Thursday, 18 December 2014

श्रीमद्भगवद्गीता - वैश्विक दृष्टि पथ
*कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके*


  श्रीमद्भगवद्गीता का कथन है कि जीवात्मा जब मनुष्य योनि प्राप्त करता है तो वह कर्म के अनुबंध या उसे कर्मविपाक कहें उसका विषय बन जाता है। केवल मनुष्य योनि ही कर्मविपाक का हेतुक है। कर्मविपाक का विस्मयकारी नजारा अगर देखना ही हो तो उसे सच्ची इन्सानियत के चौखट आइने में रख कर ही अनुभव किया जा सकता है। मार्गशीर्ष सुदी ग्यारस - अग्रहायण शुक्ल एकादशी के दिन ज्योत्सर-कुरूक्षेत्र के रणांगण  में आज से 5150 वर्ष पूर्व योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पैतृस्वसेय पार्थ कौंतेय पांडव अर्जुन को महाभारत युद्ध के पहले दिन कृष्णार्जुन संवाद के रूप में अठारह अक्षौहिणी रणोत्साही योद्धाओं के बीच श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वाेत्कृष्ट जागतिक संवाद संपन्न किया। बात अधूरी रह जायेगी अगर यजुर्वेद का वह प्रसंग  जो पितरों से संबंधित है उसका उल्लेख न हो। यजुर्वेद का मत है - 
सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगा कालंजरे गिरौ, चक्रवाका सरद्दीपे हंसा सरसि मानसे,  ते पि जाता कुरूक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगा। 
          कालंजर का किला भारतीय इतिहास का एक मजबूत खंभा है। इसी कालंजर पर्वत में वन्यमृग आखेट करने वाले सात बहेलिये जिनका दैनंदिन कर्म केवल जीव हिंसा है वे भी जब ज्योत्सर कुरूक्षेत्र पहुँचे वहां वेदवेदांतविद् वेदपारग होगये। कुरूक्षेत्र वैदिक काल से ही ऐसा क्षेत्र रहा है जहां मनुष्य ही नहीं मनुष्यों के निकटस्थ पशु-पक्षी व स्थावर वनस्पति भी ज्ञानयोग विज्ञ होगये। श्रीमद्भगवद्गीता का संवाद तब हुआ जब श्रीकृष्ण व अर्जुन दोनों नवमी प्राप्त होरहे थे। भाषा विज्ञानी प्रोफेसर सुनीति कुमार चाटुर्ज्या के अनुसार गीर्वाग्वाणी सरस्वती हेमेटिक तथा सेमेटिक वर्गों में विभक्त है। हेमेटिक धर्म धारणा तथा हेमेटिक वाणी विलास नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नव पंच वारम् पर आधारित ध्वन्यालोक है जबकि सेमेटिक मजहबी आस्था और सेमेटिक वाणी विलास मध्यपूर्व जिसे भारतीय मनीषा नैऋत्य कहती है तथा नैऋत्य दिशा के लोगों को नैऋत्र संज्ञा दी गयी है उसकी उपज है। हेनरी किसिंजर इसी सेमेटिक आस्था व सेमेटिक वाणी विलास के आधुनिक विश्व के चमकीले मंत्र दाता हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में यहूदी मजहब मानने वाले हेनरी किसिंजर ने अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग अमरीकी संयुक्त राज्य की राजनीतिक व कूटनीतिक स्थायित्त्व को अर्पण किया। उनकी ताजा पुस्तक World according to Gita and Millenia before European thinkers, Gita and Arthshastra embodied Indian Tradition of Real Politik. भारतीय आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का मुख्य स्त्रोत है। वे लिखते हैं - Hindu classic The Bhagwadgita framed that spirited tests in terms of the readership between morality and power. Arjun overwhelmed by sorrow. जिसे भारतीय वाङ्मयी मेधा ‘विषाद’ संज्ञा देती है। अपनी रचना में हेनरी किसिंजर आगे व्यक्त करते हैं - While Lord Krishna appealed the duty prevails and Arjun proposes himself freed him doubt. The cataclysm of the war decided in detail in the rest of the epic – and resonance to his earlier qualms. This central works of Hindu thoughts embodied both exhortation to war and the importance not so much of availing but by transcending it. Morality was not rejected but in any given situation the immediate conclusion was dominant while eternity prorilaec a curative perspective, what some readers lauded as a call to fearlessness in the battle. Gandhi would praise as his spiritual Dictionary. हेनरी किसिंजर अपने मत को मजहबी दीक्षा मानते हैं पर हिन्दुस्तानी मानसिकता इस सदाशयता को मजहबी आचार से न जोड़ कर मनुष्यता के नैतिक आवरण से जोड़ती है। उनका कथन है - Against the background of the entire varieties of a religion, protecting the awareness of any single earthly endeavor the tempered ruler was a feet afforded a wide berth for practical necessities. The pioneering example of the school was the 4th Century A.C. Ministers Kautilya created by engineering the rise of India’s Maurya Dynasty, which exploited Alexander the grade successes from north India and unified the subcontinental for the first time under a single rule.
  आइये विचारिये छिन्न संशयता क्या है ? वासुदेव श्रीकृष्ण जिन्हें उनके जीवन काल में ही महाविष्णु के सोलह कलाओं वाले अवतार की मान्यता मिल चुकी थी, परम भागवत शांतनु नंदन देवव्रत भीष्म ने जिस व्यक्ति को भागवत धर्म का परम पुरूष स्वीकारा और श्रीकृष्ण की आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति को सराहा। श्रीकृष्ण ने सामान्य मनुष्य की तरह शारीरिक व्यथायें, यश-अपयश सभी विधाओं का सामना किया यहां तक कि एक सौ पचीस वर्ष की उम्र में अपने खानदानियों व यादवों की यादवी से क्षुभित श्रीकृष्ण के बारे में द्वैपायन वेदव्यास ने लिखा - एवं सर्वेषु नष्टेषु कुलेषु स्वेषु केशवः। उदासीनता में अश्वत्थ वृक्ष की आड़ के सहारे बैठे योगिराज श्रीकृष्ण को एक बहेलिये ने हिरण समझ कर बाण विद्ध कर डाला। श्रीकृष्ण ने बहेलिये से कहा - वत्स तुमने मेरा उपकार किया। मुझे इस दुनिया से कूच करना था जिसका निमित्त तुम्हारा बाण है जिसने मुझे परलोक वासी बनाया है। श्रीकृष्ण ने उद्धव का सवाल मृत्यु क्या है ? का जवाब देते हुए कहा था, मृत्यु अत्यंत विस्मृति का पर्याय है। जरूरत पड़ने पर वे रणछोड़ भी हुए मथुरा छोड़ द्वारका चले गये। स्वयं राज नहीं किया पर राज करने वाले व्यक्तियों को उन्होंने परम राजधर्म बताया। अपने समधी सांब के श्वसुर महाराज कुमार सुयोधन का आतिथ्य नकार कर महात्मा विदुर के घर सूखी सागभाजी का भोजन किया। राष्ट्रपाल कंस का वध करने के पश्चात वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं यादवराज नहीं हुए। उन्होंने कंस के पिता भोजराज उग्रसेन को पुनः राजगद्दी पर बिठाया। शिशुपाल को मारने पर चेदिराज के तौर पर राजसूय यज्ञ में ही शिशुपाल पुत्र को स्थापित किया। मगध नरेश जरासंध का वध भीमसेन द्वारा संपन्न होने पर मगध का राज्याभिषेक जरासंध नंदन ब्रहद्रथ को मगध नरेश के तौर पर कराया। महाशय हेनरी किसिंजर ने श्रीमद्भगवदगीता को Hindu Classic  संज्ञा दी पर भारतीय मेधा श्रीमद्भगवदगीता को मनुष्य मात्र के लिये उपादेय मानती है। श्रीमद्भगवदगीता को किसी एक देश, राष्ट्र भाषा या भाषा समूह सहित मानव इतिहास की किसी श्रंखला से जोड़ना एकांगी दृष्टिकोण ही होगा। श्रीमद्भगवदगीता का एक एक शब्द प्रत्येक श्लोक और उवाच की मौलिक विशेषता ही यह है कि कुरूक्षेत्र के रणांगण का यह संवाद लगभग सौ मील दूरी पर स्थित हस्तिनापुर में संजय ने सुना तथा राजा धृतराष्ट्र को सुनाया। श्रीकृष्णार्जुन संवाद की विशेषतायें आदि शंकर के पश्चात संत ज्ञानेश्वर तथा आधुनिक युग में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, मोहनदास करमचंद गांधी तथा सर्वपल्ली राधाकृष्णन एवं संत विनोबा भावे सरीखे मनीषियों के अलावा भारत के कोटि कोटि जन गीता संदेश हृदयंगम करते रहते हैं। श्रीमद्भगवदगीता प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक नया जीवन संदेश देती है। हेनरी किसिंजर महाशय ने यद्यपि अपनी पुस्तक में श्रीमद्भगवदगीता को हिन्दू काव्य माना पर उनका यह कथन कि गीता का संदेश समूची धरती पर सृष्टि के लिये महत्त्वपूर्ण है। श्रीमद्भगवदगीता को हिन्दू सभ्यता, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू धर्म से जोड़़ कर देखने के बजाय विश्व मानवता के अहिंसक त्राता के तौर पर देखने की जरूरत है। हेनरी किसिंजर महाशय का कहना है - For Kautilya person who the dominant reality. It was a multi dimensional about factors were interdependent. All elements in a given situation were recalculated and amendable to manipulation towards a leaders strategic aims. हेनरी किसिंजर अपनी ऐतिहासिक महत्त्व की पुस्तक में अभिव्यक्ति करते हुए कहते हैं - Millennia before European thinkers translated their facts of ground into a theory of balance of power, The Arthshastra set out an analoguede if more elaborate system termed as Kind of State. What over profession of anity he might make any ruler whose power grew significantly would eventually find that it was in his interest to subverb his neighbor’s realm. This was an inherent dynamic of self preservation to which morality was irrelevant. Arthshastri’s exhaustive and matter of fact catalogue of the imperatives of success led the distinguished 20th Century political interest Max Weben to conclude that the Arthshastra exemplified truly radical machiavellranitm compared to it. Machiavelli “ The Prince is heartless unlike Meehivalli kautilya exhibits no nostalgia for the virtues of a letter age.
हेनरी किसिंजर महाशय ने कृष्णार्जुन संवाद वाली श्रीमद्भगवदगीता तथा आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के निष्णात योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण, वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन, सत्यवती पाराशर के कानीन पुत्र पंचम वेद महाभारत में जिस राजनीतिक चिंतन पोखर का निर्माण किया, महाभारत के सभी उपाख्यानों के समानांतर शांतिपर्व में श्रीकृष्ण द्वारा सुझाये गये भीष्म-युधिष्ठिर संवाद राजनीति के चिंतन पोखर में गोता लगाने के इच्छुक हर इन्सान के लिये प्रारंभिक शर्त्त है। हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक World Order  में जो उपोद्धात  श्रीमद्भगवदगीता व अर्थशास्त्र के संबंध में किये हैं उन्हें राजनीति के हर विद्यार्थी व राजनीति को अपना जीवन पथ चुनने वाले हरेक राजनेता के लिये पहली जरूरत है।
  राजधर्म का प्रतिगामी मार्ग दस्यु धर्म है। भारतीय वाङ्मय ने हिरण्यकश्यप, वेन तथा रावण सरीखे प्रतापी राजाओं को दस्यु संज्ञा से अभिषिक्त किया है। हिरण्यकश्यप, वेन व रावण तो एकछत्र राजाध्यक्ष थे। उनके शब्द ही कानून थे तथा वे सार्वभौम राज्याधिकारी थे। भारतीय वाङ्मय में गणराज्यों का भी उल्लेख हुआ है। विष्णुपुराण के मुताबिक कूर्म, मगध, खसगणैः कुमांऊँ व मगध में खस गण तंत्र हुआ करते थे। खस गणतंत्र में लिच्छिवि खस गणतंत्र मुखिया शाक्य शुद्धोदन के घर में गौतम बुद्ध जन्मे थे इसलिये गणतंत्र भारत की पुरातन परम्परा है। गोस्वामी तुलसीदास ने व्यक्ति के मत की महत्ता अपने काव्य में उकेरते हुए कहा था - ‘‘एतो मतो हमारो’’ मत भिन्नता की मीमांसा करने पर विभिन्न मतों से सामाजिक सरोकार उपजते हैं। संत विनोबा भावे की राय में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिकता सहित आस्थामूलक मत भिन्नता का भी समाधान कारक मार्ग खोजा जा सकता है। संत विनोबा का मत था कि पहले उन बिन्दुओं को बहस का मुद्दा बनायें जिन पर आम सहमति हो। विवादास्पद बिन्दुओं पर शनैः शनैः चर्चा चलायी जाये और सहमति सूत्र खोजने का उपाय हो। हेनरी किसिंजर महाशय फिर अभिव्यक्ति की कि Arthshastra advised that estrained and humanitarian conduct was under most circumstances strategically useful. A King who abused his subjects would forfeit these support and would be vulnerable to rebelian or invaisn, a conquer who needlessly violated a subdued people’s customs of moral sensitivities risked catalyzing resistances. हेनरी किसिंजर महाशय ने अपनी पुस्तक World Order  के जरिये हिन्दुस्तान के राजनीति चिंतन पोखर के श्रीमद्भगवदगीता के सांख्य, कर्म, भक्ति, ज्ञान-वैराग्य चिंतन पथ को चाणक्य के कौटिलीय अर्थशास्त्र के जरिये भारतीय संदर्भ में पुनर्भाषित करने का साहस जुटाने की सलाह दी है। श्रीमद्भगवदगीता व कौटिलीय अर्थशास्त्र पर सर्वधर्म समभाव वाला गांधी मार्ग जिसकी सटीक व्याख्या संत विनोबा ने श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिंन्दाऽप्य क्वापि हि भागवत शास्त्र में श्रद्धा परन्तु इतर आस्था शास्त्रों के लिये अनिन्दा का स्तुत्य भाव। आज भारत घरेलू हिंसा, नारी हिंसा से यत्र तत्र जूझ रहा है। संभवतः आज भारत में होरही अहर्निश हिंसात्मक प्रवृत्ति का मूल कारण ऐहिक सुख भोग तथा मानवीय मर्यादाओं का उल्लंघनकारी नशाखोरी की बढ़त है। कानून तथा न्याय व्यवस्था दण्डात्मक तौर तरीकों से बलात्कार सहित सामूहिक बलात्कार और छेड़छाड़ पर कारगर रोक नहीं लगा सकती। व्यक्ति में उसकी आस्थागत दीन ईमान वाली बंदिशें ही मौजूदा हिंसकता पर अंकुश लगा सकती हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने कानून व्यवस्था के समानांतर भारत सेवक समाज को गैर सरकारी स्तर पर यथोचित महत्त्व दिया। गुलजारीलाल नंदा ने भारत साधु समाज के जरिये सार्वजनिक सच्चरित्रता का मार्ग प्रशस्त किया। धन सत्ता, राज सत्ता के समानांतर ज्ञान वैराग्य का जुड़वां अभियान कैरियर तथा असीमित धनार्जन पर अंकुश लगाने के लिये नितांत आवश्यक कृत्य है। जो लोग राजनीतिक तथा प्रशासनिक सत्ता की सवारी कर रहे हैं उन्हें वासुदेव श्रीकृष्ण, महात्मा विदुर, भर्तृहरि, चाणक्य के नीति पथ को भी संवारना होगा। राजनेता एक सामान्य जन भी है। उसे सामान्य जन की विपदाओं के प्रति करूणाशील मानसिकता अपनानी होगी। आधुनिक युग में ही महात्मा गांधी ने राजनीतिक मार्ग अपनाया उनके समकालीन व्यक्तित्त्वों में गांधी की छाप स्पष्ट थी। पुरूषोत्तम दास टंडन, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, डाक्टर राममनोहर लोहिया, डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय सरीखे राष्ट्रीय व्यक्तित्त्व के लोकसत्ता के प्रहरियों ने जो जीवन पथ अपनाया उसे एक अभियान एक मुहिम के रूप में सत्ता गलियारों के समानांतर ज्ञान वैराग्य तथा मानव मात्र बंधु हैं इस भाव को उद्दीप्त करने की पहल हिन्दुस्तानी जन नेतृत्त्व की पहली जरूरत है। टाइम्स आफ इण्डिया ने अपने 21 नवंबर 14 के अंक में भारतीय मेधा को हेनरी किसिंजर के नजरिये का भान कराया है। महात्मा गांधी के पश्चात गुजरात ने निस्पृह राजनेता के रूप में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को शीर्ष नेतृत्त्व दिया है वह अत्यंत विवेकवर्धक है।

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