Tuesday, 30 December 2014

मनरेगा & पुनर्वाचन क्यों न हो ?


संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय व प्राचार्य द्वय सर्वश्री जगदीश भगवती व अरविन्द पानागरिया की राय में मनरेगा या नरेगा जो भी नाम देना चाहें वह ग्रामीण अकुशलता कानून है। भारत तो गीता मत के अनुसार ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ की शाश्वत मान्यता व परिपाटी वाला देश है। सर्वश्री भगवती व पानागरिया महाशय द्वय मोदी नेतृत्त्व व मोदी विचार श्रंखला के समर्थक विद्वान हैं। भारत में मोदी समर्थक तथा मोदी द्वेषी दो धारायें हैं। भारत के वे लोग उन विद्वानों सहित जिनकी धारणा में राष्ट्रहित सर्वोपरि है वे ‘मोदी राजधर्म शास्त्र’ के प्रशंसक हैं। मोदी प्रशंसकों में पारस्परिक विचार भेद भी हो सकते हैं पर अधिकांश की मान्यता मोदी के निस्वार्थ तथा लक्ष्यपूर्ण वाणी के प्रशंसक दिन प्रतिदिन बढ़ते जारहे हैं। भारतीय राजनीति के वे पर्व वंशवादी, परिवारवादी तथा क्षेत्रीय जातिवादी हैं, उन्हें मोदी उदय अपने अस्तित्त्व के लिये खतरा महसूस होरहा है अतः ऐसे सभी लोग मिलजुल कर मोदी प्रवाह को रोकने के लिये अग्रसर हैं। मोदी ने 2011 में गुजरात में गांवों के उत्थान के गांवों की आत्मा को बरकरार रखते हुए गांवों को शहरी सुविधायें मिलें इसकी शुरूआत गुजरात के 50 गांवों से की। उन पचास गांवों के नतीजे सामने आने की तात्कालिक जरूरत है ताकि भगवती-पानागरिया द्वय ने नरेगा कानून के बारे जो शंकायें व्यक्त कीं उन्हें राष्ट्र हित के नजरिये से देखा जाये। नरेगा कानून बनाते समय तत्कालीन शासन की मंशा गांवों के गरीब लोगों को रोजगार देने के नाम पर एक आकर्षक व ध्यान खिंचाऊ तथा ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन का समाचार दर्शन तरीके का आकर्षक रूझान श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्त्व में चल रही मनमोहन सरकार ने नेशनल रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी एक्ट पास कर उसे लागू किया। उद्देश्य गांवों में पार्श्वसज्जा सृजित करना और काम चाहने वाले लोगों को 100 दिन की रोजगार गारंटी देना। अगर रोेजगार न मिल पाये तो बेरोजगारी भत्ता अधिक से अधिक 100 दिन के लिये प्रविधित करना था। अधिनियम लाने का उद्देश्य तो मतदाताओं को आकर्षित करना था। इम्प्लायमेंट गारंटी की व्यवस्था करते समय क्या क्या करना जरूरी है यह नहीं देेेखा गया। कानून पास हुआ तो लागू कर दिया गया। मनमोहन सरकार में जिसे यू.पी.ए. की पहली सरकार कहा जाता है उसमें राष्ट्रीय जनता दल कोटे से बाबू रघुवंश प्रसाद ग्राम्य विकास मंत्री थे। ईश्वर की सृष्टि में हिरण्यकश्यप सरीखे दुर्दांत राजा के घर में प्रह्लाद सरीखा दयालु व्यक्ति भी पैदा होता है। रावण सरीखे दार चौर्य करने वाले राजा की पत्नी मंदोदरी पातिव्रत्य से साथ साथ रसोई नवाजी भी करती थी इसलिये जातीय राजनीति के धुरन्धर लालू प्रसाद यादव के साथ में रघुवंश प्रसाद सरीखा लोकसंग्रही व्यक्ति भी रह सकता है। रघुवंश प्रसाद जो सत्कार्य करते थे उनका लाभार्जन लालू प्रसाद यादव व सोनिया गांधी किया करती थीं। ग्रामीण रोजगार गारंटी सरीखा प्रबंधन किया तो बाबू रघुवंश प्रसाद ने राजनीतिक लाभ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के राजनीतिक खाते में पहुंचे यह प्रयास हर स्तर पर होता रहा। 
  विद्वत्द्वय भगवती व पानागरिया ने अपना मत व्यक्त कर दिया कि रोजगार गारंटी कानून ग्रामीण अकुशलता को बढ़ावा देता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय रोजगार गारंटी 200 गरीब से गरीब जिलों तक सीमित करने का पक्षधर है। जिन दो सौ जिलों का चयन भारत के गरीब से गरीब जिलों में किया जायेगा उनमें भी संपन्न गांव और शहरी इलाके होंगे इसलिये गरीब गांव, गरीबी पीड़ित ग्राम सभा क्षेत्र या गरीब क्षेत्र पंचायत अथवा गरीब तालुका चिह्नित करने की जरूरत है। गरीबी निवारण, गरीबी कितने किस्म की है ? गरीबी के प्रति स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी का वैचारिक दृष्टिकोण कि गरीब दरिद्र नारायण का प्रतीक है। गरीब से सहानुभूति रख कर स्वयं गरीबी ओढ़ना मनुष्यों के बीच फासला कम करती है। भारत के उद्यमी राजा बलदेव दास बिड़ला ने साठ की उम्र पार करने पर अपने उद्यमी बेटों से कहा - अब मैं काशी वास करूँगा। तुम लोग व्यापार करो पर ईश्वर और नैतिकता मत छोड़ना। बनारस आओ तो गरीबों के लिये कंबल लेते आओ। राजा बलदेव दास बिड़ला ने अपने उद्यमी बेटों से आगे कहा - मथुरा में कृष्ण मंदिर बनाओ उसमें भागवत का यह श्लोक उकेर डालो। 
यावत् भ्रियेत् जठरम् तावत्स्वत्वम् हि देहिनाम्। अधिकम योऽभिमन्येत सः स्तेनः दण्ड मर्हति।।
गरीबी हटाने का, गरीबी दूर करने का भारतीय नुस्खा महात्मा गांधी ने तय किया। रोजगार गारंटी के लिये गांधी-मार्ग गांधियन आर्थिकी चिंतक जे.पी. कुमारप्पा का गौपालन जितना महत्त्वपूर्ण गोकुल में कृष्ण-युग में था उतना ही महत्त्वपूर्ण आज भी है इसलिये कृषि गोपालन को प्राथमिकता देना जरूरी है। गरीब केवल गांव में ही नहीं रहते शहर में भी गरीब हैं इसलिये गरीबी हटाने के रास्ते में जो रोड़े हैं उनकी पहचान बहुत जरूरी है। जरूरत इस बात की है कि रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी कानून को इम्प्लायमेंट गारंटी कानून में तब्दील किया जाये और यह कानून गांव व शहराती दोनों के गरीबों पर लागू किया जाये। गांवों और शहरों के अकुशल श्रमिकों के समानांतर गांवों व शहरों में हाथ से काम करने वाले व्यक्तियों दस्तकारों में कम से कम 1. चर्खे पर सूत कताई 2. हाथ बुनाई 3. करघे पर बुनाई के तीन कुशल श्रम को इम्प्लायमेंट गारंटी से जोड़ा जाये ताकि हाथ का काम करने वाले इन तीन वर्गों 1. कताई करने वाली महिला श्रम शक्ति 2. हाथ बुनाई से स्वेटर, पुलोवर वगैरह बुनने वाला  महिला समाज तथा देश का वह जुलाहा जो जीविका के लिये भाग रहा है उसे 100 दिन का रोजगार मुहैया कराया जाये। रोजगार चाहने वाले गांव में रहते हों या शहर की झुग्गी झोंपड़ी में अथवा स्लम जहां भी रहते हों उन्हें शारीरिक श्रम अथवा कुशल श्रमिक पेटे रोजगार मुहैया कराने का संकल्प लिया जाये। जिन 200 गरीब जिलों तक रोजगार गारंटी उपयोग में लाये जाने का सवाल है बजाय जिलों के क्षेत्र पंचायत या तालुका स्तर पर रोजगार गारंटी वाले गांवों कस्बों शहरों तथा महानगरों के स्लम एरिया, झुग्गी झोंपड़ी क्षेत्र चिह्नित किये जायें। रोजगार गारंटी के लिये पचास प्रतिशत रोजगार चाहने वाले शरीर श्रम आधारित संपदा निर्माण कार्य के लिये निश्चित हों। शेष पचास प्रतिशत कत्ती, हाथ बुनाई तथा बुनकर तय किये जायेें। चर्खा कातने वाले कतकर अपने उपयोग में आने वाले वस्त्रों को हथकरघा खादी सेक्टर से प्राप्त करें। आज हथकरघा व खादी मृतप्रायः हैं। इन दोनों को जिन्दा कर रोजगार के अवसर गांवों व शहरों की महिला श्रम शक्ति को परिवार की आमदनी बढ़ाने की दिशा में मदद किये जाने की तत्काल जरूरत है। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय जो माइक्रो स्माल मीडियम इण्टरप्राइजेज के विशाल नाम से जाना जाता है, पिछले आठ वर्षों में जब से यह मंत्रालय सृजित हुआ है कितने माइक्रो क्राफ्ट बन्द हुए, कितने स्माल स्केल यूनिटों ने काम करना बंद कर दिया, मीडियम इण्टरप्राइजेज की आज क्या स्थिति है इसका मूल्यांकन किया जाना इसलिये जरूरी है क्योंकि एम.एस.एम.ई. सेक्टर में व्यापक तौर पर मत्स्य न्याय निरंतर चालू है। भारतीय वाङ्मय में मत्स्य न्याय से मतलब तालाब मगरमच्छ द्वारा अपने से कमजोर जलजीव को निगल जाना मत्स्य न्याय कहलाता है। मानवीय आर्थिक क्षेत्र में यही मत्स्य न्याय दुर्बल, दलित तथा गरीब को उसका हक लेने से रोकता है। भारत के समूचे आर्थिक तंत्र में पारम्परिक वाणिज्यकीय सदाशयता अंग्रेजी राज कानून ने लुप्त कर दी है। अब कोई व्यापारी सदावर्त नहीं लगाता, धर्मशाला नहीं खोलता। दातव्यता ने अंग्रेजियत की चैरिटी का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। मिशनरी चैरिटी ख्रिस्ती धर्म प्रसार का हेतु है। आज उसी चक्करघिन्नी में भारतीय दातव्यता भी घूमती नजर आरही है। यहां तक कि संत मदर टेरेसा को हर व्यक्ति में ईश का दर्शनाभास होता था। पीड़ितों की सेवा के पीछे उनका छद्म उद्देश्य भारत को पूर्णतः ख्रिस्ती बनाने का उपक्रम था। लार्ड मैकाले के पिता रोम कैथोलिक चर्च के आर्कबिशप थे पर मनुष्य को उसकी मां, मातृभाषा व मातृभूमि से उजाड़ना उनका सिद्धांत नहीं था। जब मैकाले भारत में अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा का क्रम चला रहे थे उनके पिता पादरी का स्पष्ट मत था कि शिक्षा मातृभाषा में हो। मैकाले ने अपने पादरी पिता को लिखा - मैं आपका का काम कर रहा हूँ। आज से दो अढ़ाई सौ वर्ष पश्चात हर भूरा हिन्दुस्तानी भूरा ख्रिस्ती होगा। हिन्दुस्तान जैसे देश को उसकी संस्कृति से उखाड़ने का काम लार्ड मैकाले ने किया। आज भारत में करीब बारह करोड़ अंग्रेजीदां मैकालाईट हैं। अंग्रेजी के सहारे हिन्दुस्तान, चीन, अरब व जापान जैसे गैर ख्रिस्ती राष्ट्र राज्यों की बराबरी में नहीं आ सकता इसलिये हिन्दुस्तान की पहली जरूरत इस पुराने राष्ट्र की 22 संविधान सम्मत राष्ट्रभाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर राष्ट्रोत्थान का मार्ग प्रशस्त करना है। 
  समीर कोचर की पुस्तक ‘डिफीटिंग पावर्टी’ और 'प्रधानमंत्री जन धन योजना' को सटीक रूप से तभी व्यवहार में लाया जा सकता है जब डिजिटल इंडिया का माध्यम भारत की संघीय भाषायें उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयाली, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती-मणिपुरी, नैपाली बोलने वाले भारतीय संघ के घटक राज्यों की ग्राम सभा, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, जिला प्रशासन तथा राज्य सचिवालय के साथ केन्द्र सरकार का पत्र व्यवहार उस प्रदेश की भाषा में हो। देश के जिन दस घटक राज्यों की राजभाषा नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी है उनके साथ केन्द्र का पत्र व्यवहार हिन्दी में हो। मनरेगा के संबंध में जो भ्रांतियां हैं उनका निराकरण करने का उपाय तत्काल किया जाये। मनरेगा के नाड़ी वैद्य बाबू रघुवंश प्रसाद हैं वे अपनी बात के पक्के तथा भारतीय लोकतंत्र के वाहक व्यक्तित्त्व हैं। प्रधानमंत्री को देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने मनरेगा के संबंध में अपना विचार प्रस्तुत किया है। रोजगार की गारंटी उसे चाहिये जिसके पास वैकल्पिक रोजगार नहीं है इसलिये पिछले आठ दस वर्षों से रोजगार दोनों, अशिक्षित व्यक्तियों को रोजगार व साक्षर व्यक्तियों को रोजगार का पिछले सतसठ वर्षों की उपलब्धियों को मद्देनजर रखते हुए रोजगार गारंटी वाले रोजगार मूल्यांकन की जरूरत है। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री समाज सहित समाज विज्ञानियों वैज्ञानिकों साहित्यिकों तथा चिंतन पोखर मूर्धण्य व्यक्तियों का समूह ज्यादातर मामलों में शहर और शहर के इर्दगिर्द ही ज्यादा रहता है। दूरदराज के गांवों में वह विशेषज्ञ के तौर पर जाना पसंद करता है। सत्ताधारी समाज भी विशेषाधिकर संपन्न है। वह भी जमीनी हकीकत देखने के लिये उड़ान भरता है, थोड़ी देर रह कर फिर सत्ता के गलियारों में लौट जाता है। समाज अमीर गरीब में ही नहीं बंटा है बल्कि समाज हर तरह से बंट चुका है। लोकतंत्र के प्रहरी जन समूह का सामान्य जन से संपर्क टूट चुका है। उसे दोबारा जोड़ने की तात्कालिक जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रयासरत हैं कि भारत राष्ट्र की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगे। यह तो लोकतंत्र है लोकमत को सही दिशा बोध कराने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहना आवश्यक है। जो लोग विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा संसद, विधानमंडलों, नगर निकायों, पंचायती राज संगठनों में चुन कर जारहे हैं उन्हें प्रशिक्षित करने की तात्कालिक जरूरत है। 
  जहां तक रोजगार गारंटी को जरूरतमंद समूहों तक पहुंचाये जाने की बात है पंगत में जो व्यक्ति सबसे पीछे खड़ा है उस समूह को सर्वप्रथम पहचानने की जरूरत है। बंधुआ मजदूर, बालश्रम (पंद्रह वर्ष के उम्र से छोटे बच्चों को मजदूरी में लगाने वाले समूह) से अपनी आर्थिकी को मजबूत करने वाले कारपोरेट सेक्टर, निजी उद्यमी आदि बालश्रम व महिलाश्रम को गांधी के चर्खे चाहे वह देशी चर्खा हो एक तकली वाला किसान चर्खा चार या छः तकली वाला नया माडल चर्खा डब्बा चर्खा और सौर चर्खा कोई भी चर्खा हो उसे स्कूल का जुवेनाईल अर्थात नाप्तयौवन भी चला सकता है। गांधी की आर्थिकी आज भी भारत के लिये उतनी ही मुफीद है जितनी आज से 100 वर्ष पहले थी जब महात्मा ने स्वदेशी का आह्वान किया था। 1924 से 1964 तक के चालीस वर्ष चर्खे के उत्थान के वर्ष थे। सर्वाधिक खादी उत्पादन 64-65 में वर्धा में हुआ था। जरूरत इस बात की भी है कि देश के प्रधानमंत्री ने 1956 में जयपुर में कहा था - खादी व ग्रामीण उद्यमों के द्वारा ही ग्रामीण औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वैकुंठ लल्लूभाई मेहता ने खादी व ग्रामोद्योग कार्यक्रमों को एक दिशा दी। रूर्बन सोसाईटी का संकल्प लिया। दस वर्ष तक निरंतर सघन क्षेत्र योजना के जरिये उन्होंने भारत के गांवों का कायाकल्प करने वाला सहकारिता आधारित नुस्खा प्रयोग किया। जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार राज्य सरकारों के सहयोग से 1. महिला स्वयं सहायता समूहों के जरिये चर्खा कताई चर्खे पर कते सूत को रोजगार गारंटी से जोड़ कर गांधी की खादी को फिर उसका वह स्थान दें जो वैकुंठ ल. मेहता के परिश्रम से पंडित नेहरू ने 1954 से 1964 तक दिया। चर्खा कताई, हाथ बिनाई तथा करघा बुनाई के तीन कुशल श्रमिक काम भी इम्प्लायमेंट गारंटी के हिस्सा बनें और खादी ग्रामोद्योग आयोग को पुनर्जीवित कर उसे इजरायल स्टाइल के बस्ती निर्माण तथा रूर्बन सोसाइटी का अथवा कहें कि वित्त मंत्री द्वारा संकल्पित डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का उद्गाता बनाया जाये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी विनोबा-शिष्य बालविजय को बुला कर गांधी के हैरिटेज खादी को पुनर्जीवित करने हेतु विचार विमर्श कर जगदीश भगवती व अरविन्द पानागरिया द्वय महाशय ने जो कहा है नरेगा रूरल इनइफिसियंशी अधिनियम न रह कर ग्रामीण उद्यमिता संवर्धक हिमालय शिखर बनाया जाये। इम्प्लायमेंट गारंटी हर उस व्यक्ति को जो रोजगार चाहत रखता है ग्रामीण पार्श्व सज्जा, सज्जा निर्माण के समानांतर गांवों के लोगों को विशेष तौर पर महिलाओं और नाप्तयौवन बच्चों को कताई के जरिये रोजगार रोटी का साधन मिले और वे अपनी पढ़ाई लिखाई भी जारी रख सकें। कैलाश सत्यार्थी ने जो मुहिम चलायी नोबल पुरस्कार अर्जित किया। भारत सरकार छः से लेकर पंद्रह वर्ष तक के बच्चों को चर्खा कताई के जरिये शिक्षा के समानांतर पारिश्रमिक अर्जन करने का भी रास्ता अख्तियार कर सकती है। राजकोट निवासी शांतिलाल त्रिवेदी ने 1928 से 1948 तक अल्मोड़ा व पौढ़ी जिलों के नौ हजार गांवों में पंद्रह हजार मील पैदल चल कर चर्खा कताई हाथ बिनाई का पैगाम फैलाया। यह गांधी आर्थिकी का महत्त्वपूर्ण काम था। हजारों विद्यार्थी ऊन कात कर अपने लिये स्वेटर, पंखी वगैरह तैयार करते थे। गांवों में उद्यमिता का पुनरूत्थान युग की पुकार है।
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