विलायती अखबार गार्जियन के मुताबिक भारत से बर्तानी राज की असल विदाई 15 अगस्त 1947 को नहीं वास्तविक विदाई नरेन्द्र मोदी के नेतृत्त्व ने 16.5.2014 को संपन्न करायी। भारतीय जनता पार्टी ने संसदीय दल के नेता के रूप में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का वरण किया। चुनाव अभियान के दौरान नरेन्द्र मोदी ने मतदाताओं से वाक्य दान लिया कि सोलहवीं लोकसभा को कांग्रेस मुक्त भारतीय संसद बनाना है। संसदीय दल के नेता चुने जाने के पश्चात नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने प्रखर प्रांजल हिन्दी में जो अविराम धाराप्रवाह संबोधन किया उसने धाराप्रवाह भाषण करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्त्वता शैली से अपने श्रोताओें को मंत्रमुग्ध करने वाली ऊर्जा ताजा होगयी। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी हृदय प्रदेश की उपज थे परन्तु श्यामा प्रसाद मुखर्जी बांग्ला भाषी होते हुए भी हिन्दी में धाराप्रवाह भाषण कला के धनी थे। अपने मुंबई प्रवास में इस ब्लागर की बाला साहब ठाकरे की मराठी वक्तृत्त्वता सुनने को मिलती रही। वह भी श्रोता को मंत्रमुग्ध करती थी। प्रांजल वक्ता ही वह है जिसकी विद्या कंठाग्र हो। इस ब्लागर ने उपरोक्त वक्ताओं को एकाधिक बार सुना है।
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| Dr. Rammanohar Lohiya |
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| Freedom Fighter Tara Datt Pant |
4. भारतीय राष्ट्रीय-वैविध्यता भिन्न-भिन्न अनेक समर्थ भाषाओं का अस्तित्त्व। नरेन्द्र मोदी के अंबुद समान राष्ट्रीय नेतृत्त्व ने भारत के जन-जन की आकांक्षा तथा अपेक्षायें बढ़ा दी हैं। इसलिये पहली जरूरत भारत में भाषायी स्वराज कायम करने की है। अहम राष्ट्रीय सवाल यह है कि जब राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हैं अपनी मातृभाषा में संबोधित करें। लोकसभा, राज्यसभा सदस्य अपनी अपनी मातृभाषा में बोल कर अपने मन की बात सदन में रखें। संसद के प्रत्येक सदस्य को उसकी मातृभाषा में या चाहत की भाषा में भाषण सुनने का अवसर मिले। स्वातंत्र्योत्तर पिछले साढ़े छह दशकों में दफ्तरों में कार्मिक कार्य का समन्वयात्मक विश्लेषण नहीं हो पाया है। तकनालाजी के संवर्धने दफ्तरी कार्य सरल भी होगया है। इसलिये जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों व विभागाध्यक्षों के कार्यालयों में जो मानव श्रम शक्ति उपलब्ध है। कार्मिक कार्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाये।
5. तमिलनाडु हिन्दी विरोधी अभियान के पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री ने हिन्दीतर भाषा भाषियों को आश्वासन दिया था कि उन पर हिन्दी नहीं थोपी जायेगी। भारत राज्यों का संघ है इसलिये भारतीय राष्ट्र राज्य की प्रकृति संघात्मक या फेडरल है। देश के जम्मू कश्मीर, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्णाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश (तेलंगाना व सीमांध्र), ओडिशा, पश्चिम बंग, असम, सिक्किम, मणिपुर तथा त्रिपुरा, गोवा के अलावा मेघालय, मिजोरम, नगालैंड व अरूणाचल प्रदेश संघशासित क्षेत्रों में पुडुचेरी, दमन, दिऊ, लक्षद्वीप, अण्डमान निकोबार के साथ केन्द्र सरकार का पत्र व्यवहार उनकी राज्य की भाषा में होना चाहिये। याने जम्मू कश्मीर से पत्र व्यवहार उर्दू या कश्मीरी में, पंजाब से पंजाबी में, गुजरात से गुजराती में, महाराष्ट्र से मराठी में, कर्णाटक से कन्नड़ में, केरल से मलयाली में, तमिलनाडु से तमिल, सीमान्ध्र व तेलंगाना से तेलुगु में, ओडिशा से उड़िया में, गोआ से कोंकणी में, पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा से बांग्ला में, मणिपुर से मणिपुरी में, सिक्किम से नेपाली में, असम से असमी में, नगालैन्ड से अंग्रेजी में पत्रों का आदान प्रदान हो। देश के दस हिन्दी भाषी राज्यों के साथ केन्द्र का पत्र व्यवहार हिन्दी में हो। हिन्दीतर भाषी राज्यों से पत्र व्यवहार उन्हीं की राजभाषा में हो तो देश का भाषायी स्वरूप आत्मसम्मान वाला होगा। मंत्रालयों, विभागाध्यक्ष कार्यालयों सहित भारत भर में केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में उपलब्ध मानव श्रम शक्ति (Human Resources) के पास क्या क्या उत्तरदायित्त्व हैं, हर व्यक्ति को दैनिक कार्यों में क्या क्या करना जरूरी है, वह कितना कर रहा है, संदर्भों की आवक जावक क्या है ? उपलब्ध मानव श्रम शक्ति की क्षमता का मानक सार निर्धारित करना भी तात्कालिक राष्ट्रीय आवश्यकता महसूस होती है। द्वितीय योजना अवधि 56-61 के दर्मियान केन्द्रीय सरकार में IMRUP के जरिये किया गया था। प्रत्येक डेस्क पर कार्य भार तथा दस्तावेजी आवश्यक व दूरगामी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दस्तावेजीकरण (Documentation) पद्धतियां निर्धारण, कार्मिक के अनुभवों को उसकी अपनी भाषा में प्रस्तुतीकरण सहित नये भारत को निर्मित करने के लिये केन्द्रीय सरकार के प्रत्येक कार्यालय, मंत्रालयों सहित यहां तक कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल के माननीय सदस्यों के स्टाफ सहित प्रत्येक कार्मिक को कैसे तैयार किया जाये, उपलब्ध मानव श्रम शक्ति को गतिशील बनाने के लिये Official work load engineering Commission गठित कर आयोग से छह माह के अंदर अपनी संस्तुति प्रस्तुत करने का आग्रह किया जाना चाहिये। जरूरत से अतिरिक्त स्टाफ का उपयोग भारतीय भाषा संस्थान के क्षेत्रीय भाषायें भाषा विज्ञानी संस्थानों को सवंर्धित करने में संयोजित किया जाये ताकि केन्द्रीय सरकार के क,ख,ग तीनों संवर्गों के स्टाफ को अपनी मातृभाषा के अलावा एक क्षेत्रीय भाषा का आधिकारिक ज्ञान हो।
6. मातृभाषा या चाहत भाषा के आधिकारिक ज्ञान के अलावा जो कार्मिक दो या तीन भाषाओं में पारंगति प्राप्त हैं, उनमें स्वाभाविक लेखन अथवा वक्तव्य देने की क्षमता प्राप्त हैं। उनकी योग्यता के परीक्षण के पश्चात उन्हें द्विभाषी या त्रिभाषी पात्रता धारक होने के उपलक्ष्य में भारत सरकार प्रोत्साहन के तौर पर कम से कम तीन बढ़ोत्तरी (Increment) देकर भारत के भाषायी प्रबंधन को संयोजित करने का उपाय करें साथ ही जो कार्मिक 40 वर्ष से कम उम्र का है उसे एकाधिक भाषा में कार्य करने की दक्षता हासिल करने हेतु प्रोत्साहन दिया जाये। बहुभाषी संसद तथा एकाधिक भाषी विधान मंडलों के अलावा भारत सरकार को प्रेषित पत्र संबंधित राज्य की राजभाषा में भेजे जायें और केन्द्रीय मंत्रालय उन पत्रों का उत्तर संबंधित राज्य की भाषा में देने के रास्ते को अग्रसर हो ऐसा वातावरण देश में बनेगा तो दो लाभ तुरंत होंगे। 1. भाषायी संशयग्रस्तता तथा विभिन्न भाषायें बोलना तथा विभिन्न भाषाओं के पत्रों का जवाब उसी भाषा में देने से भाषायी स्वराज कायम होगा। 2. आज भारत में भाषायी स्थिति लगभग वही है जो पांच सौ वर्ष पहले तुलसीदास ने काशी में झेली थी। हिन्दुस्तानी भाषाओं बोलने व लिखने वालों में हीन ग्रंथि दोष उभर गया है। अंग्रेजीदां हिन्दुस्तानी - अंग्रेजी न जानने वाले, अंग्रेजी कम जानने वाले हिन्दुस्तानी को ऐसा व्यवहार करता है जैसा घरेलू नौकर से भी नहीं किया जाता है। इसलिये अंग्रेजी न जानने वाले भारतीयों के आत्मसम्मान को राष्ट्र हित में प्रयोग करने की तात्कालिक जरूरत है।
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