Saturday, 6 December 2014

   नेहरू साहित्य को सभी भारतीय भाषाओं में

  भारत सरकार के महिला बाल कल्याण मंत्रालय की मंत्री पंडित नेहरू की दौहित्र-वधू (धेवता पत्नी) हैं। बाल दिवस के रूप में पंडित नेहरू का जन्मदिन मनाया जाता रहा है। पंडित नेहरू ने जेल से अपनी पुत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा को जो पत्र अंग्रेजी में लिखे उनका हिन्दी अनुवाद सस्ता साहित्य मंडल ने ‘‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’’ से छापे। बच्चों में यह पुस्तक वितरित हुई। आज की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जरूरत यह है कि ‘‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’’ हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हो। महिला बाल कल्याण केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी जीव दया की प्रतीक हैं। बाल बालिका कल्याण उनका मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्त्व भी है। उन्होंने पंडित नेहरू का व्यक्तित्त्व अपनी बाल्यावस्था व किशोरावस्था में अवश्य देखा होगा। कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी नेहरू सवा शताब्दी एक राजनीतिक दल के माध्यम से मना रही हैं। वह उनका राजनीतिक चेतना विचार है पर व्यक्तित्त्व व विरासत के रूप में पंडित नेहरू को इंडियन नेशनल कांग्रेस के राजनीतिक घेरबाड़ में बांध देना न तो तर्कसंगत है और न ही बुद्धिगम्य। मेनका गांधी के महिला बाल कल्याण मंत्रालय को चाहिये कि महिला व बाल कल्याण क्षेत्र में वे 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' का प्रकाशन प्रत्येक भारतीय भाषा में करा कर प्रत्येक किशोरी बालिका को उपलब्ध कराने का मार्ग प्रशस्त करें ताकि बालिकाओं में वह सामर्थ्य व ऊर्जा सवंर्धित हो सके जो इंदिरा गांधी ने अपने जीवन में उपलब्ध की। नारी सामर्थ्य जागरण के समानांतर नर-नारी समूहों में नैतिक तथा चारित्रिक क्षेत्र में क्षमता संवर्धन हो। आज जो अफरातफरी पुरूष स्त्री संबंधों में व्याप्त है उसमें विवेक संवर्धन के समानांतर व्यवहार संस्कार संवर्धन का भी एक नया मार्ग प्रशस्त हो, अतः सबसे पहले पहली जरूरत प्रत्येक भारतीय भाषा में ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ उपलब्ध हो और संक्षेप में जवाहरलाल, कमला नेहरू के व्यक्तित्त्व का एवं पंडित नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू, माता स्वरूप रानी नेहरू उनकी दो बहनों विजय लक्ष्मी पंडित तथा इंद्रा हठी सिंह के बारे में पंडित मोतीलाल नेहरू के पारिवारिक जीवन तथा पंडित नेहरू के दाम्पत्य जीवन का संक्षिप्त परंतु आकर्षक वर्णन - पिता के पत्र पुत्री के नाम की भूमिका में भारत की किशोरी शक्ति के ज्ञानवर्धन के लिये प्रकाशित की जायें। पंडित नेहरू अब राष्ट्रीय संपदा हैं। उन्हें तथा उनके समकालीन व्यक्तित्त्वों को किसी भी राजनीतिक घेरबाड़ का बंदी नहीं बनाया जा सकता। वैसे भी आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के 14 सदस्यीय मंत्रिमंडल में जानमथाई, सरदार बलदेव सिंह, डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, षण्मुखम चेट्टी, भीमराव रामराव अंबेडकर तथा होमी भाभा छः गैर कांग्रेसी सदस्य थे। डाक्टर अंबेडकर को मंत्रिमंडल में सम्मिलित करने के लिये महात्मा गांधी ने ही पंडित नेहरू को प्रेरित किया था। इतिहासज्ञ रामचंद्र गुुह डिस्कवरी आफ इंडिया के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए लिखते हैं 'A moving accounts write in jail, of the country’s history and culture, very revealing of the author himself.' माधव खोसला ने पंडित नेहरू द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को संबोधित 1947-1963 के दर्मियान प्रेषित पत्र स्वाधीन भारत के निर्माण में पंडित नेहरू के स्वयं के योगदान तथा मुख्यमंत्रियों को संबोधित पत्रों का खुलासा सुशासन करने के इच्छुक राजनीतिज्ञों तथा प्रशासनिक अधिकारी वर्ग के लिये एक अनमोल निधि है। जरूरत इस बात की है कि पंडित नेहरू द्वारा लिखित पत्र, लेख तथा पुस्तकों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में किया जाये ताकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञ प्रशासक अपनी भाषा के जरिये पंडित नेहरू व उनकी कार्यशैली को समझें, हृदयंगम करें। Nehru – a contemporary a estimate by, waller craker “A crisp, concise assessment of an Authoration scholar diplomat who lived in Delhi in 1950’s* सर्वपल्ली गोपाल द्वारा लिखित Jawaharlal Nehru a biography “The standard and still unsurpassed life, based on unpresented access to Nehru’s paper” सर्वपल्ली गोपाल द्वारा लिखित  गोपाल कृष्ण गांधी (महात्मा गांधी के पौत्र) द्वारा लिखित नेहरू एवं A study of Nehru by Rafeeq Jakaria  पंडित नेहरू के जीवन काल में ही This collection of essays was published in his life time and was therefore valuable assessment of the man in real life time. It criticized the man sharply and frontally while acknowledging his unique impact on his times साम्यवादी नेता हीरेन मुखर्जी लिखित A gentle coloesus  के संबंध में इंडियन एक्सप्रेस के व्याख्याकार लिखते हैं Mukherji  was a political opponent of Nehru from India’s left, sparing no reason in Parliament or outside to upbraid his policies and programs and yet in the best tradition of democracy, he chooses to analyze the plusses and minuses of His adversaries and bitter sweets and sours of his political leadership with what Hiren babu  would not have liked being said of him: real “class”  रूद्रांशु मुखर्जी ने Nehru and Bose lives में व्यक्त किया Latest offering on the evolution of Nehru as a politician, contrasted to be parreled political carrier of Subhash Chandra Bose his closest intellectual collegue but perhaps his most distant political partner. नयनतारा सहगल पंडित नेहरू की भागिनेयी (बहन विजयलक्ष्मी पंडित की कन्या) लिखती है Jawaharlal Nehru civilizing a savage world to a particularly intimate portrait of Nehru’s conception of foreign policy as it is largely based on the correspondence  between him and his sister Vijaylaxmi Pandit  त्रिदिव सुहृद एक समाज विज्ञानी हैं वे जवाहरलाल के बारे में अभिव्यक्ति करते हुए लिखते हैं My recommendations would be to go back to Nehru’s and his selected writings. The reader would find there an exceptionally fine mind someone deeply concerned about the fate of India and its people, about democracy and the shape it could take. The place of India in its community of Nations. पंडित नेेहरू मंत्रिमंडल में सूचना व प्रसार मंत्री का पद काशी से सांसद रहे बालकृष्ण केशकर ने पर्याप्त लंबी अवधि तक संभाला। भारत सरकार के सूचना व प्रसार मंत्रालय ने गांधी साहित्य तथा आधुनिक भारत के निर्माता शीर्षक से उन पचास भारतीयों की जीवनी प्रकाशित की जिन्हें तत्कालीन समाज आधुनिक भारत के निर्माता श्रेणी में गिनता था। उन पचास भारतीय महापुरूषों में एक हनुमान प्रसाद पोद्दार की उच्च स्तरीय आध्यात्मिकता के प्रशंसक होने के साथ साथ उन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान प्रथम भारत रत्न घोषित करना चाहते थे। उनके व डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद तत्कालीन राष्ट्रपति में प्रश्नगत विषय में विचार विमर्श हुआ। स्वान्तः सुखाय गीताप्रेस संचालन करने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार ने प्रथम भारत रत्न की उपाधि स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। 
  नेहरू सवा शती समारोह भारत सरकार मना रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की सदारत में नेहरू सवा शती समारोह समिति अपना काम कर रही है। जरूरत इस बात की लगती है कि मोदी सरकार महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू सहित कलम के बाजीगरी से समाज निर्माण करने वाले एक सौ आठ भारतीय व्यक्तित्त्वों का चिह्नांकन करे। राष्ट्र निर्माता समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को राजनीति निरपेेक्ष रूप से स्थापित करने के लिये संत विनोबा भावे के सिद्धांत - पहले वे बिंदु लें जिनमें सहमति है। राष्ट्रीय सहमति का एक नक्शा बने जिसे अंग्रेजी भाषा में रोडमैप कहते हैं। भारतीय सामाजिकता के सरोकार को राष्ट्रीय महत्त्व का बिन्दु निश्चित करते हुए राजनीतिक मतान्तंरता को वैयक्तिक शत्रुता में न बदलने का राष्ट्रीय संकल्प लिया जाये। हिन्दुस्तानी रियासतेें भारत संघ का हिस्सा बनने के रास्ते में चल रही थीं। सरदार वल्लभभाई पटेल अपनी राजनीतिक प्रखरता से ज्यादा से ज्यादा रियासतों को भारत संघ का हिस्सा बनने के लिये मना चुके थे। जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह दुविधा में थे। वे कश्मीर को स्वतंत्र राज्य का स्तर रहे यह भी कल्पना कर रहे थे। वी.पी. मेनन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह को भारतीय संघ का घटक राज्य बनाने के लिये सरदार वल्लभभाई पटेल ने गुरूजी - सदाशिव राव माधव राव गोलवलकर का सहारा लिया। महाराजा हरी सिंह काशी वास करने वाले गुरू गोलवलकर जी के अनन्य उपासक थे। वी.पी. मेनन गुरू जी को लेकर श्रीनगर पहुंचे। महाराजा ने गुरूजी को हवाई अड्डे में ही साष्टांग प्रणाम किया। मेनन इस घटना से अभिभूत हुए। सरदार वल्लभभाई व्यक्तित्त्वों को पहचानने वाले मानव मानस के अध्येता थे। उन्हें पता था कि महाराजा हरी सिंह केवल गुरूजी के कहने पर ही भारत में सम्मिलित होने का निर्णय लेंगे। यह घटना इस बात की प्रतीक है कि मदनमोहन मालवीय जी के पश्चात यदि काशी का कोई व्यक्तित्त्व अंतरिक्ष की ऊंचाई पर पहुंचा तो वह गुरू सदाशिव राव माधव राव गोलवलकर थे। आज की भारत की तात्कालिक जरूरत सच्चाई को अपनाने की है। सत्य व अहिंसा का राजयोग ही भारत को एक बार फिर उस उच्च शिखर पर पहुंचा सकता है जिसका पैमाना - दाशरथि राम ने जननी जन्मभूतिश्च स्वर्गादपि गरीयसी कह कर दुनिया को दिखाया। जब राम वनवास जाने को उद्यत थे साकेत की जनता कह रही थी - 
वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथि यथा। 
बात अधूरी रह जायेगी यदि डिस्कवरी आफ इंडिया जिसे लिपिबद्ध करने में पंडित नेहरू को अवध के किसानों के समाज की दुर्दशा ने प्रेरित किया। वे अवध के गांव गांव घूमे। उन्होंने 1938 में शांतिलाल त्रिवेदी को अल्मोड़ा में कहा - शांतिलाल अस्कोट जाकर वहां के किसानों की दुर्दशा का आंखों देखा हाल मुझे बताओ। पंडित नेहरू ने अस्कोट के किसानों का दर्द नेशनल हेरल्ड में प्रकाशित किया। कालांतर में यही लेख - डिस्कवरी आफ इंडिया का महत्त्वपूर्ण पाठ - अस्कोट से चौकोट तक बना। पंडित नेहरू कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की तरह डिस्कवरी आफ इंडिया लिखने से संतुष्ट नहीं हुए। उनकी दिली इच्छा थी कि उनकी किताब हिन्दी में छपे। उन्होंने हिन्दी साहित्यकार हरिभाऊ उपाध्याय से कहा - हरिभाऊ मेरी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करो। उपाध्याय ने पंडित जी को कहा - यह मेरा सौभाग्य होगा कि मैं पंडित नेहरू की पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद करूं। पंडित जी मेरी एक शर्त्त है। आपको अनुवाद स्वयं पूरा पढ़ कर अपनी कलम से भूमिका लिखनी होगी। आज की जरूरत यह है कि भारत की खोज सभी भारतीय भाषाओं में प्रचारित हो। पंडित नेहरू ने हरिभाऊ उपाध्याय के परिश्रम की सराहना की और लिखा - हरिभाऊ ने मुझसे अच्छा लिखा है। नेहरू सवा शती के वर्ष में भारत की खोज का हिन्दी संस्करण भारत के हर पुस्तकालय में हो। भारत की खोज - देश की सभी भाषाओं में पंडित नेहरू लिखित प्राक्कथन सहित छपे। भारतीय भाषाओं में नेहरू साहित्य गोष्ठी साहित्य तथा दूसरे महत्त्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराने के लिये भारत सरकार का भारतीष भाषा मंत्रालय तथा भारतीय भाषा साझा कोश उसी तरह निर्मित करना होगा जिस तिरह इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका का प्रकाशन होता है।

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