Monday, 19 May 2014


            नमो नमस्तुभ्यः नरेन्द्र मोदी                  

                                                                                                                                                                                                                                                                                                           वयम् नमामो भारत राजधर्मः।


          इस ब्लॉगर ने दिसम्बर 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री का अभिनंदन करते हुए जगन्नियंता परमात्मा से प्रार्थना की थी कि नरेन्द्र मोदी का अगला पड़ाव ‘‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो'' सुनिश्चित हो। सोलह महीनों के अंतराल में भारत की षोडषी लोकसभा के इक्यासी करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के बहुमत ने मई 2014 में नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी को लोकसभा नेतृत्त्व सौंपने के जरिये भारत की बागडोर का जनतांत्रिक सूत्र नरेन्द्र मोदी के हाथ में बांध कर इस पुरातन भारत राष्ट्र राज्य का योगक्षेम संकल्पित किया है। नरेन्द्र मोदी ने भारत के मतदाताओं, जिन्हें मुंबईकर मराठी मानुस मतदार कह कर पुकारते हैं हिन्द के इन इक्यासी करोड़ मतदाताओं के बहुसंख्यक समूह ने नरेन्द्र मोदी के उस वचन पर यकीन किया है कि वे साठ महीनों में ही हिन्दुस्तान की तकदीर बदल डालेंगे। इस पुरातन देश के वडोदरा व वाराणसी के मतदारों ने आसेतु हिमाचल सभी भारतीयों का सांकेतिक प्रतिनिधि कर देश को आगे लेजाने की बागडोर गुर्जर गिरा सरस्वती के लाड़ले नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी को सौंप कर एक ऐसी मिसाल कायम की है जो भारत के घटक राज्यों के संघ को राष्ट्र के रूप में एकात्मक तथा लोकशासन के रूप में संघात्मक शक्ति संपात करेगा। राममनोहर लोहिया अपने आपको कुजात गांधीवादी कहते थे। उन्हें स्वामी विवेकानंद की तरह महात्मा गांधी के दरिद्र नारायण और सामाजिक सेवा में आगे आने वाले व्यक्ति को ओढ़ी हुई गरीबी अपनाने का गांधियाना रास्ता मंजूर था। अहर्निश भारत राष्ट्र भारत के लोगों के योगक्षेम पर चिंतन करने वाले राममनोहर लोहिया चौखंभा राज की कल्पना करते थे। दिल्ली की सरकार संघ के घटक राज्यों की सरकार जिला सरकार तथा गांव सरकार या गांव रिपब्लिक उनका आदर्श था। महात्मा गांधी ग्राम राज व स्वराज्य का रामराज्यनुमा सुशासन स्थापित करने के पक्षधर थे। उनकी लेखनी से निकली इंडियन ओपीनियन के मार्फत हिन्द स्वराज का संकल्प आज भी भ्रष्टाचार शून्य लोक प्रशासन का एकमात्र जरिया है। महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज के संकल्प को गांधी विचार दर्शन के मूर्धण्य व्याख्याकार काका साहेब कालेलकर ने ही अपने एक वक्तव्य में हिन्द स्वराज की पचासवीं वर्षगांठ पर विकास के मार्ग का अवरोधक कह कर खारिज कर दिया था। हिन्दुस्तान की सत्तर फीसदी जनसंख्या आज भी गांवों में ही रहती है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेन्द्र मोदी ने गुजरात राज्य के पचास गांवों को रूरर्बनाइज़ करने की एक परियोजना का सूत्रपात 2011 में अहमदाबाद में किया। 1954-55 लेकर 1963 तक मुंबई प्रेसीडेंसी की पहली लोकप्रिय सरकार के वित्तमंत्री रहे वैकुंठ लल्लूभाई मेहता व उनके रूर्बन सोसाइटी अवधारणा के सूत्रधार झबेर भाई पी. पटेल ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई वाराणसी के अजगरा तारगांव इलाहाबाद के सहसों कमला नगर मुरादाबाद अमरोहा जनपदों के धनौरा कपसवा गांवों में रूर्बन सोसाइटी सवंर्धित करने का कार्यक्रम 1954 से 1963 तक लगातार चलाया। भारत के गांवों को शहरी सुविधायें मिलने बाबत राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने PURA-Providing Urban Amenities to Rural Areas का नया विकास मंत्र दिया। हिन्दुस्तान के गांवों, शहरी, झुग्गी-झोपड़ी, मलिन बस्ती और तीव्र गति से प्राचीन भारत की पैंठ, साप्ताहिक बाजार संस्कृति के आधुनिक प्रतीक पड़ाव, बाजार, सड़कों के किनारे बढ़ रही शहरनुमा बस्तियों पर सटीक योजनाबद्ध स्थानीय जरूरतों के मुताबिक टिकाऊ तथा कम खर्चीला विकास मॉडल संकल्पित करने की तात्कालिक आवश्यकता है। देश के सामने तीन उदाहरण हैं। 1. वैकुंठ ल. मेहता झबेर भाई पटेल संकल्पित रूर्बन सोसाइटी खड़ी करने के लिये सघन क्षेत्र योजना 2. राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रायोजित PURA तथा 3. गुजरात के पचास गांवों में गांव की आत्मा को बरकरार रखते हुए गांवों में रूर्बनाइजेशन। गांव और शहर में टिकाऊ विकास मूलक सामंजस्य स्थापित करने के लिये मनरेगा सहित ग्राम्य विकास की सभी वर्तमान परियोजनाओं का मूल्यांकन करने रूर्बन सोसाइटी, पूरा तथा रूर्बनाइजेशन परियोजना की उपलब्धियों व बाधाओं का राष्ट्रीय अध्ययन करने की जरूरत है। रूर्बनाइजेशन में गांव की आत्मा को जिन्दा रख कर गांव व शहराती जिन्दगी में जो खाई निरंतर फैलती जारही है उसे पाटने और गरीब व अमीर के बीच गांधी विचार के सहअस्तित्त्व व ट्रस्टीशिप - मैं ग्वाला हूँ रखवाला हूँ चौकीदार हूँ यह सेवा भावना जाग्रत करने की तात्कालिक जरूरत है। रूरल डेवलपमेंट इन्क्वायरी कमीशन के गठन कर योजना आयोग तथा राष्ट्रीय विकास परिषद के कायाकल्प करने की तात्कालिक आवश्यकता है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा राज्यों का शासन संभालने वाली  राजनीतिक दलीय विचारधाराओं को भी विश्वास में लेकर भारत के शहरी, अर्ध शहरी, पैंठ बाजार केन्द्रों तथा पूर्णतः ग्रामीण इलाकों को टिकाऊ विकास का लाभार्थी बनाये जाने की तात्कालिक जरूरत है।
  जिस तरह प्रह्लाद को नवधा भक्ति की दीक्षा नारद ऋषि द्वारा प्रह्लाद की माताश्री कयाधु दानवी को देवराज इन्द्र का कोपभाजन बनने से रोक कर देवर्षि नारद ने हिरण्यकश्यप की रानी कयाधु को अपने आश्रम में सुरक्षा दी। समय समय पर कयाधु को विभिन्न आख्यान भी सुनाये। प्रह्लाद ने उस ज्ञान को मां के गर्भ में ही हृदयंगम कर लिया। बलराम व श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु को पार्थ अर्जुन ने संग्राम चक्रव्यूह से मातृगर्भ में अवगत करा दिया था। चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकलें इसका पूरा-पूरा दृष्टिपथ अभिमन्यु को ज्ञात नहीं था। जिस तरह धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र में भारत युद्ध में नाप्तयौवन षोडष वर्षीय अभिमन्यु की दुश्मन सेना ने घेर डाला। भारत युद्ध की विलक्षण घटना थी अभिमन्यु का चक्रव्यूह में मारा जाना। भारत युद्ध में वैरभाव भीम और दुर्योधन में था। यद्यपि पाण्डव पक्ष के अधिष्ठाता अजातशत्रु युधिष्ठिर थे। युद्ध की कमान अर्जुन के पास थी। निरायुध योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी थे। महाभारत का यह कुरू जांगल युद्ध केवल अठारह दिन चला था पर 2014 का यह चुनावी दंगल छत्तीस दिन चलता रहा। देश के चिंतन पोखर सेकुलर और कम्यूनल अंग्रेजी भाषा के इन दो शब्दों के बीच झूल रहा था। हार्पर कालिन्स द्वारा प्रकाशित कालिन्स अंग्रेजी शब्दकोष के मुताबिक - सेकुलर शब्द विशेषण है, सेकुलर से तात्पर्य ऐहिक सुख भोग से होने के साथ-साथ पारमार्थिक व पारलौकिक सरोकारों से सेकुलर शब्द का कोई वास्ता है ही नहीं। ख्रिस्ती जगत में गिरिजाघरों के नियंत्रण से मुक्त सेकुलर प्रतीति कराता है। जब यूरोप व यूरोप की नयी बसासत अमेरिका के ख्रिस्ती लोकतंत्रीय समाज अपने हाथ में ख्रिस्ती धर्मग्रंथ बाइबिल लेकर शपथ ग्रहण करते हैं तथा अपने देश की शासन व्यवस्था को ख्रिस्ती लोकतंत्र कहते हैं। गिरिजाघर तथा ईसाई पुरोहितों अथवा पादरियों का दखल वहां के समाज व्यवस्था में बना रहता है। दूसरा शब्द कम्यूनल है जो जात बिरादरी आधारित समाज व्यवस्था का प्रतीक है। भारत के संदर्भ में भारतीय राजनीतिक समाज सेकुलर को धर्मनिरपेक्ष और कम्यूनल को संप्रदायवादी कहता आया है। कर्माधिकारे या निष्ठा, धर्म शब्द का शाब्दिक अर्थ स्व कर्त्तव्य है। धर्म शब्द की व्युत्पत्ति ही धृ अर्थात धारण करने की क्षमता से हुई है। हिन्दुस्तान के संदर्भ में धर्म से मतलब मानव धर्म से ज्यादा है। भगवद्गीता कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके कह कर मानव धर्म का उद्घोष करती है। जिसे पश्चिमी समाज रिलीजन व मध्य पूर्व का इस्लामी समाज मजहब कहता है। इन दोनों शब्दों का धर्म से कोई सीधा संबंध नहीं है। भारत में अनेक संप्रदायों ने अपने-अपने आस्थामूलक आस्थान खड़े किये जैसे वल्लभ संप्रदाय, नाथ संप्रदाय, गोरख संप्रदाय, कबीर संप्रदाय, दादू संप्रदाय, रैदास संप्रदाय आदि और आधुनिक भारत के आर्य समाज और  रामकृष्ण मिशन भी संप्रदायों की श्रेणी में ही आते हैं। जिसे पश्चिमी व मध्यपूर्व के ख्रिस्ती व इस्लामी  समाज हिन्दू मजहब या हिन्दू रिलीजन नाम से पुकारते हैं वस्तुतः वह मजहब नहीं एक जीवन शैली है। दुनियां के ज्यादा धर्म मजहब अपनी संख्या बढ़ाने के लिये धर्मान्तरण या कनवर्जन का सहारा लेते हैं पर सनातन हिन्दुस्तानी परम्परा धर्माचरण या कनवर्जन पर यकीन नहीं करती। हिन्दुस्तानी सनातन की सबसे बड़ी खूबी ही पुनर्जन्म पर यकीन करना है। पुनर्जन्म पर आस्था रखने वाले लोग लिंग भेद, वर्ग भेद, जाति भेद तथा मजहबी भेदभाव पर आध्यात्मिक तौर पर यकीन नहीं करते इसलिये हिन्दुस्तानी पारम्परिक समाज की जो नैतिक और मौलिक, बौद्धिक खूबियां हैं तथा भारतीय वाङ्मय में जो विश्वबंधुत्त्व व मानव मात्र के समानांतर समूची सृष्टि के जंगम, स्थावर, जलचर, थलचर, नभचर जीवों के प्रति आत्मीयता तथा जीव दया का करूणा तत्त्व है उसे नयी पीढ़ी के संज्ञान में लाने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक कस्बा जायस है। यहां मलिक मोहम्मद जायसी नाम के अवधी भाषा के कवि रहते थे। उन्होंने पद्मावत नाम का महाकाव्य अवधी भाषा में लिखा, लिपि फारसी थी। वह कहते हैं - ‘‘जायस नगर धरम अस्थानू जहां जाय कवि कीन्ह बखानू’’। अपने महाकाव्य में वे एक जगह लिखते हैं - ‘‘विधना के मारग हैं तेते सरग नखत तन रोवां जेते’’। मलिक मोहम्मद जायसी के अलावा सधुक्कड़ी में कबीर की साखियां खड़ी बोली में काव्य रचने वाले रहीम खानखाना ब्रज भाषा में कृष्ण भक्ति में ओतप्रोत रसखान सहित भारत की समस्त प्राकृत भाषाओं के साहित्य को नये हिन्दुस्तान - हिन्दुस्तान के नवीन अवतार के लिये रामबाण औषध है। 
  सोलह मई 2014 को घोषित लोकसभा निर्वाचित सदस्य सदन नेता का चुनाव करेंगे। मुख्य विपक्षी दल नेता प्रति पक्ष चुनेगा। राष्ट्रपति महोदय सदन के नेता को मंत्रिमंडल गठन नयी सरकार को निमंत्रण देंगे। पहली जरूरत यह है कि भारत के लोग भाषायी स्वराज्य का आह्वान कर प्रधानमंत्री सहित मंत्रिमंडल के प्रत्येक सदस्य को राष्ट्रपति महोदय शपथ ले रहे व्यक्ति की मातृभाषा में ही शपथ दिलायें। जिस वाणी के जरिये व्यक्ति ने मतदाताओं से अपना अमूल्य मत देने का आग्रह किया उसी भाषा में वह शपथ ग्रहण करने का प्रयास करे। 
  श्री नरेन्द्र मोदी बारह वर्ष भारतीय संघ के घटक राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं। हिन्दुस्तान की संघीय राजनीतिक हलचलों में यह पहला मौका है जब बारह वर्ष तक एक राज्य के सरकार को चलाने वाले मूर्धण्य व्यक्ति देश की संघीय राजसत्ता को व्यावहारिक व वास्तविक स्थितियों में संघात्मक ढांचे में ढालने के लिये अपने मंत्रिमंडल सहित घटक राज्यों के मंत्रिमंडलों को प्रेरित करें कि संघ व घटक राज्य में पत्र व्यवहार घटक राज्य की घोषित राज भाषा में ही होगा। संसद में सांसद की अपनी भाषा में अपनी बात रखने की आजादी हो। दूसरे सदस्य अपने सहयोगी सांसद की बात अपनी पसंद की भाषा, अपनी मातृभाषा अंग्रेजी अथवा हिन्दी में सुन सकें। ऐसा प्रबंध संसदीय भाषा विभाग द्वारा सुव्यवस्थित किया जाये। आज की सबसे बड़ी राष्ट्रीय जरूरत देश को समझ बूझ भाषायी संशयग्रस्तता निवारण तभी संभव है जब सांसदों सहित शासन की भाषायी नीति बोधगम्य हो। देश के राजनीतिक व प्रशासनिक तंत्र में भाषायी संशयग्रस्तता को समाप्त किया जाये। यह भाषायी अराजकता को समूल नष्ट करने का महाकुम्भ होगा। जम्मू कश्मीर से केन्द्र उर्दू या कश्मीरी में, पंजाब से गुरूमुखी पंजाबी में, गुजरात से गुजराती में, महाराष्ट्र से मराठी में, कर्णाटक से कन्नड़ में, केरल से मलयाली में, तमिलनाडु से तमिल में, सीमान्ध्र व तेलंगाना से तेलुगु में, ओडिशा से उड़िया में, पश्चिम बंग व त्रिपुरा से बांग्ला में, असम से असमिया में, सिक्किम से नैपाली में, दार्जिलिंग के गुरखा समूह से भी सिक्किम की तरह नैपाली में, नगालैंड से अंग्रेजी में, मणिपुर से मैइती  में अथवा मणिपुरी में, अन्य पूर्वोत्तर राज्यों व अरूणाचल प्रदेश से उनकी घोषित राजभाषा में। जिस दिन दिल्ली की संघ सरकार पत्राचार शुरू करना प्रारंभ कर देगी, भारत की दस हिन्दी भाषी राज्यों हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, म.प्र., उ.प्र., बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड से हिन्दी में पत्र व्यवहार हो, भारत में सुशासन की एक नयी परम्परा का आरम्भ होगा। भारतीय संसद और घटक राज्यों की विधायिकाओं में भाषायी स्वराज कायम करने की दिशा में सभी सिंधी भाषा भाषी सदस्यों को सिंधी में अपना मंतव्य रखने का स्वभाषाधिकार प्राप्त हो। रामराज्य नुमा सुशासन की ओर यह पहला कदम होगा जिससे बहुलवादी भारतीय संस्कृति की विविधता में राष्ट्रीय एकता का नया बिगुल बज सकेगा। 
  श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राजनीतिक विरोधियों व आलोचकों को राजनीतिक अभयदान देते हुए चुनावी हुड़दंग वाले विरोध का बदला न लेने का शिव संकल्प किया है। यह शिव संकल्प भारत के ग्यारह ज्योतिर्लिंगों में पहले 'सौराष्ट्रे सोमनाथम् च' का  उद्घोष है। भाषायी अराजकता से राष्ट्र राज्य को मुक्ति देते हुए दूसरा महत्त्वपूर्ण मसला राजनीतिक अफरातफरी पर पूर्ण विराम लगाते हुए 2004 से 2014 तक के दस वर्षों में संसद के लोक निर्वाचित सदन व उसके नेतृत्त्व का अवमूल्यन जाने अनजाने में हुआ उसको दुरूस्त करने के लिये सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर यह निर्णय लेना होगा कि लोकसभा व विधानसभा सदस्यता ही देश के प्रधानमंत्री व घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पद के लिये अनिवार्य होगी। उच्च सदन की सदस्यता के जरिये कोई राजनेता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर प्रतिष्ठित नहीं हो सकेगा। लोकसभा व विधानसभा चुनाव में पराजित दलगत उम्मीदवार को कोई भी राजनीतिक दल पांच वर्ष से पहले उच्च सदन की सदस्यता का उम्मीदवार नहीं बना सकेगा। उच्च सदन की सदस्यता राजनीतिक दल के मत प्रतिशत से जोड़ कर प्रत्येक राजनीतिक दल के लिये उच्च सदन सदस्यता निर्धारण करने पर सामूहिक विमर्श हो। राष्ट्रपति विश्व विद्यालय द्वारा राज्य की मनोनीत सदस्यता के लिये उद्योग, व्यापार, शिक्षा, कारपोरेट क्षेत्र, किसान-मजदूर महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत के अनुपालक तथा गांधी दर्शन अनासक्ति योग सहित गांधी द्वारा हिन्द स्वराज के अपने प्रथम मातृभाषायी लेखन में जिस प्रकार के समाज की कल्पना की गयी है पिछले 108 वर्ष में भारत ने हिन्द स्वराज को नकारा है। गांधियन इकानामिक तथा गांधियन सामाजिक जीवन दर्शन को धरती में साकार करने की दिशा में सरकारी व गैर सरकारी प्रयासों में सामंजस्य बैठाया जाये। सरकारी लोकपाल लोकायुक्त के समानांतर भारत की तात्कालिक मूर्धण्य जरूरत गैर सरकारी अंबुद समान व्यक्तित्त्वों की जरूरत ग्राम सरकार, क्षेत्र पंचायत सरकार, जिला सरकार, घटक राज्य सरकार तथा भारत सरकार के समानांतर लोकशाही के अंबुद समान व्यक्तित्त्वों को उभारने की आवश्यकता है ताकि राजहठ हिन्दुस्तानियों पर बर्बरता न कर सके। कानून के क्षेत्र में जो अफरातफरी आज अनेकानेक गैर सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) समूहों ने यत्र तत्र सर्वत्र फैला रखी है इन एन.जी.ओ. समूहों को भारतीय संदर्भ में अनुशासित करने की दिशा में पहली मूर्धण्य आवश्यकता ब्रितानी राज द्वारा सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 व उसके तहत संगठित एवं निबंधित सभा सोसाइटियों की उपलब्धियों विसंगतियों तथा एन.जी.ओ. की आड़ में राष्ट्रीय अहितकर कृत्यों पर जांच पड़ताल कर संस्तुतियां प्रस्तुत करने के लिये एक राष्ट्रीय आयोग गठित करने की तात्कालिक जरूरत है। इस आयोग को यह भी अधिकार दिया जाये कि जिन एन.जी.ओ. के विरूद्ध गंभीर शिकायतें हैं उनकी पड़ताल कर उच्चाधिकार आयोग का वर्किंग ग्रुप आरोपी संगठनों के विरूद्ध नामित कानूनी कार्यवाही की संस्तुति भी कर सके। वैष्णव कवि दशधा भक्ति के प्रेरक नरसी मेहता की ‘पीर पराई जाणे रे’ नये शासन में परिलक्षित हो, पर पीड़न करने पर निन्दा करने, पराये धन को लेने, पराई स्त्री को मातृवत् समझने का सद्भाव हर भारतीय में जाग्रत हो। नरसी मेहता की तरह हुंडी सकारने का वातावरण देश में यत्र तत्र सर्वत्र दिखे। नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीतिक हुंडी सकारने का एक नूतन भारतीय आदर्श दुनिया के सामने दिखा सकें यही शुभकामना है, यही मंगलकामना है। नरसी मेहता के समानांतर भारत-भारती रचयिता मैथिली शरण गुप्त का वह महत्त्वपूर्ण गान हर भारतवासी गुनगुनाते रहे - ‘हम कौन थे क्या होगये और क्या होंगे अभी, आओ मिल कर हम विचारें ये समस्यायें सभी’। नया भारत गढ़ने के लिये साठ महीनों में सवा अरब भारतीयों की जीवन रेखा को में नया नवेला उत्साह भरने की भीष्म प्रतिज्ञा और कर्मण्येवाधिकारस्ते का आदर्श ही जीवन दृष्टि हो। ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभागभवेत’’ यह भारत राष्ट्र राज्य का जीवनादर्श हो। राजा रंतिदेव की प्रतिज्ञा हिन्दुस्तान का हर जनप्रतिनिधि अपना जीवनमंत्र निर्धारित करते हुए - ‘‘न त्वहम् कामये राज्यम् न स्वर्गम् न पुनर्भवम् कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्’’ का सद्विचार अपना लक्ष्य रखे। नरेन्द्र मोदी नये हिन्दुस्तान को गढ़ने में कृतकार्य हों यही मंगल कामना है।
  गुर्जर गिरा सरस्वती ने हिन्दुस्तान को मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में विक्रम संवत 1926 शकाब्द 1791 आश्विन बदी द्वादशी के दिन एक अद्वितीय मानव रत्न पुतलीबाई करमचंद गांधी दम्पत्ति के घर जन्म लेकर भारत सहित समूची मानव जाति को अहिंसा का मार्ग दिखाया। ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार आश्विन बदी द्वादशी संवत् 1926 उस वर्ष 2 अक्टूबर 1869 को थी। विश्व की समूची मानव जाति अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 को मनायेगी। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्त्व में आगामी पांच वर्षों के साठ महीनों में हिन्दुस्तान का हर गांव, हर कस्बा, हर शहर भारत के सवा अरब जनता मानवीय आदर्श, कर्त्तव्यपरायणता तथा मनुष्य के शरीर श्रम का आदर्श विश्व वातायन का प्रतीक बने। हिन्दुस्तान का हर व्यक्ति अपने श्रम का उपयोग व्यापक लोकशाही व सामाजिक हित के लिये समर्पित करे तथा उसका जीवन आदर्श -

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत।
अर्थात
         जैसा व्यवहार आप को स्वयं के प्रति अच्छा नहीं लगता है वैसा व्यवहार आप दूसरों से कदापि न करें।

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