Friday, 12 December 2014

भारतीय विदेश नीति की भाषायी राखी 
संस्कृत तथा पुरानी जर्मन भाषा पर्याय


  अंगेला मरकेल महाशया जर्मनी की लोक नाड़ीविद् राजनीतिज्ञा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पकड़ जर्मनी की देशिक नीति के समानांतर विश्व के अनेकानेक देशों में उनका जो वैदेशिक कूटनीति का स्त्रोत है उस पर भी उनकी गहरी पकड़ है। हिन्दुस्तान के केन्द्रीय विद्यालयों में छठी कक्षा से जर्मन भाषा पढ़ने वाले छात्रों के लिये भारतीय भाषा संस्कृत का चयन करना केन्द्रीय विद्यालय संगठन प्रशासन परिषद का अधिकार क्षेत्र है। अगर मानव संसाधन मंत्रालय ने भारतीय प्राचीन भाषा संस्कृत तथा संस्कृत भाषा की प्राकृत शब्द शक्ति संपन्नता पर गौर से विचार किया होता तो शायद लोक नाड़ीविद् अंगेला मरकेल महाशया तथा प्रधानमंत्री मोदी के बीच जो संवाद हुआ प्रधानमंत्री मोदी ने व्रिसेल्स में अंगेला मरकेल को जो प्रत्युत्तर दिया उसके गर्भ में यूरप की मुख्य दो भाषाओं जर्मन और रूसी भाषा में संस्कृत धातु जन्य शब्दों की व्यापकता को गहरे चिंतन से भाषा विज्ञानी नजरिये से तत्काल देखने की जरूरत है। संस्कृत के शर्मन या शर्मणः तथा ऋषि शब्द जर्मनी व रूस में पहुंचते ही जर्मन और रसिया अथवा रूस कैसे बन गये इस पर भाषा विज्ञानी नजरिये से तात्कालिक पड़ताल करने की आवश्यकता प्रतीत होती है।  संस्कृत वाङ्मय में सोलह स्वर तथा पैंतीस व्यंजन कुल मिला कर 51 का उच्चारण है।
  अंगेला मर्केल महाशया ने यह प्रसंग जी-20 सम्मेलन में भागधारिता संपन्न करने आस्ट्रेलिया पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महाशय ने राष्ट्रीय प्रत्युपन्न मति का हर अवसर पर उपयोग किया। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री महोदय टौनी अबोट के उनके नाम का हम यदि भारतीय वाङ्मयकरण दृष्टि से विचारें - अंग्रेजी का टौनी शब्द संस्कृत तनय शब्द का रूपांतरण है। तनय के तात्पर्य सुत, पुत्र या नंदन से होते हैं। उनके नाम में जो अबोट शब्द है वह भारतीय वाङ्मय के अवधूत का रूपांतरण है। भारत का मूल देश ब्रह्मावर्त कहलाता है जिसे आजकल बिठूर कहते हैं। ब्रह्मावर्त के मूल नरेश नाभि - मेरू देशी के इकलौते पुत्र का नाम ऋषभ था। ऋषभ राज्यांत में अवधूत वेष धारण कर प्रव्रज्या को निकले। उन्होंने अधो तनय या पुत्र भरत को राज्य सौंपा।  भरत का दूसरा नाम तनय अवधूत भी है। इसी ऋषभ-अवधूत तनय के नाम से भारत विश्व का प्राचीनतम सभ्यता वाला देश है। टौनी अबोट जब मोदी जी द्वारा प्रधानमंत्रित्त्व ग्रहण करने के पश्चात भारत आये अपने साथ नटराज की नृत्य मुद्रा वाली कांस्य प्रतिमा को उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री को दिल्ली में सौंपा। यह प्रकरण पूर्व पोस्ट ‘ननाद ढक्का’ में वर्णित है। मनुष्य मात्र को वाणी देने वाली शक्ति तांडव नृत्यावसान में भगवान शंकर द्वारा बजाये गये डमरू से नौ और पांच ध्वनियां निकलीं। वही मानव सृष्टि का ध्वन्यालोक है। ध्वन्यालोक की अद्भुत भिन्न रूचि र्हि लोकः भारतीय वाङ्मय संस्कृत तथा संस्कृत की सहेली प्राकृत के समानांतर पुरानी जर्मन भाषा भी है। भारत में संघीय जर्मनी गणतंत्र के राजदूत माइकेल स्टीनर ने लिखा - A Indian girl wrote to me हिन्दी जर्मन भाई बहन माइकेल स्टीनर आगे लिखते हैं - I think she is right. The Mother language is closely related to old German language. We need both. A strong sense of cultural identity and open in a globalized World. German scholars have, for a long time expressed their deep response and emotional warmth towards Sanskrit. Against this made deep, I was invited to speak as the inaugural ceremony of the Sanskrit heritage caravan in Delhi in feb. 2013 what was important then, might even be more important today. भाषा विज्ञानी द्वय चाटुर्ज्या एवं जोशी ने भारोपीय वाङ्मय का प्रकरण उठाया परन्तु जर्मनी के भारत स्थित राजदूत माइकेल स्टीनर महाशय का कथन है - First a sense of deep respect and emotional warmth towards the millennia (जिसे हम भारतीय सहस्त्राब्दियां कहते हैं) old history of Indo German in language family its similarity and intellectual closeness, all linked to mother language Sanskrit. By the way the scientific lesson of the Indo German language group itself can be traced back more than 200 years. Second, the firm belief that this family is not just heritage and a distant past butsolid fundamental for us today to build our shared future. Indeed it is a mandate and an assignment for us. In other words highlighting Indo German closeness should not be left to Historians and Altaph philogian It is a task and commitment for politicians movers and shakers of today in both our countries. माइकेल स्टीनर आगे लिखते हैं कि This is the moment to pay tribute to the work of the German orientalists and indologists of 8th  and 19th centuary. They brought India both Germany. It certainally accepted a warm and fabourable impressions of India in the minds of many Germans and quite a fassion - Nation in the hearts of some. Max Mular (संस्कृत शब्द मोक्ष मूलः) of course in the name sake for our Gothe institute in India todayThe translation of Kalidas’s Shakuntala (अभिज्ञान शाकुंतल) in the German in 1791 created quite a sensation among young and wild  intellectuals Johnn Wolfgang Von Goethe and Gotfried Herder who were among to front read and write about it eupnotically. Shakuntala obtained the status of a rockstar in Germany on those days. Later in 1879 Otto Von Bothlink published a Sanskrit Dictionary in Short version. Short version means to the accurate German to limit himself to a mere seven volume.
          जर्मनी के भारत स्थित राजदूत माइकेल स्टीनर आगे प्रश्नवाची सवाल करते हैं। भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के लिये जर्मन वैज्ञानिकों दार्शनिकों तथा कवियों में ऐसा उत्साह क्यों है ? 1892 में प्रकाशित डैनिश इतिहासज्ञ जार्ज, (गर्ग) ब्राडेस के लेखन का उद्धरण देते हुए राजदूत लिखते हैं - It was not a surprise that there came a moment in German history when they – The German started to absorb and to utilize the intellectual achievment and the culture of ancient India. It is because then Germany – great dark and rich in dreams and thoughts – is in reality a modern India. No where else in world history has met a physian before of and emperical research acheived such a level of development as in the ancient India and modern Germany. 
  भारत जर्मन सांस्कृतिक शब्द सामर्थ्य मूल शर्मणः मूलक है। अंगेला मरकेल महाशया ने भारतीय प्रधानमंत्री का ध्यानाकर्षण कर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय केन्द्रीय विद्यालय में दर्जा छः से दर्जा आठ तक जर्मन भाषा के बदले संस्कृत भाषा पढ़ाये जाने को प्रशासनिक परिषद का निर्णय क्रियान्वित करने का उपक्रम किया है। हम भारतवासियों को महाशया अंगेला मरकेल को  कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिये कि उनके भारत स्थित राजदूत ने जो अध्ययन किया जर्मनी की भाषा जर्मन तथा भारत की भाषा संस्कृत में जो सांस्कृतिक एकरूपता है वह प्रकाश में आनी चाहिये। जर्मन शब्द संस्कृत वाङ्मय के शर्मन या शर्मणः शब्द से पूर्व से पश्चिम की शब्द यात्रा में जर्मन होगया।
  चांसलर अंगेला मरकेल महाशया ने जो जर्मन भाषायी सरोकार प्रधानमंत्री मोदी जी के संज्ञान में प्रस्तुत किया है वह मूलतः भारतीय विदेश नीति की रीढ़ की हड्डी सरीखा तत्व है। तात्कालिक जरूरत यह महसूस होती है कि जिस तरह भारत में जर्मनी ने भारत शास्त्र के ज्ञाता व्यक्तित्त्व का अपना राजदूत नियुक्त किया है उसी तरह भारत के जो राजदूत जर्मनी में नियुक्त हों उन्हें जर्मन भाषा का कार्य कारी ज्ञान हो तो उत्तम है। वे भारतीय गणतंत्र के जिस घटक राज्य के निवासी हों उनकी जो मातृभाषा हो। लगता है भारत का कोई भी राजदूत अब अंग्रेजी मातृभाषा वाला नहीं है। राजदूत को अपनी मातृभाषा का समग्र ज्ञान हो यदि संस्कृत, प्राकृत - अर्धमागधी सहित तद्भव भारतीय भाषाओं व बोलियों में से किन्हीं एक भाषा का निष्णात हो। जर्मन भाषा जानता हो तो सोने में सुहागा। भारतीय विदेश मंत्रालय को जर्मनी से ही शुरूआत करनी चाहिये। संस्कृत, प्राकृत - तद्भव भारतीय भाषाओं के साथ साथ पुरानी जर्मन, आधुनिक जर्मन शब्द पर्याय कोष निर्मित करने का कार्य भाषा मंत्रालय अथवा मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संपन्न हो। जर्मनी में भारतीय राजदूतावास जर्मनी मेें संघीय गणतंत्र के साथ जर्मन भाषा में पत्राचार की शुरूआत करें। जिसे जर्मनी के राजदूत माइकेल स्टीनर पुरानी जर्मन भाषा बताया है उसमें नब्बे प्रतिशत से ज्यादा शब्दों का मूल संस्कृत भाषा आधारित है। जर्मनी सहित उन ख्रिस्ती राष्ट्रों में जहां रोमन कैथोलिक गिरजे हैं गिरजों में प्रार्थना का स्वर सामवेदी है। फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी, स्कैन्डेनेवियन देशों तथा ग्रेट ब्रिटेन में गिरजाघरों की प्रार्थना की लय सामवेदी है। संभव हो ईसामसीह के अवतार से पूर्व यूरप के देश सामवेदी रहे हों। यह सामवेद के मंत्रों का गहन अध्ययन व अनुसंधान करने पर पता लगाया जा सकता है। सामान्यतया विश्व में सर्वाधिक संख्या वाले ख्रिस्ती धर्मावलंबियों का समाज अपनी प्रार्थना में सामवेद की ध्वनि को स्वीकार करने से कतरायेगा परंतु नासा सरीखे वे संगठन जो पूर्णतः वैज्ञानिक सोच रखते हैं ख्रिस्ती मतावलंबियों की प्रार्थना शैली को अंतरिक्ष में स्थित सामवेदी ध्वनियों से जोड़ने का वैज्ञानिक शोध वाला उपक्रम कर सकता है। इसलिये भारत की सरकार को जर्मन भाषा के लिये जो उद्बोधन अंगेला मरकेल महाशया ने किया है उसे भारतीय चिंतन पोखर का विषय बनायेंगे।

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