Friday, 12 September 2014

डिजिटल इंडिया  डिजिटल भारत अथवा कपिलाश्रमी हिन्द स्वराज


          लालकिले की प्राचीर से भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी ने अपने प्रथम ओजस्वी धाराप्रवाह कण्ठाग्र शब्द-सम्मुचय से भारत की सवा अरब जनता जनार्दन को आश्वस्त किया कि डिजिटल इंडिया की गूंज घर-घर, मुहल्ला दर मुहल्ला, गांव-गांव की हर झुग्गी-झोंपड़ी तक पहुंचाने का उनका शिव संकल्प है। यजुर्वेद कहता है - तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भारतीय संसद में काशी के भारतवासियों का प्रतिनिधित्त्व करते हैं जहां भारत के हर हिस्से के लोग बसते हैं। सदाशिव विश्वनाथ की नगरी काशी भारतवासियों का एक लघु भारत वरूणा और असी के इर्दगिर्द तब से रचा-बसा हुआ है जबसे दशाश्वमेध घाट पर स्नानार्थी स्नान कर काशी-विश्वनाथ का जलाभिषेक करता आरहा है। प्रणव और ओंकार के इर्दगिर्द जो हिन्दुस्तानी मजहबी आस्थायें हैं उनके लिये काशी सर्वोच्च तीर्थ है। इतर मजहबी लोगों को भी काशी आकर्षित करती रही है। काशी की सबसे बड़ी देन हिन्दुस्तान के ही नहीं समूचे विश्व मानव को ताण्डव नृत्य के अन्त में नटराज महादेव ने जब डमरू उठाया तो उससे नौ और पांच ध्वनियां निकलीं। तब सांख्यिकी व सांख्य योग एक से नौ तक ही सीमित था। ये नौ और पांच कुल मिलाकर चैदह ध्वनियां शब्द खे की प्रतीक हैं। भारतीय वाङ्मय में मराठी के ळ अक्षर सहित पंद्रह स्वर तथा कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पवर्ग के पच्चीस ध्वनियों सहित य र ल व स श ष ह क्ष त्र ज्ञ छत्तीस व्यंजन कुल मिला कर इक्यावन ध्वनियां हैं। भरत मुनि रचित नाट्य शास्त्र इसे ही ध्वन्यालोक का प्रवर्तक मानता है। संस्कृत वैयाकरण पाणिनि ने नटराज-डमरू की चौदह ध्वनियों को ही वाङ्मय का मूल स्त्रोत माना है। तमिल सहित भारतीय वाङ्मय की वर्तमान में प्रचलित लिपियों में देवनागरी के अलावा असमी, बांग्ला, मइती, उड़िया, तेलुगु, मलयाली, कन्नड़, गुजराती तथा गुरूमुखी लिपियों के अक्षर अकारादि पंद्रह स्वर तथा कवर्ग लेकर पवर्ग तक के पच्चीस व्यंजन तथा उनके अनुवर्ती य से लेकर ज्ञ तक के ग्यारह व्यंजन समानोच्चारित हैं। यद्यपि अनेक भाषा विज्ञानी Philologists and linguistic Scientists तमिल लिपि को भारतीय वाङ्मय से भिन्न बताते हैं पर मूल द्रविड़ वाङ्मय की तार्किक मीमांसा के उन भाषा विज्ञानियों का तर्क विवेकसंगत नहीं लगता। भारतीय वाङ्मय की विशेषता यह है कि जो लिखा गया है उसका उच्चारण अक्षर का अनुगामी रहता है इसलिये डिजिटल इंडिया या डिजिटल भारत याने इंडिया के बदले भारत शब्द रखने का दाधीच महोदय का सुझाव भी मननीय हो सकता है। सबसे बड़ी राष्ट्रीय जरूरत तो इंटरनेट जिसे यह ब्लॉगर अंतर्नेति संज्ञा देना इसलिये सामयिक मानता है कि जब भारत का वाङ्मय ध्वन्यालोकाधारित क्यों भारत के लोग गंगा-सागर संगम कपिलाश्रम में मकरार्क में एक डुबकी लगा कर कपिल के सांख्य दर्शन, सांख्य योग तथा पारम्परिक ज्ञान पथ का अनुसरण क्यों न करेंं। सांख्य योग ही डिजिटल थीसिस का हिन्दुस्तानी संस्करण है। यूरोप के लोग इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका सहित यह भ्रम पाले हुए हैं कि डिजिटल विजन उन्हें अरेबिया से मिला। अरेबिया - अरब अथवा भारतीय वाङ्मय के और्व, और्वोपदिष्ट योग अथवा महाभारत का और्वोपाख्यान सहित और्वोपदिष्ट मार्ग पर गवेषणा करने की तात्कालिक जरूरत है ताकि भारत के सनातन तथा अरब के इस्लाम मजहबिता के बीच संत विनोबा विचार पोखर का सेतु निर्माण हो सके और हिन्दुस्तान ‘सबका साथ - सबका विकास’ इस धुरी पर पूरे वेग के साथ चल सके। हिन्दी हृदय प्रदेश इलाहाबाद में जन्मे पढ़े लिखे महानुभाव मार्कण्डेय काटजू इधर काफी सुर्खियों में हैं। उनका कहना है कि उनकी मातृभाषा हिन्दी है पर वे विश्ववातायन के लिये अंग्रेजी भाषा की महत्ता को भारत के विकास की प्राणवायु मानते हैं। सी-सैट के मूलतः अंग्रेजी प्रश्न पत्र को सरकार तथा परीक्षक आधिकारिक मानते हैं। उसका हिन्दी रूपान्तरण ही समस्या का मूल है। प्रोफेसर रघुवीर ने हिन्दी में भाषान्तरण करने के जो तौर-तरीके स्वतंत्रता के पंद्रह वर्षों तक अपनाये आज भाषान्तरण एक मखौल बन कर रह गया है। अंग्रेजी से हिन्दी अथवा इक्कीस भारतीय भाषाओं में किये जाने वाले अनुवाद की कोई समीक्षा ही नहीं करता। उसका पुनर्वाचन नहीं हो पाता नतीजतन उसमें त्रुटियां रहती हैं। अंग्रेजी अथवा भारतीय भाषाओं का अधकचरा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति जो अनुवाद कर रहे हैं उससे देश में भाषायी संकरता ने भाषायी अराजकता को बढ़ावा दिया है। इसलिये जिस तरह अरब देश अरबी के माध्यम से तथा मंदारिन (चीनी भाषा-भाषी) का सामर्थ्यवान् प्रयोग इंटरनेट में होरहा है। डिजिटल इंडिया को भाषायी स्थितप्रज्ञता तथा स्थायित्त्व देने के लिये डिजिटल इंडिया अपना सांख्य कारोबार भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भारतीय भाषाओं के जरिये उन सभी भारतीय भाषा भाषियों को प्रस्तुत करने का संकल्प लें। संस्कृत में तित्तिर शब्द का अर्थ तीतर पक्षी से है। यह पक्षी अत्यंत बलशाली तथा विवेकी होता है। भारतीय उपनिषद साहित्य में एक उपनिषद तैत्तरीय उपनिषद भी है। तैत्तरीय उपनिषद का उपयोग स्वामी विवेकानंद ने भी शिकागोे में किया। क्यों न भारत के ट्वीट करने वाले सभी महानुभावों को तैत्तरीय उपनिषद का भाषान्तरण उनकी चाहत की भाषा में उपलब्ध कराया जाये ताकि उनके द्वारा ट्वीट किये जारहे अपने संदेश या मनोभावना को सटीक रूप से ट्वीट प्राप्तकर्त्ता को प्राप्त हो सके तथा वाणी वैमनस्यता पर कारगर रोक लगाने का राष्ट्रीय प्रयत्न हो। यूरोप की सभी भाषाओं की लिपि रोमन है, यूरोपीय भाषाओं के सभी शब्दों व अक्षरों का उच्चारण यद्यपि रोमन लिपि के 26 अक्षरों से तालमेल नहीं बैठता। उच्चारण की संशयग्रस्तता तो कम्प्यूटर तकनालाजी में तभी दूर की जा सकती है जब कम्प्यूटर विज्ञानी इस बात पर विचार करें कि नागरी लिपि को 51 अक्षर जो लिखा जाता है वही बोला जाता है। यूरोप के देशों ने नागरी व संस्कृत का विरोध न भी हो भारत में संस्कृत व नागरी सहित हिन्दी के थोपे जाने का प्रकरण पूरे वेग के साथ जिन्दा है इसलिये भारतीय वाङ्मय की नागरी सहित नौ लिपियों व फारसी तथा अरबी लिपि जिसका प्रयोग करने वाले लोग भारत में अच्छी खासी संख्या में हैं इसलिये अरबी व फारसी लिपि सहित भारतीय मूल की नागरी, असमी, बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, गुजराती व गुरूमुखी कुल बारह लिपियों में ट्विटर, फेसबुक व संदेश आदान-प्रदान करने के लिये कारगर पद्धति एक तात्कालिक राष्ट्रीय जरूरत है ताकि डिजिटल इंडिया का संकल्प यथार्थ व्यावहारिक संप्रेषण का जरिया बन सके। भाषायी ऊहापोह तथा भाषायी संशयग्रस्तता से छुटकारा पाया जा सके। तुलसी ने रामचरित मानस में कहा - नेति नेति शिव ध्यान न पावा, माया मृग पाछे सो धावा। भारतीय वाङ्मय भारतीय आध्यात्मिकता को इस अंतर्नेति से जोड़ने की जरूरत है। महात्मा गांधी ने जब चर्खे को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया वार्धा में 1935 में उन्हें परमहंस योगा के नये महाराज ने बताया कि चर्खा कातना अंगुलियों का योग मार्ग है। महात्मा ने चर्खे की कताई क्षमता संवर्धन के लिये तब एक लाख रूपये का पुरस्कार रखा। एकम्बरनाथ ने अंबर चर्खा बनाया। डिजिटल दुनिया की पहली जरूरत है उसमें रोमन लिपि के समानांतर संसार की दूसरी लिपियों को भी वैज्ञानिक स्थान मिले। डिजिटल इंडिया के प्रवर्तक सोलहवीं लोकसभा के निर्द्वंद लोकमान्य नेता भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भारतीय कम्प्यूटर वैज्ञानिकों का आह्वान करें कि वे भारतीय वाङ्मय नागरी सहित सभी भारतीय भाषा लिपियों में कम्प्यूटर कीबोर्ड अनुसंधानित कर आने वाले समय में भारतीय संवादशीलता को विश्व में प्रतिष्ठित करने के लिये वैज्ञानिकों का आह्वा करें कि नागरी लिपि व प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत कम्प्यूटर जगत में नया कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं। जो वैज्ञानिक इस प्रवृत्ति के प्रयोग कर सफलता हासिल करें उन्हें भारत सरकार बारह करोड़ रूपये की पुरस्कार राशि का उद्घोष भी करें। 
भाषायी शालीनता का प्रखर स्वरूप अवधी में दीखता है। महाकवि तुलसीदास ने स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा लिखा। इसी अवध भूमि में एक और मेधावी कवि हुए जिनका नाम मलिक मोहम्मद जायसी है, जिन्होंने पद्मावत महाकाव्य फारसी लिपि व अवधी भाषा में लिखा। वे कहते हैं - जायस नगर धरम अस्थानू तहां जाय कवि कीन्ह बखानू। उन्होंने जायस में अपनी काव्य रचना की व एक जगह कहते हैं - विधना के मारग हैं तेते सरग नखत तन रोआं जेते। काशी दश्वाश्वमेध घाट के गंगा लहरी आज भी उतनी तरोताजा है जितनी आगरा शहर में यमुना में सद्यःस्नाता लवंगी का सौंदर्य वर्णन करने बादशाह शाहजहां ने पंडित राज जगन्नाथ को कहा - जगन्नाथ की स्वर लहरी से अत्यंत आह्लादित होकर बादशाह शाहजहां ने पंडित राज से कहा - पंडत जो चाहो मांग लो, मैं बहुत खुश हूँ तुम्हारा छन्द सुनकर। पंडित राज ने कहा - शहंशाह अगर खुश ही हैं तो लवंगी को ही मुझे दे दीजिये। बादशाह वादे का पक्का था। बादशाह ने कहा - पंडत तुम ब्राह्मण हो, क्या तुम्हें मथुरा, हरिद्वार, प्रयाग, द्वारका, कांची पुरी, अयोध्या व काशी के ब्राह्मण स्वीकार करेंगे ? पंडित राज ने कहा - बादशाह सलामत वह मुझ पर छोड़ दीजिये। मुझे यकीन है कि काशी विश्वनाथ मेरा साथ देंगे। पंडित राज ने ब्राह्मणों से कहा - अगर काशी विश्वनाथ कह दें कि जगन्नाथ शुद्ध व पवित्र ब्राह्मण है तो क्या आप लोग मान जायेंगे ? ब्राह्मणों ने पंडित राज की बात मान ली। काशी विश्वनाथ में शिवलिंग पर दो पर्चियां रखी गयीं। पंडित राज शुद्ध है पवित्र है, पंडित राज अपवित्र है। काशी विश्वनाथ ने पंडित राज शुद्ध है उस पर्ची को प्राथमिकता दी। पंडित राज ने गंगा लहरी स्तुति की, बावन श्लोक की गंगा लहरी में। पंडित राज जगन्नाथ की गंगा लहरी स्तुति से गंगा मैया प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने पंडित राज को अपने आगोश में ले लिया। यह दंत कथा नहीं वास्तविक ऐतिहासिकता है। डिजिटल इंडिया भारत के जन जन की आत्मा को छूने वाला, भारत को विश्व मंच में उच्च स्थान देने वाला कर्त्तव्य पथ है। मातृ वत्सल पुत्र कपिल तथा पुत्र वत्सला देवहूति का सांख्य योग संवाद ही हिन्दुस्तान का राजनीतिक आर्थिक औद्योगिक तथा भूख निवारण के कष्ट पथ से छुटकारा देने की क्षमता रखता है।   

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