तुलसी ने कहा था - अवसि देखिअ देखन जोगू।
क्या हिन्द के दलितों को रैदास सरीखे ज्ञानी नेतृत्व की दरकार है ?
क्या हिन्द के दलितों को रैदास सरीखे ज्ञानी नेतृत्व की दरकार है ?
क्या रामविलास पासवान, उदित राज उत्तर मायावती दलित हित साधक पथ के मार्गदर्शक बन कर दलितों को हिन्दू डेमोक्रेसी मेजोरिटी दे सकते हैं ?
सागरिका घोष टाइम्स आफ इंडिया के 1 मार्च 2017 के अंक में अपने स्तंभ-उत्तर प्रदेश के दलित हिन्दुत्व अथवा अंबेडकर ? इस यक्ष प्रश्न को उठा कर कह रही हैं कि उत्तर प्रदेश में टिकाऊ दलित उत्क्रांति उत्कर्ष की ओर है पर वे मानती हैं कि वामसेफ विचारक महाशय कांशीराम ने अपने गुरू शिष्या प्रयोजन के जरिये बहन मायावती में दलित नेतृत्व की जो अलख जगाई महाशया सागरिका घोष मानती हैं दलित उत्क्रांति का लाभार्जन बहन मायावती को होने वाला है। उन्होंने दलित उत्क्रांति के लिये अंग्रेजी के परमेनेंट शब्द का प्रयोग किया। भारतीय वाङमय का अमरकोष कहता है - क्रांति, उत्क्रांति मृत्यु का पर्याय है। यथास्थिति का परिवर्तित होना ही उत्क्रांति है। सागरिका घोष बंगला भाषी हैं। उ.प्र. में ब्रज और अवधी इन दो भाषाओं के अलावा भोजपुरी, बुंदेली, रेखता या खड़ी बोली जिसे नागरी लिपि में लिखा जाये तो हिन्दी कहते हैं। फारसी लिपि व फारसी शब्द बाहुल्य वाली खड़ी बोली उर्दू कही जाती है। मौजूदा उ.प्र. पांच भाषाओं और पांच संस्कृतियों का संगम है। उत्तराखंड राज्य गठन से पहले इस राज्य में सात भाषायें थीं जिनमें कुमाउनी व गढ़वाली अब उत्तराखंड की भाषायें होगयीं। भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर ने अपने पहचान वाले उपनाम को अंबेडकर इंगित किया जो वस्तुतः महाराष्ट्र के ब्राह्मणों की एक उपजाति परक संबोधन था। बाबा साहेब ने अपने गुरू के गुरूमंत्र को स्वीकारते हुए स्वयं को अंबेडकर कहा। गुरू कृपा के अलावा बाबा साहेब पर वडोदरा गायकवाड़ राजवंश की भी महाविभूतिपूर्ण सहानुभूति थी जिसे बाबा साहेब ने तहेदिल से स्वीकार किया। उनके तार्किक विश्लेषण बाबा साहेब महात्मा गांधी से उम्र में 22 वर्ष छोटे थे, जिस तरह महात्मा और उनके पुत्र हरिलाल में पीढ़ी अंतराल जन्य विभेद था वैचारिक क्षेत्र में महात्मा गांधी के अछूतोद्धार तथा हरिजन सेवा के लिये स्थापित हरिजन सेवक संघ के प्रति बाबा साहेब की विचार तरंगें उतनी ही तीखी थीं जितनी महात्मा गांधी के ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल को पितृ सत्तात्मक नांदीमुख विचार अग्राह्य था। पीढ़ियों केे अंतराल में ऐसा वैचारिक तथा व्यवहारमूलक आचरण प्राणी मात्र के लिये स्वाभाविक पीढ़ी अंतराल दोष है जिसे नेस्तनाबूद नहीं किया जा सकता। इस विचार भेद का तरीका बदल सकता है पर पीढ़़ी अंतराल का दोष निर्मूल नहीं किया जा सकता है। इसलिये जब गांधी अंबेडकर विचार भेद पर बहस करनी हो दोनों पक्षों के गुणदोष आकलित किये जाने चाहिये। किसी को श्रेष्ठ दूसरे को उससे कमतर ठहराना विश्लेषण का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। होता यह है कि गांधीवाद और अंबेडकरवाद के पक्षधर अपना पक्ष मजबूत दिखाने का प्रयास करते हैं उसकी मौलिक समीक्षा के लिये विचार पोखर के मत्स्य न्याय का सहारा लेते हैं। तालाब में बड़ी मछली छोटी मछली को उदरस्थ कर देती है इसे ही साहित्य में मत्स्य न्याय कहा जाता है।महाशया सागरिका ने अनुसूचित जाति के खटीक उपजाति का उल्लेख किया है। खटीक लोग पालतू सुअर पालते हैं तथा सुअर का मांस स्वयं भी खाते हैं। सुअर के मांस प्रेमियों को बेचते भी हैं। खटीक लोग गांवों के अलावा उ.प्र. के हर शहर में झुंड के रूप में रहते हैं जहां कहीं भी कभी हिन्दू मुस्लिम दंगा होता है उसमें संघर्ष आमतौर पर खटीकों और मुसलमानों में होता है। खटीक समाज के किसी भी व्यक्ति ने कभी भी इस्लाम मजहब स्वीकार नहीं किया। एक दूसरा समाज वाल्मीकियों का है ये भी खटीकों की तरह एकजुट समाज है। बहन मायावती अथवा दलित समाज के सत्ता संपन्न समाज के महानुभाव मनुवाद को सारे झगड़े की जड़ मानते हैं पर किसी दलित नेता ने मनु शतरूपा गृहस्थ पर आधारित काव्य कामायनी पढ़े बिना मनुवाद के खिलाफ वैसा ही जिहाद छेड़ा है ओसामा बिन लादेन ने अपने जीवनकाल में पूरे वेग से संपन्न किया। जयशंकर प्रसाद का काव्य कामायनी वस्तुतः तुलसी दास के रामचरित मानस जैसा आकर्षक महाकाव्य है। तुलसी रामचरित मानस तो अवधी भाषा में है जयशंकर प्रसाद ने कामायनी आधुनिक हिन्दी में काव्यायित किया। कवीन्द्र रवीन्द्र की गीतांजलि उन्होंने स्वयं अंग्रेजी में अनूदित की उसे नोबेल पुरस्कार मिला। अगर कामायनी का भी अंग्रेजी अनुवाद कर प्रस्तुत किया गया होता आधुनिक हिन्दी का यह महाकाव्य भी नोबेल पुरस्कार पा सकता था। यह तो उस जमाने की बात है जब कामायनी महाकाव्य काशी में प्रकाशित हुआ तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि कामायनी का अनुवाद अंग्रेजी में किये जाने से पूर्व भारत की आंतर भारतियों में यथा असमी बंगला मइती नैपाली उड़िया तैलुगु तमिल मलयाली कन्नड़ कोंकणी मराठी गुजराती पंजाबी सिंधी उर्दू तथा संस्कृत भाषाओं में करने के साथ साथ अंग्रेजी में भी किया जाये। दलित विचारकों चिंतकों तथा दलित साहित्यकारों को कामायनी उनकी अपनी भाषा में अथवा चाहत भाषा में पढ़ने को मिले यह राष्ट्रीय प्रयास अत्यंत उपादेय है। आज दुनियां की मानव आबादी 6 अरब से कुछ बढ़ कर है जिनमें अढ़ाई अरब लोग ख्रिस्ती धर्मावलंबी हैं। ज्यादातर ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के मांसाहारी भोजन का मुख्य अंश गौमांस या बीफ है। हिन्दुस्तान के दलित समाज के अग्रणी व्यक्तियों में बीफ महोत्सव तथा महिषासुर उत्सव के लिये विश्वविद्यालयों के छात्रावासों और भोजनालयों में बीफ महोत्सव मनाया जाता रहा है। जो लोग अपने आपको शाकाहारी या निरामिष होने का प्रचार करते हैं उन्हें चिढ़ाने उनमें घृणा का वातावरण तैयार करने में बीफ महोत्सव तथा महिषासुर के मारे जाने के प्रसंगों को ताजा रखने का अहर्निश प्रयास होता रहता है। यह संघर्ष सुर संस्कृति और असुर संस्कृति वैमनस्य का प्रतीक है। सृष्टि के प्रारंभ काल में हिन्द का पहला सार्वभौम दैत्यराज हिरण्यकश्यप था जिसकी दैत्यधानी का नाम हरिद्रोही था जो आजकल हरदोई के नाम से जानी जाती है। हिरण्यकश्यप ने अपने राज में डुगडुगी पिटवा रखी थी कि जहां जहां गौशालायें हैं गायें हैं वायु शुद्धि के लिये हवन होता है वह सब रोक दो, आग लगा दो। कोई भी व्यक्ति हिरण्यकश्यप के हुक्म की नादेखी न करे परंतु इतना होने पर भी हिन्द में तब भी यज्ञ होते ही थे गायें पाली ही जाती थीं। हिरण्यकश्यप स्वयं महाविष्णु के द्वारा नृसिंह द्वारा मारा गया उसका विष्णु भक्त पुत्र दैत्यराज बना इसलिये परस्पर विरोधी एवं शत्रुता के ऊर्ध्व स्तर तक आरोहण के उपरांत परस्पर प्रतिलोमक खेमे समय के प्रवाह के साथ साथ बदलते रहते हैं। दलित चेतना के परम उत्कर्ष के बावजूद जब तक परस्पर विरोधी स्वभाव वाले व्यक्तियों तथा राजनीतिक या जातीय खेमों में आवश्यकता पड़ने पर संविद होना एक राजनीतिक प्रक्रिया है। लोकतंत्र या डैमोक्रेसी में जब क्षत्रपवाद अथवा राजनीतिक दल की व्यक्ति सुप्रीमो शैली जब तक कारगर रहेगी उसे राजनीतिक तथा डैमोक्रेटिक संयम में रहने के लिये प्रेरणा नहीं मिलेगी पारिवारिक राजकर्ता समूह बढ़ते ही रहेंगे। वे संविधान की व्याख्या अपने अपने दलीय स्वार्थ के अनुसार करते रहेंगे।
अनुसूचित जाति के उन इनेगिने समूहों और जात बिरादरियों में एक ऐसा वर्ग उभरा है जो स्वयं को दलित कहता तो है पर राजकरण के परिप्रेक्ष्य में मजबूत होकर उभर कर सामने आया है। पिछली पांच पीढ़ियों से लगातार प्रशासनिक तंत्र पर अपनी पकड़ मजबूत बनाये हुए है। सुप्रीम कोर्ट ऐसे समर्थ सक्षम तथा सामूहिक रूप से सत्ता संस्थान पर हावी है। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि क्रीमी लेयर की परिधि में आने वाले व्यक्ति वे अनुसूचित जाति से आते हों अनुसूचित जनजाति के अग्रणी हों अथवा मंडल कमीशन की संस्तुतियों से अति लाभान्वित वर्ग याने नेताजी मुलायम सिंह यादव अथवा लालू प्रसाद यादव के राज खानदानी ही क्यों न हों उनका वर्चस्व सुप्रीम कोर्ट के निर्णय कि क्रीमी लेयर से आगे बढ़ गये अनुसूचित जाति अनुसूूचित जनजाति तथा ओबीसी परिधि में आने वाले पिछड़े वर्ग के लोगों पर सख्ती से क्रीमी लेयर सिस्टम लागू होना चाहिये पर व्यवहार में यह प्रतीति होती है कि आरक्षण या रिजर्वेशन जन्य क्रीमी लेयर की आर्थिक सीमा राजनीतिक दल चुनावी लाभार्जन के लिये बढ़ाते जायेंगे जो संपन्न होगये हैं जिनके हाथ में शासन की बागडोर है वे दलित हों अनुसूचित जनजाति वाले कबीलों से आते हों अथवा पिछड़े वर्ग के ही क्यों न हों कोई भी नहीं चाहता कि उसे रिजर्वेशन से लाभ मिल गया है वह उसे अपने विवेक से त्याग मार्ग का अनुसरण करे। अगर हिन्द का जाट समाज वह हिन्दू हो मुसलमान हो या सिख हो कानून की रखवाली करने वाला न्यायमूर्ति समूह वह चाहे हाईकोर्ट हो अथवा सुप्रीम कोर्ट जाटों को प्रगतिशील तथा संपन्न मानता है। जहां तक हिन्दू धर्मावलंबी जाट समाज का संबंध है स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्यसमाज अभियान में हरयाणा और उ.प्र. के जाटों ने अद्वितीय सहयोग दिया। सर छोटूलाल सहित चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल तथा चौधरी बंशीलाल ने जाटों को एकजुट रख कर उन्हें हिन्द की आजादी का हृदयस्थ पोषक तत्व बनाया। रिजर्वेशन की जो मांग प्रगतिशील जाट समाज कर रहा है उसकी देखादेखी गुजरात का संपन्न समाज पाटीदार - पटेल वर्ग भी आरक्षण चाहता है। उ.प्र. के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में आगणित किये जाने का निर्णय लिया जो अभी तो अटक गया है पर देर सवेर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग में सम्मिलित किये जाने के अभियान रूकने वाले नहीं हैं वे चलते रहेंगे। जहां तक जाट आरक्षण का प्रश्न है अविभाजित हिन्द में हिन्दू जाट, सिख जाट तथा मुसलमान जाट ये तीन खेमे थे। यदि हिन्द में हिन्दू जाट रिजर्वेशन उपलब्धि की मुहिम में विजयी होगया तो सिख जाट तथा मुसलमान जाट भी हिन्द में रिजर्वेशन के हकदार हो जायेेंगे वहीं पाकिस्तानी पंजाब जो पाकिस्तान का दिल व दिमाग है हिन्द की जाट संस्कृति का असर पड़ना स्वाभाविक है। महाशया सागरिका घोष लिखती हैं कि बहुत से दलित भरद्वाज नंदन द्रोणाचार्य को खलनायक एवं खतरनाक व्यक्ति मानते हैं। द्रोणाचार्य इतने गरीब थे इतने दलित थे उनकी पत्नी कृपी अपने बेटे अश्वत्थामा को पिसे हुए चावल का रस उबाल कर दूध बता कर पिलाती थी। द्रोण अपने समय के उच्चकोटि के रणवीर थे। दलित श्रीमंत लोग मानते हैं कि गुरू दक्षिणा में द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया था ताकि वह अर्जुन से तीव्र योद्धा न रह सके। शिष्य ने गुरू द्रोण की प्रतिमा बना कर उससे गुरूदीक्षा ली थी। यह स्वीकार किया था कि उस पर गुरू कृपा है। हिन्द में गुरू शिष्य परंपरा अपने किस्म की अद्भुत शिक्षण शैली है। अमरीकी लेखक इलिच इवान ने हिन्द की गुरू शिष्य परंपरा को सराहा है व अमरीकी समाज का सम्मति दी कि शिक्षा गुरू शिष्य सरोकार वाली हो। दलित विद्वानों को चाहिये कि इकतरफा फैसला लेने के बजाय हिन्द के लोगों का हिस्सा बन कर रहें। हिन्द का दलित अमरीका की दासप्रथा से बहुत ऊँचा है। जरूरत इस बात की है कि वह अपना आदर्श भक्त रैदास को मान कर चले। निरंतर संघर्ष के बजाय हिन्दुत्व के कर्णधारों कऔर दलितों के कारगर संवाद की जरूरत है। रामविलास पासवान और उदित राज जैसे दलित राजनेता दलित ओर गैर दलित विशषतया जिन्हें सवर्ण हिन्दू कहा जाता है उनके बीच कारगर संवाद की जरूरत है। डाक्टर राधाकृष्णन ने काशी में महात्मा गांधी व महामना मदनमोहन मालवीय से कहा था - सनातन धर्मशास्त्र में अस्पृश्यता का कहीं उल्लेख नहीं है, यह भारत धर्म में घुसा हुआ दोष है। डाक्टर राधाकृष्णन ने जो बात महात्मा गांधी को कही उसे क्या छुआछूत हिन्दू धर्मशास्त्र का अंग है ? इस समूचे विषय पर सुप्रीम कोर्ट जो फैसला दे उस पर हिन्द का राष्ट्र चले। मूर्ति पूजा मंदिर प्रवेश के मामले में भी भारत सरकार फैसला ले कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सर्वमान्य होगा। हिन्द मंे दलित चिंतन प्रवाह में अब रामविलास पासवान जैसे राजनीति विशारदों और उदित राज सरीखे दलित चिंतन पोखर का आश्रय लेना नये दलित समाज को पूर्णतः स्वीकार्य नहीं है। संपन्न सत्तानशीन तथा सत्ता के गलियारों में गहरी पैठ रखने वाले श्रीमंत दलित समाज दलितों अथवा महादलितों के उस वर्ग से संपर्क नहीं चाहता जो अत्यंत गरीब है और हिन्दुस्तान के शहरों में रह रहे निष्किंचन दलितों के बीच पहुंच कर उनके सुखदुख का प्रतिभागी बनने की इच्छा नहीं रखते। वस्तुतः आज हिन्द के दलितों को रैदास सरीखे नेतृत्व की जरूरत है जिसमें योग्यता के साथ साथ सहानुभूति की महाविभूति भी विद्यमान हो। जिन दलित श्रीमंतों ने गरीबी को नजदीक से अनुभव किया है हिन्द की आजादी से पहले देश में जो आर्थिक हालात थे आजादी के सत्तर वर्ष बाद वह स्थिति नहीं है। युगांतर ने व्यक्ति की लिप्सा का संवर्धन किया है। वह उपहार लेना चाहता है पर जिसके पास दो जून की रोटी का इंतजाम नहीं है उसके लिये वह दलित हो या महादलित अथवा दलित आदिवासी वर्गों से न आता हो पर हो गरीब उसके लिये क्रीमी लेयर के उत्पाद संपन्न श्रीमंत दलित आदिम जाति तथा पिछड़े वर्ग के संभ्रांत समाज में ठौर नहीं है। इसलिये वक्त की जरूरत डैमोक्रेसी में ऐसे दलित नेतृत्व के उभार की जरूरत है जिसमें मानवीय मर्यादाओं के लिये श्रद्धा हो और दलित समाज के व्यापक उत्कर्ष के लिये आत्मबलिदान की क्षमता अर्जित की हो। हिन्द की आजादी के अड़सठ वर्षों के अंतराल में परिवार और भाई भतीजावाद की चौखट में न फंसा हुआ नेतृत्व नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के रूप में भारत को उपलब्ध हुआ है। भ्रष्टाचार का महादानव एक ऐसा अजगर है जो कच्चा निगलने का शौकीन है। निर्भय निर्लिप्त तथा राजकरण में अपने व्यक्तिगत मित्र तथा अपने से शत्रुता का बर्ताव करने वाले राजनीति विशारदों को समदर्शी के तौर पर देखना। जब राजनीतिक विरोधी - डैमोक्रेटिक युद्ध के मैदान में उतर कर लड़ाई लड़ना चाहता हो निर्वैर होकर वाग्युद्ध करना क्योंकि डैमोक्रेसी का युद्ध वाग्युद्ध - वाक् वज्र प्रहार का विस्मयकारी राजनीतिक रहस्य है।
उ.प्र. जो वस्तुतः भारतीय संघ के इतर घटकों की तरह एक भाषा एक रहनसहन का सांस्कृतिक तरीका तथा मजहबी आस्था के नजरिये से भी पूर्ववर्ती संयुक्त प्रांत आगरा व अवध जिसमें सात भाषायी व सांस्कृतिक क्षेत्रों का जमावड़ा था, अयोध्या मथुरा मायापुरी या हरिद्वार व काशी ये चार ऐसे तीर्थ थे जहां आसेतु हिमाचल के हर हिस्से का व्यक्ति मिल जाता था। हर बारहवें वर्ष प्रयाग के संगम पर जो कुंभ लगता था वह पौष महीने की पूर्णमासी से लेकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला डेढ़ महीने का अखिल भारतीय मेला था। उसके महत्वपूर्ण दिवसों में पौषी पूनम, मकर संक्रांति (जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है) मकर संक्रांति से लेकर मिथुन मासांति तक के छः महीने उत्तरायण व कर्क संक्रांति से लेकर पौष मासांति जिसे पंजाब में लोहड़ी और कुमाउनीं में पुषुड़िया त्यार के रूप में मनाया जाता है दक्षिणायन कहलाता है। गंगा नहान के लिये मकर संक्रांति के पश्चात दूसरा महत्वपूर्ण पर्व माघी अमावस है जिसे इलाहाबाद में मौनी अमावस कहा जाता है। क्षीर सागर के मंथन से जो चौदह रत्न निकले उनमें पहली उपलब्धि हालाहल विष था जिसे देवाधिदेव महादेव ने लोकहित के लिये पी डाला। जिस हालाहल विष को सर्वनाशी कहा जारहा था उसे पीने से देवाधिदेव महादवे का गला नीला पड़ गया वे नीलकंठ कहलाये। महादेव ने सृष्टि को हालाहल से सुरक्षा प्रदान कर दी सृष्टि के जीवजंतु जिनमें देव, दानव, गंधर्व यक्ष राक्षस किन्नरों सहित मनुष्य भी थे निर्भय होगये। समुद्र मंथन का असली उद्देश्य तो अमृत का अमृत कलश तो धन्वंतरि के कंधे में था। देवदानव गंधर्व यक्ष राक्षस किन्नर सभी अमृत झपटने के लिये छीना झपटी में लग गये उनकी इस छीना झपटी से गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम त्रिवेणी में अमृत की बूंदें छलक कर त्रिवेणी संगम में गिरीं उस दिन माघ महीने की अमावस का अमांत पर्व था। चीन के राष्ट्रीय विचारधारा के लोग जो देहाती चीन के अलावा ताइवान हांगकांग और सिंगापुर में बड़ी संख्या में हैं उन्होंने चीन का नववर्ष का पहला दिन मौनी अमावस के अमांत पर्व में मनाना तब से शुरू कर दिया था जब समुद्र मंथन आज से एक अरब पिचानवे करोड़ वर्ष पहले हुआ था। 1949 चीन के पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के दिग्दर्शक माओ त्से दुंग ने घोषित कर दिया कि चीन निरीश्वरवादी या अथीस्ट है। वह ग्रेग्रेरियन तेरहवें पोप द्वारा घोषित कैलेंडर को कम्यूनिस्ट चीन का सरकारी कैलेंडर मानते हैं। ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग व कम्यूनिस्ट चीन के देहाती लोग चीन का राष्ट्रीय कैलेंडर हजारों लाखों वर्षाें से मनाते आरहे थे चीन की राष्ट्रीय परंपरा को माओ त्से दुंग ने खंडित कर डाला। सतसठ वर्ष पूर्व माओ ने जिस चीनी राष्ट्रीय परंपरा पर रोक लगायी गत वर्ष 8 फरवरी 2016 के दिन चीन के लोगों ने अपना राष्ट्रीय कैलेंडर मनाना शुरू कर दिया। छीना झपटी में अमृत की बूंदें मेष संक्रांति केे दिन हरद्वार, सिंह संक्रांति के दिन क्रमशः उज्जयिनी और नासिक में गिरी थीं। इन तीनोें तीर्थों में भी हिन्द के लोग इलाहाबाद की भांति बारहसाला कुंभ मनाते हैं। जिन लोगों को स्वातंत्र्योत्तर भारत में दलित कहा जारहा है उनमें काशी के रैदास जो जात बिरादरी के नजरिये से चर्मशिल्पी या चमार कहे जाते थे रैदास के पिता धर्मदास काशी के भूमिहार नरेश को चौकस करने वाले रात के चौकीदार थे। जागते रहो जागते रहो कहना उनका स्वधर्म था। उन्होंने एक रात स्वयं काम से बाहर जाने के कारण अपने जवान बेटे को चौकीदारी सौंपी। रैदास स्वयंसिद्ध महात्मा थे उन्होंने जागते रहो जागते रहो के बजाय आकर्षक संस्कृत गीत गाकर काशी नरेश का ध्यानाकर्षण किया। काशी नरेश धर्मात्मा राजा थे उन्होंने जब चौकीदार द्वारा अत्यंत उच्च स्तर की भगवत् स्तुति सुनी उन्होंने धर्मदास को तलब किया। धर्मदास ने कहा - महाराज जरूरी काम से बाहर गांव गया था बेटे को चौकीदारी सौंप गया। काशी नरेश ने रैदास को बुलाया व प्रभूत दक्षिणा दी। रैदास तो त्यागी थे, उन्होंने थैली पिता को सौंप दी। पिता ने थैली लेने से इन्कार कर दिया क्योंकि उसे साधु ने बताया था जब तुम्हारा बेटा कमाई कर तुम्हें थैली देगा वह मत पकड़ना। बेटे से कहना तुम ही रखो। यह है दलित कहे जाने वाले भक्त कवि रैदास की कहानी। उसी काशी में तुलसीदास ने स्वांतः सुखाय रामचरित मानस की गाथा अवधी में प्रस्तुत की।
टाइम्स आफ इंडिया अपने कालम एनडपीफैनी आफ आइडियाज में उ.प्र. के दलितों के लिये हिन्दुत्व अथवा अंबेडकर कोने ज्यादा दैवी संपत् है। अखबार 179 वर्ष से हिन्द में अपनी अलख जगाये है। सेठ रामकृष्ण डालमिया उनकी लाड़ली कन्या रमा तािा हिमालय की जड़ में स्थित नजीबाबाद के मूल निवासी श्रेयांस प्रसाद जैन जिन्हें डालमिया जी ने अपनी कन्या रमा का विवाह किया। मालिनी तट का यह इलाका वही है जहां राजकुमार भरत (शकुंतला दुष्यंत पुत्र) सिंह शावकों के साथ महर्षि कण्व के आश्रम में खेलता था। श्रेयांस प्रसाद जैन रमा डालमिया जैन तथा टाइम्स आफ इंडिया के उत्कृष्ट श्रेय वाले संपादक गणों में गिरलाल जैन और खुशवंत सिंह की महत्तर भूमिका है। वे सही मानों में संपादक थे वैसे ही जैसे संपादक कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास थे जिन्होंने वैदिक ऋचाओं को ऋग् यजु साम व अथर्व वेद इन चार वेदों में विभक्त कर वैदिक भारत वैदिक संस्कृति वैदिक मैथमैटिक्स सहित वैदिक दर्शन एवं विभिन्न उपनिषदों के जरिये हिन्द की साहित्यिक तथा दार्शनिक महत्ता को विश्व में पहली पंगत में खड़ा किया। संपादक द्वय गिरलाल जैन व खुशवंत सिंह ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स को हिन्दुस्तानी भाषाओं के लिये भी नयी राहें निकालीं। उनके प्रकाशन नवयुग, धर्मयुग, महाराष्ट्र टाइम्स, नवभारत टाइम्स, दिनमान के संपादकों को भी संपादन कला के निखार का राही बनाया। यह ब्लागर टाइम्स आफ इंडिया सरीखे महत्वपूर्ण व सबसे पुराने हिन्दुस्तानी अखबार का ध्यानाकर्षण करना अपना फर्ज मानता है कि अखबार इस बात की पड़ताल करे कि संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के सातों भाषायी व सांस्कृतिक क्षेत्रों के कितने दलित रामचरित मानस की रामगाथा से अपने अंतर्मन से प्रभावित हैं ? निरक्षर दलित जिसने रामगाथा अवधी में सुनी और कंठाग्र भी कर ली और वे दलित जो पिछली पांच पीढ़ियों से पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता के गलियारे में अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग अलाप रहे हैं। राममनोहर लोहिया का संकल्पित चौखंभा राज तथा हिन्द के अद्वितीय राजनीतिक चिंतन जिन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल का नखशिख विरोध किया समग्र क्रांति जिनका राजनीतिक आदर्श काल्पनिक स्वार्गिक सोच (ऊटोपियन चिंतन पोखर) नहीं था वे पंचायती राज के महात्मा गांधी की कल्पना को व्यावसायिक स्तर पर प्रयोग करना चाहते थे, उनकी योग्यता मोरारजी रणछोड़जी देसाई ग्राह्य नहीं मानते थे पर जयप्रकाश नारायण जी का लोकशाही चिंतन पूर्णतः अव्यावहारिक नहीं था। परमात्मा की सृष्टि में राजधर्म के समानांतर वेगवान दस्युधर्म रेल की पटरी की तरह है। पटरी का एक हिस्सा राजधर्म तथा दूसरा दस्युधर्म है। राजधर्म अथवा रामराज्य या धर्मराज्य की कल्पना करने वाले विचारक सृष्टि के सत् असत दोनों में तालमेल बैठे। सदाचारी व्यक्ति उग्रता न अपनाये और दस्युधर्मी चिंतन पोखर राजधर्म की सनातनता का सम्मान करे तभी लोकतंत्र अथवा डैमोक्रेसी की गाड़ी सरपट दौड़ सकती है। अवरोध आने पर बहस मुबाहसे से फैसला किया जाये बात तो उसकी ही मानी जायेगी जिसका संख्याबल ज्यादा है। मुल्क की जरूरत के मुताबिक लोक नेतृत्व भारत का दैवकृपा से मिला है। राजधर्म की संरक्षा चाहने वाले विचारकों को आगे बढ़ कर राकजनीतिक, प्रशासनिक, आस्थामूलक, शैक्षिक तथा सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु का शिवसंकल्प अपने लिये जमीन खोजे। हर राजकर्ता का गुरूमंत्र हो - आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न आचरेत्। आपको जो व्यवहार नहीं जंचता उसे सामने वाले से करने से बचें यही भारत के उत्कर्ष का गुरूमंत्र हो। माया, मुलायम सिंह दोनों की ख्वाहिश थी कि दिल्ली के तख्त पर विराजमान हों किन्तु लगता है मुहूर्त्त टल गया। बिहार के सौम्य हरिजन नेता बाबू जगजीवन राम और रामविलास पासवान योग्य व्यक्तित्त्व थे पर तकदीर ने साथ नहीं दिया। रामविलास नंदन चिराग पासवान अगले प्रधानमंत्री बनने की पात्रता अर्जित करने की राह के राही हैं। उनका राजनीतिक आदर्श नरेन्द्र दामोदरदास मोदी प्रतीत होते हैं। उन्होंने अपने पिता श्री का राजनीतिक झुकाव नरेन्द्र दामोदरदास मोदी केे नेतृत्व की ओर तीव्रता से बढ़़ाया तथा हिन्द के दलित समाज सहित सभी हिन्दुस्तानी यह मान चुके हैं कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का एकमात्र लक्ष्य भारत को दुनियां के नक्शे में पहली पंगत में खड़ा करना है। उनका जातीय, राजनीतिक, पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन हिन्द के राष्ट्रवाद को समर्पित है। आज सवाल हिन्दुत्व या अंबेडकरत्व का नहीं मानव तत्व का है। श्रीकृष्ण ने अर्जुने से कहा था - कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके। आपने मानव जीवन पाया है, जगत केे जीवमात्र में मनुष्य को ही कर्म स्वातंत्र्य है। हिन्द की दलित आकांक्षा को भी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी श्रेयस मार्ग पर चलने की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। उसे आप हिन्दुत्व न कह कर मनुष्यता का आवरण पहनायें।
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