मुख्यमंत्री कृपया विचार करें नील गौ संरक्षण हेतु ठोस उपाय ?
गौ सेवी महंत योगी आदित्यनाथ का गाय और मनुष्यता की बराबरी को कर्म कौशल योग मार्ग की खेतीबाड़ी, लोक स्वास्थ्य तथा उत्तर प्रदेश को पंचगव्य का पंचायती संदेश संकल्प करें। जिस योगी का नित्यकर्म गोसेवा से शुरू होता है उसके लिये बीस करोड़ आबादी वाले उ.प्र. के लिये मूत्रम् तु नील वर्णाया के संदर्भ में उ.प्र. को उत्तम प्रदेश बनाने हेतु पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की काम की बात को साकार करने का अद्भुत अवसर अचानक हाथ आया है, उसका सदुपयोग कर जाग मछन्दर गोरख आया गो रक्षा, मानव रक्षा का नया मार्ग नीलगायों के बाड़े प्रदेश की वर्तमान गोशालाओं के साथ साथ रखने की पहली जरूरत है। अंग्रेजी में जिसे ब्लू बुल कहते हैं भारतीय वाङमय उसे नीलवर्णा गौ कहता है।
पंचगव्य निर्माण विधि सार
गोमूत्रम् गोमयम् क्षीरम् दधि सर्पिः कुशोदकम्
निर्दिष्टम् पंचगव्यम् च पवित्रम् कायशोधनम्।
गोमूत्रे वरूणो देवो हव्यवाहस्तु गोमयः
क्षीरे चन्द्रश्च भगवान् वायुर्दघ्निः समाश्रितः
भानुराज्ये स्थित स्त्रदवद् जले हरिरेव च
दर्भे च देवताः सर्वे पवित्रम् तेन नित्यशः
पंचगव्य निर्माण गोपदार्थ
मूत्रम् तु नीलवर्णाया (नीलगाय का गोमूत्र)
कृष्णाया गोमयम् स्मृतम् (कालेे रंग की गाय का गोबर)
पयश्च ताम्र वर्णाया (तांबे के रंग वाली गाय का दूध)
श्वेतायाः दधि संस्मृतम् (सफेद गाय का दही)
कपिलाया घृतम् ग्राह्यम (कपिला गाय का घी)
अलाभे सर्व वर्णानाम् कपिलैका प्रशस्यते (कपिला गौ मनुष्य मात्र के हितवर्धक है)
पंचगव्य कैसे तैयार किया जाय ?
मूत्रस्येक पलम् दद्यात, तदर्धम् गोमयम् स्मृतम्। क्षीरम् सप्तपलम् दद्यात, दधि त्रिपलम् मुच्यते।
आज्यस्येक पलम् दद्यात, पलमेकम् कुशोदकम्, सर्पिः कुशोदकम् चैव पृथक मंत्रैर्विधीयते।
मूत्रम् तु ग्राह्या गायत्र्या गंध द्वारेति गोमयम् आप्यायचिति वै क्षीरम्।
दधि क्राव्णेति वै दधि, तेजोसि शुक्रभित्याज्यम् देवस्यत्वा।
कुशोदकम् ॐ भूः भुवः स्वः ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
(उपरोक्त गायत्री मंत्र का मंत्रोच्चार नीलगाय का गोमूत्र पंचगव्य में मिलाने के समय)
गंध द्वाराम् दुराधर्षाम् नित्य पुष्टाम् करीषिणीम् ईश्वरीम् सर्व भूतानाम् तामिहोप पहृक्ये श्रियम्।
(काले रंग की गाय का गोबर मिलाने के लिये उपरोक्त मंत्रोच्चार है)
ॐ आप्तायस्व समेतुते विश्वतः सोम वृष्णियम् भवा वाजस्य संगधे
(उपरोक्त मंत्रोच्चार तांबे के रंग की गाय का दूध पंचगव्य में मिलाते समय हो)
ॐ दधिः क्राव्णोः अकारिणम् जिष्णो रश्वस्य वाजिनः सुरभिणो मुखः करत प्रण आयु षि तारिषत्।
(उपरोक्त मंत्रोच्चार सफेद रंग वाली गाय का दही पंचगव्य में मिलाने के समय का है)
ॐ तेजोसि शुक्रमस्य मृतमति धामनामासि प्रियम् देवानाम् अनाधृष्टम् देव यजनमसि।
वैदिक भाष्य के अनुसार गोमूत्र में वरूण तत्व, गोबर में हव्यवाह (याने हवनजन्य वायुशोधन), गोदुग्ध में चन्द्रमा की स्थिति, गाय के दही में - वायु, घी में सूर्य शक्ति तथा जल में भगवान विष्णु शक्ति है। इस प्रकार पांचों द्रवों को मंत्रोच्चार सहित मिलाने के पश्चात पंचगव्य का पूर्ण मंत्र ॐ देवस्यत्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्वाहुभ्याम् पूष्णोः हस्ताभ्याम् आपो हिष्टा मयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन महेरणाय चक्षसे यो व शिवतमो रसस्तस्यभाजायतेे हनः उशतीरिव मातरः तस्माऽअरंगमामवो यस्य रसयाय जिन्नथ आपोजन यथा च नः।
गोसेवा करने वाले योगी जिन्हें गोरक्षधाम की असीम कृपा से गंगा, यमुना, अदृश्य सरस्वती एवं प्रत्यक्ष सरयू सहित अनेकानेक सदानीरा नदियों का आशीर्वाद प्राप्त है। उन्हें हिन्द ने सबसे बड़े राज्य घटक जिसे आजकल उत्तर प्रदेश कहा जाता है उसमें राजधर्म संचालन का उत्तरदायित्त्व प्राप्त हुआ है इसलिये उनसे अनुरोध है कि अपनी गौशाला सहित प्रदेश भर में जहां जहां गौशालायें हैं उनके प्रमुखों तथा उ.प्र. के ऐसे गोसेवक जो जर्सी एवं संकर गायों से वास्ता नहीं रखते स्वयं भी जरसी और संकर गाय नहीं पालते उन्हें आहूत किया जाये। उनकी बात उनके अनुभव सुने जायें। गायों की साठ नस्लें थीं हिन्द में अब केवल 24 ही रह गयी हैं इस बारे में भी जानकार लोगों के विचार जाने जायें। गुजरात के कृषि महा विश्वविद्यालय जामनगर ने जो अनुसंधान किये हैं उनको भी संज्ञान में लिया जाये। उ.प्र. के लिये गाय भैंस बकरी ऊंट आदि पालने वाले चुनिंदा लोगों की रामकहानी भी सुनी जाये। नीलगाय खेतीबाड़ी को जो नुकसान पहुंचा रही हैं उसको भी ध्यान में लिया जाये। नीलागाय के मूत्र की रासायनिक पड़ताल जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से संपन्न करायी जाये। उन्होंने जर्सी और संकर गायों के दूध में अनुसंधान किया है जर्सी और संकर गायों के दूध को देसी नस्ल की गायों के दूध से अत्यंत घटिया बताया है। जरूरत इस बात की भी है कि उ.प्र. का पशुपालन विभाग को सम्मति दी जाये कि जामनगर कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधानों से लाभान्वित होने का संकल्प लें। नीलगाय बाड़े - प्रदेश में जहां जहां बड़ी गौशालायें हैं उनके आसपास नीलगाय बाड़े सृजित करने की दिशा में भी सोचा जाये ताकि नीलवर्णा गौ मूत्र पंचगव्य के लिये उपलब्ध किया जा सके। उ.प्र. में नीलगायें जिन्हें अंग्रेजी में ब्लू बुल कहते हैं किस जिले में कितनी नीलगायें हैं पशुपालन विभाग या जंगल जानवर संरक्षा करने वाले विभाग से नीलगायों की वास्तविक संख्या ज्ञात हो तो नीलगाय गोमूत्र जिसमें वरूण शक्ति विद्यमान है उसका लोकहित में प्रयोग करने के बारे में संकल्प किया जा सकता है। नीलवर्णा गौ संरक्षण के समानांतर जहां जहां गौशालायें हैं उनमें पूर्णतः काले रंग वाली देसी गायें सफेद रंग की देसी गायेें तांबे के रंग वाली देसी गायें कपिला गौ इनके अलग अलग गो सदन संरचना के बारे में संभावनायें आंकी जायें। यदि पूर्णतः सफेद, काली, बादामी या तांबे के रंग वाली तथा कपिला गौ निजी गोपालकों के पास भी होें तो गौशालाओं के लिये लिये जाने पर भी विचार किया जाये।
प्रदेश सरकार राज्य के कृषि अथवा अनुसंधान विद्यालयों सहित इंडियन वेटिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट इज्जतनगर बरेली तथा उत्तराखंड के मुक्तेश्वर स्थित आई.वी.आर.आई. से संपर्क कर पहाड़ों की गायों उ.प्र. की तराई बुंदेलखंड पूर्वांचल तथा ब्रज क्षेत्र की गायों की नस्ल को वर्गीकृत करने हेतु अनुरोध किया जाये। उ.प्र. सरकार बुंदेलखंड पूर्वांचल अवध ब्रज तथा पश्चिमी उ.प्र. के कृषि विश्वविद्यालयों व कालेजों जहां जहां पशुपालन कालेज हैं जहां पशु चिकित्सक विद्यालय हैं उन सबको प्राथमिकता देते हुए मनुष्य पशु संबंधों को मानवीय सहानुभूति से देखने की जरूरत है। मुख्यमंत्री को इन सबका मंतव्य ज्ञात कर गोसेवा को नये रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में सोचना चाहिये।
पंचगव्य और विभिन्न गो पदार्थों का अंश, नक्षत्र विचार, हिन्द की पारंपरिक पंचांग विधि में तिथिवार नक्षत्र योग और करण का महत्व है। नक्षत्र 27 होते हैं विशिष्ट दशा में कई नक्षत्र अभिजित स्तर पर पहुंचते हैं। पंचगव्य में साढ़े तेरह पल अथवा कहें 27 द्विपल मात्रा निर्धारण भी पंचगव्य के लिये विवेचनीय विषय है। गोमूत्र एक पल याने नक्षत्र विचार से हिस्सा, गोबर आधा पल याने एक हिस्सा, गोदुग्ध सात पल याने 14 हिस्सा, दही तीन पल याने 6 हिस्सा, घी एक पल याने दो हिस्सा, कुशोदक एक पल याने 2 हिस्सा ये कुल मिला कर सम्मिलित करते समय वेदोक्त मंत्रोच्चार सही सही हो तो पंचगव्य व्यक्ति के कायशोधन का कारक होगा इसलिये पंचगव्य निर्माण करने वाले मांत्रिक पंचामृत निर्माण करने वाले मांत्रिकों सहित गोपालकों गोसेवकों तथा पंचगव्य के प्रयोग से कायशोधन का मार्ग प्रशस्त होकर कैंसर तथा ऐचआईवी सरीखे जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पंचामृत के निर्माण तथा पंचामृत सेवन से अकालमृत्यु अल्पमृत्यु व अपमृत्यु से बचने के ये उपाय काम में लाये जा सकते हैं इसलिये माननीय मुख्यमंत्री जी के गौशाला संवर्धन संबंधी व्यापक विषय को जो महत्वपूर्ण उपांग है उनके बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिये। इस ब्लागर की निश्चित राय बनी है कि पंचगव्य कैंसर तथा एचआईवी की बीमारी का माकूल इलाज सप्ताह में एक बार विशेषतया शनिवार को पंचगव्य लेप से काय स्नान करने से काय शुद्धि के साथ साथ कर्कव्याधि से मुक्ति और एचआईवी के कुप्रभावों से मुक्ति मिल सकती है।
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