Tuesday, 14 March 2017

क्या अखिलेश यादव की लखनऊ तख्तपोशी मृग मरीचिका का लाक्षणिक आक्रोश तो नहीं ?
क्या यादव राज खानदान के महाराज कुमार हिन्द की मौजूदा राजनीतिक शतरंज में
प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला कर पायेंगे ?
          महाशया नीरजा चौधरी ने टाइम्स आफ इंडिया के तीन मार्च के संपादकीय पृष्ठ वाले महत्वपूर्ण स्तंभ में अपने कथ्य का शीर्षक ‘हिज आयरन एन्टीगानिस्ट’ दिया साथ में अखबार नवीसी विवेचना का यक्ष प्रश्न भी पूछा - लखनऊ के तख्त की चाहत की लड़ाई में किसका दांव चुनौतियों की ऊँचाई छू रहा है ? अखिलेश यादव या नरेन्द्र मोदी ?? महाशया नीरजा चौधरी भूल रही हैं कि अखिलेश यादव महाशय को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का श्रेय महाशय अखिलेश यादव के पिताश्री नेताजी मुलायम सिंह यादव को ही जाता है। नेताजी ने यह बात बहुत दफे अपने दिल की पीड़ा जताते हुए व्यक्त भी की है। अखिलेश यादव महाशय प्रौढ़ और मंजे हुए राजनीतिज्ञ की हैसियत हासिल करने में अपने विवेक तथा अहर्निश परिश्रम से भारत के प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी चौंसठ वर्ष की उम्र में हिन्द के प्रधानमंत्री बने। दिल्ली के तख्त में बैठने से पहले वे पूरे चौदह वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उनके अलावा उनके परिवार का कोई आदमी हिन्दुस्तानी डेमोक्रेसी का खेवन हार नहीं है। वे महात्मा गौतम बुद्ध और जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की तरह विवाहित थे पर गृहस्थ कभी नहीं रहे। समूची मानवता उनका अपना परिवार है वसुधैव कुटुंबकम जीवन आदर्श है। फ्रांसीसी भविष्य वक्ता नास्टर्डम ने हिन्द के तीन व्यक्तियों - गौतम बुद्ध महावीर त्यागी तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की भूरि भूरि भविष्यवाणी वाली भाव्यता का उल्लेख किया है। पारिवारिक सुख सुविधा को तिलांजलि देकर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने अपने जीवन का परमादर्श मानव सेवा के समानांतर हिन्द राष्ट्र सेवा को अपना व्रत माना है। वे पिछले सोलह वर्ष से राजधर्म का अनुसरण कर रहे हैं अपने विरोधी तथाा आकंठ शत्रुता रखने वाले व्यक्ति से भी शालीनतापूर्वक मिलते हैं जबकि महाशय अखिलेश यादव ने अपने जमा जमा लगभग दस वर्ष के राजनीतिक जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपने पिता को समाजवादी पार्टी से निष्कासित कर स्वयं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का आसन ग्रहण कर लिया। उन्होंने और बुआ मायावती महाशया ने सन 2007 से सन 2017 पर्यन्त उ.प्र. का मुख्यमंत्रित्व बिना डेमोक्रेसी का सहायता लिये बिना मतदाताओं का प्रतिनिधित्व ग्रहण किये उच्च सदन के सदस्य के नाते लखनऊ के तख्त ताऊस में अपने को विराजमान किया है। जिस तरह दिल्ली में 2004 से 2017 तक प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य नहीं था पर लोकनेता की भूमिका निर्वाह करते रहने वाले डाक्टर मनमोहन सिंह पंडित नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के पश्चात तीसरे प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने कांग्रेसाध्यक्ष के प्रतिनिधि के तौर पर देश पर शासन किया। दिल्ली की यह राजनीतिक चहलकदमी 2007 से 2017 तक लखनऊ से भी फलती फूलती रही। लगता है उ.प्र. के वर्तमान मुख्यमंत्री और 2017 के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहने का शिवसंकल्प संपन्न करने वाले महाशय अखिलेश यादव तथा बुआ मायावती विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं हैं। लोकतंत्र में यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी मालूम होती है। डेमोक्रेसी चाहने वाली हिन्द की जनता को लोकसभा का चुनाव लड़े बिना किसी भारतीय भद्रलोक को प्रधानमंत्री न बनने से घटक राज्यों में वही विधायक मुख्यमंत्री की दावेदारी करे जो विधानसभा का चुनाव लड़ कर विजयी हुआ हो। इस संदर्भ में राजनीतिक कमण्टेटर महाशया नीरजा चौधरी का महाशय अखिलेश यादव का गुणगान करना जिनकी पत्नी सांसद हो पिता सांसद हो चाचा शिवपाल यादव विधानसभा के निर्वाचित सदस्य हो लोकसभा के पांचों यादव सदस्य उनके अपने खानदान से हों उनकी राजनीतिक तुलना प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से करना अत्यंत हास्यास्पद प्रसंग है। लखनऊ केे तख्त ताऊस में 2002 से बारी बारी बसपा सुप्रीमो वामसेफ विचारक महाशय कांशीराम की शिष्या मायावती तथा सपा सुप्रीमो रहे नेताजी मुलायम सिंह यादव के शासन को ज्यादातर प्रेक्षकों ने माफिया राज गुंडाराज अथवा जंगल राज के विशेषणों से संबोधित किया।
          हिज आयरन एन्टागानिस्ट अंग्रेजी शीर्षक जो महाशया नीरजा चौधरी ने दिया है इस शीर्षक ने एक पुरानी कहानी ताजा कर दी। चेदिराज शिशुपाल और योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण मौसेरे भाई थे। तत्कालीन हिन्द का एक महत्वपूर्ण राज्य विदर्भ था। विदर्भ को नाग विदर्भ भी कहा जाता है। आज भी विदर्भ के लोगों की आम राय महाराष्ट्र से पृथक राज्य पाने की है। महाशय नीरजा चौधरी ने विदर्भ नरेश जिनकी प्रतिष्ठा मिथिला नरेशों की तरह जनक की जगह भीष्मक हुआ करती थी। दमयंती विदर्भ राज भीष्मक की कन्या थी। दमयंती के सैकड़ों वर्ष उपरांत विदर्भ राजकुल भीष्मक विदर्भ में रूक्मिणी जन्मी थी। रूक्मिणी के प्रथम अग्रज का नाम रूक्म था। रूक्म ने अपने पिता महाराज भीष्मक से कहा - हमारी इकलौती बहन रूक्मिणी का विवाह उत्तरापथ केे महत्वपूर्ण चेदिराज वंश के राजकुमार शिशुपाल से संपन्न किया जाये। विदर्भ नरेश अपने महाराजकुमार की इज्जत करते थे अतः उन्होंने हामी भर दी। विदर्भ में बारात तो आयी राजकुमार शिशुपाल की पर रानी शैव्या ने महाराज भीष्मक से कहा - रूक्मिणी श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती है। महाराज भीष्मक ने अपनी रानी को कहा - अगर रूक्मिणी का कृष्ण के प्रति अगाध आकर्षण है कृष्ण रूक्मिणी का अपहरण कर ब्याह कर ले। बारात तो शिशुपाल की ही आयेगी। हम स्वागत शिशुपाल का ही करेंगे। शिशुपाल की बारात में मगध नरेश जरासंध (राष्ट्रपाल कंस के ससुर) भी आये थे। उन्होंने कहा - मैंने कृष्ण से सत्रह बार युद्ध किया वह रण छोड़ भग कर समुद्र के निकट द्वारका चला गया। राजकुमार शिशुपाल दुःख मत करो। हम सभी राजा लोग अपने अपने राज्यों में चले जायें। ग्वालों ने रूक्मिणी का अपहरण कर लिया। राजा भीष्मक और रानी शैव्या की सहमति से यह हुआ। ग्वालों ने राजकुमारी का अपहरण कर कृष्ण ने रूक्मिणी से ब्याह रचा लिया। रूक्मिणी हरण का प्रसंग इसलिये प्रस्तुत किया गया है कि कृष्ण और शिशुपाल में दुश्मनी वाला द्वेषभाव था। जब अजातशत्रु शक्रप्रस्थ नरेश महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया उसमें समूचे हिन्द से राजा महाराजा सपरिवार आमंत्रित थे। राजसूय यज्ञ मंडप का नेतृत्व भीष्म पितामह कर रहे थे। कुरूराज धृतराष्ट्र तथा महारानी गांधारी उच्चासनस्थ थे। राजसूय यज्ञ का प्रथम होता कौन हो ? अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर की अनुमति प्राप्त कर सहदेव ने घोषणा की कि राजसूय यज्ञ के प्रथम होता - अधिष्ठाता वासुदेव श्रीकृष्ण होंगे। इस प्रस्ताव का चेदिराज शिशुपाल ने नखशिख विरोध करते हुए वासुदेव श्रीकृष्ण की निंदा की और प्रस्ताव का विरोध किया। अपशब्द कहने की सीमा लांघते ही योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से चेदिराज शिशुपाल का वध कर डाला और चेदिराज के पुत्र को चेदिराज घोषित कर दिया। इसे कहते हैं नखशिख विद्वेष का उग्र स्वरूप जिसने चेदिराज शिशुपाल को निष्प्राण कर दिया था। शीर्षक सहित नीरजा चौधरी का यक्ष प्रश्न - महाशय अखिलेश यादव और हिन्द के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की तुलना राजनीतिक विवेकशून्यता का प्रदर्शन है। जहां तक हिन्द के सबसे बड़ीे जनसंख्या वाले उ.प्र. में पिछले चौदह वर्षों से क्षेत्रीय सुप्रीमो वाली दो राजनीतिक समूह - समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी की बारी बारी लखनऊ के तख्त पर बैठने का सवाल है अखिल भारत कांग्रेस पार्टी की नजर में उ.प्र. पिछले सताईस सालों से बेहाल है। भारतीय जनता पार्टी भी अपना राजनीतिक वर्चस्व उ.प्र. में सन 2002 में पश्चात कायम नहीं कर पायी है।
          अगर 2012 में नेताजी मुलायम सिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को सैफई की कमान देने के बजाय अपने अनुज शिवपाल यादव जो जसवंतपुर से विधानसभा सदस्य चुने गये थे उन्हें साठ वर्ष होने के कारण बालिग अहीर कहे जा सकते थे उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया होता या अपने बेटे अखिलेश यादव को विधान परिषद सदस्यता लेने के बजाय विधानसभा का चुनाव लड़ा कर मुख्यमंत्री बनाया होता तो सैफई के यादव खानदान का सामना बुढ़ापे की देहरी में पैर रखे हुए नेताजी मुलायम सिंह को नहीं करना पड़ता। दूसरी ओर उ.प्र. के लगभग बीस प्रतिशत ब्राह्मण तथा साढ़े सात प्रतिशत राजपूतों के अलावा उ.प्र. की राजनीति में कायस्थों भूमिधरों के अलावा सवर्ण श्रेणी में गिने जाने वाले अग्रवाल आदि वैश्यों के अलावा तेली तमोली सवर्ण श्रेणी में न गिने जाने वाले वैश्य समुदाय सहित रैदास पंथियों दादू पंथियों गोरख पंथियों कबीर पंथियों पाकिस्तान बन जाने के बाद हिन्द की धरती में अपनी जिन्दगी रमाने वाले सिंधी भाषी नानक पंथी समाज की भी बहुत बड़ी भूमिका है। जो लोग पश्चिमी उ.प्र. के जाटवों जिनके समाज की देन बहन मायावती है उन्हें प्रदेश  के शेष दलितों के साथ जोड़ कर मायावती समर्थक नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः मायावती की सफलता का रहस्य साढ़े सात प्रतिशत राजपूत मतों को छोड़ कर उ.प्र. में जो बाकी तथाकथित सवर्ण हैं उनका भी समर्थन मिलता रहता है पर राजा भद्री के पोते जिन्हें उ.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल कुंडा का गंुडा कह कर संबोधित करते थे उ.प्र. का राजपूत मत तथा अपने आपको राजपूत मतवादियों से जोड़ने वाले अनेक ओबीसी के यादवेतर समूह भी राजपूत मान्यताओं के समर्थक हैं इसलिये यह तो जंचता ही नहीं कि मायावती इस्लाम धर्मावलंबियों के सहयोग से उ.प्र. का तख्त पायेंगी। अखिलेश यादव, राहुल गांधी तथा मायावती के विपक्ष में जो नेतृत्व पिछले अढ़ाई साल से हिन्द का नक्शा बदलने में लगा हुआ उ.प्र. में 2017 के विधानसभा चुनाव के पश्चात भाजपा का बहुत अवश्यम्भावी लगता है क्योंकि उ.प्र. के 20 करोड़ लोग जिनमें चार करोड़ मुसलमान भी हैं यह मानने लग गयी है कि हिन्दुस्तान के राज को पटरी में लाने की क्षमता केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में है जिसका कोई व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक स्वार्थ नहीं है। अंततोगत्वा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को उ.प्र. पर बराबर नजर गड़ाये रखनी है कि गंगा यमुना के मैदान में किसी भी स्तर पर आततायी पने का विस्तार न हो पाये।
          राजनीतिक मीमांसाकर्मी महाशया नीरजा चौधरी का सोचना है कि दलित समूहों ने बसपा सुप्रीमो बहन मायावती का साथ 2014 के लोकसभा चुनाव में नहीं दिया विश्लेषिका की नजर में दलित फिर बसपा सुप्रीमो के शरणागत होगये बताये जारहे हैं। विश्लेषिका यह भी सोचती हैं कि इस बार मुसलमान वोटर ने अपना मत योजनाबद्ध किस्म से अपना मतदान किया है। यह संभव हो सकता है कि हैदराबाद की अकबरूद्दीन नेतृत्व वाली जमात इस बार उ.प्र. के कुछ हिस्सों के मुसलमान मतदाताओं के कृपापात्र बन जायें। महाशया नीरजा चौधरी महाशय अखिलेश यादव की महिमा गाथा गारही हैं पर वस्तुतः यादवों को उ.प्र. में एकजुट रखने में मुख्य भूमिका पिछले सताईस वर्षों के नेताजी मुलायम सिंह यादव के अहर्निश परिश्रम तथा छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र मिसिर आम तौर पर उ.प्र. के मिश्र ब्राह्मणों व ब्राह्मणियों को मिसिर और मिसिरयाइन कह कर संबोधित किया जाता है, मिश्रण कला के ज्ञाता ही मिश्र कहलाते हैं पश्चिम जगत आज जिन्हें ब्ीमध्क्विबजवत नामों से पुकारता है हिन्द विशेष तौर पर हिन्दी भाषी इलाकों में ये लोग वैद्यक एवं भोजनालयों के निष्णात माने जाते हैं। जनेश्वर मिश्र के अलावा श्रीपति मिश्र, सतीश चंद्र मिश्र उ.प्र. के राजनीतिक गलियारे के सुविज्ञ राजनीकित वेत्ता माने जाते हैं मुलायम सिंह भी राजनीतिक ऊँचाई का पूरा श्रेय पश्चिमी उ.प्र. के ब्रजक्षेत्र के यादव नेता को उ.प्र. का सक्षम राजनेता के समानांतर दिल्ली की राजनीति में भी जनेश्वर मिश्र ने नेताजी को स्थापित किया। सतीश मिश्र की राजनीतिक मिश्रण की काबिलियत के चलते ही मायावती केे भाग्य का सूर्याेदय हुआ। देखने की बात है क्या उ.प्र. का ब्राह्मण समाज महाशय अखिलेश यादव तथा बुआजी मायावती से छिटक कर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के आह्वान से प्रभावित तो नहीं होगया ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का आत्मविश्वास यह प्रतीति करा रहा है कि उ.प्र. का मतदाता अहर्निश सेवामहे का व्रत लिये नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर लट्टू होगया हैै।
          महाशया नीरजा चौधरी अपने गवेषणा के पांचवें सूत्र में फरमाती हैं 2014 में लोकसभा चुनाव में नेताजी मुलायम सिंह यादव का लोहिया स्मृति समाजवादी पार्टी सैफई के यादव खानदान तक सिमट गयी। श्रीमती सोनिया गांधी जहां स्वयं और अपने लाड़ले पुत्र को ही लोकसभा सदस्यता दिला पाईं मुलायम सिंह ने यादव राजपरिवार के पांच पांडवनुमा प्रतिनिधि लोकसभा में पहुंचाये। 2012 में उनके उत्तराधिकारी अखिलेश यादव लोकसभा सांसद थे उन्हें उच्च सदन का सदस्य की हैसियत से नेता सत्ता पक्ष निश्चित किया गया। 2017 के विधान सभा चुनाव में घोषित मुख्यमंत्री भी हैं पर विधान सभा में चुने गये नेतृत्व के नाते नहीं सपा सुप्रीमो ने वही किया जो आमतौर पर हर पिता अपने बेटे को यशस्विता के शिखर पर पहुंचाना चाहता है। विश्लेषिका महाशय अखिलेश यादव पिछले अढ़ाई वर्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की राजनीतिक चालढाल समझने की पर महाशय अखिलेश की भूमिका और प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के रणनीतिक मार्ग अलग अलग हैं। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का सामना महाशय अखिलेश यादव को करने के लिये अढ़ाई वर्ष की उनकी मेहनत फायदा नहीं दे सकेगी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी महाशय अखिलेश यादव के तौर तरीकों में पूरे चौथाई शत वर्षान्तर का पीढ़ी अंतराल की दुखती रग है। महाशय अखिलेश यादव प्रधानमंत्री के सवालों का जवाब जिस तरीके से दे रहे हैं केवल एक शब्द गधा को लेेकर ही देखें। भारतीय वाङमय में किसी को गधा कहने के बजाय वैशाखनंदन कहा जाता है महाशय अखिलेश यादव की मातृभाषा ब्रजभाषा वाली हिन्दी है पर वे जब जबान खोलते हैं बोलते हैं उनके शब्दों में वह ओज नहीं जो प्रत्युत्पन्नमति वाणी का उपयोग करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में है हिन्द में स्वातंत्र्योत्तर भारत के दो गैर हिन्दी मातृभाषा भाषी डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हिन्दी भाषण उतना ही ओज है जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बाबू जयप्रकाश नारायण डाक्टर राममनोहर लोहिया की हिन्दी भाषण कला में था। इस सबका हिन्दी भक्ति काव्य सहित आधुनिक हिन्दी का गहरा अभ्यास था। महाशय अखिलेश यादव जी की वाणी में अपने पूज्यपाद पिताश्री नेताजी मुलायम सिंह जो अध्यक्ष भी रहे पर हिन्दी भाषण कला में इटावा के ही अर्जुन सिंह भदोरिया से कमतर थे। संभवतः महाशया नीरजा चौधरी उ.प्र. की बनारस व इलाहाबादी आधुनिक हिन्दी पूर्वांचल की भोजपुरी बुंदेलखंड की भरथरी शैली की बुंदेली गोस्वामी तुलसीदास व सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की अवधी रचनायें क्रमशः रामचरित मानस व जायसी का पùावत ब्रज के अष्टपाद भक्त कवियों की रचनायें बिना हृदयंगम कि उ.प्र. की राजनीति की बारहखड़ी अथवा ककहरा समझने के लिये अंग्रेजीदां मैकोलाइट भद्रलोक के उद्गार सुनने पढ़ने के बजाय साने गुरू जी द्वारा बताई गयी आंतर भारती की समझ बहुत जरूरी है। महाशय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की गद्दी अपने पिताश्री की कृपा से पाये हैं उन्हें उस कुर्सी को टिकाऊ किस्म से हथियाये रहने के लिये कम से कम बीस वर्ष तक इंतजार करना होगा तभी वे अपने पिताजी के चचेरे भाई तथा अखिलेश को हिन्द का प्रधानमंत्री देखने की हसरत रखने वाले प्रोेफेसर रामपाल यादव राजपरिवार जो एक चौथाई शताब्दी से निरंतर प्रगति में था उसको छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्रा के निधन से झटका लगा चाणक्य कहते हैं ‘मंत्रि हीनश्च राजनः शीघ्र नश्यंति न संशयः’। सटीक मंत्रणा न मिलने के कारण नेताजी मुलायम सिंह यादव भी उसी रास्ते चले जिस रास्ते बहन मायावती चल रही थीं। सूरदास उसी इलाके की देन हैं जहां से नेताजी मुलायम सिंह और उनके यशस्वी पुत्र पिताजी को पछाड़ कर गद्दी हथिया लिये हैं उन दोनों पर सूरदास की यह उक्ति लागू होती है - 'करम गति टारे नाहिं टरी' की आधुनिक हिन्दी लहजे में आन लेवा-जान लेवा दुश्मन कौन किसका हिन्द की राजनीतिक बारहखड़ी के मर्मज्ञ नरेन्द्र दामोदरदास मोदी चुनाव के बाद चुनावी दुश्मनी भूल जाते हैं। फैसला मोदी की तकदीर का नहीं अखिलेश की तकदीर का 11 मार्च को होगा।
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