उत्तराखण्डी जमीनी बंदोबस्त सम्बन्धी
निर्णायक बिन्दु
उत्तराखंडी जमीन की भार सहने की क्षमता का आकलन कौन करे ? दिल्ली से धारचूला, बांसबगड़, पिथौरागढ़, गंगोलीहाट, धरमघर, अल्मोड़ा, रानीखेत के अलावा गैरसैंण, गोपेश्वर के लिये उत्तराखंड परिवहन निगम की बसें दौड़ती हैं। उत्तराखंड परिवहन निगम इसकी स्थापना अवधि से ही निरंतर हानि वाला उपक्रम है। इसकी भीमकाय बसों के अलावा भारी भरकम टूरिस्ट बसें भी उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों की सड़कों में दौड़ती रहती हैं। इस ब्लागर की मुलाकात नैनीताल में पहले पहल नियुक्त रोड ट्रांसपोर्ट अथारिटी रहे श्री जे.पी. चन्द्रा से एक समाज सेवी संगठन कल्याणम् करोति के प्रशासकीय मंडल में हुआ करती। वे कहते - जिन्दगी में ईमानदारी, कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता का सबक उन्होंने नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी रहे पूरन चंद्र पांडे से सीखी। सादा जीवन, उच्च विचार तथा कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता उन्हें अपनी राज सेवा जिन्दगी के शुरूआती वर्षों में नैनीताल में मिली। श्री चंद्रा उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के पश्चात् उन्होंने अपनी दिनचर्या को चन्द्रभानु गुप्त के द्वारा स्थापित समाज सेवा कार्यों से संयोजित किया। पूरन चंद्र पांडे के इस आदर्श का अनुसरण किया कि सेवानिवृत्ति के बाद रहने के लिये निजी मकान नहीं बनाना। उनकी नौकरी के शुरूआत की दैनंदिन कर्त्तव्यों में वाहनों के रजिस्ट्रेशन पड़ताल, रोड ट्रांसपोर्ट कानून का अनुपालन कर रहे हैं इसकी निरंतर पड़ताल वाहन स्वीकृत मात्रा से ज्यादा वजन व स्वीकृत संख्या से ज्यादा यात्री नहीं ढो रहे हैं इसका अनुश्रवण। सरकारी अधिकारी आबकारी व परिवहन विभागों से संबद्ध होकर अपने कपड़ों पर भ्रष्टाचार का धब्बा न लगने पाये यह श्री चंद्रा का जीवन लक्ष्य था। जे.पी. चंद्रा का जीवन यापन का तरीका स्पृहणीय है। उन्होंने जिस प्रशासनिक अधिकारी के मातहत नौकरी शुरू की वे अल्मोड़ा के मूल निवासी थे। उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक एवं राजनीतिक हलकों में उन्हें समादर दिया जाता रहा। उ.प्र. लोक सेवा आयोग अध्यक्ष भी रहे। भारत की आजादी से पहले कुमांऊँ में काठगोदाम से लेकर गरूड़ तक एक ही मोटर सड़क थी। नैनीताल, अल्मोड़ा सहित वर्तमान में पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत जनपदों का क्षेत्रफल 17430 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 200 किलोमीटर मोटर मार्ग था। आज उत्तराखंड में हरिद्वार सहित 13 जनपदों में सड़कों की लम्बाई 29,939 किलोमीटर है। राज्य में रेल परिवहन रूड़की से देहरादून ऋषिकेश काशीपुर रामनगर रूद्रपुर से काठगोदाम किच्छा से काठगोदाम तक खटीमा से टनकपुर व गढ़वाल क्षेत्र में रेल यातायात सेवा कोटद्वार को छूती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जहां एक ओर मोटर सड़क निर्माण में आशातीत वृद्धि हुई सड़क के निर्धारित मानकों पर न तो योजनाकारों ने ध्यान दिया न सड़क निर्माण पुल निर्माण तकनीकी विषेशज्ञों ने अंगद का पांव जमाया नतीजा सामने है उत्तराखंड की सर्वाधिक दुखती रगें इसकी सड़कें हैं। अनियंत्रित यातायात सड़कों में मानक भार क्षमता से ज्यादा भार वाले वाहन दौड़ाना, विकास की अंधी दौड़ में यह भूल जाना कि इलाका पहाड़ी है डाइनामाइट का अंधाधुंध प्रयोग पहाड़ों की जड़ों को हिला रहा है। इस पर बारीक राजनीतिक व प्रशासनिक तथा तकनीकी ध्यान दिया ही नहीं जा सका। मनोरंजन पर्यटन व धार्मिक चार धाम यात्रा को विवेकहीनता से संचालित करने, समूचे गढ़वाल हिमालय को देहरादून की घाटीनुमा सुविधा समझने के कारण जून 2013 की भयावह त्रासदी से उत्तराखंड उबर नहीं पाया है। डाइनामाइट का अविवेक संगत प्रयोग सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों पर नियंत्रण न रहना, क्षमता से ज्यादा तीर्थयात्रियों को केदारनाथ सरीखे हिमालयी ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिये ऋषिकेश, रूद्रप्रयाग, सोनप्रयाग गौरीकुंड से आगे जाने देना, चारधाम यात्रा करने वाले महानुभावों का धन बल प्रदर्शन तथा तीर्थ यात्रा में स्वेच्छाचारिता की घुसपैठ जिनके कारण त्रासद जलप्लावन हुआ असंख्य लोग बह गये, मर गये, बह गये अथवा मर गये व्यक्तियों की वास्तविक संख्या तभी ज्ञात हो सकती थी जब तीर्थ यात्रियों की गिनती हरिद्वार ऋषिकेश अथवा रूद्रप्रयाग में की गयी होती। यह तो बीती बातें हैं उन्हें बिसार देना ही ज्यादा लाभप्रद है। अनुभव की गयी त्रासद आपदा से भविष्य में किस प्रकार बचने के रक्षात्मक उपाय किये जायें। आवश्यकता इस बात की है कि जिला स्तर की संपर्क सड़कें वे मोटर रोड हों या पैदल सड़क उन्हें जिला पंचायत को सौंपा जाये। जिला पंचायतों को वे सभी अधिकार फिर वापस दिये जायें जो अंग्रेजी राज में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड को थे। अल्मोड़ा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन अनेक वर्षों तक अल्मोड़ा के ख्यातिप्राप्त वकील श्री शोबन सिंह जीना रहे उन्होंने अपनी ऐजुकेशन बोर्ड चेयरमैनी के दर्मियान 1960 से पूर्व अस्तित्त्व वाले अल्मोड़ा जिले के सभी लोअर प्राइमरी, अपर प्राइमरी तथा मिडिल स्कूलों का लगातार मुआयना किया। वे अध्यापकों व ग्रामवासियों के बीच एक प्रतिष्ठित शिक्षण प्रबंधन के रूप में पहचान रखते थे। वे कुमांऊँ राजपूत अखबार चलाते थे। अखबार के संपादक रहे शेर सिंह हीत बिश्ट ने काम करना छोड़ दिया, उनके सहयोगी गोविन्द सिंह बिष्ट वकील ने इस ब्लागर से कहा - क्या तुम जीना साहब का अखबार नहीं चला सकते ? यह ब्लागर टीचर था, जीना साहब का अखबार अल्मोड़ा रहते तक चलाया। संपादक जीना साहब थे, अखबार यह ब्लागर चलाता था। वैसे यह ब्लागर रानीखेत से छपने वाले जयदत्त वैला के अखबार साप्ताहिक प्रजाबंधु के लिये छद्म नाम से लिखता रहता था। जीना साहब जब रामनरेश यादव मंत्रिमंडल में हिल डेवलपमेंट मिनिस्टर हुए उन्होंने इस ब्लागर को कहा - उन्हें हिल डेवलपमेंट का सही रोडमैप चाहिये। उत्तर प्रदेश में हिल डेवलपमेंट मिनिस्ट्री का श्रीगणेश चंद्रभानु गुप्त ने किया था। जब उ.प्र. की बागडोर पर्वतपुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा के हाथ आयी उन्होंने देहरादून विकास को प्राथमिकता दी। उनके पश्चात विकास पुरूष कहे जाने वाले श्री नारायण दत्त तिवारी ने केवल नैनीताल की तराई का ही विकास किया। आज भी ऊधम सिंह नगर, देहरादून व हरिद्वार ही उत्तराखंड के विकसित क्षेत्र हैं। उ.प्र. का हिस्सा रहते हुए भी दिवंगत ब्रह्म दत्त शर्मा तथा आक्टेजेनेरियन नारायण दत्त तिवारी की दृष्टि केवल देहरादून घाटी व नैनीताल की तराई पर थी। सिडकुल में तीस हजार करोड़ रूपये का विनिवेश हुआ है। उत्तराखंड का भाग तय होजाने के कारण राजनीतिक व आर्थिक सामर्थ्य इन तीन जिलों में सिमट गयी है। संख्या की दृष्टि से इन तीन जिलों की आबादी पौने चौवन लाख है। यदि इसमें हल्द्वानी, रामनगर इलाकों की मैदानी जनसंख्या भी जोड़ दी जाये तो राजनीतिक सत्ताग्राही 60 लाख लोग उत्तराखंड के मैदानी हिस्सों में रहते हैं जहां का कुल क्षेत्रफल मात्र साढ़े आठ हजार वर्ग किलोमीटर याने उत्तराखंड के कुल क्षेत्रफल का लगभग सातवां भाग है।
उत्तराखंड की दुखती रगों को छूना एक राजनीतिक उत्साह का कारक है। जहां जहां सड़कें बनी हैं, सड़कों के किनारे लोक निर्माण विभाग के नाम जो जमीनें हैं उनमें सड़कों के किनारे रह रहे लोगों का अतिक्रमण है। एकदम सड़क से सट कर मकान बनाये गये हैं। सरकार ने स्वजल योजना के तहत सड़क के किनारे जगह जगह हैंड पंप लगाये हैं। इन हैंड पंपों ने भूमिगत जल को सोख डाला है। सड़क के किनारों की जमीन पर अंदरूनी खोखलापन आने से भी सड़कें धंस रही हैं। सड़कों के किनारे जो शौचालय और स्नानघर बनाये गये हैं जो सेफ्टी टैंक शौचालय से जोड़े गये हैं वे सभी सड़कों के साथ प्राकृतिक दुश्मनी निभा रहे हैं। एक मामूली उदाहरण है गुलाब घाटी में काठगोदाम-रानीबाग के बीच सड़क का वह भाग जो हर बरसात में दरकता रहता है क्योंकि इस सड़क में जमीन की भार सहने की क्षमता से ज्यादा वजनदार वाहन चल रहे हैं यातायात रातदिन चालू है। जे.पी. चंद्रा ने बताया कि नैनीताल के जिलाधिकारी के सख्त अनुशासन के कारण काठगोदाम पुल से नैनीताल अल्मोड़ा की ओर शाम साढ़े सात बजे के बाद गाड़ियां नहीं चल पाती थीं। गाड़ियों के वजन का परीक्षण होता रहता था। आज यह सब इतिहास की बातें हो गयी हैं। पहाड़ की सड़कों में दिनरात गाड़ियां दौड़ रही हैं। प्राकृतिक जलस्त्रोत सूख रहे हैं नदियों में कचरे के अलावा निर्मित मकानों का अवशिष्ट मलवा, सड़क निर्माण में उपयोग की डाइनामाइट से उखड़े पत्थर यत्र तत्र सड़क मलवा उठाने में जेसीबी मशीन का प्रयोग सड़कों में कलमठ नाली निर्माण प्रक्रिया को तिलांजली दिया जाना। जनता जनार्दन की मांग पर प्रधानमंत्री ग्राम संपर्क सड़क निर्माण के लिये अनियंत्रित सड़क खुदाई ये सब ऐसे प्रसंग हैं जिन पर विचार करने की तात्कालिक जरूरत है। राज्य सरकार प्रदेश के हजारों घट-घराट जिनमें काफी घट-घराट गांव संजायत हैं उनका जीर्णोद्धार करने हेतु ग्राम सभाओं को प्रेरित करें। प्रत्येक घराट को जीर्णोद्धारित कर उनसे 6 से 8 किलोवाट बिजली निर्माण उस बिजली से रज्जुमार्ग निर्माण का कार्य जिला पंचायतों को सौंपे जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ग्राम संपर्क सड़क निर्माण में सड़क के साथ साथ रज्जुमार्ग निर्माण का प्रावधान करने हेतु राज्य सरकार भारत सरकार से अनुरोध करे। यदि बजट व्यवस्था नहीं है तो मनरेगा से निर्माण कार्य करने हेतु घराट जीर्णोद्धार घराट में टर्बाइन फिट कर विद्युत उत्पादन करने का उपक्रम भी विचारित किया जाये। जिस High Power Uttarakhand Land Settlement and Land
Development Enquiry Commission का सुझाव इस ब्लागर ने दिया है सड़कों की दुर्दशा को पैदा करने वाले जो कारण हैं उनकी समीक्षा तथा निदान के उपाय भी उच्चसत्ताक आयोग की सूची में जुड़ें। अस्सीसाला बंदोबस्त में संकल्पित - गौचर पनघट के हक-हकूक जिनके लिये कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे ने उत्तरायणी 14 जनवरी 1921 को बागनाथ के मन्दिर में सरयू-गोमती का जल हाथ में लेकर नौ हजार ग्राम प्रधानों थोकदारों से अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया उसे स्मरण कर उत्तराखंड का नवोदय संकल्पित हो तथा गांव गांव तक पानी पहुँचाने की जिम्मेदारी समुचित व्यवस्था के साथ ग्राम सभा को ही मिले।
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