कौटिल्य का अर्थशास्त्र भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ
भारतीय वाङ्मय ‘गीता’ के काव्य, छन्द, दोहे, चौपायी को संगीत के लहजे में गाये जाने वाले गीत को गीता संज्ञा देता है। सभी गीताओं में श्रीमद्भगवदगीता महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व के अंतर्गत तीसरा उपपर्व पहले दो जम्बू खंड विनिर्माण तथा भूमि के पश्चात श्रीमद्भगवदगीता पर्व (उपपर्व) भीष्म पर्व के तेरहवें अध्याय से शुरू होता है। भीष्म पर्व का पच्चीसवां अध्याय श्रीमद्भगवदगीता का प्रथम तथा बयालीसवां अध्याय अठारहवां अध्याय है। यह संवाद मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन अबकी गीता जयंती से ठीक 5150 वर्ष पूर्व कुरूक्षेत्र के ज्योत्सर के किनारे हुआ था। यह संवाद पार्थ सारथी योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण और उनके फुफेरे भाई कौंतेय धनंजय अर्जुन की वार्ता थी। अर्जुन स्वजन वध करने का पक्षधर नहीं था, उसमें विषाद भाव जाग्रत हुआ। उसने अपनी शंका श्रीकृष्ण के सम्मुख रखी। श्रीकृष्ण स्वयं रणछोड़ थे मथुरा से भाग कर द्वारका चले गये थे। उन्होंने जरासंध - अपने मामा कंस के श्वसुर से अठारह बार युद्ध करने के बाद रणछोड़ बनना ज्यादा उपयोगी समझा पर कुरूक्षेत्र में रणछोड़ श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का मार्ग बता रहे थे। कुरूक्षेत्र के उस रणांगण में लाखों योद्धा युद्ध के लिये तत्पर थे। अर्जुन के विषाद को तिरोहित करने के लिये ही श्रीकृष्ण ने सांख्य योग का सहारा लिया। बुद्धि विपर्यास न हो यह उपक्रम किया। श्रीमद्भगवदगीता महापुराण का ग्यारहवां स्कंध भी उद्धव गीता के नाम से पुकारा जाता है। इन दोनों गीताओं में उत्तरदाता योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण और प्रश्नकर्त्ता क्रमशः अर्जुन और उद्धव हैं। श्रीकृष्ण का दोनों व्यक्तियों से सामीप्य था। अर्जुन श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई होने के साथ साथ नर-नारायण में नर की भूमिका निर्वाह कर रहे थे जब कि उद्धव श्रीकृष्ण का सखा था। दूसरे शब्दों में लंगोटिया यार थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था - ‘भक्तोसि मे सखा चेति’ तुम मेरे भक्त व सखा हो। उद्धव को श्रीकृष्ण ने कहा था - ‘त्वम् मे भृत्यः सुहृत सखा’ अंततोगत्त्वा संवाद तो तभी होगा जब दोनों पक्ष एक दूसरे को समझते हों। इन दो श्रीमद्भगवदगीताओं के अलावा हिन्दुस्तान में एक अन्य गीता भी है। उसे अष्टावक्र गीता कहते हैं। यह विदेह जनक व अष्टावक्र के मध्य हुआ गीत संवाद है। पराशर गीता व पितृ गीता भी लोग गाते हैं।
भारत की विदेश मंत्री महोदया श्रीमती सुषमा स्वराज ने श्रीमद्भगवदगीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किये जाने की अनुशंसा की। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्प्रयास से संयुक्त राष्ट्र संघ योग को अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का श्रेय देने के मार्ग में बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ महात्मा गांधी के जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मना रहा है। अहिंसा व योग के पश्चात श्रीमद्भगवदगीता की वह ध्वनि उजागर होती है जिसका मानना है - ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोेके’। गीता के प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक उवाच की ध्वनि मनुष्य मात्र के हित साधन का मार्ग है। जो लोग श्रीमद्भगवदगीता को तथाकथित हिन्दू धर्म का ग्रंथ मानते हैं वे मजहबी संशयग्रस्तता के रोगी सरीखे व्यक्ति हैं। गीता का संवाद हिन्दुस्तान की धरती के कुरूक्षेत्र में हुआ संवाद जिन दो व्यक्तियों के बीच हुआ वे एक दूसरे को नजदीकी से जानने वाले व्यक्तित्त्व थे। पहला सवाल तो यह है कि गीता का संवाद मानवोचित व्यवहार है। उसमें संशयग्रस्तता के निवारण की शक्ति है। मनुष्य मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाला गीता का संवाद देश, काल, धर्म से ऊपर स्थित है इसलिये विश्व संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ तथा विश्व मानवता को श्रीमद्भगवदगीता को मानवीय प्रेरणा देने वाला ग्रंथ मानना चाहिये। जहां तक भारतीय समाज द्वारा राष्ट्रीय ग्रंथ कौन हो यह प्रश्न है। भारत के संभ्रांत तथा धर्मनिरपेक्षता में श्रद्धा रखने वाले महानुभाव जिन्हें गीता हिन्दू धर्म की पुस्तक लगती है, श्रीमद्भगवदगीता के समानांतर भारत में कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक ऐसा ग्रंथ है जो मानवीय श्रोतों से राजनीति को शक्ति प्रदान करता है। अर्थशास्त्र में कहीं भी सनातन धर्म सहित तत्कालीन भारतीय समाज में सनातन, जैन व बौद्ध आस्थायें विद्यमान थीं। उन आस्थाओं पर कौटिल्य ने ‘न स्तौति न निंदति’ निन्दा व स्तुति दोनों से परहेज करते हुए ईसा से 4 शताब्दी पूर्व मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर भारत को एक राष्ट्रीय सूत्र में बांधा था इसलिये भारतीय राष्ट्र की गरिमा को संवर्धन करने वाले ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ माना जाये। अर्थशास्त्र को राष्ट्रीय गं्रथ का रूतबा देने में भारतीय साम्यवादी भारत के विभिन्न धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों को भी कोई ऐतराज नहीं होगा।
जहां तक श्रीमद्भगवदगीता, उद्धव गीता व अष्टावक्र गीता सहित पराशर गीता का सवाल है ये सभी ग्रंथ धार्मिक न होकर आध्यात्मिक तथा विज्ञान व अध्यात्म में समन्वय मार्ग खोजने में मदद करने वाले ग्रंथ हैं। इनसे विभिन्न विचार पोखरों के नये नये चिंतन के मार्ग खोजने में मदद मिल सकती है। आज विज्ञान में जिस प्रकार नित नयी नयी खोजें होरही हैं उनसे आस्थामूलक विचार पोखर में भी परिवर्तन आने की संभावना है। विज्ञान यदि जलचर, थलचर (मनुष्यों के अलावा दूसरे जीव) व नभचर पक्षियों की ध्वनियों को अध्ययन कर उन पर खोज करने से कल इस नतीजे पर पहंुच जाये कि विज्ञान पशु पक्षी, कृमि, कीट पतंग, वनस्पतियों तथा जलजीवों की ध्वनियों को भाषा के रूप में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त करले जैसे मनुष्य आपस में विचार विमर्श करते हैं उनका पशु पक्षी, वनस्पति व कीट सरीसृप के साथ भी संवाद कायम हो तो दुनिया में मोबाइल क्रांति से एक बहुत बड़ी वाणी क्रांति का सूत्रपात हो सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि वैज्ञानिक खोज के मार्ग में विज्ञान पुरूष मर्यादाओं का उल्लंघन न करे। अपनी मर्यादा के अंतर्गत रहे। श्रीमद्भगवदगीता व्यक्ति को मर्यादा उल्लंघन का मंत्र नहीं देती। श्रीमद्भगवदगीता के विषाद (जिसे आजकल लोग अवसाद कहते हैं) से छुटकारा पाने के लिये श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहला रास्ता स्थितप्रज्ञता का बताया। प्रज्ञा स्थिर रहेगी तो मनुष्य पुरूष हो चाहे नारी अपनी मर्यादायें स्वयं तय करेगा। स्थितप्रज्ञता का अगला चरण समाधिस्थ होना है। सांख्य योग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्थितप्रज्ञता व समाधिस्थता के चौखट में रहने का संदेश दिया। श्रीकृष्ण ने आगे कहा - मनुष्य कर्म करने के लिये ही संसार में आया है। अर्जुन ने पूछा यदि ज्ञान मार्ग को आप श्रेयस मानते हैं मुझे क्यों कर्म की ओर ढकेल रहे हैं। अर्जुन के शब्दों में सत्व था। श्रीकृष्ण ने मनुष्य योनि को कर्म पथ बताया। आसन्न कर्म करना पहला स्वधर्म है। कर्म तो मनुष्य से क्षण क्षण होता रहेगा। सहज कर्म को दोषपूर्ण होते हुए भी श्रीकृष्ण ने कहा - सहजम् कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत्।
इसलिये गीता - मानवीय ज्ञान, कर्म विषाद ज्ञान, कर्म सन्यास, सन्यास, आत्मसंयम, ज्ञान-विज्ञान, अक्षरब्रह्म, राजविद्या, राजगुह््य, विभूति, विश्वरूप दर्शन, भक्ति, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग, गुणत्रय विभाग, पुरूषोत्तम, देवासुर संपद् विभाग, श्रद्धात्रय विभाग, मोक्ष सन्यास इन अठारह योगों का समुच्चय होने से उसे भारत-भारती व भारतवासियों की मौलिक आस्था सूत्रों तक बांध कर गीता के योग संधान को जागतिक मानवीय व विश्व बंधुत्त्व का प्रतीक ही मानना चाहिये। संयुक्त राष्ट्र संघ ने महात्मा गांधी की अहिंसा को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ प्रत्येक 2 अक्टूबर को मनाने का स्तुत्य निर्णय प्रयोग में भी लाया जारहा है। विश्व के संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों में अहिंसा व गांधी आर्थिकी का दिग्दर्शन कराने की जरूरत है। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ श्रीमद्भगवदगीता का आप्त वाक्य है। विश्व संगठन योग को भी अहिंसा दिवस की भांति विश्व मानवता का प्रतीक बनाने का आग्रह भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुझाया है। जरूरत इस बात की है कि विश्व मानव समाज संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिये - योगपथ की मानवीय पहचान सुनिश्चित की जाये। श्रीमद्भगवदगीता के तत्त्व ज्ञान को विश्व की तमाम भाषाओं व बोलियों के माध्यम से सरलतापूर्वक विश्व के विभिन्न मजहबी योग साधनों के द्वारा ज्ञान मार्ग के राहियों तक पहुंचाया जाये। भीष्म युधिष्ठिर संवाद कि ‘को धर्मः सर्व धर्माणाम् भवतः परमो मतः’ युधिष्ठिर ने धर्म की महत्ता पूछी। भीष्म ने कहा - धर्म के चार अंग हैं। पहला ध्यान-धर्म, दूसरा स्तुति-धर्म, तीसरा नमस्या-धर्म (हिन्दी वैयाकरण किशोरी दास वाजपेयी नमस्या व नमाज को पर्यायवाची मानते हैं), चौथा है वातावरण को मर्यादित रखने वाला यजमान-धर्म अर्थात यज्ञ-हवन द्वारा वातावरण को शुद्ध रखना। श्रीमद्भगवदगीता, उद्धव गीता, अष्टावक्र गीता के अलावा पराशर गीता के दस अध्याय, हंस गीता, मंकि गीता सहित अनुगीता का उल्लेख भी महाभारत महाकाव्य की देन है। हेनरी किसिंजर महाशय ने अपनी पुस्तक World
Order में गीता का उल्लेख किया है। यह सही है कि आज की दुनियां यह मानती है कि हिन्दुस्तान के रहने वाले पारम्परिकता को संजोये रखने वाला मानव समूह को ‘हिन्दू’ नाम से पुकारा करता है पर श्रीमद्भगवदगीता सहित संगीत-सामवेदी स्वर में गाये जाने वाले सभी छंद विश्व मानवता के प्रतीक हैं। क्षेत्र, जाति, राष्ट्र राज्य से जो ऊर्ध्व है वह विश्व बंधुत्त्व जिसे भारतीय वाङ्मय वैश्वेदेव नाम से पुकारता है, गीता का संदेश वैश्वेदैविक होने के साथ साथ मनुष्य के कर्म विपाक का हेतु है इसलिये श्रीमद्भगवदगीता सहित सभी ऐसे ग्रंथों को किसी एक धर्म पोखर, देश, क्षेत्र, जाति अथवा धर्म समूह या किसी एक मजहब का ग्रंथ कहने के बजाय मानवीय ज्ञान स्त्रोत ग्रंथ मानना चाहिये। भारत की विदेश मंत्री महोदया ने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का सुझाव दिया। भारत के धर्मनिरपेक्षतावादी महानुभावों को गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना समीचीन नहीं प्रतीत हुआ। संभवतः हेनरी किसिंजर ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र की जो महिमा वर्णित की है राजनीतिक आन्वीक्षिकी का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है अपनी राजनीतिक यात्रा में नंदवंश को मिट्टी में मिला कर चाणक्य ने जो राजधर्म एक सामान्य ग्वाले के बेटे को पाटलीपुत्र की राजगद्दी में बैठा कर आसेतु हिमाचल मौर्य साम्राज्य का जो डंका बजाया, सिकंदर महान के राजनीतिक सत्व के समानांतर स्थायित्त्व प्रदान किया, सम्राट अशोक द्वारा निर्मित अशोक की लाट के साथ भारत का राजचिह्न तीन सिंह मुख हैं तथा आप्तवाक्य - ‘सत्यमेव जयते’ है भारत की शासन सूत्र को वर्तमान में संचालित कर रही भारतीय जनता पार्टी को चाहिये कि वह अर्थशास्त्र का सांगोपांग सर्वांगीण अध्ययन करने के लिये अपनी पार्टी के विचार पोखर को अर्थशास्त्र का राष्ट्रीय विवेचन करने हेतु सुझाये। देश की दूसरी राजनीतिक संरचनाओं में भी दिल्ली की राजसत्ता को दिनवाणी उपलब्ध कराये । यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार कौटिलीय अर्थशास्त्र जो मूलतः संस्कृत में है उसका भाषांतरण भारती की सभी 21 भाषाओं में व अंग्रेजी में किया जाकर प्रत्येक सांसद, विधायक व त्रिस्तरीय पंचायत राज के हर जन प्रतिनिधि को उपलब्ध कराया जाये ताकि हर जन प्रतिनिधि राष्ट्रधर्म को हृदयंगम कर सके। संसद और विधानमंडल कौटिलीय अर्थशास्त्र को राष्ट्रीय सार ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित कराने के लिये भारत के राष्ट्रपति की ओर से अर्थशास्त्र को राष्ट्रीय ग्रंथ संकल्पित करने का प्रस्ताव हो। प्रत्येक जन संसद (लोकसभा-राज्यसभा घटक राज्य विधानमंडल जिला पंचायत नगर परिषद आदि क्षेत्र पंचायत व ग्राम सभा अपनी अपनी मातृभाषा - चाहत भाषा में अर्थशास्त्र - भारत का राष्ट्र ग्रंथ है यह उद्घोष करे) चाणक्य ने राजतंत्र का जो मार्ग प्रशस्त किया है वह भारत को शक्तिशाली विश्वपटल का महत्त्वपूर्ण देश तथा राजनीतिक मर्यादाओं का वाहक बना सकता है। अर्थशास्त्र का भारतीय राष्ट्र ग्रंथ होना विश्व राजनीति में आन्वीक्षिकी चिंतन का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
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