Wednesday, 10 September 2014

जंगलाती-इंतजामात 
उत्तराखण्डी भूमि-प्रबंधन बंदोबस्त की दुखती रग

   
  उत्तराखंडी सरकार संभवतः 14.1.2021 के दिन कुली उतार अभियान की शताब्दी मनाना पसन्द करे। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नये बंदोबस्त का एलान किया है। अस्सीसाला बंदोबस्त में यद्यपि कुमांऊँ के द्वितीय आयुक्त पर इंतजामात के नजरिये से महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करने वाले मिस्टर ट्रेल (1816-1830) कुमांऊँ के कमिश्नर थे। उन्होंने कुमांऊँ की भूमि स्वामित्त्व बाबत लिखा “East India Company had souverin rights over lands in Kumaon” इसके बावजूद मिस्टर ट्रेल ने सन 1823 का बंदोबस्त कराया। यही बंदोबस्त - अस्सीसाला बंदोबस्त कहलाता है। इतिहासकार कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे के अनुसार यह अस्सीसाला बंदोबस्त आदर्श व न्यायोचित बंदोबस्त है जिसमें हर गांव की चौहद्दी तय हुई तथा गांव के लोगों के गौचर पनघट के हक हकूक तय हुए। Indian forest act 1927 आजादी के पश्चात का संशोधित भारतीय वन अधिनियम 1980 एवं वर्ष 2006 में संशोधित व लागू वन अधिनियम 2006 के अनुसार वनों से घिरे गांवों के निवासी व्यक्तियों को जंगलात की भूमि में भू उपयोग की जो सुविधा उपलब्ध हुई उत्तराखंड के संदर्भ में जब 1980 में वन अधिनियम में संशोधन हुए। तत्कालीन उत्तर प्रदे सरकार कुमांऊँ व गढ़वाल के गांवों में रहने वाली जनता की आवश्यकतायें केन्द्र सरकार को प्रस्तुत नहीं कर पाये। इस संबंध में अत्यंत मननीय व विचार योग्य बिन्दु कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे व उनके सहयोगी चिरंजी लाल साह तथा हरगोविन्द पंत ने स्वाधीनता आन्दोलन में कुली बरदायश के खिलाफ जबर्दस्त मुहिम चलायी थी। जब महात्मा गांधी कोलकाता से चंपारण की तरफ ‘नील हे’ प्रकरण को स्वयं देखने जारहे थे, इलाहाबाद में रह रहे तत्कालीन अखबार नवीस बदरी दत्त पांडे ने महात्मा गांधी जी से कोलकाता में मुलाकात की और उन्हें कुली बरदायश की ज्यादतियों से अवगत कराया। महात्मा गांधी से प्रार्थना भी की कि वे अल्मोड़ा आयें और स्वयं अन्याय देखें। बदरी दत्त पांडे को महात्मा ने अल्मोड़ा आने का आश्वासन दिया। नागपुर कांग्रेस अधिवेशन से पूर्व 1920 में बदरी दत्त पांडे फिर महात्मा से मिले। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में लिखा - कुली बरदायश उतार की जो मुहिम कुमांऊँ में चल रही है वह उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना अमरीका में अब्राहम लिंकन की दास प्रथा को समाप्त करने का अभियान। महात्मा ने कुली उतार आन्दोलन को कुमांऊँ के लोगों द्वारा बर्तानी सरकार का अहिंसक प्रतिकार बताया। महात्मा ने अल्मोड़ा से गये 51 नौजवानों का उत्साह बढ़ाया और कहा - ज्योंही मौका मिलेगा कुमांऊँ आऊँगा। पंडित नेहरू ने 1929 में महात्मा गांधी का कुमांऊँ प्रवास तय किया। 
  मिस्टर ट्रेल के अस्सीसाला बन्दोबस्त में गांवों की हदबन्दी, चौहद्दी तथा हिस्सेदारों की जमीन की नापजोख नाली मुट्ठी में करने के अलावा जमीन को अव्वल दोयम व इजरान तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया गया था। गांव की बेपड़त व बेनाप जमीन पर सार्वभौम सत्ता का आधिपत्य था पर नयावाद कानून के अंतर्गत जिलाधिकारी नयावाद आवंटन सक्षम अधिकारी सुनिश्चित थे। बदरी दत्त पांडे ने गौचर पनघट के हक हकूक गांव के बासिन्दों को मिले एतदर्थ एक नया अभियान पंचायती जंगल  के बारे में चलाया। पहला पंचायती जंगल द्वाराहाट क्षेत्र के बड़ेत नामक गांव में जनवरी 1930 में सृजित हुआ। पंचायती जंगल कल्पना ही गांव के लोगों को राहत देने वाली थी। कुमांऊँ पंचायती जंगल नियमावली 1931 तथा कालांतर में उ.प्र. सरकार तथा 8.11.2000 के पश्चात उत्तराखंड सरकार की पंचायती जंगल व्यवस्था की तात्कालिक परीक्षण की जरूरत है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के पंचायती जंगल अभियान गांव के लोगों के हितार्थ चलाया था। यह प्रबंधन जंगलात के अन्दर नहीं जिलाधिकारी के मातहत था। इस पूरे प्रकरण तथा राज्य के 11 जिलों में बारह हजार से ज्यादा वन पंचायतों की भूमि व्यवस्था पर भी पुनर्विचार किया जाना तात्कालिक महत्त्व का विषय है। संप्रति उत्तराखंड में देहरादून जिले की 215 वन पंचायतों सहित कुल वन पंचायतें बारह हजार से अधिक हैं। वन पंचायतों की अधिकता पौढ़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी व चमोली में है। रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, चंपावत व नैनीताल में वन पंचायत संख्या 1000 के अन्दर है। इन वन पंचायतों के सरपंचों, महिला पंचों, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के सभी पंचों से मुख्यमंत्री जी को सीधा संवाद कायम करने के लिये कुमांऊँ में ताड़ीखेत या शीतलाखेत, पौढ़ी गढ़वाल में रूद्रप्रयाग या चमोली के वन पंचायतों का सम्मेलन गैरसैंण में आहूत करना चाहिये। देहरादून, टेहरी व उत्तरकाशी के वन पंचायतों का सम्मेलन फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में देहरादून में वन विभाग के संबंधित संस्थानों व अधिकारियों सहित आहूत किया जाये। वन पंचायतों व उत्तराखंड वन विभाग, उत्तराखंड वन विकास निगम का पक्ष मुख्यमंत्री जी सुनें। जिस High Power Uttarakhand Land Settlement and Land Development Enquiry Commission की बात पहले ब्लॉग में भेजी गयी है जंगलात, वन पंचायत, सिविल फारेस्ट तथा जंगलात से घिरे गांव के लोगों को जंगलात भूमि का उपयोग अधिकार प्रसंग और वन अधिनियमों में कुमांऊँ व गढ़वाल के जंगलों से घिरे गांवों की स्थिति का विश्लेषणात्मक अध्ययन व संस्तुतियां भी उच्चसत्ताक आयोग सरकार को प्रस्तुत करे।
  कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे ने जंगलों में गोचर पनघट के हक हकूक के जो सवाल उठाये मिस्टर ट्रेल द्वारा अस्सीसाला बंदोबस्त की हदबंदी व हदबंदी से बाहर भी जंगलों से गौचर (गाय भैसों के लिये चरागाह) तथा गांव के लोगों के लिये पानी प्रबंध का जो मुद्दा बंदोबस्त का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था मिस्टर ट्रेल के पश्चात जितने भी कमिश्नर बर्तानी सरकार ने कुमांऊँ के लिये तैनात किये उनमें सर हेनरी रामजे - 1804 - 1856 अठाईस वर्ष  कुमांऊँ के कमिश्नर रहे। मिस्टर ट्रेल कुमांऊँ के दूसरे कमिश्नर थे जो सिगौली की बर्तानिया नैपाल संधि के तुरंत पश्चात कुमांऊँ के कमिश्नर तैनात हुए और 14 वर्ष उस पद पर बने रहे। बर्तानी सरकार की जंगलात नीति का मूल स्वरूप जानने के लिये कुमांऊँ के भूतपूर्व कमिश्नर मिस्टर स्टाइफ जो 1924 से 1931 तक कुमांऊँ के बर्तानी शासक रहे। उनके शासन काल में ही Indian forest act 1927 लागू हुआ। मिस्टर स्टाइफ 1907 में जब वे जंगलात बंदोबस्त अफसर थे तब अपनी रपट में लिखा ‘‘ कुमांऊँ का जंगलात बंदोबस्त कुमांऊँ के जंगलों के उत्पादन रक्षा व किसी योग्य एजेंसी द्वारा क्रय विक्रय (Exploitation) करने के निमित्त है’’। 1927, 1980 तथा 2006 में भारतीय वन अधिनियम में जो संशोधन व परिवर्तन हुए विशेष तौर पर 2006 का जंगलों से घिरे गांवों के लोगों को जो सुविधायें 2006 के संशोधित अधिनियम के अनुसार आदिवासियों व जंगलों से घिरे गांववासियों को मुहैया की जानी थी। भारत संघ के ज्यादातर घटक राज्य जहां जंगल ज्यादा हैं गांव जंगलों के बीच में हैं जंगलों से घिरे गांव वालों को 2006 के वन अधिनियम संशोधन अधिनियम के अनुसार उत्तराखंड के अलावा ज्यादातर राज्यों ने केन्द्रीय अधिनियम के अनुपालन में कार्यवाही की है। उत्तराखंड के तीसरे मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी जी के संज्ञान में यह ब्लागर स्वयं इस प्रसंग को लेकर पहुंचा। तीन बार उ.प्र. के मुख्यमंत्री रहे तथा पूरी पांच वर्ष की अवधि तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री 2002-2007 ने मौखिक वादा तो किया वे मामले को देखेंगे पर उत्तराखंड की जबर्दस्त जंगलात लाबी ने केन्द्रीय वन अधिनियम संशोधन 2006 टालमटोल का ही रास्ता अपनाये रखा। तत्कालीन मुख्यमंत्री जी के संज्ञान में जो स्वतंत्रता सेनानी भी रहे हैं कुमांऊँनी जंगलात नीति (कुमांऊँ के इतिहास पृष्ठ 466 से 473 तक उनके संज्ञान में लायी गयी, उनकी रूचि केवल नैनीताल की तराई और अपने समधी ब्रह्मदत्त शर्मा के राजनीतिक क्षेत्र दून घाटी तक सीमित थी। कुमांऊँ व गढ़वाल का पूर्णतः पर्वतीय क्षेत्र उनके लिये गौण था। मौजूदा मुख्यमंत्री उत्तराखंड का जमीन बंदोबस्त करने के लिये लोगों से राय मांग रहे हैं। उत्साह की बात है पर उनकी सरकार कह रही है ‘‘तीन पीढ़ी से जंगल में हैं तो कागजी दस्तावेजी सबूत रखते हुए दावा करें, ऐसे दावा आवेदन पत्र जिला समाज कल्याण अधिकारी को प्रस्तुत करने होंगे। मामला भारतीय वन अधिनियम 2006 के प्रावधानानुसार वनों से घिरे गांवों में रहने वाले लोगों को अधिनियम में वन भूमि उपयोग की राहत दी है। पर दैनिक जागरण हल्द्वानी संस्करण के पेज दो दिनांक 29.8.14 की खबर के अनुसार उत्तराखंड सरकार के जंगल विभाग की नींद आठ वर्ष पश्चात खुली वह भी तीन पीढ़ियों 75 वर्ष पूर्व का गांव रहना दस्तावेजी प्रमाण मांग रहे हैं। उत्तराखंड के जंगलात के जंगल राज से माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की 85 प्रतिशत जंगलात के कब्जे वाली भूमि के लिये एक अलग इन्क्वायरी कमीशन बैठायें ताकि उत्तराखंड के विकास पथ में कुंडली मारे हुए जंगलाती अजगर से उत्तराखंड के पन्द्रह हजार गांववासियों को पलायन न करने अपनी जमीन में सुख चैन से रहने का मौका मिले। यदि जंगलात की जंगल नीति पर मुख्यमंत्री जी ने लगाम नहीं लगायी तो आने वाले पचास वर्ष में पूरा पहाड़ निर्जन हो जायेगा। 

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