Friday, 3 March 2017

मेक इन इंडिया का पहला पड़ाव
खादी और ग्रामोद्योग उद्यमिताओं का पुनर्जीवन ही है
          नांदीमुख गांधी और परंपरागत खादी बनाम 2006 में एमएसएमई एक्ट के तहत मूलतः खादी ग्रामोद्योग आयोग की पूर्व अध्यक्ष डाक्टर महेश शर्मा द्वारा अपने 6 वर्ष के खादी ग्रामोद्योग आयोग अध्यक्षता अवधि में परंपरागत खादी को नये जमाने के अनुकूल प्रबंधित किये जाने का तीव्रतम प्रयास संपन्न किया गया था। खादी मिशन के विचार के सहित परंपरागत खादी में नयापन लाने के लिये डाक्टर महेश शर्मा ने भरपूर  प्रयास किये। उनके बहनोई जनाब सिकन्दर बख्त दिल्ली के पुराने कांग्रेसी होने केे साथ साथ खादी और ग्रामोद्योगों के पक्षधर भी थे। उनके सहारे से टेक्नोक्रेट डाक्टर महेश शर्मा ने खादी ग्रामोद्योग प्रवृत्तियों में नयी जान फूंकने का  प्रयास किया है। दैव बड़ा बलवान होता है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाला राजग सन 2004 में पिछड़ गया। यू.पी.ए.1 सरकार का गठन डाक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में हुआ और ऐग्रो रूरल इंडस्ट्रीज मंत्रालय का उत्तरदायित्त्व गोरखपुर देवरिया के कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति के नेता महावीर प्रसाद मंत्रिमंडल में ऐग्रो रूरल इंडस्ट्रीज मंत्रालय के केबिनेट मिनिस्टर नियुक्त होगये। उन्होंने पहला काम खादी ग्रामोद्योग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डाक्टर महेश शर्मा को तलब किया और उनसे त्यागपत्र देने को कहा। डाक्टर शर्मा ने त्यागपत्र नहीं दिया उन्हें 14 अक्टूबर 2004 को बर्खास्त कर खादी ग्रामोद्योग आयोग के बदले एमएसएमई मंत्रालय के तहत कमिश्नरेट खादी ग्रामोद्योग के रूल 1956 में पारित खादी ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम एलएक्सआई 1956 का समूचा उत्तरदायित्त्व मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत कमिश्नरेट खादी ग्रामोद्योग को सौंप डाला। मंत्रालय ने इनक्वायरी कमीशन भी बैठाया जिसकी संस्तुति खादी ग्रामोद्योगों की उद्यमिता चमक दमक बढ़ाने के उद्देश्य से जुलाई 2006 में खादी ग्रामोद्योग आयोग का पुनर्गठन सुश्री कुमुद बेन जोशी की सदारत में हुआ। एमएसएमई मंत्रालय का कार्यभार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह को सौंपा गया पर खादी ग्रामोद्योग आयोग की स्वायत्तता तथा देश में चर्खा संघ के जमाने से खादी का काम करने वाले खादी संगठनों और खादी ग्रामोद्योग आयोग व आयोग का प्रशासन चलाने वाले एमएसएमई मंत्रालय के बीच खाई चौड़ी होती चली गयी जिसका नतीजा परंपरागत खादी और खादी मार्क में खींचतान में परिवर्तित होगया फलस्वरूप खादी के काम का आकार सिकुड़ता चला गया। 
          जब महात्मा गांधी ने 24.9.1924 के दिन पटना में कदमकुआं नामक स्थान पर अखिल भारत चर्खा संघ की स्थापना करते हुए स्वयं अपनी अध्यक्षता में चर्खा संघ के दूसरे सदस्य मौलाना शौकत अली श्री मगन गांधी श्री सतीश चंद्र दास गुप्त डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को चर्खा संघ का सदस्य, सेठ जमनालाल बजाज को खजांची तथा पंडित नेहरू शोएब कुरैशी तथा शंकर लाल बैंकर, चर्खा संघ के ये तीन सेक्रेटरी तय किये थे। चर्खा संघ का मुख्यालय सेवागांव वर्धा में था। चर्खा संघ अपना काम कर ही रहा था मिल कते तागे के हथकरघे में बुने जाने वाले सूती कपड़े को ही लोग खादी कहते थे। समूचे भारत में खादी भंडार हथकरघा में बुने कपड़े को खादी के रूप में बेचते थे। चर्खा संघ ने जबलपुर हाईकोर्ट में मुकदमा किया हाईकोर्ट के फैसले में खड्डी में बुने जाने वाला सूती कपड़ा भी पूर्णतया खादी है यह फैसला था जबलपुर हाईकोर्ट का। हाथ कते तथा करघे में बुने कपड़े को भी खादी नाम से बेचा जारहा है, हाईकोर्ट के फैसले के पश्चात चर्खा संघ के प्रमाणित खादी का ठप्पा असली खादी पर लग गया। हाईकोर्ट केे फैसले के पश्चात दिल्ली क्लाथ मिल के मालिक हरिजन सेवक संघ के प्रधान सेठ घनश्याम दास बिड़ला आदतन खादी पहनने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने भी दिल्ली क्लाथ मिल की उत्पादों को खादी नाम से बेचना शुरू किया था। अहमदाबाद के सूती मिलों के मालिक श्री गुलजारी लाल नंदा और अनुसूया बेन की संस्था मजूर महाजन के जरिये मिल मालिकों को खादी पहनने के प्रेरित करते थे। 1961 में आल इंडिया कांग्रेस का सालाना जल्सा असम के दिसपुर में संपन्न हुआ। तत्कालीन योजना मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने खादी प्रदर्शन की दौरान खादी वालों को पावरलूम की बढ़ती ताकत से सचेत किया था और कहा था कि खादी वालों को हथकरघा कपड़े से जुड़ जाना चाहिये। यह प्रसंग तत्कालीन खादी सेंट्रल प्रमाण पत्र समिति के अध्यक्ष की विचित्र नारायण शर्मा को अस्वीकार्य थी। आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता ने इस ब्लागर को कहा - लखनऊ जाकर विचित्र भाई की राय जानो। विचित्र नारायण शर्मा जी ने इस ब्लागर को झिड़कते हुए कहा - तुम तो खादी नहीं ग्रामोद्योग व सहकारी समितियों को बढ़ा रहे हो। उनकी बात पंडित नेहरू मानते थे उन्होंने पंडित जी से कहा - पंडित जी ! नंदा जी के प्रस्ताव से खादी की पवित्रता नष्ट हो जायेगी। पंडित जी ने नंदा जी को निर्देश दिया कि खादी पर दखल मत दो। सैंतीस वर्ष पश्चात 1998 में जब शतजीवी विचित्र नारायण शर्मा अस्वस्थ थे यह ब्लागर उनसे मिलने गया। इस ब्लागर को विचित्र नारायण शर्मा ने कहा - नंदा जी सही थे। वैकुंठ भाई की खादी दृष्टि मुझसे ज्यादा सही थी। खादी के पतन का जिम्मेदार मैं हूँ। इस वार्तालाप के चौथे दिन 31.5.1998 को उनका देहांत होगया। 
          जिस तरह बीसवीं शती के चौथे दशक के बीच याने 1934-35 में जबलपुर हाईकोर्ट का फैसला हाथ कती करघा बुनी खादी और मिल कते सूत से करघे में बुना हैंडलूम का कपड़ा उच्च न्यायालय जबलपुर ने खादी माना। फैब इंडिया सहित खादी ग्रामोद्योग आयोग जिन मिलों तथा सूती कपड़ों के निर्यात करने वाले दूसरी मुनाफाखोर कंपनियों से सहयोग पारहा है उन्हें सहयोग खादी मार्क के जरिये देने का संकल्प किया हुआ है। जिस तरह महात्मा जी के जीवनकाल में ही चर्खा संघ को मुंह की खानी पड़ी, खादी ग्रामोद्योग आयोग के वर्तमान अध्यक्ष को परंपरागत खादी विशेषज्ञों से परामर्श करना चाहिये। अगर खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष ब्लागर हिमकर के सैकड़ों पोस्ट जो केवल खादी से ही संबंध रखते हैं उन्हें सांगोपांग पढ़ें खादी मिशन के संयोजक बालविजय सहित हिन्द के हर प्रांत के कार्यरत परंपरागत खादी सेवियों सहित उन लोगों को भी विश्वास में लें जो वयाधिक्य के कारण अपने अपने घर बैठे हैं। इस ब्लागर ने आयोग के मौजूदा अध्यक्ष श्री विजय कुमार सक्सेना का सुझाया था कि वे 1977 के एग्रो एक्सपो को सफलतापूर्वक संपन्न करने वाले नब्बे वर्षीय विपिन सक्सेना से देहरादून उनके निवास स्थान पर जाकर मिलें तो उन्हें खादी ग्रामोद्योग आयोग की भावी दिशा सुनिश्चित करने में बहुत बड़ी सहायता मिल सकती है। पता नहीं मूलतः उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड डिवीजन के महत्वपूर्ण शहर बरेली के निवासी विपिन सक्सेना इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा कांग्रेस नेता रहे नारायण दत्त तिवारी के सहयोगी रहे हैं मुरादाबाद के मूल निवासी दूसरे खादी सेवी योगेश शर्मा भी सक्सेना जी की तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उत्पाद हैं। मोरार जी देसाई के प्रधानमंत्रित्व काल में खादी को नयी दिशा तथा श्रेय दिलाने की यशस्विता धारक विपिन सक्सेना ही हैं। यदि आयोग के मौजूदा सदर महाशय विनय कुमार सक्सेना ने विपिन सक्सेना से मिल कर खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रमों के बारे में विपिन भाई के अनुभवों का लाभ उठाया होता तो उन्हें खादी ग्रामोद्योग आयोग संचालन में सुविधा होती। टाइम्स आफ इंडिया की रपट के अनुसार खादी ग्रामोद्योग आयोग फैब इंडिया नामक कंपनी के खिलाफ अपने खादी मार्क सिस्टम के खिलाफ आचरण करने के लिये मुकदमा करना चाहता है। चर्खा संघ जब खादी कार्यक्रम को देखता था खादी संगठनों को प्रमाणपत्र जारी करता था तथा कत्तिन बुनकर व दूसरे कारीगरों की मजदूरी मात्रा सुनिश्चित करता था एक सैद्धांतिक तथा अलाभ अहानि वाला खादी कार्यक्रम चलाने का पक्षधर था। हथकरघा में बुने जाने वाले मिल कते सूत के तागे से तैयार कपड़े को जबलपुर हाईकोर्ट ने खादी बताया और चर्खा संघ की आपत्ति को खारिज कर दिया। भारतीय संसद ने 1956 में खादी ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम एलएक्सआई 1956 पारित कर 31 मार्च 1957 तक अ.भा. खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का कायाभ्यन्तरण कर खादी ग्रामोद्योग आयोग का गठन खादी से संबंध रखने वाले पूर्णकालिक पांच गैर सरकारी सदस्यों वाला स्वायत्तशासी के.वी.आई.सी. का गठन विकेन्द्रित अर्थांग के निष्णात सहकारी अभियान के पोषक बांबे प्रेसीडेंसी में 1937 में चुनी गई लोकप्रिय सरकार जिसके मुखिया महाशय वी.जी. खेर थे, उस मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री थे। भारत की आजादी के बाद संयुक्त राज्य अमरीका में भारत के प्रथम राजदूत गगन बिहारी मेहता, वैकुंठ ल. मेहता के अग्रज थे। खादी ग्रामोद्योग मंडल गठित करते समय वैकुंठ ल. मेहता मुंबई में रहते थे। जब भारत सरकार ने एस.बी.आई. एक्ट 1956 पारित कर इंपीरियल बैंक आफ इंडिया को स्टेट बैंक आफ इंडिया में परिवर्तित कर डाला वैकुंठ मेहता एसबीआई के उपाध्यक्ष (अध्यक्षता तब केन्द्रीय वित्त मंत्री संपन्न करते थे) नियुक्त हुए। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड 1.4.57 के पश्चात खादी ग्रामोद्योग आयोग का मुख्यालय मुंबई में रखने का मूल कारण ही यह था कि वैकुंठ ल. मेहता मुंबई से बाहर जाने के लिये तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में भारतीय स्टेट बैंक व खादी ग्रामोद्योग आयोग को निरंतर प्रगति के मार्ग का राही बनाया। अहर्निश लोकहित का संकल्प करने वाले वैकुंठ ल. मेहता ने 1954 से 1963 तक खादी आयोग को एक सफल संगठन के रूप में स्थापित किया। सर्व सेवा संघ की खादी प्रमाण पत्र समिति खादी ग्रामोद्योग आयोग की महत्वपूर्ण समिति थी जिसकी स्वायत्तता का वैकुंठ मेहता ने सदा सम्मान किया। खादी ग्रामोद्योग आयोग की पहली बैठक 2.4.1957 में केन्द्रीय प्रमाण पत्र समिति का गठन किया गया। श्री विचित्र नारायण शर्मा इस समिति के अध्यक्ष थे साथ ही उ.प्र. सरकार में केबिनेट मिनिस्टर भी थे। वे आयोग की प्रमाण पत्र समिति के अध्यक्ष 1957 से 1972 तक लगातार पंद्रह वर्ष तक बने रहे। खादी कमीशन एक्ट में ही इंगित किया गया कि केन्द्रीय प्रमाण पत्र समिति का मुख्यालय लखनऊ में रहेगा। एमएसएमई एक्ट के तहत खादी ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम उसकी महत्वपूर्ण Semi Autonomus कमेटी केन्द्रीय प्रमाण पत्र समिति जिसे एक्ट में Central Certification Commette कहा गया है श्री विचित्र नारायण शर्मा द्वारा प्रमाण पत्र समिति छोड़ने के पश्चात खादी कार्यक्रम में एक ऐसा ऊहापोह वातावरण बना कि चर्खा संघ द्वारा निर्धारित अलाभ अहानि का रोजगारवर्धक खादी कार्यक्रम को कालांतर में खादी मार्क के जरिये मुनाफा कमाऊ कार्यक्रम में बदलने की प्रक्रिया शुरू से गांधी की खादी का रास्ता यूपीए प्रथम के शासनकाल में बदल गया। यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह पी.वी. नरसिंह राव मंत्रिमंडल वित्त मंत्री रहते खादी ग्रामोद्योग की रोजगारदायिका क्षमता को पूरा समर्थन देते थे पर राजनीतिक कारणों से खादी ग्रामोद्योग आयोग में अध्यक्षों की तैनाती 1963 अप्रेल से ही काफी बदल चुकी थी। खादी ग्रामोद्योग आयोग का वह वर्चस्व स्थायी नहीं रह पाया जिसकी संरचना वैकुंठ ल. मेहता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समर्थन से संकल्पित की थी। वे चाहते थे कि हिन्द के गांवों को Rurban Society का आकार दिया जा सके। वैकुंठ मेहता ने दस वर्ष जो परिश्रम किया उनके उत्तराधिकारियों में वह नैतिक तथा सैद्धांतिक क्षमता नहीं थी अन्यथा आज जो स्थिति भारतीय स्टेट बैंक की है - खादी ग्रामोद्योग आयोग कुटीर ग्रामीण उद्यमिता के जरिये हिन्द के गांवों का कायाकल्प कर सकता था वह अटक गया। फैब इंडिया और उसकी रीतिनीति पर चलने वाली जो दूसरी नफा कमाने वाली कंपनियां खादी ग्रामोद्योग को अपने लाभ का नया मुकाम बनाना चाह रही हैं वे लड़खड़ा रहे खादी ग्रामोद्योग आयोग की कानूनी बखिया उखेड़ने में सक्षम प्रतीत होते हैं। रोजगार एवं पारिश्रमिक उपलब्ध कराने वाले खादी चर्खा पर सूत कताई निटिंग यार्न कताई निटिंग यार्न की हाथ बुनाई तथा हथकरघे पर सूत की बुनाई से हिन्दुस्तान की महिला श्रम शक्ति को चर्खा कताई निटिंग यार्न कताई निटिंग यार्न की हाथ बुनाई तथा हथकरघे पर सूत ऊन रेशम तागे की बुनाई से हथकरघा बुनकरों को अपने घर में रोजगार देने का जो तरीका है उस 1961 से अद्यपर्यन्त पावरलूमों ने हथकरघा बुनकरों को कारीगरी के बजाय पावरलूम मजदूर में बदल डाला है। पावरलूम में बुना कपड़ा ढोक ढांचे में हथकरघा की बराबरी नहीं कर पातां इतना जरूर है कि कपड़ा ज्यादा बुना जाता है उसमें वस्त्र की गुणवत्ता नहीं होती। यह सारा संकल खादी कार्यक्रम को 1961 से अब तक ढुलकता रहा है अब तो स्थिति यहां तक आगई है कि पावरलूम हथकरघा व खादी को लीलने की तैयारी में बैठा है। 
          ऐसी स्थिति में आयोग के वर्तमान अध्यक्ष महाशय खादी का पूरा प्रसंग एमएसएमई एक्ट द्वारा खादी मार्क सहित खादी संस्थाओं की दुर्दशा का सही सही नक्शा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के संज्ञान में लाने का प्रयत्न करें इस समय खादी ग्रामोद्योग आयोग तथा राज्यों के खादी ग्रामोद्योग बोर्डों का औद्योगिक कायाकल्प करने की जरूरत है। राज्यों के संबंधित मंत्रालयों राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्डों के अध्यक्ष व सदस्यों से प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार को सक्षम बनाने के लिये स्चयं चर्चा करें। गांवों की जो उद्यमिता हीनता का आज नजारा है उससे छुटकारा पाने के लिये खादी मार्क के समानांतर गांव के परिवारों को सूत कातने निटिंग यार्न कातने निटिंग यार्न की हाथ बुनाई कपड़ा मंत्रालय से हथकरघा हैंडलूम कमिश्नर को पुनः एग्रो रूरल इंडस्ट्रीज मंत्रालय को पुनर्जीवन देते हुए खादी, हथकरघा, तथा ग्रामीण उद्यमों के पुनर्जीवन का रास्ता अख्तियार किया जाये इसके लिये जमीनी मेहनत आयोग के अध्यक्ष महोदय को ही करनी होगी। 
          खादी ग्रामोद्योग आयोग के वर्तमान अध्यक्ष महाशय जो व्यक्ति गणनानुसार पंद्रहवें और अध्यक्षतावधि के नजरिये से आगणन करने पूर्णावधि वह तीन वर्ष की हो अथवा पांच या छः वर्ष केवल श्री घनश्याम ओझा श्री लक्ष्मीदास श्री नवलकिशोर शर्मा श्री सुरेन्द्र मोहन एक वर्ष अथवा दो वर्ष के लिये आयोगाध्यक्ष रहे शेष सभी महाशय तीन वर्ष से नौ वर्ष तक आयोग के सदर रहे। महाशय विनय कुमार सक्सेना वर्तमान खादी आयोगाध्यक्ष ने टाइम्स आफ इंडिया के रिपोर्टरों को कहा - हमारा व्यापार ऐसे उत्पाद के विपणन से प्रभावित हुआ जिसे खादी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने अपने मंतव्य को स्पष्ट करते हुए रिपोर्टरों से ही यह भी कहा कि खादी से मतलब उस उत्पाद से है जिसमें से कारीगर या आर्टिजन की मजदूरी पेटे चालीस प्रतिशत कारीगर की जीविका का अंश है याने वे यह कहना चाहते हैं कि एक रूपये की खादी में चालीस पैसा मजदूरी पेटे कत्ती बुनकर व दूसरे कारीगर का हिस्सा है। महाशय विनय कुमार सक्सेना ने कारीगर की मजदूरी वाले अंश को अपना लक्ष्य बताया। फैब इंडिया के अलावा टाइम्स आफ इंडिया के रिपोर्टरों ने रेमण्ड पीटर इंग्लिश और अरविन्द मिल का भी उल्लेख संदर्भ गत विषय में किया। चर्खा संघ ने अपने प्रमाण पत्र पद्धति में कत्ती बुनकर और कारीगरों की मजदूरी के अलावा खादी कार्यक्रम को चलाने वाली खादी संस्थाओं के लिये मुनाफाखोरी संस्था अथवा संस्था का संचालन करने वाले व्यक्ति समूह के निषेध किया था। चर्खा संघ व महात्मा गांधी की खादी का लक्ष्य लााभार्जन अथवा मुनाफा कमाने की सख्त मनाही थी। चर्खा संघ के 1948 में लुप्त हो जाने पर संत विनोबा भावे के राय मशविरे से चर्खा संघ की खादी प्रमाण पत्र नीति का जिम्मा सर्व सेवा संघ की खादी समिति को सौंपा गया खादी ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम 1956 के अस्तित्व में आने तदनुसार खादी ग्रामोद्योग आयोग के 1.4.1957 के दिन अस्तित्व में आने तक खादी समिति (सर्व सेवा संघ का एक विभाग जो खादी काम की निगरानी करता था) वह प्रमाण पत्र नियमावली का संचालन करता रहा केवीआईसी एक्ट बन जाने खादी की कानूनी परिभाषा घोषित होने के पश्चात भी हथकरघा बुना सूती कपड़ा खादी के नाम से बिकता रहा। संभवतः केन्द्रीय प्रमाण पत्र समिति ने चर्खा संघ सहित खादी का उत्पादन विपणन करने वाली प्रमाणित संस्थाओं को प्रमाणित खादी की संज्ञा दी। चर्खा संघ सर्व सेवा संघ अखिल भारत खादी ग्रामोद्योग बोर्ड अथवा केवीआईसी ने जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई अपील सुप्रीम कोर्ट में नहीं की। गुलजारी लाल नंदा सेठ अंबालाल मिल मालिक की अग्रजा अनुसूया बेन जिन्हें उनके पिता जी ने बाल विधवा होने पर महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम से जोड़ दिया था अनुसूया बेन तथा गुलजारी लाल नंदा का संकल्प मजूर महाजन सामंजस्य था। उसमें कानून की कोई घुसपैठ नहीं थी यहां तक कि सेठ प्राणलाल सुन्दर जी कापड़िया मुंबई के प्रतिष्ठित मिल मालिक थे पर खादी और हैंडलूम की वकालत कपड़ा मंत्रालय की सैंट्रल टैक्सटाइल कमेटी में करते रहते थे। प्राणलाल सुन्दर जी कापड़िया खादी और ग्रामोद्योग कार्यक्रमों के सबसे बड़े पैरोकार थे। जिस खादी मार्क रेगुलेशन की बात खादी आयोग के चेयरमैन कर रहे हैं वह चर्खा संघ की खादी नीति सहित खादी ग्रामोद्योग आयोग जब 1977 - 1980 के बीच पोली खादी या पोलियस्टर खादी को नाम नहीं किया गया था तब तक सूती खादी का अपना खास महत्त्व या प्रमाण पत्र के तौर तरीकों में भी खादी कमीशन के द्वितीय अध्यक्ष सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री व आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे उछंगराय नवलशंकर जब खादी ग्रामोद्योग आयोग अध्यक्ष हुए उन्होंने पहला काम सेंट्रल सर्टीफिकेट कमेटी के पंख काटते हुए किया इसलिये महाशय विनय कुमार सक्सेना को चाहिये कि वे प्रमाण पत्र पद्धति का पुनर्वाचन के अदालत में फैब इंडिया अथवा भविष्य अपनी चहेती कंपनी रेमंड अरविन्द मिल वगैरह कंपनियां जिनसे वे एमओयू कर रहे हैं वे भी खादी कमीशन के विरूद्ध अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसलिये उन्हें चाहिये खादी के पूरे प्रसंग को बिना छिपाये प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के संज्ञान में लाकर ही कोई कदम उठायें। कहीं उनकी चालढाल से महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 से पहले ही ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के रोजगार संवर्धन में खादी लुप्त न हो जाये। कंपनियों से मुकदमेबाजी में महाशय विनय कुमार सक्सेना अकेले पड़ जायेंगे कंपनियां खादी मार्क का लाभार्जन कर लेंगी।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

No comments:

Post a Comment