अंग्रेजी माध्यम से बारह वर्ष में उत्तराखंड शिक्षा का नवोदय ?
उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री महोदय के बयान को केवल टाइम्स आफ इंडिया ने ही महत्व दिया अंग्रेजी अखबार तथा देहरादून से ही छपने वाले हिन्दुस्तान टाइम्स के संस्करण ने नैनीताल व देहरादून से दो समाचार छापे हैं। नैनीताल वाला समाचार उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार 30 जून 2017 के अपने फैसले में निर्देश दिया है कि आगामी छः महीने के अंदर राज्य के सरकारी स्कूलों को सुविधायें (इंन्फ्रास्ट्रक्चर) उपलब्ध की जायें। निर्णय के क्रियान्वयन न किये जाने पर जनवरी 2018 से तनख्वाह कटौती के लिये तैयार रहें। उच्च न्यायालय की बेंच न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व आलोक सिंह द्वय ने राज्य सरकार को आगाह किया कि अदालत के निर्णय के क्रियान्वित न होने पर संविधान की धारा 360 के तहत वित्तीय आपातकाल भी लागू किया जा सकता है। सभी राजपत्रित अधिकारियों शिक्षा सचिव सहित अफसरों की तनख्वाहों से कटौती भी की जा सकती है। उच्च न्यायालय के इस फैसले के आने के बाद शिक्षा मंत्री ने जो बयान दिया वह एक बहुत बड़ा प्रहसन प्रतीत होता है। उन्होंने जो बयान दिया संभव है उसे मुख्यमंत्री की महाशय की भी सहमति हो। सत्ताधारी दल के विधायकों का बहुमत भी महाशय अरविन्द पांडे की घोषणा का परिपाक हो। नैनीताल से उच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स की तरफ से कमलनाथ जी ने जारी की। दूसरी ओर अखबार के उसी पन्ने में देहरादून से निधि शर्मा ने आर के कुमार शिक्षा निदेशक का हवाला देते हुए कहा - सवाल उठता है शिक्षा निदेशक महाशय ने अपनी प्रतिक्रिया उत्तराखंड की मौजूदा राजभाषा हिन्दी में की या अंग्रेजी भाषा के मैजिक शब्द का प्रयोग पत्रकार से अंग्रेजी में बात करते हुए किया। चाणक्य ने नीतिशास्त्र में कहा -
असंभवम् हेममयी कुरंगो तथापि रामो लुलुभे मृगाया।
प्रायः समापन्नमिधतिकाले धियोपि पुंसाम् मलिनी भवंति।
शिक्षा निदेशक महाशय का मानना यह प्रतीति कराता है कि शिक्षामंत्री महोदय बयान को कार्य रूप में परिणित करना अत्यंत दुस्साहस है। उनके विचार के समानांतर उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के अध्यापक समाज के संगठन के मुखिया पान सिंह मेहता ने भी हिन्दुस्तान टाइम्स को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराया। शिक्षा निदेशक व अध्यापक संगठन के मुखियाा ने स्कूल संख्या बताई पर यह नहीं बताया कि उत्तराखंड के अठारह हजार स्कूलों में कितने शिक्षक हैं। प्रत्येक शिक्षक कितने विद्यार्थियों को पढ़ाता है ? भारतीय जनसंघ केे संस्थापक सदस्य महाशय शोबन सिंह जीना अल्मोड़ा के प्रतिष्ठित वकील होने के साथ साथ अल्मोड़ा जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के ऐजुकेशन कमेटी के अध्यक्ष भी थे। घटना 1928 की है जब महात्मा गांधी ने अपनी कुमांऊँ यात्रा जून 1929 ये 10 महीने पहले साबरमती आश्रम के नौजवान कार्यकर्ता शांतिलाल त्रिवेदी जो तब 23 वर्ष के युवा थे, अल्मोड़ा भेजा। महाशय शोबन सिंह जीना ने शांतिलाल त्रिवेदी को अल्मोड़ा जिले की लोअर प्राइमरी, अपर प्राइमरी तथा तब जिले में करीबन दस मिडिल स्कूल थे उनमें ऊन कताई, हाथ बुनाई, रांच मंे पंखी बुनाई के काम के लिये शांतिलाल त्रिवेदी को संचालक नियुक्त कर अल्मोड़ा जिले में ऊन उद्यमिता का श्रीगणेश किया। महाशय शोबन सिंह जीना की विशेषता यह थी कि वे तत्कालीन अल्मोड़ा जिले के नौ हजार गांवों के पधानों, थोकदारों, अध्यापकों व हर गांव केे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। तब अल्मोड़ा जिला (आज का बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत व अल्मोड़ा) कुग्री बिग्री और लिपुलेख से फल्दाकोट पाली पछाऊँ तक फैला हुआ था। अल्मोड़ा जिला तब हिन्द की साक्षरता में केरल के गांव तिर्वांतुर के बाद दूसरे नंबर पर था। जीना साहब ने शांतिलाल त्रिवेदी को अल्मोड़ा केे नौ हजार गांवों में पैदल घूम कर ऊन कताई, तकली पर ऊन कताई तथा जीत सिंह बोरा द्वारा निर्मित पैडल ऊनी चर्खा पर ऊन कताई को उद्यम के रूप में बदल डाला। लोअर प्राइमरी, अपर प्राइमरी दर्जा अ ब एक से चार तक तथा मिडिल स्कूल दर्जा पांच से दर्जा सात तक पढ़ाई लिखाई का जो स्वरूप शोबन सिंह जीना महाशय ने स्थापित किया वह अपने आप में एक अद्भुत उपलब्धि है। पढ़ाई लिखाई तथा कंठाग्र विधा का जो स्वरूप महाशय शोबन सिंह जीना ने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अल्मोड़ा के माध्यम से स्थापित किया वर्तमान सरकार उसका पुनरावलोकन करे। अंग्रेजी माध्यम से पहले दर्जे से बारहवें शिक्षा का माध्यम निर्धारित करने के समानांतर पेशे से नामी वकील पर महान लोकसंग्रहकर्ता शिक्षाविद शोबन सिंह जीना की उपलब्धियों यदि तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के शैक्षिक दस्तावेज डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के जिला परिषद तथा वर्तमान जिला पंचायत जिसके अधिकार क्षेत्र में प्राइमरी व मिडिल शिक्षा को प्रांतीय स्तर पर बेसिक शिक्षा परिषद में परिणित कर शिक्षा पर पंचायती अधिकार के बजाय उ.प्र. सरकार के बेसिक शिक्षा परिषद का अधिकार होगया। यदि वे दस्तावेज नष्ट न कर दिये गये हों उत्तराखंड की सरकार को शैक्षिक संबल दे सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ने न्यायिक और इंद्रजालनुमा उत्तराखंड सरकार के दर्जा एक से दर्जा बारह तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई लिखाई जो दिवास्वप्न देखा जारहा है उसकी पूर्ति के लिये एक नहीं सैकड़ों तरीके अपनाने जरूरी हैं ताकि रामजे हाईस्कूल के पहली बैच के मैट्रिक पास तारा दत्त सरीखी अंग्रेजी उत्तराखंड ने नौनिहालों को सटीक काबिलियत उपलब्ध करा सके। उत्तराखंड में जनसंघ की नींव जमाने वाले शिक्षाविद पर व्यवसाय से वकील शोबन सिंह जीना जिनके नाम पर उत्तराखंड सरकार हल्द्वानी में अस्पताल तथा अल्मोड़ा में जहां स्नातकोत्तर महाविद्यालय स्थापित करने का श्रेय शिक्षाविद शोबन सिंह जीना व उनके सहयोगी प्रोफेसर अंबादत्त को जाता है सरकार ने अल्मोड़ा की शैक्षिक ऐनिक में शोबन सिंह जीना के नाम पर जो शिक्षा आवंटन अल्मोड़ा में चालू किया है जीना जो दिवंगत हुए उनतीस वर्ष हो चुके हैं संभव है मौजूदा मुख्यमंत्री महाशय की जीना साहब के दीदार हुए हों, यदि उन्होंने जीना साहब को उनकी आंखों से न देख पाया हो जीना साहब की उपलब्धियों और उनके मानवोचित सद्गुणों का जायजा जरूर लें ताकि उन्हें उत्तराखंड को सफल राज्य बनाने में संबल मिले। आज उत्तराखंड में जो शैक्षिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक स्थितियां हैं वे मुख्यमंत्री महोदय के मार्ग की सबसे अहम बाधा हैं। आज का उत्तराखंड वस्तुतः हिमालयी राज्य न होकर दून घाटी, हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर जिलों के साठ लाख से ज्यादा जनसंख्या वाला तराई दून घाटी डेमोक्रेसी का प्रतीक है। उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत जिलों को निरंतर पलायन का सामना करना ही है। पलायन रोकना उतना ही कठिन है जितना सूर्योदय पश्चिम में होना। सीमावर्ती क्षेत्र निर्जन तो हो सकते हैं पर पलायन नहीं रोक सकते।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment