Tuesday, 21 November 2017

फिर चलो गावों की ओर
हिन्द को उजड़ने से बचाना है तो गावों को फिर  आबाद  करना          जरूरी है
1. भारत विभाजन पूर्व की दिल्ली      2. विभाजन जन्य दिल्ली पर पंजाब, सीमाप्रांत तथा सिंधी भाषी हिन्दुओं का रेला दिल्ली पहुंचा और दिल्ली का नक्शा 1949 से 1957 तक बदलता रहा      3. भारत की राजधानी होने से दिल्ली में आसेतु हिमाचल के हिन्दवी दिल्ली आकर बसते रहे 4. फिर भी 1957 में दिल्ली की आबादी मात्र बीस लाख ही थी     5. तब भी दिल्ली 276 गांवों वाला राष्ट्र था      6. पंडित नेहरू दिल्ली के गांवों को गांव ही रहने देकर उनकी स्थिति सुधारने का उपाय खोजते रहते     7. नयी आबादी ने व्यापार पर कब्जा किया क्योंकि सिंधी, पंजाबी, मुलतानी हिन्दू-सिख व्यापार में माहिर थे। भारत सरकार की जरूरत उन्हें नये वातावरण में हिन्द के अनुकूल बनाने की थी। टाइम्स आफ इंडिया के नवंबर 19 के अंक में ‘दि एज आफ क्राउडेड सिटीज मे बी ड्राइंग टु एन ऐंड’ वर्ल्ड इकानामिक फोरम द्वारा स्तंभ जारी हुआ है। 
यहां हम केवल दिल्ली का ही प्रसंग उठा रहे हैं। दिल्ली में हिन्द के 6 लाख 38 हजार गांवों में से हरेक गांव का बाशिन्दा मिल सकता है। दिल्ली वास्तव में एक लघु भारत है। दिल्ली या शक्रप्रस्थ अथवा इंद्रप्रस्थ पांच हजार वर्ष पुराना शहर हैै जिसकी स्थापना में वास्तुकार विश्वकर्मा और मयदानव की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दिल्ली से केवल बयालीस मील पूर्व में मेरठ नाम का जो शहर है उसका पुराना नाम मयराष्ट्र याने मयदानव की वास्तुकारिता का अद्भुत स्थल है। विश्वकर्मा व मयदानव तत्कालीन भारत के यशस्वी वास्तुकार थे। इन दोनों वास्तुकारों ने अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यसभा निर्माण में महती भूमिका का निर्वाह किया। जब खांडवप्रस्थ जल रहा था, मयदानव को अर्जुन ने बचाया। दानवराज मय अर्जुन द्वारा की गयी सहानुभूति तथा जिन्दगी बचाने के एवज में अर्जुन को कह रहा था - कौंतेय आपने मेरे जीवन की रक्षा की मैं इसका निष्क्रय देना अपना फर्ज समझता हूँ। अर्जुन ने मयदानव से कहा - योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण से बात करो। मयदानव श्रीकृष्ण के पास पहुंचा। श्रीकृष्ण ने कहा - दानव श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर के लिये एक ऐसी राज्यसभा बनाओ जिसमें जल एवं थल में भ्रम उत्पन्न हो जाये। वास्तुकार दानवराज मय ने युधिष्ठिर की ऐसी ही राज्यसभा निर्मित कर डाली जिसमें जल व थल में भ्रम उत्पन्न होता था। जिसमें महाराज कुमार सुयोधन जल को थल समझ कर फिसल कर गिर पड़े यह देख कर भीम हंस पड़े और बोले - अंततोगत्वा अंधे के बेटे अंधे ही होंगे। यही घटना महाभारत युद्ध की जननी बनी। दिल्ली और उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में रहना एकदम मुश्किल होरहा है, भीड़ भड़ाका वाले सभी शहरों में वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि सूझ ही नहीं रहा है कि क्या किया  जाये ? तकनालाजी हिन्द के एक अरब सैंतीस करोड़ निवासियों में से मात्र एक या दो प्रतिशत लोग समझते होंगे। जो तकनालाजी जानते हैं उसे प्रयोग करने में भी वे सफल होंगे यह कहा नहीं जा सकता है इसलिये जब मुल्क के शहर रहने लायक सांस लेने लायक ही न रह जायें तो फिर तो मुल्क के शहरी लोगोें को फिर से गांवों की तरफ ही भागना पड़ेगा। दिल्ली शहर जिसे नेशनल कैपिटल रीजन राजधानी क्षेत्र कहा जाता है पहल वहां से शुरू हो। इतिहास अपने आप में दुहराया जाता ही रहता है। उत्तर भारत के अधिकांश शहर इस समय घोर आपदा से घिर गये हैं, लोग सोलर इनर्जी की भी बात कर रहे हैं पर हिन्दुस्तान जैसे देश के लिये सोलर इनर्जी केवल गिनेचुने लोगों की मददगार होगी। आज हिन्द के लोगों में तीन व्यक्तियांे में एक गरीबी की मार से त्रस्त है याने एक अरब सैंतीस करोड़ लोगों में छियालीस करोड़ लोग दो जून का भरपेट भोजन भी नहीं पारहे हैं। गरीबी की यह मार गिनेचुने चंद अमीर लोगों की जिन्दगी भी बोझिल बना सकती है। इन छियालीस करोड़ लोगों के बयानबे करोड़ हाथों को काम दिलाना आज की राष्ट्रीय जरूरत है। इस गरीबी निवारण के महायज्ञ में केवल गांधी का चरखा व कबीर का करघा ही मुल्क का मददगार साबित हो सकता है। यह बात महात्मा गांधी सौ वर्ष पहले ही अनुभव कर चुके थे इसलिये उन्होंने चरखे पर कताई व करघे पर बुनाई के जरिये हिन्द के लोगों को रोजगार का रास्ता सुझाया। भारत सरकार व राज्य सरकारों के कर्मचारी कम से कम अठारह हजार रूपये माहवारी तनख्वाह पाने के पात्रताधारक हैं। महंगाई व दूसरे भत्तों को जोड़ा जाये तो भारत का छोट से छोटा कर्मचारी भी हर महीने अपने घर परिवार के लिये कम से कम तीस हजार रूपये की थैली ले जारहा है। राज्यों व केन्द्र सरकार तथा भारतीय सेना सहित सरकारी तनख्वाह पाने वाले लोग ज्यादा से ज्यादा डेढ़ से दो करोड़ लोग ही होंगे याने पांच व्यक्तियों के कुनबे को मान कर चलें तो सरकारी तनख्वाह से केवल आठ दस करोड़ लोग ही लाभ पारहे हैं, बाकी केेे एक अरब सताईस करोड़ लोग क्या करें ? प्राइवेट कंपनियों में नौकरी करने वाले लोगों की संख्या एक करोड़ के आसपास है। वे प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी ज्यादा से ज्यादा पांच करोड़ लोगों को रोजी रोटी का लाभार्जन करा रहे हैं। कुल मिला कर माहवारी पगार पाने वाले लोग तीन करोड़ उनके आश्रित कुल मिला कर पंद्रह करोड़ के करीब होते हैं। इस प्रकार एक अरब बीस करोड़ लोगों के 240 करोड़ हाथों को काम देना आज की ज्वलंत राष्ट्रीय आवश्यकता बनी हुई है। गरीब और अमीर के बीच फासला बढ़ता ही जारहा है। शहरों में यह तकलीफ ज्यादा है क्योंकि शहरी खर्चा गांव के खर्चे से अढ़ाई गुना ज्यादा है। 
शहरी सुविधाओं का आकर्षण हिन्द के गांवों के लोगों को भी शहर की तरफ मोड़ने का मुख्य कारण बना हुआ है। जहां तक आबादी केे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का प्रसंग है भारत मेें ज्यादातर राज्यों के लोग रोजगार व रोजगार से भी अधिक कमाऊ रोजगार के लिये गांवों से पलायन कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं। स्थिति यहां तक बिगड़ चुकी है कि किन्हीं किन्हीं शहरों में तो गांवों कव छोटे छोटे शहरों तथा बाजारनुमा गांवों के जनसैलाब ने मनुष्य की पहचान तक ही बदल डाली है। सरकारें तो बहुमत द्वारा पारित कानूनों से चलती हैं प्रवासियों की बेतहाशा बढ़त ने हिन्दुस्तान के शहरों को मनुष्यों के जंगल में बदल डाला है। सुशासन तो तभी कामयाब होता है जब लोगों में सामाजिकता का समावेश हो। रोजगार के लिये पलायन ने हालात बदल डाले हैं ऐसी स्थिति में केवल विवेकवान राजनीतिक नेता ही स्थिति संभाल सकते हैं जो हिन्द के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी बखूबी संपन्न कर रहे हैं। हिन्द के अखबार बोल रहे हैं कि महाशय राहुल गांधी को इंडियन नेशनल कांग्रेस की सदारत गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले मिलने वाली है। बात सन 1936 की है जब पंडित नेहरू केे स्वराजिस्ट पिता पंडित मोतीलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे। रावी के तट पर 1930 में कांग्रेस सम्मेलन में पंडित नेहरू ने अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू से कांग्रेस की अध्यक्षता पायी। महात्मा गांधी का आह्वान ‘पूर्ण स्वराज’ पर जवाहरलाल नेहरू ने अपने पिताश्री का रास्ता छोड़ दिया व महात्मा गांधी के बताये रास्ते पर चल पड़े। देश में पूर्ण स्वराज की धुनें गायी जाने लगीं। पंडित नेहरू ने महात्मा गांधी को अपना गुरू माना और स्वराज की नयी व्याख्या कर डाली। सतासी वर्ष पूर्व रावी तट पर जो जलसा हुआ राहुल गांधी महाशय सोनिया गांधी द्वारा धारित कांग्रेसाध्यक्ष का पद ग्रहण कर रहे हैं। क्या राहुल गांधी पंडित नेहरू की तरह राजनीतिक व्यवहार के पक्षधर हैं ? कांग्रेस का यह सदारती बदलाव क्या गुजरात में हर मंदिर में मत्था टेक रहे राहुल गांधी को लाभार्जन करा पायेगा ? लगता तो यही है कि भाजपा प्रमुख अमित शाह की राजनीतिक शैली तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का करिश्माई नेतृत्व अंततोगत्वा गुजरात के पटेल समाज को राहुल गांधी की तरफ मुड़ने नहीं देगा। पटेलों के धुरन्धर नेताओं ने यह तय कर लिया है कि गुजरात को उसका राजनीतिक वैभव केवल नरेन्द्र मोदी ही दे सकते हैं। राहुल गांधी अभी गुजराती अस्मिता को समझने में ही अपना समय लगा रहे हैं उन्हें महाशय शंकर सिंह बाघेला मददगार हो सकते थे पर बाघेला सरीखे सूझबूझ वाले जननेता को कांग्रेस ने किनारे कर दिया और महाशय सोलंकी दावा करने लगे कि 125 विधायकों से राहुल गांधी राज्य में सरकार बनायेंगे। देखते रहिये, सोलंकी, अहमद पटेल राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्षता के दौरान कहीं कांग्रेस को विरोध पक्ष के नेता पद से भी पदच्युत न कर डाले। महाशय शंकर सिंह बाघेला इस समय कांग्रेस के लिये सबसे बड़ी बाधा हैं कांग्रेस सदर की कुर्सी पारहे राहुल गांधी हिमाचल व गुजरात में स्वयं को स्थापित नहीं कर पायेंगे। कर्णाटक के चुनावों में जहां टीपू सुल्तान को कांग्रेस अपना प्रतीक बता रही है टीपू सुल्तान ने जो ज्यादतियां अपने राज्यकाल में कीं कहीं कर्णाटक का हिन्दू मानस कांग्रेस को कर्णाटक से भी पदच्युत न कर डाले ? लोकसभा के 2019 में होने वाले चुनावों में कहीं कांग्रेस अपने वर्तमान लोकसभा सदस्य संख्या से घट कर नीचे न पहुंच जाये। महाराष्ट्र के शरद पवार की दोस्ती के बावजूद कांग्रेस को नीचे खिसकना ही है, जो भी हो भारत के प्रधानमंत्री को गांवों के पुनर्जागरण केे लिये पहल करनी ही चाहिये। गांवों का फिर आबाद होना आधुनिक हिन्द की राजनीतिक आवश्यकता है। 
शहरों की बर्बादी रोकने के लिये गांवों की तरफ काम बढ़ाना राष्ट्रीय आवश्यकता है। तकनालाजी नहीं लोगों के दोनों हाथों को काम देना ही आज भारत की राष्ट्रीय आकांक्षा हो। दिल्ली में अब अठावन गांव रह गये हैं पता नहीं कि क्या महाशय केजरीवाल दिल्ली के मौजूदा गांवों को ग्रामीण उद्योगों का केन्द्र बनाना चाहते हैं या इन गांवों को भी शहर में बदलना उनका लक्ष्य तो नहीं है ? जो भी हो देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से अनुरोध है जिस तरह जवाहरलाल नेहरू दिल्ली के गांवों की सुध लेते रहते थे प्रधानमंत्री जी भी उसी तरह समय निकाल कर महाशय केजरीवाल से अपेक्षा करें कि दिल्ली के उन मौजूदा गांवों की आज क्या दशा है उसका अवलोकन करने की कृपा करेंगे। संभवतः महाशय अरविन्द केजरीवाल की समझ में आगया है कि उन्हें अपना ध्यान नेशनल कैपिटल रीजन पर केन्द्रित करना है, यदि केजरीवाल राजनीति के समानांतर लोकसंग्रह भी अपनायें तो कृतकृत्य हो सकते हैं। 
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