Monday, 13 October 2014

पुरजोर बदलाव का मोदी मन्त्र
अनड्वान चौक

  पब्लिक पॉलिसी रिसर्च दिल्ली के प्रमुख तथा इंडियन ऐक्सप्रेस अखबार के Cotributor Editor जिसे हिन्दुस्तानियत के पारंपरिक नजरिये से ‘योगद संपादक’ की संज्ञा देना ज्यादा सटीक प्रतीत होता है प्रताप भानु मेहता ने अपने संपादकीय पन्ने के अग्रलेख का शीर्षक - A New Bully Pulpit  दिया है। उनका कथन है कि Bully Pulpit शब्द समुच्चय थिओडोर रूजवेल्ट के दिमाग की उपज है। उन्होंने परिवर्तन की वकालत करने के लिये जिस प्लेटफार्म की संकल्पना की उसे हिन्दुस्तानियत के नजरिये से चौक कहना ज्यादा युक्तिसंगत है। Bully Pulpit में दो शब्द हैं, Bully अनड्वान, वृषभ, सांड, बैल पर्यायों वाला गाय के जवान बछड़े को बैल कहते हैं। इसलिये हिन्दुस्तान के संदर्भ में Bully Pulpit को अनड्वान चौक कहना तात्कालिक सही दृष्टिकोण मानते हैं। चतुषष्ठि कला विद्याविद् आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति पुरोधा चौंसठ वर्षीय नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की ऊर्जा को देख कर थिओडोर रूजवेल्ट की डेमोक्रेट राजनीति संस्थान के वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति अत्यंत प्रभावित हुए हैं। हिन्दुस्तान के राजनीतिक पुरोधाओं सहित राजनीतिक रणनीति व्याख्याकारों, सत्ता के गलियारे में भारत की वित्तधानी मुंबई के दलाल स्ट्रीट के दलाल महानुभावों व राजनीतिक दलाली पारंगत मीडिया विशेषज्ञों समेत दिल्ली का समूचा राजनीतिक दलाली से अपनी रोटी सेकने वाला विशिष्ट व्यक्तित्त्वों के आगे पीछे घूमने वाले महानुभाव असमंजस की मानसिकता में जी रहे हैं। उन्हें नरेन्द्र मोदी की कोई कमजोर नस हाथ नहीं आरही है। वे पिछले सौ दिनों में नरेन्द्र मोदी की कोई दुखती रग नहीं खोज पाये हैं। इंडिया टुडे के प्रमुख संपादक अरूण पुरी का कहना है पिछले चार महीनों से नयी दिल्ली दरबार नहीं सज पाया है। इस ब्लागर ने पांच हजार एक सौ पचीस वर्ष पहले युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ को शक्रप्रस्थ का पहला दरबार बताने की कोशिश की है। दिल्ली का इतिहास पांच हजार डेढ़ सौ वर्ष पुराना तो है ही चलिये देखिये कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने कहा - वयम् सर्वे गमिष्यामो यत्र गता युधिष्ठिरः। युधिष्ठिर सुयोधन से जुआ हारने के पश्चात बारह वर्ष के वनवास व एक वर्ष अज्ञात वास के लिये रवाना होरहे थे। कुरू राजधानी हस्तिनापुर के आबाल वृद्ध युधिष्ठिर पर लट्टू थे। युधिष्ठिर जुआ हारे हुए जुआरी थे पर उनके लिये हस्तिनापुर का हर व्यक्ति रो रहा था। उन सरीखा राजा उन्हें अब कहां मिलेगा। 
हिन्दुस्तान की साहित्यिकता का पहला दर्पण प्राचेतस वाल्मीकि जिन्हें लोग आदिकवि वाल्मीकि भी कहते हैं उनकी काव्यात्मकता व्याख्याता है - वाल्मीकि के रामायण के नायक दाशरथि राम और खलनायक पुलस्त्य ऋषि के पौत्र विश्रवा के द्वितीय पुत्र एवं निधिपति कुबेर के पहले अनुज दशग्रीव हैं। दशग्रीव को तब के लोग रावण नाम से इसलिये पुकारते थे क्योंकि रावण की हंसी सुनते ही लोगों में कंपकंपी आजाती थी। वह रावण देवाधिदेव कैलासपति भगवान शंकर का अनन्य भक्त था। भक्ति तभी तरूणी रहती है जब उसके बेटे ज्ञान और वैराग्य भी तरूण हों। भगवान शंकर के वाहन नंदी जो शंकर के प्रिय गण भी थे, रावण की अपनी शंका थी कि नंदी ने उसे अभिशप्त कर डाला है। नंदी जीवात्मा के रूप में बैल ही था। हिन्दुस्तान के लोग वृषभ को धर्म-धारण शक्ति का प्रतीक मानते हैं। धर्म रूपी वृषभ के तप शौच व दया तीन पाये लंगड़ा गये हैं। इस धर्म वृषभ का केवल एक पाया सत्य रह गया है, धर्म का प्रतीक वृषभ आज विकलांग हो चुका है। इस वृषभ की विकलांगता को नियंत्रित कैसे किया जाये यह आज के युग का यक्ष प्रश्न है।
  धर्मम् वृवीषि धर्मज्ञः धर्मोऽसि वृष रूप धक्।
भारतीय परंपरा का वह धर्म वृषभ - जिसे सामान्य हिन्दुस्तानी काशी का सांड़ भी कहता है उसे पहचानने की नरेन्द्र मोदी ने भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्र धर्म के अनुपालन के जरिये उपलब्ध की है। इसलिये सोशल मीडिया सहित नारद गोत्रीय सभी अखबारनवीस और खबर्ची समुदाय नरेन्द्र मोदी की कदमताल का पूर्वानुमान नहीं लगा पारहा है।
भारतीय राजनीतिक चिंतन पोखर में सटीक व व्यावहारिक राजनीतिक रणनीति को अंजाम देने वाले व्यक्तियों में दैत्याचार्य उशना भार्गव पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान के पहले असुर सम्राट हिरण्यकश्यप की पुरोहिताई करने के बावजूद हिरण्यकश्यप के जानी दुश्मन महाविष्णु की महत्ता का पूरा-पूरा अनुशीलन किया। शुक्राचार्य में वह कला विद्यमान थी जिसके सहारे अक्रूर वसुदेव के अनन्य हितैषी मित्र होने के साथ-साथ कंस सरीखे बाल हत्यारे राष्ट्रपाल का भी विश्वास अर्जक व्यक्ति थे। राजनीति में अक्रूर सरीखे व्यक्ति ही ऊँचाई तक पहुंचते हैं। संभवतः प्रताप भानु मेहता उसी भूमि के भूमिपुत्र हैं जहां के दशधा भक्ति प्रवर्तक नरसी मेहता ने द्वारकाधीश रणछोड़ जी महाराज के पास हुण्डी भेजी उस हुण्डी को रणछोड़ जी महाराज ने अक्रूर के जरिये सकारा। नरसी मेहता कोई रहस्य नहीं ऐतिहासिक वास्तविकता के प्रतीक हैं। ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे’’ पराई पीड़ से पिघलने वाले व्यक्तित्त्वों में आधुनिक भारत में नरेन्द्र मोदी का अपना अलग स्थान सुनिश्चित हो चुका है। नरेन्द्र मोदी सीधे संवाद के पक्षधर हैं और उन्हें आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति की परख है इसलिये प्रताप भानु मेहता सहित आधुनिक भारत को मैकाले के चश्मे से देखने वाले व्यक्तित्त्व के स्वामी समाज को नरेन्द्र मोदी के अगले कदम का पूर्वाभास नहीं हो पारहा है। इसी राज निपुणता में हिन्दुस्तान का पारंपरिक रहस्य छिपा हुआ है जिसका सटीक अनुमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। कम्यूनिकेशन को हम संवाद की सामूहिकता के पटरे में बिठा सकते हैं। वस्तुतः संवाद तो दो व्यक्तियों में ही हो तभी उसकी सार्थकता है। ज्योंही संवाद शैली दो से अधिक व्यक्तियों तक पहुंचती है वह एकदम नया आकार ले लेता है। जिस सामाजिक संवाद को कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के पंद्रहवें अध्याय के आठवें श्लोक में कहा -
धन्येयमद्यधरणी तृण वीरूपस्त्वत् पादस्पृशो प्रभुत्वता करगाभिमृष्टाः।
नद्यो द्रयः खग मृगा सदयाव लोके गोप्योत्तरेण भुजयो रयि मत् स्पृहा श्रीः।।
नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने नये भारत के उत्कर्ष के लिये जो रास्ता चुना है वह संवाद शैली की ऐसी विशिष्ट स्थिति है जिसमें केवल मनुष्य(नर-नारी) ही नहीं धरती उस पर उगायी गयी घास फूस तिनके पौधे बड़े-बड़े पेड़ लतायें ही नहीं नदी पहाड़ पक्षी तथा वन्य पशु कृष्ण एक एक आह्वान पर यमुना तीरे वृन्दावन में आत्मविभोर होगये। प्रताप भानु मेहता लिखते हैं - Social change has been in recent times largely reogenous and accidental. A large amount of change, not fully understood has been the shift in media and form cultural representations. Their effect on a range of things unleashing new forms of desire creating new norms and some times powering them have been profound. नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के इलहाम में मन की अंतर्चेतना का भाव है जो वे ध्वन्यात्मक वस्तु आकर्षक शब्द शक्ति के द्वारा अपने श्रोताओं को हृदयंगम करा रहे हैं। इस ब्लागर की धारणा बनी है कि हिन्दुस्तान का चिंतन पोखर जो अंग्रेजी उपन्यासों के उदाहरण और पारंपरिक हिन्दुस्तानी नजरिये उदाहरणों लोककथाओं तथा हिन्दुुस्तान की गीताई उक्ति ’यजन्ते सात्त्विका देवान यक्ष रक्षांसि राजसा प्रेतभूतगणांश्चैव यजंते तामसा जनाः।’ यजन यज्ञ करना आराधना करना अथवा प्रार्थना करना मनुष्य लोक जिसे भगवद्गीता ‘‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके’’ कह कर व्यक्त करती है। सत्, रज और तम तीनों गुणों के गुणी अपने-अपने तरीके से परिवर्तन की कामना करते हैं। नरेन्द्र मोदी जिस आन्वीक्षिकी षडविद्या राजनीति का प्रयोग कर रहे हैं मोहनदास करमचन्द गांधी ने इंडियन ओपिनियन के जरिये हिन्दुस्तान की राजनीतिक आजादी व अपनी आध्यात्मिक ‘स्वराज’ की परिकल्पना आज से एक सौ आठ वर्ष पहले अपनी मातृभाषा के जरिये दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले गुजराती व्यापारियों के माध्यम से अफ्रीका में रह रहे हिन्दुस्तानियों में वैचारिक सड़ांध को आने से रोका था। तब भारत के जो नवयुवा बर्तानियां में अराजक तरीकों से हिन्द की आजादी की मशाल जलाये हुए थे उन्हें गांधी ने ध्यान से सुना और हिन्द स्वराज के जरिये कृष्णार्जुन संवाद सरीखा नये हिन्दुस्तान के निर्माण का अधिपति वाचक संवाद रचा। गांधी के समकालीनों और कालांतर में अपने आपको गांधी का अनुयायी बताने वाले आजादी के जंग-जवानों ने भी हिन्द स्वराज की अवहेलना ही की। आज नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जो कह रहे हैं वह उनकी अंतरात्मा की आवाज है। गांधी की तरह वे गृहस्थ करने के बावजूद परिवादवादी नहीं हैं। वे भारत के हित चिंतन के लिये समर्पित हैं और वे जो कह रहे हैं उसे समझने के लिये भारत के आधुनिक अंग्रेजीदां चिंतन पोखर को स्वामी दयानंद सरस्वती के तार्किक स्तर पर पहुंचना होगा। विवेकानंद ने जगद्गुरू शंकराचार्य के जिस अद्वैतवाद को आज से बाईस सौ वर्ष पहले पश्चिमी सभ्यता के मूल बिन्दु ईसा मसीह से चार सौ वर्ष पहले वेदांत की जो व्याख्या की आसेतु हिमालय घूम-घूम कर अद्वैत की अलख जगायी उस अद्वैत के स्वामी विवेकानंद ने तैत्तरीय उपनिषद का सहारा लेकर तीतर और आदमी के बीच नया पुल निर्मित किया। विश्व धर्म संसद में भारत की धर्म धारणा को मजहबी चौखट से ऊँचा उठा कर अंतरिक्ष में पहुुंचाया। यहां पर सदाचार का एक उदाहरण देना समीचीन इसलिये है कि राजा बलदेव दास बिड़ला जब साठ वर्ष के हुए उन्होंने अपना कारोबार अपने बेटों को सौंपते हुए काशी वास करना अपना जीवन लक्ष्य तय किया। उन्होंने अपने बेटों से एक ही बात चाही - मथुरा में जहां   कृष्ण जन्मस्थान है अभी तक मस्जिद बनी है मस्जिद के बगल में भव्य कृष्ण मंदिर बनाओ और उसमें आप्तवाक्य उकेरो - वह आप्तवाक्य सदाचार निर्णय की शीर्ष स्थिति है।
यावत् भ्रियेत जठरम् तावत्स्वत्वम् हि देहिनाम् अधिकम योऽभिमन्यते सः स्तेनो दण्डमर्हति। 
अर्थात पेट की जरूरत से ज्यादा खाने वाला व्यक्ति चोर है अतएव दण्ड पात्र है। हिन्दुस्तान की गरीबी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने बहुत करीब से देखी है। उनके विरोधी लाख कहें कि मोदी Crony Capitalism संवर्धक हैं, भारत वासियों का अहोभाग्य है कि इस धरती में नरेन्द्र मोदी सरीखा राजनेता उभरा है। वह इस मुल्क को उसका पुराना वैभव दिलाना चाहता है। हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को चिरगांव झांसी में जन्मे राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की भारत-भारती बहुत भाती थी। मैथिली शरण गुप्त ने लिखा था - ’हम कौन थे ? क्या होगये ? और क्या होंगे अभी आओ मिलकर सब विचारें ये समस्याऐं सभी।’ आइये अनड्वान चौक पर एकत्रित होकर नरेन्द्र मोदी के कथन को अपने आचरण में उतारने का भगीरथ प्रयास में योगदान दीजिये ताकि विविध बाधाओं के बावजूद आने वाले दस वर्षों में भारत की तस्वीर बदली जा सके। नरेन्द्र मोदी जिस राष्ट्र निर्माण यज्ञ के अधिष्ठाता हैं उसमें एक भारतीय नागरिक के रूप में हर हिन्दुस्तानी को अपनी आहुति देने के लिये तैयार रहना चाहिये तथा भारत राष्ट्र राज्य के गांव-गांव व हर शहर में अनड्वान चौक जिसे थिओडोर रूजवेल्ट ने परिवर्तन का प्लेटफार्म माना उसका नाम हम भारत में अनड्वान चौक रखें जहां से समग्र परिवर्तन व संपूर्ण क्रांति तथा नये भारत के निर्माण का उद्घोष निरंतर होता रहे। 

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