बहुभाषी भारतीय वाङ्मय डिजिटल बोध
कुकुरमुत्ते अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले हिन्दुस्तानी अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों के छात्र-छात्राओं की अंग्रेजी पारंगति कितनी है ? क्या वह हिन्दुस्तानी विद्यार्थी जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है अंग्रेजी साहित्य के मर्म को हृदयंगम कर सकता है ? या तोता रटन्त जिन्दगी जीने के लिये अभिशप्त है। हिन्दी दिवस संबंधी योगेन्द्र यादव की पीड़ा समझने लायक है। वे मूलतः हिन्दी भाषी हैं। अखबारनवीस शेखर गुप्ता की तरह उनकी पढ़ाई लिखाई सोचने की भाषा हिन्दी है अंग्रेजी नहीं। वे अंग्रेजी लिखते, बोलते, व्याख्यायित करते हैं पर उनके दिल की पहुंच वाली भाषा केवल हिन्दी है इसलिये उनके इस कथन में पर्याप्त अनुकूल तर्क है कि राजभाषा दिवस नहीं भारतीय भाषा दिवस मनाओ। 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान परिषद ने भारत की केन्द्रीय सरकार की प्राथमिक भाषा नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को तय किया, अंक रोमन 1,2,3 तय किये। इजरायल की तरह हिन्दुस्तान के संविधान निर्माताओं ने लगभग मृत भाषा हिब्रू को इजरायल की राज काज की भाषा इजरायल सृजन के दिन से ही शुरू कर दिया। भारत के लोगों ने नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को 26 जनवरी 1950 से आगे आने वाले दस वर्ष में भारत की प्रशासनिक भाषा बनाने का निर्णय लिया। हिन्दी की एक कहावत है ‘काल करे सो आज कर आज करे सो अब, पल में परलय होयगी बहुरि करेगो कब’। हिन्दी के साथ यही घटना घटी है। हिन्दी अभी हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली दस राज्यों की विधान सम्मत राजकाज की भाषा है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार की राजकाज की अतिरिक्त भाषा उर्दू मान्य कर दी गयी है। उत्तर प्रदेश विधान सभा, प्रदेश के किसी भी कार्यालय में नागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा के समानांतर फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू को वही दर्जा रहेगा जो उत्तर प्रदेश में वर्तमान हिन्दी का है। जिस तरह कनाडा में अंग्रेजी व फ्रेंच, सिंगापुर में मंदारिन व तमिल दो भाषायें कारगर हैं उसी तरह उत्तर प्रदेश जिसकी आबादी बीस करोड़ से करीब है दुनियां के दस बड़े देशों में मुस्लिम जनसंख्या की दृष्टि से पहला स्थान हिन्देशिया का, दूसरा स्थान हिन्दुस्तान का है। हिन्दुस्तान में मुस्लिम जनसंख्या 17,61,90,000 वर्ष 2011 के जनसंख्या अनुमानों के अनुसार मानी गयी है। मजहबवार जनगणना में विश्व में सर्वाधिक ख्रिस्ती मतावलंबी जनसंख्या 2,17,31,80,000 है। इस्लाम धर्मावलंबी संख्या 59,85,10,000 है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम संख्या करीब चार करोड़ है। ये सभी उर्दू भाषी नहीं हैं। भाषायी संशयग्रस्तता तथा एक भाषा से दूसरी भाषा में सटीक भाषांतरण का अभाव तथा भाषायी वर्ण संकरता के कारण हिन्दुस्तान में अंग्रेजी भाषा का तात्त्विक वर्चस्व नहीं बढ़ रहा पर देश में हिंग्लिश के साथ ही अन्य भाषाओं जैसे तमिलिश, मलयालिश, मराठीलिश, गुजरालिश, पंजाबलिश आदि में भी इंग्लिश की संकरता का प्रभाव बढ़ ही रहा है और अंग्रेजी फैल ही रही है। देश के लोग न तो अपनी परम्परागत भाषा का सटीक अध्ययन कर पारहे हैं न ही अमेरिकी अथवा बर्तानी अंग्रेजी पर उनका भाषाधिकार सफल होरहा है। नतीजा साफ सामने है। भाषायी ऊहापोह में भारत की अपनी परम्परायें खात्मे की ओर हैं। पूरी-पूरी अंग्रेजियत में सरोबार हो जाना हिन्दुस्तानी समाज के अशिक्षित अर्धशिक्षित तथा भाषायी अनबूझ के कारण भारत में वह स्थितियां पैदा हो सकती हैं जो 100 वर्ष पूर्व आयरलैंड व आज स्काटलैंड में ग्रेट ब्रिटेन के नाम से जाने जाने वाले युनाइटेड किंगडम को झेलनी पड़ रही हैं। बारह करोड़ अंग्रेजी पढ़ने बोलने वाले लोगों में से हिन्दुस्तान में सत्तानवे प्रतिशत अंग्रेजीदां महानुभाव जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है पर जो अंग्रेजी लिखते हैं उनकी अंतर्मन की वास्तविक व व्यावहारिक चिंतन धारा अंग्रेजी से प्रभावित न होेकर उनकी मातृभाषा से प्रभावित है। वे सोचते अपनी मातृभाषा में हैं उसे अभिव्यक्ति अंग्रेजी के माध्यम से देते हैं। अंग्रेजी की पकड़ भारत में कितने लोगों तक है ताजा आंकड़े यह प्रदर्शित करते हैं कि देश के दस फीसदी लोग याने बारह-तेरह करोड़ लोग ही अंग्रेजी ज्ञानगंगा में डुबकी लगा रहे हैं पर अंग्रेजी में ही सोेच कर अंग्रेजी साहित्य सृजन करने वाले महानुभाव भारत में दायें हाथ की पांच अंगुलियों के उन्नीस निशानों से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। अंग्रेजी भाषा के द्वारा अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने वाले भारतीय मनीषियों में पंडित नेहरू अग्रणी थे। वे अंग्रेजी में ही सोचते थे व उसी में लिखते भी थे पर उनके नेतृत्त्व का शक्तिसंपात अवध के किसानों ने किया। उन्होंने डिस्कवरी आफ इंडिया लिखने के पश्चात अजमेर के हिन्दी सेवी - सस्ता साहित्य मंडल प्रणेता स्वतंत्रता सेनानी हरिभाऊ उपाध्याय से कहा - हरिभाऊ आप डिस्कवरी आफ इंडिया का हिन्दी अनुवाद कर दें। हरिभाऊ ने पंडित जी से कहा - पंडित जी यह मेरा सौभाग्य होगा कि मैं पंडित नेहरू की किताब को हिन्दी में उतारूँ। मुझे मंजूर है किन्तु मेरी भी एक शर्त्त है। शर्त्त यह है कि आपको मेरा किया हुआ अनुवाद पूरा पढ़ना होगा और उसकी भूमिका अपनी कलम से हिन्दी में ही लिखनी होगी। पंडित जी बोले - मुझे मंजूर है और पंडित नेहरू ने डिस्कवरी आफ इंडिया के हिन्दी संस्करण की भूमिका में लिखा - हरिभाऊ की भाषा व लेखनशैली मेरे मूल लेखनशैली से श्रेष्ठ है। मैं अत्यंत खुश हूँ कि भारत के हिन्दी भाषी पाठकों के लिये हरिभाऊ ने जो तौर तरीके अपनाये हैं वे मूल अंग्रेजी पुस्तक से बहुत ज्यादा आकर्षक हैं।
भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण हिन्दी में ही दिया। वाजपेयी भारतीय भाषा व्याख्यान देने में एक अद्वितीय व्यक्ति थे। उनसे पहले हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने वालों में डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, पुरूषोत्तम दास टंडन तथा डाक्टर राममनोहर लोहिया धाराप्रवाह भाषणकर्त्ता थे जिन्हें भारतीय हिन्दी समझने वाली जनता बहुुत पसंद करती थी। वाजपेयी के पश्चात हिन्दी में बिना किसी पर्चे, नोट या संदर्भ को सामने रखते हुए हिन्दी में भाषण देने की कला कोई नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से सीखे। अटल जी हिन्दी भाषी रहे हैं उनकी वक्तृत्त्वा जमीन से जुड़ी रही। मोदी जी की अपनी मातृभाषा गुर्जरगिरा है पर वे जिस तारतम्य से हिन्दी भाषण करते हैं वह अपने आप में अद्वितीय है। संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृत भाषाओं में अभी हिन्दी की पहुंच नहीं है। वहां जिन भाषाओं की गूंज है उनमें एशियाई भाषा मंदारिन मात्र है।
संयुक्त राष्ट्र ने कुछ वर्ष पहले यह तय किया कि महात्मा गांधी जन्मदिन 2 अक्टूबर विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जायेगा। विश्व अहिंसा दिवस की चर्चा तो होरही है इसी महीने 27 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भी राष्ट्र संघ को संबोधित किया। आस्ट्रलियाई प्रधानमंत्री श्री टोनी अबोट ने खोयी हुई नटराज कांस्य मूर्ति भारत के प्रधानमंत्री को पुनः सौंपी। नटराज कांस्य मूर्ति जो ताण्डव नृत्य की प्रतीक है जिस ताण्डव नृत्यावसान में शंकर डमरू नौ और पांच बार बजा तो उससे इक्यावन ध्वनियां निकलीं जिनके आधार पर भरत मुनि का ध्वन्यालोक अस्तित्त्व में आया। पाणिनी ने अपने व्याकरण के प्रारंभ में कहा - नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्। भारतीय वाङ्मय की 51 ध्वनियां ही गीर्वांग्वाणी सरस्वती का प्रतीक हैं। भारतीय संविधान की भाषा अनुसूची के मुताबिक असमी, बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, कश्मीरी, हिन्दी व संस्कृत ये चौदह हिन्दुस्तानी भाषायें संविधान निर्माताओं ने भाषायी अनुसूची में अंकित कीं। सिन्धी, कोंकणी, डोंगरी, मैथिली, बोडो, संथाली, भोजपुरी, नैपाली भाषायें जुड़ कर कुल भाषायी अनुसूची की वर्तमान भाषायी संख्या 32 है। हिन्दुस्तान की तात्कालिक भाषायी जरूरत संघात्मक भाषायी व्यवहार है। भारत संघ में जिन घटकों ने अपने-अपने विधान मंडलों द्वारा विधान मंडलों में प्रयुक्त होने वाली भाषा तथा राजकाज की भाषा तय किया है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्यों के मुख्यमंत्रियों का आह्वान करें कि यदि वे राज्य अपने राज्य की राजभाषा में भारत सरकार से पत्र व्यवहार करना चाहेंगे तो भारत सरकार उनका स्वागत करेगी और उन्हीं की भाषा में पत्र व्यवहार को प्राथमिकता देगी। तमिलनाडु के वे सभी दल जिन्हें हिन्दी नागरी व संस्कृत भाषा अनुकूल प्रतीत नहीं होती नटराज के डमरू का व डमरू से निकली हुई इक्यावन ध्वनियों का सम्मान करें। तमिलनाडु सरकार व भारत सरकार यह सुनिश्चित करें कि भारत भूमि में ताण्डवनृत्य तथा नृत्यावसान में शंकर जी के डमरू से नौ और पांच ध्वनियां कहां व कब निकलें। दुनियां की भाषा समस्या का निदान शंकर के डमरू में ही है। तमिलनाडु सरकार यह पहल करे कि भारत संघ के घटक के रूप में तमिल में पत्र व्यवहार करने का संविधान सम्मत निर्णय ले। भारत की भाषायी अराजकता को समाप्त करने की पहल करे।
देश के वे घटक राज्य जिनकी राजकाज की भाषा हिन्दी है, हिन्दी में संघ सरकार से पत्र व्यवहार करें पर पड़ौसी राज्यों से उन राज्यों की राजभाषाओं में पत्र व्यवहार करने की पहल हिन्दी भाषी राज्य करें ताकि अहिन्दी भाषा भाषियों को यह विश्वास हो कि हिन्दी उनकी भाषा को अपदस्थ करने का संकल्प नहीं ले रही है वरन् संघात्मक स्वरूप भाषायी दृष्टि से भी चाहती है। अभी भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रतियां केवल अंग्रेजी व हिन्दी में हैं। भारतीय संसद तथा संसदीय मंत्रालय यह निश्चय करे कि हिन्दी व अंग्रेजी के अलावा शेष इक्कीस भाषाओं में संविधान का भाषांतरण कर लोकसभा-राज्यसभा की संयुक्त बैठक इक्कीस भाषाओं में भाषान्तरित भारतीय संविधान की प्रामाणिकता सुनिश्चित करेगी। अत्यंत सुयोग प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री को उपलब्ध हुआ है। भारतीय संघ के राज्य घटक पश्चिम बंग, त्रिपुरा की राजभाषायें बांग्ला हैं। बांग्लाभाषी पड़ौसी देश बांग्ला देश की भाषा भी बांग्ला है। अतः भारत सरकार का विदेश विभाग बांग्ला देश से बांग्ला में तथा नेपाल से नेपाली भाषा में, पाकिस्तान से उर्दू में पत्राचार शुरू कर एक नयी वैदेशिक परम्परा शुरू कर सकते हैं। सार्क देशों को यह नया संदेश होगा।
भाषायी स्वराज स्थापित करने के लिये भारतीय संघ के घटकों की महत्त्वशील भाषाओं में संबंधित राज्यों से पत्राचार करने के पूर्व भारत सरकार के राजभाषा मंत्रालय को भाषांतरण मंत्रालय का दर्जा देकर सर्वप्रथम आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं व अंग्रेजी का संयुुक्त विश्लेषण इनसाईक्लोपीडिया ब्रिटानिका के तर्ज पर रचित करना होगा। नागरी सहित भारतीय लिपियों में 51 उच्चारण हैं। अंग्रेजी में उच्चारण संख्या केवल 26 है। इक्यावन खंडों में भारतीय पर्याय खोज कर भाषांतरण करने वाले लोगों को तैयार शुदा भाषांतरण शैली उपलब्ध करानी होगी। जिन लोगों की मातृभाषा अथवा चाहत भाषा अंग्रेजी है और यदि अंग्रेजी में उनकी भाषायी पारंगति प्रमाणित होती है तो उन्हें अंग्रेजी का प्रयोग अधिकार स्वातंत्र्य दिया जा सकता है। बशर्त्ते उनके अभिव्यक्त मतों से भाषायी अराजकता का नया अध्याय न खुले। आज की तात्कालिक पहली जरूरत भारत से भाषायी वर्ण संकरता व भाषायी बर्बरता का त्याग करना व उर्दू सहित पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयाली, उड़िया, बांग्ला, असमी व मइती लिपियों को राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल इंडिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा निर्धारित किया जाये। जननी व जन्मभूमि की एक अद्वितीय सेवा होगी यदि ट्वीट करने वाले या फेसबुक प्रयोगकर्त्ता भारतीय लिपियों व भारतीय भाषाओं का प्रयोग करें। राष्ट्र संघ में अन्य भाषाओं के समानांतर बराबरी का दर्जा देेने की मांग भी सामयिक होगी। आजादी से पहले संयुक्त प्रांत आगरा व अवध में नागरी लिपि व हिन्दी भाषा केवल रामायण का पारायण करने वाले लोग, स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले आज व संसार सरीखे अखबार, बाबूराव पराड़कर तथा कमलापति त्रिपाठी द्वारा लिखे जाने वाले फड़फड़ाती संपादकीय टिप्पणियों के अलावा उत्तर प्रदेश व हिन्दी का भाग्योदय डाक्टर संपूर्णानंद व प्रोफेसर वासुदेव सिंह सरीखे हिन्दी प्रेमी राजनेताओं ने किया था। यह सही है कि उर्दू या रेखता उ.प्र. की उपज है। भाषायी व्याकरण के नजरिये से देखा जाये तो हिन्दी और उर्दू में एक ही फर्क है वह है - हिन्दी की शब्द टकसाल संस्कृत है जब कि उर्दू शब्द टकसाल का खजाना फारसी है। हिन्दुस्तान की भाषायी समस्या का समाधान खोजने के लिये हमें तुलसीदास के रामचरित मानस व मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत महाकाव्य की शरण में ही जाना होगा। मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत की भाषा अवधी है लिपि फारसी है। वे अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखते हैं - विधना के मारग हैं ते ते, सरग नखत तन रोआं जे ते।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment