उत्तराखण्ड त्रासदी - स्थायी समाधान
सीमावर्ती इलाकों को संघ शासित क्षेत्र घोषित करना
सीमावर्ती इलाकों को संघ शासित क्षेत्र घोषित करना
भारत का संपूर्ण क्षेत्रफल 3287263 वर्ग कि.मी. है। राष्ट्र राज्य भारत के प्रमुख घटक राज्यों केन्द्र शासित क्षेत्रों सहित कुल मिला कर पेंतीस घटक हैं जिसमें तिरेपन हजार चार सौ चौरासी वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल वाले उत्तराखंड के सर्वाधिक आबादी वाले जिले हरिद्वार देहरादून व ऊधम सिंह नगर हैं। इन तीनों जिलों का क्षेत्रफल 8503 वर्ग कि.मी. व कुल आबादी 5373956 है। इन तीनों जिलों की आबादी का घनत्व प्रति वर्ग कि.मी. 672 है। आबादी के लिहाज से सबसे कम क्षेत्रफल 2360 वर्ग कि.मी. वाल हरिद्वार की जनसंख्या 1927029 है। इस जिले में आबादी घनत्व प्रति वर्ग कि.मी. 816 है। देहरादून व ऊधम सिंह नगर जनसंख्या घनत्व के मामले में देहरादून में आबादी का घनत्व 550 तथ ऊधम सिंह नगर में 540 है। दूसरी ओर फुटहिल्स से लेकर बर्फानी चोटियों से 75 किलोमीटर नीचे तक उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ तथा चंपावत के 6 जनपद हैं जो चीन व नैपाल के सार्वभौम राष्ट्र राज्यों से अंतर्राष्ट्रीय सीमा वाले इलाके हैं। इनमें आबादी का घनत्व उत्तरकाशी में 41, चमोली में 52, पिथौरागढ़ में 68, चंपावत व रूद्रप्रयाग में क्रमशः 93 व 97 तथा बागेश्वर में सर्वाधिक 150 है। बीच में टिहरी पौड़ी नैनीताल व अल्मोड़ा के चार मध्यवर्ती जिले हैं जिनमें सब का संयुक्त आबादी घनत्व 187 है। अलग अलग जिलों में घनत्व क्रमशः टिहरी में 162, पौड़ी में 129, नैनीताल में 273 तथा अल्मोड़ा में 195 है।
2. जून 2013 में केदारघाटी सहित समूचे उत्तरकाशी चमोली रूद्रप्रयाग (केदारघाटी जिसका एक भाग है) केदारखंड के इन तीन जनपदों तथा मानसखंड के बागेश्वर व पिथौरागढ़ जनपद में जो प्राकृतिक विपदा लगभग चार सौ गांवों में आयी। इस आपदा से उत्तरकाशी चमोली रूद्रप्रयाग बागेश्वर व पिथौरागढ़ की आबादी पहले भी संत्रस्त होती रही है। महाकवि कालिदास जिनका एक मुख्य काव्य ग्रंथ मेघदूत है उसकी शुरूआत ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघ’ से हुई है। गढ़वाल के स्वनामधन्य राजनीतिज्ञ तथा साहित्य सेवी डा. शिवानंद नौटियाल ने गढ़वाल हिमालय को संस्कृत के महान कवि कालिदास की जन्म व कर्मभूमि माना है। छत्तीसगढ़ के रामगिरि पर्वत में खरोष्ट्री लिपि में यक्ष द्वारा अपनी प्रेयसी यक्षिणी को भेजा गया बादलों के मार्फत संदेश अंकित है। आषाढ़ महीने को संस्कृत व ज्योतिष शास्त्र में मिथुनाई भी कहा जाता है। मिथुन संक्रांति आम तौर पर प्रति वर्ष 15 जनवरी को होती है और सौर आषाढ़ महीना 31 या 32 दिन का होता है। आषाढ़ से चौमासा चातुर्मास्य भी शुरू माना जाता है। सन्यसी भिक्षु श्रमण तेरापंथी जैन तथा भारत का यती व वैष्णव समाज चातुर्मास्य एक ही जगह मनाने का संकल्प लेता है। चांद्रमास के अनुसार चौमासा आषाढ़ सुदी एकादशी आषाढ़ी हरिशयनी एकादशी से कार्तिक देवोत्थानी एकादशी तक मनाया जाता है।
3. अल्मोड़ा नाम का सांस्कृतिक नगर विष्णु पुराण स्कंद पुराण के अनुसार कुबेरधानी है। विष्णु पुराण का कथन है - कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्य काषाय पर्वतः। यही काषाय पर्वत वर्तमान में कसार देवी का जंगल भी कहा जाता है। जब विश्रवा ज्येष्ठ पुत्र कुबेर को रावण ने लंका से भगा दिया तो कुबेर ने हिमालय को अपना ठिकाना बनाया। मेघदूत, जब कुबेर और उसके विश्वस्त सहयोगी यक्ष देश निकाले का दंड भोग रहे थे तब यक्ष ने बादलों के मार्फत अपनी विरह व्यथा दिग्दर्शन का जो संदेश अलकापुरी-अल्मोड़ा में पति वियोग पीड़िता याक्षायणी को भेजा था उस प्रसंग का वर्णन करता है। कुमइयां बोली में याक्षायणी को जाखन देवी नाम से जाना जाता है। अल्मोड़ा शहर में जाखन देवी का ऐतिहासिक मंदिर भी है। आषाढ़ मिथुनाई का पहला दिन मिथुन संक्रांति नाम से जाना जाता है। आसमान में बादलों को देख कर आषाढ़ में यहां के परम्परागत निवासी यह मान कर चलते थे कि चौमासा आगया इसलिये बाढ़, भूस्खलन आदि से सुरक्षा करनी होगी। ग्रेगेरियन कैलेंडर के जून महीने की सोलहवीं तारीख भारतीय सौर आषाढ़ मास का दूसरा दिन होता है। इसी दिन ईस्वी 2013 में केदारघाटी के उत्तरकाशी में भागीरथी प्रवाह क्षेत्र चमोली जिले में अलकनंदा व उसकी सहायक नदियों के जलप्लावन ने जो उग्रता दिखायी उसे केवल प्राकृतिक आपदा मानने से समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचा जा सकता है। चाणक्य नेे अपनी नीति दिशा दिग्दर्शन दो श्लोकों के जरिये ‘नदी तीरे च ये वृक्षा’ का नीति दर्शक आख्यान कहा। नदी के किनारे का वृक्ष यह कल्पना नहीं कर सकता कि वह ज्यादा दिन धरती पर खड़ा रह कर स्थावर जीवन का आनंद लूटेगा। उसे तो आज नहीं तो कल बाढ़ पीड़ित होना ही है। नदियों में गिराये जाने वाला सड़कों का मलवा नदी के तट से सट कर बनाये गये एकमंजिला, दोमंजिले अथवा तीनमंजिले मकान भी बाढ़ के दंश से ध्वस्त हो सकते हैं। वर्ष 2010 में भागीरथी की बाढ़ ने उत्तरकाशी के निवासियों की जिन्दगी तबाह कर डाली। लोगों ने नदी के प्रवाह क्षेत्र तक अपने रिहायशी अथवा व्यापारिक उद्देश्य से निर्मित होटल, मोटल, रेस्तराओं को बाढ़ ने बहा डाला। उत्तराखंड सरकार व जन सामान्य ने यदि भूकंप भूजल भूस्खलन तथा बाढ़ व वारणावत प्रकोप से सीख ली होती तो प्राकृतिक आपदा के कुप्रभाव को कम किया जा सकता था पर मनुष्य ने समझ लिया था कि वह ही सामर्थ्यवान हैै। सारी प्रकृति समूचा अंतरिक्ष उसका वशवर्ती है अतः वह जो चाहेगा वह ही होगा। व्यक्ति के स्वार्थ और केवल मैं ही होऊँ मैं ही खाऊँ इस प्रवृत्ति ने क्षितिज के छोर तक मनुष्य की मनमानी वाले आचरण ने उस हिमालय को नाराज कर डाला जिसे योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने महान विभूति बताते हुए कहा था - यक्षों में मैं जय यक्ष तथा स्थावरों में मैं हिमालय हूँ। उन्होंने द्वारका में अपने अत्यंत स्नेही सखा व भृृत्य उद्धव से कहा - उद्धव मैं ही तो घिष्णुओं में मेरू पर्वत शिखर तथा गहन शिलाओं में हिमालय हूँ। उस हिमालय ने लालची मानव को केदारखंड व मानसखंड की उत्तरी भूमि में यह चेतावनी दी कि गिरिराज हिमालय व उसकी कन्याओं तथा उसके स्थावर समाज के साथ ज्यादती करोगे तो अपना ही नुकसान करोगे। अपनी सभ्यता, संस्कृति को कुचल डालोगे तथा अपना जीवन दूभर बना लोगेे। हिन्दुस्तान आजाद हुआ आजादी का सुख भोगने के लिये मोटर सड़कों के निर्माण में पत्थर तोड़ डाइनामाइट के अविवेकशील प्रयोग ने हिमालय की जड़ें हिला दीं। ठीक है सड़क बनायी पर सड़क में दौड़ने वाले वाहनों पर तो लगाम लगनी चाहिये थी। सड़क कितना वजन सहन कर सकती है उसके परिप्रेक्ष्य में वाहनों की भार क्षमता का भी निर्धारण होना चाहिये था जबकि यह ध्यान शुरू से ही न तो विकास पुरूषों ने रखा न ही सरकारों को चलाने वाले लोगों ने ही इसको तवज्जो दी। इसके विपरीत पहाड़ों पर भार ढोने की वाहनों की क्षमता दिन प्रति दिन बढ़ती ही गयी। शुरू के वर्षों में पहाड़ों पर वाहनों की भार क्षमता 35 क्विंटल थी जो कुछ वर्षों बाद बढ़ा कर 55 क्विंटल कर दी गयी। अब तो सारी हदें पार कर वाहन 150 क्विंटल तक भार ढो रहे हैं जो शुरू के वर्षों की तुलना में चौगुनी हो चुकी है। दूसरी तरफ सड़कों का जाल बिछाने की कोशिश में नदी, पहाड़, गांव तथा जंगल की प्राकृतिक आवश्यकताओं को भी किनारे कर दिया गया। हर आदमी चाहने लगा कि उसके गांव तक, उसके घर के दरवाजे तक लोक राजस्व पेटे सड़क का निर्माण हो। बात यहीं पर नहीं रूकी जो जो आदमी पढ़ लिख कर पहाड़ से नीचे उतरा उसने अपनी जननी जन्मभूमि को तिलांजलि दे डाली। व पलायन कर हिन्दुस्तान के शहरों का स्थायी निवासी बन गया। जो दूर नहीं जा सकता था जिसके पास अपेक्षाकृत कम संपदा थी उसने तराई तथा दून घाटी की तरफ बढ़ कर अपने बच्चों की पढ़ाई व अपने परिजनों की सेहत के बहाने पहाड़ के अपने पुश्तैनी गांव से पलायन करके मैदानी इलाकों में बसनेे के पुख्ता इंतजाम कर डाले। विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने, सुविधाओं की चाहत ने, विदेशियों की सुख भोग की नीति का अनुसरण व अनुकरण सहित जीवन के हर क्षेत्र में उनके तौर तरीकों को अपना कर लोगों ने बिना यह देखे कि अपने लिये क्या ठीक है क्या गलत, मनमाने तरीके को रहन सहन अपनाने से स्वयं ही अपने लिये ऐसे हालात पैदा कर दिये कि जिन्होंने माह जून 2013 के तीसरे सप्ताह में हुए जलप्लावन का रूप धारण कर उत्तराखंड के आबाल वृद्ध सभी नर नारियों सहित उनकी भू भवन संपदा को भी नेस्तनाबूद कर पूरे देश को हतप्रभ कर डाला।
4. शिक्षाविद डाक्टर संपूर्णानंद जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे वर्ष 1959 में तिब्बती समाज के धर्मगुरू दलाइ्र लामा के तिब्बत से पलायन कर भारत आने पर भारत की केन्द्रीय संघ सरकार ने तत्कालीन उ.प्र. सरकार को सुझाया कि टिहरी, पौड़ी व अल्मोड़ा जिलों का विभाजन कर उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ के तीन सीमावर्ती जिले गठित किये जायें। इन तीन जिलों का सृजन सन् 1960 में हुआ तथा उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ की सीमावर्ती जगहों पर संघ सरकार व उ.प्र. सरकार का ध्यान आकर्षित हुआ। चीन व भारत के बीच सीमा के क्षेत्रों में अशांति का वातावरण, भारत द्वारा तिब्बत के स्वतंत्र व सांस्कृतिक भू मंडल को चीन द्वारा अपने गणराज्य का हिस्सा मानने के कारण अत्यंत शांत हिमालयी क्षेत्र एक अत्यंत अशांत क्षेत्र बन गया। मध्य हिमालय के हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड के भारतीय संघ के घटक राज्यों की सीमा उत्तर में चीनी गणराज्य तथा उत्तराखंड के संदर्भ में पूर्व में हिमालयी हिन्दू राज्य से हिमालयी गणतंत्र नैपाल के रूप में उभरे माओवाद प्रभावित नैपाल के परम्परागत राजतंत्र से लोकतंत्र की तरफ बढ़ते हुए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण नये नैपाल के उद्भव से हुआ जहां अभी भी गणतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हो पायी हैं। इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में अशांत नैपाल शताब्दी के दूसरे दशक के शुरूआती तीन वर्ष में भी संविधान सभा के चुनाव स्थायी संविधान निर्माण की प्रक्रिया में ही उलझा हुआ राष्ट्र राज्य है। नैपाल की राजनीतिक अशांति का प्रभाव उत्तराखंड के कुमांऊँ मंडल पर पड़ना स्वाभाविक, भौगोलिक तथा भू भौगोलिक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है इसलिये मध्यवर्ती हिमालय जिसमें केदारखंड व मानसखंड के पार्वत्य क्षेत्र हैं तथा जिसके पश्चिम में पश्चिमी हिमालय के जलंधरखंड व कश्मीरखंड हैं। इस आलेख का आलोच्य विषय केवल मानसखंड व केदारखंड के दो हिमालयी उप क्षेत्र हैं जो तिब्बत-भारत सीमा के नयी दिल्ली से अत्यंत नजदीकी हिमालयी शिखर हैं। दिल्ली से कैलास मानसरोवर यात्रा पहले भी होती थी आज भी होरही है। सन् 1931 में मानसरोवर यात्रा संपन्न करने वाले दो समूहों की बात यहां पर प्रस्तुत की जारही है। पहला समूह था मैसूर के हिन्दू राजा महाराज चामराज वाडियार व उनकी महारानी शिवानी तथा उनके साथ गया सन्यासी समूह जिन्होंने अल्मोड़ा से 26 जून 1931 को कैलास मानसरोवर यात्रा की शुरूआत की और अस्कोट, नारायण आश्रम, कालापानी तथा लिपुलेख दर्रे से होकर तकलाकोट के रास्ते से यात्रा संपन्न की। दूसरी तरफ 1905 में सौराष्ट्र गुजरात के राजकोट में जन्मे शांतिलाल त्रिवेदी ने एक नौजवान व महात्मा गांधी के अनुयायी के तौर पर सव्य कैलास मानसरोवर यात्रा संपन्न की। शांतिलाल त्रिवेदी की कैलास मानसरोवर की सव्य यात्रा का श्रेय स्वातंत्र्यवीर दुर्गा सिंह रावत की धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी रावत को जाता है जिन्होंने शांतिलाल त्रिवेदी को झलतोला टी इस्टेट में कहा - ब्राह्मण देवता आप सौराष्ट्र से आये हो जहां भारत का पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ है। आप लिपुलेख होकर कैलास मानसरोवर यात्रा में जाने के बजाय हिन्दुस्तान के आखिरी गांव मिलम होकर कुगरी बिगरी दर्रा पार कर पहले कैलास की परिक्रमा करो फिर मानसरोवर व राकसताल जाओ। तुलसी ने त्रिवेदी को यह भी कहा - आपके साथ मेरे पति पंडित नैन सिंह के पौत्र तथा किशन सिंह रावत के पुत्र श्री दुर्गा सिंह रावत स्वतंत्रता सेनानी अपने सहयोगियों मर्तोलिया व दूसरे भोट वासियों के साथ चलेंगे। दुर्गा सिंह के दादा पंडित नैन सिंह एडवर्ड ऐटकिन्सन के सलाहकार व दायें हाथ थे जिनकी मदद से ऐटकिन्सन ने कुमांऊँ गजेटियर लिखा। शांतिलाल त्रिवेदी ने 1929 व 1930 में जब महात्मा गांधी कुमांऊँ में आये थे उनसे आज्ञा लेकर ही कैलास मानसरोवर यात्रा का संकल्प लिया। शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा कैलास मानसरोवर की 75 दिनों की यात्रा का सजीव वर्णन उत्कृष्ट मानवीय धरोहर है। यह यात्रा शांतिलाल के साथ मुंबई के सेठ तुलसीराम भाटिया ने भी संपन्न की थी।
5. अविभाजित उत्तर प्रदेश के स्वातंत्र्योत्तर शासकों में डा. संपूर्णानंद व लौह पुरूष चन्द्रभानु गुप्त ने उत्तराखंड के लिये हिमालय निष्ठा का परिचय दिया था। डा. संपूर्णानंद ने उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ जनपदों का सृजन कर उ.प्र. के धुर उत्तरी सीमा क्षेत्र के अठाईस विकास खंड - उत्तरकाशी जनपद के चार विकास खंड भटवाड़ी, डुंडा, नौगांव और पुरोला, चमोली जनपद के छः विकास खंड पोखरी, चमोली, कर्णप्रयाग, गैरसैंण, थराली व जोशीमठ, रूद्रप्रयाग के तीन विकास खंड जखोली, अगस्त्य मुनि व ऊखीमठ, बागेश्वर के तीन विकास खंड कपकोट, गरूड़ व बागेश्वर, पिथौरागढ़ के आठ विकास खंड विण, मूनाकोट, धारचूला, डीडीहाट, कनालीछीना, मुनस्यारी, बेरीनाग व गंगोलीहाट, चंपावत के चार विकास खंड चंपावत, पाटी, बाराकोट व लोहाघाट कुल मिला कर अठाईस विकास खंड ऐसे हैं जो सीमावर्ती क्षेत्रों वाले हैं। लौहपुरूष चंद्रभानु गुप्त ने अपने शासन काल में उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्रालय सृजित कर धुर सीमावर्ती क्षेत्रों व पूर्णतः पर्वतीय प्रकृति के इलाकों के विकास को प्राथमिकता दी थी। गढ़वाल हिमालय के पर्वतपुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा ने एक ही काम किया मेरठ कमिश्नरी से देहरादून जिले को अलग करके देहरादून की दून घाटी को गढ़वाल हिमालय का एक जिला बना दिया। उनके शासन काल में देहरादून की श्री वृद्धि हुई। जब बहुगुणा श्रीमती इंदिरा गांधी की नजरों में गिर गये उ.प्र. शासन की बागडोर विकास पुरूष नारायण दत्त तिवारी के हाथ आगयी। उन्होंने अपने शासन काल में नैनीताल की तराई को ही उत्तराखंड मान कर अपनी समूची विकास क्षमता को तराई में रमा डाला। यहां तक कि जब उन्हें दोबारा उत्तराखंड का राज्य करने का सौभाग्य 2002 में उपलब्ध हुआ। चार बार उ.प्र. के मुख्यमंत्री रह कर वे तराई के लिये जो नहीं कर पाये वह सिडकुल का गठन कर 2002 से 2007 तक के पांच वर्षों में संपन्न कर डाला। उ.प्र. का एक हिस्सा रहने के दर्मियान हो या नवंबर 2000 में उत्तराखंड राज्य सृजन के बाद के पिछले तेरह वर्षों में उत्तराखंड के राजनीतिक नेतृत्व ने केवल दून घाटी व नैनीताल की तराई का ही चेहरा बदला है। सुदूर पर्वतीय इलाकों के अठाईस विकास खंड केवल आपदाग्रस्त क्षेत्र बने रहने को अभिशप्त हैं। उत्तराखंड सृजन के पिछले तेरह वर्षों में उत्तराखंड में राजनेताओं ने सात बार सत्ता सूत्र संभाला। इन में सबसे ज्यादा समय विकास पुरूष तिवारी जी ने पूरे पांच वर्ष राज्य किया। उनके पश्चात पिछले वर्ष 2012 के शुरूआती महीनों से पिछले बीस महीनों से श्री विजय बहुगुणा उत्तराखंड पर राज कर रहे हैं। उनके शासन काल में महान प्राकृतिक व मानवकृत आपदा आयी। वे प्रयत्नशील तो जरूर हैं पर उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता ने उत्तराखंड के पर्वतीय ऊबड़ खाबड़ जमीन को उसके जंगलों व जलागम स्वभाव को राजनीतिक नासमझी के कारण बद से बदतर बना डाला है। वर्तमान उत्तराखंड शासन सुगम व दुर्गम के चक्रव्यूह का कारक बन कर उत्तराखंड की उस जनता जनार्दन को अभिमन्यु की तरह घेर डाला है। पहाड़ों के वे गांव जो शांत हिमालयी वादियां थीं जहां कैलास मानसरोवर सहित बदरी केदार गंगोत्री यमुनोत्री की यात्रा पर आये कुछ लोग अपने परिवार सहित स्थायी तौर पर बस गये। वे हिमालय के ही हो गये चाहे वे केरल, कर्णाटक, द्रविड़ देश, आंध्र, महाराष्ट्र, गुर्जर देश, अंगबंग, कलिंग कहीं से भी गंगा नहाने हरिद्वार गये तो पहाड़ों की शांति देख वहीें के बन गये। वे उनके वंशज आज ऊहापोह वाली विकास की अंधी दौड़ में रम गये हैं। राजनयिक कूटनीतिक तथा सामरिक महत्व वाले उत्तरकाशी जनपद को बहुगुणा सरकार पिछड़ा क्षेत्र घोषित कर चुकी है। उत्तरकाशी की तरह चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के लोग भी विजय बहुगुणा जी की ओर आस लगाये बैठे हैं कि ये जिले भी पिछड़े इलाके घोषित किये जायेंगे। पिछड़ा इलाका घोषित करने मात्र से सीमावर्ती उत्तराखंड का केदारखंड व मानसखंड इलाका याने उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के इलाके देहरादून से संचालित होने वाली सरकार के कारनामों से उपेक्षित ही रहने वाले हैं। देहरादून से पिछले तेरह वर्षों से उत्तराखंड का शासन सूत्रधार सरकार इन सीमावर्ती इलाकों से अपना सापेक्ष सरोकार कायम रखने के लिये उड़न खटोलों पर निर्भर है। इसलिये जरूरत इस बात की है कि स्थावर हिमालय की राजनयिक कूटनीतिक सामरिक तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिकता के नजरिये से भारत सरकार द्वारा 1949 में जो भूल हुई है तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने की राजनीतिक त्रुटि को दुरूस्त करने के रास्ते का एक छोटा सा उपाय - उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत इन छः सीमावती्र जनपदों के 28 विकास खंड जिन्हें भारतीय संविधान के 73वें व 74वें संशोधन के अनुसार त्रिस्तरीय पंचायत राज में क्षेत्र पंचायत या तालुका पंचायत का दर्जा दिया गया है इन अठाईस क्षेत्र पंचायतों को संघ शासित क्षेत्र घोषित किया जाये। उत्तराखंड राज्य के शेष सात जनपद टेहरी, पौढ़ी, देहरादून, अल्मोड़ा, नैनीताल, हरिद्वार व ऊधम सिंह नगर वर्तमान उत्तराखंड राज्य के हिस्से बने रहें। वर्तमान उत्तराखंड के धुर उत्तरी व उत्तरपूर्वी चीन व नैपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से सटे इलाकों को गढ़वाल क्षेत्र में केदारखंड व कुमांऊँ क्षेत्र में मानसखंड नाम से दो संघ शासित क्षेत्र घोषित कर उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के अठाईस विकास खंडों की शासन प्रबंध व्यवस्था संघ शासित क्षेत्रों के तौर पर संचालित हो तभी इस हिमालयी राज्य के उत्तरी इलाकों को भारतीयता का, भारतीय क्षेत्र होने का अहसास हो सकेगा। गरीब और अमीर के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जारही है इसलिये समाज का वह तबका जो विकास का तात्कालिक लाभार्जन लेने में असमर्थ है उसको राष्ट्र राज्य के व्यापक हितार्थ प्राथमिकता देनी जरूरी है। लोकतंत्र में संख्या बल ही सबसे बड़ा कारक है। उत्तराखंड की त्रासदी यह है कि पूरे क्षेत्रफल का लगभग आठवां हिस्सा आबादी के आधा से ज्यादा लोगों का आशियाना है। यह भूमि खंड जिसमें हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर व देहरादून के तीन जिले आते हैं यहां लगभग चौवन लाख लोग रहते हैं। उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत में भू क्षेत्रफल उत्तराखंड पूरे इलाके के क्षेत्रफल के आधे से ज्यादा क्षेत्रफल है पर अठाईस हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में जनसंख्या उत्तराखंड की पूरी जनसंख्या लगभग एक करोड़ लोगों का मात्र छठा हिस्सा है। यह इलाका दुर्गम है। सड़कें जहां जहां बनी हैं या बन रही हैं मरम्मत होरही है वह हर वर्षा में टूटती रहती है। आवागमन दुष्कर है। देहरादून में रह कर शासन करने वाली सरकार के मुखिया व उनके सहयोगियों को गांव गांव पहुंचने में दिक्कतें आती हैं। छोटी छोटी बातों के लिये राजकर्ता लोग उड़न खटोले से ही हवाई सर्वे करते हैं। जमीन से उनका वास्ता धीरे धीरे घटता जारहा है इसलिये 28 विकास खंड अथवा क्षेत्र पंचायतों वाले छः सीमावर्ती जनपदों के लिये सुशासन का एकमात्र उपाय यही है कि उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत मौजूदा संघ घटक उत्तराखंड से अलग कर केदारखंड व मानसखंड नाम से दो संघ शासित क्षेत्र सृजित किये जायें तथा वर्तमान उत्तराखंड का कार्यक्षेत्र टेहरी, पौढ़ी, अल्मोड़ा व नैनीताल के चार पर्वतीय जिलों व हरिद्वार, देहरादून व ऊधम सिंह नगर के तराई व दून घाटी के जिलों तक समेट दिया जाये। उत्तराखंड में जितनी भी सरकारें 2000 नवंबर के पश्चात अस्तित्व में आयीं उन सभी को देहरादून को ही राजधानी बनाये रखना पसंद है इसलिये दून घाटी से ही वे उत्तराखंड की राज्य पताका संचालित करते रहें। भारत की सीमाओं की चौकस व्यवस्था रखने के लिये मध्य हिमालय के केदारखंड व मानसखंड को निर्जन बनने से बचाने के लिये भारत सरकार संघ शासित क्षेत्र संबंधी निर्णय लेकर सीमा पर बसने वाले लोगों को अतिरिक्त सुविधायें मुहैया कराये। उत्तर प्रदेश से काट कर बनाया नव सृजित उत्तराखंड राज्य को पूर्व में भारतीय वित्त मंत्री के सलाहकार रहे नव नियुक्त गवर्नर भारतीय रिजर्व बैंक ने जो अध्ययन मीमांसा भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को सौंपी उसके अनुसार उत्तराखंड पिछड़े राज्य श्रंखला में नहीं आता। रघुराज की सम्मति में उत्तराखंड विकास की दौड़ में अपने पितृ राज्य उ.प्र. से काफी आगे है इसलिये उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा उत्तरकाशी जनपद को पिछड़ा इलाका घोषित करना तथा उत्तरकाशी सरीखे अन्य पांच जनपद चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत को बैकवर्ड क्षेत्र घोषित करने की स्थानीय मांग व उत्तराखंड सरकार की बैकवर्ड रीजन मानने की तैयारी वैसी ही उपहासास्पद है जैसी कि जौनसार बाबर को ट्राईबल एरिया तथा पिथौरागढ़ जनपद की मुनस्यारी व धारचूला तहसीलों केा ट्रायबल बेल्ट वाली घोषणायें या उन पर पूर्ण अथवा आंशिक अमल से उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत की 28 क्षेत्र पंचायतों एवं इन जिलों की सत्रह लाख आबादी को अगर पलायन होने से बचाना है इस समूचे भू भाग को यदि भारत सरकार निर्जन क्षेत्र होने से रोकना चाहती है तो तात्कालिक जरूरत इन अठाईस विकास खंडों को यथाशीघ्र केदारखंड व मानसखंड के दो संघ शासित क्षेत्रों में तब्दील करना ही होगा। देहरादून से संचालित नवगठित भारतीय संघ की घटक सरकार का कार्य क्षेत्र टेहरी, पौढ़ी, अल्मोड़ा व नैनीताल के पूर्ण व आंशिक पर्वतीय क्षेत्रों सहित हरिद्वार, देहरादून व ऊधम सिंह नगर के सात जनपदों तक ही सीमित करना होगा। सामरिक व अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक स्तर पर तभी भारत मेरू, सुमेरू शिखर से घोषित कर सकेगा कि हिमालय भारत का अंतरंग अंग है।
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