लोकपालो न ताम् वाचाम्] उक्त्वा न मिथ्या करिष्यति
भारत जिसे मध्यपूर्व के इस्लामी संस्कृति वाले राष्ट्र हिन्दुस्तान और यूरप के ख्रिस्ती धर्मी लोग इण्डिया कह कर पुकारते हैं उस हिन्दुस्तान के लोग प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति - जब सूर्यदेव कन्या राशि में संक्रमण करते हैं, उस दिन को विश्वकर्मा जयंती के रूप में निर्माणकर्त्ता-अभियंत्री समूह के लोग अपने औजारों की पूजा अर्चना करके मनाते हैं। आमतौर पर विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को ही होती है। हिन्दुस्तान में सृष्टि के साथ-साथ दो संस्कृतियां समानांतर चलती आरही हैं। एक है देव संस्कृति जिसके अधिष्ठाता - शक्र, इन्द्र, मधवान आदि नामों से पुकारे जाते हैं। ये त्रिदश, त्रिविष्टप देवेन्द्र भी कहलाते हैं। विश्वकर्मा इसी देव समाज के वास्तुकार हैं। दूसरी ओर इस पुराने हिन्दुस्तान में अदिति-कश्यप संतानों को जिन्हें हम हिन्दुस्तानी देवता कहते हैं उनके साथ कश्यप की दूसरी भार्या दिति के पुत्र दैत्यराज हिरण्यकश्यप, हरिद्रोही वर्तमान में हरदोई नाम सेे पुकारे जाने वाले नगर के पहले दैत्यराज थे। हिरण्यकश्यप के जुड़वां भाई हिरण्याक्ष थे। इनकी एक मौसी का नाम दनु था। दिति व दनु दोनों अदिति के प्रतिस्पर्धी थे। दनु के पुत्र नमुचि के सहोदर दानवी अभियंत्रण शास्त्र व निर्माण कला के दक्ष व्यक्तित्त्व का नाम - मय या मयासुर था। दानव मयासुर विश्वकर्मा की तरह ही अद्वितीय वास्तुकार थे। इन्द्रप्रस्थ या शक्रप्रस्थ नाम से जाने जाने वाले स्थान का पार्श्ववर्ती भाग खाण्डवप्रस्थ नाम से पुकारा जाता था। खाण्डवप्रस्थ के भयावह अग्निदाह में कुन्ती के तीसरे बेटे पार्थ अर्जुन ने मय या मयासुर नाम से पुकारे जाने वाले दानव शिल्पी की प्राण रक्षा की थी। अग्निदाह से उन्हें बचाया था। मयासुर ने अर्जुन से कहा - ‘त्वया त्रातोस्मि कौंतेय’। अर्जुन ने कहा - ‘स्वस्ति गच्छ महासुरः प्रीतिमान मे भव नित्यम् प्रीतिमत्तो वयम् च ते’। अर्जुन के ऐसा कहने पर मयासुर बोला - ‘अहम् हि विश्वकर्मा वै दानवानाम् महा कविः सोहम् वै त्वत्कृते कर्तुम् किंचित् इच्छामि पांडव’। अर्जुन ने मयासुर से कहा - मय दानव श्रेष्ठ! मैं आपके संकल्प को व्यर्थ नहीं करना चाहता। मेरा अनुरोध है कि आप वासुदेव श्रीकृष्ण का ही कोई कार्य संपन्न कर दो। इससे आपकी कर्त्तव्यपूर्त्ति हो जायेगी। वासुदेव श्रीकृष्ण दो घड़ी तक चिंतन-मनन करते रहे तब उन्होंने शिल्पी शिरोमणि दानव श्रेष्ठ मय से कहा -
‘यदित्वम् कर्तुकामोसि प्रियम् शिल्पवताम् वर, धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे।
याम् कृताम् नानु कुर्वन्ति मानवा प्रेक्ष्य विस्मिता मनुष्य लोके सकले तादृशाम् कुरू वै सभाम्’।।
मयासुर ने वासुदेव श्रीकृष्ण की सम्मति को पूरा सम्मान देते हुए पाण्डव-युधिष्ठिर के लिये विमान सरीखी अति उत्कृष्ट सभा का निर्माण संकल्पित किया। श्रीकृष्ण ने मयासुर की मुलाकात भी करूराज युधिष्ठिर से करायी। राजा युधिष्ठिर ने मयासुर का स्वागत सत्कार किया। मय दानव ने पार्थ अर्जुन को बताया कि प्राचीन काल में उन्होंने राजा वृषपर्वा जो कैलास में यज्ञ करना चाहते थे उनके लिये अद्भुत मणिमय भाण्ड तैयार किया था। मैं उसे देखने जारहा हूँ यदि वह भाण्ड वहीं होगा तो ले आऊँगा। यह निर्माण तब बिंदुसर के निकट किया गया था। वहां भीम के लायक गदा भी रखी है। वहां पर लोकपाल वरूणदेव का देवदत्त नामक विशेष शंख भी रखा है। मय ने कहा - मैं वह गदा भीम को ओर देवदत्त नामक शंख अर्जुन को देना चाहता हूँ। हिमालय में हिरण्यश्रंग नामक महामणि युक्त पर्वत है। उसी बिन्दुसर में गंगा को धरती पर लाने की कामना करने वाले भगीरथ ने तपश्चर्या की थी। वैशम्पायन ने जन्मेजय से कहा - उस सभा की रक्षा आठ हजार किंकर करते रहते थे तथा उस सभा की एक विशेषता यह भी थी कि उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर उठा कर ले जाया जा सकता था। उस सभा भवन के अन्दर अति सुंदर पुष्करिणी भी बनी हुई थी। यूरप व अमरिका की आधुनिक संस्कृति के संदर्भ में वह पुष्करिणी एक Swimming Pool किस्म की जलविहार स्थली थी। उस पुष्करिणी में कमल खिले हुए थे। उसमें स्वर्णिम मछलियों, कछुओं से उसकी शोभा बढ़ रही थी। उस पुष्करिणी में दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। जल को स्थल समझ कर उसमें गिर भी जाते थे। धर्मराज की उस सभा के चारों ओर वृक्ष पंक्तियां भी थीं। उनकी शीतल छाया, वे मनोरम वृक्ष हवा के झोंकों से हिलते रहते थे। सभा के चारों ओर अनेकों उपवन, बावड़ि़यां भी थीं जिनमें हंस, चकोर, कारण्डव आदि पक्षी चहचहाते रहते थे। चौदह महीनों में मय ने उस अद्भुत धर्मराज सभा का निर्माण किया था। सभा जब तैयार होगयी मय ने धर्मराज युधिष्ठिर को सभा निर्माण की सूचना दी। उस श्रेष्ठ सभा का निर्माण कर मयासुर ने अर्जुन से कहा - सव्यसाची इस सभा में एक ध्वजा भी रहेगी। ध्वजाग्र में किंकर गण रहेंगे। यह ध्वज वानरध्वज कहलायेगा। यह ध्वज कहीं अटकेगा नहीं, रूकेगा नहीं। मयासुर ने अपने त्राता अर्जुन को अपनी छाती से लगा कर उससे विदायी ली। धर्मराज भवन में युधिष्ठिर ने प्रवेश किया। दिल्ली में पुराना किला - पाण्डव किला भी कहा जाता है। दिल्ली पांच हजार एक सौ वर्ष पुरानी बस्ती है। तब इसे इन्द्रप्रस्थ कहते थे। कुछ विद्वान इसे शक्रप्रस्थ भी कहते थे। उस अद्भुत सभा भवन में प्रवेश करने से पहले राजा युधिष्ठिर ने दस हजार ऋत्विज-याजकों को खीर खिलायी। अभ्यागतों का स्वागत कर उन्हें संतुष्ट किया। पुण्याहवाचन करने वाले बटुकों का स्वागत-सत्कार किया। स्वस्तिवाचन करने वाले ऋत्विज उच्च स्वर से स्वस्तिवाचन कर रहे थे। तब वहां अनेकानेक राजाओं व महर्षि समाज ने प्रवेश किया। पुण्यघोषकर्त्ता समूह को युधिष्ठिर सवत्सा गौदान भी करते जारहे थे। मल्ल, नट, झल्ला, सूत, वैतालिक, चारण तथा विभिन्न विद्या जानने वाले विद्याधर राजा युधिष्ठिर की स्तुति गारहे थे। वहां अनेकानेक राजा, ऋषि उपस्थित थे। वैशम्पायन ने उस सभा का ब्यौरा देते हुए जन्मेजय से कहा - वहां असित, देवल, सत्य, सर्पिमाली, महाशिरा, अर्वावसु, सुमित्र, मैत्रेय, शुनक, बलि, बक, दाल्म्य, स्थूलशिर, कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास, शुकदेव, सुमंतु, जैमिनि, पैल आदि बादरायण व्यास के अनेक शिष्य उपस्थित थे। वैशम्पायन कहते हैं - वे भी व्यास शिष्य थे। तित्तिर, याज्ञवल्क्य, पुत्रों सहित लोमहर्षण, अप्सुहोम्य, धौम्य, अणीमांडव्य, कौशिक, दामोष्णि, त्रैवलि, पर्णाद, घटजानुक, मौजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, सारिक, बलिवाक्, सिनीवाक, सत्यपाल, कृताश्रय, जातुकर्ण्य, शिरग्वान, आलंव्य, पारिजातक, महाभाग पर्वत, मार्कण्डेय, पवित्रपाणि, सावर्ण, मालुकि, गालव, जंघाबन्धु, रैम्य, कोपवेग भृगु, हरिवसु, कौडिन्य, वभ्रुमाली, सनातन, कक्षीवान, औशिज, नाचिकेत, गौतम, पेंग्य, वराह, शुनक द्वितीय, शांडिल्य, कुक्कुर, वेगुजंघ, कालप एवं कठ आदि धर्मवेत्ता जितात्मा, जितेन्द्रिय मुनि धर्मराज युधिष्ठिर की उस सभा में उपस्थित थे। मय निर्मित उस विशाल सभा में मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, उग्रसेन, कक्षसेन, क्षितिपति, अपराजित क्षेमक, कन्नौज राज, कमढ़, महाबल कंपन ये सभी धर्मराज युधिष्ठिर की उपासना करते रहते थे। मय निर्मित उस अद्वितीय सभा में जटासुर, मद्रनरेश शल्य, राजा कुंतिभोज, किरातराज पुलिन्द, अंगबंग पुण्ड्रक, पाण्ड्य, उड्रराज, आंध्रनरेश सुमित्र, शैव्य, चाणूर, देवरात, भोज भीमख्य, श्रुतायुध, मगधनरेश जयसेन, सुकर्मा, चेकितान, पुरू, केतुमान, वसुदान, विदेहराज कृतक्षण, सुधर्मा, अनिरूद्ध, श्रुतायु, अनूपराज, क्रमजित, सुदर्शन, पुत्र सहित राजा शिशुपाल, करूणराज दन्तवक्र, आहुक, विपृथु, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, सत्यक, भीष्मक, आकृति, द्युमत्सेन, केकयराज कुमार सोमक, केतुमान, महाबली वसुमान आदि कुन्तीनंदन युधिष्ठिर की सभा में विराजमान थे। युधिष्ठिर की उस सभा में पांचों पांडव अन्यान्य महापुरूषों तथा गंधर्व-उपदेवों के साथ बैठे थे। तब उस सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। वैशम्पायन जन्मेजय को कहते हैं - वेद-उपनिषद ज्ञाता, देवताओं तथा ऋषि समूह पूजित, इतिहास-पुराण मर्मज्ञ, पूर्वकल्प विशेषज्ञ, न्यायप्रिय, धर्म के मूल तत्त्व के ज्ञाता, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद, ज्योतिष इन षडंग पंडित शिरोमणि, वेदवचन एक्यवाक्ता, संयोग-नानात्त्व समवाय, ज्ञान विशारद, प्रगल्भ वक्ता, मेधावी स्मरणशक्ति संपन्न, नीतिज्ञ, त्रिकालज्ञ, ब्रह्मवेत्ता, प्रमाणों द्वारा निश्चित सिद्धांत पर पहुंचे पंचावयवयुक्त, वाक्य गुणदोष ज्ञाता, बृहस्पति सरीखे वक्ता के साथ तर्क-वितर्क करने की योग्यता रखने वाले, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चतुष्टयी का यथार्थ निश्चय करने वाले समस्त ब्रह्माण्ड के एकल ज्ञाता, देव-दानव समाज में भी वैराग्य, राग उत्पन्न करने वाले देवर्षि नारद ज्योंही मयदानव निर्मित धर्मराज सभा में पधारे तो राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों सहित उठ कर उन्हें प्रणाम किया। उनका आदर-सत्कार करते हुए उन्हें उनके योग्य आसन में बैठा कर उनकी अर्चना की। देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से धर्म, अर्थ व काम(मोक्ष को छोड़ कर) - पप्रच्छेदम् युधिष्ठिरम् अष्टोत्तर - एक सौ आठ सवाल राजा युधिष्ठिर से किये। इस संवाद को कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने पंचम वेद महाभारत में लोकपाल-सभाख्यान का नाम करण किया। उन महत्त्वपूर्ण सवालों में से केवल दस सवाल यहां की चर्चा के विषय बने हैं।
पहला महत्त्वपूर्ण नारद का सवाल -
क्वचित् आत्मान मन्वीक्ष परांश्च जयतां वरः तथा संघाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवते ?
दूसरा सवाल -
क्वचित् प्रकृतयः सप्ता न लुप्ता भरतवर्षम् ?
क्वचित् प्रकृतयः सप्ता न लुप्ता भरतवर्षम् ?
भारत युधिष्ठिर क्या तुम अपने विरोधी की शक्ति अच्छी तरह समझ कर विरोधी का सामना निर्विकार होकर आठ कर्त्तव्य खेती का विस्तार, व्यापार की संरक्षा, समीक्षित व्यूह रचना, व्यूह संरक्षा, आवश्यक सेतु निर्माण, मूल्यवान रत्नों की खान सुरक्षा, कर वसूली का समीक्षित मार्ग, उजड़े हुए इलाकों में लोगों को बसाने, मनीषी व्यक्तियों द्वारा ये अष्ट संधान संपन्न करते हो।
देवर्षि नारद ने आगे अगला तीसरा सवाल किया -
ब्राह्मे मुहूर्त्ते उत्थाय चिन्त वेदात्मनो हितम् -
सूर्योदय से दो घड़ी याने अढ़तालीस मिनट पूर्व काल को ब्राह्म मुहूर्त्त कहा जाता है। क्या तुम ब्राह्म मुहूर्त्त में उठ कर स्वहित चिंतन करते हो ?
सूर्योदय से दो घड़ी याने अढ़तालीस मिनट पूर्व काल को ब्राह्म मुहूर्त्त कहा जाता है। क्या तुम ब्राह्म मुहूर्त्त में उठ कर स्वहित चिंतन करते हो ?
नारद ने अगला चौथा सवाल राजा युधिष्ठिर से पूछते हुए कहा -
क्वचित् सहस्त्रैर्मूर्खाणाम् एक क्रीड़ासि पंडितम्।
अपने राजधर्म संचालन में क्या तुम हजारों मूर्खों के बजाय एक विद्वान प्रत्युपन्न मति तथा समस्या को देखते ही उसका निदान खोजने वाले योग्य व्यक्ति को अपने नजदीक रखते हो ? क्योंकि एक ही मेधावी शूर दांत विचक्षण अमात्य अपने आत्मसंयम से राजपुरूष का सतत योगक्षेम संपन्न करता रहता है।
नारद के पांचवे सवाल -
क्वचित् त्वमेव सर्वस्या पृथिव्या पृथिवीयते समाश्चानामिंशक्यश्च यथा माता यथा पिता।
क्वचित् त्वमेव सर्वस्या पृथिव्या पृथिवीयते समाश्चानामिंशक्यश्च यथा माता यथा पिता।
क्या तुम्हारी जनता तुम्हें माता-पिता सरीखा विश्वसनीय मानती है ?
नारद का छठा सवाल महत्त्वपूर्ण था -
क्वचित् राष्ट्रे तड़ागानि पूर्णानि च वृहन्ति च भाग शो विनि विष्टानि न कृर्षि देेव मातृका।
क्वचित् राष्ट्रे तड़ागानि पूर्णानि च वृहन्ति च भाग शो विनि विष्टानि न कृर्षि देेव मातृका।
कौंतेय युधिष्ठिर क्या तुम्हारे राज्य में सभी भागों में जल पूर्ण तालाब, झील तथा पानी संरक्षण के लिये पुष्करिणी आदि बने हुए हैं ? क्या तुम्हारी प्रजा केवल आकाश वृष्टि - वर्षा के सहारे ही खेती तो नहीं करती ? किसानों की बात रखते हुए नारद ने सातवां सवाल पूछा -
क्वचित् भक्तम् बीजम् च कर्षकस्या वसीदती, प्रत्येकम् च शतम् वृद्धया ददास्यऋणअनुग्रहम्।
कुरूराज युधिष्ठिर क्या तुम्हारे राज में किसान का अन्न या बीज नष्ट तो नहीं होता ? क्या तुम प्रत्येक किसान पर अनुग्रह करते हुए जरूरत पड़ने पर उसे ऐसी ऋण सुविधा उपलब्ध कराते हो जिसे वह समय पर ऋण वापसी भी कर सके ?
आठवें सवाल में वत्स युधिष्ठिर -
क्वचित् अनुष्ठिता तात वार्ता ते साधुभिः जनैः वार्तायाम् संस्थिता तात लोकोयम् सुखमेधते।
क्या तुम्हारे राज्य में पुरूषों द्वारा वार्ता, कृषि, गोपालन तथा व्यापार कार्य सही तरीके से होता है ? क्योंकि वार्ता वृत्ति ही सुख का मार्ग प्रशस्त करती है। नारद ऋषि का नवां सवाल था -
नास्तिक्यम् अनृतम् क्रोधम् प्रमादम् दीर्घ सूत्रताम् अदर्शनम् ज्ञानवताम् आलस्यम् पंच वृत्तिताम्।
एक चिन्तनमर्धानम् अनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् क्वचित् त्वम् वर्जयस्येतान् राजदोषान चतुर्दश।
प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृत मूलानि पार्थिवः।
नास्तिकता, असत्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियों का संग न करना, आलस्य, विषयासक्ति, प्रजाजनों पर अकेले चिंतन, अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ मूर्खों से विचार-विमर्श निश्चित कार्य प्रारंभ करने में विलंब या टालमटोल, गुप्त मंत्रणा को असुरक्षित करना, मांगलिक उत्सव न करना, सभी विरोधियों से एक साथ निपटने का प्रयास क्या इन चौदह राजदोषों से परहेज करते हो ? देवर्षि नारद का महत्त्वपूर्ण दसवां सवाल -
क्वचित् ते सफला वेदा। क्वचित् ते सफलम् धनम्। क्वचित् ते सफला दाराः। कथय वै सफलम् श्रुतम्।
क्या तुम्हारा ज्ञान(वेद), धन, लोक दाम्पत्य जीवन तथा ज्ञान सफल है ? नारद के सवालों का जवाब युधिष्ठिर ने प्रतिप्रश्न कर दिया।
कथम् वै सफला वेदा कथम् वै सफलम् धनम् -
वेदों की सफलता अग्निहोत्र, हवन से प्रकृति तुष्ट होती है। दान व भोग से धन की सफलता है।
वेदों की सफलता अग्निहोत्र, हवन से प्रकृति तुष्ट होती है। दान व भोग से धन की सफलता है।
एक सौ आठ सवालों में से केवल दस सवाल ही ऊपर व्यक्त हैं। किसी अन्य प्रसंग में नारद ऋषि के लोकपालाख्यान प्रसंग पर प्रासंगिक बहस की जा सकती है। इन्द्र, वरूण, यम, अग्नि, वायु ये पृथ्वी के नैसर्गिक लोकपाल हैं। लोकपाल का व्यापक लोक धर्म लोक रक्षा है। प्राकृतिक लोकपाल अपने कर्त्तव्यपथ पर प्रवृत्त रहते हैं। लोकपालों के समानांतर पृथ्वी में दश दिक्पाल भी हैं। क्षेत्रपाल की भी अपनी महत्ता है। ये दैवी सत्तायें अपने अपने कर्त्तव्यपथ में विचरण करती रहती हैं। सृष्टि में लोकशक्ति व लोकसत्ता के संदर्भ में राज्य का उदय अराजकता को शून्य करने, मनुष्य समाज में व्यवस्थित जीवन शैली को सातत्य देने के लिये राजा की कल्पना हुई। राजकाज में वंशानुगत राजपरम्परा के समानांतर भारत में गणतंत्रीय व्यवस्था भी विष्णुपुराण के अनुसार थी। विष्णुपुराण ने कूर्म मगध खस गणैः का उल्लेख किया है। महात्मा गौतम बुद्ध लिच्छिवियों के खस गणतंत्र प्रमुख राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। इन जातीय गणतंत्रों की परम्परा अभी भी जातीय पंचायतों में परिलक्षित होती है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र केवल साढ़े छः दशक उम्र का है। पार्लमेंटरी डैमोक्रेसी को भारत ने अपनाया है इसलिये पश्चिम परस्त लोकतांत्रिक परम्पराओं में भारतीय लोगों को सनातन भारतीय परम्पराओं का छोंक लगा कर लोकतंत्र को लोकग्राह्य बनाना ही होगा। गुलजारीलाल नंदा और अनुसूया बेन के ‘मजूर महाजन’ प्रयोग को, जवाहरलाल नेहरू के ‘भारत सेवक समाज’ प्रयोग को गुलजारीलाल नंदा के ‘भारत साधु समाज’ सहित देश में जहां जहां सदावर्तनुमा परोपकार धर्मा स्वयं सेवितायें यत्र तत्र विद्यमान हैं। उनका राष्ट्रीय समुच्चय - कानून के आधार पर चलने वाली सरकार के समानांतर अंबुदसमान सरीखा लोककल्प खड़ा करना ही होगा।
लोकसभा निर्वाचन निर्णय सफल उम्मीदवारों की घोषणा 16 मई 14 को हुई। सत्तापक्ष के सर्वसम्मत नेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्त्व की डोर अपने हाथ में ली। चुनाव में भाजपा व उसके राजनीतिक सहयोगियों के समूह ने विरोध पक्ष के किसी भी दल को लोकसभा सदस्य संख्या के दशमांश को न छू पाने के कारण विरोध पक्ष का प्रतीक चेहरा लोकसभा में अपनी पैठ बनाने में सफल नहीं हुआ। सबसे बड़े विरोधी दल ने विरोध पक्ष का विधि सम्मत नेता चुने जाने के लिये अपने तरीके से प्रयास किये। कुल मिला कर सभी विरोधी पक्षों के लोकसभा सांसदों की संख्या पचपन से ज्यादा है। पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने वर्तमान स्पीकर का ध्यानाकर्षण लोकसभा में विपक्ष के नेता पद के लिये सदन के नियमों तथा विभिन्न निर्णायक समितियों में नेता विपक्ष की उपस्थिति को ध्यान में रखते हुए लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण स्तंभ नेता विरोध पक्ष के संबंध में निर्णय लेने का आग्रह किया गया है। स्पीकर महोदया ने सर्वोच्च न्याय कानून प्रवक्ता मुकुल रोहतगी की सम्मति के संदर्भ में नेता विरोधी दल संबंधी स्पीकर द्वारा की जाने वाली निर्णायक घोषणा यथाशीघ्र किये जाने का आश्वासन दिया है। विरोधी दलों में राजनीतिक घुटन को रोकने के लिये स्पीकर महोदया विरोध पक्षों के सभी संसद सदस्यों (लोकसभा सदस्यों) तत्संबंधी रूझान जानने और उन राजनैतिक दलों में संसदीय दल प्रमुखों से विचार विमर्श कर एक ऐसा मध्यम मार्ग खोजें जिसमें तमाम विरोधी सांसदों का अभिमत व्यक्त हो। कांग्रेस सहित अन्ना द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, बीजद के बीच अगर सहमति बनती है, विरोध पक्ष के नेता का पद बारी बारी से कांग्रेस, अन्ना द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस व बीजद के सांसदों द्वारा पंद्रह पंद्रह महीनों के लिये आवंटित कर एक स्वस्थ संसदीय परम्परा का श्रीगणेश किया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि 1952 से लेकर 1969 तक लोकसभा में नेता विरोध पक्ष का अस्तित्त्व नहीं था। सबसे पहले मान्यता प्राप्त नेता विरोधी दल कांग्रेस ‘ओ’ के डा. रामसुभग सिंह थे। 1971 में यशवंत राव चह्वाण नेता प्रतिपक्ष थे। 1980 के पश्चात केवल नरसिंह राव प्रधानमंत्रित्त्व अवधि में नेता विरोध पक्ष था। अटल बिहारी सरकार में सोनिया गांधी ही नेता प्रतिपक्ष थीं। इसलिये सत्तापक्ष तथा सत्ताच्युत पक्ष जिसे यह अहसास ही नहीं था कि उसकी लोकसभा सदस्यता चार दहाई तक ही अटक कर रह जायेगी। दस वर्ष तक कांग्रेस ने जो सत्ता सुख लाभ उत्तरदायिता डा. मनमोहन सिंह के माथे थोप कर अर्जित किया वह अब उनकी दुखती रग बन गया है। इसलिये सोनिया गांधी को राजनीतिक यथार्थ का सामना तो करना ही होगा।
लोकपाल अथवा जनलोकपाल के कानूनी दायरे के अलावा भ्रष्टाचार की नयी फसल रोकने के लिये जनता जनार्दन के उस वर्ग का सक्रिय सहयोग सरकार को आज नहीं तो कल लेना ही पड़ेगा जिसे आज के समाज में सिविल सोसाइटी नाम से जाना जारहा है। उस सिविल सोसाइटी को भी अपने आप में कारगर बदलाव का उपक्रम करना होगा। वह समाज जो पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण कर चुका है, स्वस्थ है, जिसमें ऐसे लोगोें की बहुतायतता हो जो महाभारत के महत्त्वपूर्ण संवाद का उपयोग समाज सेवा हेतु करना चाहते हैं। महाभारत में महाकाव्य का नायक युधिष्ठिर है और महाकाव्य का खलनायकत्व धार्तराष्ट्र सुयोधन में अटका हुआ है। पंचम वेद रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने धृतराष्ट्र के महाराज कुमार सुयोधन को दुर्योधन भी कहा है। व्यवहार में लोग उसे दुर्योधन के नाम से ही जानते पहचानते थे। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण सुयोधन के समधी थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा -
वासुदेव! धर्मम् जानामि न च मे प्रवृत्ति अधर्मम् जानामि न च मे निवृत्ति।
तात्पर्य धर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य को भी जानता हूँ पर कर्त्तव्य में मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है और अधर्म, अकरणीय कर्म को भी जानता हूँ पर उससे मुझे वैराग्य नहीं होता, उससे जुड़ा ही रह जाता हूँ। श्रीकृष्ण से सुयोधन की सच्चाई के पर्दाफाश का उदाहरण है। इसलिये भारत में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर काबू पाने में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी सफलता पा सकते हैं जबकि वे कानून के राज के समानांतर सदाचार को भी भारतीय राजधर्म का केन्द्र बिन्दु बनाने की ओर अग्रसर हों। इस धरती पर सदाचार का उच्चतम आदर्श -
वासुदेव! धर्मम् जानामि न च मे प्रवृत्ति अधर्मम् जानामि न च मे निवृत्ति।
तात्पर्य धर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य को भी जानता हूँ पर कर्त्तव्य में मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है और अधर्म, अकरणीय कर्म को भी जानता हूँ पर उससे मुझे वैराग्य नहीं होता, उससे जुड़ा ही रह जाता हूँ। श्रीकृष्ण से सुयोधन की सच्चाई के पर्दाफाश का उदाहरण है। इसलिये भारत में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर काबू पाने में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी सफलता पा सकते हैं जबकि वे कानून के राज के समानांतर सदाचार को भी भारतीय राजधर्म का केन्द्र बिन्दु बनाने की ओर अग्रसर हों। इस धरती पर सदाचार का उच्चतम आदर्श -
यावत् भ्रियेत जठरम् तावत्स्वत्वम् हि देहिनाम् अधिकम् योऽभिमन्येत् सः स्तेवः दण्डमर्हति।
प्राणी या देहधारी का भोजनाधिकार उतने तक ही है जितने में उसे तृप्ति हो जाये। जरूरत से ज्यादा भोजन करने वाला दूसरे का हिस्सा हड़पता है इसलिये दण्डनीय है। उसे चोर कहें तो अत्युक्ति न होगी। पार्लमेंटरी कानून के राज के समानांतर भारत के वर्तमान माहौल को राष्ट्र हितैषी बनाने के लिये अत्यंत आवश्यक है कि सदाचार की चौखट, सदाचार की चौपाल देश के गांव गांव शहरों के मुहल्ला दर मुहल्ला यत्र तत्र सर्वत्र दृष्टिगोचर हो। सदाचार के आगाज से भ्रष्टाचारियों में एक भय व्याप्त होजाये। वे भ्रष्टाचार प्रवृत्ति की तरफ अग्रसर होने में डरें। जो कानूनी लोकपाल सरकार बना कर चाहती है कि वह बने और अपना काम करे पर देश के राजनीतिक मुखिया को सदाचारी समाज को अभयदान देने के मौके बारबार आते रहें।
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