क्यों और कैसे यूनिवर्सल बेसिक इन्कम नहीं अपितु दो हाथों को काम देने का गांधी मार्ग ही हिन्द की गरीबी को आत्मसम्मान में बदल सकता है ?
क्या प्रधानमंत्री का मेक इन इंडिया गुरूमंत्र ही हिन्द के रोजगार का मील पत्थर है ??
नीति आयोग के उपाध्यक्ष महाशय अरविन्द पनगरिया का मत है कि यूनिवर्सल बेसिक इन्कम 130 करोड़ हिन्दवासियों को उपलब्ध कराने के लिये हिन्द की सरकार के पास वित्तीय स्त्रोत उपलब्ध नहीं हैं। तेंदुलकर शहराती गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रहे लोगों के लिये माहवारी एक हजार रूपये 2011-12 की रूपये की क्रय क्षमता के नजरिये से संस्तुत की गई थी पर 2011-12 के पश्चात 2016-17 में रूपये की क्रय क्षमता में जो ह्रास हुआ है माहवारी एक हजार रूपये की आमदनी की दर से बहुत कम पड़ जायेगी। अगर इसी रकम को भी आधार मान कर यूनिवर्सल बेसिक इन्कम माहवारी एक हजार रूपये सालाना बारह हजार की दर से भी संकल्पित की जाये मुल्क के 130 करोड़ लोगों के लिये यह राशि रूपये 100Í12Í130 करोड़ याने कुल मिला कर सालाना 156 करोड़ रूपये आवश्यक होंगे। महाशय पनगरिया की सम्मति में यूनिवर्सल बेसिक इन्कम वाला पहलू वित्तीय दृष्टिकोण से भी हिन्द के लिये अव्यावहारिक है। टाइम्स आफ इंडिया के रिपोर्टर श्री वैद्यनाथन अय्यर 24 जनवरी 2017 को नई दिल्ली में रपट देते हैं कि साबरमती आश्रम में विभिन्न धर्मावलंबियों की एक सभा को संबोधित करते हुए मुल्क के मुख्य आर्थिक परामर्शदाता अरविन्द सुब्रह्मण्यम ने राय जाहिर की कि मुल्क के हर नागरिक को सालाना दस हजार से पंद्रह हजार तक यूनिवर्सल बेसिक इन्कम पेटे मुहैया कराया जा सकता है। अगर रकम सालाना रूपये 10 हजार मानी गई तो भी हर नागरिक को सालाना दस हजार मुहैया करने के लिये तेरह सौ अरब रूपये चाहिये। अगर वार्षिक यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की रकम पंद्रह हजार मानी गई तो उन्नीस सौ पचास अरब रूपये चाहिये। अरविन्द सुब्रह्मण्यम का मत है कि अभी जनकल्याण हेतु एक हजार से ज्यादा जनहितकारी योजनायें सरकार द्वारा चलाई जारही हैं। इस सबके बदले यूनिवर्सल बेसिक इन्कम को लागू किया जा सकता है। चीफ इकानामिक एडवाइजर तथा नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगरिया के विचार पोखर पर तात्कालिक जरूरत क्रांतिवादी चिंतक से अध्यात्म पथ के अग्रगामी अरविन्द घोष के सावित्री महाकाव्य का पुनर्वाचन उपादेय मालूम होता है। अमरीकी चिंतको की भी मान्यता है कि आने वाले कालचक्र का महाकाव्य न तो वाल्मीकि रचित रामायण तुलसीदास की रामचरित मानस कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास रचित पंचमवेद महाभारत होगा न शेक्सपियर का काव्यात्मक लेखन न पावन कुरआन शरीफ न पवित्र बाइबिल न हिन्दुस्तानियों के अपौरूषेय वेद ऋक् यजु साम अथर्व आदि सभी मिल कर भी सूर्य की प्रकाश शक्ति का महापथ सविता देवता की आत्मा का प्रदर्शक है। सावित्री महाकाव्य आने वाले जमाने का महाकाव्य होगा यह चिंतन है अमरीकी विवेकशील विद्वानों का सविता, मार्तंड, दिनमणि, दिनकर, सूर्य, भाष्कर, रवि, दिवाकर, आदित्य, अरविन्द, अंशुमान, भानु आदि सूर्य पर्याय हैं। अंग्रेजी सहित दुनियां की अनेक भाषाओं में सूर्य के इतने पर्याय नहीं हैं। सी वैद्यनाथन अय्यर अपने समाचार में लिखते हैं मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यम साबरमती आश्रम (उन्होंने साबरमती को महात्मा गांधी का जन्मस्थान लिखा जबकि महात्मा गांधी मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म आश्विन बदी द्वादशी श्राद्ध विक्रम संवत 1926 शक संवत 1791 तदनुसार ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक उस दिन 2 अक्टूबर 1869 था। महात्मा गांधी अपना जन्मदिन हिन्दुस्तानी तरीके से कनागतों के श्राद्धों में द्वादशी श्राद्ध के दिन मनाते थे।) टाइम्स आफ इंडिया को अपने रिपोर्टर की इस त्रुटि का परिमार्जन करना चाहिये। हिन्दुस्तान का सबसे पुराना अंग्रेजी अखबार ऐसी त्रुटि करे जो सन 1838 से लगातार 179 वर्ष वर्ष से लोकसेवा कर रहा है। अरविन्द सुब्रह्मण्यम महाशय के इस कथन में वास्तविकता है कि आज हिन्द में एक हजार से ज्यादा लोकलुभावनी जनकल्याण योजनाऐं यत्र तत्र सर्वत्र चल रही हैं। इन योजनाओं के कर्ता समाज में बगूला की वृत्ति काम करती है। वे अपनी अपनी जनकल्याण योजनाओं के लिये इतने समर्पित हैं कि उन्हें योजनाओं से जो भ्रष्टाचार, घूसखोरी तथा शराबखोरी दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। वे योजनाकार तथा योजना क्रियान्वयन करने वाले नौकरशाह बगूले की तरह ध्यानमग्न हैं वे अपनी नजर इधर उधर दौड़ाते नहीं हैं। प्रतीति होती है कि डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन के सिस्टम फेलियर ने ईश्वर की तरह की सर्वव्यापकता प्राप्त करली है। जिला स्तर के राजनेता राजकर्मचारी तथा आईएएस अधिकारी पूर्व आईएएस तथा पीसीएस अधिकारी को सेवानिवृत्ति के पश्चात राजनीतिक सुप्रीमो नुमा क्षत्रपों के सहायक का काम कर रहे हैं। जिला स्तर में जो नौकरशाही पूर्व नौकरशाहों की क्षत्रप समाज से राजनीतिक मिलीभगत ने एक ऐसा चक्रव्यूह खड़ा कर डाला है जिसे उखाड़े बिना नौकरशाही को उसके कर्तव्यपथ का राही नहीं बनाया जा सकता है। अरविन्द सुब्रह्मण्यम तथा अरविन्द पनगरिया दोनों महानुभावों के विचारों को 1915 में महात्मा गांधी ने अहमदाबाद में कोचरब आश्रम स्थापित करने के पश्चात 1915 से 1924 पर्यन्त नौ वर्षों में जो भारत भ्रमण किया तथा चर्खा को पुनर्जीवित करने का जो भगीरथ प्रयास किया खादी के काम को बढ़ावा देने के लिये अपनी चदरिया में लोगों से चंदा लेकर अपने अभिन्न साथी तथा समर्थक व कर्तृत्व शक्ति के दिग्दर्शक आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी को 1933 में ईश्वरगंगी काशी में तीन लाख चालीस हजार रूपये की थैली सौंप कर कहा - प्रोफेसर यह अमानत है कत्ती-बुनकरों की इसमें खयानत न हो जाये इसका ध्यान रखना। आचार्य कृपलानी ने 20 नवंबर 1920 के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पच्चीस विद्यार्थियों के साथ बाहर निकलते समय अपनी एक महीने की पगार 275 रूपये और 25 विद्यार्थियों के जेब खर्च के पांच पांच रूपये यानी 125 रूपये कुल मिला कर 400 रूपये से संत शिरोमणि लाहिड़ी महाराज के परामर्श के अनुसार अपनी मुहिम का नाम श्री गांधी आश्रम राज। तेरह वर्ष पश्चात महात्मा जी ने उन्हें तीन लाख चालीस हजार की थैली दी। उस गांधी आश्रम के पास आज 30 अरब रूपये मूल्य की भू संपदा उ.प्र. दिल्ली उत्तराखंड पंजाब जम्मू कश्मीर मध्यप्रदेश और पश्चिम बंग में यत्र तत्र फैली है। खादी उत्पादन तथा बिक्री का काम साल दर साल घटती पर है ऐसा लगता है कि वर्ष 2016-17 में नोटबंदी का एक बड़ा झटका बिक्री घटने से श्री गांधी आश्रम को लगने वाला है।
महात्मा गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से हिन्द अपने स्वदेश लौटे। उन्होंने कोचरब आश्रम स्थापित किया। अपने ग्यारह व्रतों में महत्वपूर्ण व्रत अस्पृश्यता निवारण के लिये दूधाभाई नामक हरिजन जिसे तब अछूत कहा जाता था आज लोग उन्हें दलित कहना ज्यादा पसंद करते हैं। दलित चिंतन पोखर को हरिजन शब्द मनमाफिक नहीं बैठा इसलिये वे महात्मा व महात्मा के अछूतोद्धार के प्रति शुरू से ही सशंकित रहे जबकि महात्मा का उद्देश्य अछूतों को बराबरी का दर्जा देना चाहते रहे। दूसरी ओर महात्मा ने पुरूषों और स्त्रियों के हाथों को काम मुहैया हो इस पर सर्वथा चिंतन किया। महात्मा मुफ्तखोरी के घोर विरोधी थे वे जब भारत आये तब 1915 में आबादी पच्चीस करोड़ 1931 में इकतीस करोड़ तथा भारत विभाजन के समय 39 करोड़ थी। आज भारत में 130 करोड़ लोग बसते हैं। इन सबको उनकी पात्रतानुसार रोजगार देना पहली जरूरत है। महात्मा ने खेतीबाड़ी के पश्चात पहनावे का कपड़ा उद्यमिता को खादी अभियान के जरिये आगे बढ़ाया। देश में बेरोजगारी की स्थिति 1915 में थी। एक सौ वर्ष पश्चात 2017 में 130 करोड़ आबादी वाले हिन्द के लोगों के दोनों हाथों को काम देना देश के छः लाख चालीस हजार गांवों सात हजार नौ सौ पंद्रह शहरों में फैले 130 करोड़ भारतीयों का योगक्षेम देखना पहली जरूरत है। महात्मा गांधी का खादी अभियान उनके द्वारा जनवरी 1924 में बेलगांव कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दिये गये भाषण से साथ झलकता है उसी वर्ष 24.9.1924 के दिन उन्होंने पटना में चर्खा संघ की स्थापना की घोषणा की थी। कताई व चर्खे पर बुनाई कर्घे पर आज भी रोजगार का एकमात्र विकल्प है। यूनिवर्सल बेसिक इन्कम विचार के अग्रणी चिंतक स्विट्जरलैंड ने यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को धराशायी कर डाला है। उत्तरी यूरप के स्कैनडेनेवियन देशों में स्वीडन नामक राष्ट्र ने भी यूनिवर्सल बेसिक इन्कम सिद्धांत के प्रति तीव्र उत्सुकता का प्रदर्शन नहीं किया है। हिन्द के तीन महानुभाव जिनमें वैजयंत जय पंडा बीजद लोकसभा सदस्य, अर्थशास्त्र के अध्येता डा. भरत झुनझुनवाला तथा अरविन्द सुब्रह्मण्यम भारत के आर्थिक सलाहकार ने यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को पूर्ण या अर्धपूर्ण तरीके को ग्राह्य स्वीकार किया है। अधकचरी जनकल्याण योजनाओं में अनापशनाप तरीके से बहाये जारहे पब्लिक राजस्व के लिये सुरक्षा संरक्षा के तौर तरीकों के रूप में यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को सराहा है परंतु नीति आयोग के विचारशील उपाध्यक्ष अरविन्द पनगरिया महाशय ने यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को भारत के संदर्भ में असंभव अव्यावहारिक तथा अवास्तविक बताया है। स्वातंत्र्योत्तर सत्तर वर्षीय भारतीय लोकतंत्र जिसे दुनियां के सभी लोग सबसे बड़ी कारगर डैमोक्रेसी कहते थकते नहीं हैं गरीब और अमीर के बीच चौड़ी होती जारही आर्थिक खाई को कैसे पाटा जाये। मुल्क का पूंजी और कर्मकौशल संपन्न समाज निराश्रित निर्धन भूखे और नंगे जीवन बिता रहे लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं रखता। तकनालाजी और संपन्नता की दौड़ में भारत का निम्न मध्यम वर्गीय समाज मध्यम वर्गीय खातापीता तथा योग्यता धारक समाज अपने से कमजोर के प्रति सहानुभूति रखने की प्रवृत्ति को भूल गया है। उसे केवल अपना ही हित दीखता है वह यह भी नहीं सोचता बेरोजगारी के कारण जो संभावित Rule of Mob. हिन्दुस्तानी शहराती समाज को भावनाओं से की तरफ बढ़ रहा है संपन्न तथा विपन्न के बीच जो रार पैदा होरही है वह समाज के संपन्न वर्ग को भरपूर सामाजिक कष्ट में घेर सकती है। स्यातवाद का सहारा लें तो संभवतः आज जो हालात हमारे देश में व्याप्त हैं उनके मूल में सेकुलरिज्म की अहम भूमिका है। भारतीय संविधान में सेकुलरिज्म का उद्घोष होने 1969 में प्रिवीपर्स की समाप्ति तथा बैंको के राष्ट्रीयकरण के साथ बैंकों द्वारा ऋण मेले आयोजन किये जाने केे उपक्रम ने कर्जा लो चुकाने की जरूरत नहीं इस मनोभावना को संवर्धित किया तथा आर्थिक भ्रष्टाचार की नींव मजबूत कर डाली। दुराचार व अनाचार का प्रभाव व्यक्ति की अगली पीढ़ियों में पड़ेगा। पुनर्जन्म में यकीन रखने वाले अधिसंख्य हिन्दुस्तानियों में जन्म जन्मान्तर के दुराचरणों के प्रभाव से सेकुलरिज्म के संवर्धन के कारण नैतिक रूप समाप्त होगया जिसका प्रभाव आज समाज के हर वर्ग में स्पष्ट दीखता है। केवल कानून का भय ही मनुष्य को निर्भय बनाने में भी यादगार हुआ। गांठ में अच्छा पैसा होगा तो कानून को भी अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है यह धारणा बलवती होगई। आज जो सामाजिक अवरोध पग पग पर खड़े हैं उनके पीछे उपभोक्ता वादी संस्कृति खड़ी है। केवल डेमोक्रेटिक सिस्टम इसे सही रास्ते में तब तक नहीं ला सकता जब तक हिन्द की राष्ट्रीय मानवीय नैतिकता की पुनर्स्थापना न हो जाये। अगर मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यम महाशय सांसद वैजयंत जय पंडा आर्थिक विशेषज्ञ डाक्टर भरत झुनझुनवाला की यूनिवर्सल बेसिक इन्कम अवधारणा को लागू किया गया महात्मा गांधी का हर आदमी हर औरत के हाथों को काम दो इसे ओझल किया गया तो हिन्द राष्ट्रीय पतन की धारा अत्यंत तीव्र हो जायेगी इसलिये आज भी हिन्द के सामने रोजगार की गंगा गोमुख से गंगा सागर तक प्रबल वेग से वेगवती बनाने के लिये केवल चर्खे पर ऊन सूत रेशम की कताई हथकरघे पर हाथ कते अथवा मिल कते सूत की बुनाई चर्खा और हथकरघा बुने कपड़े के निर्यात के लिये चीन से आगे बढ़ जाना दुनियां के हर देश में भारतीय परिधान पहुंचे देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों को चर्खा व हथकरघा से जोड़ कर खादी और हैंडलूम के कपड़े गांव गांव शहर के मुहल्ले दर मुहल्ले में तैयार हों यह आज के भारत की आर्थिक जरूरत है जिसे महात्मा गांधी ने सौ वर्ष पहले आंक लिया था और स्थितप्रज्ञतापूर्वक छिन्नसंशय होकर आर्थिकी उत्थान के लिये चर्खे व हथकरघे का सहारा लेने के लिये हिन्द के लोगों को अहर्निश प्रेरित किया।
गांधी मार्ग हिन्दुस्तानियों को कृषि उत्पादन में बढ़त भी दिला सकता है। ब्रजभाषा का एक काव्य भ्रमरगीत सार है। भौंरा जिसे पश्चिम के लोग हनी बी कहते हैं हिमालयी गांवों में मौन कहलाता है। दलहन तथा तिलहन उत्पाद बढ़ाने में भौंरों या मौन वंश की उत्साहवर्धक भूमिका है। मौनपालन जिसे अंग्रेजी में बी कीपिंग या मधुमक्खी पालन कहा जाता है हिन्द के गांव गांव व हर जंगल में मधुमक्खी छत्ते हुआ करते थे। ये मधुमक्खियां खेतीबाड़ी के उत्पादन को बढ़ाने में मददगार थीं। जगह जगह डारसिट हनी बी के छत्तों से शहद निकासी करने वाले लोग शहद की उपलब्धि कराते थे। प्रतीति यह होती है कि यूरप में बी कीपिंग प्रकारांतर से नयी उद्यमिता है पर भारत में भौंरों के छत्ते जिन्हें भंवरा भी कहते हैं उनकी सहायता कृषि उत्पादन में मददगार थी। महात्मा गांधी के ग्रामीण उद्यमिता संवर्धन कार्यक्रम में मौनपालन या बी कीपिंग की बहुत बड़ी भूमिका है। वैकुंठ ल. मेहता के नेतृत्व में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने हिन्द के तत्कालीन प्रमुख मौनपाल डाक्टर एस के कल्लापुर के नेतृत्व में बी कीपिंग प्रोग्राम संचालित किया। पुणे में हनी बी रिसर्च इंस्टीट्यूट कायम कर भारतीय मौनपालन को गतिवान बनाया। हिमालयी क्षेत्र में पंडित आर. चि. मुहू ने एपिस इंडिका मौनवंश के संवर्धन के लिये मौनालय निर्माण प्रक्रिया शुरू की। नैनीताल में चेतराम साह ठुलघरिया इंटर कालेज के संस्थापक प्रबंधक दिवंगत चंद्रलाल साह ठुलघरिया ने आल इंडिया बी कीपर्स फोरम कायम कर मौन पालन को विशेष तौर पर एपिस इंडिका मौन वंश की श्रीवृद्धि का मार्ग अपनाया। आज की जरूरत कीटनाशक द्रवों रहित जैव कृषि उत्पादनों को संवर्धित करना है। खादी ग्रामोद्योग आयोग अपने मौनपालन कार्यक्रम के जरिये हिन्द की कृषि उत्पादकता का संवर्धन करने में मददगार हो सकता है बशर्ते संयुक्त राज्य अमरीका की तरह हनी बी प्रोग्राम को जिस तरह अमरीका के राष्ट्रपति स्वयं रूचि लेकर ह्वाइट हाउस में हनी प्रोग्राम का अनुश्रवण करते हैं भारत का हर लोकप्रतिनिधि हर राजनेता देश को समृद्ध बनाने के लिये अपने निजाम स्थान में कम से कम पांच मौनालय स्वयं देखने का राष्ट्रीय शिवसंकल्प ले। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी मौनपालन उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये अपने विश्वासभाजन विनय कुमार सक्सेना को सुझाव दें कि बी कीपिंग को फिर वेगवान बनाने के लिये देश भर के मौनपालकों को उत्साहित कर कम खर्चे में ज्यादा उपलब्धियों वाला मौनपालन उद्यमिता को बढ़ावा देने देश की तिलहन दलहन उत्पादकता संवर्धित करने के लिये देश के हर घटक राज्य में मौनपालन की मौजूदा स्थिति का आगणन किया जाये। घटक राज्यों की मौनपालन उद्यमिता स्थिति का आकलन करने के पश्चात खादी ग्रामोद्योग आयोग पुणे में मौनपालन महासभा का आयोजन कर निर्जीवता की ओर अग्रसर होरहे खादी ग्रामोद्योग आयोग में प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में नया जीवनदान दिलाने आगे आयें। भारत के गांवों की उद्यमिता खादी हथकरघा हैंडलूम कपड़ा और गांव गांव में पारंपरिक ग्रामोद्योगों को उस तरीके से संवर्धित करना जिसका श्रीगणेश 1954 में वैकुुंठ ल. मेहता ने किया। गांवों से गरीबी निवारण का मुख्य कारक तत्व है, नीति आयोग के सदर अरविन्द पनगरिया महाशय की सोच में महात्मा गांधी की वह अवधारणा निहित है जिससे महात्मा ने मुफ्तखोरी न करने का स्वयं व्रत लिया अपने देशवासियों को अपने हाथ से काम करने का गुरूमंत्र दिया। वर्तमान समय में मुल्क में जनहित कारी हजारों परियोजनायें चल रही हैं। लोक राजस्व और विश्वस्तरीय अथवा महाद्वीप स्तरीय यथा एसियन डेवलपमेंट बैंक, से ऋण लेकर जिन परियोजनाओं को संचालित किया जारहा है उनमें से शत प्रतिशत परियोजनायें पी.पी.पी. मोड वाली परियोजनाओं सहित कार्मिक अथवा परियोजना बनाने वाले व्यक्तियों की दक्षिणा राशि पहले ही सुनिश्चित हो जाती है यह समूचा उपक्रम लोक राजस्व की खुली लूट के अलावा अन्य कोई कारगर लोक संग्रही लोकाहितकारी उपलब्धि नहीं कराता। लोक राजस्व अथवा वैश्विक वित्त संगठनों या एसियन डेवलपमेंट बैंक के कर्जे से राजकर्मियों में अनर्जित धन कमाने की होड़ लग जाती है। दूसरी सबसे बड़ी कठिनाई आजादी के पिछले सत्तर सालों में उन राज्यों को छोड़ कर जहां शराबबंदी राज्य का नीति मंत्र है ज्यादातर राज्यों में शराबखोरी को जनहितकारी परियोजनाओं ने भी बढ़त की ओर ढकेला है। एक उदाहरण प्रस्तुत है - महात्मा गांधी की कुमांऊँ प्रवास यात्रा का आयोजन जून 1929 में पंडित नेहरू ने किया। महात्मा गांधी ने दो रात्रि विश्राम गांधी कुटी प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत में किया। पूरे पंद्रह दिन अल्मोड़ा जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के डाक बंगले कौसानी में ठहरे। वहां उन्होंने गीता को गुजराती भाष्य अनासक्ति योग की भूमिका लिखी। अनासक्त जीवन दर्शन का तरीका हिन्द के लोगों को समझाया। कौसानी हिन्दी के छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्मभूमि भी है। उनका जन्म 20 मई 1900 को कौसानी में हुआ। 1991 में तत्कालीन उ.प्र. की सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में शराबखोरी को बढ़ावा देने का फैसला लिया। शराब के सेवन से अनेक परिवार तबाह होगये प्रेमा जोशी नाम की समाज कल्याण का मार्ग अपनाने वाली प्रति वर्ष 20 मई को सुमित्रानंदन पंत जयंती के अवसर पर व्यापक शराबखोरी से असमय मृत्युग्रस्त होने वाले परिवार यथा पत्नी व बच्चों को अपने पैरों पर खड़े होने की पद्धति का श्रीगणेश किया। प्रतिवर्ष सैकड़ों ऐसे परिवार जिनमें पिता या पति की शराबखोरी से होने वाली मौत से त्रस्त स्त्रियों व उनके बच्चों को पढ़ना अपने हाथ से काम करना तथा अमरीकी अंग्रेजी के सिंगल पेरेंट फैमिली शैली के समानांतर मातृशक्ति को जाग्रत कर मां और बच्चों में ऐसी ऊर्जा का श्रीगणेश किया जिससे प्रतिवर्ष सैकड़ों परिवारों को अपने श्रम से सक्षम बनाने का मार्ग प्रशस्त किया तथा वे लगातार पचीस वर्षों से प्रतिवर्ष 20 मई सुमित्रानंदन पंत जयंती के अवसर पर कौसानी में उन परिवारों के मां बच्चों को प्रोत्साहित करने का वार्षिक पर्व मनाती आरही हैं। उत्तराखंड के नये राज्य के गठन के पश्चात शराबखोरी घटी नहीं बढ़ रही है। बोरारौ घाटी तथा गरूड़ गोमती घाटी के सैकड़ों पीड़ित परिवारों को प्रेमा जोशी ने अपने अहर्निश परिश्रम तथा वात्सल्यता से शराब संत्रास से उबारा है। इस ब्लागर ने यह प्रसंग भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ओर उत्तराखंड के सभी मुख्यमंत्रियों के संज्ञान में प्रस्तुत किया। उत्तराखंड सरकार से शराब से होरही समाज संत्रास से बचने के जो उपाय श्रीमती प्रेमा जोशी गांधियन बेसिक शिक्षा क्रम के जरिये प्रयोग कर रही हैं उन्होंने सैकड़ों परिवारों का योगक्षेम मार्ग प्रशस्त किया है उसे प्रकाश में लाया जाये। उत्तराखंड सरकार प्रतिवर्ष मदिरा राजस्व पेटे पंद्रह अरब रूपये अर्जित करती है। शराब संत्रास से बचने के जो उपाय प्रेमा जोशी ने किये हैं उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाश में लाये जाने की जरूरत है। अभी तो उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के 15 फरवरी 2017 को मतदान कराने में व्यस्त है। जरूरत इस बात की है कि श्रीमती प्रेमा जोशी की नयी तालीम वाली शैक्षिक धारा ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं उसका विहंगम भाव लोकन अवश्य होना चाहिये। अगर राज्य सरकार अपने आपको समर्थ नहीं पाती भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से प्रार्थना करे कि प्रेमा जोशी का स्तुत्य प्रयास प्रकाश में लाया जाये। शराब से होरही तबाही से कैसे निबटा जाये यह गुरूमंत्र प्रेमा जोशी ने ऊर्ध्वबाहु होकर उच्चारण किया है।
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