नीलवर्णा गाय
नील गाय के गोमूत्र का राष्ट्रीय सदुपयोग पंचगव्य है
विजयराजे सिंधिया गो संवर्धन तथा गो सेवा की परम पक्षधर थीं। उन्हें प्राचीन भारतीय मर्यादाओं का भी तात्त्विक भान था। उनके यशस्वी पुत्र माधवराव सिंधिया अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से जुड़े हुए राजनीतिज्ञ थे जब कि स्वयं विजयराजे सिंधिया की राजनीतिक मान्यता जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रीयता के निकट थी। विजयराजे सिंधिया की कन्या वसुंधरा राजे सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की कुशल महिला नेत्री हैं। मारवाड़ी अखबार मालिक स्वनामधन्य रामनाथ गोयनका गो-सेवी भी थे एवं निरामिष होने के साथ साथ राजनीतिक पटल के स्वतंत्र चेता थे। उन्होंने अपने स्वामित्त्व के अखबार इंडियन ऐक्सप्रेस के जरिये अखबारी दुनियां में खोजपूर्ण अखबार नवीसी का सूत्रपात किया था। इंडियन ऐक्सप्रेस अखबार ने 20 दिसम्बर 14 के नयी दिल्ली संस्करण के पहले पृष्ठ में - नीलगाय में भी एक गाय है इसलिये बी.जे.पी. सकते में है। केन्द्र व राज्य दोनों जगह (There is a Gai in Nilgai so BJP in a fix both in
Central and State) शीर्षक से जय मजूमदार ने अखबार के पहले पेज के अंकुर (अंग्रेजी में उन्होंने ANCHOR शब्द सृष्टि की, भारतीय वाङ्मय उसे अंकुर मानता है) में वे कहते हैं - Culling
is allowed but it is on hold because no one wants to act.
इस सारे प्रकरण में अगर आप यजुर्वेद तक अपनी पहुंच करें तो समस्या के समाधान का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इस ब्लागर ने पंचगव्य व पंचामृत के सेहत-रक्षा वाले प्रकरण को हिन्दुस्तान की सवा सौ वर्ष से चल रही कानपुर गौशाला सोसाइटी के महामंत्री पुरूषोत्तम तोषणीवाल और मध्य प्रदेश में गो सेवा अग्रणी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को पंचगव्य व पंचामृत से इन्सान की सेहत रखवाली के रास्ते खोजने का अनुरोध किया। कानपुर गौशाला सोसाइटी का मत है कि वे अपनी हजारों गौओं का गोमूत्र पतंजलि ट्रस्ट को उपलब्ध कराते हैं जो पंचगव्य का निर्माण कर जन सामान्य को पंचगव्य उपलब्ध कराने में अग्रणी हैं। यजुर्वेद के विभिन्न मंत्रों अनुसार पंचगव्य निर्माण के बारे में जो विधि बतायी गयी है वह इस प्रकार है -
गोमूत्रम् गोमयम् क्षीरम् दधिः सर्पि कुशोदकम् निर्दिष्टम् पंचगव्यम् च पवित्रम् कायशोधनम्
मूत्रं तु नील वर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मृतम् पयश्च ताम्र वर्णाया श्वेताया दधि संस्मृतम्।।
कपिलाया घृतम् ग्राह्यम् महाव्याधि विनाशकम् मूत्रस्येक पलम् दद्यात तदर्धम् गोमयम् स्मृतम्
क्षीरम् सप्त पलम् दद्यात दधि त्रिपल मुच्यते आज्येक पलम् दद्यात पलमेकम् कुशोदकम्।।
अर्थात नील गाय का मूत्र दो हिस्सा, काले रंग वाली गाय का गोबर एक हिस्सा, तांबे(भूरे रंग) के रंग वाली गाय का दूध चौदह हिस्सा तथा सफेद रंग वाली गाय का दही छः हिस्सा, कपिला गाय का घी दो हिस्सा एवं कुशोदक दो हिस्सा। यह कुल मिला कर सत्ताईस नक्षत्रों के सत्ताईस हिस्से वाला पंचगव्य व्यक्ति के शरीर व निवास देह-गेह दोनों को सामर्थ्य देने वाला है। इसके लिये पहली जरूरत यह है कि देशी गायों चाहे वह गुजरात की हों, मारवाड़ी हों, हरयाणवी हों अथवा पंजाबी, कश्मीरी, हिमाचली, केदार खंडी या मानस खंडी, गंगा-यमुना के मैदान वाली, अंग, बंग, कलिंग, आंध्र, द्रविड़, कन्नड़, मराठी, केरली, असमी, नैपाली सभी गायों के गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी के रासायनिक परीक्षण कर उनकी गुणवत्ता के अनुसार पंचगव्य निर्माण के केन्द्र सुनिश्चित किये जायें। नील गाय जिसे यजुर्वेद नीलवर्णा गौ कहता है जहां जहां नील गायों के झुंड हैं उनको संरक्षण देकर उनके गोमूत्र की पड़ताल करने की तात्कालिक जरूरत है। राजस्थान की मुख्यमंत्री महोदया को रणथम्भौर के किसानों ने अपनी व्यथा सुनायी। नील गायें उनकी फसल बर्बाद कर देती हैं। सारे हिन्दुस्तान में नील गाय संबंधी यह सामाजिक कृषि समस्या विद्यमान है। इस समस्या का समाधान करने के लिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि नील गायों के गौ-घर वन विभाग के द्वारा सृजित किये जायें। उनके लिये बाड़े बनें जिससे वे किसानों की खेती चौपट न कर पायें। ये उपाय हों और उपाय उन्हें मारना नहीं उनका वैकल्पिक उपयोग करना है। इन गायों का गोमूत्र व गोबर परीक्षण कर उसके गुण अनुसार कार्यक्रम सुनिश्चित किये जाने की जरूरत है। अखबार नवीस ने कानून की बात करते हुए कहा - नील गायों को समाप्त करने का कानूनी प्रावधान कोई व्यक्ति प्रयोग इसलिये नहीं करना चाहता क्योंकि उसे भय है कि उसे गौ हत्या का पाप लग जायेगा। नील गाय या नीलवर्णा गौ पूर्णतः भारतीय गाय है इसलिये नील गायों की गणना, इनकी बहुतायत किन किन इलाकों में है, नील गाय को पालतू गाय तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि सामान्य गाय की तरह यह पशु गरीब पशु न होकर सामर्थ्यशाली उग्रकर्मा पशु है इसलिये भारत सरकार राज्य सरकारों केन्द्र शासित क्षेत्रों जहां जहां नील गाय हैं उनके बारे में संबंधित राज्यों व केन्द्र सरकार के कृषि, पशुपालन, वन्यजीव तथा पशुचिकित्सा विभागों को मिल बैठ कर नील गाय की समस्या के बारे में विचार विमर्श कर इन्सान की सेहत का सुगम मार्ग खोजने के उपाय किये जाने चाहिये। हिन्दुस्तान में अभी जो वैचारिक धारायें हैं उनमें गाय को पवित्र मानने वाले बहुसंख्यक निरामिष हिन्दू, जैन, सिख समाजों के अलावा गोमांस का सेवन करने वाले लोग भी हैं इसलिये गाय का सेकुलरिज्म, कम्यूनलिज्म के घेरे में भी धकेल दिया जाता है। महात्मा गांधी के आर्थिकी-विशेषज्ञ जे.सी. कुमारप्पा ख्रिस्ती धर्मावलंबी थे पर हिन्दुस्तानी खेती बाड़ी तथा उद्यमिता के संदर्भ में उनके गौ संरक्षण संबंधी विचार की भूरि-भूरि प्रशंसा महात्मा गांधी स्वयं की। मौजूदा जमाने में श्वेत क्रांति के जन्मदाता डा. कुरियन वर्गीज भी ख्रिस्ती धर्मावलंबी भारतीय हैं। गाय के लिये उपरोक्त दोनों ख्रिस्ती धर्मावलंबी भारतीयों की श्रद्धा श्रेयस होने के अलावा जीव दया का भी प्रतीक है।
भारत के लोग बहुलवादी भी मानते हैं। यूरोप सहित पश्चिम में गाय दूध व गौमांस (बीफ) का स्त्रोत है। गौ मांस वहां के लोगों का मुख्य भोजन भी है। कुछ वर्ष पहले वहां मैड-काऊ पागल गाय प्रकरण भी सामने आया। लोगों में सनसनी फैली तो थोड़े दिनों तक मैड-काऊ बीफ से परहेज भी होता रहा किन्तु फिर गाड़ी पटरी पर आगयी। वहां के जीवन रस व हिन्दुस्तानी जीवन स्त्रोत में धरती आसमान का अंतर है। इस देश में भी श्वेत क्रांति होरही है पर यहां के लोग दूध व दूध से बनी मिठाई ज्यादा पसंद करते हैं। नित्य गौ मांस का सेवन करने वाले लोगों की संख्या बहुत ही सीमित होगी। आबोहवा के कारण भी भारत सामिष भोजन का क्षेत्र नहीं है इसलिये भारत की श्वेत क्रांति दूध की इफरात के लिये व्यापारिक दुग्ध उत्पादन व पारिवारिक दुग्ध आवश्यकता पूर्ति के लिये पारिवारिक दुग्ध उत्पादन का तरीका अपनाना भारत की सभ्यता व संस्कृति के मुताबिक जिस गाय का दूध पीते हैं उससे आत्मीयता पशु व मनुष्य के बीच अनुराग सौमनस्यता की स्थापना तभी होगी जब मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली सरीखे महानगरों के अलावा दस लाख तक की आबादी वाले महानगरों, नगरों व कस्बों के नगर निकाय सीमा से आठ किलोमीटर तक के क्षेत्र को गांवों में से हर एक गांव में कम से कम सात अधिक से अधिक सोलह महिलाओं के स्वयं सहायता समूह सामूहिक गौशाला संचालन के लिये संकल्पित किये जाने की जरूरत है। शहर के जो परिवार अपनी गाय का दूध सेवन करना चाहते हैं पर गाय पालने की स्थिति में नहीं हैं वे स्वयं सहायता समूहों के मार्फत गौ पालन करें। गाय खरीद कर स्वयं सहायता समूह को सौंपें व गाय का इंश्योरेंस कर स्वयं सहायता समूह से करारनामा करें कि माहवारी गौ पालन का व्यय अदा करेंगे। गाय (बछड़े के स्तन को छोड़ कर) जो दूध देगी वह गोस्वामी गाय का वास्तविक स्वामी स्वयं दुहे या दुहे गये दूध को प्रतिदिन प्राप्त करे और सप्ताह में एक दिन अवश्य अपनी गाय की देखभाल करने आये। स्वयं सहायता समूह की महिलायें सामूहिक तौर पर गायों व उनके बछड़ों की देखभाल कर सकती है। गायों का गोबर व गोमूत्र चार स्वयं सहायता समूह की संपन्न होगी। गोमूत्र व गोबर का उपयोग स्वयं सहायता समूह पंचगव्य तथा सामूहिक गोबर गैस संयत्र के लिये कर सकेगा। गांव के जो लोग गोबर गैस का प्रयोग कुकिंग गैस के तौर पर करना चाहेंगे उन्हें निर्धारित दर पर गैस स्वयं सहायता समूह उपलब्ध कराता रहेगा। गांव के निवासियों के शौचालय भी गोबर गैस संयत्र से जुड़वाये जा सकते हैं। इस प्रकार गांव में सफाई का अभियान भी चलता रह सकता है। गांव में वे महिलायें जो नौकरी करने के कारण घर के कामकाज में हाथ नहीं बंटा सकती हैं उनके बच्चों की देखभाल उनके पशुओं की देखभाल भी स्वयं सहायता समूह संपन्न कर सकता है। गांव की उन महिलाओं को जो रोजगार नहीं पारही हैं स्वयं सहायता समूह का सदस्य बनने के रोजगार के साधन उपलब्ध होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गांवों की आत्मा को बरकरार रखते हुए गांवों के कायाकल्प का जो संकल्प अपने मन में संजोये हैं, मन की बात भारत के लोगों तक समय समय पर पहुंचाते रहे हैं स्वयं सहायता समूहोें का सामूहिक गोपालन महिला श्रम शक्ति को अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता दे सकता है।
आज जो घरेलू हिंसा का वातावरण यत्र तत्र देखने में आता है उस पर भी रोक लग सकती है पर प्रधानमंत्री जी को एक नया संकल्प करना होगा कि देश से नशाखोरी का खात्मा हो। नशाखोरी रोकने के लिये देश के जो घटक राज्य नशाखोरी से सर्वाधिक पीड़ित हैं उन्हें जाग्रत होना आवश्यक है। पंजाब और उत्तराखंड ऐसे राज्य हैं जहां शराबखोरी का बोलबाला है। नशाखोरी व शराबखोरी पर अंकुश लगाने के लिये राज्य सरकारों को यह सोचना पड़ेगा कि जो लोग शराब के नशे के इतने आदी हो गये हैं कि उनसे शराब छुड़ायी जानी कठिन है उनके लिये एक मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाना होगा। उन्हें सुझाया जाये कि बिना शराब पिये जिन्दा नहीं रह सकते हैं इसके लिये उन्हें डाक्टरी प्रमाण पत्र हासिल करना चाहिये और डाक्टरी सलाह मुताबिक शराब हासिल करने का शराब आवंटन पत्र जारी हो जाना चाहिये। इससे एक फायदा तो यह होगा कि गैर कानूनी तरीके से शराब निर्मित करने आपूर्ति करने में रोक लग सकेगी और मनोवैज्ञानिक तरीके से शराब के प्रति आकर्षण पर भी रोक लग सकेगी। योेजना आयोग का जो नया अवतार नीति योजना आयोग संकल्पित है वह भी नशाखोरी पर रोक लगाने के संभावित उपायों पर विचार विमर्श करे।
पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी श्री टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम उ.प्र. के मुख्य सचिव भी रहे हैं वे विद्वान व्यक्ति हैं। उनकी अध्यक्षता में जो उच्च स्तरीय कमेटी की राय में नील गाय सरीखे प्रकरणों में भारतीय बहुसंख्यक समाज की भावनात्मकतायें जुड़ी हुई हैं इसलिये नील गाय जिसे अभी तक फसल बर्बादी करने वाली स्थिति से देेख रहे हैं यदि नील गाय के गोमूत्र की रासायनिक परीक्षणों के पश्चात पंच गव्य का महत्त्वपूर्ण भाग माना जाने योग्य समझा जाये तो नील गाय गोमूत्र-गोबर परीक्षण किया जाना चाहिये। दूसरी ओर वहां जहां पर्वतीय क्षेत्र हैं वे हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र हों या विंध्य, सह्याद्रि या अरावली पार्वत्य क्षेत्र हों वहां के तैलफाट (जहां सूर्य प्रकाश बना रहता है) या सैलफाट (जहां सूर्य प्रकाश नहीं या कम रहता है) की वनस्पति व जंगम जीव यथा विभिन्न पशु पक्षी कीट पतंग का अध्ययन किये जाने की तात्कालिक जरूरत है।
पंतजलि योग पीठ द्वारा पंचगव्य निर्माण तथा समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा पंचगव्य प्रयोग किया जारहा है। राजस्थान सरकार को बाबा रामदेव जी से अनुरोध करना चाहिये कि वे राजस्थान राज्य में उन दो चार जगहों पर वन्य जीव संरक्षण विभाग के सहयोग से नीलगाय गोमूत्र दोहन के तौर तरीकों पर विचार करें ताकि सटीक पंचगव्य निर्माण में पतंजलि योग पीठ का सक्रिय सहयोग मिले और सेहत सुरक्षा का पंचगव्य पथ राष्ट्रीय हित साधन कर सके। पंचगव्य और पंचामृत निर्माण विधि वेदांत मार्ग से उपलब्ध प्रक्रिया है इसलिये भारत के धर्मनिरपेक्षता समर्थक राजनीतिक समूह पंचगव्य और पंचामृत का राजनीतिक विरोध बड़े जोेर शोर करने की उतावली तो जरूर दिखायेगा पर यदि पंचगव्य और पंचामृत सेवन व छिड़काव वर्तमान युग की कर्क व्याधि या कैंसर, ऐड्स सरीखी जानलेवा बीमारियों से भारतवासियों को व्याधि मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करना हो और भारत के प्रमुख अल्पसंख्यक समाज इस्लाम धर्मावलंबी समूहों व ख्रिस्ती धर्मावलंबी समूहों की धर्म पुस्तकों में गोमांस सेवन उनके मजहब की अनिवार्य प्रक्रिया न हो पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब ने गोमांस सेवन को धार्मिक कृत्य न बताया हो ईसा मसीह ने कभी गोमांस सेवन का निर्देश अपने अनुयायियों को न दिया हो तो भारत में रहने वाले इस्लाम धर्मावलंबी समाज तथा ख्रिस्ती समाज को इस देश के पारम्परिक सनातन समाज में गाय के लिये जो श्रद्धा, सद्भाव मजहबी आस्था का मूल्यवान अंग माना गया है, आज का भारतीय सनातन समाज गोपालक श्रीकृष्ण तथा श्रीकृष्ण के व्यक्तित्त्व को निखार देने वाले कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास द्वारा निर्धारित सामाजिकता है। गाय के बारे में भारतीय वैदिक समाज का चिंतन इन मंत्रों में अभिव्यक्त किया है।
नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्यः एव च नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यः नमो नमः।
गावो ममाग्रतः संतु गावो मे संतु पृष्ठतः गावो में पार्श्वयोः संतु गवां मध्ये वसाम्यहम्।
पंच गावः समुत्पन्ना मध्यमाना महोदधौ तासां मध्यं तु या नन्दा तस्मै देव्यै नमो नमः।
गवां अंगेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश यस्मात् तस्मात् शिवम् मे स्यात् इहलोके परत्रं च।
वेदाश्च स्मृतयश्चैव पुराणानि तथैव च आयुर्वेेदो धनुर्वेदो गंधर्वो मंत्र गह्वरः।
औषधयो वन संभूता ग्राम्याश्चैव सुप्पिपला सानुगा देवताश्चैव मुनयः रूद्रगणा तथा ।
इन्द्रो वर्ह्निदयो रक्षः याशी वायुर्धनाधिपः ईशोह्यनंतो ब्रह्मा च सर्वे ते तर्पितां मया।
सावित्र्या सह लोकेशः सलक्ष्मीक चतुर्भुजः महेश्चोमया सार्धम् तृप्तिमायातुश्यावताम्।
अत्रिः वशिष्ठो भृगुः गौतमो च मरीचि दक्षो पुलह पुलत्स्य प्राचेतस कश्यप विश्वामित्र।
स्तथाहयगस्त्यो भृगुनो मुनिश्चन्य अन्ये च सर्वे प्रवि पुंगवास्य गृृहणन्तु दत्तम् जलमघ तुष्टा।
इसलिये गोसेवा पारम्परिक हिन्दुस्तानी सामाजिक मर्यादा का प्रतीक है। भारत के चतुर्दिक उत्थान के लिये गाय और गाय के बछड़े बैल की उत्कृष्ट भूमिका है। इसलिये भारत के गिरिजाघरों में सैक्सटन - सामवेदी पद्धति की प्रार्थना करने वाले ख्रिस्ती समाज और वज्रासन में नमस्या नमाज अदा करने वाले भारतीय ख्रिस्तियों व इस्लाम धर्मावलंबी समाज गहरा विचार विमर्श करें। यदि उन्हें लगे कि गोमांस सेवन उनके मजहब का हिस्सा नहीं है वह केवल भोजन के लिये ही गोमांस सेवन की परम्परा चली है तो निश्चय ही हिन्दुस्तानी देशी गाय का पंचामृत फिर नीलवर्णा नील गाय के गोमूत्र से निर्मित होकर सेहत सुधार में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। हर परिवार को अकाल मृत्यु भय से मुक्त करने के लिये पंचामृत सेवनीय है। पंचगव्य का साप्ताहिक शरीर लेपन उपरांत स्नान तथा सप्ताह में एक दिन घर में पंचगव्य के छिड़काव का मंत्र भारतवर्ष के लोगों के लिये खुशहाल सेहत का दिव्य मार्ग बन सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि सत्तर वर्ष पहले डा. जे.सी. कुमारप्पा ने गो पालन का जो रास्ता हिन्दुस्तानियों को दिखाया हम भारतवासी उस रास्ते पर चलें।
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