Tuesday, 25 July 2017

गोरखालैंड या सिक्किम का हिस्सा दार्जिलिंग ?
दार्जिलिंग गुर्खा समाज तथा सिक्किम चोग्याल की भूमिका। 
सन 1816 की सिगौली या सुगौली संधि ब्रिटिश नैपाल संधि का सूत्र।
यद्यपि भारत सरकार ने नैपाल भारत संधि 1816 जिसे सिगौली-संधि का नाम दिया गया 1950 में उपरोक्त संधि का नवीनीकरण भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और तत्कालीन नैपाल नरेश त्रिभुवन शाह में संपन्न वार्तालाप के पश्चात 1816 की सिगौली संधि नवीकृत करते हुए जब संधि को पुनः पचास वर्ष पर्यन्त सन 2000 के आसपास पुनः नवीकृत होना था जो अभी तक संपन्न नहीं हो पाया है। संधि के नवीकृत न होने और दार्जिलिंग के गुर्खा प्रसंग में सिक्किम के चोग्याल से भी जुड़े होने तथा दार्जिलिंग में सिक्किम का कब्जा रहने भारतीय संघ केे घटक राज्य सिक्किम के मुख्यमंत्री ने बयान देते हुए दार्जिलिंग का मसला सिक्किम से जोड़ा है इसलिये यह जरूरी लगता है कि 1816 की सिगौली संधि का पुनर्वाचन महत्वपूर्ण अनिवार्यता होगयी है। गुर्खों ने सन 1790 से लेकर सन 1815 तक कुमांऊँ व गढ़वाल के कई इलाकों में गोर्खा राज कायम कर लिया। कुमांऊँ इतिहासकार कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे के अनुसार सिगौली या सुगौली में नैपाल नरेश व ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच जो समझौता या संधि हुई उसके पक्षकार नैपाल नरेश की ओर से काजी अमर सिंह थापा थे। पूर्व में बमशाह ने जो संधि का मसौदा बनाया था उसे काजी अमर सिंह थापा ने निरस्त कर दिया। बमशाह को डोटी का सुब्बा दोनों पक्षों ने स्वीकार किया। गुर्खों ने शिमला से लेकर सिक्किम तक अपना राज्य विस्तार कर लिया था। कुमांऊँ इतिहासकार बदरी दत्त पांडे ने लिखा - राजा बाजबहादुर चंद धार्मिक विचारों के राजा थे। मानसरोवर कैलास के यात्रियों से लामाओं, हुणियों की अत्याचार पूर्ण कहानियां सुनने पर वे दुःखी होते थे। उन्होंने भोट के रास्ते तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और ईस्वी सन 1896 में ताकलाकोट के किले को छीन लिया। कहते हैं उसने जो दरार राजा बाजबहादुर चंद की सेना में की वह अभी तक वैसी ही है। राजा ने कैलास के दर्रों का अधिकार हुणियों से छीन कर अपने हाथों में ले लिया। भोटिया लोग को दस्तूरी तिब्बती हुणियों को देते थे वह भी बन्द कर दी। जब हुणियों ने यह स्वीकार किया कि वे आइन्दा कोई तकरार धर्म, रास्ता व तिजारत के बारे में नहीं करेंगे तब उसे जारी रहने दिया। पंचू आदि पांच गांवों की मालगुजारी से उन्होंने मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के लिये भोजन, वस्त्र व रहने के स्थान की व्यवस्था की। रजवार साहब अस्कोट के कागजात भी देखे और अपने बड़े बूढ़ों की परिपाटी को कायम रखा। इतिहासकार बदरी दत्त पांडे आगे लिखते हैं - नैपाली सरकार शिमला से लेकर सिक्किम के चोग्याल दरबार तक नैपाल का राज्य स्थापित होगया था। पूरा शिमला वाला हिमाचल उसके तीन बाजू तोड़ दिये गये। ये तीन बाजू कौन थे ? शिमला का हिमाचल, गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह का राज्य और कुमांऊँ के चंद राजाओं का राज्य जिन पर गुर्खा पच्चीस वर्ष से राज्य कर रहे थे वह छिन्नभिन्न कर दिया गया। यद्यपि सन 1816 में संपन्न सिगौली नैपाल ब्रिटिश संधि का संधिपत्र प्रकाश में नहीं आया है, इस संधि को सन 1950 में भारत के आजाद होने पर पुनर्नवीकृत किया गया और नैपाल नरेश व भारत सरकार के बीच संधि को हर पचास वर्ष पश्चात नवीकृत करने की व्यवस्था की गयी। वर्तमान नैपाल सरकार का मानस 1816 की सिगौली संधि जो 1950 में नवीकृत हुई उसे मान्यता नहीं देता है। दार्जिलिंग जहां गोरखालैंड का आन्दोलन उग्रतर होता जारहा है। गुर्खा लोग बंग मेें भी ममता बनर्जी द्वारा गुर्खों पर बांग्ला भाषा थोपना नापसंद करते हैं। सिक्किम जो अब भारतीय संघ का घटक राज्य है उसके पूर्व शासक चोग्याल का अधिकार क्षेत्र होने के कारण दार्जिलिंग केे बारे में सिक्किम के मुख्यमंत्री की राय महत्वपूर्ण है। यदि नैपाल सरकार ने सन 1950 की संधि को नवीकृत कर दिया होता महाशया ममता बनर्जी का दार्जिलिंग को बंगाल का अभिन्न हिस्सा मानने की उनकी संकल्पना बहुत कुछ हद तक राजनीतिक ग्राह्यता पात्रता ले सकती थी पर गुर्खा समाज अपने ऊपर बांग्ला भाषा थोपने के लिये राजी नहीं है इसलिये सिगौली संधि जिसे 1950 में नैपाल नरेश त्रिभुवन शाह ने नवीकृत किया उसका पुनर्वाचन राजनीतिक अनिवार्यता होगयी है। उत्तराखंड सरकार टेहरी डाम के टेहरी जिले केे उन गांवों के विस्थापितों को अब तक राहत नहीं दिला पाये हैं। पंचेश्वर बांध जिसकी संकल्पना 1960 में प्रोफेसर के.एल. राव ने संकल्पित की थी उसे काली, धौली, गोरी, रामगंगा, सरयू नदियों की जलप्रवाह मात्रा टेहरी बांध से ज्यादा तीव्र होगी। उत्तराखंड क चंपावत, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों के कितने गांव बांध के घेरे में समा जायेंगे इसका सटीक लेखाजोखा तो तभी सामने आयेगा जब पड़ोसी राष्ट्र नैपाल की नदियों गाड़ गधेरों का कितना पानी पंचेश्वर बांध का हिस्सा बनेगा। पिथौरागढ़ जिले में 1660 गांव हैं उनमें से काफी गांव आज निर्जन हो चुके हैं। जिन गांवों में लोग आज भी रह रहे हैं उनमें एक गांव इस ब्लागर की जन्मभूमि गरों भी है। वहां 1947 से पूर्व लगभग सवा सौ परिवार रहते थे, गांव का क्षेत्र गोरघटिया नदी के बांझघट से दौड़गाड़ तक पूर्व से पश्चिम तक पांच मील लंबा तथा उत्तर में गोरघटिया नदी से लेकर दक्षिण में होरिया गाड़ बुदिगाड़ तक 2 मील चौड़ा था उस गांव में आज केवल सोलह परिवार रहते हैं। सीमावर्ती पर्वतीय गांवों से पलायन की गति अत्यंत तीव्र है यदि पलायन का यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पच्चीस वर्ष पश्चात उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के तिब्बत व कैलास से सटे हुए सीमायें बीस किलोमीटर दूर तक के गांवों में दिया खोजने से भी मनुष्य नहीं दिख पायेंगे। उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री महाशय सहित जितने महानुभावों ने सन 2000 से अब तक उत्तराखंड में शासन किया है उनमें से कोई भी महानुभाव विशुद्ध पर्वतीय क्षेत्र का निवासी नहीं रहना चाहता। उन्हें यदि वे पर्वतीय गांव में जन्मे हों वहां रहना असुविधा जनक लगता है। कुमांऊँ व गढ़वाल के पर्वतीय इलाकों के गांवों के मूल निवासी जो सैनिक असैनिक सेवाओं से सेवानिवृत्त होकर आते हैं वे बजाय अपने गांव में इलाके के भाबर तराई देहरादून हरद्वार व ऊधम सिंह नगर में बसना पसंद करते हैं इसलिये पहाड़ों से पलायन रोकना लगभग असंभव काय्र है। सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियां लागू हो चुकी हैं। वन रैंक वन पेंशन का अपना जलवा है। गांठ में यदि प्रभूत धन हो तो कोई क्यों चाहेगा कि वह पर्वतीय गांवों की असुविधायें अपने गले बांधे रखे। जल निगम तथा जल संस्थान की जो विधियां उ.प्र. सरकार ने उ.प्र. के मैदानों के लिये संकल्पित कीं राज्य निर्माण होने से पहले और 8 नवंबर 2000 के पश्चात भी जल निगम व जल संस्थान की योजनायें बिना स्थानीय स्थितियों का आकलन किये बेधड़क चल रही हैं। सारा उत्तराखंड पिछले सत्रह वर्षों से अनुशासनहीनता पर चल रहा है इसलिये उत्तराखंड की पहली जरूरत हिन्द नैपाल संधि 1950 के पुनर्वाचन की है। यह पता नहीं कि कितने राजनीतिज्ञ जो उत्तराखंड से संबंध रखते हैं उन्होंने 1816 में संपन्न सिगौली संधि के प्रावधानों को ध्यानपूर्वक पढ़ा है। एक जमाना था जब 1790 से 1815 पर्यन्त पचीस वर्ष गुर्खा राज शिमला से सिक्किम तक फैल गया था सिगौली संधि ने उस पर रोक लगा दी। दार्जिलिंग का गुर्खा आंदोलन उसी संधि का परिणाम है। शिमला, गढ़वाल, कुमांऊँ व चोग्याल का सिक्किम कभी भी नैपाल के स्थायी हिस्से नहीं थे। इनकी भाषा संस्कृति तथा रहनसहन नैपाल से भिन्न हैं। भूतकाल में भिन्न था आज भी वैसा ही रहेगा। हिन्द की भाषायी कड़वाहट का निदान केवल साने गुरू जी की आंतर भारती ही है। तुम अपनी भाषा में रमो मुझे भी अपनी भाषा बोलने दो यह है दार्जिलिंग का मुख्य प्रश्न। बंग नेत्री महाशया ममता बनर्जी ने आव देखा न ताव दार्जिलिंग के लोगों पर बांग्ला भाषा थोप डाली। महाशया ममता बनर्जी के सामने पाकिस्तान के दो टुकड़े होना पूर्वी बंगाल के मुसलमानों का उर्दू को अपनी भाषा न मानने का उदाहरण था। बांग्ला देश भाषायी राष्ट्र है। अगर महाशया ममता बनर्जी ने 1816 में संपन्न सिगौली संधि का मसौदा न पढ़ा हो तो उसे पढ़ें और यदि पढ़ रखा हो तो पुनर्वाचन करें। वह संधि साफ साफ कहती है कि दार्जिलिंग न नैपाल का हिस्सा है न बंगाल का। दार्जिलिंग तो सिक्किम के चोग्याल के राज्य का हिस्सा था। सिक्किम के मुख्यमंत्री ने यह कह कर कि वे दार्जिलिंग के मामलों में चोग्याल नीति के पक्षधर हैं। भारत की आजादी के पुण्यपर्व पर नैपाल नरेश महाराज त्रिभुवन शाह थे वे चाहते थे कि नैपाल को भारत का एक राज्य बनाया जाये। पंडित नेहरू से उन्होंने अपने मन की बात कही भी किन्तु पंडित नेहरू ने महाराज त्रिभुवन शाह को प्रतीक्षा करने की राय दी। 1816 में सिगौली संधि के वक्त अवध के नवाबों द्वारा कुमांऊँ के तत्कालीन राजा का समर्थन किया गया। शिमला से सिक्किम तक के प्रकरण में नैपाल के तराई के अलावा हिन्द के वे इलाके जो तराई में थे उन्हें संधि के तहत लखनऊ के नवाब को दिया गया। जिसे आज बिहार में मधेसिया कहा जाता है वे नैपाली मूल के नहीं मैथिली वज्जिगा और भोजपुरी भाषी हैं। इन इलाकों को भी अंग्रेजों ने नैपाली नहीं माना। बाद में गुर्खों की ब्रिटिश सेना में भर्ती के बदले मधेसिया नैपाल को लौटा दिया पर मधेसिये गुर्खा या नैपाली नहीं हिन्दुस्तानी मूल के निवासी हैं जिनकी जनसंख्या गुर्खों से ज्यादा है। नैपाल की राजनीतिक अस्थिरता का महत्वपूर्ण कारण मधेसियों की स्वायत्तता है। नैपाल के नये प्रधानमंत्री देउबा, जिस जाति को उत्तराखंड में द्योपा या देउपा कहा जाता है, डोटी इलाके के हैं जिन पर कुमांउनी संस्कृति तथा सभ्यता का प्रभावी असर है। सिगौली संधि जो 1950 में नवीकृत हुई पर जिसे नैपाल का मौजूदा राजनीतिज्ञ समाज मान्यता देना नैपाल की राष्ट्रीय हिताकांक्षा के प्रतिकूल समझता है तब एक ही विकल्प सामने रह जाता है कि मूलतः दार्जिलिंग पर सिक्किम के चोग्याल का अधिकार था दार्जिलिंग को गोरखालैंड के दलदल से निकाल कर हिन्द के घटक राज्य सिक्किम का अविभाज्य हिस्सा सिक्किम दार्जिलिंग कलिंगपोंग सहित समूचे पार्वत्य प्रदेश को सिक्किम से जोड़ने बाबत लोकमत सुनिश्चित किया जाये।
दार्जिलिंग - सिक्किम के चोग्याल की भूमि है बंगाल का हिस्सा नहीं। 
बंगनेत्री दार्जिलिंग प्रसंग को सही परिप्रेक्ष्य में देखें। 
अवध के नवाब काशीपुर उत्तराखंड के कुमांउनी चंद राजा आनंद चंद के प्रतिनिधि हर्षदेव जोशी और रूद्र दत्त ओली ने इलाहाबाद स्थित ब्रिटिश रेजीडेंट को 1815 सन में नैनीताल घुमाया। नैनीताल की छटा को देख कर ब्रिटिश रेजिडेंट को स्वदेश इंग्लैंड की याद ताजा होगयी। उसने तय कर लिया कि वह कुमांऊँ के दो प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञों हर्ष देव जोशी और रूद्र दत्त ओली को कुमांऊँ को गुर्खा राज से मुक्ति दिलाने में कंपनी बहादुर ईस्ट इंडिया कंपनी तथा ब्रिटिश ताज की मदद कुमांऊँ के लोगों को दिलायेगा। गोर्खाली राज से पचीस वर्ष से छटपटा रहे कुमांऊँ के लोग गुर्खों के अत्याचारों से अत्यंत पीड़ित थे। गुर्खों ने पूर्व में सिक्किम के चोग्याल से लेकर पश्चिम में शिमला तक गुर्खा राज कायम कर लिया था। अवध के नवाब के हस्तक्षेप तथा अवध के नवाबों की कुमांऊँ के प्रति सौहार्द ने नैपाल नरेश के साथ सन 1816 में सिगौली संधि की पहल हुई। नैपाल की ओर से बमशाह जो कालांतर में डोटी का सूबा बनाया गया उसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी जिसका उल्लेख हर्ष देव जोशी व रूद्र दत्त ओली ने नहीं किया पर नैपाल व ईस्ट इंडिया कंपनी में संधि संपन्न होनेे में सिक्किम के चोग्याल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1816 की यह संधि सन 1950 में तत्कालीन नैपाल नरेश त्रिभुवन शाह व पंडित नेहरू की पारस्परिक वार्ता के बाद नवीकृत हुई और यह भी तय हुआ कि नैपाल व भारत संधि हर पचास वर्ष बाद नवीकृत होगी पर नैपाल नरेश त्रिभुवन शाह का भारत के साथ जो नाता था वह कालांतर के नरेशों या  प्रचंड के अभियान के कारण सन 1950 की संधि नवीकृत न होने से नैपाल व ब्रिटिश इंडिया के बीच की 1816 वाली सिगौली संधि भी अर्थहीन होगयी। नतीजतन दार्जिलिंग सहित सभी पहाड़ी इलाके चोग्याल के सिक्किम के हिस्से होगये। संभवतः पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री महाशया ममता बनर्जी ने 1816 की सिगौली संधि का पूरा पूरा वाचन न कर पाया हो अथवा उन्हें यह पता ही न हो कि 1816 में गोरखपुर के पास सिगौली में जो संधि हुई उसका एक हिस्सा सिक्किम के चोग्याल केे कब्जे वाला दार्जिलिंग भी था। सिक्किम के मुख्यमंत्री ने दार्जिलिंग का सिक्किम के चोग्याल के अधिकार में होने की पुष्टि की है। ऐसा लगता है 1950 की भारत नैपाल संधि को नैपाल नवीकृत नहीं कराना चाहता है। यदि संधि के समस्त भागों का पुनर्वाचन किया जाये संधि के नवीकृत न होने केे कारण जिस इलाके को नैपाल मधेस कहता है जहां के निवासी भारत मूल के हैं नैपाली मंगोल मूल के नहीं। यह पूरा प्रसंग जहां नैपाल की सियासत को प्रभावित करेगा वहीं सिक्किम के मुख्यमंत्री के कथन के अनुसार अंततोगत्वा पश्चिम बंगाल के वर्तमान हिस्से दार्जिलिंग को सिक्किम को सौंपना कूटनीतिक अनिवार्यता हो जायेगी। महाशया ममता बनर्जी का कहना है कि गुर्खों को केन्द्र सरकार भड़का कर पश्चिम बंगाल को तोड़ना चाहती हैै जिसे महाशया ममता बनर्जी अस्वीकार करती हैं। वे प्रतिभाशाली लोकप्रिय जननेत्री हैं जब बंगाल (अविभाजित बंग) के असेंबली के सभी सदस्यों ने एक स्वर से बंगाल को हिन्दुस्तान से अलग करने वाला 3 जून 1947 का प्रस्ताव पारित किया। उस प्रस्ताव के समर्थक पूर्वी बंगाल के पर्याप्त हिन्दू विधायक भी थे जिन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया था। महाशया ममता बनर्जी फरमाती हैं वे बंगाल का पुनर्विभाजन नहीं होने देंगी पर वे भूल रही हैं कि बंगाल अगर हिन्द से अलहदा न होता बंगाली नेशनलिज्म चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान हिन्द के राष्ट्रवाद से ज्यादा उग्र होता। डा. राजेन्द्र प्रसाद निर्मल चन्द चटर्जी डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा बंकिम चंद्र चटर्जी सरीखे राष्ट्रवादी और हिन्दुत्व की भावना से ओतप्रोत समूह के विवेक ने जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी के सिद्धांत को हिन्दुत्व के जरिये पछाड़ डाला। समूचा बंगाल पाकिस्तान बनने से रह गया। महाशया ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के मुसलमानों तथा बंगला देश के उन लोगों का समर्थन है जो अनधिकृत रूप से पश्चिम बंग में बस गये हैं पर मूलतः बंगला देशी या बंगला मुसलमान हैं। अगर महाशया ममता बनर्जी ने गुर्खों पर बांग्ला लिपि नहीं लादी होती तो गुर्खे नागरी के जरिये अपनी नैपाली भाषा से जुड़े रहते। बंगनेत्री ममता बनर्जी ने नैपाल भारत संधि को या तो पूरा पूरा या सुनीसुनाई अफवाह पर अपना डंडा चलाया जिसे गुर्खा स्वीकार नहीं करते। दार्जिलिंग से काफी लंबे अर्से से लोकसभा सांसद आमतौर पर भाजपा के ही आते हैं। भाजपा के शीर्ष राजनेता राजस्थान के मूल निवासी काफी लंबे अरसे से लोकसभा सांसद रहे। दार्जिलिंग से वर्तमान में दार्जिलिंग का प्रतिनिधित्व लोकसभा में अहलूवालिया करते हैं जिन पर गुर्खा यकीन करते हैं। ममता बनर्जी महाशया का यह कहना तथ्यों से परे है कि दार्जिलिंग के गुर्खों को भाजपा भड़का रही है उन्हें चाहिये कि पश्चिम बंग के पड़ोसी भारतीय घटक राज्य सिक्किम के मुख्यमंत्री से सिगौली संधि 1816 तथा भारत नैपाल संधि 1950 का जायजा लेना चाहिये। चूंकि 1950 की संधि का नवीनीकरण करने से नैपाल मुकर गया है चाहता है कि कुमांऊँ केे कुछ गांव नैपाल को सौंपे जायें। संधि का नवीनीकरण न होना हिन्द के लिये उतना हानिकारक नहीं है जितना नैपाल राज्य की सत्ता याने गुर्खों और मधेसियों के बीच उत्पन्न अविश्वास से अंततोगत्वा नैपाल की जनसंख्या में पचास फीसदी से ज्यादा मात्रा वाले मधेसी नैपाल के प्रभुत्व मानने से इन्कार भी कर सकते हैं। रही बात पश्चिम बंग की लोकनेत्री का कथन कि वे बंगाल का बटवारा नहीं चाहतीं दार्जिलिंग तो 1816 में ही सिक्किम के चोग्याल के अधिकार में था। संधि के विग्रह होने से सिक्किम का पक्ष मजबूत होगया है कि दार्जिलिंग को सिक्किम का हिस्सा माना जाये। नैपाल भारत की 1950 की संधि का नवीनीकरण न होने से भारत नैपाल संबंधों में भी अधिक तिक्तता आ सकती है इसलिये भारत सरकार के विदेश मंत्रालय को चाहिये कि 21816 की सिगौली संधि का मूल दस्तावेज फिर पढ़ा जाये। सिगौली संधि के अनुसार हिन्द नैपाल के बीच 1950 में जो संधि हुई और कालांतर में नवीकृत न होने के कारण समूचा नैपाल भारत राजनयिक सह अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। चीन इसका फायदा उठाने को लालायित है इसलिये हिन्द को 1949 के तिब्बत-हिन्द सीमा पर चीन के कब्जे को नकारना पड़ेगा। चीन के साथ हिन्द का सीध सीमा संबंध न होकर तिब्बत हिन्द सीमा संबंध है। ज्योंही भारत सरकार धर्मशाला स्थित तिब्बत सरकार को कूटनीतिक मान्यता देते हुए तिब्बत के स्वतंत्र देश की प्रवासी सरकार को मान्य करेगी चीन बौखला कर हिन्द पर आक्रमण कर सकता है पर आज तिब्बत की स्वतंत्रता अहम सवाल है जिसे हिन्द की सरकार को मित्र राष्ट्रों के जरिये मान्यता देने के लिये प्रेरित करना चाहिये ताकि चीन की जबर्दस्ती कब्जा करने वाली राजनीति को रोका जा सके एवं चीन जो यातनायें तिब्बती मूल के उन लोगों को देरहा है जो अभी भी तिब्बत में हैं तथा बौद्ध धर्म के हीनयान मार्ग के अनुयायी हैं जिनके लिये परम पावन चौदहवें दलाई लामा का स्थान ईश्वर तुल्य है और जो देश दलाई लामा परंपरा को नियमित मानते आरहा है। जब दलाई लामा का देहान्तरण हो जाता है तिब्बत के लामा लोग इस खोज में लगे रहते हैं कि दलाई लामा का पुनर्जन्म कहां होरहा है। दलाई लामा परंपरा एक ऐसी मर्यादा है जो जन्मान्तरण तथा पुनर्जन्म में विश्वास करती है। तिब्बत की दलाई लामा परंपरा पर हिन्द की पुनर्जन्म प्रवृत्ति का पूरा प्रभाव हैै। संभवतः चीन का अथीस्ट समाज पुनर्जन्म को मान्यता नहीं देता है वह केवल उस स्थिति पर यकीन करता है जिसे वह वर्तमान में भोग रहा है इसलिये तिब्बत को चीन के एटानामस रीजन आफ तिब्बत कहने की बात पूर्णतः चीनी मिथ्याचार है। इसलिये वह मुहूर्त्त आगया है जब भारत यह कहे कि भूटान व अरूणाचल प्रदेश लेह लद्दाख सहित भारत की समूची उत्तरी सीमा में तिब्बत का सांस्कृतिक राष्ट्र है। चीन भारत का सीमावर्ती देश नहीं केवल तिब्बत ही भारत और चीन के बीच का विश्व आस्था की अद्भुत शक्ति वाला संस्कृतिमूलक राष्ट्र है जिसकी रक्षा तथा जिसकी स्वतंत्रता विश्व के हर उस राष्ट्र को संबल देने की तैयारी करनी चाहिये जो मानव धर्म तथा मानवाधिकार का पक्षधर है। हिन्द के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने विश्व केे समर्थ राष्ट्रोें में कहिन्द की मर्यादा पुरूषोत्तम शक्ति का आह्वान कर विश्व में भारत की स्थिति का जो विश्लेषण अहिंसा व सत्य के मार्ग पर चल कर किया है वह एक नयी ज्योति लेकर आया है। इसलिये हिन्द व नैपाल के संदर्भ में सिगौली संधि 1816 के फलस्वरूप नैपाल नरेश व भारत के बीच संपन्न 1950 की संधि का पचास वर्ष पश्चात नवीकृत न होना हिन्द के दो राज्य घटक पश्चिम बंग और सिक्किम के साथ साथ भारत नैपाल की समूची भू भौगोलिक सीमा के लिये महान यक्ष प्रश्न के रूप में खड़ा है। पश्चिम बंग जननेत्री ममता बनर्जी आत्मविवेक का योगाभ्यास करें व सिक्किम के मुख्यमंत्री से संवाद कायम करें ताकि उन्हें दार्जिलिंग के बारे में जो ऐतिहासिक अवसाद हुआ है उसका वे निराकरण करने की पात्रता अर्जित कर सकें तथा भविष्य में मधेस सहित उत्तर प्रदेश एवं बिहार की तराई के वे इलाके जो लखनऊ के नवाब ने नैपाल को सौंपने की राजनीतिक तजवीज से सह अस्तित्व का जो वातावरण दो सौ एक वर्ष पूर्व संपन्न किया नैपाल भी खंडित होने से बचे और हिन्द नैपाल के बीच जो समस्यायें मुंह बाये खड़ी हैं उनके निदान के लिये नैपाली सरकार चीन का मुंह ताकने चीन द्वारा जबर्दस्ती कब्जा किये हुए तिब्बत के क्षेत्र से होकर नैपाल के लिये रेल व सड़क मार्ग का जो झांसा नैपाल को निरंतर दिया जारहा है नैपाल उसे समझने की क्षमता अर्जित करे तथा नैपाल व हिन्द के बीच सौमनस्यपूर्ण सीमा प्रबंध के साथ साथ नैपाल व भूटान में भारतीयों के प्रवास एवं भूटान व नैपाल के नागरिकों का निष्कंटक भारत प्रवेश यथापूर्व गतिशील बना रहे। इस सारे क्रम में सिक्किम व दार्जिलिंग पर सन 1816 से पूर्व सिक्किम के चोग्याल का अधिकार अंततोगत्वा बंगनेत्री ममता बनर्जी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को कोसने से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। भारत नैपाल 1950 की संधि का मूल 1816 की सिगौली संधि के प्रावधान फिर पढें तब दार्जिलिंग की बात करें।
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