Friday, 10 February 2017

कन्नड़ भाषी वनमाल विश्वनाथ का अंग्रेजी अनूदित हरिश्चन्द्र काव्य मार्कण्डेय पुराण का हरिश्चन्द्रोपाख्यान।
क्या सत्य हरिश्चन्द्र उपाख्यान को सही समझने के लिये साने गुरू जी की आंतर भारती ही ज्ञान स्त्रोत है ? 
यदि हां तो सत्य हरिश्चन्द्र आख्यान को ही आंतर भारती आधार क्यों न माना जाये ?
डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने श्रीमद्भगवद्गीता का भाष्य आज की दुनियावी लिंग्वा फ्रांका अंग्रेजी में प्रस्तुत करते हुए यह स्वीकार किया कि भगवद्गीता को सही सही समझने में अंग्रेजी भाषा पूर्णतः मददगार नहीं हो पाती है। भाष्य प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति कृष्णार्जुन संवाद के यथातथ्य निरूपण करने में सफल नहीं हो पाते हैं। वस्तुतः इस उक्ति में अनूदित काव्य में मूल काव्य की आत्मा का अभाव खटकता है। संत विनोबा भावे भारतीय भाषा समूहों सहित अरबी भाषा में गाई जाने वाली कुरआन शरीफ की आयतों का उच्चारण अनेकानेक हिन्द के कुरआन शरीफ प्रस्तोताओं से ज्यादा सटीक थे। भाषा को समझने की यह योग्यता किसी बिरले ही व्यक्ति में ज्यादा तीव्र होती है। भगवद्गीता का मराठी संस्करण ज्ञानेश्वरी हर मराठी भाषी उसी  तरह पाठ करता है जिस तरह गुरूवाणी का जाप सिख धर्मावलंबी करते हैं। भगवद्गीता के मूल संवाद को गीता ज्ञानी सस्वर गाते हुए व्यक्त करते हैं। हिन्द में ज्ञानेश्वरी व रामचरित मानस का व्यापक प्रभाव क्षेत्र है। इन दोनों ज्ञान कोशों से साक्षर ही नहीं भारत का निरीक्षर श्रौत विधा के आधार पर लाभान्वित होता रहता है। महात्मा गांधी ने सत्य हरिश्चन्द्र नाटक से अत्यंत प्रभावित होकर ही सत्याग्रह का मार्ग अपनाया। सत्य हरिश्चन्द्र के जीवन उद्देश्य को आत्मसात करने के लिये सूर्यवंशी राजाओं की इतिगाथा समझनी होगी। हरिश्चन्द्रोपाख्यान का मूल क्षेत्र साकेत या अयोध्या के साथ साथ मणिकर्णिका है। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के लिये हिन्द के आसेतु हिमाचल पूर्व में इरावती से लेकर धुर पश्चिम में वितस्ता व सिंधु नदियों तक हिन्द में यह कहावत है - 
प्रभाते बदरिकाश्चैव मध्याह्ने मणिकर्णिका, भोजने तु जगन्नाथ शयने कृष्ण द्वारकाः।
हरिश्चन्द्रोपाख्यान पंचम वेद महाभारत सहित मार्कण्डेय पुराण सविस्तार भाषित है। कन्नड़ भाषा के अलावा भारत की सभी भाषाओं व लिपियों में हरिश्चन्द्रोपाख्यान उद्गीत हुआ है। नागरी लिपि जिसमें वैदिक तथा लौकिक संस्कृत के अलावा हिन्दी मराठी कोंकणी डोंगरी नैपाली मैथिली संथाली भाषायें नागरी लिपि का उपयोग करती हैं। भारत में नागरी लिपि के समानांतर फारसी पंजाबी गुजराती कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बांगला मइती असमी तथा अरबी लिपियां भी प्रयुक्त होती हैं। फारसी लिपि में उर्दू अरबी लिपि में सिंधी भाषा लिखी जाती है। भारत विभाजन के पश्चात भारत में बसे सिंधी भाषी अरबी के समानांतर नागरी लिपि का भी उपयोग सिंधी भाषा में करते हैं। सत्य हरिश्चन्द्र उपाख्यान भारत की 296 भाषाओं में उपलब्ध है। विभिन्न भाषायें व लिपियां अपने अपने क्षेत्रों की जरूरत के मुताबिक सत्य हरिश्चन्द्र उपाख्यान में थोड़ा बहुत बदलाव भी कर सकती हैं। आठ शताब्दी पूर्व याने ईसा की बारहवीं शताब्दी में हरिश्चन्द्र काव्यम् की रचना हुई। कन्नड़ भाषा में रचित काव्य में वनमाला विश्वनाथ के मतानुसार राघवांका नामक कन्नड़ ने काव्य सृजन किया। सत्य हरिश्चन्द्र कथानक तो हिन्द की हरेक भाषा व बोली में लोकसंग्रह का कारक साहित्य है। नारायण मूर्ति कन्नड़ साहित्य को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से लोकप्रियता दिलाने के लिये कृतसंकल्प हैं। नारायण कृष्ण मूर्ति लाइब्रेरी के माध्यम से वे और उनके युवा पुत्र जो प्रयास कर रहे हैं वह प्रशंसनीय है परंतु एक बात ध्यान देने की है कि जब तक भारतीय भाषाओं और लिपियों को एक दूसरे के नजदीक लाने का भगीरथ प्रयास नहीं किया जायेगा केवल अंग्रेजी में अनुवाद करने से भारतीय संस्कृति की सर्वांगीणता पूरी पूरी तरह प्रकाश में नहीं आ पायेगी इसलिये साने गुरू जी का आंतर भारती दर्शन जहां भारती की भाषाओं को एक दूसरे के करीब लायेगा वहीं रामचरित मानस वाल्मीकि रामायण महाभारत भर्तृहरि के नीति श्रंगार तथा वैराग्य शतक जो भरथरी के तौर पर समूचे उत्तर भारत में गाया जाता है और संस्कृत केे माध्यम से भर्तृहरि ने कहा था - 
याम् चिन्तयामि सतता विरता साप्यत्र मिच्छति स जने नुरक्तः धिक्माम् धिक्ताम् धिक्तत्र्। 
नारायण मूर्ति महोदय व उनके युवा पुत्र ने कन्नड़ व अंग्रेजी में जो साहचर्य का स्त्रोत अपनाया है उसे वे आंतर भारती के जरिये ज्यादा आकर्षक बना सकते थे। भारतीय भाषाओं और लिपियों में रोमन लिपि के छब्बीस अल्फाबेट से दुगुने अल्फाबेट हैं। स्वर तथा व्यंजन की उच्चारण क्रिया भी भारतीय भाषाओं व लिपियों में समान है। सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि आंतर भारती की सभी भाषाओं का शब्द व धातु स्त्रोत वैदिक तथा लौकिक संस्कृत भाषा है। कवि राघवांक को उद्धृत करते हुए कवि और रवि के संबंध में हिन्दी भक्ति काव्य का कथन है - जहां न जाये रवि वहां जाये कवि। वनमाल विश्वनाथ महाशय हरिश्चन्द्र काव्यम् का अंग्रेजी भाषान्तरण करते समय यह स्मरण नहीं कर पारहे हैं कि राम भक्त कबीर ने कहा था - भगती उपजी द्रविड़ देश। कृष्ण द्वैपायन पराशर-सत्यवती नंदन बादरायण वेदव्यास ने पद्म पुराण में भक्ति नारद संवाद में भक्ति ने अपना परिचय देवर्षि नारद को देते हुए कहा था - 
अहम् भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तरूणौ सुतौ ज्ञान वैराग्य नामानौ कालयोगेन जर्जरौ।
भक्ति अपनी कहानी कहते हुए नारद को बताती है। - 
द्रविड़े साहम् समुत्पन्ना वृद्धिं कर्णाटके गता, क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतांगता।
कवि राघवांक के कन्नड़ काव्य को प्रस्तुति देते हुए वनमाल विश्वनाथ के कन्नड़ काव्य को उद्धृत करते हुए लिखते हैं - 
भुम् विभुगिल भुग्विभुगिल चिलि चिल इव चिलिचिल इव दग्धगिल दग्धगिल धर्धरिल  धर्धरिल धर्धरिल 
चिम चिमिल चिम चिमिल चत अचत् अधिमंत्र धाधमं धग्धमंत्रित धुत अधुत वु।
          कन्नड़ भाषा में तमिल मलयाली तैलुगु मराठी तथा कोंकणी भक्ति साहित्य का भी प्रभाव है। किसी भी भाषा का उस भूमि से अनन्य संबंध होता है जहां के लोग उस भाषा को बोलते हैं। भाषाविज्ञानी सुनीति कुमार चाटुर्ज्या और उनके सहयोगी डाक्टर हेम चंद्र जोशी भारतीय भाषाओं उनके शब्दोच्चार तथा संस्कृत प्राकृत पालि तथा वर्तमान भारतीय तद्भव भाषाओं जिनमें कन्नड़ भी एक महत्वपूर्ण भाषा है उसे सत्य हरिश्चन्द्रोपाख्यान के संदर्भ में मार्कण्डेय पुराण में वर्णित हरिश्चन्द्र उपाख्यान से जोड़ कर ही देखना होगा।वनमाल विश्वनाथ बंगुलुरू स्थित अजिम प्रेमजी विश्वविद्यालय के अभ्यागत प्राध्यापक हैं। विश्वविद्यालय उनकी कन्नड़ साहित्य मीमांसा का अपने विद्यार्थियों को हृदयंगम कराने का प्रयत्नशील है। राघवंक हरिश्चन्द्र काव्य के समानांतर सत्य हरिश्चन्द्र संबंधी साहित्य तमिल, तैलुगु मलयाली कोेंकणी मराठी गुजराती पंजाबी डोंगरी कश्मीरी उड़िया बांगला असमी मइती नैपाली भाषाओं में भी उपलब्ध है इसलिये हिन्द की मौजूदा जरूरत हिन्द की विभिन्न भाषाओं में राजा हरिश्चन्द्र कथानक को समझने की जरूरत है। सत्य हरिश्चन्द्र प्रकरण में महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि तथा नई सृष्टि के सृष्टा विश्वामित्र के बीच अनेक वर्षों तक पक्षियुद्ध हुआ। शुरूआत हुई हरिश्चन्द्र के पिता राजा त्रिशंकु से। त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे उनके कुल पुरोहित महर्षि वशिष्ठ ने सशरीर स्वर्गारोहण अव्यावहारिक बताया। त्रिशंकु विश्वामित्र की शरण में पहुंचे। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग पहुंचाने का वादा किया एवं प्रयत्न भी किया पर त्रिशंकु लटक गये सशरीर स्वर्ग नहीं पहुंच सके। त्रैशंकव हरिश्चन्द्र मर्यादाओं को पालन करने वाले सत्याचरण करने वाले राजपुरूष थे। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा महर्षि वशिष्ठ की विवेकशीलता के अनुसार संपन्न की। इस संबंध में यह जानना जरूरी है कि विश्वामित्र राजा गाधि के पुत्र थे। राजा गाधि की प्रथमा कन्या सत्यवती थी। भृगुवंशी ऋषि च्यवन राजा गाधि के राजमहल पहुंचे। उन्होंने राजा से निवेदन किया कि अपनी कन्या सत्यवती का विवाह च्यवन से कर दें। राजा गाधि ने इन्कार नहीं किया शर्त लगा दी यदि सहस्त्र श्यामकर्ण अश्व लाकर दो तो सत्यवती का पाणिग्रहण आपसे करा दूँगा। राजा गाधि सोचते थे कि सहस्त्र श्यामकर्ण अश्व लाना सरल नहीं है पर च्यवन ने वरूण देव लोकपाल आराधना संपन्न कर श्यामकर्ण घोड़े प्राप्त कर राजा गाधि को सौंप डाले। गाधि की राजधानी गंगातट गाधिपुर वर्तमान गाजीपुर उ.प्र. थी। सत्यवती अपने पति की उत्कृष्ट पौरूष से प्रभावित हुई। उसने च्यवन से निवेदन किया मुझे पुत्र रत्न चाहिये। साथ ही मेरे पिता राजा गाधि को भी पुत्रवान होना चाहिये। ऋचीक ने स्वविवेक से दो महत्वपूर्ण चरू निर्मित किये तथा सत्यवती से कहा - यह चरू तुम स्वयं खाना एवं दूसरे चरू को अपनी माता को खिलाना। सत्यवती ने उल्टा कर डाला जो चरू स्वयं खाना था उसे मां को खिला दिया और मां वाला चरू स्वयं खा लिया। मां का चरू स्वयं खा लेने से सत्यवती बेचैन रहने लगी। उसने अपने पति च्यवन ऋषि को अपना कष्ट बताया। ऋचीक ने अपनी पत्नी से कहा - घोरो दण्ड धरः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्म स्त्रियः। सत्यवती दण्ड घर पुत्र नहीं चाहती थी उसने अपने पति से कहा, कुछ ऐसा कीजिये कि मेरा पुत्र घोर दण्डधर न हो। पौत्र को दण्ड धर होने का मार्ग प्रशस्त कर दीजिये। ऋचीक ने हंस कर अपनी पत्नी से कहा अभी तो तुम्हारा पुत्र ही नहीं हुआ तुम चाहती हो पुत्र के बजाय पौत्र दण्ड धर हो। यह है मामा भांजे की पटकथा। मामा विश्वामित्र थे उनके भागिनेय जमदग्नि थे। जमदग्नि सत्यवती ऋचीक पुत्र थे। ऋचीक ने विमन होकर सत्यवती को तथास्तु तो कह डाला उन्हें मर्यादाओं का उल्लंघन भी करना पड़ा। ऋचीक पुत्र जमदग्नि के बजाय जमदग्नि के पुत्र रेणुकानंदन राम जिन्हें दुनियां परशुराम कह कर पुकारती है। उन्हें घोर दण्डधर होने का प्रबंध कर डाला पर साथ में यह भी कहा - सत्यवती यह सन्मार्ग नहीं है। तुम्हारी हेकड़ी के कारण मैं यह कर रहा हूँ। जमदग्नि व जामदग्न्य राम को भारत में आज भी प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में समूचे भारत विशेषतया विशेष रूप से पश्चिमी भारत में उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। गुजरात राजस्थान हरयाणा पंजाब तथा मध्यप्रदेश के संपूर्ण पश्चिमी इलाके में अक्षय तृतीया को विवाह करना अत्यंत उपयोगी माना जाता है। 
विद्वान अनुवादक वनमाल विश्वनाथ महाशय ने अपने अनुवाद को केवल कन्नड़ अंग्रेजी तक ही सीमित रखा। सत्य हरिश्चन्द्र कथाभूमि कर्णाटक विशेषतया दक्षिण कन्नड़ का क्षेत्र न होकर अवध साकेत तथा काशी एवं काशी में प्रवाहमान भागीरथी या जाह्नवी नदी है। विद्वान अनुवादक ने कन्नड़ लिटरेरी कल्चर शब्दों का प्रयोग करते हुए कन्नड़ भाषी साहित्यिक संस्कृति का उल्लेख किया हैै। कन्नड़ भाषी कर्णाटक सहित हिन्द के हर इलाके में हरिश्चन्द्रोपाख्यान गाया जाता है। हरिश्चन्द्र कथानक भारत की आत्मा का प्रतीक है। अनुवादक महाशय ने अंग्रेजी भाषा के Legend शब्द का प्रयोग कर हरिश्चन्द्र काव्य के प्रणेता कवि राघवांक के सत्य हरिश्चन्द्र कथ्य को दंतकथा किंवदंती के स्तर पर लाकर काव्य की सत्याधारित कल्पना को निर्भीक बना डाला है। सत्य हरिश्चन्द्रोपाख्यान की भयावह कुसेवा है महाशय वनमाल विश्वनाथ कन्नड़ साहित्य के गहन अध्येता प्रतीत होते हैं, कन्नड़ साहित्य तथा कन्नड़ अध्येता वैदिक और लौकिक संस्कृत का भरपूर साहित्यिक तथा आध्यात्मिक विवेक को समझने वाला मानसरोवर के हंस की तरह नीरक्षीर विवेक निष्णात नहीं। कबीर और कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के अनुसार भक्ति का बचपन दक्षिण कर्णाटक में ही बीता कुमारी तथा किशोरी कन्या में जो आकांक्षायें जाग्रत होती हैं वह कर्णाटक के भक्ति साहित्य में विद्यमान हैं। भक्ति का प्रौढ़ होना प्रौढ़ावस्था में ज्ञान वैराग्य दो पुत्रों को जन्म देना तथा पुष्टिमार्गी भक्ति का क्षेत्र महाराष्ट्र और गुजरात का वैष्णव समाज है। वनमाल विश्वनाथ महाशय कहते हैं - राघवांक रचित हरिश्चन्द्र काव्य कन्नड़ साहित्यिक संस्कृति का मजबूत पायदान है। महाशय विश्वनाथ यह भलीभांति जानते थे कि सत्य हरिश्चन्द्र उपाख्यान हर भारतीय भाषा का सत्याधारित पर्व है। राघवांक के काव्य की ललित रचना को अंग्रेजी भाषा के जरिये लोकविश्रुत बनाने से पहले उन्हें चाहिये था कि काशी और कर्णाटक में दूरी कितनी है ? कर्णाटक का हर वेदाभ्यासी संस्कृत पढ़ने का शौकीन विद्यार्थी काशी आकर ही ज्ञानार्जन करता था। जो चूक वनमाल विश्वनाथ महाशय से हुई है उसका निराकरण नारायण मूर्ति लाइजेनी को अपने आगामी अभियानों में संपन्न करना चाहिये। अनुवादक महाशय ने लिखा Then there is the tricky याने अत्यंत पेचीदा सवाल सैद्धांतिक विचारधारा का भी है। सैद्धांतिक मूल्यों की स्थापना के बारे में अनुवादक महाशय की सोच है कि मजहबी अथवा सामाजिक पारंपरिक विश्वासापन के तरीके आज के आधुनिक मानसिकता वाले वातावरण में कभी कभी अप्रासंगिक महसूस होने लग जाते हैं। सत्य हरिश्चन्द्र कथानक अथवा भारत में नर्मदा नदी के समुद्र में समाने के अवसर पर भड़ौच जिसे संस्कृत साहित्य भृगुकच्छ कहता है वहां प्रह्लाद के पौत्र विरोचन के पुत्र दैत्यराज बलि ने वामन को तीन कदम जमीन देने का जो संकल्प लिया तथा सत्य से न हटने की जो मानसिकता अपने पुरोहित कुलगुरू शुक्राचार्य को कहा वे वचन भंग नहीं करेंगे। दैत्यराज पुरोहित उशना ने बलि को कहा था - अथैतत् पूर्ण मम्यात्मम्पन्च नेत्वानृतं वचः सर्वम् नेतामृतं ब्रूयात स दुष्कीर्तिं श्वसन् नृता स्त्रीषु नर्म विवाहेेषु नां वृत्यर्थे प्राण संकटे भो ब्राह्मणार्थ हिंसायां चानृतं स्या जुगुप्सितम्। पर राजा बलि ने सत्यवादी हरिश्चन्द्र का अनुसरण किया। वामन को तीन कदम जमीन देना अपना कर्तव्य माना। परकाय प्रवेश प्रसंग को भी वनमाल विश्वनाथ महाशय अपने कथ्य में जोड़ रहे हैं। राघवांक हरिश्चन्द्र काव्य आठ सौ साल पुराना साहित्य है आदिशंकर के मण्डन मिश्र के साथ हुए शास्त्रार्थ में भारती ने शंकराचार्य को विजयी घोषित करते हुए कहा - सन्यासी अभी तो आपने आधी विजय पाई है। मैं मंडन मिश्र की अर्धांगिनी हूँ मुझे परास्त करो तो ही आप विजयी होंगे। आदिशंकर से भारती ने कहा - मैं तो स्त्री हूँ केवल कामशास्त्र ही जानती हूँ। शंकर ने कहा - मां सप्ताह का समय दान दो। शंकर ने कामशास्त्र का ज्ञान परकाय प्रवेश से प्राप्त किया। हिन्द में आज भी परकाय प्रवेश के प्रयोगकर्ता उपलब्ध हैं। देश में वानप्रस्थी सन्यासी जीवन व्यतीत करने वाले लोगों की संख्या भी करोड़ों में है। सन्यास मार्ग के राही भी दो श्रेणियों में आते हैं। पहला वे लोग जो हिमालय की कन्दराओं देश के विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों नदी तटों में एकांत वास करते हैं। जब उन्हें महसूस होता है कि परकाय प्रवेश से लोकहित संभव है वे उस मार्ग पर चलते हैं। सन्यासियों धर्मगुरूओं तथा उपदेशकों का एक ऐसा समूह भी हिन्द में है जो सब प्रकार के सुख ऐश्वर्य तथा धनलाभ के रास्ते अपना कर धर्म अथवा सत्य मार्ग का अवलंबन करने का नाटक करते हैं। वित्तशाठ्य से लबालब भरे हैं। अंग्रेजी साहित्य में ऐसे लोगों को आमजन Advertorial आकर्षक विज्ञापनीय भाषा जिसको देख संत कहे जाने वाले लोगों का मन भी ललचाने लग जाता है। वास्तविकता तो यह है कि किसी भी सत् साहित्य का आध्यात्मिक तथा रागात्मक नवरस आनंद केवल मूल साहित्य से ही संभव है। अनूदित साहित्य आध्यात्मिक पाखंड का संवर्धन करता है। 
A translator’s tale of bringing an ancient Kannad classical into modern English में सत्य हरिश्चन्द्र  काव्यात्मकता को हिन्दू दैनिक का साहित्यिक विश्लेषण 22 जनवरी 2017 के अंक में सत्य हरिश्चन्द्र कथानक को काल्पनिक किंवदंती मानते हुए आधुनिक अंग्रेजी के जरिये हिन्दुस्तान के अंग्रेजीदां भद्रलोक का ज्ञानवर्धन करने के लिये प्रस्तुत किया गया है। सत्य हरिश्चन्द्र कथानक को असत्य व किंवदंती मानने वाले जनसमूह को जबरन सत्याग्रह का रास्ता अपनाने के लिये बाध्य किया जाना युगधर्म नहीं है। जरूरत केवल इतनी है कि भारतीय भाषाओं में सत्य हरिश्चन्द्र को साने गुरू जी की आंतर भारती उपक्रम का पहिया बनाये जाये ताकि ज्ञान पिपासु लोगों को सत्य क्या है ? सत्याग्रह क्या है ? 
सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्, प्रियम् तु नानृतम् ब्रूयात् एव धर्म सनातनः।
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