Tuesday, 21 March 2017

विजय पताका लिये होली मनाने वाले मोदी।
          राजदीप सरदेसाई की सोच में गंगा जमना की माटी का भी असर मालूम पड़ता है। अयोध्या मथुरा काशी सप्तैका याने सात धन एक मोक्षदायिका क्षेत्र उत्तर प्रदेश है। अटल बिहारी वाजपेयी ने उत्तराखंड को उ.प्र. से अलग किया। हरद्वार कभी भी पहाड़ का इलाका नहीं था आज भी नहीं है। मोक्षदायिका मायापुरी को अगर उ.प्र. में ही रहने दिया जाता तो सारे हिन्दुस्तान के मोक्षदायक तीर्र्थों में चार उ.प्र. में ही रहते। खैर यह तो समय की बलिहारी ही कही जायेगी जो परिवर्तन कराता रहता है। उ.प्र. ही क्यों ? समूचे हिन्द में आज नरेन्द्र मोदी सरीखा राजनीतिक नेतृत्व भा.ज.पा. सहित किसी भी राजनीतिक समूह में नहीं है। सतसठ वर्षीय नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में जो शारीरिक याने कायिक, मानसिक तथा वाचिक स्फूर्ति है कांग्रेस पार्टी सबसे पुराने राजनीतिक दल सहित कम्यूनिज्म याने मार्क्स की अर्थनीति व राजनीति का अनुकरण करने वाले मार्क्सवादियों और दूसरे साम्यवादियों में भी वह फुर्ती किसी नेता में नहीं मिलती। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही हिन्द के निष्कलंक राजनेता हैं यह बात हिन्द का हर समाज आबाल वृद्ध नरनारी समूह भली तरह जानता है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का आत्मोत्थान उनकी निजी सामर्थ्य से हुआ है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जम्मू कश्मीर सहित पंजाब, उ.प्र. के यादव राजप्रमुख अखिलेश यादव, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी, उनके दोनों मंत्री पुत्र उपमुख्यमंत्री सहित उड़ीसा के नवीन पटनायक, आंध्र के चन्द्रबाबू नायडू तमिलनाडु के एम.के. स्टाालिन, कर्णाटक के कुमार स्वामी गौड़ा ये सभी अपने अपने राजखानदानी हैं। नये नेताओं में ममता बनर्जी व अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री की कदम ताल पर चलने की नकल तो कर रहे हैं पर इन दोनों की अखिल भारतीय पहचान मुश्किल लगती है। पश्चिम बंगाल ने मालदा में नकली नोटों का कारोबार ममता बनर्जी के गले में फंसी मछली की हड्डी की भूमिका अदा कर सकती है। ये क्षत्रप सुप्रीमो क्षेत्रीय नेता कुछ भी कहें इनमें यह हिम्मत आने की कोई गुंजाइश नहीं लगती जिसे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी ने अर्जित किया है। हिन्दुस्तान की जनता यह मान चुकी है कि केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही ईमानदार राष्ट्रीय खेवनहार हैं। कांग्रेस कहती है उ.प्र. सताईस साल से बेहाल है पर वस्तुतः उ.प्र. का दुर्भाग्य उस दिन शुरू हुआ जब श्रीमती गांधी ने अपनी पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार को हरा कर वेंकट गिरि वराह गिरि को भारत का राष्ट्रपति चुनवा दिया। इस घटना को घटे 2019 में पूरी आधी शताब्दी हो जायेगी। उ.प्र. का बहुसंख्यक समाज जब गोमुख से गंगा सागर तक गंगा नहान सरदेसाई ने यह कर उ.प्र. के लोगों को उसी तरह अपनी ओर आकर्षित किया जिस तरह गंगा यमुना सरस्वती के संगम त्रिवेणी के बालू पर हिन्दुस्तान का साधु नागा साधुओं सहित अपनी पीठ में बालू रगड़ते हुए कहता है - रामनाम की लूट है लूट सके तो लूट अंतकाल पछताओगे जब शरीर जायगा छूट। यह हिन्दुस्तान की वाचिक अध्यात्मिकता है जिसके प्रतीक देश के अढ़ाई करोड़ साधु हैं। हम साधुओं में गिरि गुसाईं भारती पुरी सरस्वती नाथ और अवधूतों को भी गिन रहे हैं। इन साधु सन्यासी समूह को देख कर यहां तक कि सूफी फकीरों को भी हिन्द का आदमी गंगा की तरह पवित्र मान कर उन्हें नमोनारायण करता रहता है। घोर जातिवादी महिषासुर का सम्मान करने वाले बीफ उत्सव मनाने वाले प्रबुद्ध दलित भी हैं तो हिन्दुस्तानी ? उन्हें भी अपने अवगुणों का अहसास होता रहता है। कबीर का कहना - बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजूं आपनो मुझसा बुरा न होय, याने कमजोरी अपनी देखो विशेषता या श्रेष्ठता सामने वाले में खोजें। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने पिछले अढ़ाई वर्ष में हिन्द की राजनीतिक फिजां बदल डाली है। हिन्द का आम आदमी आ.आ.पा. पर यकीन नहीं करता आआपा अपनी यशोगाथा विज्ञापनों के जरिये फैला रही है। अंततोगत्वा आआपा का वही हश्र होना है जो असम की असम गण परिषद तथा असम के नौजवान नेताओं का हुआ। इसलिये यह कहना काफी सही है कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में बी.जे.पी. उ.प्र. में बहुमत पाकर कारगर सरकार बनायेगी। दूसरे विश्लेषकों की भांति घोष वर्ड, घोष वाचा अथवा घोष वाणी संस्कृत अथवा बांगला का घोष शब्द स्वयं भी उद्गार बोधी अथवा वाणी विलास का प्रतीक है। उन्हें देश विदेश के चुनावों का अनुभव है। तुलसीदास ने अपने रामचरित मानस में एतो मतो हमारो कहा। मत देने वाला व्यक्ति या अपना मत ईमान से व्यक्त करने वाला व्यक्ति मत को गोपनीय रखता है उसी तरह जिस तरह जानवर तो कपड़ा नहीं पहना करता आदमी या इन्सान अपने लज्जा ढकने के लिये कपड़ा पहनता है। घोष महाशय फरमाते हैं लीप आफ फेथ आस्था या विश्वास सहित नेता की विश्वसनीयता ही उ.प्र. में निर्णायक बिन्दु होगा। सवाल उठता है परिवार की तोड़फोड़ से उपजे महाशय अखिलेश यादव पर मतदाता यकीन करेगा या पिछले अढ़ाई साल से मोदी जो अहर्निश सेवामहे का यज्ञ रहे हैं उनकी विश्वसनीयता पर यकीन करेगा ? घोष महाशय भोजपुरी, बुंदेली, अवधी, ब्रज और खड़ी बोली उ.प्र. की इन पांच भाषाओं पर अमिधा लक्षणा व्यंजना के तीनों स्तर पर अधिकार रखते हैं क्या ? उ.प्र. में विशेष तौर पर जोश का गोरखपुर, काशी, प्रयाग, वृन्दावन,, अध्योध्या सहित अवध के सभी इलाकों में बंगला भाषियों की जबर्दस्त उपस्थिति है जिन्हें जिस इलाके मंे वे रहते हैं वहां की भाषा व स्थितियों का पूर्ण ज्ञान है। यह संभव हो सकता है कि घोष महाशय का आकलन सही हो पर वोट देते देते उ.प्र. का वोटर इतना जागरूक होगया है कि वह समूह के बीच जो कहता है वह अपनों के बीच नकारा भी करता है इसलिये नेताजी मुलायम सिंह यादव के राज को यू.पी. का आम आदमी जो नेताजी या उनके यशस्वी पुत्र से परिचित नहीं है उसे गुंडाराज जंगलराज का भय सताता रहता है। राज गुंडा कर रहा हो या भतीजे का उ.प्र. में जंगल राज माफिया राज का गुंडा राज 2003 के पश्चात पिछले चौदह वर्ष से निरंतर अबाध गति से चल रहा है। ठाकुर अमर सिंह हिन्दुस्तान की राजनीति के नाड़ी वैद्य हैं। वे रहने वाले भी उस जिले के हैं जिसे आजमगढ़ कहा जाता है। आजमगढ़ नेताजी मुलायम सिंह को वैयक्तिक रियासत सरीखा बन चुका है। यह तो नेताजी ने भी स्वीकारा कि उनकी सबसे बड़ी मदद ठाकुर अमर सिंह ने ही की। ठाकुर अमर सिंह की मान्यता बनी है कि उ.प्र. का चीरहरण होरहा है। यह वैसी ही घटना है जिस तरह हस्तिनापुर राजप्रासाद में द्रौपदी का चीरहरण हुआ था। कृष्ण ने द्रौपदी की लाज रखी लोग आज भी कहते हैं दुशासन अपने अग्रज के हुक्म का पालन नहीं कर पाता। आकर्षक एडवर्टोरियलों के जरिये कोई व्यक्ति रातोंरात लोकप्रिय नेता नहीं बन सकता। फिर जब कि यादव राज खानदान में भयावह गृह कलह का वातावरण कायम हो। हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानियत से ही डेमोक्रेसी चल सकती है। इंग्लैंड का यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमरीका की तरह कहीं राजनीतिक विश्लेषकों को यह ध्यान में रखना चाहिये कि जिस हिन्दुस्तान की आबादी (अखंड भारत) तैंतीस करोड़ के करीब थी भारत विभाजन के बाद जो हिन्दुस्तान है उसमें आज एक सौ तीस करोड़ लोग बसते हैं। अगर बंगला देश तथा पाकिस्तान की मौजूदा जनसंख्या को भी जोड़ कर देखा जाये तो 14 अगस्त 1947 तक के हिन्दुस्तान के मुकाबले सात इन तीन देशों की आबादी एक सौ पैंसठ करोड़ करोड़ है जिसमें से 180 मिलियन या अठारह करोड़ इस्लाम धर्मी भारत के नागरिक हैं। उ.प्र. के मुसलमानों में देवबंद और बरेली के उलेमाओं का भी यत्र तत्र असर है सभी मुसलमान न तो अखिलेश राहुल गांधी को मत देंगे न ही एकजुट होकर वामसेफ चिंतक महाशय कांशीराम शिष्या बहन मायावती जिन्हें अखिलेश आदर पूर्वक बुआ कहते हैं उनकी झोली में ही सभी मुसलमानों का वोट गिरेगा ? महाराष्ट्र की तरह उ.प्र. में भी अकबरूद्दीन ओबेसी अंगद का पांव रख सकते हैं फैसला 11 मार्च को सामने आ जायेगा। नजारे की नब्ज सरदेसाई ने देख ली है। होली की शुरूआत होलाष्टक (फाल्गुन शुदी अष्टमी) से होती है। कुछ महत्वपूर्ण स्थानों में ढुंडका देवी की स्थापना से तीन दिन पहले होलाष्टक के दिन चीरबंधन होता है। यह व्यवस्था देवालयों में कारगर होती हैै। गांवों में जहां के लोग परंपरा से चीरबंधन करते हैं वह रंगभरी एकादशी से एक दिन पूर्व होली की दशमी तिथि को चीरबंधन किया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन चैत पड़वा काला पाख के दिन चीर के टुकड़े लोग अपने अपने कुर्ते कोट  या जाकिट में बांधते हैं। चीरहरण के अलावा चीरवितरण का यह तरीका कुमांऊँ के गांव गांव में मनाया जाता है। अब की होली में वे लोग जो इलेक्शन जीते हैं खुशनसीब होली मनायेंगे जो हार गये वे मुंह लटका कर होली खेलेंगे। होली का त्यौहार हिन्द का ऐसा सामाजिक त्यौहार है जिसमें डेमोक्रेसी की तरह इन्सानी बराबरी का पर्व होली है।
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