Monday, 15 September 2014

उत्तराखण्डी सदानीरा जाह्नवी भगिनिता


  बलिया निवासी राजा राम सिंह का तकिया कलाम था ‘‘औषधम् जाह्नवी तोयम् वैद्यो नारायणो हरिः’’ अर्थात गंगाजल औषध है। भागीरथी गंगा के अनेक नामों में एक नाम जाह्नवी भी है। कुमांऊँ में एक पहाड़ी टीले का नाम हाट-कालिक है। आजकल उत्तराखंडी लोग हाट कालिक को गंगोलीहाट कहते हैं। अल्मोड़ा से पैदल गंगोलीहाट होते हुए पिथौरागढ़ तक का 52 मील का पैदल यात्रा को लेकर एक कहावत कुमइयां में है - ‘‘रोल गौं की सोलह धार कां हाट कां बाजार’’। यहां कालिका का मशहूर मंदिर है जिसका कीलन आदि शंकराचार्य ने किया था। कोलकाता की दक्षिणेश्वर की कालीबाड़ी की भांति गंगोलीहाट की काली मंदिर का महत्त्व है। इस मंदिर से करीब सवा फर्लांग दूर एक सदानीरा बावड़ी है जिसे स्थानीय लोग ‘‘जाह्नवी नौला’’ कह कर पुकारते हैं। इस नौले के जल में वे सभी गुण विद्यमान हैं जिनके लिये गंगाजल की अपनी खास पहचान है। इस मंदिर के रावल स्थानीय रावल गांव के रावल क्षत्रिय हैं तथा पूजा-अर्चना करने वाले पुरोहित अगरौन गांव के ब्राह्मण - पंत और जोशी लोग।
  गोमुख से गंगा सागर तक गंगा के सतत जल प्रवाह पर गंगा के दांये व बांये दोनों तटों पर रिहायशी मकान बने हैं, टनों कचरा गंगा में नित बहता जारहा है। जल प्रदूूषण से परहेज करने वाले भारत के पर्यावरणविद संकल्प तो करते आरहे हैं कि वे जल-प्रदूषण से छुटकारा चाहते हैं। इस ब्लागर ने राजा राम सिंह का जिक्र इसलिये किया क्योंकि हिन्दुस्तान की आजादी की उपलब्धि की मुहिम में पूर्ववर्ती संयुक्त प्रांत अवध व आगरा जिसे आजादी के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश कह कर पुकारा जाने लगा इस राज्य के दो जिले अल्मोड़ा और बलिया आजादी के दीवानों की रिहायशें  थीं। इन दोनों जिलों से हजारों हजार स्वतंत्रता सेनानी देश के लिये कुर्बानी करने आगे आये। राजा राम संत विनोबा के अनुयायी सर्वोदयी थे जो मनसा, वाचा, कर्मणा लोक हितैषी कार्य करते रहते, सदा खुश रहते जब कभी मुलाकात होती - औषधम् जाह्नवी तोयम् ही कहते। पुराने अल्मोड़ा जनपद, मौजूदा पिथौरागढ़ में गंगोलीहाट का जंधवी नौले का जल, शैल गुफा में गंगा जल का कलकल गंगोलीहाट से बेरीनाग की ओर जाने वाली मोटर सड़क की दाईं ओर जाड़पाणी नामक गांव है वहां के जल में भी गंगाजल के गुण विद्यमान हैं। हिमालय से उद्गम होने वाली नदियों काली जिसे नैपाल के लोग महाकाली कह कर पुकारते हैं, धौली, गोरी, रामगंगा, सरयू और पिंडर हिमालय से निकलने वाली नदियों में अलखनंदा, मंदाकिनी, नंदाकिनी, भागीरथी और यमुना हैं, ये सभी पहाड़ी इलाकों में गंगा कहलाती हैं। नदी पर्वत कन्या है, बहती रहती है, नदी का प्रवाहमान जल - बहता हुआ पानी हिन्दुस्तानी सभ्यता में अपनी महत्ता रखता है। सदानीरा नदी का जल वाला भाग नदी का बिना जल वाला क्षेत्र जो पहाड़ में बगड़ भी कहलाता है तथा नदी जब बरसात में पूरे वेग में रहती है वहां तक उसका बाढ़ का पानी पहुंचता है वह नदी का रेहड़ है। महाभारत महाकाव्य में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद यक्ष प्रश्न कहलाता है। यक्ष ने युधिष्ठिर सरीखे धर्मात्मा स्थिर बुद्धि - युद्ध में भी धैर्य रखने वाले अजातशत्रु व्यक्तित्त्व के धनी महानायक से महत्त्वपूर्ण यक्ष प्रश्न किया - का च वार्ता किमाश्चर्यम् कः पन्था कश्च मोदते ब्रूहि मे चतुरः प्रश्नान् मृता जीवन्तु बान्धवा - मेरे चार सवालों के सही जवाब दो तो तुम्हारे मृत भाइयों को मैं जिन्दा कर दूँ। युधिष्ठिर ने जो जवाब यक्ष को दिया यक्ष ने खुश होकर कहा - मैं तुम्हारे एक भाई को जिन्दा कर दूँ बोलो किसे जिन्दा करूँ। युधिष्ठिर ने कहा - नकुल को जिन्दा कर दो। युधिष्ठिर का न्यायपूर्ण तर्क यह था कि कुंती का एक बेटा जिन्दा है न्याय यही कहता है कि माद्री का भी एक बेटा जिन्दा हो। युधिष्ठिर टस से मस नहीं हुआ, उसने अपनी बात को पूरी ताकत से कहा - इस प्रकरण में एक सवाल उठता है - पिवस्व - हरस्व पानी पियो भी जल-हरण भी करो। पाश्चात्य सभ्यता में रम गये हम हिन्दुस्तानी लोग जल का दुरूपयोग कर रहे हैं यही आज का यक्ष प्रश्न है।
  भागीरथी नदी ने उत्तरकाशी में जहां जलप्रवाह अत्यंत ढालू जमीन न होने से मन्द गति से होता है वहां नदी के गर्भ तक अतिक्रमण का कुप्रयास उत्तराखंड के लोग वर्ष 2012 में देख चुके थे। भागीरथी ने अतिक्रमणकर्त्ताओं को जो हानि कराई उससे न तो अतिक्रमणकर्त्ता समूह ने कोई सबक सीखा न उत्तराखंड की तत्कालीन सरकार के कान में जूं रेंगी। 2013 में उत्तराखंड भयावह जलप्लावन के समय उत्तरकाशी में फिर भागीरथी ने अतिक्रमणकारियों को सावधान होने के जलप्लावन वाले वरूण-संदेश दिये। नदी का बगड़ क्षेत्र, नदी के बरसाती-बाढ़ पहुंचने तक के किनारे - नदी के दोनों तटों में बगड़-बरसाती बाढ़ भूमि जो सामान्य वर्षा के समय प्रति वर्ष नदी आच्छादित होती रहती है जरूरत इस बात की है कि नदी-बगड़ की भूमि का कितना हिस्सा नदी क्षेत्र माना जाये। प्रत्येक सदानीरा नदी का गर्भ क्षेत्र-बगड़ क्षेत्र सामान्य बाढ़ क्षेत्र की जमीन नदी का स्वामित्त्व माना जाये। इसलिये High Power Uttarakhand Land Settlement and Land Development Enquiry Commission प्रत्येक सदानीरा नदी का प्रभाव क्षेत्र तय करने के लिये Empowered Sub-Working groups for the fixation of River belts  का गठन करने हेतु High Power Uttarakhand Land Settlement and Land Development Enquiry Commission Terms and Conditions निश्चित किये जाने चाहिये। नीति विशारद आचार्य चाणक्य ने कहा - नदी तीरे च ये वृक्षा नदी के किनारे के वृक्ष सुरक्षित नहीं होते उसी तरह नदी भूमि क्षेत्र में किया गया निर्माण कार्य भी विलोम परिणाम दे सकता है। ब्रह्मवैवर्त, शिव, स्कन्द, कूर्म, वाराह, मार्कण्डेय तथा वामन पुराणों में मानसखंड तथा केदारखंड के पर्वतों, नदियों, देवस्थलों, स्नानस्थलों तथा यक्ष-किन्नर, गंधर्व, दानव, दैत्य, राक्षस, पिशाच व प्रेत संबंधी जो आख्यान हैं स्थानीय जनों की जो आस्थायें हैं प्रामाणिक संदर्भ मिलने तथा मिस्टर एटकिंसन ने अपने कुमांऊँ गजेटियर में पंडित नैन सिंह के सहयोग से जो अनुसंधान किये उनका भी समावेश High Power Uttarakhand Land Settlement and Land Development Enquiry Commission के परीक्षण के लिये संदर्भित किया जाना उचित है। 

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