Thursday, 2 April 2015

इकला सुप्रीमो नहीं साझेदारी वाले बारी बारी सात सुप्रीमो खोजो

  सुप्रीमो अंग्रेजी भाषा का व्यक्ति विशेष को अलंकृत करने वाला चमत्कारिक शब्द है। अंग्रेजी कोशकार सुप्रीमो की व्याख्या करते हुए अभिव्यक्ति देते हैं कि सुप्रीमो ऐसी शख्सियत है "A person in overall authority" याने हिन्दुस्तानी लहजे में हम सुप्रीमो से तात्पर्य समझ सकते हैं जिसके बारे में हिन्दी भाषियों में एक कहावत है ‘‘स्वर्गे इन्द्रः पाताले बलिः भू लोके अहम्’’ दूसरे शब्दों में कहें तो सुप्रीमो एक ऐसी विशेष शख्सियत है जिसके बारे में यह भी सोचा जा सकता है कि ऐसा व्यक्तित्त्व जिसकी दृष्टिपथ का समूचा आकाशपथ ‘‘दृष्टि जाती है जहां तक है वहां तक राज मेरा’’। ध्वनि विज्ञान के ज्ञाताओं ने ध्वन्यालोक के माध्यम से कहा - भिन्न रूचिर्हि लोकः। इस सृष्टि में व्यक्ति व्यक्ति में विचार भिन्नता नैसर्गिक तत्व है। आधुनिक भारतीय राजनीतिक संदर्भ में - ऐसा व्यक्तित्त्व जिसकी मजबूत पकड़ अपने मानवीय परिवेश में हो। निर्णायक शक्ति का ऐसा अजस्त्र स्त्रोत का एक दुर्लभ उदाहरण शिव सेना प्रवर्तक बाला साहब ठाकरे का है जिनके प्रातःस्मरणीय पिता स्वयं मराठी भाषा में उत्कृष्ट प्रबोधनकार थे। बाला साहब ठाकरे में योगेश्वर वासुदेेव श्रीकृष्ण सरीखी अन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का अद्भुत संगम था। श्रीकृष्ण को गुजरात में रणछोड़ महाराज माना जाता है। वे निरायुध राज न करने वाले राजनीति विद् थे। उनकी षडविधा राजनीति का प्रभाव पुष्टिमार्गी भक्ति के जरिये बाला साहब ठाकरे में प्रत्यक्ष दिखता था। बाला साहब को भी मीडिया के लोग सुप्रीमो कह कर ही पुकारते थे। उन्हें राज सिंहासन का लोभ नहीं था। ‘लोभ ही तो पाप का बाप है’, अगर व्यक्ति निर्लोभी होगा तो उसे छकाना मुश्किल होगा। बाला साहब ठाकरे ने अपने अद्वितीय शक्ति संपातकारी सामना के संपादकीय उद्घोष से भारतीय राजनीति के पुरोेधाओं को सत्ता के गलियारों का नचनिया बना डाला। तुलसी ने कहा था - सबहीं नचावत राम गुसाईं नर नाचत मरकट की नाईं। भक्ति जन्मी तो थी द्रविड़ देश तमिलनाडु में किन्तु बचपन बीता कर्णाटक के संगीत में जवानी में महाराष्ट्र पहुंची वहां उस के ज्ञान व वैराग्य दो बेटे भी होगये। भक्ति का पुष्टिपथ महाराष्ट्र ही है। बाला साहब ठाकरे ने पुष्टिमार्गी भक्ति का अजस्त्र स्त्रोत सह्याद्रि में त्र्यम्बक से सप्त गोदावरी पर्यंत वेगवान बनाया। इस ब्लागर की मुलाकात बाला साहब ठाकरे से उनके महाराष्ट्र आंदोलन के उत्तरार्ध में मुंबई में हुई। यह घटना 1967 की है। हिन्दी भाषियों के साप्ताहिक उत्तर दर्शन ने अपने संपादकीयों में बाला साहब ठाकरे के अभियान की भूरि भूरि प्रशंसा की। भारतीय राजनीति के आधुनिक पर्व में सुप्रीमो वाले दो दर्जन से ज्यादा प्रकरण हैं। यहां केवल उन्हीं प्रसंगों को अभिव्यक्ति दिये जाने का प्रयास किया जारहा है जिन सुप्रीमो महानुभावों ने भारतीय राजनीतिक क्रीड़ा में अपने लिये निश्चित जगह खोजी, स्वयं अपने परिजन जाति संबंधियों तथा मित्रों को भी सुप्रीमो प्रभा मंडल से असाधारण रूप से प्रभावित किया। 
द्रविड़ राजनीति से सर्वोदय नेतृत्व-शक्ति सत्ता पुंज विनोबा के कथन के मुताबिक पुत्रात् इच्छेत पराजयम् शिष्यात इच्छेत पराजयम्। युद्ध में हार-जीत स्वाभाविक परिणाम है परंतु लोक जीवन में हार जिससे हो हार ही होनी है तो हार बेटे से मिले शिष्य से मिले यह भारतीय दर्शन का उत्तुंग शिखर है। आपका पुत्र आपसे आगे बढ़ जाये आपका शिष्य अपनी ज्ञान गरिमा को चार चांद लगा कर आपका भी नाम ऊँचा करे। ‘गुरू गुड़ ही रह गये चेला बन गये शक्कर’ कहावत चरितार्थ हो। रामस्वामी पेरियार के द्रविड़ दर्शन को सी.एन. अन्नादुराई ने वेगवान बनाया। नतीजा यह हुआ कि कामराज नाडार के राजनीतिक दृश्यपटल से ओझल होने से पहले हीे हिन्दी विरोधी मुहिम द्रविड़ जाग्रति का डंका बजा पिछले पांच दशकों से तमिलनाडु में कालग्नार एम. करूणानिधि द्रविड़ राजनीति के महानायक रहे हैं। कांग्रेस के अधोपतन से विपक्ष का माद्दा भी फिल्म जगत से राजनीतिक पटल में उभरे एम.जी. रामचंद्रन और उनकी शिष्या जयललिता जयराम ने मूल तमिल भाषी न होने के बावजूद फिल्मी शैली में करूणानिधि से लोहा लिया आज वहां द्रविड़ राजनीति के दो शिखर हैं। एक राज करता है तो दूसरा विरोध में बैठता है। मजेदार घटना यह हुई कि मूलतः तमिल भाषी सुब्रह्मण्यम स्वामी ने जयललिता को घोषित आय से अधिक मूल्य की संपदा धारक होने के कारण कानून के दायरे में लोकप्रतिनिधित्व के लिये अयोग्य घोषित किया गया है। जयललिता से पूर्व एक अन्य राजनीतिक सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की संसद सदस्यता समाप्त की जा चुकी है। जयललिता द्वितीय सुप्रीमो हैं जिन्हें लोकप्रतिनिधित्व के अयोग्यता का पात्र निर्धारित समय सीमा के लिये निर्णीत किया गया है। सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे विरोधियों से अन्य अनेकानेक सुप्रीमो व्यक्तित्त्वों को जूझना पड़ा तो संभव है देश के पचास फीसदी राजन्य सुप्रीमो अयोग्यता के कगार पर खड़े नजर आ सकते हैं। अयोग्यता पात्रता पंक्ति में जननेता मुलायम सिंह यादव तथा बसपा प्रमुख मायावती भी हैं। बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि जिन लोगों ने उनकी राजनीतिक सत्ता को डांवाडोल करने का संकल्प लिया है उनकी वह ताकत जो उद्धव से वासुदेव श्रीकृष्ण ने कही थी - ‘सर्वम् न्यायाम् युक्तिमत्वाद् विदुषाम् किं अशोभनम्’। तुलसीदास जी ने महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की इस उक्ति को अवधि में रामचरित गाते हुए कहा - समरथ को नहिं दोष गुसाईं कह कर अभिव्यक्ति दी। श्रीकृष्ण ने उद्धव के सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि जिस व्यक्ति में तार्किक शक्ति होती है वह अपनी वाणी के बल पर अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था - अपने उद्देश्य की साधन शुद्धि पूर्वक प्राप्त करने के लिये वे धूर्तता को भी ग्राह्य मानते हैं। शर्त इतनी ही कि धूर्त आचरण से सामाजिक हितवर्धन तो हो पर किसी प्राणी को कष्ट न दिया जाये। 
  निर्गुण मार्गी भक्त कबीर ने अपनी साखी में कहा - भगती उपजी द्रविड़ देस’ भक्ति की ही तरह भारतीय राजनीति में सर्वशक्तिमान सुप्रीमो का उद्भव भी द्रविड़ देस की ही विशेषता है। यहीं से सुप्रीमो शक्ति का संपात कालग्नार करूणानिधि व उनकी वैरिणी जयललिता के उत्कर्ष और पतन की गाथा गायी गयी है। कर्णाटक में सुप्रीमो शैली के रामकृष्ण हेगड़े सरीखे समर्थ राजनीतिज्ञ को लंगड़ी मार कर देवगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री बन गये। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग संयुक्त प्रांत अवध व आगरा जिसे अब हम उत्तर प्रदेश नाम से पुकारते हैं वहां - काशी प्रांत, अवध प्रांत, ब्रज प्रांत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रवृत्तियों का क्षेत्र भाग किया गया है। ब्रज प्रांत - ब्रज के चौरासी गांवों के अलावा पार्श्ववर्ती इटावा तक पहुंचता है। ब्रज भाषा के भक्त कवि रसखान का कहना था सेस महेश सुरेश दिनेश जाहि अनादि अनंत बतावें ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचावें, वृन्दावन की रासलीला का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। ब्रज प्रांत अहीरों व गुर्जरों की मढ़ैया है। राजा माांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठ कर मंडल कमीशन की संस्तुतियां लागू करने का ऐलान किया। मंडल कमीशन के सर्वोच्च लाभार्थी सेफई के भूमिपुत्र मुलायम सिंह यादव और बिहारी गोप समाज के मुखिया लालू प्रसाद यादव हैं। ये दोनों महाशय पिछले पच्चीस वर्षों से भारतीय राजनीतिक अंतरिक्ष के चमकदार सुप्रीमो हैं। न्यायपालिका द्वारा दंडित होनेे के बावजूद लालू प्रसाद अभी जोश खरोश में हैं जिससे उन्होंने बिहार व केन्द्र सरकार में अपनी धाक जमाई। न्यायालय द्वारा दंडित होने के बावजूद उनका हौसला बुलंद है। उनकी कन्या का वैवाहिक संबंध मुलायम सिंह यादव की अंतरंग पट्टीदारी में होने के पश्चात उन्हें लगता है कि वे मंडल कमीशन के तत्काल पश्चात वाले जनता दल में फिर एका मुलायम सिंह यादव की सदारत में करा सकते हैं। मुलायम सिंह यादव समाजवादी चिंतक, विचारक तथा वैयक्तिक जीवन में गांधी की सादगी के उपासक राममनोहर लोहिया की राजनीतिक दक्षता से उपजे हैं। डाक्टर लोहिया के अंतरंग सहयोगियों में भदौरिया इटावा से आते थे यद्यपि डाक्टर लोहिया के वैयक्तिक सामीप्य के सीधे लाभार्थी मुलायम सिंह नहीं रहे। मुलायम सिंह का अभ्युदय उत्तर लोहिया युग की उपज है। इटावा में जो लोग डाक्टर लोहिया के नजदीकी संपर्क वाले थे उनका राजनैतिक असर अध्यापक मुलायम सिंह यादव पर पड़ा। चौधरी चरण सिंह तथा हेमवती नंदन बहुगुणा मुलायम सिंह की जमीनी पहुंच तथा लोकसंपर्क से अवगत थे। दूसरे नेताओं के बजाय मुलायम सिंह की कार्य शैली पर चौधरी चरण सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा की राजनीतिक सूझबूझ का असर रहा है। चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गये, हेमवती नंदन बहुगुणा भी राजनीतिक योग्यता के शीर्ष पुरूष थे वे अटक गये। मुलायम सिंह यादव की मनोकामना थी कि वे भारत के प्रधानमंत्री बनें पर राजनीतिक परिदृश्य में प्रत्युपन्नमति वाले महात्मा गांधी की शैली की राजनीति को बढ़ावा देने वाले गुजराती भाषी भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भारतीय राजनीति की सुप्रीमो शैली पर अपने नैतिक बल से जबर्दस्त रोक लगा दी है। सुप्रीमो पद्धति के तीन उदाहरण दिल्ली के उत्तर पश्चिम में हैं जिनमें पहला शिरोमणि अकाली दल के शीर्ष पुरूष प्रकाश सिंह बादल, उनके पुत्र उप मुख्यमंत्री जूनियर बादल, खानदानी राजतंत्र वाला यह सुप्रीमो शिव सेना की तरह भाजपा का राजग सहयोगी भी है। जम्मू कश्मीर लेह लद्दाख के इलाके भारत की उत्तरी सीमा पर हैं। कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल है, जम्मू हिन्दू बहुल, लेह लद्दाख बौद्ध बहुल। कश्मीर से पंडितों की घाटी से निकासी के पश्चात वहां तीन चार सुप्रीमो मुस्लिम समाज में ही हैं। पहला स्थान शेख अब्दुल्ला डा. फारूख अब्दुल्ला तथा पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के कुटंब राज की सुप्रीमो धरोहर जो जम्मू कश्मीर के हिन्दू राजा राजा हरि सिंह के भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त करने के पश्चात विभाजनगत अनिश्चितता समाप्त तो होगयी परंतु कालांतर में शेख अब्दुल्ला के कुटंब राज के समानांतर मुफ्ती सईद का वैकल्पिक शासन मंतव्य इन दो सुप्रीमों के अलावा पृथकतावादी (सेपरेटियेट समूह) पाकिस्तान से कश्मीर को जोड़ने वाला समूह सब मिला कर घाटी में 1. अब्दुल्ला 2. मुफ्ती 3. गिलानी ये तीन सुप्रीमो अपने अपने तरीके से कार्यशील थे। जम्मू कश्मीर विधानसभा के निर्वाचन से घाटी में पीडीपी तथा जम्मू में भारतीय जनता पार्टी विजयी दल के रूप में उभरे। राजनीति में विरोधी दल के साथ भी संधि से नया मोड़ लाया जा सकता है। घाटी के समर्थ सुप्रीमो ने बीजेपी के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सरकार गठित कर ली। मतभेद और निर्णय साथ साथ चल रहे हैं। दोनों देख रहे हैं कि अंततोगत्वा पीडीपी सुप्रीमो कितना स्वयं झुकने को तैयार हैं और किस हद तक जम्मू में बहुमत प्राप्त भारतीय जनता पार्टी को अपनी शर्त्तें मनवाने के लिये तैयार कर पाती है। चौधरी देवीलाल का खानदान हरियाणा सुप्रीमो बनने की पूरी तैयारी में था। ओमप्रकाश चौटाला उनके बेटे अजय चौटाला हाथ पैर पटक रहे हैं परंतु लालू प्रसाद यादव व जयललिता की पंगत में खड़े हैं। फर्क इतना ही है कि सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव व जयललिता जेल से बाहर हैं और खुली हवा का सेवन कर रहे हैं पर ओमप्रकाश चौटाला व उनके पुत्र अभी कारागार में ही हैं। ये तीनों सुप्रीमो ही हैं। मास्टर तारा सिंह को कांग्रेस नेतृत्व ने अकाली राजनीति में अनेक उठापटक देखे हैं। उन्होंने वार्ताओं का लंबा सिलसिला रखा। भारत विभाजन में बर्तानिया ने सिखों को अलग पंगत में खड़ा नहीं किया। पंजाब तथा अकाल तख्त की राजनीतिक डगर को संचालित करने में प्रताप सिंह कैरो, सरदार दरबारा सिंह, ज्ञानी जैल सिंह तथा बूटा सिंह के अलावा पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में सरदार स्वर्ण सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका केन्द्रीय राजनीति में थी। दूसरी ओर अकाल तख्त का हुक्मनामा चलता था। प्रकाश सिंह बादल व उनके पुत्र पूरे पंजाब पर शिरोमणि अकाली दल पर ही आंशिक सुप्रीमो तत्व हैं। आजादी के शुरूआती पंद्रह वर्षों याने सन 1962 तक पंडित नेेहरू के लोकतांत्रिक मानस और स्वतंत्रता संग्राम अवधि की सामाजिक नैतिकता की श्वास प्रक्रिया लगभग दुरूस्त थी। चीन के द्वारा भारत पर आक्रमण किये जाने पर पंडित नेेहरू का भी मोह भंग हुआ। वे वृद्ध भी होगये थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और गोविन्द वल्लभ पंत सरीखे नेता राजनीतिक दृश्य पटल से ओझल होगये थे। परिदृश्य में जवाहरलाल नेहरू के स्तर का कोेई नेता शेष नहीं रह गया था। मौलाना आजाद व पंडित पंत के मंत्रिमंडल में रहने तक पंडित नेहरू उनकी राय को नकारने की स्थिति में नहीं थे। उनकी राजनीतिक कर्मभूमि उत्तर प्रदेश थी जहां चंद्रभानु गुप्त सरीखे जनता के बीच काम करने वाले नेताओं की अनदेखी करता कामराज प्लान को लागू करना पंडित नेहरू के अंतिम दिनों में कांग्रेस को लंगड़ा करने में सहायक सिद्ध हुआ। केवल तमिलनाडु में ही कांग्रेस बेपेंदी का लोटा नहीं बनी। उत्तर प्रदेश में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस छिन्न भिन्न राजनीतिक संगठन बन गया। परिणाम स्वरूप तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश जैसे स्थापित राज्यों में कांग्रेस लड़खड़ा गयी। अंततोगत्वा कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी रायबरेली व अमेठी से स्वयं और अपने इकलौते पुत्र को ही लोकसभा में भेज सकी। श्रीमती सोनिया गांधी की स्थिति भी सुप्रीमो संस्कृति से प्रभावित है। वे भी अन्य सुप्रीमोओं की ही तरह एक सौ तीस साल पुरानी राजनीतिक दल का संचालन कर रही हैं। सुप्रीमो नुमा यह राजनीति हाराकेरी गतिविधि में सुश्री ममता बनर्जी, श्री नवीन पटनायक भी जुड़ गये हैं। नया नवेला उदाहरण दिल्ली विधानसभा की सतसठ सीटों पर कुल पड़े मतों का चौवन प्रतिशत मतों के बल पर आम आदमी पार्टी अपना आपा खोकर ताजा सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल महाशय के नेतृत्व वाली बंदिनी बन गयी है। सुप्रीमो नेतृत्व वाले समूहों की रायशुमारी करने पर पता चलता है कि तमिलनाडु में कालग्नार एम. करूणानिधि और एम.जी. रामचंद्रन शिष्या जयललिता के द्विमुख सुप्रीमो कर्णाटक में देवगौड़ा सुप्रीमो महाराष्ट्र में शरद पवार व उद्धव ठाकरे व हरियाणा में चौटाला पंजाब में प्रकाश सिंह बादल, कश्मीर घाटी में मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव व मायावती के दो सुप्रीमो, बिहार में लालू यादव सहित समूचे भारतीय दो दर्जन से ज्यादा सुप्रीमो हैं। तात्कालिक जरूरत यह है कि सभी सुप्रीमो अनौपचारिक रूप से मिल बैठ कर राजनीतिक दलों के प्रमुख पद पर एक व्यक्ति कितने समय तक रहे, दल के संविधान के अनुसार ज्यादा से ज्यादा लगातार दो बार याने ज्यादा से ज्यादा छः वर्ष तक राजनीतिक दल की अगुवाई करे। एम. करूणानिधि जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव, जगमोहन रेड्डी, उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, ओमप्रकाश चौटाला, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, अरविन्द केजरीवाल जैसे सुप्रीमोओं को सम्मति दी जाये कि वे अपने अपने दलों के सात प्रमुख व्यक्तियों की सूची तैयार करें। दल की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाये। जो दल सुप्रीमो संस्कृति के कायल हैं उन्हें नियामक मंडल में चुने हुए सात व्यक्तियों का ब्यौरा निर्वाचन आयोग, लोकसभा स्पीकर राज्यसभाध्यक्ष, यदि राजनीतिक दल अखिल भारतीय है तो सभी विधान मंडलों में राजनीतिक दल का अध्यक्ष बदल जाये ताकि एक ही व्यक्ति की जो राजनीतिक सत्ता आज ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक दलों में दीखती है वह स्पष्ट हो जाये कि कोई राजनीतिज्ञ अपने दल का शीर्ष पुरूष केवल छः वर्ष तक ही रह सकता है। लोकप्रतिनिधित्व कानून 1951 के अंतर्गत राजनीतिक दल, राजनीतिक दल निर्णायक मंडल तथा राजनीतिक दलों की मान्यता देने के लिये मुख्य चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की तर्ज पर भारतीय राजनीतिक संगठन नियामक आयोग का गठन किया जाये जिसमें अखिल भारतीय राजनीतिक दलों के दो वो प्रतिनिधि राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों एक एक प्रतिनिधि कुल मिला कर पंद्रह सदस्यीय राजनीतिक संगठन नियामक आयोग की रचना की जाये जो राजनीतिक दलों के अधिकार व कर्त्तव्यों को सुनिश्चित करें तथा प्रत्येक राजनीतिक विचार पोखर अपनी मर्यादायें स्वयं निश्चित कर प्रस्तावित भारतीय राजनीतिक दल नियामक आयोग की नींव स्थापित हो। 
  हिन्दुस्तानी राजनीति चिंतन पोखर इस बात से इन्कार नहीं कर सकता है कि उत्तर नेहरू राजनीतिक युग में राजनीति में सामूहिक नेतृत्व में समूह का चेहरा नेता होगा पर नेता मनमानी करने के बजाय दल के कम से कम सात नेेताओं के परामर्श से दल चलायेगा। इसे हम इकला सुप्रीमो के बजाय सात साझा सुप्रीमोओं की व्यूह रचना कर अपनी राजनीतिक चेतना को वैयक्तिक हित नहीं सामूहिक हित संवर्धन के लिये प्रयुक्त करेगा। इकला सुप्रीमो शैली में परिवर्तन लाने की जरूरत है। किसी राजनैतिक दल को व्यापारिक अथवा व्यावसायिक कारपोरेट की तरह नहीं चलाया जा सकता न किसी मजहबी निर्देशों की तरह आन्वीक्षिकी राजविधा का प्रसार किया जा सकता है। सामूहिक चिंतन पोखर एक ऐसा रूप है जो गरूवे गरूवे को तो टिकायेगा हलके फुलके को हवा में उड़ा देगा। महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत विनोबा भावे से महात्मा के राजनैतिक उत्तराधिकार वर्चस्व के अग्रणी पंडित नेहरू विनोबा से मिलने के लिये धाम सरिता तट पवनार पहुंचे। विनोबा ने पंडित नेहरू की अगवानी करते हुए कहा - पंडित जी! ‘राज्यान्ते नरकम् ध्रुवम’ यह विनोद भी था व्यावहारिकी वास्तविकी राजनीति का उलाहना भी था। पंडित नेहरू गहरे सोच में पड़ गये। विनोबा जी ने कहा - पंडित जी सहज कर्म करते जाइये कर्मदोष की फिक्र मत कीजिये। विनोबा को भागवत शास्त्र अत्यंत प्रिय था पर वे इतर धर्मशास्त्रों का भी सम्मान करने वाले विश्व मानव धर्मी थे। उन्होंने पंडित जी को शूरसेन राजा चित्रकेतु की कहानी सुना डाली कहा - नरक जाने से डरने की जरूरत नहीं है। युधिष्ठिर ने स्वर्ग जाने से इन्कार कर दिया क्योंकि श्रीकृष्ण सहित भीम, अर्जुन वगैरह सभी अपने दुष्कर्मों की यातना पहले सहना चाहते थे। युधिष्ठिर नरक में पहुंचे वहां के आवासियों में उत्साह की लहर दौड़ गयी। इसलिये राजनेता को सुप्रीमो बनने के बजाय अपने संगी साथियों के साथ तुलसीदास का रास्ता अपनाना चाहिये। एतो मतो हमारो, इसलिये एक सुप्रीमो नहीं हमें एक दल में कम से कम सात सुप्रीमो चाहिये ताकि उनकी सामूहिक मेधा का लाभ गण के अग्रणी को भी मिले। चाणक्य का कहना था - न गच्छेत गणतस्याग्रे सिद्धे कार्ये समम् फलमयदि कार्य असिद्धि स्यात् मुखरः तत्र हन्यते। केजरीवाल महाशय नये नये सुप्रीमो हैं उन्हें अपने निंदकों के लिये - निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय का संकल्प लेना चाहिये यदि वे वस्तुतः भारत भाग्य विधाता पंक्ति में आना चाहें।
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