Tuesday, 23 December 2014

कैसे लागू हो गरीबी हटाने वाला समीर कोचर उद्घोषित गुरु मंत्र



  पुस्तक का शीर्षक उन्होंने ‘डिफीटिंग पावर्टी’ चुना। हिन्दुस्तानी लहजे व वाङ्मय में इसे विपन्नता-पराजय, गरीबी की हार, दरिद्रता हराना संबंधी अपनी पुस्तक में लक्ष्य निर्णायकता का परिचय चार्ल्स डार्विन को उद्धृत करते हुए If the misery of the poor be caused not by the Laws of Nature but by our institutes greets our sin. उपरोक्त उद्धरण सहित जो 54 बिन्दु समीर कोचर महाशय ने इंगित किये हैें उन पर एक सरसरी निगाह डालना भारत की गरीबी निवारण संकल्पना का सूत्रधार है। समीर महाशय धन जन एवं उससे अगले कदम के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं। उनका पहला लक्ष्य वित्त संस्थान हैं। उनका मत है कि जन धन योजना वित्तीय दृष्टि से अतिक्रमणीय हो। Viable से तात्पर्य Having reached a stage of development at which further development can occur independently of the mother. गरीबी निवारण के लिये बैंकों को नैतिक अथवा कानूनी अनिवार्यता अथवा ऐसी स्थिति जिसमें बैंक/सरकार की अनुग्रहीत करने की क्षमता का प्रदर्शन हो। वैश्विक वित्तीय सेवा अनुग्रह निधि के समानांतर योजना से जुड़े बैंक को अपने लाभांश का कम से कम 2 प्रतिशत क्रेडिट सेविंग रेशियो के संवर्धन के लिये उपलब्ध कराना चाहिये यह मत महाशय समीर कोचर ने अभिव्यक्त किया है।
  तीसरा प्रसंग जन धन खाता धारक वर्ग को अतिरिक्त वित्त पोषण के लिये वैश्विक वित्तीय सेवा अनुग्रह निधि का उपयोग उधारी जामिन के तौर पर संकल्पित करने का सुझाव श्री कोचर अपनी पुस्तक में देते हैं। स्वयं सहायता समूह का आकार कम से कम सात और अधिक से अधिक 16 व्यक्तियों तक ही मर्यादित होना स्वयं सहायता समूह के व्यक्तियों पुरूषों अथवा स्त्रियों में उद्देश्यपूूर्ण स्वयं सहायता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वित्तीय अथवा आर्थिकी साक्षरता के साथ साथ सामर्थ्य संवर्धन तथा वित्त पोषण के तौर तरीकों का निर्धारण कैसे हो ? केवल सरकारी अथवा बैंकिंग संगठनों की सरकारी व अर्ध सरकारी तकनीक से प्रधानमंत्री जन धन योजना की अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि संशयग्रस्तता पूर्ण ही होगी। भारत के प्रधानमंत्री जी व उनकी सरकार के महत्त्वपूर्ण स्तंभों को यह विचार करना ही होगा कि सरकारी मशीनरी के समानांतर लोकसत्ता के उस वर्ग का सहयोग लाजमी होगा जो जानकारी तो अच्छी रखता है पर सरकार व आर्थिकी घेरे से बाहर है। इसलिये प्रधानमंत्री जी को अपनी जन धन योजना को सफलतापूर्वक संचालन करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक सौ आठ ऐसे लोगों को चुनना होगा जो किसी राजनीतिक, व्यापारिक, औद्योगिक, कृषि सहित सभी प्रकार के व्यावसायिक हित वर्ग का हिस्सा नहीं हैं। जिसकी पारिवारिक तथा वैयक्तिक उत्तरदायितायें पूर्ण हो चुकी हैं, जो स्वस्थ्य हैं, निस्पृह हैं, रागद्वेष तथा ईर्ष्या का जिन्होंने त्याग कर दिया हो ऐसे व्यक्ति के किसी मजहबी संगठन के हिस्सा रहे हैं, औद्योगिक तथा आर्थिकी विद हों, मानवीय दृष्टिकोण के पक्षधर हों, अन्याय करने से परहेज करते हों। चार्ल्स डार्विन के कथन दारिद्र्य दुःख, प्रकृति दत्त हो अथवा मनुष्य की कृत्रिमता जन्य पाप का हिस्सा हों, दारिद्र्य कष्ट के निवारण के लिये सोचने वाले निस्पृह इन्सानों की राष्ट्रीय पंगत खड़ी होने पर ही दरिद्रता के अभिशाप से छुटकारे का रास्ता खोजा जा सकता है। इसलिये प्रधानमंत्री को चाहिये कि वे राष्ट्रीय स्तर पर अंबुद समान अष्टोत्तर व्यक्तियों की श्रंखला निर्मित करें। अंबुद समान राष्ट्रीय सरकारी तंत्र के समानांतर लोक सत्तात्मक परामर्श देश के नेता को उपलब्ध होता रहे तो राजकीय मंत्रणा के समानांतर लोक सत्तात्मक अंबुद समान मंत्रणा का मार्ग प्रशस्त किया जाना शासन स्तर में जो सिस्टम फेलियर के अवरोध उपस्थित हुए हैं उनसे निजात पाये जाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। सभी राजनीतिक दलों तथा संसद की स्वीकृति से कानूनी तंत्र के समानांतर अंबुद समान लोक सत्तात्मक शीर्ष परन्तु परामर्श मूलक संगठन खड़ा होने से संसदीय लोकतंत्र को गुरू मंत्रणा उपलब्ध करायी जा सकती है। परामर्श मूलक यह मंत्रणा स्त्रोत घटक राज्य स्तर पर ज्यादा से ज्यादा 54 सदस्यीय व कम से कम अठारह सदस्यीय अंबुद समान परामर्श मंच हो। जिला स्तर में बारह सदस्यीय विकास खंड स्तर में छः सदस्यीय तथा ग्राम पंचायत स्तर में तीन सदस्यीय अंबुद समान हो। जहां तक नगर पालिका क्षेत्रों का सवाल है अंबुद समान संस्थान नगर क्षेत्रों के लिये अधिक से अधिक 36 तथा कम से कम 12 सदस्यीय अंबुद समान हों। इन अंबुद समानों की स्थिति केवल परामर्शी रहेगी। ये पूर्णतः अराजनीतिक मानव हित संवर्धक संगठन की भूमिका निर्वाह करेंगे। निर्णायक शक्ति संसद, विधान मंडल, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत, नगर निगम आदि सहित ग्राम सभा में निहित हो। 
मत्स्य न्याय से कैसे छुटकारा मिले ?
  हमारी इस धरती में तीन चौथाई जल और एक चौथाई क्षिति है। जल जीवन में तालाब, नदी, सागर व महासागर में यत्र तत्र सर्वत्र मत्स्य न्याय व्याप्त है। मत्स्य न्याय से तात्पर्य बड़ी मछली या मगर वगैरह के द्वारा छोटी मछली व छोटे जलजीव का खा जाना, यह मत्स्य न्याय मनुष्यों सहित थलचारी व नभचारी जीवों में भी देखने को मिलता है। भारतीय औपनिषदिक वाङ्मय इस ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ की अभिव्यक्ति से करता है। प्रकृति में पूर्वाग्रह नहीं होता वह काल चक्र प्रवर्तित है पर मनुष्य ने प्रकृति के समानांतर मानवीय स्पंदन की कारूणिक व्यवस्था की भी संकल्पना की है। इसलिये मनुष्य को मत्स्य न्याय सरीखे प्राकृतिक कृत्य के समानांतर महानुभूति वाली सहानुभूति का सहारा लेना जरूरी होता है। मछली द्वारा मछली का निगला जाना जब मनुष्य देखता है उसके करूणामूलक रोम स्पंदित होते हैं पर जो मनुष्य निर्दय निष्ठुर तथा आततायी हैं उसे मत्स्य न्याय एक सहारा देता है। राजधर्म व दस्युधर्म में मत्स्य न्याय ही मानव चेतना को चौकस करता है। इसलिये सटीक राजधर्म का अवलंबन लेने वाला राजपुरूष मत्स्य न्याय की अनदेखी नहीं करता। उसका करूणापरक मन यह गवाही देता रहता है कि मनुष्यों में मत्स्य न्याय प्रभावी न हो। जहां कहीं मत्स्य न्याय की गंध आती दिखे उसे निर्मूल करने के उपाय हों। लोकतंत्र जब परिवारतंत्र का बन्दी बन जाता है। पारिवारिक एकतंत्र लोकतंत्र की ओढ़नी तो जरूर ओढ़ता है पर अपने प्रबंधन में परिवारतंत्र व परिवारहित सर्वोपरि है। नाम गिनाने की जरूरत नहीं है भारत में पिछले चार दशकों से परिवारतंत्र बढ़त पर है। इन्दिरा राजीव माता-पुत्र, सोनिया राहुल मातृ पुत्र परिवारतंत्र के साथ साथ शेख अब्दुल्ला-फारूख उमर पिता पुत्र पौत्र मुफ्ती सईद पिता महबूबा पुत्री परिवारतंत्र सैफई स्वराज का प्रतीक मुलायम सिंह अखिलेश परिवारतंत्र लालू राबड़ी दाम्पत्य एकतंत्र, देवगौड़ा कुमार स्वामी परिवारतंत्र प्रकाश सिंह-सुखबीर सिंह पिता पुत्र एकतंत्र द्रविड़ राजनीति के चैतन्य व्यक्तित्त्व करूणानिधि परिवारतंत्र तथा शिव सेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे व उनके पुत्र उद्धव ठाकरे का राजनीतितंत्र के समानांतर बीजू पटनायक नवीन पटनायक परिवारतंत्र भारतीय लोकतंत्र को परिवार प्रधान राजकरण के घटक हैं। इन घटकों में पवार का पिता पुत्री राजकरण भी जोड़ दिया जाये तो केन्द्र में मां पुत्र के दो संच, कश्मीर में तीन पीढ़ियों का राजकरण के साथ साथ पिता पुत्री राज्य, पंजाब का पिता पुत्र राज्य, उत्तर प्रदेश में सैफई परिवारतंत्र, बिहार में दाम्पत्य राजतंत्र, उड़ीसा में पिता पुत्र राजतंत्र, तमिलनाडु में पारिवारिक दलतंत्र, कर्णाटक में पिता पुत्र राजकरण, महाराष्ट्र में राजनीतिक क्षेत्र के दो कुटुम्बतंत्र। भारत में पराजयेच्छा - हार किससे स्वीकारूँ - पुत्रात् इच्छेत् पराजयम् शिष्यात् इच्छेत् पराजयम् ये दो महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं। महाशय समीर कोचर ने ‘डिफीटिंग पावर्टी’ शीर्षक रखा। लोकतंत्र अथवा गणतंत्र में जो भारतीय जातीय राजतंत्र का मुख्य कारक भी था गणतंत्र का मुखिया पिता के पश्चात पुत्र भी हो सकता है। उसकी गणतांत्रिक पात्रता पर रोक नहीं लग सकती। राज करने वाले पिता द्वारा जब अपने पुत्र मोह को प्राथमिकता दी जाये जैसा पुत्र मोह धृतराष्ट्र को था। अगर पुत्र ने अपनी गणतंत्रीय या लोकतंत्रीय विशिष्टताओं से पिता को पराजित कर दिया वह पिता से आगे बढ़ गया। सैफई परिवारतंत्र के पुरोधा धरतीपुत्र मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव अगर आने वाले समय में उ.प्र. सरीखे भारतीय संघ के सबसे बड़ी आबादी वाले घटक राज्य के लोक जीवन को वैसा रास्ता दिखा सकें जिसकी शुरूआत नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री भारत ने की है। आने वाले समय में अखिलेश यादव अपना डंका बजा सकते हैं बशर्त्ते उनकी राजनीति परिवार तक सीमित न रहे। वे लोकनीति का बाना पहनें। सर्वाधिक तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय नेतृत्त्व - सत्ता पक्ष के समानांतर विपक्ष का एक दल या बहुत से क्षेत्रीय दल मिल कर नेतृत्त्व ऐसे व्यक्तित्त्व को सौंपें जो सब की सुने और आम सहमति का मार्ग अपने साथियों को सुझाता रहे। स्वयं को राष्ट्रीय सदाचार का दर्पण सरीखा व्यक्तित्त्व निर्माण करे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक मिसाल अपने साथियों और प्रतिपक्ष के लोगों के सामने रखी है। ग्राम सभा, नगर पालिका, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, घटक राज्य, विधानमंडलों, संसद व लोकसभा राज्यसभा में सत्ता व विपक्ष दोनों ओर नेतृत्त्व इतना समर्थ व जागरूक रहे कि राष्ट्र प्रबंधन में मत्स्य न्याय के रूकावट के विभिन्न उपाय संपन्न हों। अभी तो समूची आर्थिकी उद्योग व्यापार, व्यावसायिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में सामर्थ्यवान याने संपन्न व विपन्न वर्ग के वैयक्तिक व सामूहिक हितों में मत्स्य न्याय की रूकावट यत्र तत्र व्याप्त है। व्यावसायिक औद्योगिक आर्थिकी जगत में मत्स्य न्याय से पीड़ित वर्ग यत्र तत्र देखने में आता है। पूर्ववर्ती सरकार ने 2004 में भारतीय शासन की कमान की चाबुक हाथ में लेते ही एम.एस.एम.ई. मंत्रालय का गठन किया। 2006 में एम.एस.एम.ई एक्ट के द्वारा उद्यमिता जगत में एक अजीबोगरीब किस्म की मत्स्य न्यायी व्यवस्था को उभार दिया। हस्तकला, हाथ की कारीगरी से जीवन यापन करने वाले दस्तकारों कारीगरों को हाट व्यवस्था उपलब्ध कराये जाने के नाम पर दलाली करने वाला एक नया सांचा तैयार हुआ है जो कहता तो यह है कि वह दस्तकारों का पैरोकार है मददगार है पर लाभार्जन का एक बहुत बड़़ा हिस्सा यह हाट व्यवस्था डकार रही है। जरूरत इस बात की है कि पिछले दस वर्षों में माइक्रो क्राफ्ट से जुड़े दस्तकारों, कारीगरों व हाथ का श्रम कर जीविका कमाने वालों को आर्थिकी उत्थान की किस सीढ़ी तक पहुंचाया गया है। कारीगरों, दस्तकारों, मूर्तिकारों की दक्षता संवर्धन के नाम पर जो Excellence Promotion Units कायम हुई है उनके द्वारा पिछले दस वर्षों में हाथ की कारीगरी से जीविका अर्जन करने वाले वर्गों को वास्तविक लाभ कम हुआ है क्या उनकी आमदनी उस स्तर तक बढ़ी है जिस रफ्तार से महंगाई का ग्राफ बढ़ता जारहा है। जरूरत इस बात की भी है कि पी.पी.पी. मोड का भी मूल्यांकन हो, पिछले दस वर्षों में उत्पादक श्रम से अर्जन करने के बजाय बढ़ावा सेवाक्षेत्र की अनुत्पादक छद्म उद्यमिता को मिला है इसलिये व्यावसायिक औद्योगिक, उत्पादक श्रम के क्षेत्र में व्याप्त मत्स्य न्याय को शून्य स्तर पर लाने के उपाय अत्यंत जरूरी हैं। 
प्रधानमंत्री जन धन योजना पोस्टल सेविंग बैंकिंग से जोेड़ने का संकल्प लें। 
  भारत में साढ़े छः लाख मालगुजारी गांव हैं। इन सभी मालगुजारी गांवों को संवैधानिक पंचायत राज की सह इकाई गांव सभाओं की अखिल भारतीय संख्या अढ़ाई लाख है। 31 मार्च 2011 की गणनानुसार भारत के 1,39,040 गांवों में डाकखाने थे। शहरी इलाकों के डाक घर संख्या 18826 है जो 7935 शहरी इलाकों में कार्यरत हैं। समीर कोचर की सम्मति के अनुसार भारत में वित्तीय संगठनों का व्यापक संगठन बनाये जाने की तात्कालिक जरूरत है जिससे प्रधानमंत्री जन धन योजना क्रियान्वयन सहित बैंकिंग पत्राचार कर्त्ता एक ऐसी अनिवार्यता है जो स्वावलंबन तथा जन धन योजना का सटीक क्रियान्वयन में सहायक हो सकती है। सवाल फिर फिर बार बार यही उठता है - ‘मूढ़ कविः यशः प्रार्थी’ यह बात महाकवि कालिदास ने अपने काव्यात्मक भावना में व्यक्त की। महात्मा गांधी ने विश्व ख्याति अर्जित करने से काफी पहले आज से करीब एक सौ दस वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान अपनी मातृभाषा गुजराती के जरिये इंडियन ओपीनियन का इजहार करते हुए बीस अध्याय वाल ‘हिन्द स्वराज’ की संरचना की। उन्होंने हिन्द स्वराज में जो अभिव्यक्ति प्रस्तुत की वे आज भी हिन्दुस्तान सहित विकासोन्मुख दुनियां और पश्चिमी जगत की विकसित दुनियां को विकास-विनाश के समानांतर संवर्धन से मानवता को सताने वाली चेतावनी का काम कर रही है। पश्चिम के तत्कालीन चिंतन पोखर के विज्ञ ज्ञाताओं ने मोहनदास करमचंद गांधी की हिन्द स्वराज की प्रशंसा की और ऊर्ध्व बाहु होकर टालस्टाय सहित सभी यूरोपीय विद्वानों ने गांधी मार्ग को ही आधुनिक विश्व का त्राता घोषित किया इसलिये मानव हितार्थी मौजूदा भारतीय नेतृत्त्व व्यक्तित्त्व के व्यष्टि के समानांतर समष्टि के नेतृत्त्व को भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमोघ वाक्शक्ति को हृदयंगम करते हुए मनुष्य समाज के हर वर्ग के योगक्षेम का मार्ग प्रशस्त करने में अपना योगदान करना ही आज की मुहूर्त्त व मूर्त्त आवश्यकता है। अंग्रेजी के Bank शब्द का आध्यात्मिक प्रबोधन यकीन भी है। इस समय भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को कर्जा न लौटाने की बनावटी बीमारी ने आ घेरा है। सिस्टम फेलियर ने बैंकिंग पर भी कर्जा न चुकाने की बीमारी का ग्रहण लगा हुआ है। प्रधानमंत्री जन धन योजना की सफलता बैंकिंग कारोबार की सफलता तथा बैंक का गांव गांव घर घर हर झुग्गी झोपड़ी तक कैसे पहुंच हो इस पर निर्भर करता है। 
  बैंकों की ग्रामीण शाखाओं संबंधी वास्तविकता भी लगभग वैसी ही है जैसी कि कारपोरेट सेेक्टर पर बैंकों की उधारी जिसे चुकाने की कारपोरेट सेक्टर बहाने ढूंढता रहता है। किसी भी शहरी क्षेत्र का आभ अथवा प्रभाव क्षेत्र शहर से तीन चार मील दूर गांवों तक होता है। व्यापारिक बैंक आम तौर पर अपनी ग्रामीण शाखायें शहर से सटे हुए अर्ध शहरी इलाकोेें में करते हैं जो म्यूनिसिपल कानून की नजर में ग्रामीण इलाका है पर वस्तुतः यह क्षेत्र अर्ध शहरी इलाका ही होता है। जरूरत इस बात की है कि पूर्णतः ग्रामीण शाखायें उन्हीं जगहों को माना जाय जो शहर से आठ किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर स्थित हों। सप्ताह में छः दिन काम करने वाले बैंकों की कितनी ग्रामीण शाखायें हैं इसका आंकलन जरूरी है। भारतीय स्टेट बैंक सहित सभी राष्ट्रीयकृत बैंक सहकारी बैंक रीजनल रूरल बैंक अर्बन बैंकों सहित बैंकों की समूचे भारत में कितनी शाखायें हैं उनमें कितनी शाखायें गांवों में हैं। देश के छः लाख चालीस हजार मालगुजारी गांवों में भारतीय डाक सेवा की 1,39,040 डाक घर सेवा को बैंकिंग सेवा से तत्काल जोड़े जाने की जरूरत है। चाहिये तो यह कि प्रत्येक ग्राम सभा क्षेत्र में एक डाक घर व एक बैंक जरूर हो। जब तक अढ़ाई लाख ग्राम सभाओं में बैंक शाखायें शुरू नहीं हो जातीं डाक घर पोस्टल बैंक सेवा को सामर्थ्यवान बनाये। बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने राष्ट्रीयकृत भारतीय बैंकों में वे सभी विकृतियां घुस गयीं जो सरकार के विभिन्न अंगों में थोड़ा बहुत तो विद्यमान थीं ही पर बाजारीकरण से समूचा शासन तंत्र सिस्टम फेलियर का क्षेत्र बन गया। जिन बैंकों व बैंकरों पर विश्वास किया कि वे बैंक विश्वास बनाये रखेंगे उन्होंने भी विश्वास का दीवाला निकाल डाला इसलिये समीर कोचर ने उत्तम सुझाव दिये हैं। वह हिन्दुस्तान के गांव गांव घर घर तक कैसे पहुंचें। अगर समीर कोचर ने काशीवासी तुलसीदास का रास्ता अपना कर अपनी आत्मा के स्वांतः सुखाय गरीबी हराओ को अपनी मातृभाषा में लिखा होता तो वे हिन्दुस्तानी गांवों तक वित्तीय साक्षरता का मार्ग प्रशस्त किये होते। जिन महानुभावों ने समीर कोचर की पुस्तक का प्राक्कथन लिखा अपनी सम्मति व्यक्त की उनमें भारत वित्त मंत्री अरूण जेटली संसदीय कार्य व नगर विकास मंत्री वैंकय्या नायडू पूर्व वित्त मंत्री तथा जयप्रकाश आंदोलन के मुखर प्रशंसक रहे यशवंत सिन्हा भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन तथा अमेरिकी नेता हिलेरी क्लिंटन सम्मिलित हैं। जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ भारत का दर्पण है। जवाहरलाल के अंतर्मन में पीड़ा थी कि हिन्दुस्तान का आम आदमी उनकी पुस्तक हिन्दुस्तान की खोज से तभी लाभान्वित हो सकता है जब वह हिन्दुस्तानी भाषाओं में भी छपे। उन्हें सस्ता साहित्य मंडल के हरिभाऊ उपाध्याय का हार्दिक सहयोग मिला। अवध के जिन किसानों की दुर्दशा ने पंडित नेहरू को डिस्कवरी आफ इन्डिया लिखने के लिये प्रेरित किया अवध के किसानों के लिये पंडित नेहरू की आकर्षक पुस्तक का हिन्दीकरण हरिभाऊ उपाध्याय ने किया। क्या ही अच्छा होता समीर कोचर महाशय अपनी मातृभाषा में भी गरीबी हराने का मंत्र लिख डालते। 
  महात्मा गांधी ने ‘ऐडाप्टेड पावर्टी’ की जिसे हम हिन्दुस्तानी लहजे में गरीबी ओढ़ना कह सकते हैं। गरीबी ओेढ़ने से महात्मा गांधी का तात्पर्य सीधे सादे रहन सहन से था। आज हम भारत वासी गरीबी हराने व गरीबी ओढ़ने के द्वन्द युद्ध में फंस हुए समाज हैं। विवेकानंद व महात्मा गांधी के उद्भव काल में मात्र छः वर्ष का अंतर था। दोनों दरिद्रनारायण की नारायणी शक्ति से प्रभावित करूणामूलक चिंतन पोखर की उपज थे। जीव दया के समानांतर सृष्टि के स्थावर जंगम जलचर थलचर नभचर जीवधारियों के लिये उनकी अंतरात्मा में महानुभूति वाली सहानुभूति थी। विवेकानंद व गांधी ने दरिद्रनारायण संबंधी जो उद्गार समय समय पर व्यक्त किये वह सत्ताधिष्ठान की सत्तामूलक भ्रांति नहीं। राजसत्ता भोगने वाले व्यक्तियों के लिये गरीब-दुर्बल प्रति सहानुभूति का दिग्दर्शक था। हिन्दुस्तानी गांवों के विकास अभियान में गांवों को सामूहिकता का (शहरी भीड़ तंत्र नहीं) वैश्विक बैंकिंग व छोटे स्तर में सामूहिक बैंकिंग जिसे अंग्रेजी में कम्यूनिटी बैंकिंग कहा जाता है उसका श्री गणेश करने के साथ साथ श्रीमती अरून्धती भट्टाचार्य ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे बैंकिंग का खांचा किस किस्म का हो उसका उल्लेख किया है। साथ ही यह भी कहा है कि भारतीय बैंकर दुनियां में सबसे कम पारिश्रमिक पर बैंकिंग कर रहा है इसलिये प्रधानमंत्री संकल्पित जन धन योेजना के सफल संचालक के लिये राष्ट्रीय, घटक राज्य, जिला पंचायत, नगर निगम, नगर परिषद, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत व ग्राम सभा स्तरों पर ‘बैंकिग अंबुद समान’ मैकेनिज्म की तात्कालिक जरूरत है। वित्तीय साक्षरता प्रभार के लिये पूर्वोक्त राष्ट्रीय अंबुद समान, घटक राज्य अंबुद समान, जिला पंचायत अंबुद समान, नगर निगम अंबुद समान, नगर परिषद अंबुद समान, क्षेत्र पंचायत अंबुद समान, जिला पंचायत अंबुद समान व विकास खंड अंबुद समान एवं ग्राम सभा अंबुद समान स्तर पर वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग पत्राचार जन धन योजना को उद्यमिता से जोड़ते हुए स्वावलंबन रोजगार तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वित्त पोषण का सतत प्रवाह एवं वित्तीय चौकसी प्रधानमंत्री जन धन योजना को साकार करने के लिये नितांत जरूरी उपक्रम है। 
पहले भाषायी ऊहापोह वाली अराजकता खत्म हो।
  हम भारतवासी जब तक देश की नागरी इतर लिपि वाली उर्दू, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी और मइती (मणिपुरी भाषा) ग्यारह भारतीय भाषाओं और देश के जो राज्य घटक अंग्रेजी भाषा को अपना चुके हैं, उनका भाषायी योगक्षेम सुनिश्चित नहीं करेंगे नागरी लिपि अपनाने वाली भाषाओं यथा मराठी व नैपाली को वही महत्त्व नहीं देेंगे जो उर्दू सहित इतर भाषायी प्रयोक्ता भाषायी चाहते हैं। सिद्धांत व क्रियान्वयन के लिये भारत की संसद तथा राज्यों के विधान मंडलों में मातृभाषा या चाहत भाषा में अभिव्यक्ति का अधिकार भाषायी अराजकता को रोकने का एक मात्र उपाय है। डिजिटल इंडिया का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय संकल्प तभी फलदायी हो सकता है जब गांव गांव जन जन को उसकी मातृभाषा या चाहत भाषा में संदेश मिलें। विश्व की दस प्रमुख भाषाओं अंग्रेजी, मंदारिन, स्पेनिश, अरबी, मलय, जर्मन, रसियन, फ्रेंच, पुर्तगाली व जापानी प्रमुख हैं। यद्यपि दुनियां में हिन्दी बोलने वालों की संख्या चौथे नंबर पर है, बांग्ला बोलने वालों की सातवें और पंजाबी बोलने वालों की संख्या 11वें पायदान पर है पर इन तीनों भारतीय भाषाओं के लिये इन्टरनेट में पैठ होना बाकी है। हिन्दी को पिछले छः महीनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमोघ वाणी का स्तर तो प्रदान कर दिया है। वे जहां जाते हैं श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लोहिया, अटल बिहारी की तरह हिन्दी में ही अपना वक्तव्य देते हैं। भारत में हिन्दी के साथ ‘घर का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध’ कहावत चरितार्थ होरही है। संस्कृत, नागरी व हिन्दी के विरोध की धार तभी कुन्द हो सकती है जब तमिल सहित सभी भारतीय भाषाओं को भारतीय संसद व रायसीना हिल्स पर केन्द्र सरकार के दफ्तरों में आवक हो। यह तभी मूर्त रूप धारण कर सकती है जब केन्द्र सरकार व हिन्दीतर भाषी राज्य घटक सरकारों का पत्र व्यवहार उनकी स्वीकृत लिपि व राज्य विधानमंडल निर्णीत भाषा में हों। प्रधानमंत्री नरेेन्द्र मोदी द्वारा संकल्पित व क्रियान्वित जन धन योजना की भी सफलता समूचे कार्यक्रम की स्थानीय भाषाओं के माध्यम से जन जन तक पहुंचा जाये। समीर कोचर द्वारा अपनी पुस्तक में चर्चित शेष मुद्दों पर यह ब्लागर आगामी ब्लागों में भी चर्चा करेगा। 

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