Sunday, 29 January 2017

यूनिवर्सल बेसिक इन्कम ?
क्या यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को महात्मा गांधी के खादी ग्रामोद्योग से जोड़ कर ही खेतीबाड़ी के बाद हिन्द का दूसरा महत्वपूर्ण रोजगार उपलब्धक बनाया जा सकता है ? 
यदि हां तो क्यों न हिन्द के हर दूतावास में गांधी की खादी उपलब्ध करायी जाये ?
सांसद वैजयंत जय पंडा ने हिन्द की सरकारों द्वारा जनहितकारी योजनाओं के बदले हिन्द के लोगों के लिये यूनिवर्सल बेसिक इन्कम का प्रसंग उठाया। इस ब्लागर ने यूनिवर्सल बेसिक इन्कम वाले प्रसंग को हिन्द के संदर्भ में पुनर्विचारणीय इसलिये माना क्योंकि हिन्द की जनसंख्या 2011 की जनगणनानुसार 121 करोड़ से कुछ ज्यादा है। बहुत से विचारक मानते हैं कि 2016 में हिन्द की जनसंख्या 131 करोड़ होगई है। बहुत से विचारकों का यह भी कहना है कि सन 2050 में हिन्द की आबादी 2 अरब से ज्यादा भी पहुंच सकती है। वैजयंत जय पंडा का यह भी मानना था कि हिन्द केे हर तीन व्यक्तियों में एक अत्यंत गरीब है जिसे गरीबी रेखा से नीचे माना जाता है। वैजयंत जय पंडा के आंकड़ों में चलें तो हिन्द के 44 करोड़ लोग यूनिवर्सल बेसिक इन्कम के पात्रता धारक होंगे। फिनलैंड स्विट्जरलैंड जैसे देशों के अलावा विश्व में चौधराहट करने वाले देश संयुक्त राज्य अमरीका और कम्यूनिस्ट चीन में भी गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोगों की संख्या का प्रातिशत्य संयुक्त राज्य अमरीका व चीन दोनों देशों के लिये 2017 विश्व सारणी में उपलब्ध नहीं है पर दोनों देशों में गरीब और बेघर लोग तो हैं ही। वैजयंत जय पंडा महाशय मानते हैं कि हम पसंद करें या न करें यूनिवर्सल बेसिक इन्कम वाला मसला आज दुनियां के ज्यादा देशों में बहस का मुख्य बिन्दु है। डाक्टर भरत झुनझुनवाला हिन्द के आर्थिक चिंतक हैं उनका मानना है कि जलकल्याण संबंधी अधकचरी योजनाओं को हिन्द में तुरंत बंद किया जाना चाहिये। अगर सरकार यह हिम्मत कर सकती है तो डाक्टर भरत झुनझुनवाला की राय में यूनिवर्सल बेसिक इन्कम हिन्द के 44 करोड़ गरीबी की मार सहने वाले लोगों को गर्दन उठा कर आत्म सम्मान से जीने का रास्ता सुनिश्चित किया जा सकता है। अभी गरीबी निवारण की जितनी भी योजनायें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महात्मा गांधी के नाम पर मनरेगा सरीखी योजनायें चल रही हैं उसमें 2015-16 के वित्तीय वर्ष में शिक्षा पेटे 81 हजार करोड़, स्वास्थ्य पेटे 24 परिवार कल्याण, 13 आवास, 23 शहरी विकास, 14 ग्राम्य विकास, 119 फर्टिलाइजर सब्सिडी, 73 सार्वजनिक वितरण, 115 हजार करोड़ रूपये इन सबका जोड़ 452 हजार करोड़ रूपये बताया गया। मंहगाई जोड़ें तो यह सब मिला कर वित्त वर्ष 2016-17 में डा. झुनझुनवाला की राय के मुताबिक 530 हजार करोड़ रूपये होगा। उनकी सोच है कि मुल्क के 10 करोड़ परिवारों को माहवारी 4000 रूपये तथा सालाना 48 हजार रूपये यूनिवर्सल बेसिक इन्कम पेटे उपलब्ध कराई जाये तो उनकी सोच है कि हर परिवार को माहवारी दो हजार रूपये सालाना चौबीस हजार रूपये यूनिवर्सल बेसिक इन्कम पेटे बिना किसी लाग लपेट के उपलब्ध कराया जा सकता है। यह रकम प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच व्यक्तियों के परिवार मानते हुए प्रति व्यक्ति प्रति माह चार सौ रूपये हो सकती है। देश के संपन्न खाते पीते लोग जो माहवारी प्रति परिवार एक लाख से ज्यादा है याने प्रति व्यक्ति प्रति माह आय बीस हजार रूपये से ज्यादा है वे अपनी यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की राशि आसेतु हिमाचल निराश्रित वृद्ध अपंग और अपना भोजन स्वयं बनाने की स्थिति में न रहे वृद्ध एकल या दम्पत्ति को निश्शुल्क भोजन मुहैया करने के लिये गुरूद्वारों के लंगरों इस्लाम धर्मावलंबियों के द्वारा मस्जिदों के जरिये यतीमखानों आर्यसमाज रामकृष्ण मिशन देश के सार्वजनिक देवालयों शिवालयों तथा बौद्ध धर्मावलंबी व जैन धर्मावलंबी समाज द्वारा संचालित सदावर्त एवं भारत के विभिन्न क्षेत्रों के सन्यासियों के अखाड़े विभिन्न उद्योग घरानों के द्वारा संचालित ट्रस्टों से परामर्श कर उनकी सामर्थ्य तथा परोपकार वृत्ति कर इच्छाशक्ति का सदुपयोग करने की जरूरत है। विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संगठनों में से जो संगठन देश में भूख निवारण कार्यक्रम से जुड़ना चाहते हैं एक संगठन ज्यादा से ज्यादा एक सौ लोगों की भूख मिटाने का संकल्प ले। सभी अ.भा. तथा राज्य स्तरीय राजनीतिक दल मुल्क में किसी भी व्यक्ति के भूखे न रहने के कार्यक्रम से जुड़ना चाहते हों तो उनका भी सहयोग लिया जाये। देश के विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों राज्य मंत्रिमंडलों के द्वारा भूख प्यास निवारण कार्यक्रम के लिये संकल्प लिया जाकर अखिल भारतीय भूख निवारण अंबुद समान संगठन गांव, मुहल्ला, नगर स्तर से शुरू होकर भूख निवारण निधि का सृजन संकल्पित किया जाये। जो लोग या परिवार यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की राशि भूख निवारण निधि के लिये उपलब्ध करना चाहें उन्हें प्रदत्त निधि पर आयकर की छूट दी जानी चाहिये। इसके अलावा जो ट्रस्ट और सामाजिक संगठन माइक्रो क्राफ्ट्स के लिये मदद देना चाहें उन्हें भी आयकर में छूट मिले। डाक्टर झुनझुनवाला ने महात्मा गांधी ने तत्कालीन अछूत कहे जाने वाले लोगों जिन्हें आज हमारा चिंतन पोखर दलित कहता है उनके लिये अलग मताधिकार अपनाया गया तो दलित हमेशा दबा ही रहेगा। महात्मा गांधी ने यह भी कहा कि बिना परिश्रम किये पगार या दक्षिणा मत लो। हिन्दुस्तान की रोजगार जरूरत का सही सही अमल महात्मा गांधी ने एक सौ वर्ष पूर्व कर लिया था। यूनिवर्सल बेसिक इन्कम का उज्वल पक्ष सीना तान कर खड़े होकर आत्मसम्मान पूर्वक जीना है पर आज के हिन्दुस्तान के संदर्भ में शराबखोरी ने जो विकृतियां पैदा की हैं वह मुफ्तखोरी से बढ़ जायेंगी इसलिये डाक्टर झुनझुनवाला व वैजयंत जय पंडा सरीखे विचारकों को मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने का रास्ता चौड़ा करने के बजाय महात्मा गांधी के हाथ से काम करने के तरीके से आमदनी बढ़ाने की सोच होनी चाहिये। अपने अग्रलेख का शीर्षक देते हुए डाक्टर झुनझुनवाला ‘निश्चित आमदनी का सही समय’ घोषित कर रहे हैं। ये सभी विचारक जो यूनिवर्सल बेसिक इन्कम के सिद्धांत की बात कर रहे हैं यूरप के विकसित देशों के मानक हिन्द के निश्चित आमदनी प्रसंग में एक बहुत बड़ा फर्क जीवन शैली का है। सीमित जनसंख्या तथा अप्रबंधनीय जनसंख्या की बाढ़ में बहुत बड़ा फर्क है। हिन्दुस्तान के इस सवाल कि हर हाथ को काम दो और रोजगार उपलब्ध करा कर सातवें वेतन आयोग ने जो न्यूनतम वेतन और जुड़े हुए भत्ते की संस्तुतियां स्वीकार कर पहली जनवरी 2016 से केन्द्रीय कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग संस्तुत उपलब्धियां देना शुरू भी कर दिया है। सरकार का अहलकार कम से कम अठारह हजार माहवारी वेतन अन्य भत्तों व महंगाई राहत सहित सबसे निचले स्तर का कार्मिक माहवारी तीस हजार रूपये अपने बटुए में रखेगा। मियां बीबी दो बच्चों वाली परिवार संख्या को मान कर चलें तो सरकारी अहलकार के परिवार को यदि पति पत्नी में से केवल एक सरकारी नौकर है तो प्रति व्यक्ति आमदनी साढ़े सात हजार होगी अगर दैवयोग से पति पत्नी दोनों सरकारी नौकर हों तो प्रति व्यक्ति आमदनी पंद्रह हजार से कम नहीं होगी। सरकार से जुड़ा हर व्यक्ति आमदनी पंद्रह हजार से कम नहीं होगी। सरकार से जुड़ा हर व्यक्ति शास्ता है। यह है न्यूनतम वेतन स्तर की अधिकतम वेतन सरकार में शीर्षस्थ अधिकारी को माहवारी अढ़ाई लाख विविध भत्तों सहित वह रकम तीन लाख रूपये माहवारी से ज्यादा होगी। यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की राशि भी अलग अलग देशों में अलग अलग होगी। परंपरावादी हिन्दुस्तान में एक शब्द निष्क्रय, दूसरा शब्द दक्षिणा, तीसरा गुरूद्वारे के लंगर में पेट भर कर दालरोटी मिलना तथा इस्लाम धर्मावलंबियों में जकात क्रिश्चियनिटी में मिशनरी भावना रूग्ण की सेवा दवादारू है। यूरप के समृद्धतम देशों में फिनलैंड और स्विट्जरलैंड की विशेष स्थितियां हैं। ये दोनों यूरोपीय राष्ट्र राज्य फिनलैंड का क्षेत्रफल 338424 वर्ग किलोमीटर आबादी लगभग सवा पचपन लाख भाषायें फिनिश व स्वीडिश स्विट्जरलैंड क्षेत्रफल 17324 वर्ग किलोमीटर आबादी अस्सी लाख से ज्यादा स्विट्जरलैंड की आर्थिक जीवन शैली के मुताबिक सालाना प्रति व्यक्ति आय 44864 डालर आबादी के 7.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रहे हैं। ज्ञातव्य है कि फिनलैंड व स्विट्जरलैंड गरीबी मानदण्ड भारतीय मानदण्ड से पृथक है। फिनलैंड की प्रति व्यक्ति सालाना आय 35791 डालर है फिनलैंड की 62 प्रतिशत बसासत शहरी ये राष्ट्र राज्य यूनिवर्सल बेसिक इन्कम का प्रावधान अपने नागरिक समाज की मौलिक जरूरतों के अनुसार संपन्न कर सकते हैं। जहां आबादी ज्यादा है रोजगर के स्त्रोत सूख रहे हैं हिन्दुस्तान उन देशों में से एक है जहां हर तीसरा आदमी गरीबी झेल रहा है। महात्मा गांधी ने हिन्द के रोजगार के बारे में जो विचार अपने 55वें जन्मदिन हिन्दुस्तानी तौर तरीकों के अनुसार महात्मा गांधी अपना जन्म दिन आश्विन बदी द्वादशी (कनागतों के द्वादशी श्राद्ध) को मनाया करते थे। सन 1924 में जनवरी महीने में उन्होंने बेलगाम कांग्रेस का सभापतित्व संपन्न किया। 24.9.1924 के दिन पटना में कदमकुआं में चर्खा संघ जिसे अंग्रेजी में आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसियेशन कहा जाता है उसे शुरू किया। उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि चर्खा पर सूत कताई के हाथ करघे पर कपड़े की बुनाई का काम ही खेती के बाद दूसरा बड़ा रोजगार मुहैया करने वाला काम है। जो बात महात्मा ने तब कही जब हिन्द की आबादी तीस करोड़ के करीब थी। आज हिन्द की आबादी एक अरब तीस करोड़ है। चर्खे व हथ करघे वाला रोजगार नुस्खा जिसे महात्मा ने अफरीका से भारत आने पर अपनी पहली उद्यमिता का प्रदाता बताया वह आज भी उतना ही महत्व रखता है जितना महात्मा गांधी के भारत आगमन पर। 1915-1924 के बीच उन्होंने ऊर्ध्वबाहु होकर हिन्दुस्तानियों को ललकारा था। इसलिये चर्खे पर सूत ऊनी रेशम कताई व हथकरघे पर बुनाई उद्यमिता के जरिये रोजगार मुहैया करना आज की राष्ट्रीय जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी मेक इन इंडिया अभियान के जरिये हर हाथ को काम दिये जाने का जो शिव संकल्प लिये हैं, दिल्ली में हिन्द के प्रधानमंत्रित्व का उत्तरदायित्त्व संभालने से पूर्व जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा बंबई प्रेसीडेंसी में प्रीमियर वी.जी. खेर के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहे वैकुंठ ल. मेहता ने हिन्दुस्तान के गांवों को Rurban Society अवधारणा के तहत हिन्द के गांवों को उद्यमिता का राही बनाने का शिव संकल्प लिया था। सघन क्षेत्र योजना के जरिये उनका रूर्बन सोसाइटी संकल्प और अभियान 1954 से 1963 तक पूरे वेग से चलता रहा। उन्होंने हिन्द के गांवों को इजरायली विकास शैली से भी जोड़ा। उन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री का पूरा विश्वास था। खादी और ग्रामोद्योग के जरिये वे हिन्द के गांवों और शहरों की तस्वीर एक कर्मठ राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने के लिये अहर्निश कार्यरत रहे। गांवों को उनका राष्ट्रीय हक दिलाने में रूचि रखने वाले दूसरे चिंतन पोखर के चमकीले नक्षत्र हिन्द के ग्यारहवें राष्ट्रपति मिसाइल मैन ने वैकुंठ ल. मेहता के चिंतन के Rurban Society के गुरूमंत्र को PURA - Providing Urban Amenities to Rural Area शहरों में उपलब्ध सुविधायें गांवों को भी मुहैया की जायें। भारत की सोलहवीं षोडषी लोकसभा के यशस्वी नेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने रूर्बनाइजेशन कार्यक्रम का श्रीगणेश 2011 में शुरू किया। गुजरात के पचास गांवों को रूर्बनाइजेशन के जरिये जो शहरी सुविधायें शहर वासियों को उपलब्ध हैं गांवों के ग्रामीण आधार को बरकरार रखते हुए पचास गांवों से उन्होंने जो योजना चलाई सन 2014 में लोकसभा निर्वाचन के पश्चात भारत के प्रधानमंत्री का दायित्व वहन करने वाले नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के गुजरात राज्य के उत्तराधिकार प्राप्त मुख्यमंत्री श्रीमती आनंदी बेन पटेल और गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री महाशय विजय रूपाणी रूर्बनाइजेशन कार्यक्रम के प्रति वह तत्परता रखी या नहीं जिसे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने एक विशेष मुहिम के तौर पर शुरू किया था। 
वैकुंठ ल. मेहता रूर्बन सोसाइटी चिंतन मिसाइल मैन ग्यारहवें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का PURA संकल्प तथा वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के रूर्बनाइजेशन कार्यक्रम को उनके द्वारा नियुक्त केवीआइसी चेअरमैन महाशय विजय कुमार सक्सेना ने अगर अपनाया होता तो उन्हें महात्मा गांधी के चर्खे के विशालकाय नमूने को इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निकासी द्वार पर स्थापित करने कनाट प्लेस में विशालकाय चर्खा को इस्पाती तौर तरीके से दिखाने और चर्खों कर्घों को राष्ट्रीय विरासत के रूप में म्यूजियमों में टांगने के बजाय उस रास्ते को अपनाना चाहिये था जो विकेन्द्रित अर्थांग के पारंगत सहकारिता मुहिम के अग्रणी वैकुंठ ल. मेहता ने 1954 से 1963 मार्च तक लगातार अहर्निश सेवामहे के रास्ते पर चलाया था। शायद उन्हें अपनी प्राथमिकताओं को तय करने की फुर्सत नहीं मिली। निरंतर रसातल को जारहे खादी ग्रामोद्योग आयोग की सालाना डायरी और कैलेंडर में चर्खा कातते हुए महात्मा गांधी के बजाय प्रधानमंत्री को खुश करने के लिये बिना प्रधानमंत्री की इजाजत के बिना एमएसएमई मंत्रालय की इजाजत केे चर्खा कातते प्रधानमंत्री का चित्र छाप डाला और प्रधानमंत्री के विरोधियों को एक नया औजार दे दिया। वास्तविकता तो यह थी कि खादी ग्रामोद्योग आयोग का विघटन लुप्ति क्रिया यू.पी.ए. 1 कार्यकाल में तत्कालीन केबिनेट मिनिस्टर महावीर प्रसाद खादी आयोग के अध्यक्ष महेश शर्मा की बर्खास्तगी कर 14 अक्टूबर 2004 को ही शुरू कर चुके थे। 2006 में यूपीए सरकार ने कुमुद बेन जोशी के नेतृत्व में खादी ग्रामोद्योग आयोग का पुनर्गठन किया पर खादी आयोग की वह छवि जो गांवों के औद्योगीकरण के लिये अक्टूबर 1956 में जयपुर में पंडित नेहरू ने वैकुंठ ल. मेहता की आयोग सदारती से शुरू किया था वह शनैः शनैः क्षीण होती गई। संभवतः प्रधानमंत्री महोदय ने विनय कुमार सक्सेना को खादी आयोग की अध्यक्षता का उत्तरदायित्त्व सौंप कर उसे फिर से जागरूक अखिल भारतीय संगठन के तौर पर स्थापित करना था पर एमएसएमई एक्ट 2006 ने खादी ग्रामोद्योग आयोग की स्वायत्तता तथा निर्णय ग्रामीण औद्योगीकरण के पक्ष में लेने की जो परंपरा वैकुंठ ल. मेहता ने शुरू की थी तथा जिसका क्षरण वैकुंठ भाई के उत्तराधिकारी उछंगराय नवलकिशोर ढेबर के नौवर्षीय अध्यक्षता अवधि में में ही शुरू हो चुका था उसे पूरी तरह मटियामेट होने में पचास वर्ष से ज्यादा समय लग गया। गांधी की खादी को जिन्दा रख कर ही हिन्द की रोजगार समस्या का हल निकल सकता है। इसलिये यूनिवर्सल बेसिक इन्कम विचार पुष्करिणी जिसका उग्र समर्थन डाक्टर झुनझुनवाला कर रहे हैं उसे तत्काल लागू करने का सुझाव देरहे हैं अध्यकचरी जनहितकारी योजनाओं से जो राष्ट्रीय अहित भ्रष्टाचार के दिन दूना रात चौगुना दर से बढ़ते हुए होरहा है उसके निराकरण के तौर तरीके प्रयुक्त होने ही चाहिये। नीति आयोग के माध्यम से प्रधानमंत्री यूनिवर्सल बेसिक इन्कम संबंधित मुख्यमंत्रियों राजनीतिक दलों के सुप्रीमों-क्षत्रपों ग्रामीण और शहरी इलाकों में व्याप्त भीषण गरीबी से निजात पाने के लिये रास्ता अख्तियार किया ही जाना चाहिये। सवाल इतना ही है कि हिन्द के संदर्भ में न्यूनतम यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की राशि प्रति परिवार कितनी हो ? झुनझुनवाला उसे रूपया दो हजार महीना सालाना चौबीस हजार रूपये इंगित कर रहे हैं। क्या पांच सदस्यीय परिवार की संकल्पना करते हुए बच्चों की पढ़ाई लिखाई खर्च सहित यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की यह निष्क्रय राशि कारगर होगी अथवा इस राशि के अलावा कटीर उद्यमिता सहित हाथों को काम देने वाला महात्मा गांधी का चर्खे में सूत ऊन रेशम कातो, हथकरघे पर बुनो इस उद्यमिता हिन्द की कपड़ा उद्यमिता मंत्रालय का आंशिक अथवा पूर्ण कालिक रोजगार को सामाजिक प्रतिष्ठा दी जाये। वैकुंठ ल. मेहता की रूर्बन सोसाइटी संकल्पना ग्यारहवें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की च्न्त्। अवधारणा तथा वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूर्बनाइजेशन संकल्पना को केवीआईसी के मार्फत पुनः वेगवान बनाया जा सकता है ?
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