महाकाव्य रामायण&महाभारत कालीन भौगोलिक यथार्थ
पहला चरण रामायणकालीन भूगोल
सेतुबंध रामेश्वरम के जिस अर्द्ध जलप्लावित सेतु को अंग्रेजों के अभियंत्रण समाज ने ऐडम्स ब्रिज कहा जिसे भारत के पारम्परिक लोग सेतुबंध अथवा रामसेतु कहते हैं। आदि कवि वाल्मीकि ने युद्धकांड के बाईसवें सर्ग में समुद्र से रामचन्द्र को भी कहलाया -
अयम् सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मणः, पित्रादत्तवरः श्रीमान् प्रीतिमान विश्वकर्मणः।
एष सेतुं महोत्साह करोतु मपि वानरः, तमहम् धारयिष्यामि यथा हवेष पिता तथा।।
नल ने राम से कहा - अहम् सेतुम करिष्यामि विस्तीर्णे मकरालये पितुः सामर्थ्य मासादृय तत्वमाह महोदधिः।
आगे नल ने राम से कहा - मेरे पिता विश्वकर्मा ने मेरी माता को यह वरदान दिया था कि देवी तुम्हारे गर्भ से मेरेे समान तेजस्वी पुत्र होगा। नल ने राम को बताया कि वह विश्वकर्मा का औरस पुत्र है। विश्वकर्मा के समान वास्तुकार दानव समाज में मय नाम का दानव था जिसने वृषपर्वा के लिये मंदरांचल हिमालय में एक अद्वितीय भवन निर्माण किया। मय ने वहां बलशाली गदा तथा देवदत्त नामक शंख रखा था। जब खाण्डवप्रस्थ जल रहा था तब मय की प्राण रक्षा अर्जुन ने की थी बदले में मय दानव जो विश्वकर्मा सरीखा ही वास्तुकार था उसने इंद्रप्रस्थ में श्रीकृष्ण के सुझाव के अनुसार युधिष्ठिर सभागृह का निर्माण किया जहां भारत का पहला दिल्ली दरबार राजसूय यज्ञ के तौर पर लगा। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले दिल्ली में जो सरकार थी वह ऐडम्स ब्रिज या रामसेतु तोड़ना चाहती थी ताकि कालग्नार एम. करूणानिधि का सेतु समुद्रम जलयान मार्ग बन कर वो वाहवाही लूट सके कि उन्होंने नयी परियोजना से नया मार्ग प्रशस्त किया। नितिन गडकरी जहाजरानी मंत्री केन्द्र सरकार का कहना है कि रामसेतु या ऐडम्स ब्रिज तोड़ने का कोई सवाल ही नहीें। यह तो आस्था का सवाल है। वाल्मीकि ने रामायण में यह कह कर कि नल विश्वकर्मा का बेटा था अभियंत्रण उसके डी.एन.ए. का हिस्सा था। उन्होंने RITES द्वारा सुझाये गये वैकल्पिक प्रायोजना को केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विचारार्थ स्वीकृति हेतु प्रस्तुत करने की भी घोषणा की थी। नितिन गडकरी ने लोकसभा में घोषणा की थी कि उनका मंत्रालय रामसेतु को बिना नुकसान पहुंचाये वैकल्पिक व्यवस्था का पक्षधर है। जरूरत इस बात की है कि वाल्मीकि रामायण के अलावा भारत में जितनी भी रामकथायें विद्यमान हैं परम्परागत हिन्दुस्तानी यह मानता है कि ‘‘यावत् रामकथा लोके यावत् चन्द्र दिवाकरो यावत् तिष्ठति मेदिनी’’ ये तीनों समानार्थी हैं। रामसेेतु संबंधी जो विविध आख्यान तथा सेतुबंध में उपलब्ध सेतु के होने की अवधारणा को संपुष्ट करने वाली जो स्थितियां हैं। राम से पहले का भारतीय समाज तत्कालीन राजनीतिक अवधारणा एवं सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकार जानने के लिये रामायण सीरियल में रामानंद सागर ने जो भारतीय सामाजिकता का कालचित्रण किया है उसका ऐतिहासिक व राजनीतिक भूगोल हर भारतवासी जाने। यह जरूरी है कि जिन अंग्रेज इंजीनियरों ने रामसेतु को ऐडम्स ब्रिज कहा जिन्हें सेतु पर राम-लक्ष्मण के धनुर्धारी स्वरूप की झलक भी मिली यह सारा प्रसंग दण्डकारण्य, सप्तगोदावरी, कृष्णा, कावेरी तथा किष्किंधा सहित तत्कालीन भारतीय नृवंश संबंधी ब्यौरे भी पहचानने कीे जरूरत है। डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार दस वर्ष से इस प्रयास में थी कि ऐडम्स ब्रिज को तोड़ कर बडे़ जहाजों के लिये रामेश्वरम् से उपयोगी जलयान मार्ग प्रशस्त हो संकल्प अधूरा छूट गया। कालग्नार एम. करूणानिधि अपने को Atheist कहते हिन्दुस्तानी संदर्भ में जो आस्तिक नहीं है वह उसे वेदनिंदक या अनीश्वरवादी कहा जाता है। जिस द्रविड़ भूमि से कालग्नार करूणा आते हैं वह भूमि भक्ति की भूमि है। कबीर ने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। कबीर से करीबन साढ़े चार हजार वर्ष पहले कृष्ण द्वैपायन ने पद्मपुराण में लिखा - भक्ति व नारद का संवाद एवं भक्ति ने नारद से कहा -
अहम् भक्तिरिति ख्याता इमौमे तनयौ मतौ, ज्ञान वैराग्य नामानौ कालयोगेन जर्जरौ।
उत्पन्ना द्रविड़े साहम् वृद्धिं कर्णाटके गता, क्वचिन्-क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता।।
भक्ति ने नारद को बताया कि उसे लोग भक्ति नाम से पुकारते हैं। ज्ञान व वैराग्य उसके दो बेटे हैं। वह जन्मी थी द्रविड़ में बचपन कर्णाटक में बीता महाराष्ट्र में भक्ति पुष्ट होगयी याने महाराष्ट्र ने भक्ति की प्रौढ़ता देखी गुजरात आयी तो वृद्ध होगयी। कबीर की सधुक्कड़ी समूचे भारत में समझी जाती थी या कहिये कि सधुक्कड़ी ही समूचे हिन्दुस्तान में इस्लाम व ईसाईयत के आने से पहले linguafranca थी। स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी ने इसी सधुक्कड़ी के जरिये भारत का वेदांत समझा और हिन्दुस्तान के जन-जन में जो आत्मीयता उन्हें दिखी उसका भरपूर लाभ भारत आज उठा रहा है। भारतीय वाङ्मय में रामायण-महाभारत महाकाव्यों का जो प्रभाव है, जिसे दृश्य-श्रव्य साधन द्वारा रामानंद सागर व बलराज चोपड़ा ने सीरियल के द्वारा दुनियां के सामने रखा है। रामायणकालीन तथा महाभारत भारती ऐतिहासिक भूगोल को भारत व विश्व के इंडोलाजी समझने वाले लोगों के संज्ञान में भारतीय पौराणिक इतिहास की परतें खोलना इसलिये जरूरी होगया है कि यूरोप के छद्म इंडोलाजी विद्वानों और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की जो कोहरे सरीखी व्याख्या की है तथा सत्य को निरंतर छिपाने का जो भगीरथ प्रयास किया है उसे रोक कर भारत के भूतकाल का यथातथ्य इतिहास हिन्दुस्तान का अंग्रेजीदां समाज समझे भारतीयता को पहचानने के लिये अंग्रेजी का सहारा लेने के बजाय भारतीय लोक वाङ्मय का सहारा ले। इसलिये भारत की वर्तमान 22 लोकभाषाओं के साहित्य के अलावा प्राकृत पाली तथा अर्ध मागधी सहित तद्भव भाषाओं में जो ग्रामीण साहित्य भारत में फैला हुआ है उसे समझ कर हिन्दुस्तान की असलियत दुनियां के सामने लाने की तात्कालिक जरूरत है। ग्रेट ब्रिटेन तथा सोवियत संघ क्यों बिखरे ? मजहबी एकता के बावजूद आयरलैंड ने इंग्लैंड से नाता क्यों तोड़ा ? कभी इंग्लैंड जो यूनाइटेड किंगडम कहलाता था क्या स्काटलैंड के स्वतंत्र हो जाने के पश्चात भी ग्रेट ब्रिटेन बना रह सकता है? भारत की एकता राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक मूल्यों पर टिकी है। सेतुबंध रामेश्वरम् का निवासी कैलास मानसरोवर का सपना संजोये रहता है। कर्णाटक का समाज आज भी पशुपतिनाथ से अपना वास्ता समझता है। केरल के नंबूदिरी ही बदरीविशाल के रावल होते हैं। भारत के कोने-कोने की बसासत हर बारहवें वर्ष इलाहाबाद के कुंभ में मिलती है। भारत की यह एकता मजहबी और भाषायी न होकर सांस्कृतिक एकता है जिसे पश्चिमी दुनियां हिन्दू कह कर पुकारती है वह धर्म या मजहब नहीं एक जीवनशैली है। भारत की इस जीवनशैली को मजहब के चौखट में कैद नहीं किया जा सकता, पारम्परिक हिन्दुस्तानी लोग पुनर्जन्म पर यकीन करते हैं उनका जीवन दर्शन कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके का गीता आदर्श है। इसलिये दक्षिण के ऐडम्स ब्रिज व उत्तर के पहले दिल्ली दरबार युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ को केन्द्र बिन्दु मानते हुए भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की खोज तात्कालिक आवश्यकता है। भारत में इस्लाम मजहब को मानने वाले लोगों की संख्या भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत है। इस्लाम मतावलंबी सबसे ज्यादा इंडोनेशिया में हैं। भारत मुसलमान जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा बड़ा देश है। भारत में मजहबी समरसता की जड़ें जुम्मे की नमाज में हैं। इस्लाम मतावलंबी शुक्रवार को जुम्मा कहते हैं। संस्कृत साहित्य में शुक्राचार्य का एक नाम और्व हैै। भारतीय वाङ्मय अरब या अरेबिया को संस्कृत में और्व कहता है। महाभारत तथा भागवत महापुराण में और्वोपाख्यान, और्वोपदिष्ट मार्ग तथा और्वोपदिष्ट योग तीन ऐसे समुच्चय हैं जिनके गवेषणापूर्ण अध्ययन की तात्कालिक जरूरत है। महात्मा गांधी ने जिस हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात निरंतर अपने कार्यक्रम का हिस्सा बना कर रखी वह धर्म और अहिंसा से जन्मे शांति मार्ग का अहिंसा-राजमार्ग है। अहिंसा को संसार के परिवर्तन चक्र का पहिया बनाने की जरूरत आज ज्यादा बढ़ गयी है इसलिये रामायण कालीन भारत तथा महाभारत कालीन भारत की ऐतिहासिक छवि निखारना युगधर्म सरीखा राष्ट्रधर्म है।
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