महाशया नीरजा चौधरी हिन्द केे उन राजनीतिक विश्लेषकों में अग्रणी हैं जिन्हें हिन्द का स्ट्रांग स्टेट होना रूचिकर प्रतीत नहीं होता। वे मुल्क हिन्दुस्तान को साफ्ट स्टेट ही रहने देना पसंद करती हैं ताकि सरकार में उनकी दखलंदाजी कामयाब होती रहे। उन्होंने टाइम्स आफ इंडिया के 22 नवंबर 2017 के अंक में राहुल गांधी की लंबी छलांग का खाका पेश किया है। अपने पंद्रह सूत्री स्तंभ में महाशया नीरजा चौधरी अपने चौदहवें सूत्र में यह कबूल करती हैं कि राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी ने अगर तय कर लिया कि वे 2019 के लोकसभा निर्वाचन में अपनी प्राइम मिनिस्ट्री दावेदारी न आजमा कर किसी भी इतर व्यक्ति के लिये सत्ता आसन उपलब्ध कराने का संकल्प लें तथा गैर भाजपाई राजनीतिक दल मोदी विरोधी भाजपाई खेमे में भी नजर लगाये रखें और 1989 की तरह सत्ताधारी दल के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार चुनाव लड़े। सवाल उठता है, 1989 में तो मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस और राजीव गांधी से किनारा कर लिया और उ.प्र. में राजीव गांधी की कांग्रेस के खिलाफ एक साझा उम्मीदवार खड़ा कर राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल करते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाने में मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह सफल होगये। सभी कांग्रेस विरोधियों ने राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह का समर्थन किया। महाशया नीरजा चौधरी इतिहास दुहराना चाहती हैं इसलिये कह रही हैं कि राहुल गांधी की ऊँची छलांग कारगर हो सकती है बशर्त्ते वे केन्द्रीय सत्ता के इतर दावेदारों यथा राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव, जाटव वोट बैंक की मलिकिनियां मायावती, जनता दल सेकुलर के सुप्रीमो देवगौड़ा, महाशया पश्चिम बंग मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरूद्ध काशी से सांसद चुनाव हारे महाशय अरविन्द केजरीवाल सहित भाजपा में प्रधानमंत्री के परोक्ष विरोधी जो मौका मिलने पर प्रधानमंत्री का विरोध करने केे लिये तैयार हैं। यह सब करने के लिये नीरजा चौधरी की राय में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की दावेदारी से किनारा कराना होगा। यदि कहीं दैवयोग से राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को राज्यसभा सांसद महाशय रामजेठमलानी झारखंड उच्च न्यायालय में निर्दोष प्रमाणित करने में सफलता प्राप्त कर लिये और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी वे लालू प्रसाद यादव को निर्दोष साबित कर लिये तो हिन्द केे प्रधानमंत्रित्व के दावेदारों (गैर भाजपाई राजनीतिक दलों के सुप्रीमो) में पहला स्थान लालू प्रसाद यादव का होगा क्योंकि बिहार के यादव मुस्लिम मतदाताओं पर लालू प्रसाद की वाणी जादूगरी कर जाती है। उनका स्वप्न मनोरथ पूरा होगया तो लालू प्रसाद यादव स्वयं दिल्ली के राजराजेश्वर तथा पटना उनका बेटा तेजस्वी अपनी वंशी बजाते हुए बिहार पर एकछत्र राज्य करे यही राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का मनोरथ संकल्प है हां पूर्ति होनी ईश्वर के हाथों में है।
महाशया सोनिया गांधी अपने इकलौते बेटे को दिल्ली की राजगद्दी पर नहीं बिठा पायीं कारण एक नहीं अनेक हैं। प्रतिनिधि प्रधानमंत्रित्व के जरिये वे हिन्द पर राज करती रहीं। उनके सामने 2004 नहीं 2009 में बेटे को तख्तनशीन करने का मौका था चूक गयीं। 2014 में मुल्क का राजनीतिक खाका बदल गया नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री होगये। उनके खिलाफ कोई भी व्यक्ति एक भी आरोप नहीं लगा सकता क्योंकि वे पाकसाफ राजनीति करते हैं। महाशया नीरजा चौधरी यह स्वीकार करती हैं कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का सामना सभी राजनीतिक दल अपनी अपनी चौकड़ी से संपन्न करने की पात्रता नहीं रखते। वे भी टोह लगा रही हैं कि क्या भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों में उन्हें ऐसा कोई राजनीतिक व्यक्तित्त्व नजर आ जाये जो वह सभी कर सके जो मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी को सत्ताच्युत करने के लिये अहर्निश परिश्रम करते हुए किया।। आज राजीव गांधी सरकार का पतन तथा उनके संगीसाथी रहे राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रकरण इतिहास मात्र है। हिन्द को सौफ्ट स्टेट देखते रहना चाहत वाली महाशया नीरजा चौधरी क्या कोई ऐसा व्यक्तित्त्व खोज पायेंगी जो राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा अपनाई गयी राजनीतिक भूमिका को फिर धरती पर उतार सके।
महाशय नीरजा चौधरी के संकल्प में एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न छिपा हुआ है कि क्या वंशवादी राजनीति के मौजूदा प्रतीक महाशय राहुल गांधी सन 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पूर्व यह स्पष्ट कर पायेंगे कि भाजपा को अपदस्थ करने के लिये वे अपनी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने को तैयार हैं। महाशया नीरजा चौधरी का यह सोचना हास्यास्पद है कि सोनिया गांधी व राहुल गांधी की कांग्रेस एक प्राइवेट फर्म सरीखी व्यवस्था है जबकि जिस राजनीतिक संगठन से उनका सामना होरहा है वह पब्लिक फाइनेंस कंपनीनुमा समूह है। प्राइवेट कंपनी व पब्लिक कंपनी में जो फर्क होता है वह कांग्रेस की वर्तमान अधोगति तथा भाजपा की उत्तरोत्तर प्रगति का रोडमैप है। 130 वर्ष पुरानी इंडियन नेशनल कांग्रेस जो अभी सोनिया राहुल गांधी प्राइवेट कंपनी है क्या ऐसी पुरानी संस्था जो केवल दो व्यक्तियों के सहारे खड़ी रहना चाहती है भारतीय जनता पार्टी सरीखे राजनैतिक दल का सामना कर पायेगी ? आज की मुल्क की राजनीतिक दिशा दशा में संभव नहीं दीखता परन्तु किसी के मनोरथ को तो आप खारिज नहीं कर सकते। नीरजा चौधरी का सोचना है कि तीन दशक पहले जो हालात थे वह फिर आ सकते हैं। वे कांग्रेस व कांग्रेस नेता सोनिया गांधी राहुल गांधी तथा कांग्रेस के अन्य नेताओं यथा डाक्टर मनमोहन सिंह, चिदम्बरम खड़गे, मीरा कुमार आदि पर ज्यादा भरोसा कर रही हैं पर ये सभी नेता सोनिया राहुल गांधी की दया के पात्र हैं। मां बेटे की नजरें उनके अनुकूल रहीं तो वे पार्टी के नेता हैं अन्यथा उनकी हालत वही होगी जो पी.वी. नरसिंह राव को भोगनी पड़ी। चूंकि नरसिंह राव घाघ राजनीतिज्ञ थे इसलिये पांच वर्ष राज्य करते रहे जबकि सोनिया गांधी व अर्जुन सिंह उनके विरोध पक्ष में थे। यहां तक कि अर्जुन सिंह ने नारायण दत्त तिवारी की सदारत में अलग कांग्रेस खड़ी कर ली। पी.वी. नरसिंह राव ने मुल्क का राजनीतिक नक्शा बदल डाला। उन्होंने मनमोहन सिंह को राजनीति में उतारा उन्हें वित्तमंत्री बनाया और आर्थिक सुधारों का युग शुरू हुआ।
महाशय नीरजा चौधरी की धारणा है कि विपक्ष का समुच्चय निर्मित करने से ज्यादा जरूरी है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए के विरूद्ध विरोधी दलों का साझा उम्मीदवार चुनाव लड़े। वे सोचती हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में 1989 के चुनावों की भांति राजा मांडा सरीखा कोई नेतृत्व उदित हो सकता है। यह उनका मनोरथ मात्र है। उत्तर नेहरू, उत्तर लाल बहादुर शास्त्री युग में देश में आर्थिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार की नमी बाहर आगयी। यह भ्रष्टाचार की बयार पूरे तीस वर्ष तक अबाध रूप से चलती रही। राजनीतिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार की यह अपावन गंगा निरंतर बहती रही। सन 2014 के लोकसभा चुनावों में हिन्द की जनता को यह अहसास करा दिया कि भ्रष्टाचार पूरी जिन्दगी नहीं चल सकता उसे मिटना ही होगा। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने सत्ताधिष्ठान को भ्रष्टाचार से मुक्त कर दिया। लोकमत प्रधानमंत्री के साथ गुजरात में 2001 से तथा दिल्ली में 2014 से जुड़ा है। चार वर्ष बीतने ही वाले हैं मुल्क का आम आदमी प्रधानमंत्री पर यकीन करता है उसने मान लिया है कि नरेन्द्र मोदी ही भारत की शान हैं। आज भी यत्र तत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है पर ज्योंही बात खुलती है प्रधानमंत्री कार्यवाही कर लोगों में यह विश्वास जगाते हैं कि भ्रष्टाचार के लिये कोई स्थान नहीं है।
नीरजा चौधरी भी व्यक्तिगत रूप से मानती हैं कि आज प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला करने में कोई व्यक्ति या दल समर्थ नहीं है। वे केवल कल्पना कर रही हैं कि राहुल गांधी की अप्रत्याशित छलांग के सहारे कांग्रेस उबर जाये। भाजपा विरोधियों को एकजुट रखे और एनडीए के खिलाफ साझा उम्मीदवार की कल्पना करे। वे जो सोच रही हैं वह शेखचिल्ली की कहानीनुमा विचार है। ऐसा लगता है महाशया नीरजा चौधरी को राजनीतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार भा गया है इसलिये वे जो कल्पना कर रही हैं क्या सचमुच महाशया सोनिया गांधी व राहुल गांधी अपनी राजनीतिक आकांक्षा को तिलांजलि दे देंगे ? वंशवादी राजनीति में यह व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता, आज जो वंश परंपरागत राजनीतिक खेमे बने हैं यथा जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला खानदान, मुफ्ती महबूबा खानदान, पंजाब में अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल दिल्ली में केेजरीवाल यू.पी. में बेटे से जुआ हार गये पिता मुलायम सिंह यादव बसपा नेत्री मायावती बिहार के राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, बंग नेत्री ममता बनर्जी, बीजद नेता नवीन पटनायक, तेलुगु देशम पार्टी नेता नायडू, तेलंगाना नेता राव, तमिल नेता एम.के. स्टालिन, जनता दल सेकुलर नेता देवगौड़ा, सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे तथा जेल में सजा भुगत रही शशिकला के अपने अपने स्तूप हैं। इस सुप्रीमो शैली की राजनीति को पटरी में लाने का साहस तो केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही जुटा सकते हैं। पारिवारिक राजनीतिक स्थिति राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति में इन राजनीतिक दलों को लाना आज प्रथम राष्ट्रीय आवश्यकता है। महाशय नीरजा चौधरी का संकल्प कहां तक पूरा होता है यह 2019 के लोकसभा चुनावों में ही सामने आने ही वाला है।
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