क्या चीन पाक सदाबहार दोस्ती का भारतीय विकल्प केवल तिब्बत की प्रवासी सरकार को तत्काल कूटनीतिक मान्यता समय की पुकार है ?
चाइना भारतीय अरूणाचल प्रदेश को चीन हिन्द सीमा विवाद का महत्वपूर्ण बिन्दु मानता है। किसी भी वैश्विक राजनीतिक अथवा कूटनीतिक महत्वपूर्ण व्यक्ति के अरूणाचल प्रदेश पहुंचने वहां के आर्थिक सामाजिक हिन्द के उत्कर्ष को देखने में बारबार ऐतराज करता रहता है। अमरीकी राजदूत रिचर्ड वर्मा अरूणाचल प्रदेश के तवांग इलाके में गये तो चीन ने विरोध दर्ज कर दिया। तिब्बती धर्मगुरू परम पावन चौदहवें दलाई लामा जब अरूणाचल प्रदेश जिसे पहले नेफा भी कहा जाता था, गये तो उनके वहां जाने पर भी चीन ने ऐेतराज व्यक्त किया था। हिन्द और चीन के बीच मैकमोहन रेखा को सीमा न मानना तथा पूर्व व पश्चिमी हिमालय के तिब्बत से सटे हुए सीमा क्षेत्र को विवादास्पद बताना चीन की जमीन हड़पो नीति का अंग है। चीन का असली उद्देश्य पश्चिमी भारत के अरब सागर से जुड़े पाक इलाकों तथा बर्तानी राज में आजाद रहे कलात (बलूचिस्तान) के खान वाले इलाके में चाइना पाक इकनामिक कारीडोर इकहरा गलियारा नहीं अपितु दुहरा गलियारा वामे दुनियां के इस्लामी सिंकियांग से भारत के अभिन्न अंग कश्मीर के पाक कब्जे वाले मुजफ्फराबाद आदि इलाकों बाल्टिस्तान व गिलगित के वे इलाके जो हैं तो हिन्दुस्तान के हिस्से पर पाकिस्तान ने उन इलाकों को चीन को सौंप डाला है। चीन जो आर्थिक दुहरा गलियारा बना रहा है उसका दक्षिण पूर्वी छोर कराची और दक्षिण पश्चिमी छोर बलूचिस्तान का बन्दरगाह है। पाकिस्तान को मदद देने के नाम पर चीन इस अंधियारे आर्थिक गलियारे को बना रहा है। बंगला देश के साथ भी चीन साझा व्यापार के नाम पर अपनी पहुंच बंगाल की खाड़ी तक करना तथा हिन्द महासागर में हिन्द और हिन्द के हमदर्दों को ललकार रहा है। सन 2019 में परम पावन दलाई लामा को भारत में शरण लिये हुए पूरे साठ वर्ष हो जायेंगे। वे हिन्द की धरती में ध्यानयोग साधना पिछले सत्तावन सालों से करते आरहे हैं। उन्होंने तिब्बत की पार्लमेंट तथा तिब्बत की निर्वाचित प्रवासी सरकार की कमान नौजवान तिब्बती नेता लांब सांग को सौंप दी है। भारत सहित दुनियां में जहां जहां तिब्बती हैं उनका प्रतिनिधित्व तिब्बती पार्लमेंट में है। तिब्बत की यह प्रवासी सरकार मानवता की रक्षा करने का उद्घोष करने वाले हर राष्ट्र राज्य का कूटनीतिक समर्थन तथा तिब्बती प्रवासी सरकार को लोकतंत्र अथवा डेमोक्रेसी एवं पार्लमेंटरी लोकतंत्र के वाहक राष्ट्र राज्यों की भौतिक तथा कूटनीतिक मान्यता चाहती है। यह प्रवासी सरकार भारत के धर्मशाला शहर में कार्यरत है। इसलिये पहली जरूरत हिन्द को आगे बढ़ कर लांब सांग नेतृत्व वाली प्रवासी तिब्बती सरकार को कूटनीतिक मान्यता देना है।
चीन को उसकी भाषा में ही जवाब देना आज भारत की पहली वैश्विक राजनीतिक जरूरत है। इस साल मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 को थी। ताइवान हांगकांग तथा सिंगापुर के राष्ट्रवादी देहाती चीनियों ने चीन का नया साल नये साल का पहला दिन मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 को उत्साह से मनाया। माओ त्से दुंग ने चीनी नये साल का पहला दिन माघी अमावस का अमांत पर्व मनाना बन्द करा दिया था। चीनी राष्ट्रवादी समाज ने सतसठ वर्ष पश्चात चीन के राष्ट्रीय कैलेंडर का साल का पहला दिन माघी अमावस का अमांत पर्व माघी अमावस या मौनी अमावस माघ नहान पर्व अमांत पर्व में मनाया जाता है। इस नये वर्ष के पहले दिन का संबंध समुद्र मंथन तथा समुद्र मंथन से निकले अमृत व विष सहित प्राप्त हुए चौदह रत्त्नों से है। अमृत के लिये जो छीना झपटी हुई उससे धन्वंतरि के अमृत कलश से अमृत की बूंदें इलाहाबाद के गंगा यमुना सरस्वती संगम में मौनी अमावस के अमांत पर्व पर पड़ीं। करोड़ों वर्ष से हिन्द के लोग मौनी अमावस का अमांत पर्व गंगा नहान के लिये मनाते हैं। चीन के राष्ट्रवादी एवं चीन की भाषा मंदारिन वाङमय के अनुकूल मौनी अमावस को ही अपना नया साल व नये साल का पहला दिन मनाते आरहे हैं। चीन के निरीश्वरवादी लोगों का प्रभाव सामान्य चीनी जनता पर घट रहा है। निरीश्वरवादी चीनी शास्ता चीनी नये साल के पहले दिन और तिब्बत में परम पावन चौदहवें दलाई लामा की नैतिक और आध्यात्मिक सत्ता को अपने वश में करने में समर्थ नहीं है। विश्व में अपनी व्यापारिक मजबूती कायम रखने के लिये देहाती चीनी समाज को उनका राष्ट्रीय दिवस इलाहाबाद मौनी अमावस का अमांत पर्व मनाने की छूट देनी पड़ी। भारत सांस्कृतिक मंत्रालय चीनी राष्ट्रीय नव वर्ष इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व को मंदारिन भाषी चीनी समाज उसी तरह मनाये जिस तरह इलाहाबाद में माघ के महीने को हिन्द के लोग माघ स्नान के रूप में मनाते हैं। इलाहाबाद के जिलाधिकारी से संस्कृति मंत्रालय द्वारा अनुरोध किया जाना चाहिये कि इस वर्ष मौनी अमावस 27 जनवरी 2017 को है इसलिये उस दिन भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय मंदारिन भाषी सिंगापुर ताइवान तथा हांगकांग के मंदारिन भाषियों को चीनी नव वर्ष का पहला दिन मनाने के लिये गंगा तट अथवा झूंसी प्रतिष्ठानपुर सरीखे इलाकों में चीन के राष्ट्रीय कैलेंडर के नव वर्ष के पहले दिन के तौर पर सामूहिक रूप से गंगा तट में मनाने के लिये सिंगापुर तथा ताइवान की सरकारों का ध्यानाकर्षण किया जाकर देहाती तिब्बती समाज सहित जो मंदारिन भाषी उत्सवपूर्वक चीन के नये साल के पहले दिन मौनी अमावस का अमांत पर्व इलाहाबाद में मनाना चाहते हैं चीन की कम्यूनिस्ट सरकार सहित हांगकांग ताइवान व सिंगापुर के मंदारिन भाषियों को भारत का संस्कृति मंत्रालय चीन का नया साल नये साल का पहला दिन मनाने के लिये प्रेरित करे। इलाहाबाद का यह आयोजन माघ-स्नान समारोह से ज्यादा उत्साह वर्धक होगा। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल चीनी नव वर्ष समारोह 27 जनवरी 2017 को इलाहाबाद में मनाये जाने के उपक्रम को राज्य सरकार की स्थिति सुदृढ़ करने में ही प्रयुक्त कर सकते हैं। भारत का संस्कृति मंत्रालय विेदेश मंत्रालय चीनी राष्ट्रीय नव वर्ष समारोह 27 जनवरी 2017 को इलाहाबाद में धूमधाम पूर्वक संपन्न करे। चीन पाक सदाबहार दोस्ती को बेबुनियाद बनाने में जहां भारत को पीओके कश्मीर के मुजफ्फराबाद क्षेत्र गिलगित तथा बाल्टिस्तान में चायना पाक इकानामिक कारीडोर को कमजोर किया जा सकेगा वहीं पाक आतंकवादी कार्यवाहियों पर भी कारगर रोक लगाने के साथ ही मौजूदा आतंकवादी ठिकानों को भी बर्बाद करने में सफलता हाथ आयेगी।
इंडियन ऐक्सप्रेस ने 22 अक्टूबर 2016 के संपादकीय पन्ने में ब्रिक्स ऐंड वाल्स ब्राजील रसिया इंडिया दैट इज भारत चाइना तथा साउथ अफ्रीका के पांच राष्ट्र राज्यों के निर्णायक नेतृत्व की शीर्ष बैठक भारत के गोआ शहर में संपन्न हुई। यह ब्लागर इन पांच राष्ट्र राज्यों की पंचायत को पांच पांडवों के समान देख रहा है। ब्राजील का संस्कृत नाम ब्रजलब्ध है याने ब्रज के चौरासी गांवों का लातिन अमरीकी संस्करण। ब्राजील का क्षेत्रफल 85,11,965 वर्ग किलोमीटर व जनसंख्या सवा बीस करोड़ से ज्यादा पूरी आबादी का पांचवां हिस्सा गरीबी में दिन गुजार रहा है। यहां की लोकभाषा पुर्तगाली है। यहां स्पेनी, अंग्रेजी तथा फ्रेंच बोलने वाले लोग भी हैं। गोआ भी लंबे अर्से तक पुर्तगाल का उपनिवेश था। डाक्टर लोहिया ने गोआ की आजादी का बीड़ा उठाया। ब्राजील या ब्रजलब्ध पहला पांडव युधिष्ठिर सरीखा व्यक्तित्त्व है। दूसरे नंबर पर रसिया जिसे संस्कृत में ऋषि देश कहते हैं यहां आज भी वैदिक स्वर में आर्थाेडिक्स रसियन गिरजाघरों में प्रार्थना होती है। तीसरे क्रम पर हिन्द है जिसका यह मानना है कि ‘नमो नमो प्रतिज्ञे द्वै न दैन्यम् न पलायनम्’ के रूप में भारत का प्रतीक धनुर्धर पार्थ तथा उसका मार्गदर्शक पार्थ सारथी है। ये तीनों पांडव कुंती नंदन कौंतेय हैं। चौथा पांडव दूरदर्शी नकुल है यह माद्री के जुड़वां बेटों में पहला है। अपने भागनेय नकुल का योगक्षेम देखने मद्र नरेश शल्य अपनी सेना सहित कुरूक्षेत्र के लिये रवाना हुए। विदर्भ से लेकर सारे उत्तरापथ में दुर्योधन ने शल्य के स्वागत का प्रबंध किया था। नतीजा सामने आया अपने भांजों की मदद करने रवाना हुआ राजा शल्य दुश्मन के खेमे में चला गया। नकुला और शल्य की भूमिका आज दुनियां का अत्यंत चालाक राष्ट्र राज्य चीन निर्वाह कर रहा है। चीन का नेतृत्व नकुल की तरह दूरदर्शी है। इन पांचों पांडवों में चीन की मंदारिन बोलने वाले लोग करीब डेढ़ अरब हैं। दूसरे क्रम पर भारत आता है जिसे दुनियां इंडिया कहती है। पंगत में पांचवां पांडव सहदेव साउथ अफ्रीका का प्रतीक मंडेला सरीखा सर्वज्ञ व्यक्तित्त्व है। ब्रिक्स के ये पांच पांडव गोआ में मिले। भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी पूरी शक्ति से घोषित किया कि पाक आतंक का जनक और पोषक है। चीन को छोड़ कर बाकी चार पांडव भारत के नरेन्द्र मोदी के उद्गारों से सहानुभूति तो रखते थे पर ब्रिक्स ने जो प्रस्ताव पास किया उसमें आतंकी पाक का उल्लेख नहीं हो पाया। बाजी चीन के जिनपिंग के हाथ आयी। ऐसा लगता है कि चीन के साथ हिन्द में कही जाने वाली कहावत ‘आप डूबे बामना ले डूबे जजमान’ की तर्ज पर चीन पाकिस्तान की सदाबहार यारी को समाप्त न कर दे। चीन विस्तारवादी व दूसरे राज्यों की भूमि हड़पने वाला राष्ट्र राज्य है, पाकिस्तान की संस्कृति उसकी जमीन से मेल नहीं खाती। चीन ने राष्ट्र मंडल में अपना विशेषाधिकार वीटो का उपयोग कर अजहर मसूद को आतंकी मानने के प्रस्ताव को अप्रस्ताव ही रहने दिया। चीन और पाकिस्तान में जमीन और जनसंख्या, जनभाषा तथा सांस्कृतिक वैषम्य भी है। चीन पाकिस्तान बांग्ला देश तथा श्री लंका का उपयोग हिन्द महासागर में अपनी ताकत दिखाने के लिये कर रहा है। हांगकांग, ताइवान और सिंगापुर के मंदारिन भाषी निरीश्वरवादी नहीं सांस्कृतिक चीनी राष्ट्रीयता के पोषक हैं। देखते रहिये जिनपिंग का सत्ता पथ आगे बढ़़ता है या नया नेतृत्व उभरता है। भारत के पास चीन के वीटो का विकल्प ही यह है कि तिब्बत की प्रवासी लांग सांब सरकार को कूटनीतिक मान्यता दी जाये। भारत खुल कर कहे परम पावन चौदहवें दलाई लामा की भारत में तपस्या वैसी ही है जैसी खान अब्दुल गफ्फार खान सीमांत गांधी का हिन्द प्रेम। हिन्द ने सीमांत गांधी को भारत रत्न माना। अगली 26 जनवरी 2017 को भारत परम पावन दलाई लामा को भारत रत्न की उपाधि से नवाजे और दुनियां को यह बताये कि भारत तिब्बत की स्वतंत्रता का पोषक है। तिब्बत की कूटनीतिक मान्यता से विश्व युद्ध की स्थिति आ सकती है पर चीन अपनी आर्थिक प्रगति के लिये विश्व युद्ध करना नहीं चाहेगा। अगर भारत पाक संघर्ष युद्ध का आकार ले भी ले तो भी चीन उसमें नहीं कूदेगा। यक्ष प्रश्न है - भारत का नेतृत्व क्या करे ? भारत की नयी पाकिस्तान रणनीति कैसी हो ? यह सोच है आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष महाशय समीर शरण तथा अशोक मलिक जो उस अधिष्ठान के ख्यात नामा सहचिंतक हैं। उनकी सोच का आधार है कि पाकिस्तान के मददगार तथा वर्णभेदी निजाम को समर्थन दक्षिण अफ्रीका के लोकविग्रही समूह कुतर्क का सहारा कब तक लेंगे। हिन्द के लोगों में दो तार्किक उत्कृष्ट श्रेणी के हैं। पहला मिथिला के मंडन मिश्र और उनकी विदुषी पत्नी भारती को तर्क से परास्त कर पुनः सनातन वेदांत का राही बना डाला तथा गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार अपनी तर्कबुद्धि से सिद्ध कर दिया। दूसरे तर्क वाले स्वामी दयानंद सरस्वती हैं जिन्होंने भारत के मुसलमान, इसाई, जैन तथा बौद्धों सहित सनातन धर्मी लोगों के पाखंड का पर्दाफाश कर डाला। स्तंभकार द्वय मानते हैं एक दीर्घ अवधि के पश्चात पाकिस्तान को व्यवहार परिवर्तन का राही बनाया जा सकता है। वे यह भी व्यक्त करते हैं कि यदि हिन्द इस्लामिक रिपब्लिक पाकिस्तान को वैश्विक सामाजार्थिक बिरादरी से अलग भी कर सका तो भी पाकिस्तान पूर्णतया इकला नहीं बनाया जा सकता। कुछ न कुछ राष्ट्र उसका साथ देंगे ही। तो सवाल उठता है कि हिन्द अपनी पाकिस्तान नीति का पुनर्निर्धारण कैसे करे ? मौजूदा पाकिस्तानी इस्लामिक रिपब्लिक के पेटे में पश्तो, पंजाबी, सिंधी तथा बलूच भाषायी संस्कृति केे चार धड़े हैं। पांचवां धड़ा है कराची शहर में बस गये भारत से प्रव्रजन करने वाले उर्दू भाषी मुसलमान। वे संतोष की सांस लेते हैं जब पाकिस्तान चिल्ला कर कहता है उसकी राजभाषा और लोकभाषा उर्दू है। पाकिस्तान के इस भाषायी पाखंड ने बंगला देश की उत्पत्ति में सैद्धांतिक सहयोग दिया। जिस दिन बंगाली मुसलमानों की तरह पंजाबी पश्तो भाषी सिंधी भाषी मुसलमान जाग जायेगा पाकिस्तानी इस्लामिक गणतंत्र के बजाय पश्तो भाषी पंजाबी भाषी सिंधी भाषी गणतंत्र के रूप में अपना कायाभ्यन्तरण उसी तरह कर लेगा जिस तरह बंगला देश ने किया। पाकिस्तान का निर्माण ही बनावटी बुनियाद में हुआ। पाकिस्तान इस्लाम के उस अध्यात्म तत्व को आत्मसात करने की स्थिति में इसलिये नहीं है क्योंकि पंजाब, सीमा प्रांत, बलूचिस्तान व सिंध की जमीन और जमीनी संस्कृति पंचनद के प्राचीन इतिहास की पुनरावृत्ति तो कर सकती है पर भारत के बनावटी विभाजन के अंग्रेजी राज के संस्करण को अधिक लंबे अर्से तक नहीं चला सकती। हिन्द की पाकिस्तान नीति तथा इस्लामिक रिपब्लिक आफ पाकिस्तान व भारतीय उप महाद्वीप के उपगन्धर्व स्थान, बलूचिस्तान, सिंध, प्रदेश पुरानी स्थिति में पहुंच जायेंगे। तक्षशिला तथा सरस्वती संस्कृति पुनरूत्थान मांगती है इसलिये धीरज धरे सो उतरे पार। क्रिस्टोफर जैफरलेट ने ब्रिक्स ऐंड वाल्स शीर्षक से अपने स्तंभ में कहा - Contradictions are mounting with India’s diplomacy could explore alternative groupings.
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ।
हिन्द के महान संस्कृत कवि कालिदास ने अपनी पत्नी के कथन - अस्ति कश्चित वाग् विशेषः अर्थात क्या आपकी वाणी में कोई विशेषता आयी ? कालिदास ने अस्ति से कुमार संभव, कश्चित् से मेघदूत, वाग् विशेषः से रघुवंश तीन महाकाव्य रच डाले। अस्ति से उन्होंने अस्त्युत्तरस्याम् दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः कुमार संभव रचा। कश्चित् कांता विरहः गुरूणा से मेघदूत रचा। पार्वती को जब मालूम हुआ कि कालिदास ने उनकी निजता याने प्राइवेट लाइफ पर वैसा ही हमला किया है जैसा आजकल ट्विटर व फेसबुक में प्राइवेसी को चौराहे पर नचाया जारहा है तो पार्वती ने परमेश्वर देवाधिदेव महादेव से कालिदास की करतूत जिसे वे दंडनीय मानती थीं, का हवाला देकर कालिदास को कोढ़ी हो जाने का शाप शंकर जी द्वारा दिलाना चाहा। शंकर जी को पार्वती की बात बहुत रूचिकर नहीं लगी फिर भी उन्होंने तथास्तु कह कर यह भी जोड़ डाला कि अगर कालिदास रामकथा लिखेंगे तो उसे रोगमुक्त किया जा सकेगा। कालिदास ने लिखा -
वागर्था विव संपृक्तौ वागर्था प्रतिपत्तये जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ।
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