संस्कृत वाणी की अधजल गगरी छलकत जाय कहावत
पेइचिंग चरितार्थ कर रहा है ?
पेइचिंग चरितार्थ कर रहा है ?
महापंडित राहुल सांकृत्यायन त्रिविष्टप (मौजूदा तिब्बत), त्रिविष्टप संस्कृति
और हिन्दुस्तान के संस्कृत वाङमय के इकलौते ज्ञाता हैं।
हिन्द के संस्कृत वाङमय में कश्यप-अदिति संतति का कर्मक्षेत्र त्रिविष्टप या त्रिदश नाम से पुकारा जाता है। यायावर महापंडित राहुल सांकृत्यायन लार्ड मैकाले द्वारा अपने पादरी पिता को संबोधित सैंतीस पन्ने वाली अंग्रेजी चिट्ठी अपनी जेब में रखते थे। वे कुमांऊँ के रास्ते मानसरोवर कैलास जाते रहते थे। अल्मोड़ा में यह ब्लागर उनका साथ गर्मियों की छुट्टियों में देता था। हिन्द में सूर्य के दो मंदिर हैं। पहला कलिंग के कोणार्क का सूर्य मंदिर व दूसरा कुमांऊँ के कोसी कटारमल का सूर्य मंदिर है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस ब्लागर को लार्ड मैकाले द्वारा अपने पादरी पिता को संबोधित पत्र पढ़ाया। लार्ड मैकाले के पिता पढ़ाई लिखाई में मातृृभाषा के पक्षधर थे। उन्होंने अपने पुत्र को कहा - हिन्दुस्तान पर अंग्रेजी थोप कर पुरानी सभ्यता तथा सांस्कृतिक धरोहर को नेस्तनाबूद मत करो। वहां के लोगों को उनकी अपनी मातृभाषाओं केे जरिये बढ़ने दो। पुत्र ने पादरी पिता को लिखा - पिता जी मैं तो आपका ही काम कर रहा हूँ। अढ़ाई सौ वर्ष पश्चात हिन्द का हर आदमी भूरा अंग्रेज होगा। उसका मजहब इस्लाम हो या हिन्दू वह ईसाइयत के घेरे में रम जायेगा। भले ही उसका बपतिस्मा हो या न हो लेकिन वह ईसाइयत का प्रतीक होगा। महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिन्द की संस्कृति हिन्द के वाङमय तथा स्वयं हिन्दीभाषी होते हुए भी हिन्द की हिन्दीतर भाषाओं के पोषक थे। वे हिन्द को हिन्द रहने देना चाहते थे। उन्होंने समूचा हिमालय लांघ कर तिब्बत मध्य एशिय होते हुए रूस जिसका पुराना नाम ऋषि देश है वहां की नदी वोल्गा व गंगा हिन्द की नदी विषयक आकर्षक ‘गंगा से वोल्गा तक’ हिन्द संस्कृति का एक नया अध्याय शुरू किया। इंडिया टुडे के जून 26, 2017 के अंक में पेइचिंग या बीजिंग जो नाम देना चाहें महाशय - अनंत कृष्णन् व चाइना कल्चर शीर्षक से ‘दी लौस्ट संस्कृत ट्रेजर्स आफ तिब्बत’ में व्यक्त करते हैं - कि How China is attempting to unravel the mysteries contaimed in 2000 year old forgotten Sanskrit text with Bible help from across the border. देवरिया के एक व्यक्ति पाठक हैं उनके पास इस ब्लागर केे परिचित मुरारीलाल वाजपेयी पहुंचे उन्हें उनकी कन्या के संदर्भ में रावण संहिता जिसकी भाषा संस्कृत पर लिपि तिब्बती थी। पुरानी तिब्बती लिपि बंगला की तरह लिखी जाती है। उसका एक अंश पढ़ने तथा समझने के लिये दिया। रावण संहिता भृगु संहिता की तरह महत्वपूर्ण ज्योतिष कृति हैै। इस ब्लागर ने अपने परिचित व्यक्ति को बताया कि चिंता करने की जरूरत नहीं है कन्या का विवाह जिससे वे कराना चाहते हैं वही होगा बीच में में बाधा खड़ी होगी उसका निराकरण उनकी धर्मपत्नी करायेंगी। तिब्बत और चाइना दो अलग अलग सांस्कृतिक थातें हैं। इंडिया टुडे के यशस्वी प्रमुख संपादक अरूण पुरी का ध्यानकर्षण करना यह ब्लागर इसलिये जरूरी समझता है कि चीन के मार्ग दृष्टा माओ त्से दुंग तथा वर्तमान प्रमुख शास्ता शिनपिंग महाशय मंदारिन वाङमय का त्याग करने की क्षमता अर्जित नहीं कर सके हैं। मंदारिन वाङमय चीन की आत्मा है। मंदारिन वाङमय का मूल स्त्रोत क्षीरसागर मंथनजन्य अमृतोत्पादन है जिसके लिये देव दानवों में भीषण छीनाझपटी केे समय माघी अमावस जिसे इलाहाबाद में मौनी अमावस कहा जाता है उसका अमांत पर्व मंदारिन वाङमय का महापर्व है। सन 1949 के मौनी अमावस पर्व पर माओ त्से दुंग के हुक्म पर मंदारिन वाङमय का नववर्ष मनाना रोक दिया था। माओ ने कहा - हमारा नया साल पहली जनवरी को होता है। सतसठ साल बाद आठ फरवरी 2015 के दिन मौनी अमावस थी, मंदारिन भाषियों ने मंदारिन नववर्ष धूमधाम से मनाना शुरू किया। महाशय शिनपिंग वह ताकत दिखा नहीं पाये जो माओ ने 1949 में दिखायी थी। मंदारित वाङमय के जरिये देहाती चीन में राष्ट्र चेतना का पुनर्जागरण हो चुका है। इसे दबी जुबान से चीन का मीडिया भी स्वीकार कर रहा है। मंदारिन वाङमय चीन के लिये एक ऐसी वाणी है जिसे वह निगल ही नहीं पारहा, त्याग ही नहीं सकता क्योंकि राष्ट्रीय चीन का ताइवान स्थित मंदारिन वाङमय माओ त्से दुंग से लेकर महाशय शिनपिंग तक चीन के समूचे निरीश्वरवादी अपने को Athiest कहने वाले शास्ता वर्ग में समूचे देहाती चीन को अपने आगोश में घेरने में पूरी पूरी तरह सफलता नहीं पायी है।
पुलत्स्य ऋषि के पौत्र, विश्रवा के ज्येष्ठ पुत्र यक्षाधिपति कुबेर थे। कुबेर को महाविष्णु ने पुष्पक विमान भेंट स्वरूप दिया। कुबेर केे अनुज दशग्रीव रावण ने लंकेश्वर कुबेर को हरा कर स्वयं लंकेश बन गया। महाविष्णु दत्त विमान भी कुबेर से छीन ले गया। कुबेर निधिपति थे उन्हें हिमालय की अलकापुरी पसंद आ गयी और वहीं बस गये। अलकापुरी को कुबेरधानी बना लिया। महाकवि कालिदास की रचनाओं में एक ग्रंथ का नाम मेघदूत है। कुबेर ने अलकापुरी के अपने विश्वस्त यक्ष को देश निकाला दे दिया। यक्ष की याक्षायणी अलकापुरी जिसे आजकल कुमइयां भाषा में अल्माड़ कहते हैं याक्षायणी अल्माड़ ही रह गयी। उसने जाखनदेवी में अपना निवास बना लिया। देश निकाला यक्ष वर्तमान छत्तीसगढ़ केे रामगिरि पर्वत पर अटक गया। उसने बादलों के मार्फत जो संदेशा अल्माड़ स्थित याक्षायणी को भेजा वह रामगिरि में खरोष्ट्री लिपि में अंकित है। पुलत्स्य विश्रवा कुबेर तथा दशग्रीव रावण महाकवि कालिदास से हजारों हजार वर्ष पूर्व अस्तित्व में थे। उस जमाने में हिन्द में ब्राह्मी, खरोष्ट्री लिपियां प्रयोग में आती थीं। यद्यपि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत, कुमारसंभव, रघुवंश नागरी लिपि में लिपिबद्ध हैं पर कुबेर गाथा तथा विरहिणी याक्षायणी - जाखनदेवी का आख्यान अत्यंत पुरातन था। खरोष्ट्री का जीवंत उदाहरण आज भी रामगिरि में उपलब्ध है। संस्कृत केे अनेक ग्रंथ तिब्बती भाषा की स्वलिपि में भी लिखी गयी हैं, उदाहरण रावण संहिता का है जिसे इस ब्लागर ने पढ़ा है। मान्यता यह भी है कि वेदों का पहला भाष्यकार कैलासपति शंकर का भक्त दशग्रीव रावण था। इसलिये देवनागरी लिपि का प्रयोग वैदिक संस्कृत सहित संस्कृत साहित्य में कब शुरू हुआ यह गहन अनुसंधान की अपेक्षा रखने वाला विषय है। मूल वैदिक साहित्य श्रौत विधा हैै। यह श्रौत विधा पुस्तक के रूप में कब उभरी यह भी गहन अनुसंधान का विषय है। मानस खंड केदार खंड व जलंधर खंड तथा कश्मीर खंड के हिमालयी क्षेत्रों में देवनागरी लिपि में वेदों सहित अनेकानेक ब्राह्मण ग्रंथ हाथकागज में लिखे यत्र तत्र सर्वत्र मिलते हैं। बारह पन्नों में वैदिक संस्कृत का जो उद्धरण महाशय अनंत कृष्णन् ने इंडिया टुडे में छापा है वह कोई नयी खोज नहीं है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन अद्भुत विद्वान थे निरंतर चलते रहते थे। इस ब्लागर से उनकी भेंट 1948 में हुई। महाशय अनंत कृष्णन् ने जो फोटो इंडिया टुडे में छापी है वह राहुल सांकृत्यायन की फोटो नहीं लगती। राहुल सदासर्वदा सन्यासियों की तरह मुंडन करते थे खादी की धोती कुर्ता पहने रहते थे। उनमें यौगिक क्रियायें प्रभावी रहती थीं। रूस में रह कर भी उन्होंने वर्तमान युग के श्री श्री रविशंकर महाराज की तरह सन्यस्त जीवन जिया। मूलतः उ.प्र. जो बर्तानी राज में युनाइटेड स्टेट आफ आगरा एंड अवध कहलाता था उसके आजमगढ़ जिले के निवासी भूमिधर ब्राह्मण थे। राहुल सांकृत्यायन की जीवनशैली समझने के लिये वोल्गा से गंगा तक पढ़ कर तर्क करना ज्यादा विवेकसम्मत होगा। तिब्बती भाषा के अलावा हिमालयी राज्य भूटान की भाषा भूटानी तथा सिक्किम में बोली जाने वाली भाषाओं जिनमें एक बोली लेपचा कहलाती हैै। तिब्बती के अलावा शक हूणों की भाषायें भी समझनी जरूरी हैं। यायावर महापंडित राहुल सांकृत्यायन संबंधी साहित्य हिन्दी अथवा रूसी भाषा में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यायावर राहुल सांकृत्यायन राममनोहर लोहिया जिनकी जन्मभूमि शाजादपुर अकबरपुर वर्तमान अंबेडकर नगर जिला पूर्वकाल में फैजाबाद जिले की तहसील था। अंबेडकर नगर व आजमगढ़ के बीच की दूरी 100 किलोमीटर से कम है। ये दोनों महानुभाव अंग्रेजी भाषा परस्त नहीं थे। डाक्टर लोहिया ने तीन महीने में जर्मन सीखी और बर्लिन विश्वविद्यालय से जर्मन भाषा के माध्यम से डाक्टरेट प्राप्त की। महापंडित राहुल सांकृत्यायन भी डाक्टर लोहिया की तरह अंग्रेजी परस्ती न मानने वाले विद्वान थे इसलिये महाशय अरूणपुरी सरीखे साफ सुथरे तरीके अपनाने वाले हिन्द के पत्रकार को महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर इंडिया टुडे के विशेषांक निकालने का प्रयास करना चाहिये। अंग्रेजी भाषा का अधकचरा ज्ञान तथा संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं की आंतर भारती विशेषता अंग्रेजी में भारतीय भाषाओं के अधकचरे व अधूरे अनुवाद को पढ़ कर हिन्द की आंतर भारती को गहराई में पहुंच कर ही जाना जा सकता है। भारत में अंग्रेजी भाषा के मर्म को समझने वाले लोगों की संख्या एक सौ सैंतीस करोड़ हिन्दवासियों में एक प्रतिशत से भी कम है। नारायण मूर्ति उनके नौजवान अंग्रेजीदां बेटे तथा चेतनभगत सरीखे अंग्रेजी भाषा में हिन्दत्व की व्याख्या करने वाले अनेक व्यक्ति हैं पर किसी हिन्दुस्तानी अंग्रेजीदां भद्रलोक में वह क्षमता नहीं है जो हरिपुरी कांग्रेस में महात्मा गांधी के कथन - सीतारमैया की हार मेरी हार है। इसे आल इंडिया नेशनल कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में जिस भाषायी खूबी से अपने अंग्रेजी वक्तव्य में तत्कालीन संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के प्रीमियर पंडित पंत ने प्रस्तुत किया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके समर्थक पंडित नेहरू सहित समूचे आल इंडिया कांग्रेस के नुमाइंदों ने महात्मा गांधी को उम्मीदवार के पक्ष में अपना मन पक्का कर लिया। स्वयं नेताजी ने त्यागपत्र देकर महात्मा के उम्मीदवार सीतारमैया को कांग्रेस सदर की कुर्सी में बैठाया। इसे कहते हैं हृदय परिवर्तन करने वाला बयान। अंग्रेजी पढ़ो, भाषा में पैठ बनाओ पर साथ में हिन्दुस्तानी भी बने रहो। जापान की सामाजिकता का अनुशीलन करो। सूर्य नमस्कार करते हुए नैऋतवाद को समझो तभी हिन्दुस्तान चतुर्दिक उन्नति करेगा। अंग्रेजी भाष्यकार महाशय अनंत कृष्णन् ने खरोष्ट्री लिपि का उल्लेख किया पर खरोष्ट्री के अलावा देवनागरी से पुरानी लिपियों में ब्राह्मी लिपि महत्वपूर्ण है। महाशय अनंत कृष्णन् चीनी सिक्यांग के इस्लाम धर्मावलंबियों की चर्चा करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि इस्लाम धर्म केवल 1439 वर्ष पुराना है। हिजरी सन 1439 इस वर्ष 22 सितंबर 2017 को शुरू होरहा है। हिजरी सन 355 दिवस वाला चांद्रमास के तुल्य चांद्रवर्ष है। सौर वर्ष 365 दिन का होता है हर चौथे वर्ष 366 दिन सौर वर्ष में होते हैं। इसलिये इस्लाम धर्म की उम्र मात्र 1400 सौर वर्ष है जबकि त्रिविष्टप सहित आधुनिक चीन साम्राज्य की सबसे प्रामाणिक भाषा और लिपि मंदारिन है। चाइनीज कोई भाषा नहीं है इसलिये तिब्बत और हिन्दुस्तान का कालचक्र प्रवर्तन सही तरीके से समझना युगधर्म है। तिब्बत की भाषा तिब्बत के धर्म (मुख्यतः हीनयान पंथी बौद्धों का ध्यानधर्म जिसे दलाई लामा परंपरा ने आज भी जीवित रखा है) हिन्दुस्तान व चीन के तौर तरीकों में भी धरती आसमान का अंतर है। भारत को प्राग्ज्योतिषपुर में भगवती कामाख्या का प्रसिद्ध मंदिर है। कामाख्या मंदिर में आषाढ़ (मिथुनार्क) आमतौर पर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक पंद्रह-सोलह जून को संपन्न होता है। आषाढ़ महीने के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि से आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा भगवती कामाख्या रजस्वला रहती हैं। हिन्द के कलिंग क्षेत्र के जगन्नाथपुरी (जहां वासुदेव बलराम भगिनी सुभद्रा तथा रामानुज कृष्ण की मूर्तियों का आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथयात्रा प्रारंभ होती है) में अबकी यह रथयात्रा मुहूर्त्त रविवार को द्वितीया तिथि प्रातः चार बज कर चौवन मिनट में शुरू हो जायेगी, उदया तिथि पड़वा है पर तिथिक्षय के कारण रथयात्रा मुहूर्त्त ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक 25 जून रविवार 2017 को ही संपन्न होगी। हिन्दत्व हर मुकाम में व्यक्ति के मत का महत्व प्रभावी रहता है। तुलसीदास कहते हैं - एतो मतो हमारो। अनीश्वरवादी चीन के साथ मत की कोई महत्ता नहीं यहां शास्ता जो कहे वही मर्यादा है वही नियम है वही व्यवस्था है। इसलिये महापंडित राहुल सांकृत्यायन प्रकरण को वोल्गा से गंगा तक की उनकी रचना सहित समझना होगा। जिसे आज लोग रूस या रसिया कहते हैं संस्कृत वाङमय में उसे ऋषि देश कहा गया है। पूरे यूरेशिया में शर्मणी (वर्तमान जर्मनी) त्रिविष्टप (वर्तमान तिब्बत) दिति की बहन दनु की संतानें शर्मणी व ऋषि देश में बसीं। दिति की संतानें दैत्य कहलाती थीं उन्होंने हिन्द के हरिद्रोही या वर्तमान हरदोई भृगुकच्छ या भड़ौच तथा असम के शोणितपुर को क्रमशः हिरण्यकश्यप व प्रह्लाद ने हरदोई को दैत्यधानी रखना पसंद किया। हिरण्यकश्यप के पौत्र बलि ने गुजरात जाकर नर्मदा तट पर अपनी दैत्यधानी निश्चित की। बलि के पुत्र बाणासुर ने सुदूर पूर्व शोणितपुर में अपना अलग राज्य कायम किया। यूरप व एशिया के मध्य भाग में कैस्पियन सी नाम का एक छोटा समुुद्र है। यह स्थान मरीचिनंदन कश्यप और उनकी तीन पत्नियों को बहुत पसंद आया। दक्ष प्रजापति की संततियों में पहली अदिति थीं। अदिति को कश्यप से जो संतानें मिलीं उन्हें आदित्य कहा जाता था। आदित्यों ने त्रिविष्टप को अपनी कर्मभूमि बनाया। अदिति की दो बहनें क्रमशः दिति व दनु थीं। इन दोनों की अदिति से बनती नहीं थी। दिति के पुत्र दैत्य कहलाये, उन्होंने हिन्दुस्तान को चुना। दनु पुत्रों में शुंभ निशुंभ के अलावा महान वास्तुकार मय, नमुचि आदि थे। दैत्यों व दानवों में भाईचारा था किन्तु आदित्यों से उनकी जन्मजात दुश्मनी थी। आदित्यों केे सबसे बड़े पक्षधर स्वयं महाविष्णु थे जिन्होंने बलि के नेतृत्व वाले दैत्य समाज दनु पुत्रों के दानव समाज से संविद स्थापित करने के लिये पुरन्दर इन्द्र को समझाया। बलि, शुंभ, निशंुभ क्षीर सागर मंथन कर अमृत पाने के लिये दैत्य दानवों से मिल कर परिश्रम करने के लिये तैयार होगये। यही मूल कहानी है अमृतोत्पादन की ताकि आदित्य लोग अपने सौतेले भाइयों का सामना कर सकें।
अब हम महापंडित राहुल सांकृत्यायन जो अगले वर्ष 9 अप्रेल 2018 के दिन पूरी सवा शती - एक सौ पच्चीस वर्ष के हो जायेंगे। उनकी सवा शती जन्म शताब्दी याने 125 वर्ष के अवसर पर हिन्द के उस नामी विद्वान का सटीक स्मरण करें जो आजमगढ़ के पनहा गांव में 9 अप्रेल 1893 को जन्मा। पिता केेदारनाथ पांडे तथा माता कुलवती ने इस अद्भुत बालक को जना जिसका महाप्रयाण दार्जिलिंग में चौदह अप्रेल 1963 को हुआ। हिन्द के वे लोग जो तीर्थ में जाकर नहाने के उपरांत अपने पितरों की तृप्ति के लिये तिलांजलि देते हैं ऐसे बहुत से हिन्दुस्तानी हैं जो भीष्माचार्य को अपुत्र होने के कारण अपनी श्रद्धा से जलांजलि देते हुए कहते हैं -
वैयाघ्र पाद गोत्राप संकृति प्रवराय च, गंगा पुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहम् तिलोदकम्
अपुत्राय ददाम्येतत् सलिलम् भीष्मवर्मणे।
हर हिन्दुस्तानी का फर्ज है वह भीष्मपितामह का तर्पण करे। वे संकृति प्रवर थे। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने आपको सांकृत्यायन क्यों कहा ? संकृति प्रवर होने के कारण वे सांकृत्यायन कहलाये। ऐसा लगता है महापंडित राहुल सांकृत्यायन को हिन्द के लोग भूल रहे हैं। यह ब्लागर महाशय अनंत कृष्णन् केे आधे अधूरे विवेचन व अपूर्ण जानकारी के प्रायश्चित्त के लिये महाशय अरूण पुरी का ध्यानाकर्षण करना अपना स्वधर्म मानता है कि इंडिया टुडे का अगले वर्ष 2018 ईस्वी वाला वार्षिकांक महापंडित राहुल सांकृत्यायन को समर्पित हो। राहुल सांकृत्यायन ने हिन्दत्व की जो महान सेवा की है उसे प्रकाश मंे लाना युगधर्म है। भारत के प्रधानमंत्री महोदय नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से भी एक नम्र प्रार्थना है वे अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी महाशय वैंकया नायडू का ध्यानाकर्षण करें कि वर्ष 2018 केे लिये प्रकाशित होने वाले प्छक्प्। 2018 के लिये वार्षिक प्रकाशन में Who is Who in India प्रकाशित करने के लिये महानिदेशक प्रकाशन कक्ष को प्रेरित करें ताकि हिन्द के महत्वपूर्ण व्यक्तित्त्वों का उल्लेख भी वार्षिक प्रकाशन में जुड़ जाये। महाशय अरूण पुरी से अनुरोध है कि हिन्द की सरकार को राहुल सांकृत्यायन के बारे में जागृत करने में योगदान देकर श्रीलंका से लेकर ऋषि देश तक सांकृत्यायन पर्व का उन्मेष हो।
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