Monday, 13 January 2014

            श्रीमद् भागवत महापुराण के अनुसार "सर्व जीव निकायानाम् सूर्य आत्मा दृगीश्वरः" अर्थात सूर्य ही प्राणिमात्र में नेत्र रूप हैं। मकर-संक्रांति से उत्तरायण का प्रारम्भ हो जाता है। परम्परा से चलने वाली भारतीय सामाजिकता में सूर्य जिसे भारतीय वाङ्मय में हिरण्यगर्भ, भाष्कर, मार्त्तण्ड, आदित्य, दिनकर, आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया जाता है, ही प्राणिमात्र स्थावर-जंगम, जलचर, थलचर, नभचर सभी का जीवनदाता है। अहोरात्र, दिन और रात का कर्ता भी यही सूर्य है। रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि ये सात वार भी सूर्य पर ही आश्रित हैं। इनसे इतर सूर्य की सबसे बड़ी देन माह में दो पक्षों के रूप में शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष के पन्द्रह-पन्द्रह दिन हैं। सूर्य एक वर्ष में बारह राशियों के चक्र में घूमता रहता है। ये बारह राशियां मेष से मीन पर्यन्त बारह सौर मास कहलाते हैं। इनमें मुख्य मेष, कर्क, तुला व मकर राशियां हैं। सूर्य जब मेष एवं तुला राशि  में प्रवेश करता है तो दिन-रात समान मात्रा के होते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस राष्ट्रीय पंचांग का गठन करने के लिये आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय पंचांग कमेटी गठित की गयी थी उसने जो संस्तुतियां दीं, तार्किकता के पश्चात् भी पारम्परिकता का निर्वाह करने वाले भारतीय समाज के बहुसंख्यक विद्वत् समाज ने बहुसंख्यकों की आस्था वाली नींव को हिलाने-डुलाने से इन्कार कर दिया। वे अब भी मकर संक्रांति सहित, जब सूर्य उत्तराभिमुख होते हैं, सभी बारह संक्रांतियों को यथापूर्व मानती आरही है जबकि भागवत महापुराण के अनुसार भी मेष व तुला संक्रांति क्रमशः २१ मार्च व २३ सितम्बर के दिन मनायी जानी चाहिये थी क्योंकि उन्हीं दो दिनों में रात-दिन बारह घंटे या तीस घड़ी के होते हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण का कथन है कि  मेष एवं तुला संक्रांति को रात-दिन समान अवधि के होते हैं। भारत के सभी पंचांग दिनमान व रात्रिमान क्रमशः २१ मार्च व २३ सितम्बर को समान मानते हैं। "यदा मेष तुलयोर्वर्तते तदा अहोरात्राणि समानानि भवन्ति, यदा वृषभादिषु पंचसु च राशिषु चरति तदा हान्येव वर्धते ह्रसति च मासि मास्येका चरति राशिषु।" गढ़वाल हिमालय जिसे पौराणिक आख्यान केदारखण्ड के नाम से पुकारते हैं उसमें विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, सोन(स्वर्ण)प्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग तथा देवप्रयाग अलकनंदा, मन्दाकिनी, नन्दाकिनी एवं जाह्नवी (भागीरथी) संगमों पर जल यज्ञ स्थलियां हैं। सातवां जल यज्ञ स्थल तीर्थराज प्रयाग है जिसे आजकल लोग इलाहाबाद के नाम से जानते हैं जहाँ गंगा-यमुना और अदृश्य, अप्रत्यक्ष सरस्वती का संगम है। किसी समय में हमारे देश भारत की धरती पर सरस्वती साक्षात् रूप में बहती थी          

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