Monday, 29 September 2014

महाकाव्य रामायण - महाभारत कालीन भौगोलिक यथार्थ 

दूसरा चरण महाभारत कालीन भूगोल

          पंचम वेद के नाम से जाना जाने वाला भारतीय वाङ्मय महाकाव्य रचयिता तथा लिपिबद्धकर्त्ता पराशर सत्यवती नंदन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास और जगतः पितरो वन्दे पार्वती परमेश्वरौ नंदन गणपति के बीच हुए समझौता कि लेखक की कलम रूकेगी नहीं, सत्यवती नंदन की यह शर्त्त कि जो लिखा जारहा है लेखक को उसकी बोधगम्यता भी हो, दोनों युगपुरूषों ने जो समझौता किया उसका अनुपालन दोनों ने शालीनतापूर्वक संपन्न किया। भारतीय वाङ्मय में संभवतः महाभारत पहला महाकाव्य है जिसे लिपिबद्ध किया गया है। आधुनिक भारत निर्माता समाज में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्त्व गीताप्रेस गोरखपुर के जरिये भारतीय वाङ्मय को श्रेयस बनाने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार हैं। सोलह कलाओं के अवतार योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के समय संबंध के बारे में हनुमान प्रसाद पोद्दार की सम्मति में श्रीकृष्ण आज से ५२३९ वर्ष पूर्व सिंह राशि में जब सूर्य विचरण कर रहे थे, भाद्रपदी बुधवार अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्म हुआ। श्रीकृष्ण १२५ वर्ष तक इस धरा धाम में रहे और उनकी अवतारी जीवन लीला प्रभास-पाटन वर्तमान गुजरात राज्य के कच्छ के रण में बहेलिये द्वारा श्रीकृष्ण के पांव को हिरण का मुख समझने से बाण चलाने से हुई। बहेलिया जब अपने शिकार को देखने पहुंचा, उसके होश उड़ गये। बाण लगने से घायल योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे ढाढ़स देकर कहा - वत्स! तुमने मेरा आकांक्षित कार्य किया है, स्वधामगमन हेतु मुझे कुछ बहाना तो चाहिये ही था तुम तो केवल निमित्तात्मक हो। द्वारका जाकर वहां शेष रहे बंधुबांधवों को मेरी स्थिति बताओ और उनसे कहो - आज से सातवें दिन द्वारका में जलप्लावन हो जायेगा इसलिये सारे यदुवंशी अर्जुन के साथ मथुरा को लौट जायें। 
  रामानन्द सागर ने रामायण की रामकथा व रामायण महाकाव्य के पात्रों का सजीव चित्रण कर भारतीय दूरदर्शन के माध्यम से रामायण सीरियल का सूत्रपात कर हिन्दुस्तान के पारम्परिक समाज हिन्दुस्तानियत के अलावा दूसरी आस्थाओं के श्रद्धालु समाजों को भी रामानन्द सागर की अद्भुति दृश्य-श्रव्य सामर्थ्य ने एक नया समेकित सांस्कृतिकता को उभार दिया। हिन्दुस्तान के अलावा संसार के दूसरे भागों में रहने वाले समाजों को भी रामानन्द सागर के रामकथा की ओर आकर्षित किया। संस्कृत भाषा में कहा गया है- 
 यावद् गंगा कुरूक्षेत्रे, यावत् चंद्रदिवाकरौ। यावत् रामकथा लोके तावद् जीवति बालकः।
          किसी बच्चे की दीर्घायु कामना के लिये गंगा-कुरूक्षेत्र, अंतरिक्ष में सूर्य व चंद्रमा तथा लोक में रामकथा जब तक प्रसादित हैं बालक दीर्घायु हो। रामानन्द सागर के रामायण तथा बलराज चोपड़ा के महाभारत सीरियल हिन्दुस्तान की संयुक्त राष्ट्र शक्ति को जाग्रत कर मानवीय संबंधों को जिन व्यावहारिक मर्यादाओं के चौखट में प्रस्तुत किया रामायण महाभारत कालीन भारत की सामाजिकता सामने आयी। इस जाग्रति ने भारत जिसे जम्बू द्वीप का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र ब्रह्मावर्त का मूूल देश जिसे आज भारतीय लोग बिठूर कहते हैं आर्यावर्त हिन्दुस्तान व इण्डिया नामों से पहचाना जाता है। उसकी मानवीय शकल-सूरत का आइना इन दो दूरदर्शन सीरियलों ने आकर्षक रूप से प्रस्तुत किया। रामायण में आदिकवि वाल्मीकि द्वारा गूंथी गयी रामकथा माला का काल निर्धारण आधुनिक भारतीय पाश्चात्य विधा से प्रभावित महानुभाव प्राग ऐतिहासिक कहते हैं। उनकी सम्मति में इतिहास का श्रीगणेश ईसामसीह जिसे भारतीय वाङ्मय ख्रीस्त संज्ञा देता है ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के प्रादुर्भाव से ही गिनता है परन्तु रामायण काल की गणना भारतीय ज्योतिष शास्त्र-काल गणनानुसार वर्तमान मन्वन्तर, वैवस्वत मन्वन्तर, वाराह कल्प का चौदह मनुओं के कालखंड का सातवां मन्वन्तर माना जाता है जिसके सत्ताईस महायुग याने चारों युगों के समुच्चय बीत चुके हैं। अठाईसवें चतुर्यगी के तीन चरण सत्य, त्रेता और द्वापर बीत चुके हैं तथा चतुर्थ चरण कलियुग के सूर्य चन्द्र सहस्त्रामित ५१३० वर्ष बीत चुके हैं। ज्योत्सर कुरूक्षेत्र के रणांगण में योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने जिन्हें हिन्दुस्तान के लोग पार्थसारथी भी कहते हैं उन्होंने अपने पितृष्वसेय कौंतेय अर्जुन से कहा -
इमं विवस्वते योगम् प्रोक्तवानहमव्ययम्, विवस्वान मनवे प्राह मनुरिक्षाकवे वृषीत्।
 एवं परम्परा प्राप्तम् इमन्, राजषेयो विदुः।  
          श्रीकृष्ण ने कहा था योगशास्त्र का यह महान योग। श्रीकृष्ण ने पूर्व काल में विवस्वान मनु को कहा, मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। ये इक्ष्वाकु सूर्यवंशी राजा थे एवं इन्हीं के खानदान में इक्ष्वाकु से पंद्रहवीं पीढ़ी में दाशरथि राम का जन्म हुआ, तब सूर्य मीन राशिस्थ थे। शुक्ल पक्ष था व तिथि नवमी थी जिसे हिन्दुस्तानी रामनौमी के रूप में राम-जन्म मनाते हैं। वैयाकरण पाणिनि का कथन है - येषाम् योगिनः रमन्ते सः रामः सैव दाशरथि रामः। राम के समय तत्कालीन भारतीय भूगोल को समझने की जरूरत है। उसी तरह महाभारत कालीन भारतीय भूगोल विशेष तौर पर इन्द्रप्रस्थ में कुरूराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का दिल्ली का पहला राजदरबार वर्तमान श्रीकृष्ण संवत् 5239 तथा वर्तमान में की जारही कलियुग गणनारंभ पांच हजार एक सौ पचास वर्ष के मध्य 89 वर्षों में किसी एक वर्ष हुआ लगता है। दिल्ली के पहले राजदरबार की कालगणना का निर्धारण किया जा सकता है। काल निर्धारण से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बिन्दु कुरूराज युधिष्ठिर के लोकपाल समान शक्तिशाली चार भाइयों ने राजसूय यज्ञ के लिये तत्कालीन जम्बू द्वीप के विभिन्न नरेशों कर वसूली का राज्य युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ को अत्यंत प्रभावशाली सुव्यवस्थित समारोह का आकार दिया। 
          उत्तर कुरू उत्तरवर्ती सभी हिमालयी राजपुरूषों से कुरूराज युधिष्ठिर को राजसूय संपन्न करने के लिये कर तथा भेेंट प्रस्तुत की गयी थी। आज के स्वतंत्र भारतवर्ष में हिमालय और हिमालय के पर्यावरण तथा विश्वचर्चित आबोहवा में व्यापक परिवर्तनकारी बदलाव का संत्रास व्याप्त है। पहले यह पता लगाना जरूरी लगता है कि कौंतेय अर्जुन अपने अग्रज कुरूराज युधिष्ठिर के महत्त्वपूर्ण समारोह के लिये वित्त प्रबंधन के लिये किन-किन राजाओं के पास जाकर उनसे कर व भेंट प्राप्त किये। हिमालय क्षेत्र पूर्व में इलावर्त क्षेत्र - वर्तमान में म्यांमार में इरावती नदी उद्गम क्षेत्र से धुर पश्चिम में वर्तमान अफगानिस्तान जिसे संस्कृत वाङ्मय उपगंधर्व स्थान कहता है उनकी भौगोलिक स्थिति का सटीक आकलन किया जाना समय की मूर्त आवश्यकता है। रामायण व महाभारत सीरियलों ने जो सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का माहौल भारत में बनाया उसे स्थायित्त्व देने के लिये भारत सरकार को रामायण कालीन भारत के जनपदीय भूगोल की समीक्षा इसलिये की जानी जरूरी है कि रामायण काल में जो क्षेत्र थे, जो नदियां और पर्वत थे तथा जो राज्य रामायण काल में विद्यमान थे, संस्कृत प्राकृत पाली के अलावा जो तद्भव भाषायें भारत के तत्कालीन लोग बोलते थे, विभिन्न क्षेत्रों में जो लिपियां प्रयुक्त होती रहीं उनके प्रामाणिक साक्ष्यों सहित ब्राह्मी व खरोष्ट्री लिपियों में उत्कीर्ण शिलालेखों सहित संस्कृत साहित्य के महान कवि व नाट्यकार कालिदास द्वारा रचित अपने नाटकों में विद्वान दीक्षित वैयाकरणज्ञ से संस्कृत भाषा में संवाद कराया वहीं अदीक्षित व्याकरण रहित पुरूष या स्त्री से प्राकृत संवाद कराया है। अतएव रामायण काल को सटीक रूप से समझने के लिये संस्कृत-प्राकृत-पाली के समानांतर भारतीय तद्भव भाषाओं विशेष तौर पर राम वनवास मार्ग के इलाकों की भाषा संबंधी गवेषणा भी जरूरी है। इसलिये रामायण कालीन भारतीय भूगोल व रामायण कालीन राज्यों जनपदों क्षेत्रों तथा रामायण कालीन तीर्थों का ज्ञान आवश्यक है। भारत सरकार को चाहिये कि सेतुबंध रामेश्वर में स्थित ऐडम्स ब्रिज के निर्माण संबंधी मसलों सहित सभी संबद्ध विषयों पर आत्यंतिकी अनुसंधान का निर्णय लिया जाये। 

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