Monday, 29 September 2014


   

ननाद ढक्का नव पञ्चवारम्  


  वैयाकरण पाणिनि के अनुसार महाताण्डव नृत्य के बाद जब देवाधिदेव महादेव के द्वारा अपना डमरू बजाया गया उससे नौ और पांच बार आवाजें आयीं, इन आवाजों में वाणी के इक्यावन सुर निकले। मनुष्य की वाणी में सरस्वती का वास उसी दिन हुआ जब नटराज के द्वारा नृत्यावसान में ढक्का याने शिवजी का डमरू बजा। बर्तानिया के अखबार गार्जियन ने सही कहा - भारत से अंग्रेज व उनकी अंग्रेजियत की पंद्रह अगस्त 1947 को नहीं सही माने में सोलह मई 2014 को विदाई हुई। हिन्दुस्तानी महीना बन्दी के हिसाब से देखें तो 16 मई 2014 के दिन शुक्रवार था। नक्षत्रों में अपना सानी खोजने वाला अनुराधा याने छोटी राधा, सत्रहवां नक्षत्र, तैतिल करण, रक्ष योग तथा कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि थी। सौर मास की दृष्टि से ज्येष्ठ संक्रांति से अगला दिन सौर ज्येष्ठ 2 था। मृत्युवाण व्याप्ति थी। अखबार गार्जियन का कहना वास्तविकता थी कि हिन्दुस्तान से लार्ड मैकाले की अंग्रेजियत परम्परा अपने अवसाद पर थी। दूसरी सितंबर 2014 के दिन मोदी राज के शुरूआती शतक पूरा होगया। हिन्दुस्तानी परम्परा सौ से ज्यादा अष्टोत्तर को महत्त्व देती है। हिन्दुस्तान के लिये एक कमाल होगया। नटराज की कांस्यमूर्ति आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी अबोट के माध्यम से भारत के प्रधानमंत्री को जो अप्रेल 2008 में खोयी या गुम होगयी थी अथवा चुरा ली गयी थी, महत्त्वपूर्ण हिन्दुस्तानी धरोहर भारत को वापस मिल गयी। हिन्दुस्तान के कुमांऊँ हिस्से में एक पर्वत शिखर अबोट माउंट कहलाता है, यहां देवदारू के जंगल हैं। अंग्रेजी भाषा का Abbot शब्द संस्कृत वाङ्मय से काशी से इंग्लिश चैनल पार कर विलायत पहुंच कर अवधूत से Abbot होगया। यह है अवधूत शब्द की काशी से लंदन यात्रा। 
  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना वसंत पंचमी जिसे बंगाल सहित भारत के अनेक हिस्सों में श्री पंचमी भी कहा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर मुताबिक 15 फरवरी 1915 को संपन्न हुई। काशी नटराज आदिदेव महादेव की अपनी बारह कर्म भूमियों में एक विशिष्ट स्थान रखने वाली भूमि है। अंग्रेजी दैनिक राष्ट्रीय अखबार हिन्दू ने अपने 6 सितंबर 2014 के दिल्ली संस्करण के सातवें पृष्ठ में Return of Chola Icons शीर्षक से नटराज कांस्य मूर्ति का ब्यौरा छापा है। भागवत महापुराण के द्वितीय स्कंध के तीसरे अध्याय में सातवां श्लोक अभिव्यक्ति करते हुए बखान करता है -
               यज्ञम् यजेत् यशस्काम कोश काम प्रचेतसाम्, विद्याकामस्तु गिरिशम् दाम्पत्यार्थम् उमाम् सतीम्।
          गीर्वाग् वाणी के प्रदाता गिरि शिखर कैलास मन्दरस्थ नटराज राज महाशिव ही हैं। वह मूर्तिकार कौन था जिसने नटराज की कांस्य मूर्ति निर्मित की ? यह मूर्ति कब बनी ? काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का विश्व पंचांग पिछले 89 वर्षों से अहर्निश कालगणना करता आरहा है। विश्व पंचांग के अनुसार कल्पारंभ आज से 1,97,29,49,115 वर्ष पूर्व हुआ। सृष्टि से अब तक 1,95,58,85,115 वर्ष बीत चुके हैं। कलियुुग - चतुर्युगी का अंतिम युग आज से 5115 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ। हनुमान प्रसाद पोद्दार के अनुसार श्रीकृष्ण-वसुदेव देवकीनंदन का जन्म 5239 वर्ष पूर्व हुआ। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का संदेश कृष्णार्जुन संवाद के रूप में महाभारत युद्ध के पहले दिन अगहन शुक्ल एकादशी को कुरूक्षेत्र के ज्योत्सर में उपलब्ध कराया। नासा के अनुसार कृष्णार्जुन संवाद आज भी अंतरिक्ष में विद्यमान है।
  भारतीय वाङ्मय में सिकन्दर महान को अलक्षेन्द्र कहा गया है। संस्कृत वाङ्मय का अलक्षेन्द्र्र की शब्द यात्रा नवद्वीप, नालंदा, काशी, अवंतिका, तक्षशिला से शुरू हुई और बर्तानिया पहुंचते-पहुंचते अंग्रेजी भाषा के Alaxendar शब्द तक पहुँच  गयी। इसी तरह तनय अवधूत नाभि मेरू देवी नंदन ऋषभ ने जब अवधूत वेष धारण किया दिशायें ही जिसकी परिधान थीं शरीर मात्र ही परिग्रह था। वह तनय अवधूत बर्तानियां पहुंचने पर भाषा विज्ञानी अपनी यात्रा में Tonny Abbot शब्द बन गया। भारत में तनय अवधूत को भरत नाम से जाना जाता है जिसके कारण इस देश का नाम भारत है। हिन्दू अखबार के अनुसार तमिलनाडु के अरियालूर जनपद के श्रीपुरन्थनम् पूर्व काल में यह गांव श्रीपुरन्तकम् चतुर्वेदि मंगलम नाम से पुकारा जाता था, यहीं पर नटराज कांस्य मूर्ति ईसा से 990-980 वर्ष पूर्व याने आज से तीन हजार चार वर्ष के ईस्वी पूर्व सहस्त्राब्दी के आठवें-नवें दशक के बीच मूर्ति का निर्माण हुआ। इसके साफ माने होते हैं कि नटराज प्रतिमा का निर्माण महाभारत के कुरूक्षेत्र में संपन्न अठारह दिवसीय सगोत्रीय महासमर के दो हजार वर्ष पश्चात हुआ। भारत में यत्र तत्र शिलालेख व प्रस्तर उत्कीर्ण खरोष्ट्री व ब्राह्मी लिपियों में उपलब्ध है। इन लिपियों की ध्वनियां वही इक्यावन थीं जो महादेव के डमरू के चौदह बार बजने से निकलीं। महाभारत काल का एक दृष्टान्त उत्तराखंड के कुमांऊँ मंडल के पाली क्षेत्र में जो तब विराट नगर कहलाता था वहां खरोष्ट्री लिपि में पाण्डुपुत्र वृकोदर भीम द्वारा कीचक वध का उल्लेख है। अलकापुरी वर्तमान अल्मोड़ा के निधिपति यक्ष सम्राट धनद कुबेर अपने यक्ष-सेवक भृत्य से असंतुष्ट होगया। धनद कुबेर ने यक्ष को देश निकाला दे दिया। यक्ष वर्तमान छत्तीसगढ़ के रामगिरि नामक पर्वत पर रहने लगा। उसने बादलों के जरिये अपनी विरहिणी-यक्षिणी को संदेश भेजा। इस संदेश को महाकवि कालिदास ने मेघदूत महाकाव्य सृजित किया जिसका पहला छन्द - ‘‘कश्चित् कांता विरह गुरूणा’’ है। रामगिरि पर्वत में प्रवासी देश-निर्वासन दण्ड भोग रहे यक्ष ने प्रेयसी यक्षिणी को जो संदेश भेजा वह रामगिरि पर्वत पर उत्कीर्ण है। अल्मोड़ा शहर में जाखन देवी (याक्षायणी) मंदिर उसी विरहिणी यक्षिणी का स्मारक है। रामायण व महाभारत के सीरियल भारतीय दूरदर्शन ने दुनियां भर को उपलब्ध कराये। रामानंद सागर व बलराज चोपड़ा ने जो परिश्रम किया वह रामायण कालीन व्यक्तित्त्वों व महाभारत कालीन व्यक्तित्त्वों के चरित्र उजागर करता है। रामायण कालीन भारतीय भूगोल तत्कालीन राज्य, राजाओं तथा राजनीतिक स्थितियों का अनुसंधान समय की मांग है। तमिलनाडु के द्रविड़ समाज के दो धुर हैं। सी.एन. अन्नादुरई की अगुवाई वाला कालग्नार एम. करूणानिधि के नेतृत्त्व वाला द्रविड़ समूह निरीश्वरवादी जिसे अंग्रेजी साहित्य Atheist कहता है, उस निरीश्वरवाद (नास्तिको वेद निंदकः) वाला पक्ष है जो बर्तानी शासकों द्वारा सेतुबंध रामेश्वर को Adoms Bridge मानने को तैयार नहीं बल्कि सेतुबंध को तोड़ कर जलयान मार्ग प्रशस्त कराने का पक्षधर है। 2004 से लेकर 2014 तक यह दल इंडियन नेशनल कांग्रेस का हमसफर था उसका प्रयास था कि ऐडम्स ब्रिज तोड़ा जाये। दिल्ली व चेन्नई में ‘‘भगती उपजी द्रविड़ देस’’ की कबीर की सधुक्कड़ी के प्रति सहानुभूति रखने वाले व्यक्तित्त्व सत्तासीन होगये इसलिये अब मौका है कि सेतुबंध रामेश्वर पर भी अनुसंधान हो। रामायण-महाभारत कालीन भारतीय भूगोल तत्कालीन राज्यों-राजाओं के संबंध में बाल गंगाधर तिलक, डाक्टर संपूर्णानंद, डाक्टर भगवान सिंह द्वारा समय-समय पर सुझाये गये बिन्दुओं पर मार्क्सवादी तथा इस्लामी गरिमा का गुणगान करने वाले इतिहासज्ञों व भारतीय भाषाओं में वर्णित लोकभाषा साहित्य का अनुशीलन कर भारत की ऐतिहासिक यथातथ्य वास्तविकताओं को उजागर करने की तात्कालिक जरूरत है इसलिये भारत सरकार उसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी महोदय का पुनः-पुनः ध्यानाकर्षण कराना हर जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी का गुरूमंत्र जाप करने वाले हिन्दुस्तानी से अपेक्षा करना राष्ट्रधर्म है कि भारत को उसके छद्म इतिहास से मुक्त कराया जाये। राष्ट्रीय बहस हो, बहस ईमानदारी से हो बहस का फैसला देने वाले व्यक्तियों में मिथिला निवासी मंडन मिश्र की धर्म चारिणी का सा आचरण हो जो आदि शंकर - मंडन मिश्र के मध्य हुए शास्त्रार्थ की निर्णायिका थी। उसका निर्णय था कि शंकर विजयी हैं उसके पति मंडन मिश्र तर्क में शंकर से पराजित हैं।

  आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी अबोट जिसे यह ब्लागर तनय अवधूत भरत सरीखा शासक समझता है जिसका उद्देश्य सत्य, अहिंसा आधारित विश्व निर्माण है नटराज की कांस्य मूर्ति भारत आगयी है, उसे भारतीय घटक राज्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री महोदय के माध्यम से वहीं पुनर्स्थापित किया जाये जहां से मूर्ति गुम हुई थी। भारत के प्रधानमंत्री इस देश की बाईस मुख्य भाषाओं का प्रयोग करने वाले लोगों के हितार्थ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से अनुरोध करें कि वे तमिलभाषी भारतीयों की आकांक्षा को शीर्ष में पहुंचाने के लिये भारतीय संघ राज्य से तमिल में ही पत्र व्यवहार शुरू करें। विविध कारण विद्यमान हैं जिनके कारण वे नागरी व संस्कृत भाषा का विरोध करते हैं। भारत में ज्यादा लोगों द्वारा समझी व बोली जाने वाली हिन्दी के प्रति भी विरोध का डंका बजता रहता है इसलिये उन्हें राय दी जानी चाहिये कि संघ सरकार से तमिल में पत्र व्यवहार करें तथा भारत सरकार को सुझाव देें कि सिंगापुर की शहर सरकार जिसकी एक राजभाषा तमिल भी है, भारत व तमिलनाडु सिंगापुर सरकार से तमिल भाषा में पत्राचार करने का संकल्प लें। भारत सरकार की संविधान अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओें में उर्दू, नेपाली, बांग्ला तीन ऐसी भाषायें हैं जिनमें भारत सरकार का विदेश मंत्रालय पाकिस्तान, नेपाल व बांग्ला देश के साथ कूटनीतिक व राजनयिक संबंध सुधार के लिये सिंगापुर से तमिल में, नेपाल से नेपाली में व बांग्ला देश से बंगाली भाषा में पत्राचार शुरू कर एक नयी पहल भारतीय विदेश नीति में लायी जा सकती है। यह सब सोच विचार कर शुरू करने से पहले भारतीय भाषाओं का पर्यायवाची शब्द सागर जिसे अंग्रेजीदां दुनियां के भारतीय भाषा - Encyclopedia of Indica forum of Twenty Two principle Indian Languages के रूप में सवंर्धित कर सी-सैट में होरही भाषाकरण त्रुटियों से राहत का रास्ता खोजा जाये। भारतीय भाषाओं में भारत का राजकाज तात्कालिक महत्त्व का प्रश्न है। भाषा ही वह यक्ष प्रश्न है जिसके समाधान की तात्कालिक जरूरत है। जिन भारतीयों की चाहत की भाषा अंग्रेजी है उन्हें भारतीय भाषाओं के अंग्रेजी रूपांतरण एवं भाषांतरण उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्त्व भी भाषांतरण आयोग द्वारा संपन्न हो।           

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