हिरण्यकश्यप ने महाविष्णु को अपना सबसे बड़ा शत्रु समझ लिया था। हिरण्यकश्यप की राजमहिषी कयाधु नामक दानवी थी। जब हिरण्यकश्यप तपश्चर्या में लगा तो देवेन्द्र शक्र को महसूस हुआ कि कयाधु के गर्भ में असुरराज है। इन्द्र चाहता था कि कयाधु का अपहरण कर दैत्यराज हिरण्यकश्यप के रास्ते में कांटे बोये जायें। नारद ने इन्द्र की यह कूटनीतिक चाल भांप ली। नारद ने कयाधु को अपने आश्रम में सुरक्षित रहने का आश्वासन दिया। नारद समय-समय पर गर्भिणी कयाधु को आध्यात्मिक आख्यान सुनाते रहते। कयाधु दानवी नारदाश्रम में सुरक्षित रहने के अलावा अत्यंत प्रसन्नचित्ता थी। नारद ने जो कथानक कयाधु को सुनाये वे कालान्तर में उसे स्त्री स्वभाव एवं मनोविज्ञान के कारण विस्मृत हो गये पर गर्भस्थ शिशु प्रह्लाद को नवधा भक्ति मार्ग स्त्रोत माता के गर्भ में ही मिल गया था। प्रह्लाद ने गर्भस्थ शिशु के रूप में जो ज्ञान शलाका उपलब्ध की थी उसका वर्णन कुमार प्रह्लाद ने दैत्य कुमारों को सुनाया। श्रौत विद्या अत्यंत प्रभावोत्पादक शिक्षण कला है। जब महाविष्णु ने हरिद्रोही हिरण्यकश्यप का वध किया नृसिंह रूप में, प्रह्लाद को दितीश्वर के सिंहासन में स्थापित किया। प्रह्लाद ने नर-नारायण से तुमुल युद्ध भी किया। सृष्टि में समस्याओं के समाधान के चार ही मार्ग हैं। पहला त्याग मार्ग है। त्याग मार्ग का अनुसरण व्यक्ति तभी कर सकता है जब उसमें वैराग्य उत्पन्न हो किंतु वैराग्य के साथ-साथ ज्ञान भी हो। वैराग्य और ज्ञान एक जन्म में अर्जित हो जाने वाले तत्त्व कदापि नहीं हैं। व्यक्ति तभी ज्ञानी व वैरागी होगा जब जन्म जन्मान्तरों का इस ओर अभ्यास हो। दो व्यक्तियों या दो राजसत्ताओं में आपस में वार्ता वृत्ति हो। उत्पन्न समस्याओं का समाधान संवाद से भी होता है। समस्याओं के निराकरण की एक प्रक्रिया द्यूत क्रीड़ा भी है। पारस्परिक संघर्ष से निवृत्त होने का अंतिम रास्ता युद्ध ही है। प्रह्लाद भगवद्भक्त था, उसके प्राण नृसिंह ने बचाये थे वरना उसका पिता उसे यमलोक पहुंचाने के लिये उतारू था। हिरण्यकश्यप दितीश्वर की सोच यह थी कि वह प्रह्लाद उस ईश्वर तत्त्व से भक्तिप्रवण था जिसने प्रह्लाद के चाचा हिरण्याक्ष का वध कर डाला था। प्रह्लाद ने भी युद्ध का सहारा लिया। नर-नारायण से उसका तुमुल युद्ध लगातार होता रहा। तब जो लोग युद्ध करते थे वे युद्ध प्रक्रिया सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही संपन्न करते थे। सूर्यास्त के पश्चात दोनों पक्ष युद्ध में एक दूसरे के कृत्यों पर विवेचन, समालोचन तथा युद्ध में कौन-कौन सी विद्यायें उन्होंने प्रयोग कीं इस पर भी विमर्श करते थे। प्रकारांतर से जिस तरह खिलाड़ी लोग अपने-अपने खेल की प्रशंसा दूसरे के द्वारा उपयुक्त तौर-तरीकों की प्रशंसा अथवा आलोचना करते हैं उसी प्रकार धर्म युद्ध में युद्ध से अवकाश लेने पर विविध चर्चायें होती रहती थीं। भार्गव च्यवन नर्मदा में स्नान करने के लिये नकुलेश्वर महादेव के तीर्थ में उतरे ही थे कि सर्प ने बलपूर्वक पकड़ कर पाताल को पहुंचा दिया जहां च्यवन की मुलाकात दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद से हुई। भार्गव च्यवन ऋषि ने प्रह्लाद को बताया कि नैमिषारण्य, चक्रतीर्थ व पुष्कर तीर्थ ऐसे हैं जहां जाकर स्नान करना ही चाहिये। भार्गव श्रेष्ठ च्यवन ऋषि की बात सुन कर दैत्येश्वर प्रह्लाद ने दल-बल दैत्य-दानव वीरों को लेकर नैमिषारण्य का रास्ता पकड़ा। नैमिषारण्य में पहुंच उन सभी दैत्य दानवों ने नैमिषारण्य तीर्थ पहुंच वहां स्नान कर पीतवस्त्र पुण्डरीकाक्ष विष्णु का दर्शन लाभ लिया व सरस्वती के पुण्य उदक का भी दर्शन किया। नरनारायण में से नर ने प्रह्लाद को ललकारा और कहा - कोई मनुष्य, दैत्य, दानव, गधर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर हमें पराजित नहीं कर सकता। दैत्येश्वर प्रह्लाद को यह बात अखर गयी। उसे दैत्य व दानवों के बाहुबल पर भरोसा था यद्यपि वह भगवान विष्णु के नृसिंहावतार की नवधा भक्ति का दैत्य समाज का पहला व्यक्तित्त्व था जो यजमान धर्म के प्रति समर्पित होने के साथ-साथ न्यायप्रिय व करूणापरक राजा भी था। वाल्मीकि अर्ष्टिषेण हनुमान से वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में कहलाते हैं -
‘‘क्रुद्धः पापन् न कूर्यात् कः क्रुद्धो हन्यात् गुरूनपि’’ अर्थात क्रोध व्यक्ति से कुछ भी न करने योग्य दुष्कर्म करा सकता है। दैत्येश्वर प्रह्लाद भी नारायण के संगी-साथी नर की बात सुन कर क्रुद्ध हो गये। प्रह्लाद ने तुमुल युद्ध की ठान ली। भक्त और भगवान के बीच हुए इस तुमुल युद्ध ने एक दूसरे पर प्रहार करना शुरू कर दिया। क्रोध की अग्निज्वाला दोनों तरफ से तीखे प्रहार कर रही थी। नारायण तो धर्म व अहिंसा दम्पत्ति के नंदन थे पर जब युद्ध का ज्वर सताने लगा तो दैत्यपति प्रह्लाद नारायण के प्रहार से मूर्च्छित हो धरती में गिर गये। किंचित् शक्ति पाने पर दैत्येन्द्र प्रह्लाद फिर नारायण के पास युद्ध हेतु पहुंचे। नारायण ने प्रह्लाद से कहा - युद्ध अब कल करेंगे। आज अब आराम करो। दैत्येश्वर प्रह्लाद नारायण से लगातार हारते रहे। दैत्येश्वर ने पीतवासा विष्णु के पास जाकर पूछा - इतनी लम्बी लड़ाई लड़ ली पर मैं नारायण को पराजित नहीं कर सका इसका कारण क्या है ? पीतवासा विष्णु ने अपने भक्त से कहा - प्रह्लाद तुम अहिंसा धर्म दम्पत्ति के नंदन नारायण को युद्ध में पराजित नहीं कर सकते। तुम्हें यदि विजय ही प्रिय हो तो फिर भक्ति मार्ग का अनुसरण करो। प्रह्लाद ने कहा - मेरी प्रतिज्ञा विफल होरही है। मुझे मिथ्या अहंकार होगया कि मैं नारायण को युद्ध में पराजित कर लूँगा। नैमिषारण्य तीर्थ में स्नान करते हुए पुनः महाविष्णु से प्रार्थना की। महाविष्णु ने कहा - नारायण को जीतने का एक ही उपाय है वह है नवधा भक्ति का रास्ता। कृष्ण भक्ति की एक अलौकिक शक्ति गुर्जर वाणी में नरसी मेहता ने वैष्णव भक्ति का नया मार्ग दशधा भक्ति वाला चुना है। वह शक्ति अर्जित की है कि जिसे वह अपनी हुण्डी भेज देते हैं वह कृष्ण द्वारा सकार ली जाती है। भक्ति ही एक ऐसा स्त्रोत है जो नर-नारायणमय बना सकता है।
दैत्य वंश की राज सत्ता प्रह्लाद तीर्थयात्रा में निकलने से पूर्व ही अपने चचेरे भाई अंधक, हिरण्याक्ष नंदन को सौंप चुके थे। नारद ऋषि ने पुलत्स्य जी से सवाल किया कि राजधर्म को समझने वाले महाबाहु प्रह्लाद ने नेत्रहीन अंधक को अपना राज्याधिकार किस हेतु हस्तातंरित किया जबकि उसका अपना पुत्र राजकुमार विरोचन सक्षम राज्याधिकारी था। प्रह्लाद तो राजधर्म के ज्ञाता थे। उन्होंने अपने चचेरे भाई हिरण्याक्ष नंदन अंधक का राज्याभिषेक किया ? पुलत्स्य जी ने नारद के सवाल का जवाब देते हुए कहा- अंधक ..... था। उसे दृष्टि लाभ अपने पिता हिरण्याक्ष के जीवन काल में ही मिल गया था। प्रह्लाद को लगा अंधक प्रतापी राजा हो सकता है अतः न्यायपथ यह कहता है कि हिरण्याक्ष ने अंधक को ही राजा बनाये जाने का उपक्रम ज्यादा तर्कसंगत है। अंधक ने शूलपाणि त्रिलोचन महादेव की आराधना करके महर्षि वेदव्यास के शब्दों में जो वरदान शूलपाणि शंकर से प्राप्त किया वह ‘‘अजेयत्वम् अवध्यत्वम् सुर सिद्धर्षि ..... अदाह्यत्वम् हुताशेन अक्लेदनम् जलेन वा’’ वर जो अंधक ने मांगा वह था अजेय होऊँ, अवध्य होऊँ, मुझे अग्निभय व जलभय न हो, सुर, सिद्ध, ऋषि, पन्नग कोई मेरा अहित न कर सकें। शुक्राचार्य को अपना गुरू बना कर अंधक दैत्य राज्य का संचालन करने लगा। देवासुर संग्राम में प्रह््लाद नंदन विरोचन ने वरूण के साथ जंभ, बलशाली कुबेर के साथ सत्संत्रार, वायु के तथा मय दैत्य अग्नि के साथ युद्ध करने लग गये। हयग्रीव महाबली दैत्य ने अग्नि, सूर्य, अष्ट वसु, शेषनाग दो दो साथ मिल कर संग्राम शुरू किया। उभय पक्षीय बाण वर्षा कर अपने शत्रु को ललकार कर कहने लगे - खड़े-खड़े डर क्यों रहे हो। अमोघ अस्त्र संचालन से चतुर्दिक मंदाकिनी के जल प्रवाह सरीखे बहती हुई रूधिर प्रवाह करने लगे जिसमें पिशाच व राक्षसों की रक्त पिपासा को सवंर्धित किया। भीरू पुरूषों को भयभीत करने वाला भीषण संग्राम देवासुर युद्ध में सहस्त्राक्ष शक्र अपने विशाल धनुष से बाण वर्षा करने लगे। दैत्येन्द्र अंधक भी वेगवान धनुष से बाण छोड़ कर इन्द्र पर आक्रमण करने लगा। इन्द्र अंधक महायुद्ध हुआ और बलशाली अंधक ने इन्द्र के वज्र का मुकाबला किया। अपनी मुट्ठी के बल से अंधक ने इन्द्र के वज्र का सामना किया और ऐरावत हाथी को अपना निशाना बना कर ऐरावत को भी पटक डाला। इन्द्र ऐरावत से कूदे और अमरावती चले गये। अंधक महावीर था उसने देव सेना पर प्रहार करना आरंभ किया। कालाग्नि के समान समस्त त्रिलोकी को दग्ध करने के निमित्त प्रज्वलित यम दण्ड को प्रह््लाद पर छोड़ा। असुर समाज में कोलाहल पूर्ण चीत्कार सुनायी दिया कि प्रह्लाद यम के हाथों मारे गये। दैत्य-दानव चीत्कार से दैत्येश्वर अंधक विचलित नहीं हुआ।
हिन्दुस्तानी सौतिया डाह के कश्यप दायादों देव-दानव-दैत्य पारस्परिक मनमुटाव के अलावा दाशरथि राम को कैकेयी द्वारा चौदह वर्ष का वनवास दिया जाना आज से सवा पांच हजार वर्ष पहले कुरू वंश के धृतराष्ट्र और पांडु में कौन राजा शांतनु नंदन विचित्रवीर्य की मृत्यु के अनंतर शांतनु के मत्स्यगंधा सत्यवती के पुत्र द्वय विचित्रवीर्य और चित्रांगद के दिवंगत होने के पश्चात राजधर्म का वह पक्ष तब भी बलवान था जब कुरू संसद ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र के राज्याधिकार ने देकर पांडु को हस्तिनापुर नरेश घोषित करते समय यह व्यवस्था दी थी कि धृतराष्ट्र व पांडु के पुत्रों में जो ज्येष्ठ होगा वह राज्याधिकारी होगा। इस ब्लागर के परम आदरणीय गुरू पंडित रघुनाथ उप्रेती सैंणसोर पिथौरागढ़ के कुजौली निवासी एक छंद गाया करते थे। भीष्माचार्य की महिमा का गुणगान करते हुए कहते थे - मैं राज्य की चाह नहीं करूँगा जो ईष्ट तुम्हें हो वह ही वरूँगा। संतान जो सत्यवती जनेगी राज्याधिकारी वह ही बनेगी। देवव्रत की इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही वह भीष्म कहलाये। वे महाराज शांतनु के ज्येष्ठ पुत्र थे। राज्याधिकार उन्हीं का था पर उन्होंने अपने पिता शांतनु के दाम्पत्त्य सुख के लिये राज्याधिकार का त्याग किया। उनके पिता शांतनु के अग्रज भरत के पौत्र प्रतीक के पुत्र देवादि ने किशोरावस्था से ही ब्रह्मचर्य व्रत लेकर कलापग्राम वास शुरू कर दिया था। यही कलाप ग्राम यमुना का खादर है। यहीं के एक यमुना के में गर्भ स्थित द्वीप में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जन्मे थे। वे पंगु मुनि पराशर के पुत्र तथा मत्स्यगंधा सत्यवती के कालीन पुत्र थे जिसका पालन-पोषण साढ़े सात वर्ष तक सत्यवती ने अपने पितृ गृह दासराज मामी के घर किया था। जब बालक साढ़े सात वर्ष का होगया पंगु मुनि उसे अपने आश्रम ले गये। हिन्दुस्तान में अदिति, दिति व दनु के मध्य जो सौतिया डाह था उसका पहला सिरा अदिति व उसके बेटे बारह आदित्य थे। दूसरा ध्रुव दिति व दनु का था जिसके पुत्र समूह में हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष, शुंभ-निशुंभ व तारकासुर आदि थे। सौतिया डाह का पहला उदाहरण त्रिविष्टप स्वामी त्रिपुरेन्द्र महावान इन्द्र, उपेन्द्र आदि देवता तथा दितीश्वर हिरण्यकश्यप व उसके अग्रज हिरण्याक्ष का विष्णु सहित सभी देवताओं से शत्रुता की तीखी मार थी।
मानव समाज में विवेकानंद व विवेकान्ध दो तरीके के पुरूष व स्त्रियां होती हैं। हिरण्याक्ष नंदन अंधक जन्मांध तो था ही वह विवेकान्ध भी था। उसके पिता हिरण्याक्ष के जीवनकाल में ही उसे चक्षु ज्योति मिल गयी थी पर जन्मांध होने के कारण उसके राज्याधिकार में भी दैत्य समाज में भी मतभेद था जिसको दैत्येश्वर प्रह्लाद ने चुनौती के रूप में लेकर अपना उत्तराधिकारी अपने चचेरे भाई अंधक को ही तय किया।
कश्यप नंदन हिरण्यकश्यप के बारे में कहीं ऐसा कथानक नहीं आता कि वह स्त्री समाज का आदर नहीं करता था। घरेलू हिंसा का विशेष तौर पर स्त्री हिंसा का समर्थक था। उसका मुख्य उद्देश्य अपने शत्रु महाविष्णु से अपनी सुरक्षा करना तथा महाविष्णु के अलावा तत्कालीन सृष्टि में जो भी ब्रह्मा, शंकर आदि देव तत्त्व थे उनकी आराधना तथा तपस्या से उन्हें प्रसन्न करना हिरण्यकश्यप का जीवन ध्येय था। उसका पुत्र भक्त प्रह््लाद गाय-ब्राह्मण की संरक्षा करने वाला व्यक्तित्त्व था। जरूरत पड़ने पर दैत्य होने के कारण अस्त्र-शस्त्र भी धारण करता था। दैत्य वंश के तृतीय नरेश अंधक के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का समर्थक था। प्रह्लाद ने उसे अपना उत्तराधिकारी बनाते समय ताकीद की थी कि वह स्त्रियों का सम्मान किया करे। देवर्षि नारद ने जब पुलत्स्य ऋषि से सवाल किया कि जब देवाधिदेव महादेव मंदराचल में विराजित थे तब दैत्येन्द्र अंधक ने क्या किया, वह प्रकरण सुनाइये। अंधक ने अपने बंधु-बांधवों व गणों से कहा - जो व्यक्ति शैल कुमारी को जितनी जल्दी मेरे पास लायेगा वही मेरा वास्तविक बंधु व प्यारा होगा। तब प्रह्लाद ने अपने चचेरे भाई अंधक को कहा - तुम मदनातुर होगये हो एवं तुम्हारा विवके भी अंधा होगया है। वह गिरिजा जिसे तुम अपनी भार्या बनाना चाहते हो वह महादेव दयिता वस्तुतः तुम्हारी मां है एवं शंकर तुम्हारे पिता हैं। कवि कालिदास का कहना था कि - जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ। पार्वती-परमेश्वर इस संसार के माता-पिता हैं। प्रह्लाद ने बार-बार विवेकान्ध अंधक को झकझोर कर कहा - कुमार्ग का त्याग कर डालो एवं यह सोचना छोड़ दो कि तुम गिरिराज कन्या, शैल कन्या को अपनी भार्या बनाने की कामना नहीं कर सकते। शूलपाणि शंकर को जीतने की कामना तुम्हें सफल मनोरथ नहीं कर सकेगी इसलिये प्रह्लाद ने अंधक को बारम्बार यही कहा कि शंकर विजय तुम्हारी क्षमता से बाहर है इसलिये गौरी को अपनी अंकशायिनी बनाने की मनोभिलाषा का त्याग कर सन्मार्ग पर चलो। दैत्येश्वर विवेकान्ध अंधक तुम्हें अपने पिता हिरण्याक्ष के अग्रज हिरण्यकश्यप नंदन प्रह्लाद जो सन्मार्ग बता रहा है उसका अनुकरण करना ही तुम्हारे लिये हितकारी है। प्रह्लाद ने दैत्येश्वर अंधक को दण्ड-अरजा उपाख्यान सुनाया। अरजा, दैत्याचार्य उशना भार्गव की प्रथम कन्या थी। उनकी द्वितीय कन्या देवयानी का आख्यान भारत की आधुनिक देवयानी खोबरागड़े के संदर्भ में भारत की विदेश नीति का मूलमंत्र क्या हो इस पर विस्तारपूर्वक इसी ब्लॉग में एक अन्य जगह चर्चा की जा चुकी है। आज के हिन्दुस्तानी समाज को वामनावतार के युग में जो ऊहापोह था उससे सामयिक सबक लेने की मूर्धण्य आवश्यकता है। आज जो जड़ता भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक सोच में घर कर गयी है उसे हिन्दुस्तानी धरती व हिन्दुस्तानी वाङ्मय के अनुकूल ढालने की पहली जरूरत की संपूर्ति केवल वही नेतृत्त्व कर सकता है जो हिन्दुस्तानी जन समाज का नाड़ी वैद्य हो।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
बरेली के एक समाचार में कहा गया था कि भूख से केवल निर्धन ही नहीं अपितु धनवान भी मरता है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् भारत संचार निगम लिमिटेड का एक वरिष्ठ इंजीनियर बरेली में अपनी धर्मपत्नी के साथ अकेला रहता था। वृद्धावस्था के कारण दोनों ही इस स्थिति में नहीं थे कि स्वयं भोजन बना कर खा सकें। भोजन के अभाव में पुरुष के प्राण पखेरू उड़ गए। इस समय देश में आर्थिक दृष्टि से निर्बल वर्ग के लिये संविधान सम्मत भोजन उपलब्धि का शिगूफ़ा छोड़ा गया है। भूख तो केवल प्रकृति के कानून को जानती है।राजव्यवस्था के कानून भूख से छुटकारा नहीं दिला सकते। भूख से मुक्ति पाने के लिये समाज में दया व सेवा भाव से ही भूखे के लिये भोजन कि व्यवस्था हो सकती है। वर्तमान में संयुक्त परिवार टूट गये हैं। कामकाजी दम्पत्ति अपने-अपने काम एवं भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। वृद्ध माता-पिता की चिंता उन्हें नहीं सताती, न ही वृद्ध माता-पिता पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ रहने की मानसिकता रखते हैं। वे भी अपनी निजता की संरक्षा के लिये अलग ही रहना चाहते हैं। प्राचीन काल में धनी व दानी लोग वाराणसी, मथुरा, वृन्दावन, अयोध्या, हरिद्वार, द्वारिका आदि तीर्थ स्थलों में सदावर्त व भोजनालय चला कर भूखे लोगों को भोजन कराते थे। जगह-जगह अनाथालयों, यतीमखानों में अनाथ लोगों के लिये भोजन व रहने का सहारा था। धर्मशालायें थीं जहाँ लोग आकर ठहर सकते थे। आज पर्यटन व्यवसाय ने रहने व खाने के प्रबंधन को इतना महंगा कर दिया है कि भूखे को भोजन विज्ञापन जगत की "वाहवाही" लूट का साधन सा बनता दिखायी दे रहा है। भूख और प्यास निवारण जीव मात्र की पहली जरूरत है। अंधाधुंध बढ़ रही जनसंख्या का दबाव झेल रहे शहरों में प्यास बुझाने तथा भोजन करने के लिये जेब में पैसा चाहिये। शरीर असमर्थ है, वृद्धावस्था है, रहने-खाने की ठौर नहीं है, ऐसे आबाल, वृद्ध नर-नारी शहरों में रह रहे हैं और टुकुर-टुकुर देख रहे हैं उनके योगक्षेम के लिये कानून व्यवस्था अथवा कानून का राज रत्ती भर भी मददगार नहीं हो सकता। समाज के ऐसे वंचित लोगों के लिये संपन्न लोगों के मन में दयाभाव हो, जीवों के प्रति दया दृष्टि हो तभी ऐसे लोगों को भूख व प्यास के संकट से उबारा जा सकता है। जो लोग यह सोचते हैं कि कानून व सरकार हर समस्या का समाधान है, कानून व सरकारी मशीनरी में जीव दया के लिये कोई माकूल कोना है ही नहीं तो सरकार दारिद्र्य दुःख पीड़ित व्यक्तियों के हितार्थ कानून, नियम, उपनियम बना ले किन्तु मानवीय दृष्टिकोण के अभाव में पीड़ितों की पीड़ा बढ़ने ही वाली है। राहत तो उसे तब मिल सकती है जब प्रबंधन में करुणा का भाव जाग्रत हो। केदारघाटी सहित समस्त केदारखंड (गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग व चमोली जिले) के सैकड़ों गावों के हजारों परिवार अपने पैतृक घर-गावों से बाहर राहत शिविरों के तम्बुओं में अथवा एस्बेस्टिस चादरों के खोखों में रह रहे हैं, उनके पास पहनने, ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों का भी अत्यंत अभाव है। उत्तराखंड सरकार उन्हें राहत के नाम पर आश्वासन देती जारही है, उनके मकान बनाने के लिये आर्थिक सहायता देने की घोषणायें करती तो है किन्तु जमीनी स्तर पर वास्तविक राहत का कहीं नामोनिशान तक नज़र नहीं है। नग्न को कपड़ा, भूखे को भोजन व प्यासे को पानी दिलाने के लिये कानून, नियम, उपनियम तथा विभिन्न प्रकार की नियमावलियां काम नहीं आयेंगी। आपदा से निपटना राजनीतिक तथा प्रशासनिक आपद्धर्म के जरिये स्थानीय संपन्न, श्रीमंत व भूत दया करने वाले महानुभावों एवं ममतामयी मातृ शक्ति के सहयोग से ही राहत का मार्ग खोजा जा सकता है। जिस तरह सांप्रदायिक, भाषायी एवं अन्य प्रकार के दंगों के समय शांति समितियां गठित की जाती हैं, उत्तराखंड सरकार को चाहिए था कि उजड़े हुए गावों लोगों के लिये पुनर्स्थापन हेतु राहत व पुनर्स्थापन कमेटी जिला, ब्लाक तथा नगर या ग्राम पंचायत स्तर तक गठित की जातीं। राहत बाँटने के काम में अकेला जिला प्रशासन कुछ नहीं कर सकता। उसे जन सहयोग आपद्धर्म के रूप में लेना ही होगा। वर्त्तमान सरकार यदि उत्तराखंड की आपदा राहत को रास्ते पर नहीं ला सकती, चुनावी वर्ष होने के कारण राजनैतिक व प्रशासनिक अमला यदि अत्यंत व्यस्त है तथा उसे पीड़ित की सुध लेने का अवसर ही नहीं मिल रहा हो तो दिल्ली के तख़्त में २०१४ के सामान्य चुनाव के परिणामों के पश्चात जो भी नयी सरकार आती है उसे उत्तराखंड को त्रासदी से परित्राण दिलाने के तौर-तरीके तय करने चाहिये।
नान्दीमुख गांधी चिंतन के अंतर्गत हिन्द स्वराज तथा अनासक्ति योग में अभिव्यक्त गांधी विचार पुष्करिणी में सत्याग्रह, अहिंसा, अभय, अस्तेय, अस्वाद, शरीरश्रम, स्वदेशी, सर्वधर्म समानत्त्व तथा छुआछूत से छुटकारा पाने की सामूहिक मनोवृत्ति एवं वंचित, दलित, दमित, शोषित समाज को भी राजा-रईस व सत्ताधारी के सामानांतर छाती फुला कर खड़े होने का साहस मिले इस आलेख का यह महत्त्वपूर्ण पहलू है। गांधी आचरित सत्याग्रह, निरायुध अहिंसक समाज सृजन, गांधी आर्थिकी के द्वारा संयुक्त राष्ट्र में गांधी अहिंसा दर्शन, गांधी आर्थिकी की शरीरश्रम वाली माइक्रो उद्यमिता से हर हाथ को काम मिले। भारत सरकार से यह अपेक्षा की जाये कि जिस तरह संयुक्त राज्य अमेरिका ने अब्राहम लिंकन को दास प्रथा मुक्तिदूत के रूप में प्रतिष्ठित किया है उसी तरह महात्मा गांधी की अहिंसा को राष्ट्र संघ भारतीय दूतावासों, भारत संघ के घटक राज्यों सहित प्रत्येक जनपद, नगर निकाय जिला पंचायत, क्षेत्र-तालुका पंचायत तथा ग्राम पंचायत में महात्मा गांधी अहिंसा स्थलों की स्थापना की जाये। ऐसा करने के लिये भारत सरकार भारतीय संसद की अनुमति से "राष्ट्रीय महात्मा गांधी अहिंसा न्यास" की स्थापना कर वैश्विक अहिंसा को स्थापित करने में राष्ट्र संघ का भरपूर सहयोग करे। संसार के संपन्न समाज व विपन्न मानवीय संवेदना, सहानुभूति एवं समग्र वैश्विक मानव समाज में अहिंसा का मार्ग अपनाने की पहल इस आलेख की प्राथमिकता है। ब्लॉग के द्वारा सामयिक सरोकारों पर बहस, जुवेनाइल जिसे भारतीय वाङ्मय नाप्तयौवन कहता है, आज कानून के क्षेत्र में यत्र-तत्र चर्चित बिंदु है। नाप्तयौवन-जुवेनाइल कौन है ? उम्र का कौन सा पड़ाव पुरुष अथवा स्त्री को युवा या आप्तयौवन मानता है, इस पर भी वैश्विक बहस के समानांतर मुष्टिक व चाणूर सरीखे मल्लों के साथ नंदनंदन श्रीकृष्ण व बलराम का मल्लयुद्ध जुवेनाइल कानून के सन्दर्भ में तात्कालिक विचार योग्य बिंदु है।
शब्द नाप्तयौवन का "जुवेनाइल" अवतार।।
शब्दों व ध्वनियों का मूल स्त्रोत ध्वन्यालोक और भारत का नटराज नृत्य के सम्बन्ध में वैयाकरण पाणिनी ने भी कहा - "नृत्यावसाने नटराज राजोननाद ढक्का नवपंचवारम"। शब्द यात्रा के इस शब्दाटन को भाषा विज्ञानी सुनीति कुमार चाटुर्ज्या और डॉक्टर हेम चन्द्र जोशी ने भारतीय वाङ्मय शब्द शक्ति को यूरोप के उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोणस्थ) इंग्लिश स्थान पहुँचने पर मातृ को मदर, पितृ को फादर, भ्रातृ को ब्रदर तथा स्वषा को सिस्टर के रूप में देखा। आज भारत में यत्र तत्र जुवेनाइल शब्द लोगों की जुबान पर है। मथुरा में भोजेन्द्र उग्रसेन के राजकुमार कंस ने अपने पिता को गद्दी से उतार कर वह स्वयं वृष्णि, अंधक, कुंकुर व भोज समुदायों का राजा बन गया। आज भी मथुरा के कंसथार मोहल्ले को कंस का राजमहल माना जाता है। भोजेन्द्र कंस ने अपनी चचेरी बहन के पुत्र देवकी नंदन तथा नन्द यशोदा द्वारा पालित पुत्र को मुष्टिक व चाणूर नाम के मल्लों द्वारा मारे जाने के लिये मल्ल युद्ध रंगमंच का निर्माण किया था। देवकी व रोहिणी पुत्र कृष्ण बलराम का मुष्टिक व चाणूर से मल्ल युद्ध आयोजित किया। मथुरा के आबाल वृद्ध नर-नारियों ने कहा - कृष्ण बलराम नाप्तयौवन हैं अर्थात अभी जवान नहीं हुए अतः उन्हें मुष्टिक-चाणूर सरीखे पहलवानों से लड़ाना न्याय संगत नहीं है। तब कृष्ण बलराम दोनों ही सोलह वर्ष से कम उम्र के थे। कृष्ण बलराम के अलावा भारतीय पारम्परिकता में दूसरा उदाहरण पंगु मुनि पराशर-सत्यवती पुत्र कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास व वतिका के सोलह वर्षीय पुत्र ज्ञानसिंधु शुकदेव का है जिन्होंने नाप्तयौवन याने जुवेनाइल उम्र में पारमहंस्य ज्ञान गंगा का प्राकट्य किया। आज हिंदुस्तानी विज्ञ समाज जुवेनाइल की जो व्याख्या कर रहा है, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने जब हथियार उठाये थे एवं रणांगण में युद्ध की बिसात बिछायी थी तब वह षोडशी ही तो थी।
आज भारत में प्राकृतिक जल प्लावन, नदियों की बाढ़, समुद्र तटीय क्षेत्रों में चक्रवात किस्म की सुनामी के समानांतर मानव समाज में भी अनेक प्रकार की भीषण बाढ़ें आयी हुई हैं। पहले हम भारत के आस्थामूलक बहुसंख्यकों में आयी तथाकथित धार्मिकता की बाढ़ को देखें। यत्र-तत्र भारत भर में मंदिरों, तीर्थों तथा विभिन्न भारत धर्मी सम्प्रदायों के गुरुओं और धर्माचार्यों के उपदेशों, प्रवचनों और आशीर्वचनों की भी भयंकर बाढ़ आयी हुई है। अध्यात्म व भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की त्रिवेणी जगह-जगह अपनी नवनूतन धर्म व्यापार के रूप में बढ़ रही है। धर्मगुरुओं में मध्य यूरोप में फ़ैली मध्ययुगीन पोप लीला का संचरण सर्वव्यापी दिख रहा है। यहाँ तक कि वैश्विक बाज़ार संस्कृति ने योगाचार्य महर्षि पतंजलि के योगपथ को चौराहे पर खड़ा कर बिकाऊ माल बना डाला है। कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर धर्मगुरुत्व करने वाले महानुभावों ने सर्वधर्म समानत्व, अपरिग्रह, अनासक्ति, अस्वाद, शरीरश्रम, ब्रह्मचर्य के अलावा गांधी मूल व्रत सत्य का अवलम्बन या सत्याग्रह तथा अहिंसा परमो धर्म के मर्यादामूलक आचरण करना छोड़ कर अहम् पूर्वम्-अहम् पूर्वम् की होड़ तथा दौड़ में भागीदारी कर ली है। आस्था आज बाजारू विज्ञापन की सूत्रधार बन गयी है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
![]() |
| खादी के प्रवर्तक |
खादी किधर ?
हैरिटेज का अद्वैत अथवा मल्टी ब्राण्ड वाला द्वैताद्वैत !!
महात्मा गांधी के जीवनीकार डी.जी. तेंदुलकर ने "महात्मा" के आठ वॉल्यूमों के तीसरे वॉल्यूम में लिखा - महात्मा गांधी ने कदम कुआं पटना में अपनी छप्पनवीं वर्षगांठ आश्विन बदी द्वादशी (चर्खा जयंती) संवत् 1981 के दिन आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसिएशन खड़ा किया। इसे हिन्दुस्तानी नाम चर्खा संघ दिया। भारत के मिल मालिकों की भी एक आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसिएशन तब भी थी जब महात्मा ने चर्खा संघ स्थापित किया। आज महात्मा गांधी वाला चर्खा संघ कपड़ा निर्माण परिदृश्य से ओझल हो गया है पर मिल मालिकों का ए.आई.एस.ए. पिछले एक सौ वर्ष से जीवित है। महात्मा गांधी के चर्खा संघ में उनके अलावा मौलाना शौकत अली, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, सतीश चंद्र दास गुप्ता, मगनलाल गांधी, जमनालाल बजाज (खजांची), पंडित जवाहरलाल नेहरू, शोएब कुरैशी तथा शंकरलाल बैंकर सेक्रेटरी थे। महात्मा गांधी का चर्खा संघ ए.आई.एस.ए. हाथ कते सूत से खादी वस्त्र निर्माण का एक अनोखा मानव समूह था जिस पर महात्मा गांधी को गर्व था। 1924 से 1934 तक स्वयं चर्खा संघ के प्रमुख रहे। 1934 में उन्होंने चर्खा संघ का उत्तरदायित्त्व श्री कृष्ण दास जाजू को सौंप दिया।
बाल विजय संयोजक खादी मिशन ने अपने अंग्रेजी परिपत्र "बुद्ध पूर्णिमा" 25 मई 2013 की शुरूआत करते ही खादी क्षेत्र के अपने सहयोगियों को संबोधित करते हुए लिखा “Heritage Khadi Sector is facing serious challenge today, “Survive or Perish”. अर्थात "गाँधी विरासत वाला खादी क्षेत्र आज स्वयं के बने रहने अथवा समाप्त हो जाने जैसी गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है।"
2. बालविजय जी यह भी व्यक्त करते हैं कि आज हर व्यक्ति किंकर्त्तव्यविमूढ़ है कि वह मल्टीनेशनल ब्रांड खादी और महात्मा गांधी की राष्ट्रीय विरासत वाली खादी इन दोनों में से किस खादी को अपनाये। यही भारतीय समाज को भ्रमित करने वाला यक्ष प्रश्न है। चर्खा द्वादशी, जो महात्मा गांधी की छप्पनवीं जयंती के अवसर पर 24 सितंबर 1924 को थी तब से अगले दस वर्ष तक महात्मा गांधी ने बजरिये चर्खा संघ भारत भर में खादी के फैलाव का अहर्निश प्रयास किया। उन्हें अपार जन सहयोग भी मिला। खादी हिन्दुस्तान की आजादी के दीवानों की वर्दी थी। आबाल वृद्ध हर कोई, खादी के लिये अपना योगदान देने में महात्मा गांधी को भारतीय राष्ट्र का परित्राता समझता व मानता भी था। सेवा ग्राम वार्धा में सन् 1935 में परमहंस योगानंद ने महात्मा गांधी से भेंट की और सूत कताई व हाथ कताई को अद्वितीय योग मार्ग बताया। पांच हजार वर्ष पहले सत्यवती पाराशर नंदन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने नारायण कवच का जो उद्गान किया था, करन्यास - हाथ का योग, दोनों हाथों की दसों अंगुलियों का पोर स्पर्श योग मार्ग की उद्भट क्रिया है। गांधी के चर्खे में अंगूठा, तर्जनी व मध्यमा अंगुलियों का निरन्तर सूत कातते जाना एक ऐसी यौगिक क्रिया है जो शरीर को स्वस्थ्य रखने का काम करने के साथ-साथ हाथ-पांव हिलते रहें तथा शरीर श्रम होता रहे। तकली अथवा हर किस्म के चर्खे में कताई करने में व्यक्ति के स्वास्थ्य का बहुत बड़ा खजाना महात्मा गांधी ने उपलब्ध कराया था।
कुल्लू-मनाली हिमाचल प्रदेश से जारी अपने पथ प्रदर्शक नौ परिच्छेद वाले परिपत्र में बाल विजय ने गांधी की राष्ट्रीय विरासत वाली खादी से जुड़े लोगों का आह्वान किया है। उन्हें ललकारा है कि अपना रास्ता स्वयं खोजो, सामूहिक मेधा व विवेक का सहारा लो। आदि शंकर की तरह तत्त्वबोध का मार्ग खोजने के लिये निरन्तर विमर्श करते रहो, हारो मत। महात्मा गांधी की स्थितप्रज्ञता तक पहुँच रखो तथा गांधी प्रार्थना फिर शुरू करो। यदि गांधी जीवन दर्शन की बुनियादी बातों को अपनाना है तो केवल सादा रहन-सहन व ऊँचे विचार, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, शरीर श्रम, अस्वादु भोजन उतना ही करना जितनी पेट की जरूरत हो। सदाचार का सबसे बड़ा स्त्रोत पेट की जरूरत से ज्यादा भोजन न करना है। यह सवाल अपनी षष्टि पूर्ति के वक्त राजा बलदेव दास बिड़ला ने पितृभक्त बेटों को नसीहत दी थी। एक सामान्य जन के रूप में काशी वास पसंद किया था। गांधी विरासत वाली खादी का रास्ता अपनाने वाले लोगों को अपनी नजर में हिन्दुस्तान के गांव के गरीबों व महानगरों के झुग्गी, झोपड़पट्टी में अपने दिन बिताने वाले गरीबों के जीवनयापन के स्तर को ऊँचा उठाने में एक विचार-विशेषज्ञ समिति के रूप में कार्य करना होगा। सद्विचार व ऊँचा आदर्श अपनाने वाले लोग जो खादी, महात्मा गांधी की विरासत वाली खादी से जुड़े रहना पसंद करते हैं उन्हें वाल स्ट्रीट, मल्टी नेशनल खादी ब्रांड वालों के साथ सहअस्तित्त्व का, सहभोज का, सह वीर्य का, साथ-साथ चलने का प्रयास तो करना ही होगा पर अपने आपको स्वामी मान कर नहीं अपितु ग्वाला, रखवाला, अमानत की देखरेख करने वाला, कार्यक्रम को सही दिशा बोध देने वाले विचार-विशेषज्ञों के रूप में स्थापित करना होगा। जिन खादी वालों को तड़क-भड़क वाली जिन्दगी पसंद है उन्हें चाहिये कि वे मल्टी ब्रांड, मल्टी नेशनल, अंतर्राष्ट्रीय खादी की पंगत में वर्तमान खादी कमीशन व एम.एस.एम.ई. मंत्रालय की गणेश-प्रदक्षिणा शुरू कर अपने लिये वाजिब जगह मल्टी ब्रांड खादी सेक्टर में सुनिश्चित कर लें।वह एक ऐसा ही बंटवारा होगा जो 1905 में बंग भंग तथा 1947 में भारत विभाजन के समय हुआ। भारत के उस सपूत रत्न को चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री जिसने भारतीय मुद्रा में महात्मा गांधी का आमुख (Face of Mahatma Gandhi) तय किया वह वास्तव में भारतीय राष्ट्र की नींव का वह पत्थर है जिसे हजारों साल पहले महाविष्णु के मशविरे से "कश्यपदायादों" (देव- दानवों) ने समुद्र-मंथन का संविद तय होने पर जिसमें महाविष्णु ने स्वयं कच्छप बन कर समुद्र मंथन को मूर्त्त रूप देकर गढ़ा था। उत्तर भारत में रामलीलायें यत्र-तत्र-सर्वत्र आज भी होती रहती हैं। राम के एक्टर को लीला अवधि में राम पद मिलता है पर वह राम नहीं मात्र राम का एक्टर होता है। वह यह विवेक रखे कि उसने राम का स्वांग किया, वह स्वयं राम नहीं। राम सरीखा बनने के लिये उसे जन्म जन्मांतर तक मनोयोग पूर्वक जीवन जीना होगा जिससे उसके व्यक्तित्त्व में राम का मर्यादा पुरूषोत्तम गुण प्रकट हो सके। वैयाकरण पाणिनि ने दाशरथि राम में वह शक्ति खोजी जो "येषाम् योगिनः रमन्ते सः रामः सैव दाशरथि रामः" के रूप में विद्यमान थी। महात्मा गांधी ने इसी दाशरथि-राम-तत्त्व से बंध कर भारत की आजादी के संघर्ष का सूत्रपात किया। आसेतु हिमाचल महात्मा गांधी रातोंरात भारतीय जन-जन के हृदय सम्राट बन गये। आदि कवि वाल्मीकि ने राम वनवास के अवसर पर श्रंगबेरपुर में साकेत-अयोध्यावासियों के जनसमूह से कहलाया था - "वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथि यथा"।
3. जीव जगत में जिनकी पहचान गुर्जर-गिरा वाग्-वाणी उच्चारने वाले पोरबन्दर निवासी पुतलीबाई करमचंद कबा गांधी दम्पत्ति के यशस्वी पुत्र जिनका जन्म भारतीय पंचांग के अनुसार विक्रम संवत् 1926 में आश्विन बदी द्वादशी को मघा नक्षत्र में तथा वर्तमान में विश्व में प्रचलित ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था, उस अहिंसा के मसीहा महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी की जन्म तिथि को विश्व मानवता की शिखर संस्था जिसे अमेरिकी नगर न्यूयार्क में राष्ट्र-संघ (यूनाइटेड नेशन्स) के तौर पर पहचाना जाता है, प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को "विश्व अहिंसा दिवस"(Global Non-Violence Day) के रूप में मना रही है तथा दुनिया भर के उन सभी सार्वभौम सत्ता संपन्न राष्ट्र राज्यों से अपेक्षा करती है कि वे महात्मा गांधी का अहिंसा पथ अपना कर धरती में अमन चैन का वातावरण बनाने के लिये "विश्व अहिंसा दिवस" मनोयोगपूर्वक मनायें। विश्व भर की यू.एन.ओ. से जुड़ी राज सत्तायें यत्र तत्र व्याप्त हिंसा के वातावरण के बावजूद वर्ष में एक दिन ही सही अहिंसा का जप-यज्ञ कर तो रही हैं। फिलहाल इतना ही काफी है।
4. गांधी विरासत को जो चुनौती संत विनोबा के अंतरंग शिष्य रहे बाल विजय ने महसूस की है उसे खादी के मौजूदा कर्णधार किस सीमा तक हृदयंगम कर पाये हैं, यह दूसरा यक्ष प्रश्न है। उन्होंने अपने दस्तावेज के सातवें परिच्छेद में 16-17 मार्च 2013 को सेवा ग्राम वार्धा में संपन्न खादी सभा द्वारा नियुक्त खादी कमीशन निरपेक्ष कार्य योजना (Action Plan) सुझाने के लिये श्री रामेश्वर नाथ मिश्र के संयोजकत्त्व में नौ सदस्यीय समिति गठित करने व समिति द्वारा 30 अप्रेल 2013 तक अपनी संस्तुतियों को खादी सभा को सौंपने का जिम्मा दिया। संयोजक के अलावा उक्त कायाकल्प समिति में सर्वश्री रामदास शर्मा, महेश शर्मा, लोकेन्द्र भारतीय, के. चिन्नास्वामी, बी.बी. पाटिल, डा. विभा गुप्ता, मनुभाई मेहता व रामचन्द्र राही हैं। बाल विजय ने अपनी विचारोत्तेजक नौ सूत्रीय ललकार के जरिये खादी अभियान की जमीनी हकीकतों को मानव-श्रम केन्द्रित खादी संगठन ढांचे की दुखती रगों को छू कर खादी वालों को बताया है कि दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से लाभार्जन की रफ्तार बढ़ाने वाली (Profit Oriented Corporate Company) की तर्ज पर खादी रिफार्म व खादी बढ़त के कार्यक्रम को विदेशी पूंजी की मदद से बढ़ाने का जो संकल्प एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के तत्त्वावधान में जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1956 में संकल्पित भारत के लाखों लाख गांवों के ग्रामोद्योगीकरण का अक्टूबर 1956 में जयपुर में उद्घोषित किया गया था, खादी आयोग व खादी के प्रशासनिक मंत्रालय ने उससे मुंह मोड़ लिया है। ये दोनों खादी को राज्याश्रय वाले पिछले साठ वर्षों में सटीक दिग्दर्शन के बजाय खादी रिफार्म व मल्टी नेशनल ब्रांड खादी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय सहित विश्व के तमाम देशों में भारत के राज दूतावासों के जरिये गांधी की खादी को हिन्दुस्तान के गंवई, गांव, गंवार से वाल स्ट्रीट सहित दुनियां के हर वाल मार्ट तक पहुंचाना चाहते हैं। विचार तो श्रेयस्कर है पर इस खादी रिफार्म व मल्टी नेशनल ब्रांड खादी के लिये हमारे देश वासियों को पहला करारनामा हथकरघा व हाथ कते सूत के मैत्री करार के तरीके पर अपनाना होगा। हथकरघे में बुना हुआ कपड़ा भी खादी है भले ही जिस सूत से वह कपड़ा बुना गया वह मिल कता तागा हो या हाथ कता सूत, बढि़या असरदार हथकरघा पर बुना हुआ वह कपड़ा है जिसका ताना मजबूत हो, मजबूती मिल कते सूत के किस्म की हो पर बाना हाथ कता हो। गांधी जी ने जब स्वदेशी की बात चलायी, भारत के मिल मालिक संघ ने भी अपनी-अपनी मिलों में मोटा खुरदरा कपड़ा बुनना शुरू किया उसे मिल मालिकों ने दिल्ली क्लाथ मिल की खादी के नाम से पुकारा। खद्दर व हथकरघे की गलबहियां ही दोनों का कायाकल्प कर सकती हैं। एक जमाना था जब टेक्सटाइल कमेटी में खादी से जुड़े लोग प्राणलाल सुन्दरजी कापडि़या सरीखे मिल मालिक, भारतीय कपड़ा मिल आई.एस.ए. के समानांतर महात्मा गांधी के चर्खा संघ की भी तरफदारी करते थे। उस विचार मंथन में सह अस्तित्त्व था। वहां मत्स्य-न्याय के लिये कोई कोना बचा ही नहीं था, यह महात्मा गांधी की स्थितप्रज्ञता का प्रताप था।
5. 1954 में दिल्ली में खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी के पश्चात अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल ने नई दिल्ली में खादी ग्रामोद्योग भवन संचालित करने का बीड़ा उठाया। शुरूआती दिनों में दिल्ली के खादी ग्रामोद्योग भवन के संचालन का उत्तरदायित्त्व मार्गदर्शन खादी क्षेत्र के विपणन अग्रदूत जे. राजाणी को तथा खादी ग्रामोद्योग भवन संचालक भरत टोपरानी को सौंपा गया। वैकुंठ भाई चाहते थे कि नई दिल्ली का खादी ग्रामोद्योग भवन गांधी आश्रम मेरठ चलाये पर यह बात विचित्र नारायण शर्मा को रूचिकर नहीं लगी। उन्होंने वैकुंठ भाई से कहा - मेरे पास मानव संपदा इस स्तर की नहीं जो दिल्ली के खादी भवन की जिम्मेदारी निभा सके। वैकुंठ भाई ने विचित्र भाई से कहा - कोई ऐसा हिन्दी भाषी कार्यकर्त्ता बताइये जो खादी ग्रामोद्योग भवन नई दिल्ली को सही तरीके से चला सके। विचित्र नारायण शर्मा जी ने वैकुंठ भाई को रामनाथ टण्डन का नाम सुझाया। टण्डन कानपुर के रहने वाले थे। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ कानपुर में रचनात्मकता का काम किया था। रामनाथ टण्डन को दिल्ली बुलाया गया तथा उन्हें रीगल बिल्डिंग, कनाट सर्कस के खादी ग्रामोद्योग भवन की बागडोर सौंप दी गयी। रामनाथ टण्डन ने खादी ग्रामोद्योग भवन के जरिये खादी का कार्य विस्तार अपने तरीके से किया। जब तक वैकुंठ भाई आयोग के सदर थे वे दिल्ली आने पर खादी भवन जरूर जाते और टण्डन की संस्तुति ध्यानपूर्वक सुनते थे। आज नयी दिल्ली सहित भारत भर के खादी भवनों की खादी मार्केटिंग पर रामनाथ टण्डन की स्पष्ट छाप है। वैकुंठ भाई ने रामनाथ टण्डन की सिफारिश मानते हुए खादी ग्रामोद्योग भवन के हर कार्यकर्त्ता को टोकन कीमत पर खादी वर्दी मुहैया करायी थी वह व्यवस्था वैकुंठ मेहता के खादी आयोग से निवृत्त होने के पश्चात एकदम उलट गयी। नतीजा साफ है, आज खादी भवनों, खादी भंडारों, खादी संस्थाओं में खादी पहनने वाले कार्यकर्त्ता दांये हाथ की पांच अंगुलियों में गिने जा सकते हैं। खादी मिशन को अपनी सहयोगी संस्थाओं को प्रेरित करना चाहिये कि वे अपने कार्यकर्त्ताओं को खादी कार्यकर्त्ता वर्दी (पुरूषों को कुर्ता-पायजामा, जवाहर कट सदरी तथा महिलाओं को सलवार-कमीज, साड़ी-ब्लाउज व लेडीज शाल) मुहैया करायें ताकि कार्यकर्त्ता के पहरावे को देखकर खादी उपभोक्ता को भी प्रेरणा मिले तथा इसके साथ ही स्थितप्रज्ञता वाली गांधी प्रार्थना, वर्दी अनुशासन, समय की पाबंदी कार्यकर्त्ताओं का आदर्श हो। पॉली वस्त्र का प्रयोग कार्यकर्त्ता मुफ्ती के रूप में कर सकता है पर खादी कार्यकर्त्ता के लिये वर्दी संबंधी अनुशासन आज युग की पुकार है। हैरिटेज खादी को अगर जिन्दा रखना है तो परिधान अनुशासन अपनाना ही पड़ेगा।
6. बाल विजय जी ने अपने उद्बोधन में विभिन्न चुनौतियों का सामना करने के जो उपाय सुझाये हैं उनमें से एक यह भी विचारणीय है कि गांधी के नाम के कारण गांधी की खादी की जो साख आज भी आम हिन्दुस्तानी के मन-मस्तिष्क में मजबूती से बनी हुई है, उसका भरपूर उपयोग किया जाय। इस साख की हुंडी को सकारा जा सकता है। खादी सभा कहती है उसे जमीन बिक्री का अधिकार चाहिये। खादी संस्थाओं के मौजूदा कर्त्ताधर्त्ता लोगों को अपने वक्षस्थल पर हाथ रख कर सोचना चाहिये कि उनके वैचारिक पुरूखों ने जो संपत्ति दान, विष्णुप्रीति व अनुदान के पैसों से अर्जित की वह संपत्ति सामुदायिक है। कुछ गिनेचुने लोग जो आज संस्था पर काबिज़ हैं उन्हें संस्था संपत्ति बेचने का नैतिक अधिकार इसलिये नहीं है क्योंकि वे संस्था के ट्रस्टी हैं। संस्था उनकी निजी जायदाद न होकर उनकी देखरेख में रखी ऐसी अमानत है जिसकी ख़यानत करना सामाजिक अनुत्तरदायिता है इसलिये जब खादी सभा के लोग हैरिटेज खादी की बात करते हैं तो उन्हें गांधी विचार दर्शन का आइना सामने रखना होगा। अतएव बाल विजय जी को भी अपने अंतर्मन से (उसमें जो गांधी-विनोबा के दायभाग वाला दृष्टा बैठा है) से उत्तर मांगना चाहिए। अतः संस्थाओं की जमीन बेचने के प्रसंग को बाल विजय अपने आह्वान-पत्र से हटा दें क्योंकि आज भारत के शहरी, अर्ध शहरी व सड़क के किनारे जहां-जहां संस्था की परिसंपदा है उस पर देश के नव-धनाढ्य धनकुबेरों की नजर लगी हुई है। मुंबई के कोरा केन्द्र का जो हाल हुआ वह उदाहरण बन कर भारत के सभी बड़े शहरों के आसपास गांधी विचार से जुड़ी संस्था-संपदा के लुटवाने में विलंब नहीं करेगा इसलिये हर संस्था से यह अपेक्षा करनी जरूरी है कि यदि संस्था का ट्रस्ट सामूहिक है तथा किसी एक व्यक्ति या परिवार की संपदा नहीं है, संस्था के आवरण वाली परिसंपदा बेचने का अधिकार देश के दीवानी कानून से बंधा हुआ हो तथा संस्था सामूहिक है तो परिसंपदा बेचने का सवाल ही नहीं उठना चाहिये। हां अगर किसी व्यक्ति ने खादी कमीशन कानून के अस्तित्त्व में आने के बाद अपनी निजी पारिवारिक संपत्ति में खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रमों को चलाने के लिये अनुदान व सब्सिडी के लालच में संस्था खड़ी की, भू भवन संपदा का बाजार मूल्य बढ़ जाने से वे यह महसूस करते हों कि उन्हें घाटा होरहा है तो ऐसे मामलों में अगर संस्था के आवरण वाला व्यक्ति न्याय की अपेक्षा करे तो उसका पक्ष सुना जाना चाहिये। यदि वास्तविकता में वह घाटे में हो तो उसे न्याय प्रार्थिता का हक मिलना ही चाहिये। जो संस्थायें प्रबंधन की पिछली चार पांच पीढि़यां या उससे अधिक अवधि वाली हैं उन्हें परिसंपदा बेचने का अधिकार देना महात्मा गांधी की ट्रस्टीशिप विचार पोखर में सेंधमारी करने जैसा है।
7. खादी संस्थायें जो अपने आप को गांधी दायभाग तथा गांधी की राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा समझती हैं उन्हें अपना संगठनात्मक कायाकल्प करना ही होगा। उन्हें पता लगाना होगा कि जिस इलाके में वो काम कर रहे हैं वहां आज भी कितने व कौन-कौन लोग हैं जो खादी पहनते हैं या खादी से जिन्हें सहानुभूति है। डाक्टर जी. रामचन्द्रन जब खादी आयोग के प्रमुख थे तब उन्होंने आदतन खादी पहनने वालों का रजिस्टर बनाने की पहल की थी किन्तु वह परवान नहीं चढ़ पायी। डा. रामचन्द्रन के हिन्द स्वराज में गांधी जी के मशीन विरोध पर उनसे संवाद कायम किया था। वे गांधी दर्शन के अद्वितीय व्याख्याता थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में खादी को जनाधारित बनाने के लिये सतत प्रयास किये। सबसे अहम् जरूरत तो खादी संगठनों को अपना ही कायाकल्प करने की है। सांप की तरह केंचुली बदलने का वक्त खादी वालों के लिये आगया है। उन्हें अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने के बजाय उन गलतियों से सीख लेनी चाहिये। हर गांव, हर मोहल्ला, हर बाखली में कातने वालों, बुनने वालों, दूसरे दस्तकारों व कारीगरों की कम से कम सात, अधिक से अधिक सोलह पुरूषों व स्त्रियों के स्वयं सहायता समूह गठित करने चाहिये। गांव सभा क्षेत्र, न्याय पंचायत क्षेत्र, नगर पालिका व नगर पंचायत क्षेत्र में वहां बसे कारीगरों के स्वयं सहायता समूह गठित हों। उनके स्थानीय फैडरेशन, विकास खंड या जिला स्तर के कनफैडरेशन गठित कर उन कनफैडरेशनों के अध्यक्ष, मंत्री को संस्था प्रबंध समिति सदस्यता अथवा विशेष आमंत्रित सदस्यता नवाजी जाने चाहिये। कोई भी खादी संस्था किसी भी दस्तकार, कारीगर, कत्तिन, बुनकर से सीधे डीलिंग करने के बजाय कनफैडरेशन, फैडरेशन व स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ही उद्यमिता पारिश्रमिक आदान-प्रदान करने का संकल्प ले। जब तक कत्तिनों के स्वयं सहायता समूह, उनके फैडरेशन तथा कनफैडरेशन कानून की जद में खादी संस्था के औद्योगिक सहयोगी की हैसियत अर्जित नहीं कर लेते तब तक खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों में संचालित ग्रामोद्योग भवनों व पूनी संयंत्रों की राज्य स्तरीय खादी ग्रामोद्योग संस्था संघों को जहां-जहां ऐसे संघ कार्यशील हैं तथा खादी ग्रामोद्योग भवन व पूनी संयंत्र संचालन के लिये तैयारी रखते हैं, स्टाफ सहित उन्हें सौंपे जायें जो स्टाफ डैप्यूटेशन पर संस्था संघ या संस्था मंडल में काम करने को तैयार हैं उन्हें डैप्यूटेशन अलाउंस मिले। जो स्टाफ डैप्यूटेशन पर जाने को राजी न हो उसे खादी ग्रामोद्योग आयोग अपने प्रबंधन में जहां-जहां रिक्तियां हैं उनका उपयोग करे। खादी मार्केटिंग अथवा रौ मैटिरियल प्रबंधन सहित सभी स्लाइबर मैन्यूफैक्चरिंग इकाईयों को अंततोगत्त्वा कतकर, बुनकर, कारीगर, स्वयं सहायता समूहों के जिला कनफैडरेशनों को ही सौंपा जाना चाहिये । इन कनफैडरेशनों से खादी संस्थाओं की उद्यमिता आयात-निर्यात प्रबंधन संबंधी इकरारनामा हर वर्ष नवीनीकृत किया जाता रहे।
8. खादी सभा 2013 के प्रस्ताव क्रमांक नं. 1 के दूसरे परिच्छेद में यह कहा गया है कि 21-22 अप्रेल 2012 को देश भर की खादी संस्थाओं का जमावड़ा जयपुर में हुआ था। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह तब केन्द्रीय मंत्रिमंडल में एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के केबिनेट मंत्री थे। प्रस्ताव व्यक्त करता है कि तत्कालीन एम.एस.एम.ई. मंत्री महोदय ने संस्थाओं की कर्ज मुक्ति की घोषणा की थी। उस सभा में तत्कालीन एम.एस.एम.ई. मंत्री महोदय ने म.न.रे.गा. में (चर्खे में सूत कातने वाले स्किल्ड लेबर को भी देश की आधी आबादी को आर्थिक सामर्थ्य उपलब्ध कराने के लिये) केन्द्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्ताव रखने की भी घोषणा की थी। शायद यह घोषणा याने मनरेगा के साथ खादी के तार जोड़ने वाली श्री वीरभद्र सिंह जी द्वारा व्यक्त विचार कायाकल्प कमेटी के संयोजक सहित सभी नौ सदस्यों में जो लोग तब जयपुर में थे उन्होंने भी सुनी होगी। जरूरत इस बात की है कि चर्खा कताई के शारीरिक परिश्रम को मनरेगा से जोड़ कर कम से कम 100 दिनों का कताई परिश्रम महिला कतकरों को मिले। इस प्रयास से महिला सामर्थ्यवर्धन के साथ-साथ खादी सामर्थ्य संवर्धन भी होगा।
9. बाल विजय जी ने भारत के प्रधानमंत्री जी का ध्यानाकर्षण अपने 25 अप्रेल 2013 के अनुरोध पत्र में किया। अनुरोध पत्र में दूसरे परिच्छेद में श्रीमती इंदिरा गांधी भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री (1966-1977 व 1980-1984) की सदाशयता का भी उल्लेख किया है। इंदिरा जी स्वयं आदतन खादी पहनने वाली व अपने पिताश्री के लिये खादी परिधान का निर्णायिका तो जरूर थीं पर उन्हें जब भारत की एकछत्र सत्ता हासिल हुई तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्षा के तौर पर सत्ता के अराजनीतिक दलालों की बात मान कर कांग्रेसजनों के लिये खादी पहनने वाली शर्त्त हटाने से इस मुल्क को जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ वह खादी के कपड़े की शर्त्त हटाने के कारण ही हुआ। राजनीतिक संगठन के रूप में कांग्रेस उत्तर प्रदेश से नदारद सी होगयी। दूर-दूर तक ऐसे कोई लक्षण आज भी नजर नहीं आरहे कि जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गांव-गांव घूम कर स्वराज्य का जो माहौल खड़ा किया, दलित वाद, जाति वाद व बिरादरी वाद से उत्तर प्रदेश को राजनीतिक राहत मिलेगी। दलित मंडल कमंडल का त्रिवेणी प्रयाग का संगम फिर भारत की मुख्य धुरी की भूमिका का निर्वाह करने की पात्रता अर्जित कर भी पायेगा ?
बाल विजय जी व उनके हेरिटेज खादीवादियों के सामने आज केवल दो ही विकल्प रह गये हैं। वे संकल्प लें कि भारत के प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जी से अनुरोध करें कि गांधियन इकोनामिक एक्शन को सजीव व प्राणवान बनाने के लिये पन्द्रह अगस्त 1947 को मध्य बिन्दु मानते हुए उस दिन से पहले जो खादी संगठन भारत में कार्यशील थे यदि वे आज भी जिन्दा हों तो उन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय विरासत न्यास का दर्जा दिया जाये। उनमें जो लोग ट्रस्टीशिप वाली खादी थिअरी के पोषक हैं उनमें से सरकार जिन्हें योग्य समझती है उनमें से पांच महात्मा गांधी - कार्यक्रम न्यासी चुने जायें और देश भर के गांधी विचार पोषकों का राष्ट्रीय गांधी विचार पोखर गठित किया जाये जिसमें प्रत्येक राज्य से कम से कम दो, अधिक से अधिक पचीस, सवा सौ लोगों का गांधी विचार पोखर निश्चित किया जाये। खादी मिशन भारत सरकार से अनुरोध करे कि भारतीय संघ के हर एक घटक राज्य में खादी ग्रामोद्योग कारीगर कार्यकर्त्ता सम्मेलन किये जायें। अखिल भारतीय सम्मेलन के लिये राज्य सम्मेलन अपने प्रतिनिधि तय करें। हेरिटेज खादी व मल्टी नेशनल ब्रांड खादी के बारे में खुला विचार विमर्श हो। दुनियां के देशों में गांधी के अहिंसात्मक विचार के समानांतर दरिद्रनारायण के प्रति मानवीय हमदर्दी का गांधी मार्ग तय करने के लिये हेरिटेज खादी को आदर्श मानकर बढ़ा जाये। खादी रिफार्म व मल्टी नेशनल ब्रांड खादी को चलाने के लिये भी एम.एस.एम.ई. मंत्रालय को हेरिटेज खादी वालों की सहायता की दरकार रहेगी ही। बाल विजय व उनके सहयोगियों का समर्थन अगर एम.एस.एम.ई. मंत्रालय हासिल नहीं कर सका तो उनका खादी मार्क कानून केवल मंत्रालय की अल्मारी की ही शोभा बढ़ायेगा इसलिये एम.एस.एम.ई. मंत्रालय को चाहिये कि वह हेरिटेज खादी व वालमार्ट में बिकने वाली खादी के बीच एक सेतु का निर्माण करे। हेरिटेज खादी वालों का एक ग्रुप गठित किया जाये जो संयुक्त राष्ट्र संघ के अलावा प्रत्येक राष्ट्र राज्य में भारतीय दूतावासों में हेरिटेज खादी के मार्फत मल्टी नेशनल ब्रांड खादी रिफार्म की आमद सुनिश्चित करे। यह सौभाग्य की बात है कि भारत के वर्तमान विदेश मंत्री उस राज्य से आते हैं जहां डा. जाकिर हुसैन ने बेसिक एजुकेशन के मार्फत चर्खा कातने का अभ्यास महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में 1929-30 से ही शुरू कर दिया था। आज की जरूरत हिन्दुस्तान के बुनकरों की दस्तकारी विश्व भर के हर भारतीय राज दूतावास में पहुँचाने की है। बुनकरों व कतकरों को फिर उनकी ताकत का अहसास कराने के लिये बाल विजय के नेतृत्त्व वाले हैरिटेज खादी के पुरोधाओं व एशियन डेवलपमेंट बैंक की निधियों से खादी रिफार्म का नक्शा बनाने वाले खादी रिफार्म का राग अलाप रहे लोगों के बीच निम्न महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर आधारित तात्कालिक संवाद की सख़्त जरूरत है। कौन क्या करे ?
उत्तिष्ठ, जाग्रत, वरान्निबोधयत्।।
10. हैरिटेज खादी वाली बाल विजय जी की बात अंतर्मन को छू रही वह पीड़ा है जो गांधी की राष्ट्रीय विरासत वाली खादी के क्रमिक ह्रास की ओर भारत के अवाम का ध्यान आकर्षित कर रही है। गांधी विचार, गांधी विरासत यहां तक कि गांधी का अहिंसा आधारित सत्याग्रह देश के नौजवानों में एक नयी आकर्षक धार लेकर आरहा है। सिविल नाफर्मानी सहित सत्य, अहिंसा की वैचारिक ओजस्विता गांधीगिरी के नये अवतार में उदय होरही है। जिन लोगों ने महात्मा गांधी का सान्निध्य हासिल किया वे भाग्यशाली थे। उन्होंने हिन्दुस्तान को नया निखार देने वाला गांधी मार्ग अपनाया। हिन्दुस्तान के लोगों में ज्यादा संख्या उन लोगों की है जिनकी मजहबी आस्था उन्हें झकझोरती और कहती है - ‘ऋण न मुच्यते काशी’। अगर आप ऋणी हैं तो काशी के दशाश्वमेघ घाट में किया हुआ गंगा स्नान आपको, यदि आप पुनर्जन्म व परलोक की कल्पना में यकीन करते हैं, आपको मुक्ति या मोक्ष तब तक नहीं मिल सकता जब तक आप त्रिविध ऋण से उऋण न हो जायें। हिन्दुस्तान में उन लोगों की भी एक बड़ी जमात है जिनका आस्थागत विश्वास उन्हें झकझोरता रहता है कि अगर आप कर्जदार हैं अपनी हज यात्रा मक्का शरीफ में जाकर काबा में कलमा पढ़ने के बावजूद संसार के नियन्ता ‘खुदा-अल्लाह’ को आपका हज कबूल नहीं होगा। इसलिये महात्मा गांधी वाला रास्ता, वह रास्ता जिससे होकर सधुक्कड़ी साखियों के जरिये जन जन को आगाह किया, बार बार बाजार में खड़े होकर ऐलान किया ‘कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ’ अपनाना ही होगा।
11. कबीर की सधुक्कड़ी या दखिनी ‘भारत की लिंगुआ फ्रांका’ थी। आसेतु हिमाचल सन्यासियों व व्यापारियों के पारस्परिक संपर्क की बोलचाल थी। संस्कृत के विद्वान संस्कृत भाषा में विमर्श करते। इस्लाम के भारत आगमन से पहले खासदारों की भाषा संस्कृत, आमदारों की भाषा प्राकृत थी। प्राकृत व संस्कृत में चोली दामन का संबंध इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात सिंध सरीखे प्रदेशों में अरबी व उत्तर भारत में पारसी राजदरबार की भाषा बन गयी थी। सरकारी हुक्मनामे फारसी में जारी होते। जहां हिन्दू राजा शासक थे वे संस्कृत व तद्भव स्थानीय भाषा में राजकाज चलाते थे पर बाजार में बोली जाने वाली लश्करी-रेखता या उर्दू के समानांतर सधुक्कड़ी ही जन जन के बीच विमर्श व व्यापार का माध्यम थी। महात्मा गांधी जब 1918 में कोलकाता से मुजफ्फरपुर होते हुए चंपारण के गांवों के लोगों की दिशा-दशा देखने उत्तर बिहार जिसे तब तिरहुत कहा जाता था वहां पहुंचे, उनका जो संवाद गांव के निरक्षर पर गुणी लोगों से हुआ उसमें उन्होंने पाया कि तिरहुत के गांवों के हिन्दू मुसलमान एक ही भाषायें बोलते हैं। वह वज्जिका है। बिहार प्रदेश की दूसरी जन भाषायें मैथिली, मगही, अंगिका व भोजपुरी थीं। जिसे अब हम झारखंडी के नाम से जानते हैं वहां संथाली तथा छोटा नागपुरी उप भाषायें जन सामान्य द्वारा बोली जाती थीं पर व्यापारियों व साधु-संतों की भाषा सधुक्कड़ी समूचे भारत की संपर्क भाषा थी। यही कारण है भारत भ्रमण के द्वारा हर इलाके की जनभावना हृदयंगम करने के पश्चात महात्मा गांधी भारती लोक नाड़ी वैद्य का मानव सेवा का अद्वितीय कार्य संपादन किया। हिन्दुस्तान की पुरातन संस्कृति को महात्मा ने राष्ट्रीय परिवेश दिया।
12. खादी को वह महत्ता क्यों मिली ? गांधी ने जब चंपारण के गांवों की गरीबी को नजदीक से हृदयंगम किया तब उन्होंने भी अपने लिये न्यूनतम कपड़ों की जरूरत तय की। उनका यही आदर्श जहां भारत के आम लोगों को भा गया वहीं गांधी का अंतर्मन हर हिन्दुस्तानी का जीवनादर्श बना। यही जीवनादर्श गांधी विरासत वाली खादी है। गरीबी का प्रकोप इस देश में तब भी था जब बर्तानी शासक राज करते थे। आज भी अपना स्वराज होने के बावजूद भारत में गरीबी का कहर है। महात्मा गांधी ने अपनी निजी कपड़ा जरूरत को उस सीमा तक मर्यादित रखा जहां आबाल वृद्ध नर नारियों को तन ढकने के कपड़े की जरूरत थी। गांधी ने जहां स्वयं गरीबी को ओढ़ा हिन्दुस्तान के खुशहाल लोगों को भी ओढ़ी हुई गरीबी अपनाने के लिये प्रेरित किया। ओढ़ी हुई गरीबी को पश्चिमी विचारकों ने (Adopted Poverty) कहा। राजा, रईस व रंक में मानवीय भेदभाव न रहे, गरीब में भी वह साहस पैदा हो कि वह राजाओं रईसों के सामने सीना तान कर खड़ा हो सके। गांधी की आजादी की मुहिम हाथ कते, हाथ बुने परिधान के जरिये देश में एक ऐसा वातावरण तैयार करने में सफल हुई जिसने खादी का माहौल बनाया। भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की खादी के लिये श्रद्धा, सहानुभूति थी। जब तक पंडित नेहरू रहे उन्होंने खादी वालों की हर मांग को ग्रामीण औद्योगीकरण के परिप्रेक्ष्य में लिया। खादी के मूर्धण्य नेताओं से पंडित नेहरू की वैयक्तिक भिन्नता थी। पंडित नेहरू के पश्चात सरकार व खादी वालों में खींचतान शुरू हो गयी। खादी को भी दलीय राजनीति का कोपभाजन बनना पड़ा। राजनीतिक हितों की टकराहट ने उछंगराय नवलशंकर ढेबर सरीखे राजनेता रहे व्यक्ति को वैकुंठ भाई के पश्चात नौ वर्ष तक खादी आयोग का सदर रहने पर भी मार्मिक पीड़ा थी कि उन्हें केन्द्रीय सचिवालय में अनुसचिव स्तर के अधिकारी की चिरौरी मनौती करनी पड़ रही है जबकि उनके पूर्वाधिकारी रहे वैकुंठ लल्लू भाई मेहता जब भी मुंबई से दिल्ली आते पंडित नेहरू व पंडित पंत से मिलने का समय लेते जो उन्हें एक ही बार फोन करने पर मिल जाता। वे कहते कि लालबहादुर जी को कह दो कि वैकुंठ भाई आये हैं। वाणिज्य मंत्री लालबहादुर शास्त्री स्वयं वैकुंठ भाई से मिलने कोटा हाउस के कमरा नं. 6 में जाकर खादी ग्रामोद्योग आयोग के पहले सदर से मिलते थे। जब भारतीय संसद ने खादी ग्रामोद्योग अधिनियम L.X.I.1956 पारित किया, राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक कानून उसी अवधि में बने थे। खादी ग्रामोद्योग आयोग तब तक फलता फूलता रहा जब तक वैकुंठ मेहता उसके सदर रहे। वैकुंठ भाई की विशेषता यह थी कि वे आम सहमति के कार्यक्रमों को ही बढ़ावा देते थे। उनका जीवन दर्शन विकेन्द्रित अर्थांग था। उनमें कार्यकर्त्ता मात्र से सीधा संपर्क रखने का महामानवीय गुण था। वे जब तक आयोगाध्यक्ष रहे, आयोग मुख्यालय व आयोग के चारों जोनल कार्यालय व नयी दिल्ली के सघन क्षेत्र विकास कार्यालय के हर कार्मिक को सुनते थे। उनका मार्गदर्शन करते थे। सघन ग्राम विकास व ग्रामीण प्राथमिकताओं को मजबूत करना उनकी प्राथमिकता थी। वैकुंठ भाई के आयोग से रूखसत होने के पश्चात पहली अप्रेल 1963 से खादी आयोग में बौसिज्म ने दस्तक दी। पिछले पचास वर्ष में खादी संस्थाओं में भी बौसिज्म ने अपने पांव पसार लिये जिसका परिणाम सामने है। हैरिटेज खादी वाले गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं उन्हें खादी कमीशन व एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के शाही फरमानों को नहीं मानना है। वे अपनी उस स्वायत्तता के आकांक्षी हैं जो उन्हें वैकुंठ लल्लू भाई मेहता, प्राणलाल कापडि़या, श्रीमन्नारायण, आर. श्री निवासन, द्वारकानाथ लेले एवं अण्णा सहाय बुद्धे के आयोग सदस्यतावधि पहली अप्रेल 1957 से 31 मार्च 1963 पर्यन्त व्यावहारिक व क्रियात्मक रूप से उपलब्ध थी। वैकुंठ मेहता व उनकी टीम के सभी पूर्णकालिक सदस्य आयोग द्वारा सीधे वित्त पोषित संस्थाओं को वही रूतबा देती थीं जो विभिन्न राज्यों के कानून सम्मत स्वायत्तशासी राज्य खादी ग्रामोद्योग मंडलों को उपलब्ध था। वार्षिक बजट प्रबंधन का जो सिलसिला वैकुंठ मेहता ने आयोग बनने पर 1957 में निश्चित किया था वह पूरे 6 वर्ष विधिवत चलता रहा। खादी फंड व ग्रामोद्योग फंड से राज्य खादी ग्रामोद्योग मंडलों व सीधी वित्त पोषित संस्थाओं का वित्तीय सहायता तकनीकी सहायता तथा संगठनात्मक ढांचा बदस्तूर मिलता रहा। ढेबर कमीशन, रामचंद्रन कमीशन, घनश्याम ओझा कमीशन, थामस कमीशन, सोमदत्त कमीशन फिर थामस कमीशन में वैकुंठ भाई द्वारा बराबरी का दर्जा साझा होता रहा। जब तक खादी ग्रामोद्योग आयोग में चर्खा संघ व विभिन्न खादी संगठनों से जुडे़ कार्यकर्त्ता काम करते रहे आयोगाध्यक्षों के बदलने के बावजूद वैकुंठ भाई का विकेन्द्रित अर्थांग अपनी पकड़ बनाये रखा। वैकुंठ भाई खादी प्रबंधन के आखिरी सदर एम.एस.थामस को परिदृश्य से उनके ओझल हो जाने के पश्चात खादी कमीशन महाजन और खादी संस्था ‘कर्जदार’ होगयी। साहूकार व कर्जदार इस राम कहानी ने जवाहरलाल नेहरू के उस वक्तव्य की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी जो उन्होंने अक्टूबर 1956 में खादी ग्रामोद्योग आयोग प्रदर्शनी के उद्घाटन के वक्त ग्रामीण औद्योगीकरण की पृष्ठभूमि बताते हुए व्यक्त किये थे। उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने के.वी.आई.सी. विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत करते समय राष्ट्र राज्य के 6 लाख से ज्यादा गांवों का औद्योगीकरण का पथप्रदर्शक बताया था।
13. श्रीमती इंदिरा गांधी के दिवंगत होने के पश्चात राजनीतिक अफरातफरी का युग शुरू होगया था। इंदिरा जी ने ए.एम. थामस के साथ गोविन्द दास रिछारिया व जगपत दुबे को आयोग का सदस्य बनाया। डा. रिछारिया जब अपने लिये राज्यसभा सदस्यता जुटाने में सफल हो गये, मथुरा के राजनीतिज्ञ श्री लक्ष्मीरमण आचार्य को खादी आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। आयोग के तीन सदस्यों का पारस्परिक विवाद बढ़ता रहा। उन्हें रोकने वाला तो कोई था ही नहीं। खादी आयोग की दुर्दशा यहीं से शुरू हुई नतीजतन जो संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत हुआ और पारित भी होगया उसके अनुसार खादी आयोग की स्वायत्तता जाती रही। सदस्य अंशकालिक होगये, केवल अध्यक्ष व दो सरकारी सदस्य ही पूर्णकालिक रहे। संभवतः तत्कालीन उद्योग मंत्री ने सोचा कि बैंको की तरह आयोग के सदस्य भी अंशकालिक हों। 2004 में खादी आयोग का भंग होना फिर 2006 में खादी आयोग के पुनर्गठन के समय कई एक नामीगिरामी अखबारों ने छापा कि खादी आयोग की अध्यक्षता की मार्केट कीमत पांच करोड़ है। सदस्यों सहित उपसमितियों वगैरह में भी जगह पाने के लिये वित्त विनिमय होने की बातें होती रहती हैं। जहां ऐसी आपाधापी हो, हैरिटेज खादी के सैद्धांतिक दावेदार अपनी खादी मेढी को कैसे बचा कर रखें। उन्हें आयोग व मंत्रालय नौकरशाही के साथ साथ खादी पर दलाली करने वाले बिचौलियों का भी मुंह मीठा करना ही होगा। इसलिये जो हैरिटेज खादी वाले यह समझते हैं कि उन्हें खादी को जिन्दा रखना ही है तो उन्हें भारत सरकार को चलाने वालों के राजनीतिक तंत्र को यह बताना ही होगा कि केवल गांधी विचार ही भारतीय राष्ट्र की राजनीति की चेतना को जाग्रत रख सकता है। उन्हें सरकार के मुखिया व दूसरे राजनीतिक दलों को यह कहना ही होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ महात्मा गांधी जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मना रहा है। भारत सरकार विश्व संगठन से कहे कि संयुक्त राष्ट्र संघ में गांधी दीर्घा की स्थापना हो जिसमें खादी व माइक्रो क्राफ्ट सहित विश्व भर की हाथ दस्तकारी का अहिंसा के मसीहा की स्मृति में महात्मा गांधी संग्रहालय स्थापित किया जाये। महात्मा गांधी ने अपनी मातृभाषा गुजराती में जो जो विचार व्यक्त किये उन्हें विश्व अहिंसा दीर्घा में अभिव्यक्ति मिले। भारत सरकार अपने प्रत्येक राजदूतावास में उस देश की भाषा, अंग्रेजी, हिन्दी व गुजराती में गांधी साहित्य उपलब्ध करे । विश्व के हर दूतावास में विश्व अहिंसा दिवस के अलावा महात्मा गांधी की अपनी जयंती मनाने की - चर्खा जयंती का आयोजन हो। गांधी आत्मकथा - सत्य के प्रयोग दुनियां भर की भाषाओं में उपलब्ध कराने में भारतीय विदेश मंत्रालय अपने राजदूतावासों को प्रेरित करे। राष्ट्र संघ सहित प्रत्येक राष्ट्र राज्य के भारतीय दूतावास में गांधी की खादी के परिधान उपलब्ध कराने बाबत एम.एस.एम.ई. मंत्रालय अपने प्रशासन तंत्र को सक्रिय करे।
14. राष्ट्र संघ सहित विश्व में हर देश में गांधी पंरपरा गांधी जीवन दर्शन उकेरने के लिये भारत सरकार महात्मा गांधी अहिंसा न्यास का गठन करे। देश के प्रत्येक घटक राज्य कम से कम दो और अधिक से अधिक पचीस सदस्यों वाला विश्व अहिंसा विचार पोखर (Global Non Violence think tank) गठित करना चाहिये जिसमें कम से कम 125 व ज्यादा से ज्यादा 250 सदस्य हों। महात्मा गांधी राष्ट्रीय न्यास के अंतर्गत सभी गांधी प्रवृत्तियां समेकित हों। महात्मा गांधी राष्ट्रीय अहिंसा न्यास की सदस्यता केवल राजनीति निरपेक्ष लोगों को ही दी जाये। भारत सरकार एक बार सभी गांधी पंथियों को एक मंच पर इकट्ठा कर उनकी राय जान कर गांधी 150वीं जयंती से पूर्व महात्मा गांधी समग्र मानव मंत्रणा सुनिश्चित कर जिस तरह अमेरिका ने अब्राहम लिंकन को राष्ट्र का प्रतीक माना है, महात्मा गांधी आधुनिक भारतीय राष्ट्र राज्य के प्रतीक पुरूष घोषित हों। इसलिये गांधी विचार से जुड़े हर संगठन को उत्तिष्ठ, जाग्रत, वरान्निबोधतयत् के तिराहे पर दस्तक देनी ही होगी।
प्रत्येक हैरिटेज गांधी संस्था को अपना इतिहास व्यक्त करते हुए गांधी हैरिटेज संस्था डौसियर तैयार करना होगा जिसमें सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन कानून 1860 अथवा किसी राष्ट्रीय/घटक राज्य कानून के तहत स्थापित ट्रस्ट अथवा (Non Profit earner Company) 1.स्मृति पत्र 2. संस्था के मूल संस्थापकों का वैयक्तिक परिचय 3. संस्था प्रबंधन मंडल में विभिन्न अवधियों के कार्यशील पदाधिकारी तथा सदस्यगण 4. संस्था की स्वामित्त्व वाली परिसंपदा (भू, भवन अचल संपदा) सहित संस्था के पिछले दस वर्षों का वार्षिक लेखा पत्रक 5. संस्था द्वारा दिवानी व फौजदारी मामले जो विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं 6. संस्था की कार्मिक संख्या व वार्षिक वेतन सहित राशि 7. गांधी हैरिटेज से संबद्धता संबंधी दस्तावेजी सबूत, संस्था स्मृति पत्र की ताजा प्रति व विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा पारित कानूनों के अनुसार संस्था की कानूनी वैधता।
जागरूक होकर देश के वर्तमान कानूनी परिवेश में गांधी हैरिटेज संरक्षा के लिये संस्था का सर्वसम्मत अभिमत खादी मार्क मल्टी ब्रांड खादी के लिये एम.एस.एम.ई. मंत्रालय ने कमर कस रखी है। यद्यपि समग्र रूप से समीक्षा करने पर यह लगता है कि एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के माइक्रो, स्माल व मीडियम तीनों सेक्टरों का निर्यात चार प्रतिशत घट गया है। गांधी हैरिटेज संस्थायें एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के माइक्रो क्राफ्ट सेक्शन व मंत्रालय के के.वी.आई.सेक्शन से गांधी विरासत खादी की स्वायत्तता के लिये संवाद स्थापित करे। हैरिटेज खादी यह संकल्प ले कि यदि भारत सरकार 15.8.47 से पूर्व स्थापित खादी संस्थाओं, गांधी संस्थाओं को मंत्रालय के खादी मार्क खादी रिफार्म व मल्टी ब्रांड खादी को सटीक दिग्दर्शन कराने के लिये अ.भा. खादी प्रशिक्षण व अनुसंधान संस्थान की इकाई के रूप में मंत्रालय पूर्ण वित्त पोषण करे।
सन्मार्ग की खोज
15. गांधी विचार, गांधी दर्शन व गांधी के निजी वैयक्तिक आदर्श वाला गंवई गांव से लेकर भारत के सत्ता केन्द्र दिल्ली तक राज-राजतंत्र व तंत्र की विविध व्यवस्था प्रविधियों के समानांतर गांधी से जुड़े लोगों ने भी एक नया संसार रचा। गांधी की आध्यात्मिक एवं सत्याग्रह आधारित जीवन शैली की बुनियाद आसेतु हिमाचल गांधी की अनेकानेक प्रस्तर प्रतिमाओं की स्थापना करते करते अनेक गांधी विरासत मेढियां भारत में यत्र तत्र सर्वत्र आज भी देखने में आरही हैं। गांधी जीवन काल में ही गांधी सेवा संघ गांधी आश्रम सरीखी संस्थाऐं अस्तित्त्व में आगयी थीं। भारत में आयी आधुनिकता के समानांतर गांधी के सान्निध्य में मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है। इस वैचारिक सिद्धांत के आधार पर भारतीय वाङ्मय में - साबरमती अहमदाबाद में आश्रम स्थापित करने के पश्चात ही महात्मा गांधी 1914-15 से भारतीय जनमानस में छा गये। जब उन्होंने दूधा भाई के कुटुंब को कोचरब आश्रम का एक हिस्सा बनाया, अस्पृश्यता निवारण का बीड़ा उठाया। गुजराती वैष्णव समाज जो उन्हें अपना मानता समझता था तथा आश्रम चलाने के लिये स्वैच्छिक वित्त पोषण भी करता था, महात्मा गांधी से एकदम बिफर गया। गुजरात के वैष्णव संप्रदायी हिन्दुओं ने महात्मा गांधी से असहयोग कर डाला। कोचरब आश्रम की दिनचर्या पर जब असर पड़ने लगा, ‘‘अहिंसा परमोधर्मः’’ के निष्णात जैन धर्मावलंबी मिल मालिक सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के अस्पृश्यता निवारण यज्ञ के लिये तेरह हजार रूपये की थैली सौंप कर आश्रम के चलते रहने का प्रबंध किया। वैष्णव बनिया समूह की असहयोगकारी हरकतों से महात्मा गांधी ने अपने कदम पीछे नहीं किये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये वसंत पंचमी पन्द्रह फरवरी 1915 को महात्मा जी ने अपनी आत्मिक पीड़ा वड़ील महामना मदन मोहन मालवीय को बतायी। महात्मा मालवीय जी से जानना चाहते थे कि क्या छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? यदि हां तो प्रमाण क्या हैं ? महामना मालवीय जी उस समाज से आते थे जो परंपराओं का परिपालन करते थे। मालवीय जी ने महात्मा जी की शंका निवारण करने में शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करने में अपनी निजी असमर्थता व्यक्त की पर महात्मा गांधी को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापना दिवस की भरी सभा में आश्वासन दिया कि वे काशी विद्वत् समाज की राय मालूम कर महात्मा जी की शंका का समाधान करेंगे। मालवीय जी महात्मा जी को साथ लेकर सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन के घर गये। उनके सामने गांधी जी की समस्या उठायी। राधाकृष्णन ने महामना-महात्मा द्वय को एक पखवाडे़ में सनातन शास्त्र सम्मत राय बताने का वादा किया। डा. राधाकृष्णन ने महामना मालवीय व महात्मा गांधी की विशाल मानवीय हृदयता का उल्लेख किया कि उनके सरीखे साधारण अध्यापक के घर आकर महात्मा गांधी व मदन मोहन मालवीय ने उन्हें कृतार्थ किया। जब राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को यह बताया कि अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है, मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता तो महात्मा गांधी ने छाती फुला कर उद्घोष किया कि हिन्दू समाज से अस्पृश्यता निवारण उनकी पहली प्राथमिकता है।
16. आज के हिन्दुस्तानी समाज की मूर्धण्य आवश्यकता ही यह है कि गांधीवादियों को सिलसिलेवार गांधी विचार से अवगत कराया जाये। गांधी विरासत को अपना आदर्श मानने वाले गांधीवादियों को सबसे पहले उनके अपने बीच घुस गये प्रचंड पाखंड का निवारण करना होगा। महात्मा गांधी की साफगोई अपनानी होगी। महात्मा जब दिल्ली आते, सेठ घनश्यामदास बिड़ला उन्हें हरिजन सेवक संघ किंग्जवे कैंप लाना नहीं भूलते। गांधी जी हरिजन सेवक संघ की प्रार्थना सभा में बिना नागा सम्मिलित होते थे। पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट के पास चिटगल नामक गांव के मित्रदेव पंत हरिजन सेवक संघ के लेखाकार थे। पूरी तरह गांधी जीवन शैली को समर्पित मित्रदेव के हिसाब व उनकी लिखावट की महात्मा गांधी जहां जाते प्रशंसा करते रहते। मित्रदेव पंत के वृद्ध पिता प्रयाग दत्त विधुर थे, बेटे के साथ रहते थे। छुआछूत पर यकीन भी करते थे। वैयक्तिक आचरण में छुआछूत मानते भी थे। लकड़ी धोकर खाना बनाने वाले ब्राह्मणों में से थे। यद्यपि प्रयाग दत्त पंत ज्यादा समय घर के अंदर ही रहते तथापि उनका सामाजिक दायरा अपनी पीढ़ी के कुछ ब्राह्मणों व बुजुर्गों तक ही सीमित था। प्रार्थना सभा से पहले किसी मनचले युवा ने मित्रदेव पंत के घर में छुआछूत मानने की बात महात्मा जी के संज्ञान में ला दी। उन्होंने मित्रदेव को संबोधित कर कहा - उसके घर में छुआछूत मनायी जाती है। मित्रदेव ने महात्मा को सफाई दी कि वे स्वयं छुआछूत पर यकीन नहीं करते पर अपने वृद्ध पिता को अनुशासित करना उनके स्वधर्म का अंग नहीं बन सकता। महात्मा मित्रदेव की काबिलियत व परिश्रमशीलता के प्रशंसक थे पर उन्होंने फैसला लिया कि मित्रदेव हरिजन सेवक संघ के परिसर में नहीं रह सकते। महात्मा गांधी ने घनश्यामदास बिड़ला से कहा - मित्रदेव के लिये आवश्यक इंतजाम बिड़ला मिल में करो।
17. छुआछूत वाली उपरोक्त घटना मैंने इसलिये लिखी क्योंकि आज भी पूरे पाश्चात्य रंग में रंग जाने के बावजूद अपने को सवर्ण कहने वाले हिन्दू छुआछूत मानते हैं। गांधीवादियों में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो छुआछूत मानते हैं तथा दलित समाज को हिकारती नजर से देखते हैं। मौका आने पर उनका सामाजिक अपमान करने से भी नहीं चूकते इसलिये प्रचंड पाखंड का परित्याग करने, गांधी-प्रार्थना सहित गांधी एकादश व्रत गांधीवादी अपनी नित्य नैमित्तिक जीवनचर्या का अनिवार्य अंग बनाने आगे आयें। आजादी के संघर्ष युग में जो समता दिखती थी वह फिर समाज में जाग्रत हो, गांधीवादियों का यह नैतिक कर्त्तव्य है कि वे भारत के सामाजिक जीवन को पुनः संवेदनशील बनाने के लिये पुरजोर तरीके से आगे आयें। श्रीमद्भगवद्गीता में अठारहों अध्यायों के श्लोक सात सौ हैं, उवाच (वचन) धृतराष्ट्र एक, संजय नौ, अर्जुन 21 तथा श्री भगवान 28 हैं। सांख्ययोग के ५४ वें श्लोक से ७२ वें श्लोक के अठारह समुच्चय जिनमें दो उवाच हैं स्थितप्रज्ञता का परम आदर्श है। महात्मा गांधी को यही स्थितप्रज्ञता भाती थी। वे अपनी नित्य प्रार्थना में सांख्ययोग के इन अठारह श्लोकों के जरिये ही स्तुति प्रार्थना की महत्ता के बल पर गांधी विरासत को हिन्दुस्तानियों को उपलब्ध करा सके।
18. गांधी एकादश व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, अपरिग्रह, अस्वाद, शरीर श्रम, सर्वधर्म समभाव, स्पर्श भावना तथा स्वदेशी व ब्रह्मचर्य का अपने अपने क्षेत्र में कायिक, वाचिक व मानसिक महत्त्व है। गांधी युग में अनेक ऐसे गांधी साधक हुए जो उपरोक्त सभी एकादश व्रतों के लिये समर्पित थे। महात्मा गांधी ने अपने व्यक्तित्त्व स्तर पर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, अस्वाद, शरीर श्रम, स्पर्श भावना तथा स्वदेशी के महत्त्व को उजागर किया। ब्रह्मचर्य उनका वैयक्तिक आचरण था। उनके अनुयायियों से यह आशा तो नहीं की जा सकती कि वे दूसरे गांधी बनें पर इन व्रतों में जितने भी अपनाये जा सकें उसकी ओर प्रवृत्त हों। देखने वाले को लगे कि गांधी विरासत की खादी पहनने वाला, गांधी विरासत का काम करने वाला गांधी आदर्शों के प्रति कितना संवेदनशील है। आज जरूरत इस बात की भी है कि गांधी हैरिटेज से जुड़े लोग पारस्परिक विचार विमर्श करते रहें। भारतीय समाज को गांधी आदर्श की ओर प्रेरित करें। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार की जो गहरी पैठ होगयी है उसके प्रभाव को कम करने के लिये एक ही उपाय है। हिन्द स्वराज में गांधी जी ने 103 वर्ष पहले जो कहा जो लिखा उसकी पहली पाठशाला गांधी हैरिटेज खादी संस्थानों के विमर्श केन्द्र हों। कितना भी सख्त कानून हो वह भ्रष्टाचार व कदाचार को निर्मूल नहीं कर सकता। कदाचार व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिये सदाचार विमर्श करना होगा। भ्रष्टाचारी व्यक्ति से हमें सहानुभूति रखनी होगी। भ्रष्टाचार नेस्तनाबूद हो ऐसे तौर तरीके ईजाद करने होंगे। गांधी हैरिटेज वाले लोग आज भी इस स्थिति में हैं कि वे अपने बीच के भ्रष्टाचार को रोक सकें तथा पार्श्ववर्त्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ लोक भावना जाग्रत कर सकें।
आजकल दूरदर्शन चैनलों व समाचार जगत में कदाचार, अमानवीय हिंसा तथा आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टता के ही समाचार ज्यादा नजर आते हैं। लोग इन समाचारों को चटखारे लेते हुए सुनते व पढ़ते ही हैं। खबरों को सनसनीखेज बनाने की नयी कला भी वाणी कौशल व कलम के धनी लोगों ने इस तरह अपना ली है कि खबरों का बाजार हमेशा गर्म ही रहता है। शिष्ट, शालीन व वाणी विलास की प्रेरक भाषा का उपयोग करने के बजाय पत्रकार बन्धुओं ने मिर्च मसाले के भरपूर उपयोग से चटपटा बना कर श्रोताओं व पाठकों को अपना स्थायी ग्राहक बना डाला है। व्यवहार एवं वार्त्तालाप में जो शब्द आज खबरों की टकसाल से निकल रहे हैं वे ज्यादातर मामलों में संकर हैं जिसे अंग्रेजी भाषा Hybrid कहती है। इसलिये हैरिटेज गांधीवादियों को सबसे पहले अपनी प्रामाणिकता साबित करनी होगी। गांधी विनोबा का दायभाग जपने से वे अपने अस्तित्त्व को स्थायित्त्व देने की क्षमता अर्जित नहीं करेंगे इसलिये सबसे पहले उन्हें साफगोई के साथ आपस में मशविरा करना होगा। तो हैरिटेज गांधीवादियों को क्या करना है ? क्या नहीं करना है ? ये दो प्राथमिकतायें सबसे पहले तय करनी होंगी।
19. गीता के सवाल कि ‘‘कर्मम किम् अकर्मेति कवयोप्यत्रमोहिता’’ का पुनराभ्यास करना होगा।सामाजिक तौर पर वे तभी निश्चय कर सकेंगे जब उनमें सहज संवाद कायम होगा। भक्त प्रह्लाद व महात्मा गांधी सरीखे निर्वैर भाव से अपने विचार का मंडन करते समय सामने वाले के विचार का खंडन करने से पहले मनन करना होगा। विमर्श करना होगा कि अगले व्यक्ति की वाणी की विशेषता क्या है ? संत विनोबा का वह सिद्धांत अपनाना होगा कि पहले समान विचार वाले बिन्दुओं का निर्धारण कर सामूहिक मेधा से सामूहिक चिंतन करो तब निर्णय लो। मतभेद वाले बिन्दुओं को पृष्ठभूमि में रखो। अगर आपका साथी सहयोगी आपकी कटुतम आलोचना कर रहा हो तो धैर्य से काम लो। मतभेद के खात्मे के लिये मध्यम मार्ग का अनुसरण करने पर ही सामाजिक दोषों का निवारण किया जा सकता है। भारतीय वाङ्मय में 'एवं' शब्द संस्कृत सहित अधिकांश भाषाओं में उपयोग में आता है जिसे धूर्त संज्ञा दी जाती है। महात्मा गांधी ने अपने अभिव्यक्त विचारों में यह स्वीकार किया कि अपने आदर्श की प्राप्ति के लिये वे धूर्तता के स्तर तक भी जाने के लिये तैयार हैं पर महात्मा द्वारा अपनायी जाने वाली धूर्तता परपीड़ाकारक नहीं थी। इसलिये विरासत वाली गांधी परंपरा को निरंतरता देने के लिये हैरिटेज वादी गांधी विचारकों को सतत पारस्परिक संवाद की शुरूआत करनी ही होगी। वे न तो राजा हैं न दस्यु। राजा व दस्यु दोनों के पास राजसत्ता व दस्युसत्ता के बाहुबल हैं पर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अभय, अपरिग्रह, अस्वाद, शरीर श्रम, सर्वधर्म समभाव तथा अस्पृश्यता निस्तारण के संकल्पकर्त्ताओं को वैयक्तिक श्रद्धा तथा सामूहिक साधना से ही अपने मार्ग को तय करना होगा तथा सामने वाले के अस्तित्त्व को स्वीकार करके ही लक्ष्यभेद के तरीके तय करने होंगे।
20. बाल विजय ने जो सवाल किया है Survive or Perish उसके बारे में वाल मार्ट में कौन खादी बिके ? मल्टी नेशनल खादी को हैरिटेज खादी अंतर्राष्ट्रीय मानवीय स्तर में बढ़ने से रोके या उसकी बढ़त को विकासशील राष्ट्र राज्यों की जरूरत से जोड़ कर देखा जाये। गांधी के भारतीय दरिद्रनारायण को विश्व पटल से दारिद्र्य दुःख निवारण के प्रमुख कारक के रूप में स्थापित कर हैरिटेज खादी वाले मल्टी ब्रांड खादी से सहअस्तित्त्व का नया तोरण बना सकते हैं। स्वयं स्वावलंबी बने रह कर स्वावलंबन का आदर्श दुनियां भर के गरीब राष्ट्रों के सामने रखना गांधी की हैरिटेज खादी का आदर्श हो। भारतीय संसद सहित समूचे शासन तंत्र में गांधी विरासत पुनर्जीवित की जाये। लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के समानांतर गांधी अनुयायी समूह स्वयं सेवी लोकाधारित राष्ट्रीय चौकसी तंत्र का संवर्धन करे। लोकतंत्र, एकतंत्र या सैन्यजुण्टा तंत्र में तब्दील न हो इसके लिये पार्लियामेंटरी राजव्यवस्था में अथवा वेस्ट मिनिस्टर शासन तंत्र के समानांतर एक-एक सतर्कता संगठन की जरूरत है जिसमें समाज के वे लोग जो शासन तंत्र की चौकसी स्वयं सेविता के आधार पर कर सकें जिसे कुछ लोग सिविल सोसाइटी भी कहते हैं। ऐसा स्वयं सेवी तटस्थ विचारकों का समूह लोकतंत्रात्मक, राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक स्तम्भों पर तटस्थ नजर रख कर व्यापक सामाजिक हित को दृष्टि में रखते हुए राजव्यवस्था के समानांतर जो नीति सम्मत मंत्रणा दाता समान हो वह भारत सरीखे देश में गांधी मार्गी समाज संपन्न कर सकता है। भारत इस समय विश्व का सबसे बड़े आकार वाला लोकतंत्र है। आजादी के बाद विभिन्न झंझावतों के बावजूद भारत ने अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता को बरकरार रखा है। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में एक शताब्दी पहले जो चेतावनियां दीं उसका चिंतन मनन करने तथा सत्याग्रह व अहिंसा के मार्ग से समय समय पर उपस्थित होने वाली समस्याओं का समाधान गांधी विचार में निहित है। जरूरत है उस पर सोद्देश्य बहस शुरू कर आसन्न समस्याओं का समाधान खोजना। लोकतंत्र में संवाद ही एक ऐसा साधन है जो आसन्न कठिनाइयों से समाज को संरक्षण दे सकता है इसलिये गांधी मार्ग के बटोही जो स्वयं को गांधी दायभाग की विरासत पर खड़ा बता रहे हैं उनमें से हर एक के हाथ में गांधी हिन्द स्वराज (1906-1909) के गुजराती संस्करण के साथ साथ नागरी लिपि में इंगित गुर्जर वाणी हिन्द स्वराज व भारतीय लोकभाषाओं में हिन्द स्वराज के अनुवाद को हर गांधी वादी के हाथ में थमाया जाये। भारत आगमन के पश्चात महात्मा गांधी वाङ्मय का महत्त्वपूर्ण परिदृश्य अनासक्ति योग है। यह भी गुजराती वाङ्मय में है। गांधी विचार को हृदयंगम करने के लिये गांधी रचनायें हिन्द स्वराज व अनासक्ति योग का पुनराभ्यास आज युग की जरूरत मालूम पड़ती है। बालविजय को अपने अनुयायियों को यह समझाना ही होगा कि गांधी संवाद के बिना हैरिटेज गांधीवादी दृष्टिकोण को भारतीय समाज की आज दिशाहीनता की स्थिति से उबारना ही होगा।
30 जनवरी 1948 के दिन जीवन लीला के उन्यासिवें वर्ष में महात्मा गांधी ने पार्थिव शरीर छोड़ कर विशाल प्राण पुंज में प्रवेश कर लिया। शरीर रूपी मृण्मय पार्थिव घड़े का जल विशाल जलराशि का हिस्सा बन गया। प्राणवायु के अंतरिक्ष में प्रवेश से जीवात्मा परमात्मा का मिलन होगया। गांधी परिनिर्वाण के साथ साथ पिछले पैंसठ छियासठ वर्ष भारत का पार्लियामेंटरी स्वराज लोक द्वारा लोक हितैषी शासन तंत्र लोकशासन के रूप में संसदीय लोकतंत्र भारत में प्रभावी है। महात्मा गांधी की उच्च कल्पना का भारत पंचायती भारत था। पंच परमेश्वर की वह भावना जो मुंशी प्रेमचन्द ने अपने कथ्य में उभारी है और गांव या समूह का प्रबंधन न्यायतंत्र कम से कम शासन डंडा चलाये बिना किस तरह सत्याग्रह तथा अहिंसा की पृष्ठभूमि में लोकशासन का संबल बन सकता है।
इस तंत्र में शासन करने की डंडा नीति में हिंस्र पाशविक व्यवहार वाली शासन पद्धति में अहिंसा व सत्य के लिये बहुत ही सीमित क्षेत्र बचा रहता है। हिंसा सामूहिक कदाचार की प्रतीक है। अहिंसा के साथ अभय का होना व्यक्ति का वैयक्तिक गुण व विशिष्टता है। सत्य भी वैयक्तिक गुण है। इन दोनों को समूह (परिवार समाज व विशाल मानव समूह) में प्रवेश देने के लिये महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज में व्यक्त विचारों का मनन आवश्यक है। आज यत्र तत्र भारत में सर्वत्र मानवीय जीवन में पारिवारिक हिंसा सामाजिक हिंसा तथा उत्पीड़नजन्य हिंसा का बोलबोला है। गांधी ने अहिंसा का यह अस्त्र-निरायुध व्यक्तित्त्व पसंद कर हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को सत्याग्रह व अहिंसा के रास्ते पराधीनता के दुःख से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है, यह जीवन दर्शन स्वयं अपनाया। अपने अफ्रीका निवास के दौरान अपनी मातृभाषा गुजराती के जरिये जो पब्लिक ओपिनियन का बीड़ा उठाया उससे महात्मा गांधी के सत्य अहिंसा वाले वैयक्तिक जीवन यापन के साथ साथ समाज में न्याय मार्ग का अनुसरण निजी जिन्दगी में क्या कायाकल्प कर सकता है इसे महात्मा ने अपनी स्वराज कल्पना के आधार स्तम्भ के रूप में स्थापित किया।
गुरु शिष्य प्रयोजन की अद~भुत
प्रति प्रासंगिकता
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
प्रह्लाद का उत्तराधिकारी हिरण्याक्ष नन्दन अन्धक
‘‘क्रुद्धः पापन् न कूर्यात् कः क्रुद्धो हन्यात् गुरूनपि’’ अर्थात क्रोध व्यक्ति से कुछ भी न करने योग्य दुष्कर्म करा सकता है। दैत्येश्वर प्रह्लाद भी नारायण के संगी-साथी नर की बात सुन कर क्रुद्ध हो गये। प्रह्लाद ने तुमुल युद्ध की ठान ली। भक्त और भगवान के बीच हुए इस तुमुल युद्ध ने एक दूसरे पर प्रहार करना शुरू कर दिया। क्रोध की अग्निज्वाला दोनों तरफ से तीखे प्रहार कर रही थी। नारायण तो धर्म व अहिंसा दम्पत्ति के नंदन थे पर जब युद्ध का ज्वर सताने लगा तो दैत्यपति प्रह्लाद नारायण के प्रहार से मूर्च्छित हो धरती में गिर गये। किंचित् शक्ति पाने पर दैत्येन्द्र प्रह्लाद फिर नारायण के पास युद्ध हेतु पहुंचे। नारायण ने प्रह्लाद से कहा - युद्ध अब कल करेंगे। आज अब आराम करो। दैत्येश्वर प्रह्लाद नारायण से लगातार हारते रहे। दैत्येश्वर ने पीतवासा विष्णु के पास जाकर पूछा - इतनी लम्बी लड़ाई लड़ ली पर मैं नारायण को पराजित नहीं कर सका इसका कारण क्या है ? पीतवासा विष्णु ने अपने भक्त से कहा - प्रह्लाद तुम अहिंसा धर्म दम्पत्ति के नंदन नारायण को युद्ध में पराजित नहीं कर सकते। तुम्हें यदि विजय ही प्रिय हो तो फिर भक्ति मार्ग का अनुसरण करो। प्रह्लाद ने कहा - मेरी प्रतिज्ञा विफल होरही है। मुझे मिथ्या अहंकार होगया कि मैं नारायण को युद्ध में पराजित कर लूँगा। नैमिषारण्य तीर्थ में स्नान करते हुए पुनः महाविष्णु से प्रार्थना की। महाविष्णु ने कहा - नारायण को जीतने का एक ही उपाय है वह है नवधा भक्ति का रास्ता। कृष्ण भक्ति की एक अलौकिक शक्ति गुर्जर वाणी में नरसी मेहता ने वैष्णव भक्ति का नया मार्ग दशधा भक्ति वाला चुना है। वह शक्ति अर्जित की है कि जिसे वह अपनी हुण्डी भेज देते हैं वह कृष्ण द्वारा सकार ली जाती है। भक्ति ही एक ऐसा स्त्रोत है जो नर-नारायणमय बना सकता है।
दैत्य वंश की राज सत्ता प्रह्लाद तीर्थयात्रा में निकलने से पूर्व ही अपने चचेरे भाई अंधक, हिरण्याक्ष नंदन को सौंप चुके थे। नारद ऋषि ने पुलत्स्य जी से सवाल किया कि राजधर्म को समझने वाले महाबाहु प्रह्लाद ने नेत्रहीन अंधक को अपना राज्याधिकार किस हेतु हस्तातंरित किया जबकि उसका अपना पुत्र राजकुमार विरोचन सक्षम राज्याधिकारी था। प्रह्लाद तो राजधर्म के ज्ञाता थे। उन्होंने अपने चचेरे भाई हिरण्याक्ष नंदन अंधक का राज्याभिषेक किया ? पुलत्स्य जी ने नारद के सवाल का जवाब देते हुए कहा- अंधक ..... था। उसे दृष्टि लाभ अपने पिता हिरण्याक्ष के जीवन काल में ही मिल गया था। प्रह्लाद को लगा अंधक प्रतापी राजा हो सकता है अतः न्यायपथ यह कहता है कि हिरण्याक्ष ने अंधक को ही राजा बनाये जाने का उपक्रम ज्यादा तर्कसंगत है। अंधक ने शूलपाणि त्रिलोचन महादेव की आराधना करके महर्षि वेदव्यास के शब्दों में जो वरदान शूलपाणि शंकर से प्राप्त किया वह ‘‘अजेयत्वम् अवध्यत्वम् सुर सिद्धर्षि ..... अदाह्यत्वम् हुताशेन अक्लेदनम् जलेन वा’’ वर जो अंधक ने मांगा वह था अजेय होऊँ, अवध्य होऊँ, मुझे अग्निभय व जलभय न हो, सुर, सिद्ध, ऋषि, पन्नग कोई मेरा अहित न कर सकें। शुक्राचार्य को अपना गुरू बना कर अंधक दैत्य राज्य का संचालन करने लगा। देवासुर संग्राम में प्रह््लाद नंदन विरोचन ने वरूण के साथ जंभ, बलशाली कुबेर के साथ सत्संत्रार, वायु के तथा मय दैत्य अग्नि के साथ युद्ध करने लग गये। हयग्रीव महाबली दैत्य ने अग्नि, सूर्य, अष्ट वसु, शेषनाग दो दो साथ मिल कर संग्राम शुरू किया। उभय पक्षीय बाण वर्षा कर अपने शत्रु को ललकार कर कहने लगे - खड़े-खड़े डर क्यों रहे हो। अमोघ अस्त्र संचालन से चतुर्दिक मंदाकिनी के जल प्रवाह सरीखे बहती हुई रूधिर प्रवाह करने लगे जिसमें पिशाच व राक्षसों की रक्त पिपासा को सवंर्धित किया। भीरू पुरूषों को भयभीत करने वाला भीषण संग्राम देवासुर युद्ध में सहस्त्राक्ष शक्र अपने विशाल धनुष से बाण वर्षा करने लगे। दैत्येन्द्र अंधक भी वेगवान धनुष से बाण छोड़ कर इन्द्र पर आक्रमण करने लगा। इन्द्र अंधक महायुद्ध हुआ और बलशाली अंधक ने इन्द्र के वज्र का मुकाबला किया। अपनी मुट्ठी के बल से अंधक ने इन्द्र के वज्र का सामना किया और ऐरावत हाथी को अपना निशाना बना कर ऐरावत को भी पटक डाला। इन्द्र ऐरावत से कूदे और अमरावती चले गये। अंधक महावीर था उसने देव सेना पर प्रहार करना आरंभ किया। कालाग्नि के समान समस्त त्रिलोकी को दग्ध करने के निमित्त प्रज्वलित यम दण्ड को प्रह््लाद पर छोड़ा। असुर समाज में कोलाहल पूर्ण चीत्कार सुनायी दिया कि प्रह्लाद यम के हाथों मारे गये। दैत्य-दानव चीत्कार से दैत्येश्वर अंधक विचलित नहीं हुआ।
हिन्दुस्तानी सौतिया डाह के कश्यप दायादों देव-दानव-दैत्य पारस्परिक मनमुटाव के अलावा दाशरथि राम को कैकेयी द्वारा चौदह वर्ष का वनवास दिया जाना आज से सवा पांच हजार वर्ष पहले कुरू वंश के धृतराष्ट्र और पांडु में कौन राजा शांतनु नंदन विचित्रवीर्य की मृत्यु के अनंतर शांतनु के मत्स्यगंधा सत्यवती के पुत्र द्वय विचित्रवीर्य और चित्रांगद के दिवंगत होने के पश्चात राजधर्म का वह पक्ष तब भी बलवान था जब कुरू संसद ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र के राज्याधिकार ने देकर पांडु को हस्तिनापुर नरेश घोषित करते समय यह व्यवस्था दी थी कि धृतराष्ट्र व पांडु के पुत्रों में जो ज्येष्ठ होगा वह राज्याधिकारी होगा। इस ब्लागर के परम आदरणीय गुरू पंडित रघुनाथ उप्रेती सैंणसोर पिथौरागढ़ के कुजौली निवासी एक छंद गाया करते थे। भीष्माचार्य की महिमा का गुणगान करते हुए कहते थे - मैं राज्य की चाह नहीं करूँगा जो ईष्ट तुम्हें हो वह ही वरूँगा। संतान जो सत्यवती जनेगी राज्याधिकारी वह ही बनेगी। देवव्रत की इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही वह भीष्म कहलाये। वे महाराज शांतनु के ज्येष्ठ पुत्र थे। राज्याधिकार उन्हीं का था पर उन्होंने अपने पिता शांतनु के दाम्पत्त्य सुख के लिये राज्याधिकार का त्याग किया। उनके पिता शांतनु के अग्रज भरत के पौत्र प्रतीक के पुत्र देवादि ने किशोरावस्था से ही ब्रह्मचर्य व्रत लेकर कलापग्राम वास शुरू कर दिया था। यही कलाप ग्राम यमुना का खादर है। यहीं के एक यमुना के में गर्भ स्थित द्वीप में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जन्मे थे। वे पंगु मुनि पराशर के पुत्र तथा मत्स्यगंधा सत्यवती के कालीन पुत्र थे जिसका पालन-पोषण साढ़े सात वर्ष तक सत्यवती ने अपने पितृ गृह दासराज मामी के घर किया था। जब बालक साढ़े सात वर्ष का होगया पंगु मुनि उसे अपने आश्रम ले गये। हिन्दुस्तान में अदिति, दिति व दनु के मध्य जो सौतिया डाह था उसका पहला सिरा अदिति व उसके बेटे बारह आदित्य थे। दूसरा ध्रुव दिति व दनु का था जिसके पुत्र समूह में हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष, शुंभ-निशुंभ व तारकासुर आदि थे। सौतिया डाह का पहला उदाहरण त्रिविष्टप स्वामी त्रिपुरेन्द्र महावान इन्द्र, उपेन्द्र आदि देवता तथा दितीश्वर हिरण्यकश्यप व उसके अग्रज हिरण्याक्ष का विष्णु सहित सभी देवताओं से शत्रुता की तीखी मार थी।
मानव समाज में विवेकानंद व विवेकान्ध दो तरीके के पुरूष व स्त्रियां होती हैं। हिरण्याक्ष नंदन अंधक जन्मांध तो था ही वह विवेकान्ध भी था। उसके पिता हिरण्याक्ष के जीवनकाल में ही उसे चक्षु ज्योति मिल गयी थी पर जन्मांध होने के कारण उसके राज्याधिकार में भी दैत्य समाज में भी मतभेद था जिसको दैत्येश्वर प्रह्लाद ने चुनौती के रूप में लेकर अपना उत्तराधिकारी अपने चचेरे भाई अंधक को ही तय किया।
कश्यप नंदन हिरण्यकश्यप के बारे में कहीं ऐसा कथानक नहीं आता कि वह स्त्री समाज का आदर नहीं करता था। घरेलू हिंसा का विशेष तौर पर स्त्री हिंसा का समर्थक था। उसका मुख्य उद्देश्य अपने शत्रु महाविष्णु से अपनी सुरक्षा करना तथा महाविष्णु के अलावा तत्कालीन सृष्टि में जो भी ब्रह्मा, शंकर आदि देव तत्त्व थे उनकी आराधना तथा तपस्या से उन्हें प्रसन्न करना हिरण्यकश्यप का जीवन ध्येय था। उसका पुत्र भक्त प्रह््लाद गाय-ब्राह्मण की संरक्षा करने वाला व्यक्तित्त्व था। जरूरत पड़ने पर दैत्य होने के कारण अस्त्र-शस्त्र भी धारण करता था। दैत्य वंश के तृतीय नरेश अंधक के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का समर्थक था। प्रह्लाद ने उसे अपना उत्तराधिकारी बनाते समय ताकीद की थी कि वह स्त्रियों का सम्मान किया करे। देवर्षि नारद ने जब पुलत्स्य ऋषि से सवाल किया कि जब देवाधिदेव महादेव मंदराचल में विराजित थे तब दैत्येन्द्र अंधक ने क्या किया, वह प्रकरण सुनाइये। अंधक ने अपने बंधु-बांधवों व गणों से कहा - जो व्यक्ति शैल कुमारी को जितनी जल्दी मेरे पास लायेगा वही मेरा वास्तविक बंधु व प्यारा होगा। तब प्रह्लाद ने अपने चचेरे भाई अंधक को कहा - तुम मदनातुर होगये हो एवं तुम्हारा विवके भी अंधा होगया है। वह गिरिजा जिसे तुम अपनी भार्या बनाना चाहते हो वह महादेव दयिता वस्तुतः तुम्हारी मां है एवं शंकर तुम्हारे पिता हैं। कवि कालिदास का कहना था कि - जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ। पार्वती-परमेश्वर इस संसार के माता-पिता हैं। प्रह्लाद ने बार-बार विवेकान्ध अंधक को झकझोर कर कहा - कुमार्ग का त्याग कर डालो एवं यह सोचना छोड़ दो कि तुम गिरिराज कन्या, शैल कन्या को अपनी भार्या बनाने की कामना नहीं कर सकते। शूलपाणि शंकर को जीतने की कामना तुम्हें सफल मनोरथ नहीं कर सकेगी इसलिये प्रह्लाद ने अंधक को बारम्बार यही कहा कि शंकर विजय तुम्हारी क्षमता से बाहर है इसलिये गौरी को अपनी अंकशायिनी बनाने की मनोभिलाषा का त्याग कर सन्मार्ग पर चलो। दैत्येश्वर विवेकान्ध अंधक तुम्हें अपने पिता हिरण्याक्ष के अग्रज हिरण्यकश्यप नंदन प्रह्लाद जो सन्मार्ग बता रहा है उसका अनुकरण करना ही तुम्हारे लिये हितकारी है। प्रह्लाद ने दैत्येश्वर अंधक को दण्ड-अरजा उपाख्यान सुनाया। अरजा, दैत्याचार्य उशना भार्गव की प्रथम कन्या थी। उनकी द्वितीय कन्या देवयानी का आख्यान भारत की आधुनिक देवयानी खोबरागड़े के संदर्भ में भारत की विदेश नीति का मूलमंत्र क्या हो इस पर विस्तारपूर्वक इसी ब्लॉग में एक अन्य जगह चर्चा की जा चुकी है। आज के हिन्दुस्तानी समाज को वामनावतार के युग में जो ऊहापोह था उससे सामयिक सबक लेने की मूर्धण्य आवश्यकता है। आज जो जड़ता भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक सोच में घर कर गयी है उसे हिन्दुस्तानी धरती व हिन्दुस्तानी वाङ्मय के अनुकूल ढालने की पहली जरूरत की संपूर्ति केवल वही नेतृत्त्व कर सकता है जो हिन्दुस्तानी जन समाज का नाड़ी वैद्य हो।
सोलहवीं लोकसभा का सटीक नेतृत्त्व
तिहत्तरवें व चौहत्तरवें संविधान संशोधन ने ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत इन तीन संवैधानिक अधिष्ठानों को भारतीय संघ व उसके घटक राज्य के समानांतर भारतीय संविधान सम्मत सत्ता को राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्त्व काल में प्राप्त हो चुके हैं। सवाल केवल इतना रह गया है की भारत संघ व उसके घटक राज्य संवैधानिक व्यवहारिकता के क्षेत्र में खुल कर आगे आयें, ग्राम सरकार, क्षेत्र पंचायत, सरकार जिला सरकार को केंद्र व राज्य की सत्ता में प्रतिभागिता करायी जाये। राजीव गांधी सरकार के पतन, विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्त्व में सत्ता में आयी सरकार ने जो सरकारी ढांचा जैसे चल रहा था उसे मंडल आयोग की संस्तुतियां स्वीकार कर राजनैतिक तहलका मचा डाला। मंडल आयोग की संस्तुति कि देश के चौवन प्रतिशत पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण का लाभ मिले, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ा वर्ग आरक्षण यदि उन वर्गों की आबादी के अनुसार अनंत काल तक जारी रखा जाये भारत की समूची राजनीतिक चेतना जातिवाद के वर्चस्व में घिर जायेगी, हिंदुस्तान के मजहबी आधार पर 1947 में हुए भारत विभाजन के पीछे मुंबई के प्रतिष्ठित वकील मोहम्मद अली जिन्ना का यह कहना था कि बनिया, वामन की मेढ़ी में मुसलमान सुरक्षित नहीं है। यदि तब कांग्रेस के कारोबारी वामन बनिया न होकर कोई और हिंदुस्तानी कांग्रेस का अगुवा होता तो शायद विभाजन टल भी सकता था क्योंकि भारत विभाजन ने मुसलमानों मनचाही कौमी राज की ख्वाहिश तो आधी अधूरी ही सही पूरी तो हो गयी। भारत का पश्चिमी और पूर्वी मुस्लिम बहुल इलाका पाकिस्तान के नाम से दुनियां के नक़्शे में अस्तित्त्व में आगया और चौबीस वर्ष दुनियां का एक नया नवेला इस्लामिक राष्ट्र भारत के पूर्व व पश्चिम में अपना अस्तित्त्व बनाये रख सका । दोनों का मुख्य कारण पूर्व पाकिस्तान में जनसंख्या का पश्चिम पाकिस्तान से ज्यादा होने के अलावा बंगालियों का उर्दू को अस्वीकार करना तथा स्वभाषा बांग्ला के प्रति समर्पित बंगाली मुसलमानों के अधिसंख्य लोग बगावत पर उतर आये। इंदिरा गांधी ने समय की नज़ाकत को भांपा और पश्चिमी पाकिस्तान से छुटकारा चाहने वाले बंगाली मुसलमानों को नैतिक तथा साहसिक सैन्य समर्थन देकर बांग्ला देश को अस्तित्त्व में आने में पूरी की पूरी राजनीतिक मदद पहुंचायी। पश्चिम में सिंध में रहने वाले उर्दू बोलने वाले यू.पी. बिहार के मुसलमान सिंधी, पश्तोभाषी पख्तून व बलूच भी पंजाबी मुसलमानों के जुए से मुक्ति के आकांक्षी हैं। विभाजन के समय बलूच व पख्तूनों ने पाकिस्तान के साथ रहना तहेदिल से नहीं माना इसलिये हिन्दू व मुसलमान दो कौमें हैं एक राष्ट्र नहीं बन सकते का मुस्लिम लीगी चिंतन पोखर बिखर गया है। देर-सवेर बलूच, पख्तून व सिंध पंजाबी मुसलमानों के बाड़े से बाहर निकलने का यत्न करते रहेंगे। अंततोगत्वा जब हिंदुस्तान, पाकिस्तान व बांग्लादेश के मुसलमान समझ जायेंगे कि हिंदुस्तान के हिन्दू बहुल समाज में ही उनकी सुरक्षा है तो विभाजक बर्लिन की दीवार की तरह हिंदुस्तान के लोग भी अटक से कटक तक, काराकोरम से कराची तक, बलूचिस्तान के क्वेटा से लेकर उत्तर-पूर्व भारत में तवांग तक आसेतु हिमाचल सारा हिंदुस्तान चैन की वंशी बजा सकता है। यह तभी संभव है जब हिंदुस्तान का जो पिछड़ा वर्ग है उसमें से ही नेतृत्त्व का उदय हो। वामन, बनिया वाली कहावत केवल कांग्रेस पर ही नहीं भारतीय जनता पार्टी पर भी यह वामन-बनिया तमगा जुड़ा हुआ है। सनातन भारतीय आस्था चातुर्वर्ण्य पर यकीन करती है। महात्मा गांधी ने छाती फुला कर कहा था ' मैं चातुर्वर्ण्य पर विश्वास करता हूँ '। चलिये जरा खोज-खबर तो करें, यह चातुर्वर्ण्य क्या है? वेदांत कहता है - मनुष्य शरीर का मुख ब्राह्मण है, बाहु राजन्य हैं, ऊरु वैश्य है तथा पैर शूद्र हैं। व्यक्ति की पहचान उसके मुख से होती है, हाथ, पैर, पेट आदि उसके सहायक हैं इसलिये व्यक्ति जब बोलता है अथवा अभिव्यक्ति करता है तो वह ब्राह्मण है। उसके शब्द ही उसकी पहचान हैं। उसकी कर्तव्यनिष्ठा एवं बाहुबल उसे राज करने की क्षमता देता है। उसके शरीर की पाचन व्यवस्था उसे जीवित रहने व कर्म करते रहने की शक्ति देती है। उसके दो पैर उससे चरैवेति-चरैवेति कहते हुए ''सजग रहो, चलते रहो, ठिठको नहीं'' यह सन्देश देते रहते हैं। हिंदुस्तान में एक जगह का नाम गया है। वहां विष्णुपद हैं। यही विष्णुपद भारत को ''अहर्निशम् सेवामहे'' की शक्ति देते हैं। इसलिये निश्चिन्त होकर आगे बढ़िये। हमारे देश में जाति-बिरादरी संरचना ने ही सारे हिंदुस्तान को इस्लामिस्ट अथवा ख्रिस्ती मज़हब अपनाने से रोका है। लालच में आकर जो हिंदुस्तानी, मुस्लिम या इसाई मज़हब अपना लिये, जात का तमगा आज भी नहीं टूट पारहा है। वे हिंदुस्तान की सरकार से अर्ज कर रहे हैं कि उन्हें भी अनुसूचित जाति अथवा जनजाति का आरक्षण मिले जिन्हें सरकार पिछड़ा आरक्षण देती है। इसाई व मुसलमान हुए पिछड़े भी अपनी जात की खोज-खबर कर अर्ज कर रहे हैं कि उन्हें भी पिछड़ी जाति का आरक्षण लाभ मिले। जाट भाइयों में हिन्दू जाट, मुस्लिम व सिख जाट हैं। जब भारत की केंद्र सरकार फैसला करती है कि जाट पिछड़े हैं तो हिन्दू जाट, सिख जाट व मुस्लिम जाट अगर आरक्षण मांगें तो मना करने का कोई तार्किक आधार नहीं है। सिख जाट व मुस्लिम जाट को केवल इतना ही तो साबित करना है कि वह जाट है अतएव हिन्दू जाटों की तरह पिछड़ा आरक्षण का सुपात्र है।
एक नयी शब्दावली आरक्षण के मामले में सामने आयी है। दलितों में अति दलित, महा दलित तथा पिछड़ा, ज्यादा पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा। दलित व पिछड़ा आरक्षण ने समाज में एक नया वर्ग उपजाया है वह है संपन्न व समर्थ दलित और पिछड़ों में संख्याबल के आधार पर वे जातियां जो आज समाज में तथाकथित वामन-बनियां, ठाकुर भूमिधर व लाला (कायस्थ) जिन्हें अगड़ा माना जाता है उसकी बराबरी में काफी नजदीक है। पिछड़ों में संपन्न बहुसंख्यक हैं। इनमें दलित समाज सहित क्रीमी लेयर की परिधि में आने वाले दलित व पिछड़े भी आरक्षण के अपने हक़ को ईमानदारी से छोड़ने को तैय्यार नहीं हैं। वे सभी निरंतर आरक्षण चाहते हैं। सरकारी नौकरी का साँचा और ढाँचा दोनों ढलान पर हैं। दलित और पिछड़ों की नयी मांग है कि निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू हो तथा सरकारी सेवा में भर्ती के समानांतर प्रमोशन का आरक्षण सुरक्षित किया जाय। यह भी मांगें अपने चरम पर हैं। भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले चतुर्दिक भ्रष्टाचार के बारे में एक बांग्ला भद्र लोक ने राय जाहिर की कि भ्रष्टाचार बढ़त में आरक्षण भी एक जबरदस्त करक तत्त्व है।
भारत से भ्रष्टाचार भगाना है तो उस पर अंकुश लगाने के अनेकानेक नुस्खे समय-समय पर परिदृश्य में आते रहते हैं। अरविन्द केजरीवाल महाशय की स्वराज पुस्तक में केवल भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार के प्रसंग प्रमुख रूप से चर्चित हो रहे हैं। उन्हें खबरनवीसों सहित उद्योगपतियों, राजनीतिज्ञों व ऊंचे नौकरशाहों में ज्यादा से ज्यादा लोग भ्रष्ट ही नजर आरहे हैं। अगर खुदानखास्ता उनकी ईमानदारी पर लट्टू होकर हिंदुस्तानी मतदाता उनके सौ से ज्यादा सांसद सोलहवीं लोकसभा में भेज दें तो वे हिंदुस्तान के हर उस व्यक्ति को जो उनके साथ नहीं है उनकी बात तर्कसंगत नहीं समझता उसे वे भ्रष्टाचारी करार देकर जेल की हवा खिलाने का शिवसंकल्प किये हुए हैं। वाणी के संयम के बिना जो व्यक्ति भारत पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष राज करने की ख्वाहिश पाले हुए है उन्हें खुल कर सामने आने की जरूरत है। वे कहते हैं ग्राम स्वराज के लिए कानून बने। भारतीय संविधान के 73वें व 74वें संशोधन के जरिये ग्राम रिपब्लिक व ग्राम पंचायत की बात वे अपने आख्यान में फरमाते हैं। नगर स्वराज भी जरूरी है, ग्राम स्वराज तो एक लम्बी प्रक्रिया है। अगर भारत से अराजकता को भगाना है एवं अराजक मानसिकता पर अंकुश लगाना है तो नगर स्वराज, शहरी पूर्ण स्वराज दिन-रात बढ़ते शहरीकरण के कारण सर्वोच्च प्राथमिकता है। सातवें आसमान में बैठे उस ईश्वर ने अरविन्द केजरीवाल महाशय को दिल्ली की शहरी बस्तियों में 'नगर-स्वराज' लेने का मौका दिया। उन्होंने उमाशंकर दीक्षित की पतोहू जो दिल्ली में लगातार पंद्रह वर्षों से शासन कर रही थी उसे हरा कर उन्हीं कांग्रेस वालों की मदद से सत्ताईस सदस्यों वाली अल्पमत सरकार को 49 दिनों तक चलाया भी, कैसे चलाया यह तो लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी को मिलने वाले मत प्रतिशत से सामने आयेगा। उन्हें एक स्वर्णिम अवसर मिला कि प्राचीनकाल में जो सिटी स्टेट पद्धति यूनान में विकसित हुई थी, दिल्ली जिसके मतदाताओं ने उन्हें विधायक बनाया, उनके अलावा 26 अन्य साथियों को विजय पताका फहराने का स्वर्णिम अवसर दिया उस दिल्ली को सटीक नगर राज्य का स्वरुप वह दिला सकते थे, परिश्रम कर सकते थे पर नहीं उन्हें तो आआपा नामक नयी-नवेली राजनीतिक ईमारत को हिंदुस्तान की सोलहवीं लोकसभा का चमकीला नक्षत्र बनाने का सपना आरहा था। नगर राज तथा अघोषित नगर इलाकों की रात-दिन बढ़त से हिंदुस्तान की प्रबंधन व्यवस्था को जो झटका लगा है उस तरफ उनकी नज़र ही नहीं गयी।
आज के समूचे सही मायने वाले गँवारी हिन्द के वे इलाके जो शहराती बनाने की फ़िराक में हैं पर कानूनन शहरी नहीं हैं तथा भारत के स्थापित शहर, उनकी झुग्गी-झोपड़ी वाली बसासत को नितांत आवश्यक नागरिक सुविधाएँ उपलब्ध करने सहित रोजगार, कानून व्यवस्था, लोगों की बढ़ती हुई महंगाई को राहत देने के लिए दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व की तात्कालिक जरूरत है। हिंदुस्तान के गांवों, अर्ध-शहरी गँवारी इलाकों, शहरी इलाकों पर उनकी तात्कालिक जरूरतों का जायजा लेने वाले राष्ट्रीय नेतृत्त्व में ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो समदर्शी हो, निर्वैर हो। लोकसभा द्वारा सोलहवीं लोकसभा के नेतृत्त्व अधिकार से लैस होने पर अनुरोधी और विरोधी दोनों तबकों के साथ कारगर राष्ट्रीय संवाद स्थापित करने की क्षमता रखता हो। राजनीतिक दलों का शीर्ष नेतृत्त्व वह एक परिवार वाला हो, पिता-पुत्र, माँ-बेटे, पति-पत्नी के संबंधों से अस्तित्त्ववान हो, कम्युनिस्टों व भाजपाईयों की तरह संवर्ग (काडर) आधारित हो। मायावती के नेतृत्त्व वाला बहुजन-समाज ही क्यों न हो, ममता-जयललिता सलीके का महिला नेतृत्त्व, बीजू पटनायक की राजनीतिक उपलब्धियों का लाभार्जन करने वाले नवीन पटनायक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित समूचे भारत में वर्तमान राजनैतिक सत्ता-सम्पात के सभी लाभार्थियों वे भले ही सोलहवीं लोकसभा में एक प्रतिनिधि भेज सकें या अनेक प्रतिनिधि भेजने में समर्थ हों उन सभी से सटीक सामाजिक संवाद स्थापित करने का शुभ मुहूर्त्त मतगणना के अगले दिन से शुरू किये जाने की जरूरत है। सोलहवीं लोकसभा में प्रधानमंत्री के तौर पर नेतृत्त्व करने का उद्घोष केवल नरेंद्र मोदी ने संपन्न किया है। उन्होंने भारत की जनता से केवल साठ महीने का समय माँगा है। वे भारत राष्ट्र को नवीन चेतना से लैस करने के पक्षधर हैं। प्रच्छन्न व अप्रत्यक्ष आकांक्षा धारकों में राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल को भी भारतीय अखबारी दुनियां प्रच्छन्न व अप्रत्यक्ष प्रधानमंत्री की दौड़ के दो विशिष्ट धावक बता रहे हैं। भारतीय मातृवर्ग ममता, मायावती और जयललिता का नाम भी सामने आता रहता है। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के यादव कुलभूषण मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव भी मौका मिलने पर प्रधानमंत्री दौड़ के धावक हैं। प्रधानमंत्री पद पर नजर तो देवगौड़ा भी बनाये हुए हैं। जिस व्यक्ति व उसके राजनीतिक संगठन ने बाकायदा भारत के प्रधानमंत्रित्त्व के लिए नरेंद्र मोदी का आह्वान किया है भारत के जागरूक मतदाता को सोलहवीं लोकसभा को सामर्थ्यवान नेतृत्त्व देने के लिए नरेंद्र मोदी का आह्वान करना ही चाहिए क्योंकि मौजूदा हालात में देश को सही नेतृत्त्व देने की क्षमता केवल नरेंद्र मोदी में ही दिखती है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
एक नयी शब्दावली आरक्षण के मामले में सामने आयी है। दलितों में अति दलित, महा दलित तथा पिछड़ा, ज्यादा पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा। दलित व पिछड़ा आरक्षण ने समाज में एक नया वर्ग उपजाया है वह है संपन्न व समर्थ दलित और पिछड़ों में संख्याबल के आधार पर वे जातियां जो आज समाज में तथाकथित वामन-बनियां, ठाकुर भूमिधर व लाला (कायस्थ) जिन्हें अगड़ा माना जाता है उसकी बराबरी में काफी नजदीक है। पिछड़ों में संपन्न बहुसंख्यक हैं। इनमें दलित समाज सहित क्रीमी लेयर की परिधि में आने वाले दलित व पिछड़े भी आरक्षण के अपने हक़ को ईमानदारी से छोड़ने को तैय्यार नहीं हैं। वे सभी निरंतर आरक्षण चाहते हैं। सरकारी नौकरी का साँचा और ढाँचा दोनों ढलान पर हैं। दलित और पिछड़ों की नयी मांग है कि निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू हो तथा सरकारी सेवा में भर्ती के समानांतर प्रमोशन का आरक्षण सुरक्षित किया जाय। यह भी मांगें अपने चरम पर हैं। भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले चतुर्दिक भ्रष्टाचार के बारे में एक बांग्ला भद्र लोक ने राय जाहिर की कि भ्रष्टाचार बढ़त में आरक्षण भी एक जबरदस्त करक तत्त्व है।
भारत से भ्रष्टाचार भगाना है तो उस पर अंकुश लगाने के अनेकानेक नुस्खे समय-समय पर परिदृश्य में आते रहते हैं। अरविन्द केजरीवाल महाशय की स्वराज पुस्तक में केवल भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार के प्रसंग प्रमुख रूप से चर्चित हो रहे हैं। उन्हें खबरनवीसों सहित उद्योगपतियों, राजनीतिज्ञों व ऊंचे नौकरशाहों में ज्यादा से ज्यादा लोग भ्रष्ट ही नजर आरहे हैं। अगर खुदानखास्ता उनकी ईमानदारी पर लट्टू होकर हिंदुस्तानी मतदाता उनके सौ से ज्यादा सांसद सोलहवीं लोकसभा में भेज दें तो वे हिंदुस्तान के हर उस व्यक्ति को जो उनके साथ नहीं है उनकी बात तर्कसंगत नहीं समझता उसे वे भ्रष्टाचारी करार देकर जेल की हवा खिलाने का शिवसंकल्प किये हुए हैं। वाणी के संयम के बिना जो व्यक्ति भारत पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष राज करने की ख्वाहिश पाले हुए है उन्हें खुल कर सामने आने की जरूरत है। वे कहते हैं ग्राम स्वराज के लिए कानून बने। भारतीय संविधान के 73वें व 74वें संशोधन के जरिये ग्राम रिपब्लिक व ग्राम पंचायत की बात वे अपने आख्यान में फरमाते हैं। नगर स्वराज भी जरूरी है, ग्राम स्वराज तो एक लम्बी प्रक्रिया है। अगर भारत से अराजकता को भगाना है एवं अराजक मानसिकता पर अंकुश लगाना है तो नगर स्वराज, शहरी पूर्ण स्वराज दिन-रात बढ़ते शहरीकरण के कारण सर्वोच्च प्राथमिकता है। सातवें आसमान में बैठे उस ईश्वर ने अरविन्द केजरीवाल महाशय को दिल्ली की शहरी बस्तियों में 'नगर-स्वराज' लेने का मौका दिया। उन्होंने उमाशंकर दीक्षित की पतोहू जो दिल्ली में लगातार पंद्रह वर्षों से शासन कर रही थी उसे हरा कर उन्हीं कांग्रेस वालों की मदद से सत्ताईस सदस्यों वाली अल्पमत सरकार को 49 दिनों तक चलाया भी, कैसे चलाया यह तो लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी को मिलने वाले मत प्रतिशत से सामने आयेगा। उन्हें एक स्वर्णिम अवसर मिला कि प्राचीनकाल में जो सिटी स्टेट पद्धति यूनान में विकसित हुई थी, दिल्ली जिसके मतदाताओं ने उन्हें विधायक बनाया, उनके अलावा 26 अन्य साथियों को विजय पताका फहराने का स्वर्णिम अवसर दिया उस दिल्ली को सटीक नगर राज्य का स्वरुप वह दिला सकते थे, परिश्रम कर सकते थे पर नहीं उन्हें तो आआपा नामक नयी-नवेली राजनीतिक ईमारत को हिंदुस्तान की सोलहवीं लोकसभा का चमकीला नक्षत्र बनाने का सपना आरहा था। नगर राज तथा अघोषित नगर इलाकों की रात-दिन बढ़त से हिंदुस्तान की प्रबंधन व्यवस्था को जो झटका लगा है उस तरफ उनकी नज़र ही नहीं गयी।
आज के समूचे सही मायने वाले गँवारी हिन्द के वे इलाके जो शहराती बनाने की फ़िराक में हैं पर कानूनन शहरी नहीं हैं तथा भारत के स्थापित शहर, उनकी झुग्गी-झोपड़ी वाली बसासत को नितांत आवश्यक नागरिक सुविधाएँ उपलब्ध करने सहित रोजगार, कानून व्यवस्था, लोगों की बढ़ती हुई महंगाई को राहत देने के लिए दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व की तात्कालिक जरूरत है। हिंदुस्तान के गांवों, अर्ध-शहरी गँवारी इलाकों, शहरी इलाकों पर उनकी तात्कालिक जरूरतों का जायजा लेने वाले राष्ट्रीय नेतृत्त्व में ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो समदर्शी हो, निर्वैर हो। लोकसभा द्वारा सोलहवीं लोकसभा के नेतृत्त्व अधिकार से लैस होने पर अनुरोधी और विरोधी दोनों तबकों के साथ कारगर राष्ट्रीय संवाद स्थापित करने की क्षमता रखता हो। राजनीतिक दलों का शीर्ष नेतृत्त्व वह एक परिवार वाला हो, पिता-पुत्र, माँ-बेटे, पति-पत्नी के संबंधों से अस्तित्त्ववान हो, कम्युनिस्टों व भाजपाईयों की तरह संवर्ग (काडर) आधारित हो। मायावती के नेतृत्त्व वाला बहुजन-समाज ही क्यों न हो, ममता-जयललिता सलीके का महिला नेतृत्त्व, बीजू पटनायक की राजनीतिक उपलब्धियों का लाभार्जन करने वाले नवीन पटनायक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित समूचे भारत में वर्तमान राजनैतिक सत्ता-सम्पात के सभी लाभार्थियों वे भले ही सोलहवीं लोकसभा में एक प्रतिनिधि भेज सकें या अनेक प्रतिनिधि भेजने में समर्थ हों उन सभी से सटीक सामाजिक संवाद स्थापित करने का शुभ मुहूर्त्त मतगणना के अगले दिन से शुरू किये जाने की जरूरत है। सोलहवीं लोकसभा में प्रधानमंत्री के तौर पर नेतृत्त्व करने का उद्घोष केवल नरेंद्र मोदी ने संपन्न किया है। उन्होंने भारत की जनता से केवल साठ महीने का समय माँगा है। वे भारत राष्ट्र को नवीन चेतना से लैस करने के पक्षधर हैं। प्रच्छन्न व अप्रत्यक्ष आकांक्षा धारकों में राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल को भी भारतीय अखबारी दुनियां प्रच्छन्न व अप्रत्यक्ष प्रधानमंत्री की दौड़ के दो विशिष्ट धावक बता रहे हैं। भारतीय मातृवर्ग ममता, मायावती और जयललिता का नाम भी सामने आता रहता है। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के यादव कुलभूषण मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव भी मौका मिलने पर प्रधानमंत्री दौड़ के धावक हैं। प्रधानमंत्री पद पर नजर तो देवगौड़ा भी बनाये हुए हैं। जिस व्यक्ति व उसके राजनीतिक संगठन ने बाकायदा भारत के प्रधानमंत्रित्त्व के लिए नरेंद्र मोदी का आह्वान किया है भारत के जागरूक मतदाता को सोलहवीं लोकसभा को सामर्थ्यवान नेतृत्त्व देने के लिए नरेंद्र मोदी का आह्वान करना ही चाहिए क्योंकि मौजूदा हालात में देश को सही नेतृत्त्व देने की क्षमता केवल नरेंद्र मोदी में ही दिखती है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
हिन्द स्वराज से अरविन्द स्वराज के एक सौ आठ वर्ष
श्री शेखर गुप्ता के राष्ट्रीय महत्त्व वाले तात्कालिक उपादेय सरोकार के आलेख अरविन्द चित्र कथा शीर्षक इंडियन ऐक्सप्रेस के शनिवार आठ फरवरी 14 के मुंबई संस्करण में पढ़ने को मिला। सेठ रामनाथ गोयनका के मानसपुत्र इंडियन ऐक्सप्रेस को मैं तब से पढ़ रहा हूँ जब इंडियन ऐक्सप्रेस 1946 में अल्मोड़ा तीसरे दिन मिलता था। तब अल्मोड़ा में बिजली भी नहीं थी। यायावर महापंडित राहुल सांकृत्यायन व डा. राम मनोहर लोहिया सरीखे राष्ट्र जनों को अल्मोड़ा एक खूबसूरत पहाड़ी कस्बा लगता था। महात्मा गांधी को जब जून 1929 में अल्मोड़ा म्यूनिसिपल बोर्ड के सदर फादर ओकले ने नागरिक अभिनंदन किया तो महात्मा बड़े भाव विभोर हुए। रामजे हाईस्कूल के अंग्रेजी अध्यापक पादरी ओकले म्यूनिसिपल बोर्ड अल्मोड़ा के अध्यक्ष भी थे। महात्मा गांधी को फादर ओकले ने हिन्दी भाषा के शब्द समुच्चय से अभिनंदन करते हुए आह्लादित भी किया। महात्मा की यह निजी यात्रा पंडित नेहरू ने प्रबंधित की थी। कुमांऊँ के अहिंसक कुली उतार मुहिम ने ही महात्मा को कुमांऊँ प्रवास की प्रेरणा दी। यह कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडे का निरन्तर प्रयास था जिसने 14 जनवरी 1921 को वागीश्वर(बागेश्वर) में अहिंसा के कुली उतार को हजारों की जन संसद ने अंजाम दिया। महात्मा ने हिन्द स्वराज कुमांऊँ यात्रा के बीस इक्कीस वर्ष पहले इंडियन ओपीनियन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के हृदय परिवर्तन का हक बताया। इंडियन ओपीनियन में हिन्द स्वराज मूलतः गुजराती भाषा में निबंधित बीस अध्याय वाला लगभग बाईस हजार भारतीय वाङ्मय की गुर्जर गिरा के शब्द हैं। महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज एक ऐसा संवाद है जिसे हम अगर पांच हजार डेढ़ सौ वर्षों पहले ज्योतिसर कुरूक्षेत्र में हुए कृष्णार्जुन संवाद के पास ले जाकर विचार पोखर बनायें तो यह साफ जाहिर होगा कि गांधी संवाद शैली कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की संवाद शैली का आधुनिक प्रत्यय है। महात्मा गांधी ने अपने प्रथम लेखन में आज से लगभग अष्टोत्तर वर्ष पूर्व जो विचार हिन्द के लोगों के सोचने के लिये उपलब्ध किया उसकी पृष्ठभूमि विलायत सहित यूरोप के देशों में भारत की आजादी के लिये शब्दान्तर करें तो स्वराज के लिये अराजक हिंसा मार्ग का जो मार्ग चुना था उसे गांधी ने मनोयोग से सुना किन्तु स्वीकारा नहीं। हिन्द स्वराज के संवाद में महात्मा ने वाचक के अधिपति शब्दों का प्रयोग किया है। संस्कृत वाङ्मय में वाचक से मतलब प्रश्नकर्त्ता प्राश्निक तथा जिज्ञासु से है एवं अधिपति से तात्पर्य उस दृष्टा अधिष्ठाता से है जो प्राश्निक के सवालों का सटीक जवाब देने के समानांतर कभी-कभी प्राश्निक से प्रतिप्रश्न भी करता है। सौ वर्षों से भी ज्यादह समय बीत गया जब गांधी ने अपनी मातृभाषा के जरिये विश्व को हिन्द के उस शाश्वत विचार से अवगत कराया जिसे यूरोप के अनेकानेक विद्वानों ने अपनी-अपनी भाषा के माध्यम से महात्मा के हिन्द स्वराज का मौलिक व सुनीतिपूर्ण रसास्वादन कर हिन्द स्वराज को केवल भारत ही नहीं समूची आधुनिक दुनियां के लिये भी अत्यंत उपयोगी बताया। यूरोप के औद्योगिक विकास से जो विकृत विसंगतियां समाज को घेर रही थीं उनसे रोम्यांरोलां व टालस्टाय सहित सदाचार व सद्विचार का अग्रणी विद्वत समाज गांधी के हिन्द स्वराज का प्रशंसक बन गया। उनका विचार था कि गांधी का सदाचार का रास्ता ही दुनियां को आने वाली भयंकर त्रासदी से बचा सकता है।
ग्रेगेरियन कैलेंडर के 2015वें वर्ष में हिन्दुस्तान वाले महात्मा गांधी के कोचरब आश्रम और उसमें दलित दूधाभाई परिवार को हिन्दुस्तान से छुआछूत मिटाने की शताब्दी मनायेंगे। गुजरात का वैष्णव समाज गांधी सदाचार से प्रभावित तो था एवं कोचरब आश्रम को चलाने के लिये स्वैच्छिक वित्त पोषण भी करता था पर उन वैष्णवों को जो नरसी मेहता द्वारा श्रीकृष्ण को द्वारका में भेजी हुंडी की आस्थामूलक चर्चा तो जरूर करते थे पर मनुष्य मात्र बंधु हैं उन्हें विवेकानंद व गांधी पोषित दरिद्र नारायण में ईश्वर मूर्ति वाली बात मंजूर नहीं थी। अमदाबाद व आसपास के वैष्णव छिटक गये। महात्मा गांधी से परहेज करने लगे। विषम सामाजिक चिंतन में तेरापंथी सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के श्री चरणों में तेरह हजार की थैली कोचरब आश्रम को चलाते रहने के लिये प्रस्तुत की। अंबालाल की दीदी अनसूया बेन महात्मा के रसोढ़े की व्यवस्था देखती थीं। अन्नपूर्णा तो बा व अनसूया बेन ही थीं पर महात्मा अपने अभ्यागतों को भोजन के साथ नीम की चटनी स्वयं परोसते थे।
सन् बावन 1952 से लेकर सन् 1967 तक के चार सामान्य निर्वाचन हिन्दुस्तान की अपना मत इजहार करने वाली जनता के लिये जनतंत्र के त्यौहार पर्व सरीखे थे। पहले तीन सामान्य निर्वाचनों में हिन्द के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सक्रिय व लोकतंत्र के अगुवा थे। वे मई 1964 में अस्वस्थ होगये। उन्होंने कमलापति त्रिपाठी को कहा - मेरा इलाज शिव ज्यादह सही तरीके से कर सकते हैं, तुम उन्हें बुलाओ। पश्चिमी सभ्यता में ओतप्रोत पंडित नेहरू का दोस्ताना-याराना बड़े ऊँचे दर्जे का था। जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बन गये तब शिव त्रिपाठी ने पंडित जी से कहा - जवाहरलाल अब तुम भारत-भाग्य विधाता बन गये हो तो कुछ वैद्यक-आयुर्वेद की भी सुध लो। पंडित जी ने अपने हमजोली शिव त्रिपाठी से कहा - शिव, तुम राजकुमारी अमृत कौर से मिलो। शिव ने पंडित नेहरू को जो जवाब दिया उसे तो मैं यहां नहीं लिख रहा हूँ किन्तु सन् 1946 के पश्चात शिव त्रिपाठी फिर पंडित नेहरू से मिलने कभी नहीं गये। मृत्यु नजदीक देख कर पंडित नेहरू को शिव त्रिपाठी की काबिलियत याद आयी तथा उनकी अनुपस्थिति का ऐहसास भी हुआ। उन्होंने चाहा कि शिव उनका नाड़ी ज्ञान करके उनका रोग निदान करें। अपने नेता की इच्छा को शिव त्रिपाठी को बताने के लिये कमलापति त्रिपाठी स्वयं गये किन्तु शिव त्रिपाठी ने उन्हें झिड़क दिया। कमलापति त्रिपाठी उल्टे पांवों लौट कर पंडित नेहरू के पास आये और उनसे कहा - बजाय मेरे जिलाधिकारी वाराणसी को कहना ज्यादह अच्छा रहेगा। पंडित नेहरू का संदेशा जिलाधिकारी वाराणसी को पहुंचा। वे अधिकारी जानते ही नहीं थे कि शिव काशी की पहचान हैं, तात्कालिक सर्वोत्कृष्ट वैद्य हैं किन्तु फिर भी आज्ञानुसार उन्होंने शिव त्रिपाठी के हवेली में पहुंच कर उन्हें पंडित नेहरू की इच्छा बताई। शिव ने जिलाधिकारी से कहा - पंडित नेहरू मेरे देश के राजा हैं अतएव जाओ, जाकर उनसे स्वयं मेरा संदेश कहो कि शिव अपने मन से तो आपका इलाज नहीं करना चाहता पर हां, मेरे साथ यदि जबर्दस्ती कर मुझे गिरफ्तार कर देहरादून ले जायेंगे तब राजदण्ड के कारण मैं जवाहरलाल का इलाज कर सकता हूँ। जवाहरलाल जानते थे कि शिव त्रिपाठी अपनी आन के पक्के हैं, बलात् उठा कर देहरादून लाये जाने पर वह मेरा इलाज जरूर करेगा परन्तु जवाहरलाल को यह हठयोग मंजूर नहीं था क्योंकि जवाहरलाल केवल देश के राजा ही नहीं बल्कि अवध के किसानों के प्रिय नेता भी थे। अवध ने ही पंडित नेहरू को डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखने के लिये प्रेरित किया था। उन्होंने कमलापति त्रिपाठी को किसी अन्य वैद्य को लाने के लिये कहा। वैद्यक व ज्योतिष का चोली-दामन का साथ है। काशी के ही दूसरे वैद्य पंडित नेहरू को देखने के लिये देहरादून गये। यद्यपि एक छोटी सी घटना ने दोनों के रास्ते अलग कर दिये थे किन्तु फिर भी शिव त्रिपाठी के दिल में पंडित नेहरू के लिये अपार स्नेह था। नाजुक परिस्थिति में वे स्वयं को रोक न पाये तथा पंडित नेहरू के इलाज हेतु देहरादून जारहे काशी के उस वैद्य के गमन के समय के नक्षत्र, वार, तिथि एवं मुहूर्त्त इत्यादि का सटीक आकलन कर शिव त्रिपाठी ने कमलापति त्रिपाठी की हवेली पहुंच कर स्वयं उनसे कहा - कमला, जवाहरलाल सत्ताईस से आगे जिन्दा नहीं रहेंगे।
शेखर गुप्ता ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया का उल्लेख अपने आलेख में किया है। कुमांऊँ में नेपाल से सटा हुआ एक इलाका अस्कोट है। अस्कोट के रजवार के अत्याचारों से वहां की रियाया जिन्हें खापकर व सिर्तान का दर्जा था अत्यंत त्रस्त व पीड़ित थी। जवाहरलाल नेहरू ने अल्मोड़ा में शांतिलाल त्रिवेदी से कहा - शांतिलाल अस्कोट के गांव-गांव, घर-घर जाकर अपनी आस्थामूलक टिप्पणी मुझे दो। शांतिलाल त्रिवेदी ने जवाहरलाल नेहरू को अस्कोट का आंखों देखा हाल लिख भेजा। नेशनल हेरल्ड ने उसे छापा। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में एक अध्याय ‘‘अस्कोट से चौकोट तक’’ है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखने के तुरंत बाद पंडित नेहरू को लगा कि हिन्दुस्तान की जनता तक उनकी बात कैसे पहुंच सकती है। आम आदमी से उसकी वाणी में ही तो बात हो सकती है। पंडित नेहरू ने सस्ता साहित्य मंडल के हरिभाऊ से कहा - हरिभाऊ, क्या तुम मेरी अंग्रेजी में लिखी किताब का हिन्दी अनुवाद कर दोगे। हरिभाऊ ने जवाब दिया - पंडित जी, यह तो मेरे लिये परम सौभाग्य होगा परन्तु मेरी एक शर्त्त होगी। पंडित जी ने कहा - क्या शर्त्त होगी ? हरिभाऊ ने कहा - मेरा किया हुआ हिन्दी अनुवाद स्वयं आपको ही पूरा-पूरा पढ़ना होगा तथा ‘‘भारत की खोज’’ का प्राक्कथन भी स्वयं ही लिखना होगा तभी मैं आपकी आज्ञा का पालन कर आनंदित हो सकूंगा। पंडित नेहरू ने बात मान ली।
स्तम्भकार शेखर गुप्ता ने गुरू जी माधवराव सदाशिवराय गोलवलकर की पुस्तक ‘‘ए बंच ऑफ थॉट्स’’ का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अरविन्द केजरीवाल के 2012 में प्रकाशित स्वराज को सरसरी तरह से पढ़ डाला बंगलुरू से नयी दिल्ली आते समय। आचार्य चतुरसेन की ‘‘वैशाली की नगरवधू-आम्रपाली’’ गुप्ता जी व अरविन्द केजरीवाल दोनों ने ही पढ़ी होगी। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की अनुसार विशाल, शूण्य बंधु धूम्रकेतु विश्रवानंदन धनद निधि पति कुबेर के बेटे थे। विशाल ने ही वैशाली नगर की स्थापना की थी। राजा विशाल के बेटे का नाम हेमचंद्र पोता धूम्राक्ष फिर धूम्राक्ष से कृशाश्व सोमदत्त जिसके पुत्र का नाम जन्मेजय है। कृष्ण द्वैपायन रचित भागवत महापुराण के अनुसार वैशाली के राजपुरूषों में तृण बिन्दु व यशोधर मुख्य थे। ये सभी राजपुरूष राजा नृग के वंशधर थे जिससे परायी गौ पर गौदान करने के कारण त्रेता-द्वापर का पूरा युग द्वय बेट द्वारका में चमगादड़ की जिन्दगी जी कर बिताया। सूत जी ने लिखा - ‘‘करम गति टारे नाहीं टरी’’।
प्राचीन हिन्दुस्तान के देवर्षि नारद संबंधित आख्यान जब अखबार नहीं थे, रेडियो व दूरदर्शन का दृश्य श्रव्य सोशल मीडिया भी नहीं था नारद खबरों को पहुंचाते थे। खबर देना खबर पहुंचाना एक तात्कालिक काम है। बासी होने पर खबर बेशकीमती नही बेकीमती हो जाया करती है। अरूण शौरी का यशोगान उनका स्मरण करते हुए शेखर गुप्ता करते तो हैं और वह अच्छा भी है परन्तु रामनाथ गोयनका के अखबार को फ्रैंक मौरिस ने जो ऊँचाई दी वह अपने आप में अद्वितीय है। पंडित नेहरू की सरकार के खिलाफ जब 1963 पारसपत्र लोकसभा में तीन आना बनाम तीन रूपये की बहस डाक्टर लोहिया ने शुरू की, डाक्टर साहब देवरिया के लोकसभा सांसद उग्रसेन को मेरे पास भेजा कहलाया मेरा बयान लोकसभा में सुनने नौकरी से छुट्टी लेकर आइये। पत्रकार दीर्घा में फ्रैंक मौरिस व सी.के. तिवारी भी बैठे थे। फ्रैंक मौरिस ने लिखा हिन्दी में इतने उच्च स्तर की संसदीय बहस हो सकती है डाक्टर लोहिया ने यह साबित कर दिया। पंडित नेहरू को डाक्टर लोहिया में भारतीय विदेश नीति का राजनीतिज्ञ दिखता था। वे डाक्टर लोहिया को राममनोहर कह कर पुकारते थे। संसद में उन्होंने संसदीय शिष्टाचार बजाय आत्मीयता से कहा - राममनोहर, पंडित जी के अपनी त्रुटि का अहसास होगया। उन्होंने फिर कहा - माननीय सदस्य। डाक्टर लोहिया ने पंडित जी से प्रार्थना की कि आप राममनोहर ही कह कर मुझे पुकारें माननीय सदस्य नहीं। यह है अन्तरात्मा का एक आत्मा से दूसरी आत्मा का अनुराग। सरदार वल्लभ भाई पटेल को हिन्दुस्तान की रियासतों को भारतीय संघ से जोड़ने की मुहिम में उनके सचिव वी.पी. मेनन की अद्वितीय पहल थी। सरदार पटेल ने कश्मीर नरेश राजा हरि सिंह को भारत संघ में जोड़ने के लिये गोलवलकर जी का सहयोग लिया। राजा हरि सिंह गुरू जी का बहुत आदर करते थे। वे श्रीनगर के हवाई अड्डे में गुरू जी का स्वागत करने स्वयं आये। वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक में लिखा कि राजा हरि सिंह ने हवाई अड्डे में ही गुरू जी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सरेआम साष्टांग प्रणाम किया। राजमहल जाकर राज्य कश्मीर को भारत में मिलाने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।
बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, महात्मा गांधी का अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज देशवासियों के लिये पार्लियामेंटरी स्वराज्य की संकल्पना रावी के तट पर कांग्रेसाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू के ‘पूर्ण स्वराज’ का उद्घोष आजाद भारत के लोगों की पिछले सड़सठ वर्ष की स्वतंत्र चेता राष्ट्र यात्रा को मोहनदास करमचन्द गांधी के हिन्द स्वराज और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के खाके को आज के नये परिप्रेक्ष्य में भांपने की जरूरत है। नांदीमुख गांधी के हिन्द स्वराज व अरविन्द केजरीवाल संकल्पित स्वराज पर देश में 2014 के महानिर्वाचन के पहले आने वाले अढ़ाई महीनों में देश को धीरोदस्त दृढ़निश्चयी तथा अपने वादे पर टिकने वाले नेता की जरूरत है। अब तक ज्ञात उम्मीदवार नमो हैं। नरेन्द्र मोदी सहित वे उम्मीदवार जो प्रधानमंत्री तो बनना चाहते हैं पर खुल कर आगे नहीं आरहे हैं उन्हें भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना होगा। देश इस समय ऐसा दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व चाहता है जो हर देशवासी का योगक्षेम देखे और भारत को विश्व में उसका वाजिब वैभव दिलाये। आपके सिद्धांतविद योगेन्द्र यादव ने अपने साक्षात्कार में आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषित उम्मीदवार और कांग्रेस के अघोषित उम्मीदवार को अपनी बात दोहराते हुए ‘प्ज ूपसस इम ं जतंहमकल वित प्दकपं’ उम्मीदवार कहा है। सिद्धांतकार यह भी कहते हैं कि वे अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम जाहिर करेंगे यदि आप अपने दांव को अंगद के पांव सरीखा मजबूत पाती है। अगर आप अपने उम्मीदवार का नाम प्रकट करती है तो देश में प्रधानमंत्री पद के जो इतर दावेदार हैं मतदाता अदालत उनका फैसला देगी। योगेन्द्र यादव का मत है कि उनका दल लोकसभा चुनाव अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्त्व में लड़ेगा। हिन्दुस्तान के कुछ गांधीवादी विचार पोखर के मनीषी भी आप को सशर्त्त समर्थन देने की घोषणा कर रहे हैं। अभी तो ग्रेगेरियन कैलेंडर का दूसरा महीना ही चल रहा है अबकी गुड़िपड़वा चैती चांद, संवत्सर प्रतिपदा 30 मार्च 2014 को पड़ रहा है। पराभव संवत्सर अपनी जिम्मेदारियां पूर्णवत्सरी अमावस्या 29 मार्च 14 को तिरोधान हो जायेगा। उसकी जगह प्लवंग नाम का नया संवत्सर आरहा है। भारत के काफी इलाकों के रहने वाले लोग संवत्सर पड़वा गुड़िपड़वा और मेष संक्रांति से नया साल मनाते हैं। लोकसभा का आगामी चुनाव राष्ट्रीय पंचांग के अनुसार सौर वैशाख महीने से शक संवत 1936 में होगा। मोहनदास करमचंद गांधी रचित ‘हिन्द स्वराज’ और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के लोक मंथन ने ही यह फैसला करना है कि हम हिन्दुस्तानी गांधी का आध्यात्मिक स्वराज पार्लियामेंटरी स्वराज व केजरीवाल के स्वराज में किसे चुनते हैं ? मोहनदास करमचंद गांधी भारत राष्ट्र राज्य नांदीमुख है। देश के दुनिया को दिखाने लायक चेहरे हैं। अहिंसा के प्रवर्तक युगपुरूष गांधी संकल्पित स्वराज हमारा अभिप्रेत है। हमें वचन भंग न करने वाले महात्मा गांधी सरीखे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व की जरूरत है। देश के मतदाता ही उसका भविष्य तय करने वाले शक्तिस्त्रोत हैं। वे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व का वरण करें यही भारत राष्ट्र की मंगल कामना है। महात्मा गांधी - मोहनदास करमचंद गांधी रचित हिन्द स्वराज में बीस अध्याय हैं। अरविन्द केजरीवाल की बारह अध्याय वाली पुस्तक स्वराज हिन्द स्वराज के अस्तित्त्व में आने के एक सौ चार वर्ष प्श्चात जनवाणी आयी। दोनों पीढ़ियों के अंतराल के समानांतर भारत की दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही जनसंख्या के सामने मुंह बाये खड़ी अनेकानेक त्रासद समस्याओं का जो अंबार लगा हुआ है उन ज्वलंत सरोकारों का समाधान युग की पुकार है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
श्री शेखर गुप्ता के राष्ट्रीय महत्त्व वाले तात्कालिक उपादेय सरोकार के आलेख अरविन्द चित्र कथा शीर्षक इंडियन ऐक्सप्रेस के शनिवार आठ फरवरी 14 के मुंबई संस्करण में पढ़ने को मिला। सेठ रामनाथ गोयनका के मानसपुत्र इंडियन ऐक्सप्रेस को मैं तब से पढ़ रहा हूँ जब इंडियन ऐक्सप्रेस 1946 में अल्मोड़ा तीसरे दिन मिलता था। तब अल्मोड़ा में बिजली भी नहीं थी। यायावर महापंडित राहुल सांकृत्यायन व डा. राम मनोहर लोहिया सरीखे राष्ट्र जनों को अल्मोड़ा एक खूबसूरत पहाड़ी कस्बा लगता था। महात्मा गांधी को जब जून 1929 में अल्मोड़ा म्यूनिसिपल बोर्ड के सदर फादर ओकले ने नागरिक अभिनंदन किया तो महात्मा बड़े भाव विभोर हुए। रामजे हाईस्कूल के अंग्रेजी अध्यापक पादरी ओकले म्यूनिसिपल बोर्ड अल्मोड़ा के अध्यक्ष भी थे। महात्मा गांधी को फादर ओकले ने हिन्दी भाषा के शब्द समुच्चय से अभिनंदन करते हुए आह्लादित भी किया। महात्मा की यह निजी यात्रा पंडित नेहरू ने प्रबंधित की थी। कुमांऊँ के अहिंसक कुली उतार मुहिम ने ही महात्मा को कुमांऊँ प्रवास की प्रेरणा दी। यह कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडे का निरन्तर प्रयास था जिसने 14 जनवरी 1921 को वागीश्वर(बागेश्वर) में अहिंसा के कुली उतार को हजारों की जन संसद ने अंजाम दिया। महात्मा ने हिन्द स्वराज कुमांऊँ यात्रा के बीस इक्कीस वर्ष पहले इंडियन ओपीनियन के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के हृदय परिवर्तन का हक बताया। इंडियन ओपीनियन में हिन्द स्वराज मूलतः गुजराती भाषा में निबंधित बीस अध्याय वाला लगभग बाईस हजार भारतीय वाङ्मय की गुर्जर गिरा के शब्द हैं। महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज एक ऐसा संवाद है जिसे हम अगर पांच हजार डेढ़ सौ वर्षों पहले ज्योतिसर कुरूक्षेत्र में हुए कृष्णार्जुन संवाद के पास ले जाकर विचार पोखर बनायें तो यह साफ जाहिर होगा कि गांधी संवाद शैली कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की संवाद शैली का आधुनिक प्रत्यय है। महात्मा गांधी ने अपने प्रथम लेखन में आज से लगभग अष्टोत्तर वर्ष पूर्व जो विचार हिन्द के लोगों के सोचने के लिये उपलब्ध किया उसकी पृष्ठभूमि विलायत सहित यूरोप के देशों में भारत की आजादी के लिये शब्दान्तर करें तो स्वराज के लिये अराजक हिंसा मार्ग का जो मार्ग चुना था उसे गांधी ने मनोयोग से सुना किन्तु स्वीकारा नहीं। हिन्द स्वराज के संवाद में महात्मा ने वाचक के अधिपति शब्दों का प्रयोग किया है। संस्कृत वाङ्मय में वाचक से मतलब प्रश्नकर्त्ता प्राश्निक तथा जिज्ञासु से है एवं अधिपति से तात्पर्य उस दृष्टा अधिष्ठाता से है जो प्राश्निक के सवालों का सटीक जवाब देने के समानांतर कभी-कभी प्राश्निक से प्रतिप्रश्न भी करता है। सौ वर्षों से भी ज्यादह समय बीत गया जब गांधी ने अपनी मातृभाषा के जरिये विश्व को हिन्द के उस शाश्वत विचार से अवगत कराया जिसे यूरोप के अनेकानेक विद्वानों ने अपनी-अपनी भाषा के माध्यम से महात्मा के हिन्द स्वराज का मौलिक व सुनीतिपूर्ण रसास्वादन कर हिन्द स्वराज को केवल भारत ही नहीं समूची आधुनिक दुनियां के लिये भी अत्यंत उपयोगी बताया। यूरोप के औद्योगिक विकास से जो विकृत विसंगतियां समाज को घेर रही थीं उनसे रोम्यांरोलां व टालस्टाय सहित सदाचार व सद्विचार का अग्रणी विद्वत समाज गांधी के हिन्द स्वराज का प्रशंसक बन गया। उनका विचार था कि गांधी का सदाचार का रास्ता ही दुनियां को आने वाली भयंकर त्रासदी से बचा सकता है।
ग्रेगेरियन कैलेंडर के 2015वें वर्ष में हिन्दुस्तान वाले महात्मा गांधी के कोचरब आश्रम और उसमें दलित दूधाभाई परिवार को हिन्दुस्तान से छुआछूत मिटाने की शताब्दी मनायेंगे। गुजरात का वैष्णव समाज गांधी सदाचार से प्रभावित तो था एवं कोचरब आश्रम को चलाने के लिये स्वैच्छिक वित्त पोषण भी करता था पर उन वैष्णवों को जो नरसी मेहता द्वारा श्रीकृष्ण को द्वारका में भेजी हुंडी की आस्थामूलक चर्चा तो जरूर करते थे पर मनुष्य मात्र बंधु हैं उन्हें विवेकानंद व गांधी पोषित दरिद्र नारायण में ईश्वर मूर्ति वाली बात मंजूर नहीं थी। अमदाबाद व आसपास के वैष्णव छिटक गये। महात्मा गांधी से परहेज करने लगे। विषम सामाजिक चिंतन में तेरापंथी सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के श्री चरणों में तेरह हजार की थैली कोचरब आश्रम को चलाते रहने के लिये प्रस्तुत की। अंबालाल की दीदी अनसूया बेन महात्मा के रसोढ़े की व्यवस्था देखती थीं। अन्नपूर्णा तो बा व अनसूया बेन ही थीं पर महात्मा अपने अभ्यागतों को भोजन के साथ नीम की चटनी स्वयं परोसते थे।
ग्रेगेरियन कैलेंडर के 2015वें वर्ष में हिन्दुस्तान वाले महात्मा गांधी के कोचरब आश्रम और उसमें दलित दूधाभाई परिवार को हिन्दुस्तान से छुआछूत मिटाने की शताब्दी मनायेंगे। गुजरात का वैष्णव समाज गांधी सदाचार से प्रभावित तो था एवं कोचरब आश्रम को चलाने के लिये स्वैच्छिक वित्त पोषण भी करता था पर उन वैष्णवों को जो नरसी मेहता द्वारा श्रीकृष्ण को द्वारका में भेजी हुंडी की आस्थामूलक चर्चा तो जरूर करते थे पर मनुष्य मात्र बंधु हैं उन्हें विवेकानंद व गांधी पोषित दरिद्र नारायण में ईश्वर मूर्ति वाली बात मंजूर नहीं थी। अमदाबाद व आसपास के वैष्णव छिटक गये। महात्मा गांधी से परहेज करने लगे। विषम सामाजिक चिंतन में तेरापंथी सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के श्री चरणों में तेरह हजार की थैली कोचरब आश्रम को चलाते रहने के लिये प्रस्तुत की। अंबालाल की दीदी अनसूया बेन महात्मा के रसोढ़े की व्यवस्था देखती थीं। अन्नपूर्णा तो बा व अनसूया बेन ही थीं पर महात्मा अपने अभ्यागतों को भोजन के साथ नीम की चटनी स्वयं परोसते थे।
सन् बावन 1952 से लेकर सन् 1967 तक के चार सामान्य निर्वाचन हिन्दुस्तान की अपना मत इजहार करने वाली जनता के लिये जनतंत्र के त्यौहार पर्व सरीखे थे। पहले तीन सामान्य निर्वाचनों में हिन्द के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सक्रिय व लोकतंत्र के अगुवा थे। वे मई 1964 में अस्वस्थ होगये। उन्होंने कमलापति त्रिपाठी को कहा - मेरा इलाज शिव ज्यादह सही तरीके से कर सकते हैं, तुम उन्हें बुलाओ। पश्चिमी सभ्यता में ओतप्रोत पंडित नेहरू का दोस्ताना-याराना बड़े ऊँचे दर्जे का था। जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बन गये तब शिव त्रिपाठी ने पंडित जी से कहा - जवाहरलाल अब तुम भारत-भाग्य विधाता बन गये हो तो कुछ वैद्यक-आयुर्वेद की भी सुध लो। पंडित जी ने अपने हमजोली शिव त्रिपाठी से कहा - शिव, तुम राजकुमारी अमृत कौर से मिलो। शिव ने पंडित नेहरू को जो जवाब दिया उसे तो मैं यहां नहीं लिख रहा हूँ किन्तु सन् 1946 के पश्चात शिव त्रिपाठी फिर पंडित नेहरू से मिलने कभी नहीं गये। मृत्यु नजदीक देख कर पंडित नेहरू को शिव त्रिपाठी की काबिलियत याद आयी तथा उनकी अनुपस्थिति का ऐहसास भी हुआ। उन्होंने चाहा कि शिव उनका नाड़ी ज्ञान करके उनका रोग निदान करें। अपने नेता की इच्छा को शिव त्रिपाठी को बताने के लिये कमलापति त्रिपाठी स्वयं गये किन्तु शिव त्रिपाठी ने उन्हें झिड़क दिया। कमलापति त्रिपाठी उल्टे पांवों लौट कर पंडित नेहरू के पास आये और उनसे कहा - बजाय मेरे जिलाधिकारी वाराणसी को कहना ज्यादह अच्छा रहेगा। पंडित नेहरू का संदेशा जिलाधिकारी वाराणसी को पहुंचा। वे अधिकारी जानते ही नहीं थे कि शिव काशी की पहचान हैं, तात्कालिक सर्वोत्कृष्ट वैद्य हैं किन्तु फिर भी आज्ञानुसार उन्होंने शिव त्रिपाठी के हवेली में पहुंच कर उन्हें पंडित नेहरू की इच्छा बताई। शिव ने जिलाधिकारी से कहा - पंडित नेहरू मेरे देश के राजा हैं अतएव जाओ, जाकर उनसे स्वयं मेरा संदेश कहो कि शिव अपने मन से तो आपका इलाज नहीं करना चाहता पर हां, मेरे साथ यदि जबर्दस्ती कर मुझे गिरफ्तार कर देहरादून ले जायेंगे तब राजदण्ड के कारण मैं जवाहरलाल का इलाज कर सकता हूँ। जवाहरलाल जानते थे कि शिव त्रिपाठी अपनी आन के पक्के हैं, बलात् उठा कर देहरादून लाये जाने पर वह मेरा इलाज जरूर करेगा परन्तु जवाहरलाल को यह हठयोग मंजूर नहीं था क्योंकि जवाहरलाल केवल देश के राजा ही नहीं बल्कि अवध के किसानों के प्रिय नेता भी थे। अवध ने ही पंडित नेहरू को डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखने के लिये प्रेरित किया था। उन्होंने कमलापति त्रिपाठी को किसी अन्य वैद्य को लाने के लिये कहा। वैद्यक व ज्योतिष का चोली-दामन का साथ है। काशी के ही दूसरे वैद्य पंडित नेहरू को देखने के लिये देहरादून गये। यद्यपि एक छोटी सी घटना ने दोनों के रास्ते अलग कर दिये थे किन्तु फिर भी शिव त्रिपाठी के दिल में पंडित नेहरू के लिये अपार स्नेह था। नाजुक परिस्थिति में वे स्वयं को रोक न पाये तथा पंडित नेहरू के इलाज हेतु देहरादून जारहे काशी के उस वैद्य के गमन के समय के नक्षत्र, वार, तिथि एवं मुहूर्त्त इत्यादि का सटीक आकलन कर शिव त्रिपाठी ने कमलापति त्रिपाठी की हवेली पहुंच कर स्वयं उनसे कहा - कमला, जवाहरलाल सत्ताईस से आगे जिन्दा नहीं रहेंगे।
शेखर गुप्ता ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया का उल्लेख अपने आलेख में किया है। कुमांऊँ में नेपाल से सटा हुआ एक इलाका अस्कोट है। अस्कोट के रजवार के अत्याचारों से वहां की रियाया जिन्हें खापकर व सिर्तान का दर्जा था अत्यंत त्रस्त व पीड़ित थी। जवाहरलाल नेहरू ने अल्मोड़ा में शांतिलाल त्रिवेदी से कहा - शांतिलाल अस्कोट के गांव-गांव, घर-घर जाकर अपनी आस्थामूलक टिप्पणी मुझे दो। शांतिलाल त्रिवेदी ने जवाहरलाल नेहरू को अस्कोट का आंखों देखा हाल लिख भेजा। नेशनल हेरल्ड ने उसे छापा। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में एक अध्याय ‘‘अस्कोट से चौकोट तक’’ है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखने के तुरंत बाद पंडित नेहरू को लगा कि हिन्दुस्तान की जनता तक उनकी बात कैसे पहुंच सकती है। आम आदमी से उसकी वाणी में ही तो बात हो सकती है। पंडित नेहरू ने सस्ता साहित्य मंडल के हरिभाऊ से कहा - हरिभाऊ, क्या तुम मेरी अंग्रेजी में लिखी किताब का हिन्दी अनुवाद कर दोगे। हरिभाऊ ने जवाब दिया - पंडित जी, यह तो मेरे लिये परम सौभाग्य होगा परन्तु मेरी एक शर्त्त होगी। पंडित जी ने कहा - क्या शर्त्त होगी ? हरिभाऊ ने कहा - मेरा किया हुआ हिन्दी अनुवाद स्वयं आपको ही पूरा-पूरा पढ़ना होगा तथा ‘‘भारत की खोज’’ का प्राक्कथन भी स्वयं ही लिखना होगा तभी मैं आपकी आज्ञा का पालन कर आनंदित हो सकूंगा। पंडित नेहरू ने बात मान ली।
स्तम्भकार शेखर गुप्ता ने गुरू जी माधवराव सदाशिवराय गोलवलकर की पुस्तक ‘‘ए बंच ऑफ थॉट्स’’ का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अरविन्द केजरीवाल के 2012 में प्रकाशित स्वराज को सरसरी तरह से पढ़ डाला बंगलुरू से नयी दिल्ली आते समय। आचार्य चतुरसेन की ‘‘वैशाली की नगरवधू-आम्रपाली’’ गुप्ता जी व अरविन्द केजरीवाल दोनों ने ही पढ़ी होगी। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की अनुसार विशाल, शूण्य बंधु धूम्रकेतु विश्रवानंदन धनद निधि पति कुबेर के बेटे थे। विशाल ने ही वैशाली नगर की स्थापना की थी। राजा विशाल के बेटे का नाम हेमचंद्र पोता धूम्राक्ष फिर धूम्राक्ष से कृशाश्व सोमदत्त जिसके पुत्र का नाम जन्मेजय है। कृष्ण द्वैपायन रचित भागवत महापुराण के अनुसार वैशाली के राजपुरूषों में तृण बिन्दु व यशोधर मुख्य थे। ये सभी राजपुरूष राजा नृग के वंशधर थे जिससे परायी गौ पर गौदान करने के कारण त्रेता-द्वापर का पूरा युग द्वय बेट द्वारका में चमगादड़ की जिन्दगी जी कर बिताया। सूत जी ने लिखा - ‘‘करम गति टारे नाहीं टरी’’।
प्राचीन हिन्दुस्तान के देवर्षि नारद संबंधित आख्यान जब अखबार नहीं थे, रेडियो व दूरदर्शन का दृश्य श्रव्य सोशल मीडिया भी नहीं था नारद खबरों को पहुंचाते थे। खबर देना खबर पहुंचाना एक तात्कालिक काम है। बासी होने पर खबर बेशकीमती नही बेकीमती हो जाया करती है। अरूण शौरी का यशोगान उनका स्मरण करते हुए शेखर गुप्ता करते तो हैं और वह अच्छा भी है परन्तु रामनाथ गोयनका के अखबार को फ्रैंक मौरिस ने जो ऊँचाई दी वह अपने आप में अद्वितीय है। पंडित नेहरू की सरकार के खिलाफ जब 1963 पारसपत्र लोकसभा में तीन आना बनाम तीन रूपये की बहस डाक्टर लोहिया ने शुरू की, डाक्टर साहब देवरिया के लोकसभा सांसद उग्रसेन को मेरे पास भेजा कहलाया मेरा बयान लोकसभा में सुनने नौकरी से छुट्टी लेकर आइये। पत्रकार दीर्घा में फ्रैंक मौरिस व सी.के. तिवारी भी बैठे थे। फ्रैंक मौरिस ने लिखा हिन्दी में इतने उच्च स्तर की संसदीय बहस हो सकती है डाक्टर लोहिया ने यह साबित कर दिया। पंडित नेहरू को डाक्टर लोहिया में भारतीय विदेश नीति का राजनीतिज्ञ दिखता था। वे डाक्टर लोहिया को राममनोहर कह कर पुकारते थे। संसद में उन्होंने संसदीय शिष्टाचार बजाय आत्मीयता से कहा - राममनोहर, पंडित जी के अपनी त्रुटि का अहसास होगया। उन्होंने फिर कहा - माननीय सदस्य। डाक्टर लोहिया ने पंडित जी से प्रार्थना की कि आप राममनोहर ही कह कर मुझे पुकारें माननीय सदस्य नहीं। यह है अन्तरात्मा का एक आत्मा से दूसरी आत्मा का अनुराग। सरदार वल्लभ भाई पटेल को हिन्दुस्तान की रियासतों को भारतीय संघ से जोड़ने की मुहिम में उनके सचिव वी.पी. मेनन की अद्वितीय पहल थी। सरदार पटेल ने कश्मीर नरेश राजा हरि सिंह को भारत संघ में जोड़ने के लिये गोलवलकर जी का सहयोग लिया। राजा हरि सिंह गुरू जी का बहुत आदर करते थे। वे श्रीनगर के हवाई अड्डे में गुरू जी का स्वागत करने स्वयं आये। वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक में लिखा कि राजा हरि सिंह ने हवाई अड्डे में ही गुरू जी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सरेआम साष्टांग प्रणाम किया। राजमहल जाकर राज्य कश्मीर को भारत में मिलाने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।
बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, महात्मा गांधी का अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज देशवासियों के लिये पार्लियामेंटरी स्वराज्य की संकल्पना रावी के तट पर कांग्रेसाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू के ‘पूर्ण स्वराज’ का उद्घोष आजाद भारत के लोगों की पिछले सड़सठ वर्ष की स्वतंत्र चेता राष्ट्र यात्रा को मोहनदास करमचन्द गांधी के हिन्द स्वराज और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के खाके को आज के नये परिप्रेक्ष्य में भांपने की जरूरत है। नांदीमुख गांधी के हिन्द स्वराज व अरविन्द केजरीवाल संकल्पित स्वराज पर देश में 2014 के महानिर्वाचन के पहले आने वाले अढ़ाई महीनों में देश को धीरोदस्त दृढ़निश्चयी तथा अपने वादे पर टिकने वाले नेता की जरूरत है। अब तक ज्ञात उम्मीदवार नमो हैं। नरेन्द्र मोदी सहित वे उम्मीदवार जो प्रधानमंत्री तो बनना चाहते हैं पर खुल कर आगे नहीं आरहे हैं उन्हें भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना होगा। देश इस समय ऐसा दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व चाहता है जो हर देशवासी का योगक्षेम देखे और भारत को विश्व में उसका वाजिब वैभव दिलाये। आपके सिद्धांतविद योगेन्द्र यादव ने अपने साक्षात्कार में आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषित उम्मीदवार और कांग्रेस के अघोषित उम्मीदवार को अपनी बात दोहराते हुए ‘प्ज ूपसस इम ं जतंहमकल वित प्दकपं’ उम्मीदवार कहा है। सिद्धांतकार यह भी कहते हैं कि वे अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम जाहिर करेंगे यदि आप अपने दांव को अंगद के पांव सरीखा मजबूत पाती है। अगर आप अपने उम्मीदवार का नाम प्रकट करती है तो देश में प्रधानमंत्री पद के जो इतर दावेदार हैं मतदाता अदालत उनका फैसला देगी। योगेन्द्र यादव का मत है कि उनका दल लोकसभा चुनाव अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्त्व में लड़ेगा। हिन्दुस्तान के कुछ गांधीवादी विचार पोखर के मनीषी भी आप को सशर्त्त समर्थन देने की घोषणा कर रहे हैं। अभी तो ग्रेगेरियन कैलेंडर का दूसरा महीना ही चल रहा है अबकी गुड़िपड़वा चैती चांद, संवत्सर प्रतिपदा 30 मार्च 2014 को पड़ रहा है। पराभव संवत्सर अपनी जिम्मेदारियां पूर्णवत्सरी अमावस्या 29 मार्च 14 को तिरोधान हो जायेगा। उसकी जगह प्लवंग नाम का नया संवत्सर आरहा है। भारत के काफी इलाकों के रहने वाले लोग संवत्सर पड़वा गुड़िपड़वा और मेष संक्रांति से नया साल मनाते हैं। लोकसभा का आगामी चुनाव राष्ट्रीय पंचांग के अनुसार सौर वैशाख महीने से शक संवत 1936 में होगा। मोहनदास करमचंद गांधी रचित ‘हिन्द स्वराज’ और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के लोक मंथन ने ही यह फैसला करना है कि हम हिन्दुस्तानी गांधी का आध्यात्मिक स्वराज पार्लियामेंटरी स्वराज व केजरीवाल के स्वराज में किसे चुनते हैं ? मोहनदास करमचंद गांधी भारत राष्ट्र राज्य नांदीमुख है। देश के दुनिया को दिखाने लायक चेहरे हैं। अहिंसा के प्रवर्तक युगपुरूष गांधी संकल्पित स्वराज हमारा अभिप्रेत है। हमें वचन भंग न करने वाले महात्मा गांधी सरीखे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व की जरूरत है। देश के मतदाता ही उसका भविष्य तय करने वाले शक्तिस्त्रोत हैं। वे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व का वरण करें यही भारत राष्ट्र की मंगल कामना है। महात्मा गांधी - मोहनदास करमचंद गांधी रचित हिन्द स्वराज में बीस अध्याय हैं। अरविन्द केजरीवाल की बारह अध्याय वाली पुस्तक स्वराज हिन्द स्वराज के अस्तित्त्व में आने के एक सौ चार वर्ष प्श्चात जनवाणी आयी। दोनों पीढ़ियों के अंतराल के समानांतर भारत की दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही जनसंख्या के सामने मुंह बाये खड़ी अनेकानेक त्रासद समस्याओं का जो अंबार लगा हुआ है उन ज्वलंत सरोकारों का समाधान युग की पुकार है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, महात्मा गांधी का अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज देशवासियों के लिये पार्लियामेंटरी स्वराज्य की संकल्पना रावी के तट पर कांग्रेसाध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू के ‘पूर्ण स्वराज’ का उद्घोष आजाद भारत के लोगों की पिछले सड़सठ वर्ष की स्वतंत्र चेता राष्ट्र यात्रा को मोहनदास करमचन्द गांधी के हिन्द स्वराज और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के खाके को आज के नये परिप्रेक्ष्य में भांपने की जरूरत है। नांदीमुख गांधी के हिन्द स्वराज व अरविन्द केजरीवाल संकल्पित स्वराज पर देश में 2014 के महानिर्वाचन के पहले आने वाले अढ़ाई महीनों में देश को धीरोदस्त दृढ़निश्चयी तथा अपने वादे पर टिकने वाले नेता की जरूरत है। अब तक ज्ञात उम्मीदवार नमो हैं। नरेन्द्र मोदी सहित वे उम्मीदवार जो प्रधानमंत्री तो बनना चाहते हैं पर खुल कर आगे नहीं आरहे हैं उन्हें भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना होगा। देश इस समय ऐसा दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व चाहता है जो हर देशवासी का योगक्षेम देखे और भारत को विश्व में उसका वाजिब वैभव दिलाये। आपके सिद्धांतविद योगेन्द्र यादव ने अपने साक्षात्कार में आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषित उम्मीदवार और कांग्रेस के अघोषित उम्मीदवार को अपनी बात दोहराते हुए ‘प्ज ूपसस इम ं जतंहमकल वित प्दकपं’ उम्मीदवार कहा है। सिद्धांतकार यह भी कहते हैं कि वे अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम जाहिर करेंगे यदि आप अपने दांव को अंगद के पांव सरीखा मजबूत पाती है। अगर आप अपने उम्मीदवार का नाम प्रकट करती है तो देश में प्रधानमंत्री पद के जो इतर दावेदार हैं मतदाता अदालत उनका फैसला देगी। योगेन्द्र यादव का मत है कि उनका दल लोकसभा चुनाव अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्त्व में लड़ेगा। हिन्दुस्तान के कुछ गांधीवादी विचार पोखर के मनीषी भी आप को सशर्त्त समर्थन देने की घोषणा कर रहे हैं। अभी तो ग्रेगेरियन कैलेंडर का दूसरा महीना ही चल रहा है अबकी गुड़िपड़वा चैती चांद, संवत्सर प्रतिपदा 30 मार्च 2014 को पड़ रहा है। पराभव संवत्सर अपनी जिम्मेदारियां पूर्णवत्सरी अमावस्या 29 मार्च 14 को तिरोधान हो जायेगा। उसकी जगह प्लवंग नाम का नया संवत्सर आरहा है। भारत के काफी इलाकों के रहने वाले लोग संवत्सर पड़वा गुड़िपड़वा और मेष संक्रांति से नया साल मनाते हैं। लोकसभा का आगामी चुनाव राष्ट्रीय पंचांग के अनुसार सौर वैशाख महीने से शक संवत 1936 में होगा। मोहनदास करमचंद गांधी रचित ‘हिन्द स्वराज’ और अरविन्द केजरीवाल के स्वराज के लोक मंथन ने ही यह फैसला करना है कि हम हिन्दुस्तानी गांधी का आध्यात्मिक स्वराज पार्लियामेंटरी स्वराज व केजरीवाल के स्वराज में किसे चुनते हैं ? मोहनदास करमचंद गांधी भारत राष्ट्र राज्य नांदीमुख है। देश के दुनिया को दिखाने लायक चेहरे हैं। अहिंसा के प्रवर्तक युगपुरूष गांधी संकल्पित स्वराज हमारा अभिप्रेत है। हमें वचन भंग न करने वाले महात्मा गांधी सरीखे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व की जरूरत है। देश के मतदाता ही उसका भविष्य तय करने वाले शक्तिस्त्रोत हैं। वे दृढ़निश्चयी नेतृत्त्व का वरण करें यही भारत राष्ट्र की मंगल कामना है। महात्मा गांधी - मोहनदास करमचंद गांधी रचित हिन्द स्वराज में बीस अध्याय हैं। अरविन्द केजरीवाल की बारह अध्याय वाली पुस्तक स्वराज हिन्द स्वराज के अस्तित्त्व में आने के एक सौ चार वर्ष प्श्चात जनवाणी आयी। दोनों पीढ़ियों के अंतराल के समानांतर भारत की दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही जनसंख्या के सामने मुंह बाये खड़ी अनेकानेक त्रासद समस्याओं का जो अंबार लगा हुआ है उन ज्वलंत सरोकारों का समाधान युग की पुकार है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
भन्ते! भारत भ्रष्टाचार भगावा।
पंचतन्त्र की कहानी "भक्षभक्ष्यकयो: प्रीति विपत्तेरेव कारणम् " कहती है। आम आदमी की वाणी में इसे ‘घोड़े और घास की यारी’ के रूप में जाना जाता है। स्वातंत्र्योत्तर पौने सात दशकों में भारतीय राजनीतिक चेतना को मंद गति वाला मंथरानुमा लकवा मार गया है। धनबल, बाहुबल एवं दस्युबल से लैस राजनीति करने वाले राजनीतिक पंगत के महत्त्वपूर्ण नाकों पर कब्जा कर चुके हैं। ज्यादातर राजनीतिक समूह या तो परिवारवादी हैं या जातिवादी हैं। साम्यवाद प्रभावित राजनीतिक दल और वैचारिक तौर पर अपने आपको सांस्कृतिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत मानने वाले अंगुलियों में गिने जाने लायक राजनीति करने वाले समूहों को छोड़ कर जो क्षेत्रीय क्षत्रप अथवा क्षेत्रीय जातिवादी तथा कुटुंबमूलक राजनीतिक पुरोधाओं का वर्चस्व क्षेत्रीय जातीय तथा क्षत्रप वर्चस्व की राजनीति में भी राजधर्म के बजाय दस्युधर्मा भीड़तंत्र वाले धनतंत्र का बोलबाला है। राष्ट्रीय स्तर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद शासक दल जिसे संसद में पूर्ण बहुमत था उसे राजनैतिक चैतन्यता अपनानी चाहिये थी पर 1984 में श्रीमती गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकार का मुकुट राजीव गांधी को पहना दिया गया। यहीं से तीव्र राजनीतिक अफरातफरी शुरू हुई। राजनीतिक आदर्शों की अवहेलना तो 1967 के निर्वाचन के पश्चात ही शुरू हो चुकी थी। इन्दिरा सरकार ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता तथा सैद्धांतिक जीवन बिताने वाले राजनीतिज्ञ मोरारजी रणछोड़जी देसाई की सदारत में प्रशासनिक सुधार आयोग गठित किया, उद्देश्य मुरारजी देसाई को उकसाना मात्र था। मोरारजी देसाई के वैयक्तिक जीवन प्रशासनिक अनुभव के समानांतर दीर्घ अवधि वाला राजनीतिक अनुभव था। मोरारजी देसाई ने अपनी प्रशासनिक सुधार संस्तुति में उत्तर यूरोप के स्कैन्डेनेवियन देशों में प्रचलित OMBUDSMAN अंबुद समान सतर्कता शीर्ष का आह्वान किया था। प्रशासनिक सुधार आयोग की संस्तुतियों पर मुंबई से प्रकाशित होने वाले दिनमान साप्ताहिक के संपादक रघुवीर सहाय ने अंबुदसमान संबंधी अपने विचारोत्तेजक लेखों, आख्यानों व संपादकीय द्वारा भारत की जनता को झकझोरा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के आयाम अपने पाठकों के सामने रखे। मोरारजी देसाई ने जो संस्तुतियां सातवें दशक के अंतिम वर्षों में की वह अंबुदसमान अगर 1971-75 के बीच आकार ग्रहण कर लेता तो शायद इंदिरा जी को आपात काल नहीं लगाना पड़ता। आपात काल भारतीय राजनीति के वर्चस्व पर एक बहुत बड़ा कुरूप धब्बा था। इंदिरा गांधी के किचन कैबिनेट की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़त और राजीव गांधी राज के उनके गैर राजनीतिक दोस्तों व हमजोलियों ने जो कारनामे किये उनका असर तत्काल नहीं हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह का उद्भव उनकी अनुभव रहित राजनीतिक हाराकिरी ने सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान किया। अगर 1984 में ज्ञानी जैल सिंह जी ने आननफानन में राजीव गांधी की ताजपोशी करने के बजाय उन रास्तों को भी खोजा होता जो जवाहरलाल नेहरू के निधन तथा लालबहादुर शास्त्री की विदेश की जमीन में हुई मृत्यु के बाद गुलजारी लाल नंदा के भारत का प्रधानमंत्री पद दो बार संभालना पड़ा था। यह है बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय। राजनीति अत्यंत टेढ़ा मेढ़ा रास्ता है। उस टेढ़े मेढ़े रास्तों पर अनेक ऐसे गतिरोधक हैं जिनका सामना किये बगैर कोई भी राजनीति विजेता सफलतापूर्वक अपनी राजनीतिक प्रवाहमान धारा को नहीं चला सकता। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री को साहित्य प्यारा था। वे बालकृष्ण शर्मा नवीन, मैथिलीशरण गुप्त तथा रामधारी सिंह दिनकर के काव्य पाठ का आनंद लेते थे। इलाहाबाद के कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंशराय बच्चन तथा रघुपति सहाय फिराक की शायरी उन्हें भाती थी। वे स्वयं भी इन कवियों के पास जाते थे और उन्हें बुलाते भी थे। संत विनोबा का राजनीतिक दर्शन हंसते-हंसते लोटपोट कराने वाला था। विनोबा जी से जब नेहरू जी पवनार धाम में मिले तो संत ने नेता से कहा - राज्याते नरकम् ध्रुवम्। सनातन शास्त्र में हिन्दुस्तानी लोग निधिपति धनद कुबेर को धन का देवता मानते हैं। यूनानी धन देवता प्लुत है। पश्चिम से मानसिक चिंतन से जुड़े भारतीय विद्वत मंडल व स्वतंत्र चेता व्यक्ति अंग्रेजी शब्द प्लुतोक्रेसी नव धनियों नव धनाढ्यों द्वारा सारे तंत्र पर अपनी गहरी पकड़ की बात करते हैं। बात बहुत पुरानी नहीं है। राजा बलदेव दास बिड़ला जब साठ वर्ष के हुए उन्होंने अपना कारोबार अपने बेटों को सौंप काशी वास का व्रत लिया। जो व्यक्ति तत्कालीन धन कुबेर था उसने बनारस की गलियों में घूमना शुरू किया। आजाद हिन्दुस्तान ने सेकुलरिज्म का वरण किया। ऐहिक, ऐन्द्रिक सुख की ज्यादा से ज्यादा कामना, परोपकार, करूणा, दुर्बल के प्रति हमदर्दी का जो माद्दा हिन्दुस्तान के उन लोगों में था जो व्यापार कर धनार्जन करते, धर्मकथा भी लगाते अपनी आमदनी का निश्चित हिस्सा खर्च करते। महात्मा गांधी के दृश्य पटल पर रहते तक रईस व रंक का अपना अपना आत्म सम्मान था। महात्मा गांधी के मानस पुत्र सरीखे सेठ जमनालाल बजाज जो हिन्दुस्तानी जात बिरादरी के नजरिये से महात्मा की ही तरह बनिया थे उन्होंने एक दिन महात्मा से कहा - बापू सात पीढ़ी की जीविका के लिये धन कमा चुका हूँ। गांधी ने हंस कर सेठ जमनालाल से कहा - जमनालाल गांव से करीब एक मील की दूरी पर सड़क के किनारे एक बुढ़िया बैठती है। भीख पर जिन्दा रहती है उसे आटा दे आओ। सेठ जमनालाल बजाज आटा देने बुढ़िया के पास गये। बुढ़िया ने उन्हें कहा - आज की रोटी का इंतजाम है कल की कल देखी जायेगी। जब जमनालाल आटा लेकर वापस आये उन्होंने बापू को घटना सुनायी। यह है दरिद्र का अपरिग्रह। गांधी, संत शिरोमणि स्वामी विवेकानंद की तरह दरिद्रनारायण संज्ञा से गरीब का अभिषेक करते थे।
यक्ष प्रश्न ? - भ्रष्टाचार की पहचान
भारत में इस्लामी राज ईस्ट इंडिया कम्पनी का व्यापार राज पहले स्वतंत्रता आंदोलन 1857 के सैन्य विद्रोह बर्तानी ताज का भारत पर सीधा सीधा नब्बे साला शासन 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण ने शासन व्यवस्था के समानांतर कार्मिक-भ्रष्टाचार ने भी अपने पांव फैलाये। उपनिवेश वादी शासन व्यवस्था में बर्तानी राज के अपने कब्जे में नये नये इलाकों को जोड़ते रहने के साथ जहां एक ओर युद्धमूलक दुराचार व भ्रष्टाचार फलता फूलता रहा। बर्तानी राज मैनुअल आधारित शासन व्यवस्था को अंजाम देते समय हिन्दुस्तान की आम जनता को यह भरोसा देने की कोशिश करता था कि वह न्यायपूर्ण राज व्यवस्था भारत में उसी तरह चलाना चाहता है जिस तरह इंगलिस्तान की राज सत्ता लोक सत्ता के साथ हाथ में हाथ मिला कर चलती है। 1858 में कुंभ मेले में बर्तानियां की महारानी विक्टोरिया का संदेश लाखों भारतीयों को सधुक्कड़ी तब की भारतीय लिंग्वा फ्रांका में संगम तट पर सुनाया गया था। भारतवासियों से वादा भी किया गया था कि बर्तानी राज उनके रस्मो रिवाज पर हमला नहीं करेगा। शांति व्यवस्था ही उसका उद्घोष था। हिन्दुस्तान के लोगों में स्वतंत्रता, स्वराज और सुशासन की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के चुंबकीय व्यक्तित्त्वों ने आम हिन्दुस्तानी को जाग्रत कर डाला था। ये तीनों युग पुरूष इस दुनियां में राज करने नहीं आये थे। उन व्यक्तिगत व सामाजिक सरोकार ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत्’’ था।
दुर्गंध ठहरे हुए पानी में ही आती है। पानी का प्रवाह जब रूक जाता है, जब आदमी अपनी दिखाऊ छवि को बरकरार रखने के लिये शहरी जिन्दगी की दुर्गंध को जमीन के नीचे गटर व गंदी नाली में डाल कर जल-जमीन व जंगल (वृक्ष-स्थावर जीव) पर आवश्यकता से ज्यादा दोहन करने के उपाय शुरू करता है बस वहीं पर भ्रष्टाचार का उद्गम होता है। तंत्र व भ्रष्टाचार का आपसी संबंध चोली-दामन सरीखा है। जहां प्रबंधन होगा, व्यवस्था होगी, पंक्तिभेद का व्यवहार होगा वहां भ्रष्टाचार बिन बुलाये मेहमान की तरह अपना आसन मजबूती से पकड़ लेगा इसीलिये तंत्र के समानांतर पुराने हिन्दुस्तान में वानप्रस्थ जीवन की परिकल्पना थी जो तंत्र के समानांतर तंत्र में उपजने वाले भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिये लोक सत्ता मूलक सदाचार का आश्रय लेता था। विभाजन की विभीषिका जब भ्रष्टाचार व कदाचार से लोहा लेने के लिये अखिल भारतीय राष्ट्रीय संकल्प वाले जिन स्वयं सेवी संगठनों ने विभाजन पीड़ितों की जो सेवा की, मानवीय उच्चादर्श का जो उदाहरण प्रस्तुत किया आजादी के पश्चात स्वातंत्र्य वीर राजकाज में फंस जरूर गये पर उन्होंने भारत सेवक समाज तथा भारत साधु समाज जैसे गैर राजनीतिक संगठन खड़े कर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रणालियों के समानांतर एक ऐसा सत्ता रहित चौकसी तंत्र खड़ा किया जिसे देख कर भ्रष्टाचार लिप्तता को खौफ हो जाता था। जवाहरलाल और गुलजारीलाल में यह माद्दा था। जवाहरलाल के निधन के पश्चात भ्रष्टाचार जो तब तक कालीन के नीचे दुबक रहा था खुल कर सामने आया। उत्तर नेहरू पचास वर्ष की राजनीतिक, प्रशासनिक तथा आस्थामूलकता सहित उद्योग, व्यापार, संस्कृति, साहित्य, संगीत, सिनेमा, खेल सहित समूचा मानव धर्म भ्रष्टाचार की लपेट में आगया। वैश्विक बाजारीकरण ने कोढ़ में खाज का काम किया। पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने परमिट, लाइसेंस राज तथा इन्सपेक्टर राज खत्म करने का उद्घोष क्या किया भारत में यत्र तत्र भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार नजर आने लगा। सवाल उठता है कि क्या केवल सख्त कानून बनाने से हर भ्रष्टाचारी को जेल में बंद करने से भ्रष्टाचार को भगाया जा सकता है। नहीं मौजूदा हालातों में भ्रष्टाचार के रक्तबीज को समूल उखाड़ने के लिये आद्या शक्ति को पुनः जाग्रत करने की तात्कालिक जरूरत है। भ्रष्टाचार को कम करने के लिये अथवा उसे रोकने के लिये सदाचार का रास्ता मजबूत करना जरूरी है। पाश्चात्य लोकतांत्रिक प्रणाली भारत में यूरोप व अमेरिका की तरह अपनी जड़ें नहीं जमा सकती क्योंकि भारत का पारस्परिक पंचायती प्रबंधन विष्णु पुराण में वर्णित ‘‘कूर्म मगध खस गणै’’ से प्रेरित है। यहां की जाति पंचायतों के स्वरूप को उनकी आंतरिक मर्यादाओं को अध्ययनपूर्वक पहचानने के बाद ही खाप पंचायतों सहित विभिन्न प्रकार की जो जाति पंचायतें आज भी यत्किंचित् अस्तित्त्व में हैं समाज को प्रभावित करती रहती हैं उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में समझा कर उनके सरोकारों को कारगर संवाद से ही हल करने की जरूरत है। केवल कानून की रट लगाना, मौजूदा कानूनों को उपयोग करते समय भ्रष्टाचार के कारण पंक्तिभेद करते रहने से अदालतों में मुकदमे बढ़ेंगे। जेलों में भी कितने लोगों को ठूंसेंगे अतः वह भी कोई कारगर हल नहीं हो सकता इसलिये सामाजिक चौकस सामाजिक अंबुदसमान जिसे विगत शताब्दी के सातवें दशक में रघुवीर सहाय ने उछाला था, मोरारजी देसाई ने भी जिस अंबुदसमान की अनुशंसा की थी सवैधानिक अंबुदसमान या लोकपाल के समानांतर सामजिक गैर सरकारी अंबुदसमान की नैतिक सत्ता ही भ्रष्टाचार के बढ़ावे को रोक सकती है। हिन्द स्वराज व अरविन्द स्वराज में हम किसे चुनते हैं यह 2014 के महानिर्वाचन में सामने आने वाला है।
पंचतन्त्र की कहानी "भक्षभक्ष्यकयो: प्रीति विपत्तेरेव कारणम् " कहती है। आम आदमी की वाणी में इसे ‘घोड़े और घास की यारी’ के रूप में जाना जाता है। स्वातंत्र्योत्तर पौने सात दशकों में भारतीय राजनीतिक चेतना को मंद गति वाला मंथरानुमा लकवा मार गया है। धनबल, बाहुबल एवं दस्युबल से लैस राजनीति करने वाले राजनीतिक पंगत के महत्त्वपूर्ण नाकों पर कब्जा कर चुके हैं। ज्यादातर राजनीतिक समूह या तो परिवारवादी हैं या जातिवादी हैं। साम्यवाद प्रभावित राजनीतिक दल और वैचारिक तौर पर अपने आपको सांस्कृतिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत मानने वाले अंगुलियों में गिने जाने लायक राजनीति करने वाले समूहों को छोड़ कर जो क्षेत्रीय क्षत्रप अथवा क्षेत्रीय जातिवादी तथा कुटुंबमूलक राजनीतिक पुरोधाओं का वर्चस्व क्षेत्रीय जातीय तथा क्षत्रप वर्चस्व की राजनीति में भी राजधर्म के बजाय दस्युधर्मा भीड़तंत्र वाले धनतंत्र का बोलबाला है। राष्ट्रीय स्तर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद शासक दल जिसे संसद में पूर्ण बहुमत था उसे राजनैतिक चैतन्यता अपनानी चाहिये थी पर 1984 में श्रीमती गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकार का मुकुट राजीव गांधी को पहना दिया गया। यहीं से तीव्र राजनीतिक अफरातफरी शुरू हुई। राजनीतिक आदर्शों की अवहेलना तो 1967 के निर्वाचन के पश्चात ही शुरू हो चुकी थी। इन्दिरा सरकार ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता तथा सैद्धांतिक जीवन बिताने वाले राजनीतिज्ञ मोरारजी रणछोड़जी देसाई की सदारत में प्रशासनिक सुधार आयोग गठित किया, उद्देश्य मुरारजी देसाई को उकसाना मात्र था। मोरारजी देसाई के वैयक्तिक जीवन प्रशासनिक अनुभव के समानांतर दीर्घ अवधि वाला राजनीतिक अनुभव था। मोरारजी देसाई ने अपनी प्रशासनिक सुधार संस्तुति में उत्तर यूरोप के स्कैन्डेनेवियन देशों में प्रचलित OMBUDSMAN अंबुद समान सतर्कता शीर्ष का आह्वान किया था। प्रशासनिक सुधार आयोग की संस्तुतियों पर मुंबई से प्रकाशित होने वाले दिनमान साप्ताहिक के संपादक रघुवीर सहाय ने अंबुदसमान संबंधी अपने विचारोत्तेजक लेखों, आख्यानों व संपादकीय द्वारा भारत की जनता को झकझोरा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के आयाम अपने पाठकों के सामने रखे। मोरारजी देसाई ने जो संस्तुतियां सातवें दशक के अंतिम वर्षों में की वह अंबुदसमान अगर 1971-75 के बीच आकार ग्रहण कर लेता तो शायद इंदिरा जी को आपात काल नहीं लगाना पड़ता। आपात काल भारतीय राजनीति के वर्चस्व पर एक बहुत बड़ा कुरूप धब्बा था। इंदिरा गांधी के किचन कैबिनेट की दिन दूनी रात चौगुनी बढ़त और राजीव गांधी राज के उनके गैर राजनीतिक दोस्तों व हमजोलियों ने जो कारनामे किये उनका असर तत्काल नहीं हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह का उद्भव उनकी अनुभव रहित राजनीतिक हाराकिरी ने सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान किया। अगर 1984 में ज्ञानी जैल सिंह जी ने आननफानन में राजीव गांधी की ताजपोशी करने के बजाय उन रास्तों को भी खोजा होता जो जवाहरलाल नेहरू के निधन तथा लालबहादुर शास्त्री की विदेश की जमीन में हुई मृत्यु के बाद गुलजारी लाल नंदा के भारत का प्रधानमंत्री पद दो बार संभालना पड़ा था। यह है बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय। राजनीति अत्यंत टेढ़ा मेढ़ा रास्ता है। उस टेढ़े मेढ़े रास्तों पर अनेक ऐसे गतिरोधक हैं जिनका सामना किये बगैर कोई भी राजनीति विजेता सफलतापूर्वक अपनी राजनीतिक प्रवाहमान धारा को नहीं चला सकता। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री को साहित्य प्यारा था। वे बालकृष्ण शर्मा नवीन, मैथिलीशरण गुप्त तथा रामधारी सिंह दिनकर के काव्य पाठ का आनंद लेते थे। इलाहाबाद के कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंशराय बच्चन तथा रघुपति सहाय फिराक की शायरी उन्हें भाती थी। वे स्वयं भी इन कवियों के पास जाते थे और उन्हें बुलाते भी थे। संत विनोबा का राजनीतिक दर्शन हंसते-हंसते लोटपोट कराने वाला था। विनोबा जी से जब नेहरू जी पवनार धाम में मिले तो संत ने नेता से कहा - राज्याते नरकम् ध्रुवम्। सनातन शास्त्र में हिन्दुस्तानी लोग निधिपति धनद कुबेर को धन का देवता मानते हैं। यूनानी धन देवता प्लुत है। पश्चिम से मानसिक चिंतन से जुड़े भारतीय विद्वत मंडल व स्वतंत्र चेता व्यक्ति अंग्रेजी शब्द प्लुतोक्रेसी नव धनियों नव धनाढ्यों द्वारा सारे तंत्र पर अपनी गहरी पकड़ की बात करते हैं। बात बहुत पुरानी नहीं है। राजा बलदेव दास बिड़ला जब साठ वर्ष के हुए उन्होंने अपना कारोबार अपने बेटों को सौंप काशी वास का व्रत लिया। जो व्यक्ति तत्कालीन धन कुबेर था उसने बनारस की गलियों में घूमना शुरू किया। आजाद हिन्दुस्तान ने सेकुलरिज्म का वरण किया। ऐहिक, ऐन्द्रिक सुख की ज्यादा से ज्यादा कामना, परोपकार, करूणा, दुर्बल के प्रति हमदर्दी का जो माद्दा हिन्दुस्तान के उन लोगों में था जो व्यापार कर धनार्जन करते, धर्मकथा भी लगाते अपनी आमदनी का निश्चित हिस्सा खर्च करते। महात्मा गांधी के दृश्य पटल पर रहते तक रईस व रंक का अपना अपना आत्म सम्मान था। महात्मा गांधी के मानस पुत्र सरीखे सेठ जमनालाल बजाज जो हिन्दुस्तानी जात बिरादरी के नजरिये से महात्मा की ही तरह बनिया थे उन्होंने एक दिन महात्मा से कहा - बापू सात पीढ़ी की जीविका के लिये धन कमा चुका हूँ। गांधी ने हंस कर सेठ जमनालाल से कहा - जमनालाल गांव से करीब एक मील की दूरी पर सड़क के किनारे एक बुढ़िया बैठती है। भीख पर जिन्दा रहती है उसे आटा दे आओ। सेठ जमनालाल बजाज आटा देने बुढ़िया के पास गये। बुढ़िया ने उन्हें कहा - आज की रोटी का इंतजाम है कल की कल देखी जायेगी। जब जमनालाल आटा लेकर वापस आये उन्होंने बापू को घटना सुनायी। यह है दरिद्र का अपरिग्रह। गांधी, संत शिरोमणि स्वामी विवेकानंद की तरह दरिद्रनारायण संज्ञा से गरीब का अभिषेक करते थे।
यक्ष प्रश्न ? - भ्रष्टाचार की पहचान
भारत में इस्लामी राज ईस्ट इंडिया कम्पनी का व्यापार राज पहले स्वतंत्रता आंदोलन 1857 के सैन्य विद्रोह बर्तानी ताज का भारत पर सीधा सीधा नब्बे साला शासन 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण ने शासन व्यवस्था के समानांतर कार्मिक-भ्रष्टाचार ने भी अपने पांव फैलाये। उपनिवेश वादी शासन व्यवस्था में बर्तानी राज के अपने कब्जे में नये नये इलाकों को जोड़ते रहने के साथ जहां एक ओर युद्धमूलक दुराचार व भ्रष्टाचार फलता फूलता रहा। बर्तानी राज मैनुअल आधारित शासन व्यवस्था को अंजाम देते समय हिन्दुस्तान की आम जनता को यह भरोसा देने की कोशिश करता था कि वह न्यायपूर्ण राज व्यवस्था भारत में उसी तरह चलाना चाहता है जिस तरह इंगलिस्तान की राज सत्ता लोक सत्ता के साथ हाथ में हाथ मिला कर चलती है। 1858 में कुंभ मेले में बर्तानियां की महारानी विक्टोरिया का संदेश लाखों भारतीयों को सधुक्कड़ी तब की भारतीय लिंग्वा फ्रांका में संगम तट पर सुनाया गया था। भारतवासियों से वादा भी किया गया था कि बर्तानी राज उनके रस्मो रिवाज पर हमला नहीं करेगा। शांति व्यवस्था ही उसका उद्घोष था। हिन्दुस्तान के लोगों में स्वतंत्रता, स्वराज और सुशासन की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के चुंबकीय व्यक्तित्त्वों ने आम हिन्दुस्तानी को जाग्रत कर डाला था। ये तीनों युग पुरूष इस दुनियां में राज करने नहीं आये थे। उन व्यक्तिगत व सामाजिक सरोकार ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत्’’ था।
दुर्गंध ठहरे हुए पानी में ही आती है। पानी का प्रवाह जब रूक जाता है, जब आदमी अपनी दिखाऊ छवि को बरकरार रखने के लिये शहरी जिन्दगी की दुर्गंध को जमीन के नीचे गटर व गंदी नाली में डाल कर जल-जमीन व जंगल (वृक्ष-स्थावर जीव) पर आवश्यकता से ज्यादा दोहन करने के उपाय शुरू करता है बस वहीं पर भ्रष्टाचार का उद्गम होता है। तंत्र व भ्रष्टाचार का आपसी संबंध चोली-दामन सरीखा है। जहां प्रबंधन होगा, व्यवस्था होगी, पंक्तिभेद का व्यवहार होगा वहां भ्रष्टाचार बिन बुलाये मेहमान की तरह अपना आसन मजबूती से पकड़ लेगा इसीलिये तंत्र के समानांतर पुराने हिन्दुस्तान में वानप्रस्थ जीवन की परिकल्पना थी जो तंत्र के समानांतर तंत्र में उपजने वाले भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिये लोक सत्ता मूलक सदाचार का आश्रय लेता था। विभाजन की विभीषिका जब भ्रष्टाचार व कदाचार से लोहा लेने के लिये अखिल भारतीय राष्ट्रीय संकल्प वाले जिन स्वयं सेवी संगठनों ने विभाजन पीड़ितों की जो सेवा की, मानवीय उच्चादर्श का जो उदाहरण प्रस्तुत किया आजादी के पश्चात स्वातंत्र्य वीर राजकाज में फंस जरूर गये पर उन्होंने भारत सेवक समाज तथा भारत साधु समाज जैसे गैर राजनीतिक संगठन खड़े कर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रणालियों के समानांतर एक ऐसा सत्ता रहित चौकसी तंत्र खड़ा किया जिसे देख कर भ्रष्टाचार लिप्तता को खौफ हो जाता था। जवाहरलाल और गुलजारीलाल में यह माद्दा था। जवाहरलाल के निधन के पश्चात भ्रष्टाचार जो तब तक कालीन के नीचे दुबक रहा था खुल कर सामने आया। उत्तर नेहरू पचास वर्ष की राजनीतिक, प्रशासनिक तथा आस्थामूलकता सहित उद्योग, व्यापार, संस्कृति, साहित्य, संगीत, सिनेमा, खेल सहित समूचा मानव धर्म भ्रष्टाचार की लपेट में आगया। वैश्विक बाजारीकरण ने कोढ़ में खाज का काम किया। पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने परमिट, लाइसेंस राज तथा इन्सपेक्टर राज खत्म करने का उद्घोष क्या किया भारत में यत्र तत्र भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार नजर आने लगा। सवाल उठता है कि क्या केवल सख्त कानून बनाने से हर भ्रष्टाचारी को जेल में बंद करने से भ्रष्टाचार को भगाया जा सकता है। नहीं मौजूदा हालातों में भ्रष्टाचार के रक्तबीज को समूल उखाड़ने के लिये आद्या शक्ति को पुनः जाग्रत करने की तात्कालिक जरूरत है। भ्रष्टाचार को कम करने के लिये अथवा उसे रोकने के लिये सदाचार का रास्ता मजबूत करना जरूरी है। पाश्चात्य लोकतांत्रिक प्रणाली भारत में यूरोप व अमेरिका की तरह अपनी जड़ें नहीं जमा सकती क्योंकि भारत का पारस्परिक पंचायती प्रबंधन विष्णु पुराण में वर्णित ‘‘कूर्म मगध खस गणै’’ से प्रेरित है। यहां की जाति पंचायतों के स्वरूप को उनकी आंतरिक मर्यादाओं को अध्ययनपूर्वक पहचानने के बाद ही खाप पंचायतों सहित विभिन्न प्रकार की जो जाति पंचायतें आज भी यत्किंचित् अस्तित्त्व में हैं समाज को प्रभावित करती रहती हैं उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में समझा कर उनके सरोकारों को कारगर संवाद से ही हल करने की जरूरत है। केवल कानून की रट लगाना, मौजूदा कानूनों को उपयोग करते समय भ्रष्टाचार के कारण पंक्तिभेद करते रहने से अदालतों में मुकदमे बढ़ेंगे। जेलों में भी कितने लोगों को ठूंसेंगे अतः वह भी कोई कारगर हल नहीं हो सकता इसलिये सामाजिक चौकस सामाजिक अंबुदसमान जिसे विगत शताब्दी के सातवें दशक में रघुवीर सहाय ने उछाला था, मोरारजी देसाई ने भी जिस अंबुदसमान की अनुशंसा की थी सवैधानिक अंबुदसमान या लोकपाल के समानांतर सामजिक गैर सरकारी अंबुदसमान की नैतिक सत्ता ही भ्रष्टाचार के बढ़ावे को रोक सकती है। हिन्द स्वराज व अरविन्द स्वराज में हम किसे चुनते हैं यह 2014 के महानिर्वाचन में सामने आने वाला है।
यक्ष प्रश्न ? - भ्रष्टाचार की पहचान
भारत में इस्लामी राज ईस्ट इंडिया कम्पनी का व्यापार राज पहले स्वतंत्रता आंदोलन 1857 के सैन्य विद्रोह बर्तानी ताज का भारत पर सीधा सीधा नब्बे साला शासन 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण ने शासन व्यवस्था के समानांतर कार्मिक-भ्रष्टाचार ने भी अपने पांव फैलाये। उपनिवेश वादी शासन व्यवस्था में बर्तानी राज के अपने कब्जे में नये नये इलाकों को जोड़ते रहने के साथ जहां एक ओर युद्धमूलक दुराचार व भ्रष्टाचार फलता फूलता रहा। बर्तानी राज मैनुअल आधारित शासन व्यवस्था को अंजाम देते समय हिन्दुस्तान की आम जनता को यह भरोसा देने की कोशिश करता था कि वह न्यायपूर्ण राज व्यवस्था भारत में उसी तरह चलाना चाहता है जिस तरह इंगलिस्तान की राज सत्ता लोक सत्ता के साथ हाथ में हाथ मिला कर चलती है। 1858 में कुंभ मेले में बर्तानियां की महारानी विक्टोरिया का संदेश लाखों भारतीयों को सधुक्कड़ी तब की भारतीय लिंग्वा फ्रांका में संगम तट पर सुनाया गया था। भारतवासियों से वादा भी किया गया था कि बर्तानी राज उनके रस्मो रिवाज पर हमला नहीं करेगा। शांति व्यवस्था ही उसका उद्घोष था। हिन्दुस्तान के लोगों में स्वतंत्रता, स्वराज और सुशासन की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के चुंबकीय व्यक्तित्त्वों ने आम हिन्दुस्तानी को जाग्रत कर डाला था। ये तीनों युग पुरूष इस दुनियां में राज करने नहीं आये थे। उन व्यक्तिगत व सामाजिक सरोकार ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत्’’ था।
दुर्गंध ठहरे हुए पानी में ही आती है। पानी का प्रवाह जब रूक जाता है, जब आदमी अपनी दिखाऊ छवि को बरकरार रखने के लिये शहरी जिन्दगी की दुर्गंध को जमीन के नीचे गटर व गंदी नाली में डाल कर जल-जमीन व जंगल (वृक्ष-स्थावर जीव) पर आवश्यकता से ज्यादा दोहन करने के उपाय शुरू करता है बस वहीं पर भ्रष्टाचार का उद्गम होता है। तंत्र व भ्रष्टाचार का आपसी संबंध चोली-दामन सरीखा है। जहां प्रबंधन होगा, व्यवस्था होगी, पंक्तिभेद का व्यवहार होगा वहां भ्रष्टाचार बिन बुलाये मेहमान की तरह अपना आसन मजबूती से पकड़ लेगा इसीलिये तंत्र के समानांतर पुराने हिन्दुस्तान में वानप्रस्थ जीवन की परिकल्पना थी जो तंत्र के समानांतर तंत्र में उपजने वाले भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिये लोक सत्ता मूलक सदाचार का आश्रय लेता था। विभाजन की विभीषिका जब भ्रष्टाचार व कदाचार से लोहा लेने के लिये अखिल भारतीय राष्ट्रीय संकल्प वाले जिन स्वयं सेवी संगठनों ने विभाजन पीड़ितों की जो सेवा की, मानवीय उच्चादर्श का जो उदाहरण प्रस्तुत किया आजादी के पश्चात स्वातंत्र्य वीर राजकाज में फंस जरूर गये पर उन्होंने भारत सेवक समाज तथा भारत साधु समाज जैसे गैर राजनीतिक संगठन खड़े कर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रणालियों के समानांतर एक ऐसा सत्ता रहित चौकसी तंत्र खड़ा किया जिसे देख कर भ्रष्टाचार लिप्तता को खौफ हो जाता था। जवाहरलाल और गुलजारीलाल में यह माद्दा था। जवाहरलाल के निधन के पश्चात भ्रष्टाचार जो तब तक कालीन के नीचे दुबक रहा था खुल कर सामने आया। उत्तर नेहरू पचास वर्ष की राजनीतिक, प्रशासनिक तथा आस्थामूलकता सहित उद्योग, व्यापार, संस्कृति, साहित्य, संगीत, सिनेमा, खेल सहित समूचा मानव धर्म भ्रष्टाचार की लपेट में आगया। वैश्विक बाजारीकरण ने कोढ़ में खाज का काम किया। पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने परमिट, लाइसेंस राज तथा इन्सपेक्टर राज खत्म करने का उद्घोष क्या किया भारत में यत्र तत्र भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार नजर आने लगा। सवाल उठता है कि क्या केवल सख्त कानून बनाने से हर भ्रष्टाचारी को जेल में बंद करने से भ्रष्टाचार को भगाया जा सकता है। नहीं मौजूदा हालातों में भ्रष्टाचार के रक्तबीज को समूल उखाड़ने के लिये आद्या शक्ति को पुनः जाग्रत करने की तात्कालिक जरूरत है। भ्रष्टाचार को कम करने के लिये अथवा उसे रोकने के लिये सदाचार का रास्ता मजबूत करना जरूरी है। पाश्चात्य लोकतांत्रिक प्रणाली भारत में यूरोप व अमेरिका की तरह अपनी जड़ें नहीं जमा सकती क्योंकि भारत का पारस्परिक पंचायती प्रबंधन विष्णु पुराण में वर्णित ‘‘कूर्म मगध खस गणै’’ से प्रेरित है। यहां की जाति पंचायतों के स्वरूप को उनकी आंतरिक मर्यादाओं को अध्ययनपूर्वक पहचानने के बाद ही खाप पंचायतों सहित विभिन्न प्रकार की जो जाति पंचायतें आज भी यत्किंचित् अस्तित्त्व में हैं समाज को प्रभावित करती रहती हैं उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में समझा कर उनके सरोकारों को कारगर संवाद से ही हल करने की जरूरत है। केवल कानून की रट लगाना, मौजूदा कानूनों को उपयोग करते समय भ्रष्टाचार के कारण पंक्तिभेद करते रहने से अदालतों में मुकदमे बढ़ेंगे। जेलों में भी कितने लोगों को ठूंसेंगे अतः वह भी कोई कारगर हल नहीं हो सकता इसलिये सामाजिक चौकस सामाजिक अंबुदसमान जिसे विगत शताब्दी के सातवें दशक में रघुवीर सहाय ने उछाला था, मोरारजी देसाई ने भी जिस अंबुदसमान की अनुशंसा की थी सवैधानिक अंबुदसमान या लोकपाल के समानांतर सामजिक गैर सरकारी अंबुदसमान की नैतिक सत्ता ही भ्रष्टाचार के बढ़ावे को रोक सकती है। हिन्द स्वराज व अरविन्द स्वराज में हम किसे चुनते हैं यह 2014 के महानिर्वाचन में सामने आने वाला है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
सही नेतृत्त्व के हवाले सोलहवीं लोकसभा
मशीनी अभियंत्रण की दीक्षा प्राप्त अभियंता का नया अवतरण हुआ जिसे समाजशास्त्री लोग सामाजिक अभियंत्रण अथवा सामाजिक यांत्रिकी कह कर नया समाज खड़ा करने की अभिलाषा रखते हैं। यांत्रिकी अभियंत्रण स्थावर अथवा लगभग निर्जीव पदार्थों, वस्तुओं, प्रकृति प्रदत्त उपादानों पर प्रयुक्त होता है जो एक प्रकार का एक ही तरह चलने वाला मशीन-आचरण है पर जो जीव, जंतु जंगम हैं, जलचर, थलचर, नभचर हैं जिनके आकार अलग-अलग हैं। मशीन से निकले दो या दस पुर्जे एक से होते हैं परंतु एक ही मां बाप से जन्मे दस बच्चे लड़के हों या लड़की उनकी बनावट व प्रकृति तथा स्वभाव में अंतर होता है। वे एक जैसी आवाज नहीं करते। उन्हें पहचानने के लिये उनका मुख, उनकी आवाज, उनकी चालढाल जानना जरूरी होता है। अगर साक्षर है तो उनकी लिखावट की पहचान कराने वाली प्रविधि होती है जिसे आधुनिक दुनियां सोशल इंजीनियर कहती है। अगर हम हिन्दुस्तान के संदर्भ में उन सोशल इंजीनियरों की एक पंगत खड़ी करना चाहें तो पहला हिन्दुस्तानी सोशल इंजीनियर केरल के कालड़ी गांव में जन्मा शंकर नाम का युवक था। सन्यासी बनना चाहता था, पिता गुजर चुके थे। दीक्षा देने वाले गुरू ने कहा - मां की आज्ञा प्राप्त करो तभी तुम्हें सन्यासी बनाया जायेगा। शंकर अपनी मां को कावेरी स्नान के लिये ले गया। मां को नहला कर किनारे बैठाया और स्वयं डुबकी लगायी। मां से कहा मुझे इजाजत दो कि मैं सन्यासी हो जाऊँ। मां उससे ज्यादा होशियार थी, उसने कहा - बेटा तुम मेरे इकले बेटे हो मैं विधवा हूँ आस लगाये बैठी हूँ मेरा अंतिम संस्कार बेटा करेगा। अगर तू वादा करता है सन्यासी बनने के बाद मेरी अंत्येष्ठि और्ध्वदैहिक क्रिया करेगा मेरी आज्ञा है हो जा सन्यासी। शंकर के खानदानी नंबूद्रि ब्राह्मण थे मां के मरने पर उन्होंने शंकर को अंत्येष्ठि करने से रोकना चाहा, कहा - तुम अब ब्राह्मण नहीं सन्यासी हो तुम्हारी मां ब्राह्मणी है उसका वैदिक विधि अंत्येष्ठि हम करेंगे। शंकर ने कहा - ब्राह्मणो आप मुझे अपने माता पिता का पुत्र स्वीकारते हो ? उन्होंने कहा - हां तुम पुत्र तो उसी के हो अगर अकेले अंत्येष्ठि करना चाहते हो तो करो हमारा सहयोग नहीं होगा। शंकर ने नयी परम्परा जगायी। आगे चल कर भारत में स्मार्त धर्म और एकेश्वरवाद का मंडन अद्वैत सिद्धांतानुसार किया। सारा भारत निरीश्वरवादी वेद विरोधी जैन एवं बौद्ध सम्प्रदायों में रम गया था। शंकर ने आसेतु हिमाचल वैदिक अद्वैतवाद को पुर्नस्थापित किया। शंकर के अद्वैत के समानांतर थोड़े कालखण्ड के पश्चात रामानुज का द्वैताद्वैत और मध्वाचार्य का विशिष्ट द्वैत सिद्धांत भी तमिलनाडु व कर्णाटक कुछ इलाकों में चला पर शंकर का अद्वैत सिद्धांत का जागतिक पोषण स्वामी विवेकानंद ने सारी धरती में फैला दिया। आदि शंकर की सोशल इंजीनियरी ही भारत धर्म की महान विरासत है।
रामानुज, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य आदि सभी सोशल इंजीनियर अपने अपने आदर्श और सिद्धांत व्याख्यायित करते रहे पर उन्होंने सोशल इंजीनियरी की वह शीर्ष शिखर तक अपना गंतव्य नहीं बना सका। शुक्राचार्य उशना भार्गव ने जो और्वोपदिष्ट मार्ग और और्वोपदिष्ट योग संचालन किया उसकी पहली सीढ़ी भरूकच्छ(भृगुकच्छ) में नर्वदा हिन्द महासागर संगम स्थल पर प्रह्लाद के पौत्र, विरोचन के पुत्र बलि यज्ञ का संपादन किया। यज्ञ का मूल उद्देश्य अदिति पुत्रों का पलायन कराना था क्योंकि हिरण्यकश्यप के ही राजकाज के जमाने से दैत्य वंश फलफूल रहा था। अदिति के बेटे दुबक रहे थे। दिति-अदिति सगी बहनें थीं सौतें भी थीं। एक दूसरे को फूटे आंख देखना भी पसंद नहीं करती थीं। अदिति के पुत्रों यानि आदित्य लोगों जिनमें प्रमुख शचीपति शक्र थे उनको बुला कर महाविष्णु ने समुद्र-मंथन कर अमृतोत्पादन से अजर-अमर होने की तरकीब बतायी थी। महाविष्णु की यही तरकीब राजनीति करने का छल प्रपंच, पाषंड के जरिये भी जीत हासिल करने का एक नायाब तरीका था। अदिति नंदन आदित्यों का योगक्षेम देवमाता अदिति की तपस्या से अभिभूत होकर द्वादश आदित्यों में से एक महाविष्णु ने देवमाता को आश्वस्त किया कि वे स्वयं उनके पुत्र बन कर आदित्य पक्ष का योगक्षेम स्वयं देखेंगे। और्वोपदिष्ट योगी शुक्राचार्य ने बलि को आगाह किया कि इस छलिये को जमीन मत दो। राजा बलि अपने वचन पर अड़ा रहा। उसने नरक जाना बंदी बनना स्वीकार किया पर वचनभंग की विधि नहीं अपनायी। वामन ने बलि का राज्य अपने अग्रज इन्द्र को सौंप दिया। हिन्दुस्तानी लोग आज हजारों वर्ष पश्चात भी प्रयाग, हरिद्वार, अवंति और नासिक में हर बारहवें वर्ष महाकुम्भ मेले समुद्र-मंथन और अमृत की छीना झपटी की यादगार में मनाये जाते हैं। आेंंकार के अनुयायी करोड़ों भारतवंशी इन कुम्भ पर्वों पर सामूहिक स्नान करते हैं।
इस्लाम के नबी हजरत मोहम्मद साहब व उनके अनुयायियों ने समूचे मध्यपूर्व को इस्लामी छत्रछाया का पात्र बना डाला। जिसे आज हम ईरान कहते हैं कभी वह पारसीक धर्मावम्बियों का मूल स्थान था। जिसे अफगानिस्तान के नाम से लोग जानते हैं वह कभी उपगंधर्व अथवा उपदेव स्थान कहा जाता था जहां के गंधर्व व अप्सराओं सहित विद्याधरों की एक श्रंखला थी। इस्लाम अपना पूरा का पूरा सिक्का केवल भारत में नहीं जमा पाया। यहां उन्होंने राज किया, करोड़ों मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनवायीं पर सारे हिन्दुस्तान को इस्लाम में तब्दील नहीं किया जा सका जब कि पूर्व की ओर बढ़ते हुए इस्लाम ने पूर्वी एशिया के अधिकतर देशों में इस्लाम का झंडा गाढ़ डाला। क्या भारत भूमि में कोई ऐसी शक्ति थी जिसे इस्लाम व इसाईयत पूरे पूरे तरीके अपने माकूल नहीं बना पाये। इस्लाम के सिद्धांतकारों ने भारतीय वेदांत के विभिन्न पक्षों यथा शंकराचार्य संकल्पित अद्वैत दूसरे आचार्यों द्वारा द्वैताद्वैत विशिष्टाद्वैत सहित सांख्ययोग, कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके का रहस्यमय सिद्धांत कर्मण्येवाधिकारस्ते का कर्म विपाक सिद्धांत की जब मुलाकात इस्लामी सिद्धांतों से हुई सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान बनाने के बजाय इस्लामी चिंतन पोखर सूफी सिद्धांत तवस्सुफ़ की ओर बढ़ा। इस्लामी वैभव के जमाने में भी भारत को भक्ति युग की एक कई देश की तत्कालीन प्राकृत भाषाओं के जरिये दिखायी। आदि शंकर के पश्चात ब्राह्मणों की पंडिताई को किनारे रख कर जिस तुलसीदास ने काशी के विद्वानों के आग्रह को ताक पर रख कर हिन्दुस्तान के जन सामान्य के लिये स्वांतःसुखाय रामचरितमानस लिख कर हिन्दुस्तान की वैदिक आस्था को जन सामान्य की बोलचाल की भाषा में रामकथा गाकर येषाम् योगिनः रमन्ते स रामः सैव दाशरथि राम कह कर रामकथा घर-घर पहुंचायी। ग्रियर्सन का मत है कि तुलसीदास यदि यूरोप में पैदा हुआ होता उसका स्थान अंग्रेजी कवि शेक्सपियर से अत्यधिक ऊँचा होता।
इस हिन्दुस्तान में कालड़ी के शंकर के पश्चात हुलसी के बेटे तुलसी ने हिन्दुस्तान में नयी ज्योति जगा कर सोशल इंजीनियरी की नयी मधुकरी - मांग के खाइबो मजीद में सोइबो का नया पैगाम दिया। बादशाह अकबर ने तुलसी के लोक यश से प्रभावित होकर उन्हें बुलावा भेजा। तुलसी का सीधा साधा जवाब था ‘संतन के सीकरी से क्या काम’। रहीम खानखाना ने संतों की मुलाकात बादशाह अकबर से करायी। तुलसीदास तो ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे पर कबीर, रसखान, मलिक मोहम्मद जायसी ने तत्कालीन समाज में जो सोशल इंजीनियरी की वह हिन्दुस्तान की भाषायी, मजहबी तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में अपने अद्भुत प्रभाव छोड़ गयी। कबीर ने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। रसखान ने कहा - या लकुटी अरू कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारूँ। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपना हवाला देते हुए कहा - जायस नगर धरम अस्थानू जहां जाय कवि बीन बखानू। आगे अपने महाकाव्य पद्मावत में जायसी कहते हैं - विधना के मारग हैं ते ते सरग नखत तन रोवां जेते।
बर्तानिया के कंपनी बहादुर के व्यापार के समानांतर हिन्दुस्तानियों की आपसी कलह से फायदा उठा कर राजकाज में भी यत्र तत्र दखल देने और जब कंपनी बहादुर के लिये स्वयं राज करना कठिन होगया, बर्तानिया के लोकतांत्रिक दिखने वाले राजतंत्र ने हिन्दुस्तान को अपना उपनिवेश बना डाला। महात्मा गांधी ने लिखा कि हिन्दुस्तान कैसे गया ? उन्होंने अपने सवालिये को बताया कि दरअसल अंग्रेज हिन्दुस्तान में व्यापार करने आये थे। हिन्दुस्तान अंग्रेजों ने लिया सो बात नहीं है बल्कि हमने उन्हें हिन्दुस्तान दिया है। इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्वागत करते, हम उनकी मदद करते थे। अधिपति अपने सवालिया से आगे कहते हैं - हिन्दुस्तान के सच्चे सेवक अच्छी तरह खोज करके इसकी जड़ तक पहुंचना होगा। सवालिये ने अधिपति की बात को समझते हुए कहा - मुझे समझाने के लिये अब आपको ज्यादा दलीलें नहीं देनी पड़ेंगी। सवालिये ने अधिपति से कहा - मैं अब हिन्दुस्तान की हालत के बारे में आपके विचार जानना चाहता हूँ। सवालिये को अधिपति ने कहा - हिन्दुस्तान अंग्रेजों से नहीं आज की सभ्यता से कुचला जारहा है। हिन्द इस दुनियावी सभ्यता में फंस गया है। उन्होंने फिर कहा - मुझे स्वधर्म (अपना कर्त्तव्य) प्यारा है। पहला दुःख मुझे यह है कि हिन्दुस्तान कर्त्तव्य भ्रष्ट होता जारहा है। उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए उसे हिन्दू, मुस्लिम या जरथ्रुस्ती धर्म नहीं कहा। सवालिये को अधिपति की बात नहीं जंची उसने कहा - आप पाखंडी बनने की तालीम दे रहे हैं। धर्म के नाम पर लोग ठगते आये हैं आप भी ठग रहे हैं। अधिपति ने कहा - आप धर्म पर गलत आरोप लगा रहे हैं। पाखंड तो सब धर्मों में है। जहां सूरज है वहां भी अंधेरा रहता ही है। परछाईं बन कर चीज के साथ जुड़ा ही रहता है।
सामाजिक अभियांत्रिकी अथवा हिन्द की सोशल इंजीनियरिंग का ताजा उदाहरण मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा एक शताब्दी पूर्व स्थापित कोचरब आश्रम है। एक ओर वे कोचरब आश्रम की स्थापना पर हिन्दुस्तान के दलितों को शेष हिन्दुस्तानियों के बराबर खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे। वसंत पंचमी 1915 को दिल्ली में मोतीलाल नेहरू के पुत्र जवाहरलाल नेहरू की शादी कमला नेहरू से होरही थी। वसंत पंचमी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शुभारम्भ महामना मदनमोहन मालवीय ने महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी के हाथों कराया था। मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन का सबसे बड़ा सवाल जिस धर्म को वे दिल से प्यार करते थे जिस पर उनकी गहरी आध्यात्मिक आस्था थी उसमें घुसे छुआछूत प्रकरण से वे अत्यंत दुःखित थे। वे स्वयं सनातन धर्म के व्याख्याता नहीं थे। उन्होंने भरी सभा में अपनी अंतरात्मा का दुःख वड़ील महामना मदनमोहन मालवीय के सामने उंडेला। महात्मा का एक छोटा से सवाल था कि क्या सनातन में छुआछूत धर्म शास्त्र सम्मत है ? पंडित मदनमोहन मालवीय सनातनियों की चौखट के उस हिस्से से आते थे जिन्हें सनातनी लोग ब्राह्मण कहते थे। जिन्हें तुलसीदास ने बार-बार तिरस्कृत किये जाने के बावजूद जिन लोगों को भू सुर अर्थात धरती के देवता कह कर पुकारा था। महात्मा गांधी के सवाल पर पंडित मदनमोहन मालवीय ने कहा - मैं तो परम्परा का निर्वाह कर रहा हूँ। महात्मा ने कहा - मैं विश्वनाथ की काशी के विद्वान ब्राह्मणों की शरण में आया हूँ पूछ रहा हूँ, मेरे सवाल का जवाब खोजिये। मदनमोहन मालवीय ने सोच कर कहा - यहां एक विद्वान ब्राह्मण सनातन दर्शन का ज्ञाता आंध्र देशीय सर्वपल्ली राधाकृष्णन है। आप व मैं उनके पास जायेंगे। मुझे लगता है राधाकृष्णन आपकी समस्या का समाधान खोज सकते हैं। दोनों महापुरूष राधाकृष्णन के पास पहुंचे। गांधी जी ने उनके सामने अपनी समस्या रखी जिसे गांधी भारत का यक्ष प्रश्न मानते थे। राधाकृष्णन ने एक पखवाड़े का समय चाहा। वेदों, संहिताओं, स्मृतियों व औषवदनिक दृष्टांतों के हवाले से उन्होंने महात्मा से कहा - महात्मा जी, हिन्दू धर्म शास्त्र छुआछूत की अनुमति नहीं देता। यह एक ऐसी परम्परा पड़ गयी है जिसका मैं भी अनुपालन करता हूँ। राधाकृष्णन की राय का महात्मा ने अक्षरशः अनुशीलन करते हुए छुआछूत के कलंक से हिन्दू धर्म को मुक्त करने की मुहिम शुरू कर डाली।
भारत के पिछले सवा दो हजार वर्षों में आदि शंकर जिनकी जयंती भारत के लोग वैशाख शुक्ल पंचमी को मनाते हैं। तुलसीदास जिनकी जयंती हिन्द के लोग प्रतिवर्ष सावन शुक्ल सप्तमी को मनाते हैं। इन दो भारतीय सामाजिक अभियंताओं सिरमौर के अलावा द्वादशी श्राद्ध आश्विन बदी संवत् 1926 में जन्मे महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी आधुनिक भारत के सोशल इंजीनियरों के सिरमौर हैं। उनके पहले सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे सहित भारत में सामाजिक संरचना के जितने भी मनीषी चिंतक हुए हैं उन सभी की उपलब्धियों के साथ-साथ आज के भारत के इक्यासी करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के समूह को व्यक्तिगत वार्ता व संभाषण के छोटे-छोटे समूहों के द्वारा भी यह सोचना जरूरी होगया है कि सोलहवीं लोकसभा का नेतृत्त्व करने के लिये भारत की सवा अरब जनता के चतुर्दिक योगक्षेम के संपादन के लिये जिस सक्षम नेतृत्त्व की जरूरत है उसे हमारे मतदाता निर्धारित करें। प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, प्रच्छन्न जितने तरीके के उम्मीदवार मतदाता की नजर में आरहे हैं उनमें कौन भारत राष्ट्र राज्य का नया भाग्य विधाता बनने की पात्रता रखता है, यह निर्णय मतदाता को ही करना है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आज की पहली जरूरत राजनैतिक अश्पृश्यता निवारण
बात केवल अठानब्बे वर्ष पुरानी है जब मोहनदास करमचन्द गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश आये और उन्होंने कोचरब आश्रम की स्थापना की। यद्यपि वे वर्णाश्रम व्यवस्था के विरोधी नहीं थे तथापि उनके ह्रदय में छुआछूत के राष्ट्रीय कलंक को धोने की शिवसंकल्पवत् प्रबल आकांक्षा थी। रामायण व गीता के लिये उनकी मार्मिक आस्था तथा सादगी के लिये उन्हें गुजरात के वैष्णव समाज ने सराहा। मनुष्य मात्र के प्रति सहृदयता के लिये गुजराती भाषी वैष्णव समाज उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करता था। जब महात्मा ने दूधा भाई नाम के हरिजन (अब लोग हरिजन न कह कर अनुसूचित जाति समूह को 'दलित' संज्ञा देते हैं।) को सकुटुम्ब अपने आश्रम में रख कर छुआछूत निवारण का प्रयोग शुरू कर डाला तो उन्हें चंदा देने वाले वैष्णव वणिक समाज में खुसुर-पुसुर बातें होने लगीं कि महात्मा एक अछूत के परिवार को अपने साथ रख रहे हैं। वैष्णव बनियों ने आश्रम के लिये चंदा देना बंद कर दिया। यह बात जब जैन मतावलम्बी मिल मालिक सेठ अम्बालाल को पता चली तो वे गांधी जी के पास पहुंचे। उन्होंने गांधी जी के चरणों में तेरह हजार रुपयों की थैली रख कर उनसे प्रार्थना की कि वे इन रुपयों से अपने आश्रम का खर्च चलायें।
वसंत पंचमी 15 फरवरी 1915 के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन महात्मा के द्वारा कराने का निर्णय लिया था। स्थापना समारोह के पश्चात् महात्मा ने पंडित मदन मोहन मालवीय से कहा - वडील, (गुजराती शब्द वडील का अर्थ हिंदी में पूज्य पुरुष से है, महात्मा मालवीय जी को पूज्य मानते थे।) मेरे मन में एक शंका है और आप उसका निवारण कर सकते हैं। वह शंका छुआछूत के शास्त्र सम्मत होने या न होने के विषय में है। आप मुझे बतायें कि 'क्या सनातन धर्म में छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? मालवीय जी ने उत्तर दिया - मैं आपकी इस शंका का समाधान करने की योग्यता नहीं रखता किन्तु मैं छुआछूत मानता हूँ क्योंकि मैं सामाजिक परम्पराओं का पालन करता हूँ। महात्मा ने पुनः उनसे निवेदन किया कि वे काशी विद्वत् समाज से इस विषय में परामर्श कर उन्हें सूचित करें। मालवीय बोले - इस विषय में तो केवल सर्वपल्ली राधाकृष्णन ही सनातन धर्म की शास्त्रसम्मत व्याख्या कर सकते हैं। दोनों में परामर्श के पश्चात् यह राय बनी कि दोनों उनके निवास स्थान पर जाकर उनकी राय ज्ञात करें। महात्मा के अन्तर्मन को विश्वास था कि वेदों तथा अन्यान्य धर्म शास्त्रों में अश्पृश्यता का विधान नहीं है। सर्वपल्ली के पास जब युगल मूर्तियां पहुंचीं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा - राष्ट्र के दो बड़े नेताओं ने आज उनके घर को पवित्र कर दिया है तथा वे अपने आप को उनके आगमन से धन्य मान रहे हैं। सर्वपल्ली ने पंद्रह दिनों में उक्त समस्या का समुचित समाधान प्रस्तुत करने का वचन दोनों को दिया साथ ही दोनों से निवेदन भी किया कि छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है ऐसा उनका अपना मानना है, अधिक एवं सत्य क्या है यह वे पुनः पर्याप्त अध्ययन के पश्चात् ही बता सकेंगे किन्तु फिर भी मेरी राय में यह पराधीनता की हीनग्रन्थि मात्र ही है।
छुआछूत वाली सनातन धर्म की हीनग्रन्थि ने स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीति करने वाले महानुभावों को जकड़ डाला है। हमारे संविधान निर्माताओं ने छुआछूत का निवारण किया पर वे लोग जो आज संविधान के दायरे में राजनीति कर राजधर्म गोप्ता बने हैं वे स्वयं राजनीतिक छुआछूत से पीड़ित हैं। जिन व्याख्याकारों ने राजधर्म की भारतीय वाङ्मय में शुक्राचार्य, देवगुरु बृहस्पति, महामति विदुर, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास व आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य राजनीतिक रणनीति में स्पृश्यास्पृश्य का भेदभाव नहीं किया पर आज हम स्वतंत्र भारत में सेक्युलर और कम्यूनल अंग्रेजी भाषा के इन दो शब्दों के सहारे राजनीतिक अस्पृश्यता को अंजाम दे रहे हैं। यह बात तो हर भारतीय अच्छी तरह समझ रहा है कि कोई अकेली राजनीतिक पार्टी अब भारत राष्ट्र राज्य में एकछत्र राज करने की क्षमता अर्जित नहीं कर सकती है। अतएव संघीय सरकार दलों के पारस्परिक संविद से ही चलने वाली है। तमिलनाडु, पंजाब, ओडिशा, बंगाल राज्यों में राज्य संघीय एक दलीय सरकार है। वहीँ हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखण्ड, असम, आंध्र, कर्णाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक दल सत्ता में हैं। देश के राज्य घटकों व अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक सत्तासीन दल पारिवारिक भूमिका वाले दल भी हैं। विश्व राजनीतिक चिंतन में ऐसे दलों को वंशगत राजनीति वाली लोकतांत्रिकता भी कहा जाता है। भारत में ऐसे दलों में अ. भा. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की गिनती की जारही है। बीजद को भी कुछ लोग पिता- पुत्र दोनों के संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष होने के प्रसंग को भी वंशानुगत जनतांत्रिक लोकसत्ता प्रभाव भी कहते हैं। लोकतंत्र में व्यक्ति की निजी योग्यतानुसार यदि पिता के पश्चात् पुत्र या पुत्री शासक बनती है तो वह कोरी वंशानुगत सत्तासूत्रता नहीं कही जा सकती । भारत में पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के सत्ता में आने और रहने की प्रक्रिया को भी वंशानुगत कहना समीचीन नहीं होगा क्योंकि इंदिरा गांधी ने सत्ता अपनी वैयक्तिक नेतृत्त्व योग्यता एवं क्षमता से प्राप्त की। हाँ यह कहा जा सकता है कि इंदिरा जी के निधन के पश्चात् राजीव गांधी का प्रधानमंत्री होना वंशानुगत प्रभाव था किन्तु राजीव गांधी के पश्चात् सोनिया गांधी व राहुल गांधी के ज़माने में कांग्रेस एक परिवार पार्टी तो जरूर हो गयी है पर यह वंशानुगत सत्ता का सूत्र नहीं है क्योंकि राजीव गांधी के पश्चात् प्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी ने देश की राजसत्ता नहीं सम्भाली। वे परोक्ष रूप से सत्ता की चाबुक अपने हाथों में रखती हैं। उनके नामिती बिना लोकसभा चुनाव लड़े दस वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। जिन प्रधानमंत्री महोदय ने जब यह कहा कि वे स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद पर पंडित नेहरू एवं इंदिरा जी के पश्चात् सर्वाधिक अवधि तक आसीन रहे। जब कभी वर्तमान भारतीय राजकाज का इतिहास लिखा जायेगा तब तटस्थ इतिहासकार यू.पी.ए.I व यू.पी.ए.II के 2004 से 2014 तक के केंद्रीय सरकार, जनप्रतिनिधि सरकार के बजाय परिवार प्रतिनिधि परोक्ष शासक की ही संज्ञा दी जायेगी। इसलिये सभी राजनीतिक दलों को मिल बैठ कर यह तय करना होगा कि उच्च सदन का सदस्य लोकसभा या विधासभा का चुनाव लड़ कर ही नेता सदन एवं प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री हो। साथ ही राजनीतिक धरातल पर 'आप' सरीखे दल के अभ्युदय के पश्चात् सभी राजनीतिक दल मिलकर राजनीतिक छुआछूत से छुटकारा पाने के लिये एक ऐसा स्वयंसेवी एसोसिएशन हमें खड़ा करना होगा जो भारतीय लोकनीति, दण्डनीति, राजनीति तथा देश के विभिन्न समुदायों के विश्वासजन्य बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक बार मिल बैठ कर चर्चा करें। राजनीतिक परिधि में प्रवेश करने के इच्छुक सज्जनों युवकों एवं युवतियों के राजनीतिक प्रशिक्षण के लिये अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले प्रशिक्षण विद्यालय शुरू किये जाएँ। राजनीती के दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ कौटिल्यीय अर्थशास्त्र तथा महाभारत के शांतिपर्व को सभी भारतीय भाषाओँ में प्रकाशित किया जाये। भारत के राजनीतिक चिंतकों की जीवनियां प्रकाशित की जायें। जो व्यक्ति चुनाव की राजनीती में प्रवेश चाहता है उसे उसकी मातृभाषा में राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाये। सभी राजनीतिक दल ऐसे विद्यालयों के लिए चंदा दें। चुनाव लड़ने वालों से जो शुल्क लिया जाता है वह एवं ज़ब्त जमानत धनराशि सम्बंधित राज्य के राजनैतिक प्रशिक्षण संसथान को दी जाये। मात्र इस प्रकार के प्रशिक्षण प्रबंधन से ही राजनैतिक छुआछूत समाप्त हो सकती है। विभिन्न दलों के जरिये राजनीती करने वाले महानुभावों में स्वस्थ्य संवाद स्थापित होने पर ही लोकतंत्र सफलता के शीर्ष पर पहुँच सकता है।
मोहनदास करमचन्द गांधी ने महात्मा विशेषण जुड़ने से पहले हिन्द स्वराज के जरिये हिंदुस्तानी समाज को सचेत करते हुए भारतीय सामाजिक मूल्यों को ही अपनाये रखने की नेक सलाह अपनी मातृभाषा गुजराती में दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों को इंडियन ओपिनियन के जरिये दी थी। हिंदुस्तान के लोगों की मान्यता है कि गांधी जी को 'महात्मा' कह कर सबसे पहले कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पुकारा था। शिमला के रहने वाले इतिहासकार श्री राम मेहरोत्रा का मानना है कि गांधी जी को सबसे पहले डा. प्राणजीवन जगजीवन दास मेहता जो स्वयं काठियावाड़ी थे उन्होंने अपनी पुस्तक 'एम.के. गांधी' एवं 'दी साउथ इंडियन अफ्रीकन प्रॉब्लम' नामक पुस्तक में 'महात्मा' विशेषण दिया। कोचरब आश्रम को खड़ा करने में डा. मेहता ने महात्मा गांधी को नैतिक सम्बल भी दिया था। ज्ञातव्य है कि डा. मेहता स्वयं दसधा नरसी मेहता भक्तिपथ के राही थे। ''वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे'' जो कोचरब आश्रम की स्थापना के निन्यानबे वर्ष पश्चात आज गुजरात भारत भूमि में वह गौरव फिर अर्जित कर रहा है जो महात्मा गांधी ने सत्याग्रह व अहिंसा के जरिये किया था। नरेंद्र मोदी का नेतृत्त्व भारत को सभी तरह की छुआछूत निवारण के साथ-साथ राजनैतिक मूल्यों की विरासत को स्थायी अवलम्ब देने की क्षमता धारक है। आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक हुंडी सकारने की है। नरेंद्र मोदी भारत की राजनीतिक हुंडी सकारने में सक्षम नेतृत्त्व हैं।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
स्वरुप शाश्वत सनातन धर्म का और दृष्टिकोण वेंडी डोनिगर की विवादित पुस्तक का
बीबीसी से बातचीत में डोनिगर ने कहा, "मैंने लगभग एक हफ़्ते पहले इस बारे में सुना और मुझे काफ़ी दुख हुआ. मुझे आशंका थी कि ऐसा हो सकता है. पिछले चार साल से ये क़ानूनी मामला चल रहा था. जिस तरह से भारत में और पूरी दुनिया भर में इसे लेकर प्रतिक्रिया हुई है मैं उससे आश्चर्यचकित हूँ. मुझे नहीं लगा था कि किसी को इस बात से कोई फ़र्क पड़ेगा." सौजन्य से बी. बी. सी. हिंदी
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में शिकागो की धर्म संसद में संत शिरोमणि विवेकानंद ने भारतीय धर्म की विभिन्न शैलियों, परम्पराओं तथा मानव धर्म के उदात्त स्वरुप को अत्यंत चित्ताकर्षक वाणी के माध्यम से प्रस्तुत किया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के जन समाज में हिन्दू नाम से पुकारे जाने वाले भारतियों की आस्था के विभिन्न नामों का विवेचन करते हुए अमेरिकी समाज में भारत जिज्ञासा की ललक पैदा कर दी थी।
इसी शिकागो शहर के विश्वविद्यालय की आचार्या वेंडी डोनिगर ने पौर्वात्य धर्म संहिता वाले भारत देश के विश्वास व आस्थामूलक इतिहास पर ''द हिन्दू - अल्टरनेटिव हिस्ट्री (The Hindu-Alternative History) शीर्षक से इक्कीसवीं शताब्दी के पहली दशाब्दी में लिखी इस पुस्तक के प्रकाशक 'पेंगुइन' ने किताब को भारत के बाज़ार से उठाने का फैसला एक इकरारनामे के तहत किया। इतिहासज्ञ रामचंद्र गुह ने इस समाचार को अत्यंत निराशाजनक बताते हुए कहा कि अत्यन्त हतोत्साहित करने वाला है पेंगुइन का यह प्रयास, चाहिए तो था कि ऊँची अदालत में अपील करते।''। सोशल मीडिया ट्विटर के अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा - ''अगर किसी को कोई पुस्तक अप्रिय या आपत्तिजनक लगती है तो उसका प्रत्युत्तर है एक और किताब न कि उस पर प्रतिबंध, कानूनी कार्रवाई अथवा मारने-पीटने की धमकी''। देवदत्त पटनायक की राय में - ''उन्होंने वेंडी डोनिगर की रचनाओं का सन्दर्भ लिया और उन्हें एक अत्यंत विदुषी महिला करार दिया''। उनकी राय में विद्वत् समाज में गहरी मानसिक असहजावस्था और प्रारम्भ की गयी हास्यावस्था अथवा हास्य उपक्रम भारतीय सन्दर्भ में वशिष्ठ-चार्वाक वैचारिक भिन्नता संवाद में देखी जा सकती है। अपने पुत्र शक्ति के द्वादशाह श्राद्ध में वशिष्ठ ने चार्वाक को भी आमंत्रित किया था। चार्वाक का मत था कि ''जिस तरह बुझी हुई बाती तेल का उपयोग कदापि नहीं कर सकती उसी तरह मृत व्यक्ति भी श्राद्ध में प्रदान की गयी सामग्री का उपभोग नहीं कर सकता''। इस पर वशिष्ठ ने कहा - ''खाना तो मुझे एवं आपको है, मृत व्यक्ति तो केवल निमित्त मात्र है''। चार्वाक श्राद्ध भोज में सम्मिलित हुए क्योंकि उनके ऐतराज को वशिष्ठ ने मानते हुए वास्तविक स्थिति का विश्लेषण कर लिया। पेंगुइन क्योंकि पुस्तकों का एक व्यापारिक संगठन है एवं उसे अपना व्यापार पहले देखना है बाकी बहस के मुद्दे बाद में। पुस्तक में क्या सही है व क्या गलत इस विवाद में पेंगुइन के प्रकाशक महोदय नहीं पड़े। उन्होंने पूरे विश्व बाज़ार से डोनिगर की पुस्तक वापस न लेकर मात्र भारत देश के बाज़ार से ही पुस्तक को हटाया। पुस्तक का मूल विरोध तो संयुक्त राज्य अमेरिका में पुस्तक के बाज़ार में आने पर ही शुरू हो चुका था। न्यूयार्क के हिंदुओं ने सभा कर पुस्तक का विरोध करना शुरू कर दिया। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जगह-जगह सैकड़ों हिन्दू मंदिर हैं। रामकृष्ण मिशन, चिन्मयानन्द मिशन, परमहंस योगानंद के योगमार्ग, भारतीय वैष्णव मत की आधारशिला, श्रीमद्भागवत् महापुराण सहित भारतीय आस्थामूलक साहित्य अमेरिकी अंग्रेजी में यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध है। इस ब्लॉगर की दुहिता जिसका जन्म भारत के हिमालय प्रदेश में हुआ, भारत में पढ़ाई के बाद वह अमेरिका जा बसी और अपने पति तथा दो कन्याओं सहित अमेरिकी नागरिक है। अपने पिता को अमेरिका बुलाती रहती है। उसकी माँ अपने जीवनकाल में चार बार अमेरिका गयी फलतः उसके निधन के पश्चात् माँ की याद में वह अपने पिता को वहाँ बुलाती रहती है। उसने 'द हिन्दू - अल्टरनेटिव हिस्ट्री (The Hindu-Alternative History)' खरीद कर अपने पिता को पढने हेतु दी। इस ब्लॉगर ने दो बार पुस्तक सांगोपांग पढ़ ली किन्तु छोटी-मोटी विसंगतियों को नजरअंदाज करते हुए केवल आदि जगद्गुरु शंकराचार्य सम्बन्धी वेंडी डोनिगर के विवेचन को उनकी पुस्तक का सर्वाधिक अस्वीकार्य पक्ष माना। शंकराचार्य का अद्वैत, रामानुज का द्वैताद्वैत, तथा माध्वाचार्य के विशिष्ट द्वैताद्वैत का विवेचन करते हुए वेंडी डोनिगर ने रामानुज व माध्वाचार्य को शंकर से ऊंचा आसन देने की असफल कोशिश की शायद इसका कारण यह लगता है कि वेंडी डोनिगर हिन्दू समाज की व्यापक व विशद विविधताओं पर एक समदर्शी इतिहासकार की दृष्टि नहीं रख पायीं। सम्भवतः उन्हें भारत की मूल भाषा संस्कृत का थोड़ा बहुत ज्ञान रहा होगा तथापि वे भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ की मर्मज्ञता प्राप्त नहीं कर सकीं। उनका सारा विश्लेषण अंग्रेजी भाषा में भारत धर्मिता के पाश्चात्य या उन भारतीयों के विश्लेषण पर आधारित था जिन्हें भारत धर्म की बारहखड़ी अंग्रेजी के माध्यम से ज्ञात हुई। गनीमत यह रही कि वेंडी डोनिगर सरीखी विदुषी महिला अल्टरनेटिव रिलिजन धर्म पर भी भाष्य लिख सकती थीं जो अभी होना शेष है। आज दुनियां के जो लश्करी मजहब हैं, विशेष तौर पर वेटिकन से अनुशासित ईसाई मजहब तथा कुछ अन्यान्य दूसरे मजहब भी, वे कभी-कभी धर्मादेश अथवा फ़तवे जारी करते हैंकिन्तु सनातन धर्म में मतभेद की स्थिति में परस्पर विचार-विमर्श कर निर्णयात्मक रास्ता खोजा जाता है, अन्य धर्मों की तरह उस पर ही चलने की पाबन्दी नहीं होती। चाहें तो मानें अथवा न चाहें तो न मानें। मनुष्यों की तरह मजहब भी पैदा होते हैं और मरते भी हैं। संसार का यह प्रमुख गुण है जिसे हम परिवर्तनशीलता के नाम से जानते हैं। प्रश्न उत्पन्न होता है, ईसाई मजहब का इतिहास मात्र दो हजार वर्ष पुराना है, इस्लाम का इतिहास अधिक से अधिक चौदह सौ चालीस वर्ष पुराना कहा जा सकता है यहूदी मजहब सहित ये सभी पाश्चात्य अथवा नैऋत्य आस्थायें सेमेटिक परिवारी हैं। भारत में सनातन धर्म के अलावा जैन, बौद्ध तथा सिख आस्थायें ओंकार मूलक हैं। प्रणव का उद्गान वेद भी करते हैं। वे लोग जो वेद को नहीं मानते हैं तथा वेद की निंदा तक करते हैं ऐसी उन आस्थाओं तक को भी सनातनता ने अस्तित्त्व दिया। आज भारत के लोग जैन, बौद्ध तथा सिख धर्म के अनुयायियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों की संज्ञा दे रहे हैं किन्तु वस्तुतः ये तीनों धर्म जिनके उद्गाता क्रमशः महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध एवं नानकदेव गुरु गोविन्द सिंह हैं तथा जिनकी अपनी-अपनी धार्मिक पुस्तकें पृथक-पृथक अस्तित्त्व भी रखती हैं तथापि जिसे भारत के लोग सनातन, स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त आदि सम्प्रदायों में अपने आपको घेरे रखते है, उप सम्प्रदायों अथवा सह सम्प्रदायों के रूप में भारत में नानकपंथी, दादूपंथी, कबीरपंथी, गोरखपंथी,चिंतक या पोषक भी हैं। कबीर ने अपनी साखी में लिखा - 'भगती उपजी द्रविड़ देश'। श्रीमद्भागवत के माहात्म्य वर्णन के अन्तर्गत पद्मपुराण में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने लिखा - ''द्रविड़े साअहम् समुत्पन्ना, वृद्धिम् कर्णाटके गतां क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णताम् गता।''।
भक्ति नारद को अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं द्रविड़ देश (वर्तमान तमिलनाडु) में जन्मी, कर्णाटक में बाल्यकाल बीता महाराष्ट्र में पुष्ट हुई तथा यहीं उसके ज्ञान व वैराग्य दो पुत्र हुए एवं गुजरात पहुँच कर बूढी हो गयी। ''वृद्धमाता बलप्रदा''।
प्रश्न उठता है कि क्या हिन्दू एक धर्म है अथवा एक जीवनशैली या फिर जीवनपद्धति ? आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन तो स्थापित संगठन है जिनकी व्यापक अखिल भारतीय विश्व मानवीय धार्मिकता है। इसलिये वेंडी डोनिगर सहित हिन्दू समाज के प्रागैतिहासिक, पौराणिक, पूर्व इस्लाम आगमन तथा ईसाई धर्म की भारत में दस्तक तथा इन दोनों सेमेटिक रिलीजनों का जो राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव हिन्दू समाज पर पड़ा उसने भारत के पांथिक स्वरुप को नया आकार देने में कौन-कौन सी महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह किया। संत विनोबा भावे ने महत्त्वपूर्ण आस्थामूलक व्याख्या को, उनका कहना था ''श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापिहि'' भागवत शास्त्र में श्रद्धा पर इतर श्रद्धाओं व आस्थाओं के लिये अनिंदा भाव तात्पर्य कि दुनियां की हर आस्थामूलका की स्तुति। संत विनोबा का शब्द संसार मानव हितैषी होने के साथ-साथ कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके का प्रतीक है। मनुष्य समाज कर्म विपाक से बंधा हुआ है। उसे कर्म ही करते रहना है पर कर्म फललिप्सा में बंधना नहीं है। वेंडी डोनिगर ने बहुत परिश्रम किया पर सनातन के जिस बरगद को उन्होंने छोड़ दिया, महाराष्ट्र, कर्णाटक, तमिलनाडु, बंगाल, उत्कल सहित भारतीय राज्यों में आस्थामूलकता की जो सर्वसम्मत राह थी उसे पकड़ना चाहिये था। वेंडी डोनिगर ने आदिशंकर प्रसंग को इतने हलके क्यों लिया। रामानुज व माध्वाचार्य का द्वैताद्वैत तथा विशिष्टा द्वैत केवल तमिलनाडु व कर्णाटक तक ही प्रभावी था जबकि शंकर का अद्वैत आसेतु हिमाचल, अटक से कटक तथा काराकोरम से कन्याकुमारी पर्यन्त बंग, कलिंग, कामरूप, कुमाऊँ, कांगड़ा व कश्मीर तक सर्वत्र विद्यमान था। हिंदी साहित्य के मूर्धण्य विचार पोखर नामवर सिंह ने पेंगुइन किताब वापसी के प्रसंग को लेखक के विचार स्वातंत्र्य पर आक्रमण करार दिया है। डोनिगर ने स्वयं भी भारत में पुस्तक वापस लिये जाने के प्रसंग को सहन करने योग्य घटना नहीं माना। सज्जन दास गुप्ता एवं हरि कुंगरु ने भी स्वयं को असहज महसूस किया। कुंगरु ने तो यहाँ तक अभिव्यक्ति दी कि यदि मतान्तर है तो छपास के जरिये व्यक्त करो। भारत से वेंडी डोनिगर की उक्त विवादित पुस्तक को प्रकाशक द्वारा वापस लिया जाना कोई अनहोनी व नयी घटना नहीं है।
भारत के लोगों के सामने तो पेंगुइन की खबर ही विचार स्वातंत्र्य, अपनी बात कहने की आज़ादी का सवाल भारत के विद्वत् समाज ने रखा। वेंडी डोनिगर ने हिन्दू समाज को ही हिन्दू धर्म के रूप में ऐतिहासिक अध्यन के अपने उपक्रम को इकतरफा देखा। शायद उन्हें यह ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी रही होगी कि वे उस आस्था मार्ग का सही-सही निरूपण करने की स्थिति में पहुँच गयी हैं जिससे वे अपने ऐतिहासिक वक्तव्य को वैकल्पिक ऊँचाई देना चाहती हैं। वे यह भूल गयीं कि इस भारत में कपिलाचार्य नाम का एक सांख्ययोगी भी हुआ था जिसकी माता देवहूति व पिता कर्दम थे। माता ने पुत्र से पूछा - ''गुणेषु सत्सु प्रकृते: कैवल्यम् तेष्वम् कथम्''।
कपिल ने माता को उत्तर दिया - ''अनन्य हेतुष्वथ मे गतिस्यात्, आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहास''।
इतिहास का एक नाम मृत्युहास भी है। भारतीय सन्दर्भ में यदि वेंडी डोनिगर ने अपनी इतिहासज्ञता को सटीक प्रमाणित करने के लिये भारत के ऊधो माधो के बतियाने का ही अनुशीलन किया होता तो उन्हें ऊलजलूल बातें हिंदुओं के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में लिखने के बावज़ूद उनको विरोधी समाज नहीं घेर पाता। पारम्परिक भारतीय आस्था का वह स्वरुप जो यह कहता है -
''सरित् समुद्रश्च् हरे शरीरम् यत्किञ्च् भूतम् प्रणमेदनय्।
खं वायुर्मार्गम् सलिलं मही च् ज्योतिषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन।।''।
जो भारतीय समाज समूचे विश्व को ईश्वर रूप मानती है उसे इतिहासज्ञ तिरछी नज़र से परखने का प्रयास करेंगी तो उसे चतुर्दिक विरोध का ही सामना करना पड़ेगा और यही वेंडी डोनिगर के इतिहास भाव प्रवण के तौर-तरीकों से हुआ। भारत सहित समूचे विश्व के विद्वत् समाज को यह पूरा अधिकार है, उनका कर्त्तव्य भी है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आंच न आने दें। संसार में किसी भी विचार के खण्डन व मण्डन के तार्किक तौर-तरीके हैं। वेंडी डोनिगर ने केवल आंशिक व इकतरफा तर्क का सहारा लिया। उन्होंने भारतीय आस्था मूलकता के उन बिन्दुओं की लगभग अनदेखी ही की जिन्हें सभी भारतीय आस्था वर्ग मान्यता देते थे। उन्होंने विरोध के उन स्वरों को पकड़ा जिनके प्रशंसक अत्यधिक संख्या में कम थे तथा जिनकी उपासना शैली पर अंगुलियां भी उठ जाया करती थीं। भारतीय तंत्र मार्ग, वह वैदिक आधार का तंत्र हो, बीजमंत्रों को सिद्ध सम्पुट का उनका प्रयोग हो वह वाम मार्ग का उत्प्रेरक हो या तंत्र की वह स्थिति जिसे सर्वमान्यता मिली है इसका उन्हें एहसास न होने से उनके लेखन के विरुद्ध अमेरिकी हिन्दुओं जिनमें पारम्परिक हिन्दुओं के अलावा भक्तिवेदांत स्वामी के भक्तों की भी बड़ी संख्या थी जो मूलतः भारतीय नहीं थे पर भारत धर्म से प्रभावित थे। वे भी वेंडी डोनिगर के विरुद्ध खड़े हो गये। धरती के अनेक राष्ट्र राज्यों में ईश निंदा पर दण्ड देने की व्यवस्था अनेकानेक धर्मावलम्बियों के मध्य सुस्थापित है। भारत धर्म में ईश निंदा के कई एक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ स्थापित ईश तत्त्व की निंदा व्यक्ति स्वधर्म मानता है। पहला उदाहरण दिति-कश्यप नंदन हिरण्यकश्यप का है केशिनी ने राजा प्रह्लाद की अदालत में जो दैत्य वंश के प्रथम प्रतापी राजा थे जिनके वंश में उनके मारे जाने के बाद उनका पुत्र नवधा भक्ति का प्रतीक प्रह्लाद दैत्यराज हुए, प्रह्लाद के सामने केशिनी के साथ सुधन्वा व विरोचन (प्रह्लाद के अपने बेटे) प्रेम-प्रसंग का निर्णय करने के लिये केशिनी ने राजा प्रह्लाद की अदालत में न्याय याचना की। केशिनी का कहना था की वह उससे विवाह करेगी जो विरोचन व सुधन्वा में श्रेष्ठ हो, राजा प्रह्लाद ने निर्णय दिया सुधन्वा के पिता राजा प्रह्लाद से इसलिये श्रेष्ठ है क्योंकि वह तापसी है सुधन्वा की माँ को राजा प्रह्लाद ने अपनी रानी से श्रेष्ठ बताया, प्रह्लाद का तर्क था चूंकि सुधन्वा के मातापिता दोनों प्रह्लाद व विरोचन से श्रेष्ठ हैं इसलिए सुधन्वा विरोचन से श्रेष्ठ है ? यह सृष्टि के पहले नीतिसम्मत दैत्यराज का निर्णय था।
हिंदुस्तान की एक और विशेषता है। नारद ने युधिष्ठिर से कहा - चेदिराज शिशुपाल योगेश्वर बालकृष्ण की यत्र-तत्र-सर्वत्र निंदा ही किया करता था। अपशब्द भी कहता रहता था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल को दण्डित किया। उसके स्थान पर शिशुपाल नंदन को चेदिराज के सिंहासन पर राजसूय यज्ञ में ही बैठा डाला। वैरानुबन्ध भी भक्ति का एक मार्ग है। ईशनिंदा करने से भी ईश्वर की सत्ता को जीवात्मा स्वीकार करता है। हिन्दू नाम से पुकारे जाने वाले भारतीय समाज में निंदा व स्तुति से ऊपर उठना ही धार्मिकता का प्रतीक है। मनुष्य की परिभाषा करते हुए विवश्वान ने कहा था - ''मनुते इति मनुष्यः पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुः''। मनुष्य में पाशविक आवरण को पैठ करना ही आज की विश्व समस्या है। दुनियां के सुविचार के अनुयायी लोगों को राजनीति, शासन, कॉरपोरेट प्रशासन, साहित्य, संगीत, सिनेमा तथा खेलों में भी मर्यादा निर्वाह करने का वक़्त आगया है। उग्र वैचारिक प्रवाह विश्व में जनोपयोगी कारगर शांति की स्थापना व गांधी चिंतित अहिंसा का रास्ता मनुष्य के बाज़ारू होने और मनुष्यता के बिकाऊ होने से बचा सकता है।
''आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ''।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आधुनिक देवयानी और पौराणिक काव्य सुता
भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े और उनकी नौकरानी संगीता रिचर्ड प्रकरण ने उच्च राजनयिक वितण्डा खड़ा कर दिया। आधुनिक देवयानी के पिता श्री उत्तम खोबरागड़े ने एक दुहित्र वत्सल पिता के नाते अपनी पीड़ा भारत सरकार के गृहमंत्री व विदेशमंत्री को स्वयं रायसीना हिल्स जाकर बयान की। पौराणिक देवयानी के पिता दैत्याचार्य शुक्र थे। वे मृत व्यक्ति को पुनः जीवित करने की कला के विशारद थे। देव-दानव युद्ध में वे दैत्य सैनिक जब मर जाते उन्हें जिन्दा कर देते थे। मार्कण्डेय पुराण की गाथा इस तथ्य को उजागर करती है। दैत्य शक्ति के आगे देव शक्ति अपने आपको नगण्य समझने लग गयी थी। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच ने देव समाज से अनुरोध किया कि उन्हें शुक्राचार्य से मृत संजीवनी विद्याभ्यास के लिये पात्रता प्रदान की जाये। देव संसद ने कच की प्रार्थना स्वीकार कर ली। कच शुक्राचार्य के गुरुकुल गये। वहां पितृ वत्सला देवयानी से उसकी आँखें मिलीं। देवयानी कच के स्नेह्पाश में रत हो गयी पर कच का उद्देश्य मृत संजीवनी विद्यार्जन था। वह कायाभिभूत नहीं हुए। देवयानी को विद्यार्जन तक बरगलाते रहे पर अंत में कच ने गुरु पुत्री प्रणय निवेदन को ठुकरा कर कहा - गुरु पुत्री से विवाह महान धर्म हानि है। अन्यमनस्का देवयानी राजा वृषपर्वा की राजकुमारी शर्मिष्ठा की हमउमर थी, साथ ही गुरु पुत्री थी। दोनों साथ-साथ खेलते, मनोरंजन करते तथा सैर-सपाटों में भी जाया करती थीं। एक सैर-सपाटे में गंगा स्नान पर वृषपर्वा राजधानी की कुलीन ललनायें राजकुमारी शर्मिष्ठा व गुरुपुत्री काव्य सुता के साथ जल- विहार कर रही थीं। शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लिये फलतः देवयानी के पास राजकुमारी के वस्त्र पहनने के अलावा अन्य कोई विकल्प न था। उसने शर्मिष्ठा के वस्त्र क्या पहने राजकुमारी ने उसे नग्न कर एक अंधे कुंए में फेंक दिया। मध्य उत्तर प्रदेश के गंगा घाटी क्षेत्र में राजा नहुष की राजधानी निगोहा थी। नहुष के प्रथम महा राजकुमार ययाति आखेट हेतु निकले थे। उन्हें एक स्त्री की चीत्कार सुनायी दी। प्यास भी लगी थी। कुंए या तालाब की खोज में थे। उन्होंने अंधे कुंए में नग्न देवयानी को देखा तो अपना उत्तरीय कुँए में छोड़ा। उसे पकड़ कर देवयानी कुँए से बाहर आयी। उसने राजकुमार ययाति से कहा - कूप लग्न हो गया, मैं आपकी परिणिता हो गयी। राजकुमार ययाति अपने पिता नहुष के देवताओं के राजा इंद्र के स्थान पर देवराज होने से निगोहा के राजा बन गये थे। देवयानी से अपनी आपबीती की पूरी गाथा अपने पिता शुक्राचार्य को सुनायी। देवयानी-शर्मिष्ठा प्रकरण राजनयिक व्यवस्था की शिक्षा का पहला पाठ है। दूत अदण्ड्य व अवध्य भी है। विदेशों में राजनयिक दूतालयों तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक व्यवहार को मानवीय चेहरा उपलब्ध कराने की तात्कालिक जरूरत संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजनयिक को पुलिसियन पड़ताल में निर्वस्त्र करने की दुर्नीति ने राजकुमारी शर्मिष्ठा द्वारा काव्य सुता देवयानी को निर्वस्त्र कर अंधे कुँए में धकेलने का आधुनिक सभ्य संसार का नया संस्करण है।
भारत में लोग ऊधो और माधो की लंगोटिया याराना व्यवहार के गीत गाते हैं। मराठी संत कवि एकनाथ ने उद्धव गीता पर अठारह हजार अभंग लिख कर भारत के मराठी भाषियों में भक्ति को पुष्टिमार्गी स्तर तक पहुँचाया। आधुनिक भारत के सांस्कृतिक स्वरुप को गढ़ने वाले कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने श्रीकृष्ण से अपने सखा को सम्बोधन करते हुए कहलवाया - अथैतत् परमम् गुह्यतम् श्रण्वतो यदुनन्दन।
सुगोप्यमसि वक्ष्यामि त्वम् मे भृत्यः सुहृत् सखा।। भारतीय जन 'भृत्य सुख' के भी गीत गाते रहते हैं। भृत्य पुत्र की तरह ही स्नेह से रखा जाने वाला पुरुष था। स्त्री भृत्य है। राजनयिक देवयानी प्रकरण में अंतर्राष्ट्रीय राजनय ने भृत्य के प्रति भारत में किये जारहे व्यवहार को हाशिये में डाल दिया। भारत सरकार को अपने विदेश मंत्रालय में एक ऐसा महकमा सृजित करने पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि आसेतु हिमाचल जो भारत संस्कृति है अलग-अलग भाषा समूहों द्वारा देश कालानुकूल निरंतर बह रही सांस्कृतिक हवा को राजनय से जोड़ने का उपक्रम किया जाये। भारतीय पारम्परिकता की नान्दीमुख महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर जिस आश्रम जीवन पद्धति की शुरुआत की, महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज और अनासक्ति योग में जिस बुद्धि स्थिरता को उन्होंने अपनी दैनंदिन प्रार्थना का हिस्सा बनाया, गांधी जीवन दर्शन की उस झांकी को भारतीय विदेश मंत्रालय तथा भारत के राजदूतावासों व वाणिज्य दूतावासों सहित संयुक्त राष्ट्र संघ में अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी द्वारा जो सत्य, अहिंसा का जीवन व्रत लिया गया उसे राजनयिक गुह्यता से जोड़ने की तात्कालिक जरूरत है। राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ अमेरिकी सत्ताधिष्ठान ने जो व्यवहार किया ऐसे राजनयिक व्यवहार की पुनरावृत्ति न हो, इस पर भारत सरकार को गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये। देश की विदेश नीति नियन्ताओं को सद्व्यवहार का यह मन्त्र अपनाना ही चाहिये जो उद्घोषपूर्वक अभिव्यक्ति देता है कि ''आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्''। संस्कृत, पालि सहित भारत की पुरानी भाषाओँ और भारतीय संविधान द्वारा संकल्पित राष्ट्र भाषा समूह जिन्हें अंग्रेजी में 'वर्नाक्युलर लैंग्वेजेज' कहा जाता है और भारत का अंग्रेजी राजनीतिक व समूचा प्रशासनिक तंत्र घटिया मान कर भारतीय वाङ्मय की अवहेलना करने में भी संकोच नहीं करता। स्वातंत्र्योत्तर पिछले साढ़े छह दशकों में बर्तानी राज द्वारा अपनायी गयी शासन पद्धति लोकतान्त्रिक भारत में सिस्टम फेलियर के आगोश में आ चुकी है। राजनीतिक संवादहीनता प्रशासनिक जड़ता तथा मातहत को घटिया नौकर समझ कर उसे निरंतर दुत्कारने की प्रवृत्ति ने भारत सरीखे देश जहाँ महाभारत युद्ध से पहले ही श्रीकृष्णार्जुन संवाद हुआ, अठारह दिन वाले युद्ध केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही मर्यादित था। द्वेष बुद्धि केवल दुर्योधन, भीम तक सीमित थी, योद्धा तो क्षात्र धर्म का पालन कर रहे थे। जो राजा योद्धा दुर्योधन की तरफ से लड़ रहे थे उनमें नकुल, सहदेव के मामा माद्री अग्रज मद्र नरेश शल्य भी युधिष्ठिर को मदद देने निकले थे पर दुर्योधन ने नाग विदर्भ से इंद्रप्रस्थ तक को स्वागत, आवभगत राजा शल्य की अगवानी में किया, शल्य को दुर्योधन का पक्ष लेना राजनयिक आवश्यकता बन गयी। जरूरत इस बात की है कि सिस्टम फेलियर पर राजनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर उच्च स्तरीय चर्चा हो तथा प्रशासनिक सुधार के उपायों में उस सामान्य नागरिक की भी भागीदारी सुनिश्चित की जाये जो लोकतान्त्रिक व प्रशासन तंत्र से बाहर है। उनमें किसान, मजदूर, उद्यमी, व्यापारी कारपोरेट सेक्टर से सेवानिवृत्त समूह के वे लोग जिनके पास व्यापक अनुभव है, जिंदगी के उठापटक जिन्होंने देखे हैं, जिन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वाह कर लिया है और जो लोग किसी भी विषय, समस्या तथा विवाद की स्थिति में तटस्थता के हामी हैं ऐसे लोगों की अनौपचारिक चौपालों, गोष्ठियों के माध्यम से संपर्क में रखा जाये। नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशनों को लोक कल्याणकारी रास्ते पर अग्रसर करने के लिये लोकमत का प्रतिपादन करना जरूरी है। आज भारत का इलेक्टोरल महाभारत सरीखा युद्ध पिछले बासठ वर्षों में घृणा के ही माहौल का निर्माता, पोषणकर्त्ता बना है। इसी घृणा के माहौल ने जन सामान्य में राजनीतिकों व नौकरशाही के खिलाफ भ्रष्टाचारी होने का तगमा जड़ दिया है। राजनीतिक क्षेत्र व नौकरशाही में सारे के सारे लोग न तो भ्रष्ट हैं और न ही कर्तव्यविमुख हैं पर चाटुकारिता जिसे जनसामान्य चमचागिरी कहता है उससे परहेज करने वाले राजनीतिक व नौकरशाह सिस्टम फेलियर में पिस रहे हैं।
देवयानी, संगीता रिचर्ड स्वामिनी-भृत्या प्रकरण भारतीय दलित नेतृत्त्व की अगुवा बहुजन समाज की शीर्ष नेता मायावती के देवयानी राजनयिक संत्रास प्रकरण को भारतीय उच्च सदन राज्यसभा में उठा कर देश के राजनीति कर्त्ता गैरदलित राजनेताओं व उच्च स्तरीय नौकरशाही में गैरदलित नौकरशाहों को राजनीतिक चेतावनी दे डाली है इसलिये भी भारत के राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक सरोकारों के चिंतन पोखर को मिल बैठ कर राजनयिक संहिता व राजनयिक गोपनीयता युक्त विदेशनीति, पड़ौसी सार्वभौम राष्ट्र राज्यों से उभय पक्षीय संबंधों की राजनीतिक राजनयिक, कूटनीतिक विवेचना में भारतीय वाङ्मय में अभिव्यक्त मतों को राजनयिकों की मातृभाषा में भी उन्हें समझने को मिले ऐसा प्रयास करने पर ही भारत की नीति जिस पर कब्ज़ा आज अंग्रेजीदां लोगों का है विश्व की मुख्य अंग्रेजी भाषाओँ के कूटनीतिक साहित्य की चिनगारियाँ भारतीय राजनयिकों के भेजे में घुसाना समय की पुकार है। भारतीय विदेश सेवा (I.F.S.) ऐसे लोग अब अँगुलियों में गिने जा सकते हैं जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी हो। ज्यादातर विदेश सेवा के लोग भारत की क्षेत्रीय मातृभाषी ही तो हैं अतएव भारतीय विदेश मंत्रालय को कूटनीतिक व राजनयिक कार्यशैली की हस्तपुस्तिका हर भारतीय भाषा में उपलब्ध करनी चाहिये विभिन्न राष्ट्रों के भारतीय दूतावासों में, भारतीय राजधानी दिल्ली प्रदेश की राजधानियों, जिला मुख्यालयों जहाँ-जहाँ उच्च राजनीतिक सत्ता संस्थान तथा नौकरशाही के अ.भा. स्तर के अधिकारी कार्यरत हैं उन सबको विचार करने का यह बढ़िया मौका संगीता रिचर्ड सेविका प्रकरण ने उपलब्ध कराया है। बंधुआ मजदूरी समाप्त करने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है यदि वे ही घरेलू भृत्य से अमानवीय व्यवहार करने लगेंगे तो विलोम स्थितियां अपने आप उत्पन्न होंगी इसलिये अपने बच्चों की देखभाल दाय(धात्री) अथवा गवर्नेंस रखने वाले राजनीतिक नौकरशाही के शिखरस्थ महानुभावों व भद्र महिला शिखरस्थ व्यक्तित्त्वों को अपने घर में अपनी नाक तले होरहे शोषण को समाप्त करना होगा। इसी आलेख में ऊधो-माधो की दास्तान देते हुए योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के इस कथन को अपने स्वजीवन में उतारना होगा कि ''भृत्य सुहृत् सखा'' एक समान है, अपने ही बराबर है। जो व्यक्ति भृत्य सुख लाभ लेना चाहता है उसे भृत्य के साथ भाईचारा रखना चाहिये। अगर महिला भृत्य है, स्वामिनी भी महिला है उसे अपनी सखी-सहेली के रूप में देखे, उसके साथ सद्व्यवहार हो। संगीता रिचर्ड का पक्ष प्रस्तुत करते हुए भारतीय मूल के अमेरिकी वकील ने जो दलीलें दीं उन्हें नकारना कूटनीति व राजनय धर्म के अनुकूल नहीं है अतः पुनर्विवेचनीय भी है।
अब आइये सूरदास की कथनी ''करमन की गति न्यारी'' पर। काव्य सुता देवयानी नाहुष ययाति की राजरानी थी। ययाति से उसे यदु, द्रुह्य व तुर्वसु तीन पुत्र हुए। राजनय की जरूरतों ने राजा वृषपर्वा को अपनी लाड़ली राजकुमारी शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बना कर गुरुपुत्री देवयानी के यौतुक दहेज़ के रूप में देना पड़ा।यहाँ फिर भृत्याधिकार वाला मानवीय पक्ष अपना रंग गया। दैत्यगुरु शुक्राचार्य से राजपुत्री शर्मिष्ठा ने पूछा - गुरुदेव, यौतुक के रूप में जब दासियाँ दहेज़ में दी जायें तो दहेज़ पाने वाला व्यक्ति उनका उपयोग कैसे करे ? क्या वे उसकी धर्मचारिणी नहीं बन सकतीं ? इस पर शुक्राचार्य ने जो मत व्यक्त किया वह चौंकाने वाला था। उन्होंने शर्मिष्ठा से कहा - राजपुत्री ! दहेज़ में दी गयी दासी दहेज़ प्राप्तकर्त्ता के लिये जीवन संगिनी सरीखी है। शर्मिष्ठा की बाछें खिलीं। उसने ययाति से पत्न्याधिकार पा लिया। ययाति से उसे जो पुत्र हुए उनमें पुरू सबसे छोटा था जो ययाति के पश्चात् भारत का शक्तिशाली नरेश बना। पुरू के राजखानदान शकुंतला-दुष्यंत, कुमार भरत, शांतनु, भीष्म, युधिष्ठिर और परीक्षित सरीखे प्रतापी भारत विश्रुत राजपुरुषों ने जन्म लिया। मनुष्य वह पुरुष हो या स्त्री एक मननशील देहवासी है। अपनी अभिव्यक्ति प्रकट कर कर्म स्वातंत्र्य का प्रचेता है। जंगम जीव जगत में मानव योनि के अलावा जो दूसरी तिर्यक, सरीसृप, स्वेदज, अंडज जीव योनियाँ हैं। उनके जीवनयापन स्त्रोत से मानव-मानवी सीख ले सकते हैं। मनुष्येतर योनियों में मर्यादाओं का चौखट है। मनुष्य मर्यादाओं लाँघ सकता है पर मर्यादाओं को लाँघ कर अमर्यादित होगया। अपनी नैतिक सीमायें पार कर अनीति व दुर्नीति के मार्ग का अनुसरण करने से जो नयी परम्परायें बनाता है, जो अतिवादी रास्ता अपनाता है, वह अतिवाद जिसे आजकल के विद्वतजन आतंक अथवा टेरर कह कर पुकारते हैं वह अपने आप उपजता है, बढ़ता है, कभी-कभी ऐसा आतंक सामाजिक स्वीकार्यता भी पालता है। वर्तमान विश्व में अनेक राष्ट्रों में जो विप्लव हो रहा है, शासक समाज की चूलें हिल रही हैं वह सब अपने हजारों वर्षों के इतिहास में भारत देश भोग चुका है इसलिये राजधर्म व दस्युधर्म के घालमेल से बचने की जरूरत है। भारत लोकतान्त्रिक राजव्यवस्था की दृष्टि से नया खिलाड़ी है इसलिये राजनीतिक व राजधर्मी क्षेत्रों में भारत अपनी पारम्परिकता के समानांतर आधुनिक विश्व की नूतन उपलब्धियों के बीच समन्वयात्मक दृष्टि से आगे बढ़ कर ही विभिन्न सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में नौका वहन विवेकपूर्वक संपन्न करना होगा। वह राजनयिक विवेक भारत को स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी सरीखे निर्वैर, अजातशत्रु व्यक्तित्त्वों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों में उपलब्ध कराया है। चूलें हिल चुकी कम्पायमान सिस्टम का कायाकल्प करना आज की राजनीतिक कूटनीतिक, राजनयिक तथा शीर्ष प्रशासन स्तर की पहली जरूरत है। राजतन्त्र में घुसे हुए दोष निवारण के लिये देश की नब्ज़ पकड़ सकने वाले नेता की भारत बाट जोह रहा है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
बात केवल अठानब्बे वर्ष पुरानी है जब मोहनदास करमचन्द गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश आये और उन्होंने कोचरब आश्रम की स्थापना की। यद्यपि वे वर्णाश्रम व्यवस्था के विरोधी नहीं थे तथापि उनके ह्रदय में छुआछूत के राष्ट्रीय कलंक को धोने की शिवसंकल्पवत् प्रबल आकांक्षा थी। रामायण व गीता के लिये उनकी मार्मिक आस्था तथा सादगी के लिये उन्हें गुजरात के वैष्णव समाज ने सराहा। मनुष्य मात्र के प्रति सहृदयता के लिये गुजराती भाषी वैष्णव समाज उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करता था। जब महात्मा ने दूधा भाई नाम के हरिजन (अब लोग हरिजन न कह कर अनुसूचित जाति समूह को 'दलित' संज्ञा देते हैं।) को सकुटुम्ब अपने आश्रम में रख कर छुआछूत निवारण का प्रयोग शुरू कर डाला तो उन्हें चंदा देने वाले वैष्णव वणिक समाज में खुसुर-पुसुर बातें होने लगीं कि महात्मा एक अछूत के परिवार को अपने साथ रख रहे हैं। वैष्णव बनियों ने आश्रम के लिये चंदा देना बंद कर दिया। यह बात जब जैन मतावलम्बी मिल मालिक सेठ अम्बालाल को पता चली तो वे गांधी जी के पास पहुंचे। उन्होंने गांधी जी के चरणों में तेरह हजार रुपयों की थैली रख कर उनसे प्रार्थना की कि वे इन रुपयों से अपने आश्रम का खर्च चलायें।
वसंत पंचमी 15 फरवरी 1915 के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन महात्मा के द्वारा कराने का निर्णय लिया था। स्थापना समारोह के पश्चात् महात्मा ने पंडित मदन मोहन मालवीय से कहा - वडील, (गुजराती शब्द वडील का अर्थ हिंदी में पूज्य पुरुष से है, महात्मा मालवीय जी को पूज्य मानते थे।) मेरे मन में एक शंका है और आप उसका निवारण कर सकते हैं। वह शंका छुआछूत के शास्त्र सम्मत होने या न होने के विषय में है। आप मुझे बतायें कि 'क्या सनातन धर्म में छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? मालवीय जी ने उत्तर दिया - मैं आपकी इस शंका का समाधान करने की योग्यता नहीं रखता किन्तु मैं छुआछूत मानता हूँ क्योंकि मैं सामाजिक परम्पराओं का पालन करता हूँ। महात्मा ने पुनः उनसे निवेदन किया कि वे काशी विद्वत् समाज से इस विषय में परामर्श कर उन्हें सूचित करें। मालवीय बोले - इस विषय में तो केवल सर्वपल्ली राधाकृष्णन ही सनातन धर्म की शास्त्रसम्मत व्याख्या कर सकते हैं। दोनों में परामर्श के पश्चात् यह राय बनी कि दोनों उनके निवास स्थान पर जाकर उनकी राय ज्ञात करें। महात्मा के अन्तर्मन को विश्वास था कि वेदों तथा अन्यान्य धर्म शास्त्रों में अश्पृश्यता का विधान नहीं है। सर्वपल्ली के पास जब युगल मूर्तियां पहुंचीं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा - राष्ट्र के दो बड़े नेताओं ने आज उनके घर को पवित्र कर दिया है तथा वे अपने आप को उनके आगमन से धन्य मान रहे हैं। सर्वपल्ली ने पंद्रह दिनों में उक्त समस्या का समुचित समाधान प्रस्तुत करने का वचन दोनों को दिया साथ ही दोनों से निवेदन भी किया कि छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है ऐसा उनका अपना मानना है, अधिक एवं सत्य क्या है यह वे पुनः पर्याप्त अध्ययन के पश्चात् ही बता सकेंगे किन्तु फिर भी मेरी राय में यह पराधीनता की हीनग्रन्थि मात्र ही है।
छुआछूत वाली सनातन धर्म की हीनग्रन्थि ने स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीति करने वाले महानुभावों को जकड़ डाला है। हमारे संविधान निर्माताओं ने छुआछूत का निवारण किया पर वे लोग जो आज संविधान के दायरे में राजनीति कर राजधर्म गोप्ता बने हैं वे स्वयं राजनीतिक छुआछूत से पीड़ित हैं। जिन व्याख्याकारों ने राजधर्म की भारतीय वाङ्मय में शुक्राचार्य, देवगुरु बृहस्पति, महामति विदुर, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास व आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य राजनीतिक रणनीति में स्पृश्यास्पृश्य का भेदभाव नहीं किया पर आज हम स्वतंत्र भारत में सेक्युलर और कम्यूनल अंग्रेजी भाषा के इन दो शब्दों के सहारे राजनीतिक अस्पृश्यता को अंजाम दे रहे हैं। यह बात तो हर भारतीय अच्छी तरह समझ रहा है कि कोई अकेली राजनीतिक पार्टी अब भारत राष्ट्र राज्य में एकछत्र राज करने की क्षमता अर्जित नहीं कर सकती है। अतएव संघीय सरकार दलों के पारस्परिक संविद से ही चलने वाली है। तमिलनाडु, पंजाब, ओडिशा, बंगाल राज्यों में राज्य संघीय एक दलीय सरकार है। वहीँ हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखण्ड, असम, आंध्र, कर्णाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक दल सत्ता में हैं। देश के राज्य घटकों व अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक सत्तासीन दल पारिवारिक भूमिका वाले दल भी हैं। विश्व राजनीतिक चिंतन में ऐसे दलों को वंशगत राजनीति वाली लोकतांत्रिकता भी कहा जाता है। भारत में ऐसे दलों में अ. भा. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की गिनती की जारही है। बीजद को भी कुछ लोग पिता- पुत्र दोनों के संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष होने के प्रसंग को भी वंशानुगत जनतांत्रिक लोकसत्ता प्रभाव भी कहते हैं। लोकतंत्र में व्यक्ति की निजी योग्यतानुसार यदि पिता के पश्चात् पुत्र या पुत्री शासक बनती है तो वह कोरी वंशानुगत सत्तासूत्रता नहीं कही जा सकती । भारत में पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के सत्ता में आने और रहने की प्रक्रिया को भी वंशानुगत कहना समीचीन नहीं होगा क्योंकि इंदिरा गांधी ने सत्ता अपनी वैयक्तिक नेतृत्त्व योग्यता एवं क्षमता से प्राप्त की। हाँ यह कहा जा सकता है कि इंदिरा जी के निधन के पश्चात् राजीव गांधी का प्रधानमंत्री होना वंशानुगत प्रभाव था किन्तु राजीव गांधी के पश्चात् सोनिया गांधी व राहुल गांधी के ज़माने में कांग्रेस एक परिवार पार्टी तो जरूर हो गयी है पर यह वंशानुगत सत्ता का सूत्र नहीं है क्योंकि राजीव गांधी के पश्चात् प्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी ने देश की राजसत्ता नहीं सम्भाली। वे परोक्ष रूप से सत्ता की चाबुक अपने हाथों में रखती हैं। उनके नामिती बिना लोकसभा चुनाव लड़े दस वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। जिन प्रधानमंत्री महोदय ने जब यह कहा कि वे स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद पर पंडित नेहरू एवं इंदिरा जी के पश्चात् सर्वाधिक अवधि तक आसीन रहे। जब कभी वर्तमान भारतीय राजकाज का इतिहास लिखा जायेगा तब तटस्थ इतिहासकार यू.पी.ए.I व यू.पी.ए.II के 2004 से 2014 तक के केंद्रीय सरकार, जनप्रतिनिधि सरकार के बजाय परिवार प्रतिनिधि परोक्ष शासक की ही संज्ञा दी जायेगी। इसलिये सभी राजनीतिक दलों को मिल बैठ कर यह तय करना होगा कि उच्च सदन का सदस्य लोकसभा या विधासभा का चुनाव लड़ कर ही नेता सदन एवं प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री हो। साथ ही राजनीतिक धरातल पर 'आप' सरीखे दल के अभ्युदय के पश्चात् सभी राजनीतिक दल मिलकर राजनीतिक छुआछूत से छुटकारा पाने के लिये एक ऐसा स्वयंसेवी एसोसिएशन हमें खड़ा करना होगा जो भारतीय लोकनीति, दण्डनीति, राजनीति तथा देश के विभिन्न समुदायों के विश्वासजन्य बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक बार मिल बैठ कर चर्चा करें। राजनीतिक परिधि में प्रवेश करने के इच्छुक सज्जनों युवकों एवं युवतियों के राजनीतिक प्रशिक्षण के लिये अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले प्रशिक्षण विद्यालय शुरू किये जाएँ। राजनीती के दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ कौटिल्यीय अर्थशास्त्र तथा महाभारत के शांतिपर्व को सभी भारतीय भाषाओँ में प्रकाशित किया जाये। भारत के राजनीतिक चिंतकों की जीवनियां प्रकाशित की जायें। जो व्यक्ति चुनाव की राजनीती में प्रवेश चाहता है उसे उसकी मातृभाषा में राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाये। सभी राजनीतिक दल ऐसे विद्यालयों के लिए चंदा दें। चुनाव लड़ने वालों से जो शुल्क लिया जाता है वह एवं ज़ब्त जमानत धनराशि सम्बंधित राज्य के राजनैतिक प्रशिक्षण संसथान को दी जाये। मात्र इस प्रकार के प्रशिक्षण प्रबंधन से ही राजनैतिक छुआछूत समाप्त हो सकती है। विभिन्न दलों के जरिये राजनीती करने वाले महानुभावों में स्वस्थ्य संवाद स्थापित होने पर ही लोकतंत्र सफलता के शीर्ष पर पहुँच सकता है।
मोहनदास करमचन्द गांधी ने महात्मा विशेषण जुड़ने से पहले हिन्द स्वराज के जरिये हिंदुस्तानी समाज को सचेत करते हुए भारतीय सामाजिक मूल्यों को ही अपनाये रखने की नेक सलाह अपनी मातृभाषा गुजराती में दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों को इंडियन ओपिनियन के जरिये दी थी। हिंदुस्तान के लोगों की मान्यता है कि गांधी जी को 'महात्मा' कह कर सबसे पहले कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पुकारा था। शिमला के रहने वाले इतिहासकार श्री राम मेहरोत्रा का मानना है कि गांधी जी को सबसे पहले डा. प्राणजीवन जगजीवन दास मेहता जो स्वयं काठियावाड़ी थे उन्होंने अपनी पुस्तक 'एम.के. गांधी' एवं 'दी साउथ इंडियन अफ्रीकन प्रॉब्लम' नामक पुस्तक में 'महात्मा' विशेषण दिया। कोचरब आश्रम को खड़ा करने में डा. मेहता ने महात्मा गांधी को नैतिक सम्बल भी दिया था। ज्ञातव्य है कि डा. मेहता स्वयं दसधा नरसी मेहता भक्तिपथ के राही थे। ''वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे'' जो कोचरब आश्रम की स्थापना के निन्यानबे वर्ष पश्चात आज गुजरात भारत भूमि में वह गौरव फिर अर्जित कर रहा है जो महात्मा गांधी ने सत्याग्रह व अहिंसा के जरिये किया था। नरेंद्र मोदी का नेतृत्त्व भारत को सभी तरह की छुआछूत निवारण के साथ-साथ राजनैतिक मूल्यों की विरासत को स्थायी अवलम्ब देने की क्षमता धारक है। आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक हुंडी सकारने की है। नरेंद्र मोदी भारत की राजनीतिक हुंडी सकारने में सक्षम नेतृत्त्व हैं।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
छुआछूत वाली सनातन धर्म की हीनग्रन्थि ने स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीति करने वाले महानुभावों को जकड़ डाला है। हमारे संविधान निर्माताओं ने छुआछूत का निवारण किया पर वे लोग जो आज संविधान के दायरे में राजनीति कर राजधर्म गोप्ता बने हैं वे स्वयं राजनीतिक छुआछूत से पीड़ित हैं। जिन व्याख्याकारों ने राजधर्म की भारतीय वाङ्मय में शुक्राचार्य, देवगुरु बृहस्पति, महामति विदुर, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास व आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य राजनीतिक रणनीति में स्पृश्यास्पृश्य का भेदभाव नहीं किया पर आज हम स्वतंत्र भारत में सेक्युलर और कम्यूनल अंग्रेजी भाषा के इन दो शब्दों के सहारे राजनीतिक अस्पृश्यता को अंजाम दे रहे हैं। यह बात तो हर भारतीय अच्छी तरह समझ रहा है कि कोई अकेली राजनीतिक पार्टी अब भारत राष्ट्र राज्य में एकछत्र राज करने की क्षमता अर्जित नहीं कर सकती है। अतएव संघीय सरकार दलों के पारस्परिक संविद से ही चलने वाली है। तमिलनाडु, पंजाब, ओडिशा, बंगाल राज्यों में राज्य संघीय एक दलीय सरकार है। वहीँ हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखण्ड, असम, आंध्र, कर्णाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक दल सत्ता में हैं। देश के राज्य घटकों व अखिल भारत स्तरीय राजनीतिक सत्तासीन दल पारिवारिक भूमिका वाले दल भी हैं। विश्व राजनीतिक चिंतन में ऐसे दलों को वंशगत राजनीति वाली लोकतांत्रिकता भी कहा जाता है। भारत में ऐसे दलों में अ. भा. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की गिनती की जारही है। बीजद को भी कुछ लोग पिता- पुत्र दोनों के संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष होने के प्रसंग को भी वंशानुगत जनतांत्रिक लोकसत्ता प्रभाव भी कहते हैं। लोकतंत्र में व्यक्ति की निजी योग्यतानुसार यदि पिता के पश्चात् पुत्र या पुत्री शासक बनती है तो वह कोरी वंशानुगत सत्तासूत्रता नहीं कही जा सकती । भारत में पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के सत्ता में आने और रहने की प्रक्रिया को भी वंशानुगत कहना समीचीन नहीं होगा क्योंकि इंदिरा गांधी ने सत्ता अपनी वैयक्तिक नेतृत्त्व योग्यता एवं क्षमता से प्राप्त की। हाँ यह कहा जा सकता है कि इंदिरा जी के निधन के पश्चात् राजीव गांधी का प्रधानमंत्री होना वंशानुगत प्रभाव था किन्तु राजीव गांधी के पश्चात् सोनिया गांधी व राहुल गांधी के ज़माने में कांग्रेस एक परिवार पार्टी तो जरूर हो गयी है पर यह वंशानुगत सत्ता का सूत्र नहीं है क्योंकि राजीव गांधी के पश्चात् प्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी ने देश की राजसत्ता नहीं सम्भाली। वे परोक्ष रूप से सत्ता की चाबुक अपने हाथों में रखती हैं। उनके नामिती बिना लोकसभा चुनाव लड़े दस वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। जिन प्रधानमंत्री महोदय ने जब यह कहा कि वे स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद पर पंडित नेहरू एवं इंदिरा जी के पश्चात् सर्वाधिक अवधि तक आसीन रहे। जब कभी वर्तमान भारतीय राजकाज का इतिहास लिखा जायेगा तब तटस्थ इतिहासकार यू.पी.ए.I व यू.पी.ए.II के 2004 से 2014 तक के केंद्रीय सरकार, जनप्रतिनिधि सरकार के बजाय परिवार प्रतिनिधि परोक्ष शासक की ही संज्ञा दी जायेगी। इसलिये सभी राजनीतिक दलों को मिल बैठ कर यह तय करना होगा कि उच्च सदन का सदस्य लोकसभा या विधासभा का चुनाव लड़ कर ही नेता सदन एवं प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री हो। साथ ही राजनीतिक धरातल पर 'आप' सरीखे दल के अभ्युदय के पश्चात् सभी राजनीतिक दल मिलकर राजनीतिक छुआछूत से छुटकारा पाने के लिये एक ऐसा स्वयंसेवी एसोसिएशन हमें खड़ा करना होगा जो भारतीय लोकनीति, दण्डनीति, राजनीति तथा देश के विभिन्न समुदायों के विश्वासजन्य बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक बार मिल बैठ कर चर्चा करें। राजनीतिक परिधि में प्रवेश करने के इच्छुक सज्जनों युवकों एवं युवतियों के राजनीतिक प्रशिक्षण के लिये अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले प्रशिक्षण विद्यालय शुरू किये जाएँ। राजनीती के दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ कौटिल्यीय अर्थशास्त्र तथा महाभारत के शांतिपर्व को सभी भारतीय भाषाओँ में प्रकाशित किया जाये। भारत के राजनीतिक चिंतकों की जीवनियां प्रकाशित की जायें। जो व्यक्ति चुनाव की राजनीती में प्रवेश चाहता है उसे उसकी मातृभाषा में राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाये। सभी राजनीतिक दल ऐसे विद्यालयों के लिए चंदा दें। चुनाव लड़ने वालों से जो शुल्क लिया जाता है वह एवं ज़ब्त जमानत धनराशि सम्बंधित राज्य के राजनैतिक प्रशिक्षण संसथान को दी जाये। मात्र इस प्रकार के प्रशिक्षण प्रबंधन से ही राजनैतिक छुआछूत समाप्त हो सकती है। विभिन्न दलों के जरिये राजनीती करने वाले महानुभावों में स्वस्थ्य संवाद स्थापित होने पर ही लोकतंत्र सफलता के शीर्ष पर पहुँच सकता है।
मोहनदास करमचन्द गांधी ने महात्मा विशेषण जुड़ने से पहले हिन्द स्वराज के जरिये हिंदुस्तानी समाज को सचेत करते हुए भारतीय सामाजिक मूल्यों को ही अपनाये रखने की नेक सलाह अपनी मातृभाषा गुजराती में दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों को इंडियन ओपिनियन के जरिये दी थी। हिंदुस्तान के लोगों की मान्यता है कि गांधी जी को 'महात्मा' कह कर सबसे पहले कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पुकारा था। शिमला के रहने वाले इतिहासकार श्री राम मेहरोत्रा का मानना है कि गांधी जी को सबसे पहले डा. प्राणजीवन जगजीवन दास मेहता जो स्वयं काठियावाड़ी थे उन्होंने अपनी पुस्तक 'एम.के. गांधी' एवं 'दी साउथ इंडियन अफ्रीकन प्रॉब्लम' नामक पुस्तक में 'महात्मा' विशेषण दिया। कोचरब आश्रम को खड़ा करने में डा. मेहता ने महात्मा गांधी को नैतिक सम्बल भी दिया था। ज्ञातव्य है कि डा. मेहता स्वयं दसधा नरसी मेहता भक्तिपथ के राही थे। ''वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे'' जो कोचरब आश्रम की स्थापना के निन्यानबे वर्ष पश्चात आज गुजरात भारत भूमि में वह गौरव फिर अर्जित कर रहा है जो महात्मा गांधी ने सत्याग्रह व अहिंसा के जरिये किया था। नरेंद्र मोदी का नेतृत्त्व भारत को सभी तरह की छुआछूत निवारण के साथ-साथ राजनैतिक मूल्यों की विरासत को स्थायी अवलम्ब देने की क्षमता धारक है। आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक हुंडी सकारने की है। नरेंद्र मोदी भारत की राजनीतिक हुंडी सकारने में सक्षम नेतृत्त्व हैं।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
स्वरुप शाश्वत सनातन धर्म का और दृष्टिकोण वेंडी डोनिगर की विवादित पुस्तक का
बीबीसी से बातचीत में डोनिगर ने कहा, "मैंने लगभग एक हफ़्ते पहले इस बारे में सुना और मुझे काफ़ी दुख हुआ. मुझे आशंका थी कि ऐसा हो सकता है. पिछले चार साल से ये क़ानूनी मामला चल रहा था. जिस तरह से भारत में और पूरी दुनिया भर में इसे लेकर प्रतिक्रिया हुई है मैं उससे आश्चर्यचकित हूँ. मुझे नहीं लगा था कि किसी को इस बात से कोई फ़र्क पड़ेगा." सौजन्य से बी. बी. सी. हिंदी
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में शिकागो की धर्म संसद में संत शिरोमणि विवेकानंद ने भारतीय धर्म की विभिन्न शैलियों, परम्पराओं तथा मानव धर्म के उदात्त स्वरुप को अत्यंत चित्ताकर्षक वाणी के माध्यम से प्रस्तुत किया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के जन समाज में हिन्दू नाम से पुकारे जाने वाले भारतियों की आस्था के विभिन्न नामों का विवेचन करते हुए अमेरिकी समाज में भारत जिज्ञासा की ललक पैदा कर दी थी।
इसी शिकागो शहर के विश्वविद्यालय की आचार्या वेंडी डोनिगर ने पौर्वात्य धर्म संहिता वाले भारत देश के विश्वास व आस्थामूलक इतिहास पर ''द हिन्दू - अल्टरनेटिव हिस्ट्री (The Hindu-Alternative History) शीर्षक से इक्कीसवीं शताब्दी के पहली दशाब्दी में लिखी इस पुस्तक के प्रकाशक 'पेंगुइन' ने किताब को भारत के बाज़ार से उठाने का फैसला एक इकरारनामे के तहत किया। इतिहासज्ञ रामचंद्र गुह ने इस समाचार को अत्यंत निराशाजनक बताते हुए कहा कि अत्यन्त हतोत्साहित करने वाला है पेंगुइन का यह प्रयास, चाहिए तो था कि ऊँची अदालत में अपील करते।''। सोशल मीडिया ट्विटर के अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा - ''अगर किसी को कोई पुस्तक अप्रिय या आपत्तिजनक लगती है तो उसका प्रत्युत्तर है एक और किताब न कि उस पर प्रतिबंध, कानूनी कार्रवाई अथवा मारने-पीटने की धमकी''। देवदत्त पटनायक की राय में - ''उन्होंने वेंडी डोनिगर की रचनाओं का सन्दर्भ लिया और उन्हें एक अत्यंत विदुषी महिला करार दिया''। उनकी राय में विद्वत् समाज में गहरी मानसिक असहजावस्था और प्रारम्भ की गयी हास्यावस्था अथवा हास्य उपक्रम भारतीय सन्दर्भ में वशिष्ठ-चार्वाक वैचारिक भिन्नता संवाद में देखी जा सकती है। अपने पुत्र शक्ति के द्वादशाह श्राद्ध में वशिष्ठ ने चार्वाक को भी आमंत्रित किया था। चार्वाक का मत था कि ''जिस तरह बुझी हुई बाती तेल का उपयोग कदापि नहीं कर सकती उसी तरह मृत व्यक्ति भी श्राद्ध में प्रदान की गयी सामग्री का उपभोग नहीं कर सकता''। इस पर वशिष्ठ ने कहा - ''खाना तो मुझे एवं आपको है, मृत व्यक्ति तो केवल निमित्त मात्र है''। चार्वाक श्राद्ध भोज में सम्मिलित हुए क्योंकि उनके ऐतराज को वशिष्ठ ने मानते हुए वास्तविक स्थिति का विश्लेषण कर लिया। पेंगुइन क्योंकि पुस्तकों का एक व्यापारिक संगठन है एवं उसे अपना व्यापार पहले देखना है बाकी बहस के मुद्दे बाद में। पुस्तक में क्या सही है व क्या गलत इस विवाद में पेंगुइन के प्रकाशक महोदय नहीं पड़े। उन्होंने पूरे विश्व बाज़ार से डोनिगर की पुस्तक वापस न लेकर मात्र भारत देश के बाज़ार से ही पुस्तक को हटाया। पुस्तक का मूल विरोध तो संयुक्त राज्य अमेरिका में पुस्तक के बाज़ार में आने पर ही शुरू हो चुका था। न्यूयार्क के हिंदुओं ने सभा कर पुस्तक का विरोध करना शुरू कर दिया। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जगह-जगह सैकड़ों हिन्दू मंदिर हैं। रामकृष्ण मिशन, चिन्मयानन्द मिशन, परमहंस योगानंद के योगमार्ग, भारतीय वैष्णव मत की आधारशिला, श्रीमद्भागवत् महापुराण सहित भारतीय आस्थामूलक साहित्य अमेरिकी अंग्रेजी में यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध है। इस ब्लॉगर की दुहिता जिसका जन्म भारत के हिमालय प्रदेश में हुआ, भारत में पढ़ाई के बाद वह अमेरिका जा बसी और अपने पति तथा दो कन्याओं सहित अमेरिकी नागरिक है। अपने पिता को अमेरिका बुलाती रहती है। उसकी माँ अपने जीवनकाल में चार बार अमेरिका गयी फलतः उसके निधन के पश्चात् माँ की याद में वह अपने पिता को वहाँ बुलाती रहती है। उसने 'द हिन्दू - अल्टरनेटिव हिस्ट्री (The Hindu-Alternative History)' खरीद कर अपने पिता को पढने हेतु दी। इस ब्लॉगर ने दो बार पुस्तक सांगोपांग पढ़ ली किन्तु छोटी-मोटी विसंगतियों को नजरअंदाज करते हुए केवल आदि जगद्गुरु शंकराचार्य सम्बन्धी वेंडी डोनिगर के विवेचन को उनकी पुस्तक का सर्वाधिक अस्वीकार्य पक्ष माना। शंकराचार्य का अद्वैत, रामानुज का द्वैताद्वैत, तथा माध्वाचार्य के विशिष्ट द्वैताद्वैत का विवेचन करते हुए वेंडी डोनिगर ने रामानुज व माध्वाचार्य को शंकर से ऊंचा आसन देने की असफल कोशिश की शायद इसका कारण यह लगता है कि वेंडी डोनिगर हिन्दू समाज की व्यापक व विशद विविधताओं पर एक समदर्शी इतिहासकार की दृष्टि नहीं रख पायीं। सम्भवतः उन्हें भारत की मूल भाषा संस्कृत का थोड़ा बहुत ज्ञान रहा होगा तथापि वे भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ की मर्मज्ञता प्राप्त नहीं कर सकीं। उनका सारा विश्लेषण अंग्रेजी भाषा में भारत धर्मिता के पाश्चात्य या उन भारतीयों के विश्लेषण पर आधारित था जिन्हें भारत धर्म की बारहखड़ी अंग्रेजी के माध्यम से ज्ञात हुई। गनीमत यह रही कि वेंडी डोनिगर सरीखी विदुषी महिला अल्टरनेटिव रिलिजन धर्म पर भी भाष्य लिख सकती थीं जो अभी होना शेष है। आज दुनियां के जो लश्करी मजहब हैं, विशेष तौर पर वेटिकन से अनुशासित ईसाई मजहब तथा कुछ अन्यान्य दूसरे मजहब भी, वे कभी-कभी धर्मादेश अथवा फ़तवे जारी करते हैंकिन्तु सनातन धर्म में मतभेद की स्थिति में परस्पर विचार-विमर्श कर निर्णयात्मक रास्ता खोजा जाता है, अन्य धर्मों की तरह उस पर ही चलने की पाबन्दी नहीं होती। चाहें तो मानें अथवा न चाहें तो न मानें। मनुष्यों की तरह मजहब भी पैदा होते हैं और मरते भी हैं। संसार का यह प्रमुख गुण है जिसे हम परिवर्तनशीलता के नाम से जानते हैं। प्रश्न उत्पन्न होता है, ईसाई मजहब का इतिहास मात्र दो हजार वर्ष पुराना है, इस्लाम का इतिहास अधिक से अधिक चौदह सौ चालीस वर्ष पुराना कहा जा सकता है यहूदी मजहब सहित ये सभी पाश्चात्य अथवा नैऋत्य आस्थायें सेमेटिक परिवारी हैं। भारत में सनातन धर्म के अलावा जैन, बौद्ध तथा सिख आस्थायें ओंकार मूलक हैं। प्रणव का उद्गान वेद भी करते हैं। वे लोग जो वेद को नहीं मानते हैं तथा वेद की निंदा तक करते हैं ऐसी उन आस्थाओं तक को भी सनातनता ने अस्तित्त्व दिया। आज भारत के लोग जैन, बौद्ध तथा सिख धर्म के अनुयायियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों की संज्ञा दे रहे हैं किन्तु वस्तुतः ये तीनों धर्म जिनके उद्गाता क्रमशः महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध एवं नानकदेव गुरु गोविन्द सिंह हैं तथा जिनकी अपनी-अपनी धार्मिक पुस्तकें पृथक-पृथक अस्तित्त्व भी रखती हैं तथापि जिसे भारत के लोग सनातन, स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त आदि सम्प्रदायों में अपने आपको घेरे रखते है, उप सम्प्रदायों अथवा सह सम्प्रदायों के रूप में भारत में नानकपंथी, दादूपंथी, कबीरपंथी, गोरखपंथी,चिंतक या पोषक भी हैं। कबीर ने अपनी साखी में लिखा - 'भगती उपजी द्रविड़ देश'। श्रीमद्भागवत के माहात्म्य वर्णन के अन्तर्गत पद्मपुराण में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने लिखा - ''द्रविड़े साअहम् समुत्पन्ना, वृद्धिम् कर्णाटके गतां क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णताम् गता।''।
भक्ति नारद को अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं द्रविड़ देश (वर्तमान तमिलनाडु) में जन्मी, कर्णाटक में बाल्यकाल बीता महाराष्ट्र में पुष्ट हुई तथा यहीं उसके ज्ञान व वैराग्य दो पुत्र हुए एवं गुजरात पहुँच कर बूढी हो गयी। ''वृद्धमाता बलप्रदा''।
प्रश्न उठता है कि क्या हिन्दू एक धर्म है अथवा एक जीवनशैली या फिर जीवनपद्धति ? आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन तो स्थापित संगठन है जिनकी व्यापक अखिल भारतीय विश्व मानवीय धार्मिकता है। इसलिये वेंडी डोनिगर सहित हिन्दू समाज के प्रागैतिहासिक, पौराणिक, पूर्व इस्लाम आगमन तथा ईसाई धर्म की भारत में दस्तक तथा इन दोनों सेमेटिक रिलीजनों का जो राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव हिन्दू समाज पर पड़ा उसने भारत के पांथिक स्वरुप को नया आकार देने में कौन-कौन सी महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह किया। संत विनोबा भावे ने महत्त्वपूर्ण आस्थामूलक व्याख्या को, उनका कहना था ''श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापिहि'' भागवत शास्त्र में श्रद्धा पर इतर श्रद्धाओं व आस्थाओं के लिये अनिंदा भाव तात्पर्य कि दुनियां की हर आस्थामूलका की स्तुति। संत विनोबा का शब्द संसार मानव हितैषी होने के साथ-साथ कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके का प्रतीक है। मनुष्य समाज कर्म विपाक से बंधा हुआ है। उसे कर्म ही करते रहना है पर कर्म फललिप्सा में बंधना नहीं है। वेंडी डोनिगर ने बहुत परिश्रम किया पर सनातन के जिस बरगद को उन्होंने छोड़ दिया, महाराष्ट्र, कर्णाटक, तमिलनाडु, बंगाल, उत्कल सहित भारतीय राज्यों में आस्थामूलकता की जो सर्वसम्मत राह थी उसे पकड़ना चाहिये था। वेंडी डोनिगर ने आदिशंकर प्रसंग को इतने हलके क्यों लिया। रामानुज व माध्वाचार्य का द्वैताद्वैत तथा विशिष्टा द्वैत केवल तमिलनाडु व कर्णाटक तक ही प्रभावी था जबकि शंकर का अद्वैत आसेतु हिमाचल, अटक से कटक तथा काराकोरम से कन्याकुमारी पर्यन्त बंग, कलिंग, कामरूप, कुमाऊँ, कांगड़ा व कश्मीर तक सर्वत्र विद्यमान था। हिंदी साहित्य के मूर्धण्य विचार पोखर नामवर सिंह ने पेंगुइन किताब वापसी के प्रसंग को लेखक के विचार स्वातंत्र्य पर आक्रमण करार दिया है। डोनिगर ने स्वयं भी भारत में पुस्तक वापस लिये जाने के प्रसंग को सहन करने योग्य घटना नहीं माना। सज्जन दास गुप्ता एवं हरि कुंगरु ने भी स्वयं को असहज महसूस किया। कुंगरु ने तो यहाँ तक अभिव्यक्ति दी कि यदि मतान्तर है तो छपास के जरिये व्यक्त करो। भारत से वेंडी डोनिगर की उक्त विवादित पुस्तक को प्रकाशक द्वारा वापस लिया जाना कोई अनहोनी व नयी घटना नहीं है।
भारत के लोगों के सामने तो पेंगुइन की खबर ही विचार स्वातंत्र्य, अपनी बात कहने की आज़ादी का सवाल भारत के विद्वत् समाज ने रखा। वेंडी डोनिगर ने हिन्दू समाज को ही हिन्दू धर्म के रूप में ऐतिहासिक अध्यन के अपने उपक्रम को इकतरफा देखा। शायद उन्हें यह ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी रही होगी कि वे उस आस्था मार्ग का सही-सही निरूपण करने की स्थिति में पहुँच गयी हैं जिससे वे अपने ऐतिहासिक वक्तव्य को वैकल्पिक ऊँचाई देना चाहती हैं। वे यह भूल गयीं कि इस भारत में कपिलाचार्य नाम का एक सांख्ययोगी भी हुआ था जिसकी माता देवहूति व पिता कर्दम थे। माता ने पुत्र से पूछा - ''गुणेषु सत्सु प्रकृते: कैवल्यम् तेष्वम् कथम्''।
कपिल ने माता को उत्तर दिया - ''अनन्य हेतुष्वथ मे गतिस्यात्, आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहास''।
इतिहास का एक नाम मृत्युहास भी है। भारतीय सन्दर्भ में यदि वेंडी डोनिगर ने अपनी इतिहासज्ञता को सटीक प्रमाणित करने के लिये भारत के ऊधो माधो के बतियाने का ही अनुशीलन किया होता तो उन्हें ऊलजलूल बातें हिंदुओं के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में लिखने के बावज़ूद उनको विरोधी समाज नहीं घेर पाता। पारम्परिक भारतीय आस्था का वह स्वरुप जो यह कहता है -
''सरित् समुद्रश्च् हरे शरीरम् यत्किञ्च् भूतम् प्रणमेदनय्।
खं वायुर्मार्गम् सलिलं मही च् ज्योतिषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन।।''।
जो भारतीय समाज समूचे विश्व को ईश्वर रूप मानती है उसे इतिहासज्ञ तिरछी नज़र से परखने का प्रयास करेंगी तो उसे चतुर्दिक विरोध का ही सामना करना पड़ेगा और यही वेंडी डोनिगर के इतिहास भाव प्रवण के तौर-तरीकों से हुआ। भारत सहित समूचे विश्व के विद्वत् समाज को यह पूरा अधिकार है, उनका कर्त्तव्य भी है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आंच न आने दें। संसार में किसी भी विचार के खण्डन व मण्डन के तार्किक तौर-तरीके हैं। वेंडी डोनिगर ने केवल आंशिक व इकतरफा तर्क का सहारा लिया। उन्होंने भारतीय आस्था मूलकता के उन बिन्दुओं की लगभग अनदेखी ही की जिन्हें सभी भारतीय आस्था वर्ग मान्यता देते थे। उन्होंने विरोध के उन स्वरों को पकड़ा जिनके प्रशंसक अत्यधिक संख्या में कम थे तथा जिनकी उपासना शैली पर अंगुलियां भी उठ जाया करती थीं। भारतीय तंत्र मार्ग, वह वैदिक आधार का तंत्र हो, बीजमंत्रों को सिद्ध सम्पुट का उनका प्रयोग हो वह वाम मार्ग का उत्प्रेरक हो या तंत्र की वह स्थिति जिसे सर्वमान्यता मिली है इसका उन्हें एहसास न होने से उनके लेखन के विरुद्ध अमेरिकी हिन्दुओं जिनमें पारम्परिक हिन्दुओं के अलावा भक्तिवेदांत स्वामी के भक्तों की भी बड़ी संख्या थी जो मूलतः भारतीय नहीं थे पर भारत धर्म से प्रभावित थे। वे भी वेंडी डोनिगर के विरुद्ध खड़े हो गये। धरती के अनेक राष्ट्र राज्यों में ईश निंदा पर दण्ड देने की व्यवस्था अनेकानेक धर्मावलम्बियों के मध्य सुस्थापित है। भारत धर्म में ईश निंदा के कई एक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ स्थापित ईश तत्त्व की निंदा व्यक्ति स्वधर्म मानता है। पहला उदाहरण दिति-कश्यप नंदन हिरण्यकश्यप का है केशिनी ने राजा प्रह्लाद की अदालत में जो दैत्य वंश के प्रथम प्रतापी राजा थे जिनके वंश में उनके मारे जाने के बाद उनका पुत्र नवधा भक्ति का प्रतीक प्रह्लाद दैत्यराज हुए, प्रह्लाद के सामने केशिनी के साथ सुधन्वा व विरोचन (प्रह्लाद के अपने बेटे) प्रेम-प्रसंग का निर्णय करने के लिये केशिनी ने राजा प्रह्लाद की अदालत में न्याय याचना की। केशिनी का कहना था की वह उससे विवाह करेगी जो विरोचन व सुधन्वा में श्रेष्ठ हो, राजा प्रह्लाद ने निर्णय दिया सुधन्वा के पिता राजा प्रह्लाद से इसलिये श्रेष्ठ है क्योंकि वह तापसी है सुधन्वा की माँ को राजा प्रह्लाद ने अपनी रानी से श्रेष्ठ बताया, प्रह्लाद का तर्क था चूंकि सुधन्वा के मातापिता दोनों प्रह्लाद व विरोचन से श्रेष्ठ हैं इसलिए सुधन्वा विरोचन से श्रेष्ठ है ? यह सृष्टि के पहले नीतिसम्मत दैत्यराज का निर्णय था।
हिंदुस्तान की एक और विशेषता है। नारद ने युधिष्ठिर से कहा - चेदिराज शिशुपाल योगेश्वर बालकृष्ण की यत्र-तत्र-सर्वत्र निंदा ही किया करता था। अपशब्द भी कहता रहता था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल को दण्डित किया। उसके स्थान पर शिशुपाल नंदन को चेदिराज के सिंहासन पर राजसूय यज्ञ में ही बैठा डाला। वैरानुबन्ध भी भक्ति का एक मार्ग है। ईशनिंदा करने से भी ईश्वर की सत्ता को जीवात्मा स्वीकार करता है। हिन्दू नाम से पुकारे जाने वाले भारतीय समाज में निंदा व स्तुति से ऊपर उठना ही धार्मिकता का प्रतीक है। मनुष्य की परिभाषा करते हुए विवश्वान ने कहा था - ''मनुते इति मनुष्यः पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुः''। मनुष्य में पाशविक आवरण को पैठ करना ही आज की विश्व समस्या है। दुनियां के सुविचार के अनुयायी लोगों को राजनीति, शासन, कॉरपोरेट प्रशासन, साहित्य, संगीत, सिनेमा तथा खेलों में भी मर्यादा निर्वाह करने का वक़्त आगया है। उग्र वैचारिक प्रवाह विश्व में जनोपयोगी कारगर शांति की स्थापना व गांधी चिंतित अहिंसा का रास्ता मनुष्य के बाज़ारू होने और मनुष्यता के बिकाऊ होने से बचा सकता है।
''आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ''।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आधुनिक देवयानी और पौराणिक काव्य सुता
भारत में लोग ऊधो और माधो की लंगोटिया याराना व्यवहार के गीत गाते हैं। मराठी संत कवि एकनाथ ने उद्धव गीता पर अठारह हजार अभंग लिख कर भारत के मराठी भाषियों में भक्ति को पुष्टिमार्गी स्तर तक पहुँचाया। आधुनिक भारत के सांस्कृतिक स्वरुप को गढ़ने वाले कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने श्रीकृष्ण से अपने सखा को सम्बोधन करते हुए कहलवाया - अथैतत् परमम् गुह्यतम् श्रण्वतो यदुनन्दन।
सुगोप्यमसि वक्ष्यामि त्वम् मे भृत्यः सुहृत् सखा।। भारतीय जन 'भृत्य सुख' के भी गीत गाते रहते हैं। भृत्य पुत्र की तरह ही स्नेह से रखा जाने वाला पुरुष था। स्त्री भृत्य है। राजनयिक देवयानी प्रकरण में अंतर्राष्ट्रीय राजनय ने भृत्य के प्रति भारत में किये जारहे व्यवहार को हाशिये में डाल दिया। भारत सरकार को अपने विदेश मंत्रालय में एक ऐसा महकमा सृजित करने पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि आसेतु हिमाचल जो भारत संस्कृति है अलग-अलग भाषा समूहों द्वारा देश कालानुकूल निरंतर बह रही सांस्कृतिक हवा को राजनय से जोड़ने का उपक्रम किया जाये। भारतीय पारम्परिकता की नान्दीमुख महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर जिस आश्रम जीवन पद्धति की शुरुआत की, महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज और अनासक्ति योग में जिस बुद्धि स्थिरता को उन्होंने अपनी दैनंदिन प्रार्थना का हिस्सा बनाया, गांधी जीवन दर्शन की उस झांकी को भारतीय विदेश मंत्रालय तथा भारत के राजदूतावासों व वाणिज्य दूतावासों सहित संयुक्त राष्ट्र संघ में अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी द्वारा जो सत्य, अहिंसा का जीवन व्रत लिया गया उसे राजनयिक गुह्यता से जोड़ने की तात्कालिक जरूरत है। राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ अमेरिकी सत्ताधिष्ठान ने जो व्यवहार किया ऐसे राजनयिक व्यवहार की पुनरावृत्ति न हो, इस पर भारत सरकार को गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये। देश की विदेश नीति नियन्ताओं को सद्व्यवहार का यह मन्त्र अपनाना ही चाहिये जो उद्घोषपूर्वक अभिव्यक्ति देता है कि ''आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्''। संस्कृत, पालि सहित भारत की पुरानी भाषाओँ और भारतीय संविधान द्वारा संकल्पित राष्ट्र भाषा समूह जिन्हें अंग्रेजी में 'वर्नाक्युलर लैंग्वेजेज' कहा जाता है और भारत का अंग्रेजी राजनीतिक व समूचा प्रशासनिक तंत्र घटिया मान कर भारतीय वाङ्मय की अवहेलना करने में भी संकोच नहीं करता। स्वातंत्र्योत्तर पिछले साढ़े छह दशकों में बर्तानी राज द्वारा अपनायी गयी शासन पद्धति लोकतान्त्रिक भारत में सिस्टम फेलियर के आगोश में आ चुकी है। राजनीतिक संवादहीनता प्रशासनिक जड़ता तथा मातहत को घटिया नौकर समझ कर उसे निरंतर दुत्कारने की प्रवृत्ति ने भारत सरीखे देश जहाँ महाभारत युद्ध से पहले ही श्रीकृष्णार्जुन संवाद हुआ, अठारह दिन वाले युद्ध केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही मर्यादित था। द्वेष बुद्धि केवल दुर्योधन, भीम तक सीमित थी, योद्धा तो क्षात्र धर्म का पालन कर रहे थे। जो राजा योद्धा दुर्योधन की तरफ से लड़ रहे थे उनमें नकुल, सहदेव के मामा माद्री अग्रज मद्र नरेश शल्य भी युधिष्ठिर को मदद देने निकले थे पर दुर्योधन ने नाग विदर्भ से इंद्रप्रस्थ तक को स्वागत, आवभगत राजा शल्य की अगवानी में किया, शल्य को दुर्योधन का पक्ष लेना राजनयिक आवश्यकता बन गयी। जरूरत इस बात की है कि सिस्टम फेलियर पर राजनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर उच्च स्तरीय चर्चा हो तथा प्रशासनिक सुधार के उपायों में उस सामान्य नागरिक की भी भागीदारी सुनिश्चित की जाये जो लोकतान्त्रिक व प्रशासन तंत्र से बाहर है। उनमें किसान, मजदूर, उद्यमी, व्यापारी कारपोरेट सेक्टर से सेवानिवृत्त समूह के वे लोग जिनके पास व्यापक अनुभव है, जिंदगी के उठापटक जिन्होंने देखे हैं, जिन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वाह कर लिया है और जो लोग किसी भी विषय, समस्या तथा विवाद की स्थिति में तटस्थता के हामी हैं ऐसे लोगों की अनौपचारिक चौपालों, गोष्ठियों के माध्यम से संपर्क में रखा जाये। नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गनाइजेशनों को लोक कल्याणकारी रास्ते पर अग्रसर करने के लिये लोकमत का प्रतिपादन करना जरूरी है। आज भारत का इलेक्टोरल महाभारत सरीखा युद्ध पिछले बासठ वर्षों में घृणा के ही माहौल का निर्माता, पोषणकर्त्ता बना है। इसी घृणा के माहौल ने जन सामान्य में राजनीतिकों व नौकरशाही के खिलाफ भ्रष्टाचारी होने का तगमा जड़ दिया है। राजनीतिक क्षेत्र व नौकरशाही में सारे के सारे लोग न तो भ्रष्ट हैं और न ही कर्तव्यविमुख हैं पर चाटुकारिता जिसे जनसामान्य चमचागिरी कहता है उससे परहेज करने वाले राजनीतिक व नौकरशाह सिस्टम फेलियर में पिस रहे हैं।
देवयानी, संगीता रिचर्ड स्वामिनी-भृत्या प्रकरण भारतीय दलित नेतृत्त्व की अगुवा बहुजन समाज की शीर्ष नेता मायावती के देवयानी राजनयिक संत्रास प्रकरण को भारतीय उच्च सदन राज्यसभा में उठा कर देश के राजनीति कर्त्ता गैरदलित राजनेताओं व उच्च स्तरीय नौकरशाही में गैरदलित नौकरशाहों को राजनीतिक चेतावनी दे डाली है इसलिये भी भारत के राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक सरोकारों के चिंतन पोखर को मिल बैठ कर राजनयिक संहिता व राजनयिक गोपनीयता युक्त विदेशनीति, पड़ौसी सार्वभौम राष्ट्र राज्यों से उभय पक्षीय संबंधों की राजनीतिक राजनयिक, कूटनीतिक विवेचना में भारतीय वाङ्मय में अभिव्यक्त मतों को राजनयिकों की मातृभाषा में भी उन्हें समझने को मिले ऐसा प्रयास करने पर ही भारत की नीति जिस पर कब्ज़ा आज अंग्रेजीदां लोगों का है विश्व की मुख्य अंग्रेजी भाषाओँ के कूटनीतिक साहित्य की चिनगारियाँ भारतीय राजनयिकों के भेजे में घुसाना समय की पुकार है। भारतीय विदेश सेवा (I.F.S.) ऐसे लोग अब अँगुलियों में गिने जा सकते हैं जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी हो। ज्यादातर विदेश सेवा के लोग भारत की क्षेत्रीय मातृभाषी ही तो हैं अतएव भारतीय विदेश मंत्रालय को कूटनीतिक व राजनयिक कार्यशैली की हस्तपुस्तिका हर भारतीय भाषा में उपलब्ध करनी चाहिये विभिन्न राष्ट्रों के भारतीय दूतावासों में, भारतीय राजधानी दिल्ली प्रदेश की राजधानियों, जिला मुख्यालयों जहाँ-जहाँ उच्च राजनीतिक सत्ता संस्थान तथा नौकरशाही के अ.भा. स्तर के अधिकारी कार्यरत हैं उन सबको विचार करने का यह बढ़िया मौका संगीता रिचर्ड सेविका प्रकरण ने उपलब्ध कराया है। बंधुआ मजदूरी समाप्त करने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है यदि वे ही घरेलू भृत्य से अमानवीय व्यवहार करने लगेंगे तो विलोम स्थितियां अपने आप उत्पन्न होंगी इसलिये अपने बच्चों की देखभाल दाय(धात्री) अथवा गवर्नेंस रखने वाले राजनीतिक नौकरशाही के शिखरस्थ महानुभावों व भद्र महिला शिखरस्थ व्यक्तित्त्वों को अपने घर में अपनी नाक तले होरहे शोषण को समाप्त करना होगा। इसी आलेख में ऊधो-माधो की दास्तान देते हुए योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के इस कथन को अपने स्वजीवन में उतारना होगा कि ''भृत्य सुहृत् सखा'' एक समान है, अपने ही बराबर है। जो व्यक्ति भृत्य सुख लाभ लेना चाहता है उसे भृत्य के साथ भाईचारा रखना चाहिये। अगर महिला भृत्य है, स्वामिनी भी महिला है उसे अपनी सखी-सहेली के रूप में देखे, उसके साथ सद्व्यवहार हो। संगीता रिचर्ड का पक्ष प्रस्तुत करते हुए भारतीय मूल के अमेरिकी वकील ने जो दलीलें दीं उन्हें नकारना कूटनीति व राजनय धर्म के अनुकूल नहीं है अतः पुनर्विवेचनीय भी है।
अब आइये सूरदास की कथनी ''करमन की गति न्यारी'' पर। काव्य सुता देवयानी नाहुष ययाति की राजरानी थी। ययाति से उसे यदु, द्रुह्य व तुर्वसु तीन पुत्र हुए। राजनय की जरूरतों ने राजा वृषपर्वा को अपनी लाड़ली राजकुमारी शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बना कर गुरुपुत्री देवयानी के यौतुक दहेज़ के रूप में देना पड़ा।यहाँ फिर भृत्याधिकार वाला मानवीय पक्ष अपना रंग गया। दैत्यगुरु शुक्राचार्य से राजपुत्री शर्मिष्ठा ने पूछा - गुरुदेव, यौतुक के रूप में जब दासियाँ दहेज़ में दी जायें तो दहेज़ पाने वाला व्यक्ति उनका उपयोग कैसे करे ? क्या वे उसकी धर्मचारिणी नहीं बन सकतीं ? इस पर शुक्राचार्य ने जो मत व्यक्त किया वह चौंकाने वाला था। उन्होंने शर्मिष्ठा से कहा - राजपुत्री ! दहेज़ में दी गयी दासी दहेज़ प्राप्तकर्त्ता के लिये जीवन संगिनी सरीखी है। शर्मिष्ठा की बाछें खिलीं। उसने ययाति से पत्न्याधिकार पा लिया। ययाति से उसे जो पुत्र हुए उनमें पुरू सबसे छोटा था जो ययाति के पश्चात् भारत का शक्तिशाली नरेश बना। पुरू के राजखानदान शकुंतला-दुष्यंत, कुमार भरत, शांतनु, भीष्म, युधिष्ठिर और परीक्षित सरीखे प्रतापी भारत विश्रुत राजपुरुषों ने जन्म लिया। मनुष्य वह पुरुष हो या स्त्री एक मननशील देहवासी है। अपनी अभिव्यक्ति प्रकट कर कर्म स्वातंत्र्य का प्रचेता है। जंगम जीव जगत में मानव योनि के अलावा जो दूसरी तिर्यक, सरीसृप, स्वेदज, अंडज जीव योनियाँ हैं। उनके जीवनयापन स्त्रोत से मानव-मानवी सीख ले सकते हैं। मनुष्येतर योनियों में मर्यादाओं का चौखट है। मनुष्य मर्यादाओं लाँघ सकता है पर मर्यादाओं को लाँघ कर अमर्यादित होगया। अपनी नैतिक सीमायें पार कर अनीति व दुर्नीति के मार्ग का अनुसरण करने से जो नयी परम्परायें बनाता है, जो अतिवादी रास्ता अपनाता है, वह अतिवाद जिसे आजकल के विद्वतजन आतंक अथवा टेरर कह कर पुकारते हैं वह अपने आप उपजता है, बढ़ता है, कभी-कभी ऐसा आतंक सामाजिक स्वीकार्यता भी पालता है। वर्तमान विश्व में अनेक राष्ट्रों में जो विप्लव हो रहा है, शासक समाज की चूलें हिल रही हैं वह सब अपने हजारों वर्षों के इतिहास में भारत देश भोग चुका है इसलिये राजधर्म व दस्युधर्म के घालमेल से बचने की जरूरत है। भारत लोकतान्त्रिक राजव्यवस्था की दृष्टि से नया खिलाड़ी है इसलिये राजनीतिक व राजधर्मी क्षेत्रों में भारत अपनी पारम्परिकता के समानांतर आधुनिक विश्व की नूतन उपलब्धियों के बीच समन्वयात्मक दृष्टि से आगे बढ़ कर ही विभिन्न सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में नौका वहन विवेकपूर्वक संपन्न करना होगा। वह राजनयिक विवेक भारत को स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी सरीखे निर्वैर, अजातशत्रु व्यक्तित्त्वों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों में उपलब्ध कराया है। चूलें हिल चुकी कम्पायमान सिस्टम का कायाकल्प करना आज की राजनीतिक कूटनीतिक, राजनयिक तथा शीर्ष प्रशासन स्तर की पहली जरूरत है। राजतन्त्र में घुसे हुए दोष निवारण के लिये देश की नब्ज़ पकड़ सकने वाले नेता की भारत बाट जोह रहा है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।


म एडम्स KEVIN, Aiico बीमा plc को एक प्रतिनिधि, हामी भरोसा र एक ऋण बाहिर दिन मा व्यक्तिगत मतभेद आदर। हामी ऋण चासो दर को 2% प्रदान गर्नेछ। तपाईं यस व्यवसाय मा चासो हो भने अब आफ्नो ऋण कागजातहरू ठीक जारी हस्तांतरण ई-मेल (adams.credi@gmail.com) गरेर हामीलाई सम्पर्क। Plc.you पनि इमेल गरेर हामीलाई सम्पर्क गर्न सक्नुहुन्छ तपाईं aiico बीमा गर्न धेरै स्वागत छ भने व्यापार वा स्कूल स्थापित गर्न एक ऋण आवश्यकता हो (aiicco_insuranceplc@yahoo.com) हामी सन्तुलन स्थानान्तरण अनुरोध गर्न सक्छौं पहिलो हप्ता।
ReplyDeleteव्यक्तिगत व्यवसायका लागि ऋण चाहिन्छ? तपाईं आफ्नो इमेल संपर्क भने उपरोक्त तुरुन्तै आफ्नो ऋण स्थानान्तरण प्रक्रिया गर्न
ठीक।