पुत्रात् इच्छेत पराजयम् शिष्यात् इच्छेत पराजयम् ।
गुरू गुड़ ही रह गये चेला बन गये शक्कर।
गुरू गुड़ ही रह गये चेला बन गये शक्कर।
क्या पराजय त्रास से बचने के लिये पुत्र व शिष्य से हारना हिन्दुस्तानी खासियत है ?
क्या पितामह - पैट्रियार्क के लिये पराजय का पतझड़ भी मुफीद है ?
क्या सपा नान्दीमुख मुलायम सिंह यादव का सैफई चक्रव्यूह खत्म होगया ?
बीजू जनता दल या बीजद सांसद वैजयंत जय पंडा कलम के धनी हैं। विचार तो करते ही रहते हैं, अपने विवेक को ताजातरीन भी रखते हैं। उन्होंने यूनिवर्सल बेसिक इन्कम के बारे में लिखा। टाइम्स आफ इंडिया के विचार कणों की बिसात बैठाते हुए उन्होंने अपने प्रशंसकों के बीच नेताजी नाम से संबोधित होने वाले मुलायम सिंह यादव को Autumn of the Patriarch शीर्षक से मुलायम सिंह यादव की पच्चीस साला राजनीतिक चतुराई का पतझड़ समझ लिया। डाक्टर राममनोहर लोहिया के समर्थक व प्रशंसक केवल उ.प्र. बिहार ही नहीं कलिंग में भी बड़ी संख्या में थे। डाक्टर लोहिया ने जब लखनऊ में उ.प्र. के तत्कालीन 51 जिलों के नब्बे हजार लोगों की व्यवस्थित रैली झंडे वाला पार्क अमीनाबाद से विधान भवन के लिये रवाना की तथा उ.प्र. के इटावा जिले के प्रतिनिधित्व करने वाले समाजवादी नेता अर्जुन सिंह भदौरिया थे शायद तब नेताजी मुलायम सिंह यादव दस वर्ष के बालक रहे होंगे। उन्हंे नेतृत्व की सही दिशा देने वाले छोटे लोहिया के नाम से विख्यात जनेश्वर मिश्रा थे। मार्च 1949 में लखनऊ में संपन्न रैली का प्रतिनिधित्व अल्मोड़ा से इस ब्लागर सहित पांच अन्य व्यक्तियों सर्व श्री दुर्गा सिंह रावत, त्रिलोक सिंह, लीलाधर पंत, नंदन सिंह बिष्ट, मदन मोहन उपाध्याय ने किया था। नेताजी मुलायम सिंह यादव की नेतृत्व शैली को सही सही पहचानने वाले चौधरी चरण सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा थे। उन्होंने अपने अपने तरीके से मुलायम सिंह यादव का नेतृत्व संवारा। यह राजनीतिक बारहखड़ी नेताजी को छोटे लोहिया ने ही सिखाई। नेताजी डाक्टर लोहिया के सीधे संपर्क में कभी नहीं रहे क्योंकि जब नेताजी के भाग्य का सूर्योदय 1967 में होरहा था डाक्टर लोहिया अस्वस्थ थे और उसी वर्ष दिवंगत भी होगये। लोहिया जी का नाम पाकर नेताजी पचीस वर्ष उ.प्र. राजनीति के चमकीले नक्षत्र बने रहे। छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्रा के दिवंगत होने के बाद उन्हें राजनीति का सटीक आकलन करने वाला गुरूमंत्र दाता के ओझल हो जाने के बाद नेताजी ने वही तरीका अपनाया जिसने लालू प्रसाद यादव को बिहार में। उ.प्र. में बहन मायावती ने आत्मवैभव का सूत्र पकड़ लिया। सैफई संवर्धन में वही तरीका नेताजी ने भी अख्तियार किया अंततोगत्वा उन्हें अपने बेटे से हार माननी पड़ी। परंपरागत हिन्दुस्तानी तरीके में पराजय ही होनी हो तो संकल्प कीजिये - पुत्रात् इच्छेत पराजयम्। बाप गुड़ ही रहे चेला बन गये शक्कर। विनोबा भावे कहते थे - बेटे से हारने के साथ साथ शिष्यात् इच्छेत पराजयम् का संकल्प लीजिये। जिन्दगी की दौड़ में ‘हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ’ का आप्त वाक्य सदा अपनी वाणी में रखिये। इसमें कोई दो राय नहीं कि आधुनिक हिन्द में सुप्रीमो-क्षत्रप राजनीतिक समूहों में नेताजी मुलायम सिंह यादव ने उ.प्र. और हिन्द की राजनीति के अखाड़े में अपनी भूमिका का निर्वाह किया। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को हिन्द का राष्ट्रपति चुने जाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नेताजी मुलायम सिंह यादव ने नैतिक तथा राजनैतिक समर्थन दिया जबकि अखिल भारतीय कांग्रेस की एकच्छत्र नेत्री श्रीमती सोनिया गांधी भिन्न राय रखती थीं। नेताजी मुलायम सिंह यादव की तरह सार्वभौम राजनीतिक सुप्रीमो शक्तिधारक नेतृत्व अब्दुल्ला परिवार, मुफ्ती परिवार, बादल परिवार, मायावती नेतृत्व, लालू प्रसाद यादव नेतृत्व, नवीन पटनायक, एन टी आर जामाता चन्द्रबाबू नायडू, देवगौड़ा, करूणानिधि में भी पारिवारिक राजकर्ता के गुण हैं। ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल की सुप्रीमो शैली पूर्णतः आत्मवादी है जबकि गुरू शिष्या परंपरा की तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का लोकसंग्रह अपने किस्म का अनोखा राजकाज था। श्रीमती इंदिरा गांधी के राज्यकाल में अखिल भारत कांग्रेस निर्जीव होगई उसको इंदिरा कांग्रेस लील गई। केवल वामपंथी राजनीतिकर्ता तथा एकदम दक्षिणपंथी भा.ज.पा. सुप्रीमो क्षत्रप दोष रहित राजनीतिक दल थे।वैजयंत जय पंडा फरमाते हैं बाईस वर्ष पूर्व एन.टी. रामाराव से संयुक्त आंध्र (अब तेलुगु भाषी दो राज्य हैं तेलंगाना और आंध्र) की राजसत्ता उनके दामाद चन्द्रबाबू नायडू ने हथिया ली। नेताजी मुलायम सिंह यादव, यादव राज खानदान के नांदीमुख हैं। उनकी तरह ही राजद सुप्रीमो महाशय लालू प्रसाद यादव भी नांदीमुख हैं। भारत में जम्मू कश्मीर के नांदीमुख द्वय शेख अब्दुल्ला उनके पुत्र डाक्टर फारूख अब्दुल्ला पौत्र उमर अब्दुल्ला को डायनास्टी याने राजवंश में पैदा हुए बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था के राजवंश मुफ्ती खानदान पितापुत्री का शास्ता होना पंजाब का बादल खानदान, उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांवा के मूल निवासी नेताजी मुलायम सिंह यादव का राज खानदान बिहार के लालू प्रसाद यादव का राज खानदान वैजयंत जय पंडा जिस राजनीतिक दल से लोकसभा सांसद हैं बीजद का नवीन पटनायक राज खानदान आंध्र प्रदेश के एनटी रामाराव उनके जामाता चंद्रबाबू नायडू का ससुर जंवाई खानदान एवं करूणानिधि का राज खानदान कन्नड़ भाषी देवगौड़ा कुमार स्वामी राज खानदान महाराष्ट्र के शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने स्वयं राज नहीं किया राज करने के इच्छुक लोगों को सहारा दिया इसलिये ठाकरे शिवसेना सियासत को राज खानदान की चौखट में फिट करना तर्कसंगत नहीं है। बाल ठाकरे के जीवन दर्शन को डायनस्टी याने राजवंश वाले चौखट में रखना राजनीतिक विवेक शून्यता है। शरद पवार महाराष्ट्र के शक्तिशाली मराठा राजनेता हैं पर उन्हें भी डायनस्टी के घेरे में रखना उनकी लोकनेतृत्व शक्ति का मखौल उड़ाना मात्र ही कहा जा सकता है। हिन्द के मौजूदा डायनास्टिक राजवंशीय घेरे में स्वराजिस्ट मोतीलाल नेहरू स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है इसकी घोषणा रावी तट में करने वाले पंडित नेहरू उनकी प्रियदर्शिनी कन्या इंदिरा गांधी पर जो भी आरोप आप जड़ना चाहें पर वे अपनी राजनीतिक पात्रता से उछंगराय नवलकिशोर ढेबर के उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं। यह बात 1959 की है कांग्रेसाध्यक्ष चुने जाने के बाद इंदिरा जी ने अपने पिता पंडित नेहरू से कहा - वे फीरोज गांधी से तलाक लेना चाहती हैं। पंडित नेहरू ने इंदिरा को कहा - इन्दु पंडित पंत से परामर्श लेने उनके पास जाआ। इंदिरा जी ने पंडित नेहरू से कहा - मैं कांग्रेस प्रेसीडेन्ट हूँ। पंडित पंत आपके मंत्रिमंडल के सदस्य हैं मैं उनसे मिलने उनके घर नहीं जाऊँगी। पंडित नेहरू अत्यंत चिंतित थे, उन्हें पंडित पंत ने बताया कि इन्दु फीरोज से तलाक लेकर पंडित नेहरू के प्रिंसिपल सेक्रेटरी एम.ओ. मथाई से विवाह करना चाहती है। अपने पिता पंडित नेहरू की इच्छा का आदर करते हुुए इंदिरा जी पंडित पंत से मिलने पहुंचीं। पंडित पंत ने एम.ओ. मथाई की व्यक्तिगत जिंदगी का कच्चा चिट्ठा तथा प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी के नाते अथाह अनर्जित धन का जुगाड़ कांग्रेसाध्यक्ष इंदिरा जी के सामने रख दिया। उन्होंने पंडित नेहरू व कांग्रेसाध्यक्ष इंदिरा गांधी को कहा - मेरा कष्ट केवल इतना है कि बर्तानिया व अमरीका के अखबार मुखपृष्ठ में खबर छापेंगे। एम.ओ. मथाई को पंडित पंत ने तलब किया कहा - मथाई त्यागपत्र दे दो तुम्हें सभी सुविधायें मिलेंगी। त्यागपत्र नहीं दोगे तो तुम पर कार्यवाही की जायेगी। मथाई ने अपनी हेकड़ी नहीं छोड़ी पर समझाने बुझाने पर त्यागपत्र देकर चला गया। इसे कहते हैं आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति जिसका प्रयोग पंडित पंत ने अचम्भा ट्रस्ट तथा एम.ओ. मथाई पर बिना किसी अखबारी होहल्ले के संपन्न कर इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को बनाये रखा। उसी वर्ष फीरोज गांधी का निधन होगया। डाइवोर्स का प्रसंग निरर्थक होगया। स्वराजिस्ट मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी की राजनीतिक शैली के पक्षधर जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी को राजनीतिक राजवंश के घेरे में डालना विवेक संगत नहीं लगता। जब इंदिरा गांधी का निधन हुआ वह एक त्रासद घटना थी। उन्हें उनके ही सिपाही ने निष्प्राण किया। तब हिन्द के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह थे। उन्होंने भारतीय राजनीतिक यात्रा में राष्ट्रपति पद तक पहुंचाने में इंदिरा गांधी का महान अनुग्रह माना और इंदिरा जी की मृत्यु पर उनके पुत्र राजीव गांधी को हिन्द का प्रधानमंत्री नियुक्त कर इंदिरा जी की उन पर जो कृपा थी उस ऋण का भुगतान कर डाला पर राजीव गांधी के निधन के पश्चात यदि श्रीमती सोनिया गांधी अथवा उनके पुत्र राहुल गांधी हिन्द के प्रधानमंत्री बनते तब तो कहा जा सकता था कि इंदिरा गांधी डायनास्टी किन्तु यह तो दैव को मंजूर नहीं था। सोनिया जी न स्वयं प्रधानमंत्री 2004 में बनीं न 2004 या 2009 में अपने इकलौते बेटे को राजगद्दी सौंपने का साहस जुटा पाईं अतः नेहरू खानदान या इंदिरा खानदान राजवंश या डायनास्टी का प्रतीक है यह मानना तर्कसंगत नहीं लगता। यहां बात डायनास्टी की है पर हिन्द में व्यक्ति सुप्रीमो क्षत्रप राजनीतिक दल भी हैं जिनमें गुरू शिष्या परंपरा के दो उदाहरण दिवंगता जे. जयललिता उनके अभिनय व राजनय गुरू एम.जी. रामचंद्रन ने तमिलनाडु में गैर तमिल राजनीति का डंका बजा कर लोकसमर्थन तथा लोकसंग्रह की जयललिता पद्धति का श्रीगणेश कर तमिल भाषी जन जन को अम्मा का मुरीद बना डाला। दूसरी ओर वामसेफ विचार पोखर के प्रखर चिंतक महाशय कांशीराम गुरू शिष्या परंपरा में मायावती का नया अध्याय शुरू किया। कांशीराम को गहन विश्लेषण के पश्चात बाल ठाकरे व्यक्तित्त्व प्रतिभा के अंदर आंका जा सकता है क्योंकि कांशीराम चिंतक थे स्वयं राज करना उनका स्वधर्म नहीं था। बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के चिंतक कांशीराम ने मायावती में नेतृत्व क्षमता कूट कूट कर भर दी। आंशिक रूप से दिवंगत जयललिता और बहन मायावती की कार्यशैलियां पूर्णतया भिन्न भिन्न रहीं। बहन मायावती अपने विरोधियों को बख्शती नहीं मौका मिलने पर तीव्र आक्रमण करती रहती हैं जबकि दिवंगत जयललिता तमिल का जन जन सम्मान से देखता था। मायावती के समानांतर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की एकछत्र नेत्री हैें। वामपंथियों व कांग्रेस को पश्चिम बंग से बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं। वे और दिल्ली सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल का एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना है।
अपने नांदीमुख का पतझड़ अग्रलेख में सांसद वैजयंत जय पंडा लिखते हैं कि मार्क तुली की एक पत्रकार के नाते हिन्द की राजनीतिक चहलकदमी में जबर्दस्त पकड़ थी उन्हें उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि वंशवाद करिश्माई विरासतकर्ता भी है। रंजनी अय्यर मोहंती की राय में वंशानुगत उम्मीदवारी को मतदाताओं का विरासती समर्थन भी दिलाता है। वे कहते हैं श्रीमती गांधी ने अ.भा. कांग्र्रेस को एक बार नहीं दो बार तोड़ा तो भी कांग्रेस समर्थक मतदाताओं का रूझान इंदिरा गांधी की ओर ही था। हिन्दुस्तान के जो मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक अपनी मातृभाषा सहित हिन्द की आंतर भारतियों केे हिन्द की भाषाओं में उपलब्ध राजनीतिक दांवपेच हिन्दुस्तानी संदर्भ में देखने के बजाय अंग्रेज विद्वानों ने हिन्द का जो राजनीतिक सरोकार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से उपलब्ध कराया है उसको ही वेदवाक्य तो नहीं पोप वाक्य मान कर चलते हैं। सांसद वैजयंत जय पंडा ने यदि उत्कल के राज्यों रियासतों का राजनीतिक साहित्य अंग्रेजी में पढ़ने के बजाय मूल उड़िया में समझने का प्रयास किया होता साथ ही भारतीय राजनीति को सही सही समझने के लिये महाभारत का शांतिपर्व अनुशीलन करना इसलिये जरूरी है कि मनु शतरूपा से लेकर उत्तानपाद सुरूचि सुमति तथा ध्रुवोपाख्यान दस्युधर्मी राजा वेन के आत्मज पृथु अथवा पृथुश्रवा की कृषि नीति, दोहन प्रक्रिया के समानांतर हिन्द के मौजूदा राजनीति करने वाले महानुभावों को अधकचरी इंडोलाजी के बजाय यदि उनकी मातृभाषा कश्मीरी, डोंगरी, पंजाबी, डिंगल, गुजराती, मराठी, सिंधी, कन्नड़, कोंकणी, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बंगला, असमी, मइती या मैनपुरी, नैपाली के अलावा जिस भाषा को दुनियावी भाषाविद हिन्दी उर्दू हिन्दुस्तानी त्रिकुटी में गिनते हैं और जिसकी भगिनी भाषाओं में मैथिली, मराठी, भोजपुरी, वज्जिका, अंगिका, अवधी, छत्तीसगढ़ी, महाकौशली, ब्रजभाषा, खड़़ी बोली, रेखता, कांगड़ी, गढ़वाली और कुमांऊँनी के अलावा संथाली और झारखंडी भाषा परिवार जिसे आज दुनियां के लोग हिन्दी कहते हैं जिस हिन्दी ने हिन्द की आजादी संघर्ष में अद्वितीय योगदान किया इन सभी भारतीय भाषाओं याने आंतर भारती ही भारत की भाषा समस्या का बौद्धिक निदान है यह कहना है भारतीय संस्कृति जिसे दुनियां हिन्दू संस्कृति के नाम से पहचानती है उसके मीमांसकर्ता साने गुरू जी का। भारत और यूरप में अंतर ही यह है कि भारत में नागरी सहित बारह लिपियों में हर लिपि में बावन अक्षर या अल्फाबेट हैं। भाषायी नजरिये से हिन्द दुनियां का शीर्ष राष्ट्र राज्य है। वहीं दूसरी ओर यूरप में अंग्रेजी के अलावा महत्वपूर्ण भाषा समूहों में फ्रेंच, पुर्तगाली, स्पेनी, जर्मन, फिनिश, स्कैनडेनेवियन, डच, रूसी भाषा सहित सभी भाषाओं में 26 अल्फाबेट वाली रोमन लिपि का प्रयोग होता है। यूरप के देश भाषाई प्रधान हैं जब कि हिन्द संस्कृति तथा मानवता प्रधान देश है। भाषायें इस मुल्क के भूषण हैं। जहां तक राजे महाराजाओं की वंश परंपरा का सवाल है हिन्दुस्तान के आजाद होते वक्त भी देश में पौने छः सौ रियासतें थीं। उन रियासतों की वंशवादी राज परंपरा थी परंतु वे सभी राजवंश कूटनीतिक तथा राजनीतिक रणनीतियों के क्षेत्र में पांरगति प्राप्त राजर्षि थे। आधुनिक हिन्दुस्तान में डाइनास्टी के बारे में पितामह का पतझड़ Autumn of the Patriarch में वैजयंत जय पंडा का यह मत कि Dynesty has its uses in Politics but is being supplanted by modern media.। अगर वैजयंत जय पंडा महाशय ने पंडित नेहरू की पहली सार्वजनिक क्षमता का अनुशीलन 1934 में पंडित नेहरू के इलाहाबाद म्यूनिसपैलिटी के चेयरमैन चुने जाने के पश्चात उनके समक्ष पहला यक्ष प्रश्न उठा था कि वेश्यावृत्ति से किस तरह निजात पायी जाये। इलाहाबाद म्यूनिसपैलिटी के सभासद पंडित मोतीलाल नेहरू के अभिन्न मित्र तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संस्थापक महामना मदनमोहन मालवीय भी थे। मालवीय जी चाहते थे कि इलाहाबाद से वेश्यावृत्ति समाप्त की जाये। अपने प्रथम सार्वजनिक कार्यक्रम में पंडित नेहरू ने जिस विद्वता से इलाहाबाद म्यूनिसपल बोर्ड की बैठक में वेश्यावृत्ति निवारण की महत्ता को स्वीकार करते हुए वेश्यावृत्ति को निरस्त करने से उत्पन्न होने वाली अन्य समस्याओं सरोकारों तथा भारतीय समाज की विभिन्न स्थितियों का विश्लेषण करते हुए अपना वक्तव्य दिया वह जहां भारत के धार्मिक बहुसंख्यकों की भावना का समादर था वहीं उस प्रस्ताव को पंडित नेहरू ने अव्यावहारिक करार दिया। उन्होंने जो तर्क रखे उन्हें महामना मदनमोहन मालवीय सरीखे वेश्यावृत्ति समाप्त करने के पक्षधर लोगों को अपने तर्क से चुप कराया वहीं राजनीतिक रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण दिया। वैजयंत जय पंडा एन टी रामाराव व नेताजी मुलायम सिंह यादव को वंशवाद का पैट्रियार्क बता रहे हैं। यह ब्लागर पैट्रियार्क शब्द की अंग्रेजी भाषा से शब्दचौर्य के बजाय एन टी रामाराव तथा नेताजी मुलायम सिंह यादव को राजवंशवाद का नांदीमुख कहना ज्यादा तार्किक समझता है।
हिन्द की तात्कालिक राजकरण वाली जरूरत राजवंशनुमा राजनीतिक दल सुप्रीमो क्षत्रप शैली को धीरे धीरे सुधार करने की जरूरत है। यह काम नरेन्द्र मोदी सरीखा पूर्ण व बहुमत प्राप्त पूर्णतया राष्ट्र राज्य को समर्पित नेतृत्व कर सकता है। नेता को जब अपनी पत्नी पुत्र पौत्र तथा लड़की दामाद आदि परिजनों का योगक्षेम देखने में ज्यादा समय लगाना पड़ा तो उसके मार्ग में बाधायेें आना स्वाभाविक है। महात्मा गांधी ने जब अखिल भारत कांग्रेस का नेतृत्व संभाला तो उन्होंने अपने परिवार के लोगों की चिंता करने के बजाय हिन्द के लाखों गांवों में रहने वाले लोगों के हित साधन के तरीकों पर विचार किया। देश में गरीबी का साम्राज्य था, उद्यमिता बर्तानी राज में शून्य तक पहुंच गई थी। महात्मा ने एक तीर से दो साध्य प्राप्त किये। चर्खे पर कते सूत से बने खादी कपड़े को स्वतंत्रता सेनानियों का पहरावा तय किया तथा घर घर गांव गांव में चर्खे को पुनर्स्थापित कर मां बहनों को चर्खा कात कर देश की कपड़ा जरूरत को पूरा करने की दिशा में कदम उठाया। अब हम फिर एक बार नेताजी मुलायम सिंह यादव के लिये वैजयंत जय पंडा नेे पतझड़ की बेरूखाई का जो प्रसंग उठाया है। नेताजी मुलायम सिंह यादव तो जीवट के व्यक्ति हैें उन्होंने उत्तर प्रदेश सरीखे विविधताओं वाले हिन्दुस्तान समझे जाने वाले घटक राज्य में 1991 से लगातार अपना झंडा फहराया है। उ.प्र. के गोप, यादव, अहीर बहुल इलाकों को कुलदीप नैयर के मतानुसार आज भारत की आबादी में पचीस प्रतिशत मुसलमान हैं। 1947 में जब भारत विभाजन हुआ था तब पूरे देश में 23 प्रतिशत मुसलमान थे। हिन्दू मुसलमान समस्या का समाधान केवल सबका साथ सबका विकास के गुरूमंत्र में निहित है इसलिये यह बात स्वीकार करनी ही चाहिये कि नेताजी मुलायम सिंह यादव से उनके पुत्र अखिलेश यादव अपने प्रशंसकों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। उनकी राजनीतिक समझ तथा उ.प्र. के जातीय समीकरण को भी मुलायम सिंह यादव से ज्यादा सही आंका है। जब तक जनेश्वर मिश्र जीवित थे तब तक उनकी राजनैतिक लोहिया शैली से मुलायम सिंह यादव लगातार लाभान्वित होते रहे। जनेश्वर मिश्र के निधन के पश्चात वे पारिवारिक जातिवादी तथा जन्मभूमि के प्रति श्रद्धालु व्यक्तित्त्व के नाते सैफई प्रासाद सैफई राजवंश के विस्तार के विचार कैदी होगये। उन्हें बुढ़ापे ने भी घेर लिया इसलिये अखिलेश यादव का उत्कर्ष नेताजी मुलायम सिंह यादव को तहेदिल से स्वीकार कर अपना बुढ़ापा और याददाश्त की कमी को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर दारा गार सुत मोह से मुक्ति लेनी ही चाहिये। अखिलेश यादव व वैजयंत जय पंडा सरीखे नौजवानों को सही राजनीतिक बारहखड़ी सीखने की नसीहत देनी चाहिये। शिव संकल्प लीजिये - न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः। सपा सैफई नान्दीमुख नेताजी मुलायम सिंह यादव हिम्मती सियासत।
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