या देवी सर्वभूतेषु जाति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै] नमस्तस्यै] नमस्तस्यै नमो नमः।।
नमस्तस्यै] नमस्तस्यै] नमस्तस्यै नमो नमः।।
श्री हीरा सिंह महोदय की पुस्तक Recasting
Caste (मूल्य रू. 795/-, प्रकाशक- Sage
Publication India Ltd. Mohan Cooperative Industrial Area, Mathura Road, New
Delhi – 11 की आलोचनात्मक समीक्षा दैनिक हिन्दू के 21 अक्टूबर 2014 के दिल्ली संस्करण में श्री अरविन्द शिवरामकृष्णन द्वारा प्रस्तुत हुई। ‘जाति’ शब्द संस्कृत वाङ्मय का जीव-जातक प्रतीक है। मार्कण्डेय पुराण का मत है कि दैवी शक्ति सभी जीव-जंतुओं में अर्थात स्थावर, जंगम, जलचर, थलचर, नभचर आदि में जाति के रूप में विद्यमान है। Collins
Concise कोष के अनुसार अंग्रेजी भाषा के Caste शब्द की विवेचना करते हुए कहा गया है कि Caste any of four
major heriditory classes namely Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shoodra in to
which Hindu Society is divided. Also called caste system, the system or basis
of that classes . Any social class or system based on such distribution as
heredity, rank, wealth etc. The position confused by such a system lower caste,
inf to loose one’s social position confered and of various type of individual
such as the worker in social injects 6-16 from past caste race from castes pure
castes .
भारतीय वाङ्मय के अनुसार जीव-जगत में 84 लाख योनियां हैं। महर्षि मार्कण्डेय के मतानुसार जीव जगत का प्राणिमात्र विभिन्न जात्यात्मक श्रंखला का सूत्र है। जीव मात्र में जो शक्ति है वही जाति का प्रतीक है। इसलिये अंग्रेजी भाषा के Caste शब्द की भारतीय वाङ्मय के जाति शब्द का पर्याय मानना भारतीय संस्कृति के प्रति पश्चिम की संशयग्रस्तता है। श्री हीरा सिंह महाशय की पुस्तक का शीर्षक Recasting
Caste – from Sacred to the profane मननीय बिन्दु है। भारतीय वाङ्मय के जाति शब्द को अंग्रेजी भाषा के Caste शब्द का पर्याय या समानार्थी मानने से यह संशय बढ़ता जारहा है। वे लिखते हैं, उत्तर प्रदेश के राजपूत और ब्राह्मण पूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती महोदया द्वारा चाय पर आमंत्रित होने पर अपने आपको धन्य समझते हैं परंतु 1940 के दशक में उन्होंने बहन मायावती की जाति के लोगों को उनका चाय-प्याला छूने नहीं दिया होता। चाया वाली एक घटना ने उन्नीसवीं शती के अंतिम दो दशकों की एक सच्ची घटना को ताजा कर डाला। महारानी विक्टोरिया के भतीजे मिस्टर ग्रांडी कुमांऊँ के बेरीनाग नामक स्थान में मिशनरी का काम करते थे। अल्मोड़ा रामजे हाईस्कूल के पहले बैच से हाईस्कूल पास तारा दत्त पंत गंगोलीहाट के उपराड़ा गांव से अपनी मौसी के गांव बना आया। बेरीनाग की छोटी सी बाजार में उसकी मुलाकात मिस्टर ग्रांडी से हुई। ग्रांडी ने तारा दत्त को चाय पर बुलाया। ग्रांडी तारा दत्त की अंग्रेजी भाषा से प्रभावित था। तारा दत्त ने ग्रांडी के बंगले में जाकर चाय पी। वह सारा इलाका महाराष्ट्र से पेशवाई खानदान के पंत लोगों का था। उन्होंने तारा दत्त को जातिच्युत कर डाला। अल्मोड़ा में जब महामना मदनमोहन मालवीय, एनीबेसेन्ट, स्वामी विवेकानंद आये थे। कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे ने तारा दत्त प्रकरण मालवीय जी, स्वामी विवेकानंद व एनीबेसेन्ट के संज्ञान में प्रस्तुत किया। मालवीय जी के हस्तक्षेप करने से काशी विद्वत परिषद ने तारा दत्त को अपने माता पिता के श्राद्धाधिकार का पात्र घोषित कर दिया। एनीबेसेन्ट के हस्तक्षेप करने से तत्कालीन ईसाई समुदाय ने तारा दत्त का बपतिस्मा न होने के कारण उन्हें ईसाई नहीं माना। तारा दत्त की पत्नी ईसाई थी। तारा दत्त के इकलौते पुत्र डैनियल पंत अल्मोड़ा के बिशप थे। डैनियल पंत की पुत्री पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खां की बेगम थी। अपने पिता तारा दत्त पंत की चाय वाली वारदात इस ब्लागर को डैनियल पंत साहब ने सुनायी थी। तारा दत्त गृहस्थ थे। उनकी पत्नी ख्रिस्ती धर्मावलंबी थी परंतु तारा दत्त कुमांऊँ के ब्राह्मणों द्वारा अपनायी जाने वाली सभी प्रक्रिया संपन्न करने वाले स्वयंपाकी व्यक्ति थे। समीक्षक के अनुसार - Author
anlise that Caste Society is founded on material relations particularly those the to do with Land Ownership. पर महाशय हीरा सिंह संभवतः उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के प्रभावी होने तथा गांवों में रहने वाली सभी जातियां अथवा उप समाज जो तालुकेदारों जमींदारों व व नवाबों की जमीन में खेती बाड़ी करने वाले लोग थे। वे सभी भूमिधर होगये इसलिये जमीन की हिस्सेदारी का जाति व्यवस्था से कोई सीधा सरोकार नहीं है। वैदिक समाज व्यक्ति के मुख को ब्राह्मण, बाहुओं को क्षत्रिय, गले से लेकर जठर पर्यन्त समूचे शरीर को वैश्य तथा व्यक्तित्त्व को चरैवेति चरैवेति का मार्ग प्रशस्त करने वाले पैरों का शूद्र संज्ञा देता रहा है। जहां व्यक्ति (पिंड) में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र विद्यमान हैं उसी तरह वर्ण व्यवस्था अथवा वर्णाश्रम व्यवस्था भारतीय पारम्परिकता का मूल स्त्रोत है।
Recasting
Caste में कास्ट की पुनरीक्षित व्याख्या करते हुए श्री हीरा सिंह का यह कहना कि From
Sacred to Profane तर्क सम्मत प्रतीत नहीं होता। ऐसा लगता है कि जाति वादी व्याख्या करने में पूर्वाग्रहग्रस्तता व्याप्त है। आज भारत शहरीकरण प्रक्रिया में घुलमिल गया है। बाजार में जातिमूलक चिंतन प्रक्रिया की कोई महत्ता नहीं है। बाजार में कुलीन सामान्य जन और गरीब अमीर सभी एक से हैं। इसलिये वे पारम्परिक भारतीय समाज में बाहरी आक्रमणों तथा आपसी द्वन्द्व युद्ध के कारण जो कलह का वातावरण व्याप्त हुआ, इस्लामी प्रभुत्त्व तथा बर्तानी व्यापारिक तौर तरीकों ने हिन्दुस्तान के पारम्परिक समाज ने अपने आपको कछुए सरीखा जीवन यापन करने का आदी बना डाला। अस्पृश्यता निवारण महात्मा गांधी का जीवन का पहला उद्देश्य था। जब कोचरब आश्रम में एक शताब्दी पहले 1915 में महात्मा गांधी ने दूधाभाई परिवार को आश्रम का अभिन्न अंग बनाया। छुआछूत मानने वाले वैष्णव महात्मा से छितर गये। तेरापंथी जैन समुदाय के सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी को 1915 में तेरह हजार रूपये चन्दे के रूप में दिये तब कोचरब आश्रम में जीवनज्योति आयी। अस्पृश्यता निवारण के लिये महात्मा का हृदय व्याकुल रहता था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन पर्व में महामना मदनमोहन मालवीय से अपनी आत्मपीड़ा व्यक्त की। मालवीय जी ने कहा - महात्मा जी आपके प्रश्न का सही समाधान का सही जवाब प्रोफेसर सर्वपल्ली राधाकृष्णन दे सकते हैं। दोनों महानुभाव सर्वपल्ली के निवास स्थान पर गये और उन्होंने अपना सवाल सर्वपल्ली के समक्ष रखा। सर्वपल्ली ने पंद्रह दिन का समय चाहा। पंद्रह दिन बाद सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को कहा - अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है। यह एक परिपाटी बन गयी है। महात्मा गांधी अस्पृश्यता निवारण के लिये कृतसंकल्प थे। हिन्दुस्तान की पारम्परिकता को कृष्णार्जुन संवाद के चातुवर्ण्य मया सृष्टम् गुण कर्म विभागशः का उपोद्धात है। महात्मा गांधी ने छाती फुला कर कहा - मैं चातुवर्ण्य पर यकीन करता हूँ। साथ ही इतिहास के गर्त में हिन्दुस्तानियत में जो विकार अस्पृश्यता सरीखे उत्पन्न हुए उनको मानवीय दृष्टिकोण से अहिंसात्मक विधि से महात्मा गांधी हटाने के पक्षधर थे। कानून बना देने मात्र से कोई सामाजिक चेतना का परिवर्तन नहीं कर सकता। कानून के साथ कानून का अनुपालन करने वाले राजसेवक तथा कानून की व्याख्या करने वाले दक्ष वकीलों तथा कानून के आधार पर न्याय तुला प्रवर्तन करने वाले न्यायमूर्तियों की एक कानूनी हदबंदी है। महात्मा गांधी और उनके जीवन दर्शन के व्याख्याता संत विनोबा की सम्मति में सरकार की सत्ता के समानांतर सामाजिक परिवर्तन के अहिंसक पैरोकारों का मानना है कि सत्य और अहिंसा के सहारे भी समाज को गतिमान बनाया जा सकता है। महात्मा गांधी की अहिंसा में दण्ड का कोई प्रावधान नहीं है। व्यक्ति का हृदय परिवर्तन उसमें करूणा का अभ्युदय ही अहिंसा का श्रेय पथ है। इसलिये ही राजनीति के समानांतर अहिंसक लोक नीति का पहला काव्य महात्मा गांधी रचित हिन्द स्वराज है जिसमें महात्मा ने अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज तथा गुलामी की जंजीरों से बंधी हिन्दुस्तानी जन समाज के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की कल्पना की।
महाशय हीरा सिंह भारतीय जाति प्रथा के बारे में जिस Recasting Caste का उद्बोधन किया है। आज भारत में अस्पृश्यता संबंधी जो नये नमूने सामने आये हैं संभवतः वह कानूनी पेचीदगियों की उपज है। Caste को जाति का पर्याय मान कर चला हुआ समूचा अभियान वैमनस्य व विकार संवर्धन की ओर अग्रसर है। अगड़े-पिछड़े का विवाद भी राजनीतिक हथियार बना हुआ है। भारत में जब इस्लामी राज था क्षत्रियाणी मीराबाई ने काशी वासी रैदास को अपना गुरू बनाना चाहा। रैदास ने मीरा से कहा - महाराणी, आप क्षत्रियाणी हो किसी ब्राह्मण या राजन्य को गुरू बनाये मैं तो जात का चमार हूँ। आपका गुरू कोई अगड़ा ही होना चाहिये। मीरा ने रैदास को कहा - मेरे गिरिधर गोपाल ने मुझे आपसे ही दीक्षा लेने की इजाजत दी है क्योंकि मेरी दृष्टि में आप ही सच्चे गुरू हो। आपकी दीक्षा से मैं कृतकृत्य हो जाऊँगी। हीरा सिंह जी ने स्वामी विवेकानंद द्वारा भारतीय जातीय व्यवहारवाद के बारे में जो अभिव्यक्ति शिकागो की विश्व धर्म संसद में की गयी उसका अवलोकन व चिंतन करेंगे तो हिन्दुस्तानी जाति व्यवसाय परम्परा का प्रभाव महसूस कर सकेंगे। उन्होंने गिरमिटिया मजदूरों के भारत से अफरीका लातिनी अमरीकी देशों में मजदूरी करने गये लगभग दो सौ वर्ष पूर्व के जो हिन्दुस्तानी उन देशों के बासिन्दे हो गये उनमें जातीयता की हनक हीरा सिंह जी महसूस नहीं करते हैं। बात अपनी जगह सोलह आने सटीक है। समीक्षक अरविन्द शिवरामकृष्णन् ने अपने आलेख संपूर्ति में व्यक्त किया -
Singh also notes a
contemporary diminution of Caste practice among of India dispora in the global
north and if he is some what of to optimistic about program in that directions ,
his concluding point is a lesson for all the roots of Caste and the Caste
system do not lie in Hinduism. The end of caste is not the end of Hinduism its
part the India republic as present anyway leaves all free to follow bo faith
and even to reject the very idea of a God or Gods.
धर्म और मजहब दो अलग अलग बिन्दु हैं। धर्म व्यक्ति का होता है व्यक्ति के कर्त्तव्य पथ को धर्म कहा जा सकता है परन्तु मजहब आस्था की उस संकीर्ण गली का पर्याय है जिसमें किं कर्मम् किं कर्मेति कवयोप्पत्र मोहिता का गीता वचन है। मजहब प्राणियों की तरह जनमते हैं पुष्ट होते हैं अपनी पताका फहराते हैं जिस तरह जीव मृत्यु को प्राप्त होता है। मजहब भी इतिहास की कहानी बन जाते हैं। आज के संसार में ख्रिस्ती धर्मावलंबी संख्या सर्वाधिक है। ख्रिस्ती धर्म प्रसार के लिये एक सतत प्रयास निरन्तर चलता आरहा है। धर्मान्तरण भी कराया जाता है। ख्रिस्ती धर्म के पश्चात दूसरा मजहब इस्लाम है जिसकी जनसंख्या दूसरे क्रम में है। जिस सामाजिकता तथा आस्था वर्ग को धर्म की गणना करने वाले लोग हिन्दू धर्म अथवा Hinduism कहते हैं उनके मानने वालों की संख्या विश्व जनसंख्या के तीसरे पायदान में है। ईसाईयत व इस्लाम की तरह हिन्दू धर्म धर्मान्तरण पर यकीन नहीं करता। हिन्दू धर्म कहे जाने वाले धर्म के धर्मसारथी के पर्याय जो ऊँकार पर आस्था रखते हैं इनके जैन, बौद्ध, सिख धर्म भी आते हैं। दूसरे धर्मों के प्रवर्तक हैं पर सनातन धर्म स्वयं उद्भूत धर्म है। श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय में अर्जुन से कहा -
स काले ने ह महता योगो नष्टः परन्तप, स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोसि मे सखा चेति रहस्यम् हयेतदुन्तामा्।
धर्म लोप भी हुआ करता है। मजहब पैदा होता है दिवंगत भी होता है इसलिये ईश्वर के अस्तित्त्व के संबंध में अनेकानेक मत हैं। दुनियां के कई समृद्ध देशों में ईशनिन्दा अत्यंत गर्हित है पर भारत में ईशनिन्दा को भगवद्भक्ति का एक अजूबा रास्ता करार दिया जाता है। नारद ने युधिष्ठिर से कहा था -
यथा वैरानुबन्धेन भर्त्यस्तन्मयता मियात्, न तथा भक्ति योगेन इति मे निश्चित मतिः।
अतएव अंग्रेजी के Caste तथा भारतीय वाङ्मय के जाति शब्द की पर्याय वाचिता एक संशयग्रस्त विषय है।
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