Friday, 7 July 2017

भाषायी क्षेत्र में हिन्दी/नागरी विरोध का विकल्प जरूरी है ?
बंगलुरू के कन्नड़ भाषियों में व्याप्त नागरी लिपि विरोध हिन्दी विरोध और संस्कृत भाषा को देवनागरी केे बजाय कन्नड़ लिपि में लिखे जाने के प्रसंगों को इस ब्लागर ने कर्णाटक राज्य की अपनी अनेक यात्राओं में महसूस किया। महाशय रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल सहयोगी थे। सारी जिन्दगी काशी और उत्तराखंड के कौसानी में बिताई। मातृभाषा कन्नड़ होने के बावजूद काशी निवास के कारण धाराप्रवाह हिन्दी बोलने वाले व्यक्तित्त्व के धनी थे। जब कर्णाटक भाषायी राज्य के रूप में उदित नहीं हुआ था वहां मैसुरू राज्य था। वर्तमान कर्णाटक राज्य के उत्तरी हिस्से मुंबई प्रेसीडेंसी के हिस्से को तेलुगु भाषी कुछ हिस्से मद्रास प्रेसीडेंसी के भाग थे। हिन्द के वर्तमान भाषायी राज्यों में कर्णाटक अकेला राज्य है जो उत्तर में कोंकणी (लिपि देवनागरी) तथा मराठी (लिपि देवनागरी) भाषा भाषी लोगों की बहुतायत का इलाका है। संयुक्त महाराष्ट्र अभियान के दौरान वर्तमान कर्णाटक के मराठी भाषी समूह को महाराष्ट्र से जोड़ने का भगीरथ प्रयास हुआ पर संयुक्त महाराष्ट्र समर्थन समाज कृतकृत्य नहीं हो पाया। कर्णाटक सहित तमिलनाडु आंध्रप्रदेश व तेलंगाना में भी स्वभाषा प्रेम जोर मारता रहता है। हिन्दी विरोध की पहली पहल तमिलनाडु में शुरू हुई। भाषायी उग्रता राजनीतिक घटना है पर स्वभाषा प्रेम स्वाभाविक है, मनोभावना है। बंगलुरू में कर्णाटक राज्य द्वारा विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ाने के लिये दस हजार शिक्षकों के पद रिक्त हैं। जब लोगों में हिन्दी पढ़ने के लिये उत्साह ही नहीं है पदों का रिक्त रहना स्वाभाविक है। बंगलुरू शहर में मेट्रो में हिन्दी में लिखे हुए संकेतों के लिये भी लोगों में विरोध की ज्वाला धधक रही है। दूसरी ओर तमिलनाडु और कर्णाटक का जल विवाद विशेषतः कावेरी जल को लेकर दोनों ओर से देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के निर्णयों के लिये भी वैराग्य भाव है। दोनों राज्य अपने अपने फैसले पर अडिग रहना चाहते हैं। ऐसी विषम स्थिति में कौन सा मार्ग अपनाया जाये। कर्णाटक राज्य की बसों में केवल कन्नड़ भाषा में ही संकेत रहते हैं। किन्हीं बसों में रोमन लिपि में संकेत पाये जाते हैं पर जो लोग कन्नड़ लिपि पढ़ नहीं पाते और अंग्रेजी भी नहीं जानते उन्हें कर्णाटक यात्रा के दौरान कठिनाइयां आती हैं। हिन्दुस्तान 1947 में आजाद हुआ। इजरायल 1948 में अस्तित्व में आया। इजरायल ने हिब्रू भाषा को नवजीवन दिया, वैसे बाइबिल मूलतः हिब्रू भाषा में लिखी गई धर्म पुस्तक है पर विश्व भर के अढ़ाई अरब ख्रिस्ती धर्मावलंबी बाइबिल की प्रार्थनायें अपनी अपनी भाषा में संपन्न करते हैं। इजरायल ने हिबू्र भाषा को पुनर्जीवित कर दुनियां के सामने एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। हिन्दुस्तान की संविधान सभा ने प्रस्ताव किया कि हिन्द की राजकाज की भाषा संविधान लागू होने केे दस वर्ष उपरांत नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी होगी। भारत की मूलतः 276 भाषाओं और बोलियों में जिन भाषाओं की अपनी लिपियां हैं उनमें मइती या मणिपुरी, असमी, बांगला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी, सिंधी तथा उर्दू की अपनी अपनी लिपियां हैं। संस्कृत, डोंगरी, मराठी, कोंकणी, बोडो, मैथिली, नैपाली, संथाली भाषायें देवनागरी लिपि का उपयोग करती हैं। देवनागरी उपयोक्ता भाषाओं में एक भाषा हिन्दी भी है जिसे खड़ी बोली भी कहा जाता है। अवधी व ब्रजभाषा वर्तमान हिन्दी की आत्मा हैं। सूरत में बर्तानिया की ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थापित होने से पूर्व भारत में सधुक्कड़ी भाषा हिन्द की लिंग्वा फ्रांका थी। इस सधुक्कड़ी के ओजस्वी व्यक्तित्त्व कबीरदास थे जिन्होंने सधुक्कड़ी को आसेतु हिमाचल भारत की लिंग्वा फ्रांका बनाया। सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसे सधुक्कड़ी क्यों कहा जाता है ? प्राचीन भारत के शंकराचार्य के जमाने तक संस्कृत, प्राकृत, पालि भाषायें देश के तीर्थयात्री, साधु सन्यासी व व्यापार करने के लिये एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने वाले व्यापारी भी साधु कहलाते थे। ये लोग जो भाषा बोलते वही सधुक्कड़ी कहलाती है। स्वामी विवेकानंद तथा महात्मा गांधी ने सधुक्कड़ी का प्रयोग अपने भ्रमण काल में संपन्न किया। सधुक्कड़ी ने हिन्द के अस्तित्व को बनाये रखा। कंपनी बहादुर ईस्ट इंडिया कंपनी ने रोमन उर्दू के जरिये अपने पांव फैलाये। यह कोशिश की कि रोमन उर्दू हिन्द की लिंग्वा फ्रांका का आकार पा ले पर सधुक्कड़ी का सामना रोमन व उर्दू नहीं कर पायीं। 
साने गुरू जी ने हिन्द के लोगों के सामने आंतर भारती याने भारत की भाषाओं का एक दूसरे के नजदीक लाने का भगीरथ प्रयास किया। उन्होंने साफ साफ कहा भारत की भाषाओं को एक दूसरे को समझने का अवसर तभी मिल सकता है जब भारत की भाषाओं और लिपियों में एक दूसरे के लिये आकर्षण जाग्रत किया जाये। कर्णाटक के कन्नड़ भाषी समाज द्वारा कर्णाटक राज्य के गठन 1956 से शुरूआती चालीस वर्षों तक नागरी और संस्कृत भाषा का दबदबा था। पिछले बीस वर्षों याने नयी पीढ़ी के आगमन ने कर्णाटक में नागरी और संस्कृत का दबदबा समाप्त होगया। वैदिक संस्कृत के मंत्र भी कन्नड़ लिपि का आश्रय लेने को बाध्य होगये। कर्णाटक वह इलाका था जहां आदि शंकर ने श्रंगेरी में पहला शांकर मठ स्थापित किया। कर्णाटक के कई इलाकों में आदि शंकर को अद्वैत के समानांतर रामानुज के द्वैताद्वैत तथा माध्वाचार्य केे विशिष्टाद्वैत के समानांतर जैन धर्मावलंबियों का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। जिस तरह बदरीनाथ का रावल नंबूदिरी ब्राह्मण ही हो सकता है नैपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का प्रमुख पुजारी कर्णाटक के शैव संप्रदाय का ही व्यक्ति होता आया है। कुमांऊँ में एक शहर अल्माड़ नाम से जाना जाता है। यहां कर्णाटक ब्राह्मणों का एक मोहल्ला कर्णाटक खोला है जो समूचे अल्मोड़ा शहर की पुरोहिताई करता था। अब हम कर्णाटक की भाषा समस्या पर विचार करना चाहेंगे। कर्णाटक राज्य उत्तर में कोंकण तथा महाराष्ट्र से जुड़ा है। इन दोनों क्षेत्रों गोआ व महाराष्ट्र की लिपि नागरी है। इसलिये कर्णाटक के लोगों को चाहिये कि कन्नड़ भाषा के लिये नागरी लिपि का प्रयोग करें जिससे समूचे उत्तर कर्णाटक की भाषायी समस्या का निदान हो सकता है। दूसरी ओर कर्णाटक केरल याने मलयाली भाषी समाज से भी जुड़ा है इसलिये पूरे दक्षिण कर्णाटक में कन्नड़ भाषा को मलयाली लिपि में भी लिखा जाना चाहिये। कर्णाटक तमिलनाडु आंध्रप्रदेश तथा तेलंगाना से भी जुड़ा है इसलिये कन्नड़ भाषा के तमिल तेलुगु लिपियों का प्रयोग करने से कर्णाटक सहित जिन्हें अंग्रेजी समझ में नहीं आती पर अपनी अपनी भाषा लिपि के जरिये वे कन्नड़ समझ सकते हैं। हिन्दी-नागरी विरोध करते रहने के बावजूद कन्नड़ भाषी समाज पड़ोसी राज्यों की लिपि में कन्नड़ लिखे जाने से आंतर भारती को समृद्ध करने में मददगार हो सकते हैं। हिन्दी और नागरी विरोध केवल तमिलनाडु व कर्णाटक तक सीमित नहीं है। दक्षिण के राज्यों में केरल में हिन्दी समझी बोली जाती है जो रास्ता केरल ने अपनाया है बावजूद इसके कि उस राज्य में इस्लामी एकता का भी जोर है जिसे हिन्दत्व पर यकीन नहीं के बराबर हैै। केरल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ख्रिस्ती धर्मावलंबी है। इसके बावजूद केरल का हिन्दुत्ववादी मातृप्रधान परिवार वाला नायर समाज ही केेरल को समीक्षित नेतृत्व देता है। तमिल तेलुगु तथा मलयाली लिपियां एक दूसरे की भाषाओं को नजदीक लाने में कारगर हो सकती हैं। भारत सरकार संविधान के निर्णय कि हिन्दी की राजकाज भाषा नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी होगी किन्तु अंक एक दो तीन चार के बजाय 1 2 3 4 आदि होंगे। हिन्द संघ राज्य है, घटक राज्य की भाषा या भाषायें घटक राज्यों की राजभाषायें होंगी। वर्तमान में नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भारत के दस राज्यों की राजभाषा है जिनमें उ.प्र. मध्यप्रदेश बिहार छत्तीसगढ़ झारखंड उत्तराखंड हरयाणा राजस्थान हिमाचल पूर्णतः घटक राज्य हैं। दसवां क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली है जहां विधानसभा है पर दिल्ली संघ शासित क्षेत्र है। इन दस राज्यों की जनसंख्या पूरे देश की 2011 जनगणनानुसार एक अरब इक्कीस करोड़ से ज्यादा है। मोटे अनुमानों के अनुसार भारत की आबादी का पचास प्रतिशत अंश हिन्दी भाषी है शेष पचास प्रतिशत आबादी हिन्दीतर भाषायें हैं। भारत सरकार केन्द्रीय विद्यालयों तथा केन्द्र संचालित शिक्षण केन्द्रों में हिन्दी को अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम का भाग बनाने में समर्थ है पर मुल्क की तमाम राजभाषायें व उनकी लिपियां मुल्क के लिये उतनी ही महत्वपूर्ण हैं इसलिये अगर राज्य सरकारें यह महसूस करें कि उन पर केन्द्र हिन्दी थोप रहा है भारत सरकार को चाहिये कि साने गुरू जी की आंतर भारती भाषायी विधा को प्रश्रय दे। केवल यही अपेक्षा रखी जाये कि प्रादेशिक भाषा व अंग्रेजी न जानने वाले लोग भी आंतर भारती से लाभान्वित हों। डाक्टर संपूर्णानंद ने उ.प्र. में आजादी के तुरंत बाद से हिन्दी अनिवार्य कर दी पंडित नेहरू को समझा दिया कि यदि उ.प्र. में हिन्दी को अनिवार्य नहीं किया गया तो उर्दू का बोलबाला रहेगा। जिस तरह इजरायल ने हिब्रू भाषा को नवजीवन दिया वह अपने आप में विश्व महत्व का विषय है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री महोदय राज्यों पर हिन्दी न लादें उन्हें केवल यह सलाह दें कि घटक राज्य अपनी राजभाषा को पड़ोसी घटक राज्य की राजभाषा व लिपि के साथ आंतर भारती पद्धति का अनुसरण करे। नागरी लिपि व हिन्दी भाषा के प्रति जो अनिच्छा घटक राज्यों में व्याप्त है उसे घटाने की जरूरत है संवर्धित करने की नहीं। आज मुल्क में जो ढर्रा चल रहा है उसमें घटक राज्य की राजभाषा और अंग्रेजी की प्रभुता है। नब्बे दिन में अंग्रेजी बोलने की कवायद सिखाने के बावजूद भारत में आज जो अंग्रेजी ज्ञान का स्तर है वह निरंतर क्षीण होता जारहा है जिससे यह शंका लगती है कि हिन्द में राजनीतिक लोग जनता जनार्दन से वोट तो उनकी भाषा में मांगेंगे पर शासन करने के लिये अमरीकी अंग्रेेजी सहित विलायती अंग्रेजी का सहारा लेंगे जिससे हिन्द की मौजूदा डेमोक्रेसी भाषायी संत्रास झेलने को बाध्य हो सकती है इसलिये पहली जरूरत तो यह है कि लोकसभा राज्यसभा व विधानसभा में लोकप्रतिनिधि को अपनी मातृभाषा अथवा चाहत भाषा में वक्तव्य देने और दूसरे सदस्यों के विचार अपनी भाषा अथवा चाहत भाषा में सुनने का मौलिक अधिकार यथासंभव शीघ्र से शीघ्र प्रबंधित हो जाना चाहिये। जो केन्द्रीय सरकारी कर्मचारी अपनी मातृभाषा के अलावा दो या तीन भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति पात्रता रखते हैं उन्हें देश के भाषायी प्रबंध का सुव्यवस्थित स्वरूप जिसमें भाषायी विद्वेष की भावना लुप्त हो सके वह प्रयास करना जरूरी लगता है। भारत सरकार को आंतर भारती भाषायी प्रबंध के लिये प्रांतीय भाषाओं के लिये उनकी अपनी भाषायी लिपि के समानांतर पड़ोसी भाषायी लिपि में भी प्रादेशिक भाषा लिखी जाने लगे तभी भारत की आंतर भारती भाषाओं केे पर्यायवाची शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रयोग होने की नयी गुंजाइश होगी। भाषायी राज्यों में एक राज्य की भाषा दूसरे राज्य की भाषा के नजदीक लाने का एकमात्र उपाय आंतर भाषायी विश्वकोष है। अंग्रेजी सहित भारत की मौजूदा सभी 22 भाषाओं भाषायी सामंजस्य नितांत राष्ट्रीय आवश्यकता है। एक दूसरे को समझने की प्रक्रिया है। भारत सरकार को घटक राजभाषाओं से सामंजस्य स्थापित करना ही होगा।
          हिन्दी विरोध करते रहिये पर आंतर भारती अपनाते रहिये। यही हिन्द की भाषायी जरूरत है। इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा बंगलुरू का हिन्दी विरोध नजदीक से देखें। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने आधुनिक हिन्द के पचास निर्माताओं की जीवनियां प्रकाशित की हैं। बंगलुरू में हिन्द की ऐतिहासिकता को अपने तरीकों से विश्लेषित करने वाले महाशय रामचंद्र गुहा बंगलुरू में ही रहते हैं। उन्होंने अंग्रेजी भाषा की Builders of modern India  में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को नये हिन्द का निर्माता माना है। उन्होंने अठारह अन्य महानुभावों को नये भारत के निर्माताओं की श्रेणी में आगणित किया है। कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना उम्र में महात्मा गांधी (मोहनदास करमचंद गांधी) से मात्र सात वर्ष छोटे थे। वे मूलतः महात्मा गांधी की तरह गुजराती भाषी भी थे और हिन्द के मुसलमानों के शिया संप्रदाय से आते थे। उनका गुरूमंत्र यह था कि ‘हिन्द का मुसलमान वामन बनिया की चाकरी नहीं करेगा’। महात्मा गांधी वैष्णव बनिया संप्रदाय से आते थे। पंडित नेहरू कश्मीरी पंडित थे, उनके दादा गंगाधर नेहरू कश्मीर से उतर कर गंगा सिंध के मैदानी हिन्द में बस गये थे। पंडित नेहरू के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद के नामचीन वकील थे। इतिहासकार महाशय रामचंद्र गुहा की राय में आधुनिक हिन्द को हिन्द बनाने में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना की अहम भूमिका मानते हैं जबकि हिन्द का हिन्दू जनमत कायदे आजम का हिन्द का बंटवारा कर पाकिस्तान निर्माता होने के कारण कायदे आजम को हिन्द याने अखंड भारत का दुश्मन मानता है। आजादी के सत्तर वर्ष के बाद भी हिन्द व पाकिस्तान में जो वैमनस्य है उसके मूलकर्ता कायदे आजम ही हैं। उन्हें आधुनिक भारत के उन्नीस निर्माताओं में आगणित कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्द के हिन्दू मुस्लिम द्वेष की दावाग्नि को बढ़ाने का ही काम किया। बहुत से भारतीय चिंतक इतिहासज्ञ कायदे आजम को वह महत्ता देने के पक्षधर नहीं हैं जिसे इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि मानते हैं। बंगलुरू में बढ़ रहे हिन्दी विरोध को इतिहासकार महाशय रामचंद्र गुहा हिन्दुस्तान टाइम्स के एच बी थिंक ? में सवाल कर रहे हैं Why this revival of Hindi chaonism यह ब्लागर व्यक्तिगत रूप से इस राय का है कि जो लोग नागरी लिपि और हिन्दी भाषा नहीं चाहते उन पर यह भाषा न थोपी जाये। हिन्दुस्तान केे प्रखर सांस्कृतिक तथाा समाजवादी चिंतक साने गुरू जी ने हिन्द की भाषा समस्या का कारगर समाधान खोजने केे लिये आंतर भारती (हिन्द की सभी भाषाओं जिनकी लिपियां अलग अलग हैं उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाये जाने का नाम ही आंतर भारती हैै)। आज हिन्द में केवल हिन्दी का ही विरोध नहीं नागरी और संस्कृत का भी भयावह विरोध बढ़ रहा है। पंडित नेहरू के हिन्दू कोड बिल ने Hindu Democracy को उभार दिया। असमी, मइती, बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी तथा उर्दू की अपनी अपनी लिपियां व भाषायें हैं। नागरी लिपि का उपयोग करने वाले मराठी भाषी नागरी को अपनाते हैं पर उन्हें हिन्दी नहीं चाहिये, यही स्थिति नैपाली की भी है लिपि नागरी है पर नैपाल में हिन्दी विरोध चरम पर है। महाशय गुुहा फरमाते हैं उन्होंने जिस चाउनिज्म शब्द का प्रयोग किया है उसको सामान्य हिन्दुस्तानी तौर तरीके पर स्वयं को श्रेष्ठता देने वाला विचार या दूसरे को अपने स्तर का न मानने वाली काल्पनिकता - वाणी का एक अवगुण है। महाशय रामचंद्र गुहा ने महाशय वैंकया नायडू का उल्लेख किया। वैंकया नायडू ने यह भी तो कहा वे प्रखर हिन्दी विरोधी रहे पर समय ने उन्हें प्रतीति करा दी कि अगर हिन्द में यत्र तत्र सर्वत्र जाना हो तो खड़ी बोली ही सहारा हैै। रामचंद्र गुहा के नाम से यह तो साफ झलकता है कि अंग्रेजी उनकी मातृभाषा नहीं है। क्या वे पंडित नेहरू की तरह अंग्रेजी में सोचते हैं ? या अपनी मातृभाषा अथवा चाहत की हिन्दुस्तानी भाषा में चिंतन करते हैं ? आज जैसी स्थिति है उसमें मुल्क का लगभग पचास फीसदी व्यक्ति अपने घर से बाहर निकलते ही हिन्दी में बोलता है। यह हिन्दी प्राचीन मध्यकालीन भारत में सधुक्कड़ी कहलाती थी जिसे लोग कबीर की सधुक्कड़ी कहते हैं। आदि शंकर जब हिन्द में घूम रहे थे साढ़े चार हजार वर्ष पहले जनसामान्य भी संस्कृत बोलता था जिसे व्याकरण का ज्ञान नहीं था वह प्राकृत बोलता था। संयुक्त राज्य अमरीका में पंद्रह लाख हिन्दू हैं। वे अपने लोगों में अपनी भाषा मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयाली, तेलुगु, कांेकणी, उड़िया, बांग्ला, मइती, असमी व नैपाली में बोलते हैं पर बाजार में जब हिन्दुस्तानी संयुक्त राज्य अमरीका के राज्यों में मिलता है मंदिरों में एक दूसरे से बात करता है तो वह बात हिन्दी में ही होती है। महाशय रामचंद्र गुहा का यह व्यक्तिगत स्वाधिकार है कि वे हिन्दी का जम कर विरोध करते रहें पर हिन्दुस्तानी भाषाओं का विरोध उन्हें हिन्द के इतिहास का खलनायक बना देगा। भारतीय भाषा से एक दूसरे के नजदीक आयें यह तभी संभव है जब पश्चिम बंगाल का पर्वतीय इलाका दार्जिलिंग जहां के लोग नैपाली बोलते हैं और उनकी लिपि नागरी है इसलिये बांग्ला को असमी उड़िया और नागरी लिपियों में भी प्रस्तुत किया जाना एक भाषा को दूसरी भाषा में निकटता लायेगा। जब रामचंद्र गुहा सरीखा इतिहासकार कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत का निर्माता घोषित करेगा और मुल्क की भाषायी ऊहापोह को अंग्रेजी के जरिये संवारना चाहेगा। संयुक्त राज्य अमरीका केे जार्जिया विश्वविद्यालय की अंग्रेजी प्रोफेसर ने जो भाषायी जलजला की भविष्यवाणी की है वह लोगों को कष्ट ही देगी। हिन्दी की हिन्दीतर भाषाओं के बीच में भाषायी तालमेल का एकमात्र तरीका साने गुरू जी का आंतर भारती समाधान है। हिन्द की भाषायें अंग्रेजी के माध्यम से नहीं भाषायी पारंपरिकता से एक दूसरे के नजदीक आ सकती हैं। मतदाताओं से वोट की भिक्षा जनता की भाषा में मांगते हैं लोकसभा विधानसभा में भी स्थानीय भाषाओं में अपना वक्तव्य देने की आजादी हर विधायक को मिले। वह जिस भाषा में सुनना चाहता है उस भाषा में दूसरे वक्ता का बयान सुनने को मिले वही हिन्द की सही सही भाषायी बाहुल्यता का समाधानकारी मार्ग हैै जिसे साने गुरू जी ने हिन्द के लोगों को सुझाया है। बंगलुरू में हिन्दी विरोध जोरों पर है। भारत सरकार उन पर हिन्दी न थोपे जो हिन्दी नहीं सुनना चाहते या नागरी लिपि नापसंद करते हैं पर जो लोग हिन्दी पढ़ना चाहते हैं उन्हें कर्णाटक सरकार राज्य के दस हजार हिन्दी शिक्षकों के पदों पर नियुक्ति देकर रोजगार दे सकती है, जो लोग हिन्दी पढ़ना चाहते हैं उन्हें कृतार्थ कर सकती है। भाषायी राजनीति के बजाय देश की जरूरत भाषायी सहअस्तित्वता है। कर्णाटक की सरकार तथा कर्णाटक में कन्नड़ भाषा की प्रभुता कायम चाहने वाले कन्नड़ भाषियों भाषायी राजनीति के जरिये सियासी उपस्थिति दर्ज करने की चाहत वाले कन्नड़ भाषियों को चाहिये कि वे भारतीय संविधान की कन्नड़ भाषा में आधिकारिक उपलब्धि के लिये भारतीय संसद के दोनों सदनों में कन्नड़ भाषा में संविधान की आधिकारिक उपस्थिति के लिये अहर्निश प्रयत्न करें। हिन्दी विरोध उन्हें कोई लाभार्जन देने के बजाय पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल के चमकीले तारे रहे रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर और बालकृष्ण केशकर सरीखी श्रेष्ठता तभी मिल सकती है जब वे स्वभाषा की उन्नति के समानांतर कर्णाटक से सीमा रखने वाले राज्यों की राजभाषाओं व लिपियों को भी कन्नड़ प्रसार के लिये अपनायें। मौजूदा हिन्द की वे घटक राज्य सरकारें जिन्हें नागरी लिपि तथा हिन्दी भाषा से वैराग्य है वे घटक राज्य हित के लिये भारतीय संसद पर यह दवाब बनायें कि  मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयाली, तेलुगु, कांेकणी, उड़िया, बांग्ला, मइती, असमी, सिंधी, संस्कृत, बोडो, पंजाबी, उर्दू व नैपाली भाषाओं में भी हिन्द केे संविधान की प्रामाणिक संस्करण संसद के दोनों सदनों तथा संबंधित घटक राज्यों के विधानमंडलों द्वारा संपुष्टि कर भारत के चौदहवें राष्ट्रपति द्वारा महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ में जारी की जायें ताकि अंग्रेजी और हिन्दी के समानांतर भारत की इतर भाषाओं व उनकी लिपियों में हिन्द के संविधान के प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध हों। हिन्द का उपहास करने वाले तथा कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत का निर्माता कहने वाले रामचंद्र गुहा महाशय अपने कथन पर पुनर्विचार करें। 
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