नेतृत्त्व की असली पहचान निर्लिप्तता है।
सागरिका घोष ने टाइम्स विचार सामयिकी में सवाल उठाया है कि क्या बुद्धिजीवी नेतृत्व का सटीक अधिकारी है ? योगेन्द्र यादव तथा प्रशांत भूषण को लेकर आआपा में जो सिर फुटौवल चलती आरही है, आआपा की पी.ए.सी. से बुद्धिजीवी द्वय का केजरीवाल महाशय की अनुपस्थिति में हटाया जाना तथा आआपा की राष्ट्रीय कौंसिल से यादव भूषण युगल का कुछ अन्य सदस्यों सहित निष्कासन नयी नवेली राजनीतिक संगत आआपा के लिये सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने की कहावत चरितार्थ कर रही है। पहला सवाल तो यह है कि देश में अनेकों राजनीतिक दल पहले से ही विद्यमान थे तब क्या वास्तविक तौर पर किसी नये राजनीतिक दल की आवश्यकता थी ? जिन लोगों को राजनीति का शौक है उन्हें यूरप अमरीका का आदर्श सामने रख कर राजनीति करने की बजाय हिन्दुस्तानियत की राजनीति करनी चाहिये। अरविन्द केजरीवाल महाशय ने कहा कि वह नैपोलियन बोनापार्ट नहीं हैं। अपनी गतिविधि दिल्ली की लंगड़ी विधान सभा तक ही अपना विजय रथ वाला अभियान सीमित रखना चाहते हैं। अगर केजरीवाल महाशय और बुद्धिजीवी द्वय प्रशांत भूषण व योगेन्द्र यादव ने कौटिल्य का अर्थशास्त्र मनोयोग से पढ़ा होता, यदि वे संस्कृत से सुपरिचित न रहे हों अंग्रेजी के जरिये संस्कृत समझना चाहते हों तब भी कोई बात नहीं। अमरीकी राजनीति के धुरंधर ज्ञाता तथा विश्व में अमरीका की राजनीतिक पैठ को मजबूत करने वाले यहूदी धर्मावलंबी हेनरी किसिंजर की किताब भी पढ़ ली होती तो उन्हें भारतीय राजनीति ककहरा सही सही समझने में मदद मिलती। भारत में रामायण काल, महाभारत काल, कुरूक्षेत्र के महाभारत युद्ध के लगभग अढ़ाई हजार वर्ष पश्चात आचार्य चणक के यशस्वी राजनीति वेत्ता पुत्र विष्णु शर्मा जिन्हें हिन्दुस्तान सहित दुनियां के लोग चाणक्य के नाम से जानते हैं उनके द्वारा रचित कौटिल्यीय अर्थशास्त्र भारतीय राजनीति को समझने के लिये दिशाबोधक ग्रंथ है। राजनीतिक विश्लेषण आदि कवि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रंथ रामायण में जिसे महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास रचित महाभारत जिसे जनसामान्य पंचम वेद कहता है राजनीतिक बारहखड़ी सीखने का एकमात्र सटीक स्त्रोत है। पूरा महाभारत आप न भी पढ़ना चाहें समय के अभाव में तो भी केवल शांतिपर्व का मनोयोग पूर्वक वाचन करने से राजनीतिक अखाड़े में राजनीतिक कुश्ती करने के इच्छुक महानुभाव को युधिष्ठिर के सवाल तथा भीष्म पितामह के जवाब वाले उपाख्यानों को पढ़ना चाहिये ताकि राजनीति की सही सही समझबूझ दिमाग में घुस सके। भारत में इस्लामी सल्तनत व अंग्रेजी राज के ईस्ट इंडिया कंपनी के अंगद के चरण जब सूरत में पड़े तब से भारत विभाजन तक की बर्तानी राज शैली से अहिंसात्मक सत्याग्रही रास्ता अपनाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी की चिंतनधारा को भी हृदयंगम करना हिन्दुस्तानी राजनीति पर पकड़ बनाये रखने के लिये जरूरी है। भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में भक्ति साहित्य का अगाध भण्डार है। अपनी अपनी मातृभाषा में भी भारतीय भक्ति अभियान जो भारतीय राजनीति का मूलाधार है उसे समझबूझ कर पढ़ने की जरूरत है। पर सबसे बड़ी विचित्र व बेतुकी बात यह है कि भारत के लोगों में सेक्यूलरिज्म का भूत सवार है। यूरप के सेक्यूलरिज्म व भारत के सर्वधर्म समभाव में फर्क है। सेक्यूलरिज्म को सही तरीके से समझने के लिये विनोबा भावे का चिंतन पथ अपनाना होगा। वे उद्धव गीता में प्रबुद्ध एवं राजा जनक के बीच संवाद का उदाहरण देकर कहते हैं - ‘श्रद्धा भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि’। भागवत शास्त्र में श्रद्धा पर किसी भी इतर धर्म शास्त्र की अनिंदा याने हर धर्म शास्त्र का सम्मान करना। भारत के हर अंग्रेजी पढ़े लिखे व्यक्ति में जब तक मदन मोहन मालवीय सरीखा वैचारिक संतुलन, महात्मा गांधी सरीखी सत्याग्रह मूलक अहिंसा, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का स्वराज्याधिकार निष्ठा तथा भारतीय ज्ञान मार्ग की सही पैठ, आचार्य नरेन्द्र देव का संतुलित भारत बोध, डाक्टर संपूर्णानंद के ब्राह्मण सावधान तथा हिन्दुस्तानी समाजवाद, डाक्टर लोहिया की चौखंभा भारतीय राष्ट्र व्यवस्था, जयप्रकाश नारायण की संतुलित समग्र क्रांति तथा समर्पित सिद्धांतवादिता के समानांतर पंडित नेहरू की लोकतांत्रिक समावेशित शैली और अपने हर परिचित व्यक्तित्त्व से आत्मीयता पूर्ण व्यवहार एवं विचार भेद के बावजूद आन्वीक्षिकी राजनीतिक परम्परा का अनुशीलन। भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री की प्रत्युपन्न मति वाली राजनीतिक पहल, दूसरों के उपदेश देने अथवा अपने अनुयायियों को दिशाबोध करने के समय अपने मन को संयमित रख कर जो व्यवहार स्वयं को नापसंद है वह सामने वाले से नहीं करना - ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्’। अरविन्द केजरीवाल महाशय अभी अप्रौढ़ हैं उनका अपनी जबान पर भी नियंत्रण नहीं लगता है। जिन लोगों को उन्होंने लात मार कर बाहर करने की बात कही वे दोनों अपने अपने क्षेत्र में धुरन्धर व्यक्तित्त्व हैं। उनका अपनी वाणी पर भी कुशल नियंत्रण है। उनका चमकीला राजनेता बनने का ऐसा कोई लक्ष्य भी नहीं लगता। चाणक्य ने अपनी नीति में कहा है -
‘नदी तीरे च ये वृक्षा पर गेहेषु कामिनी, मंत्रिहीनश्च राजानः शीघ्र नश्यन्ति न संशयः’
यहां राजानः से मतलब राजनेता भी होता है। राजनेता को सही समय पर सटीक मंत्रणा मिले तभी वह लक्ष्य प्राप्ति कर सकता है। यह भगवद् कृपा ही थी कि अरविन्द केजरीवाल महाशय को यादव व भूषण सरीखे विज्ञ सलाहकार उपलब्ध हुए। सागरिका घोष लिखती हैं कि योगेन्द्र यादव केजरीवाल महाशय के लिये वही भूमिका का निर्वाह कर रहे थे जो लेनिन के लिये कार्लमार्क्स ने संपन्न की थी। कार्लमार्क्स जर्मन थे व उनकी भाषा स्वभावतः जर्मन ही थी। वे 1818-1883 में रहे जब कि लेनिन 1870-1924 पर्यन्त रहे। जब कार्लमार्क्स का देहांत हुआ लेनिन मात्र 13 वर्ष के किशोर थे। मार्क्स व लेनिन में वैचारिक अथवा कायिक संघर्ष का सवाल ही नहीं उठता, संभवतः लेनिन ने कार्लमार्क्स को देखा भी न हो। दोनों की राष्ट्रीयतायें व भाषायें भी अलग अलग थीं। लेनिन मार्क्स की आर्थिकी सिद्धांतवादिता से प्रभावित हो सकते हैं। दोनों के बीच सत्ता संघर्ष की बात करते हुए सागरिका घोष ने अतिशयोक्ति की है। आधुनिक अंग्रेजीदां भूरे रंग वाले हिन्दुस्तानियों के बारे में लार्ड मैकाले की यह उक्ति सटीक लागू होती है जो उन्होंने अपने पादरी पिता को हिन्दुस्तान में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी तय करने के कालातीत प्रभावों के बारे में लिखी थी। मैकाले का कहना था - पिता जी मैं आपका लक्ष्य साधन कर रहा हूँ। दो अढ़ाई सौ वर्षों के बाद हर हिन्दुस्तानी आपके ऐंजिकल धर्मोपदेश का मानसिक दास होगा। उसकी अपनी हिन्दुस्तानी आत्मा मर चुकी होगी। वह भूरा हिन्दुस्तानी मन, काया व वाणी से पूरा पूरा ख्रिस्ती होगा भले ही माथे पर चंदन अथवा कुंकुम का टीका लगाये हो या इस्लामी टोपी अपने सिर पर धारण किये रहा हो। आज भारत पूर्णतः मैकालाइट हो चुका है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने श्रीमद्भगवदगीता का अंग्रेजी भाषांतरण करते समय अपने उद्बोधन में व्यक्त किया था कि गीता के अंतरंग तत्व को केवल संस्कृत में ही सही सही समझा जा सकता है। अंग्रेजी भाषांतरण अथवा रूपांतरण में गीता का दर्शन सटीक तरीके से नहीं समझा जा सकता है। दूर मत जाइये आधुनिक युग की तुलनात्मक साहित्य चेतना पर्व का डोरोथी एम. फिगरूआ की ताजी पुस्तक को जिसका शीर्षक ‘आर्यन ज्यूज ब्राह्मण’ उसे पढ़ डालिये। जार्जिया विश्वविद्यालय में ध्वन्यालोक (जो अब संसार में अध्ययन के लिये उपलब्ध नहीं है) का यह कथन कि ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ इस सृष्टि में विभिन्न रूचि के लोग हैं इसलिये उन सबको एक जगह लाकर खड़ा नहीं किया जा सकता। हर सिद्धांत भाषा, वाणी तथा उक्ति का अपना अपना प्रभाव क्षेत्र है। डोरोथी ने यूरप व भारत के उन इतिहासकारों की बखिया उघाड़ डाली है जो कहते हैं आर्य यूरप से भारत आये। अपने ताजा ग्रंथ में डोरोथी ने यह साबित करने की कोशिश की है कि आर्य जू व ब्राह्मण में करीबी संबंध है जो भारत से ही यत्र तत्र फैले हैं। महाभारतकालीन भारत और उससे पूर्व पंद्रह हजार वर्ष से अधिक की अवधि वाला रामायणकालीन भारत व पृथ्वी का सटीक विवेचन बिना नटराज के नृत्यावसान काल की डमरू की नौ और पांच ध्वनियों का समावेश किये वाणी विलास को सही सही समझना कठिन कार्य है। हिन्दुस्तानी मर्यादा का मानना है विद्या व अविद्या ज्ञान की दो विधायें हैं। अविद्या से व्यक्ति ज्ञान कोष का संवर्धन कर मृत्यु का सामना कर सकता है, मृत्यु से तैर सकता है। मृत्यु से आगे जाने पर ही विद्या का क्षेत्र आता है। अविद्या मृत्युम् वीत्वी विद्ययामृत भानुते। विद्या ही अमृतोत्याग की सहायक है। राजनीति का मर्म समझने के लिये सतत चिंतन पोखर आवश्यक है। राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण वही कर सकता है जो पानी में रह कर भी पानी से प्रवाहित नहीं हो पाता। अरबी के पत्तेे पत्ते में पानी की बूंद चमकती है पर पत्ता गीला नहीं होता। आन्वीक्षिकी राजनीति का ज्ञाता भी राजनीति के छल प्रपंच पाखंड के बीच रह कर भी उससे प्रभावित नहीें होता। लेनिन, निक्सन, थैचर का उदाहरण सागरिका घोष ने दिया है। दुनियां के एक देश की राजनीति दूसरे देश या दूसरे सार्वभौम राज्य के लिये आदर्श नहीं हो सकती इसीलिये राजा अथवा राजनेता को सटीक मंत्रणा देने वाले निर्वैर निरपेक्ष राजनीतिक चिंतन का मार्गदर्शन जरूरी होता है। दिल्ली में केजरीवाल के झाड़ू को विश्वविजयी बनाने के अनेकानेक कारण हैं। उनके जिस झाड़ू ने इंडियन नेशनल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का सूपड़ा साफ कर दिया वह झाड़ू उनके अपने लिये भी राजनीतिक आपदाओं का तात्कालिक हेतु बन सकता है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में केजरीवाल महाशय हैं अत्यंत अद्भुत राजनीतिक तारे नहीं उनसे पहले रामस्वामी नायकर, सी.एन. अन्नादुरै, एम.जी. रामचंद्रन, एन.टी. रामाराव, असम गण परिषद के महंत कई राजनीतिक चेतनाओं का उदय हो चुका है। समय आया गया उनका प्रतिभा मंडल क्षीण होता गया। जितनी तेजी से उभरे उतनी ही तीक्ष्णता से तिरोहित भी होगये। इसे ही राजनीतिक ज्वार कहा जाता है। पौर्णमासी को ज्वार आता है और पंद्रह दिन बाद वह भाटा में बदल जाता है। इसी राजनीति के ज्वार की ताजी नजीर आआपा है। यदि आआपा और उसके स्वयंभू नेता अरविन्द केजरीवाल का राजनीतिक डी.एन.ए. खोजना हो उनकी कृति ‘स्वराज’ का पारायण कीजिये। महात्मा गांधी ने भी हिन्द स्वराज लिखा उनकी अपनी मातृभाषा में । उन्होंने अपने आध्यात्मिक स्वराज और देशवासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज दुुंदुभि बजायी। हिन्द स्वराज के बार बार पढ़ने से गांधी जीवन दर्शन का रास्ता खुलता है। प्रोफेसर गोखले और काका साहब कालेलकर ने हिन्द स्वराज की सराहना नहीं की पर गांधी विचार पर इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अरविन्द स्वराज के बारे में यह पता नहीं चलता कि उन्होंने पुस्तक अंग्रेजी में लिखी या अपनी मातृभाषा हिन्दी में। पुस्तक की वैचारिक अवधारणा की पृष्ठभूमि भी अत्यंत डिजाऊ किस्म की है। उन्होंने पहली पारी में जब दिल्ली की आंशिक विजय की तब दिल्ली में कांग्रेस का राज था और केन्द्र में भी अग्रज कांग्रेस थी। उन्हें आआपा गढ़़ ने और आआपा के जरिये राजनीति करने का सुअवसर मिला। उनपचास दिन उनकी सरकार चली। 2015 के विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी से था। बीजेपी के खिलाफ उनके तरकस इतने शक्तिशाली तीर नहीं थे फिर भी उन्हें दिल्ली के मतदाताओं ने सत्ता सौंपी। उन्हें सत्तर सीटें क्यों नहीं मिलीं, तीन कम क्यों होगयीं ? क्या उनके उम्मीदवार सक्षम नहीं थे ? दिल्ली से भ्रष्टाचार भगाने के लिये केजरीवाल महाशय ने जो राजनीतिक बिसात बैठाई, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अथक परिश्रम के बावजूद भारतीय जनता पार्टी का सूपड़ा केजरीवाल के झाड़ू का सामना नहीं कर पाया। उसे केवल तीन निर्वाचन क्षेत्रों से विजय श्री हासिल हुई। केजरीवाल महाशय फरमाते हैं कि प्रशांत भूषण व योगेन्द्र यादव उन्हें हराना चाहते थे याने भितरघात के दोषी थे इसीलिये उन्हें पीएसी व राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निष्कासित किया गया। सागरिका घोष महोदया ने रूस देश के उन्नीसवीं शताब्दी के बुद्धिजीवी नोरोदनिक्स का उल्लेख किया है जिन्होंने ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक तौर पर लोगों के बीच वैचारिक पहुंच करने का भगीरथ प्रयास किया पर उन्हें सफलता नहीं मिली ऐसा सागरिका महोदया मानती हैं। बुद्धिजीवियों में भी दो श्रेणियां हैं पहली श्रेणी वह है जो अपनी वाणी से श्रोता समाज को प्रभावित करती है। दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो कलम के धनी हैं अपने लेखों के द्वारा पाठकों को आकर्षित करते हैं। राजनीति का दायरा तो घर के चौके चूल्हे से शुरू होेता है। पारिवारिक व्यवहार पड़ोसियों के साथ व्यवहार कार्यस्थल का व्यवहारमूलक आचरण निंदा स्तुति अथवा व्यक्ति या घटना से पूर्णतः अप्रभावित रहने का प्रयास करना इस सब में राजनीति होती है। वे व्यवहार कम या ज्यादा पारिवारिक घटनाओं में भी डालते हैं। जिसे सागरिका घोष विचारक या इंटेलेक्चुअल कह रही हैं वह वैचारिक दार्शनिक होता है। यदि उसकी वाणी में ओज हो तो वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। भारत में वाणी के धनियों में डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी अपनी बातों से लोगों को मुग्ध करते थे। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में भी वही क्षमता विद्यमान है। हिन्दी भारत में हिमालय से लेकर सागर तट तक समझी जाती है। उसमें बोलने वाला व्यक्ति शब्द शक्ति से लोगों को आकर्षित करता है। हर किसी राजनीतिज्ञ में वाणी वैभव कला नहीं होेती फिर भी वह राजनीतिक नेतृत्व को संभालने का उपक्रम करता रहता है। योगेन्द्र यादव को सागरिका घोष आआपा का भीष्म पितामह मानती हैं। उनकी सोच है कि केजरीवाल महाशय ने सुयोग खो दिया। भीष्म स्वयं मर्यादाओं को उल्लंघन न करने वाले भीष्मव्रती थे। योगेश्वर श्रीकृष्ण का मानना था कि भीष्म अपने युग के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्त्व थे। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा था - जाओ पितामह से अपनी शंकाऐं व्यक्त करो वे धर्म के गुर जानते हैं। इच्छामृत्यु के धनी हैं। वे जो राजधर्म बतायेंगे उसका अनुसरण करो। इसी संवाद को महाभारत का शांतिपर्व कहा जाता है। जो व्यक्ति राजनीति करना चाहता है वह शांतिपर्व जरूर पढे़। उसमें हजारों ऐसे आख्यान हैं जिनका अनुशीलन राजनीतिज्ञ की आसन्न समस्याओं का समाधान कर सकता है पर लगता है कि हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक अरविन्द केजरीवाल नैपोलियन बोनापार्ट का आदर्श अपनाये हुए हैं। नैपोलियन यूरप का महारथी था, पूर्वी यूरप से सिकन्दर महान जिसे संस्कृत वाङमय अलसेन्द्र अंग्रेजी भाषा ऐलेक्जेंडर दि ग्रेट कहती है उसे भारत पर आक्रमण करने पर राजा पुरू से जो आमना सामना हुआ उससे उसने विश्व विजय की कामना ही छोड़ डाली। भारत धर्म - ‘युद्धस्व विगत ज्वरः’ का पोषक है। भारतीय धर्म युद्ध कला विजयी होने के बावजूद स्वयं राज्य करने के बजाये पराजित राजा अथवा उसके राजकुमार या अनुज को सिंहासन पर बैठाती है। धर्म युद्ध का नया संस्करण एतो मतो हमारो वाला बैलट युद्ध भी है। केजरीवाल महोदय दिल्ली के बैलट युद्ध में विजयी रहे। भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री ने उन्हें तत्काल विजय बधाई दी और आत्मीयतापूर्वक चाय पर न्यौता भी दिया। अपने धुर विरोधी को निसर्गोपचार की सलाह भी दी इसे कहते हैं राजनीतिक शिष्टाचार। केजरीवाल महाशय ने अपने भीष्म पितामह को आआपा की चौहद्दी से ही बाहर कर डाला। नेतृत्व का सही पात्र ही वह है जो अपना समूचा निजत्व या प्राइवेसी को राष्ट्र को सौंप दे। योगेन्द्र यादव ने एक बार लिखा - वे जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तानियों की चाहत हैं और इसलिये वे दिल्ली के तख्त पर विराजने ही वाले हैं। योगेन्द्र यादव का मोदी विरोध प्रतीकात्मक था क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते थे कि मौजूदा हिन्दुस्तान की राजनीतिक नैया को सही तरीके से चलानेे की क्षमता केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में ही है।
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