Tuesday, 23 December 2014

धर्मान्तरण हिन्दू संस्कार का अंग नहीं 


विश्व की मजहबी ¼Religion Based½ जनसंख्या में विश्व का ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज सर्वोच्च पायदान में विश्व के दस प्रमुख ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज की जनसंख्या 1,03,36,70,000 है जिसमें सर्वाधिक ख्रिस्ती धर्मावलंबी संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं। उनकी संख्या 24,30,60,000 है। संयुक्त राज्य अमेरिका में ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज का आबादी प्रतिशत 78.3 है। ब्राजील, मैक्सिको, रूस, फिलीपीन्स, नाइजीरिया, चीन, कांगो का गणतंत्रीय रिपब्लिक जर्मनी, इथियोपिया अन्य नौ ख्रिस्ती जनसंख्या प्रधान देश हैं। इन दस राष्ट्र राज्यों के अलावा शेष देशों में ख्रिस्ती आबादी 1,13,95,00,000 है। ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के पश्चात विश्व मजहबी संकाय में इस्लामी जनसंख्या 1,59,45,16,000 के इस्लाम मजहब मानने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या इंडोनेशिया में है जहां 20,91,20,000 मुस्लिम आबादी है जो इंडोनेशिया की कुल जनसंख्या का 87.2 प्रतिशत है। इस्लामी मजहब मानने वाले लोगों की जनसंख्या में दूसरा स्थान भारत का है। उसके बाद पाकिस्तान, बांग्ला देश, नाइजीरिया, मिश्र, ईरान, टर्की, अल्जीरिया और मोरक्को का क्रम आता है। दुनियां केे इन दस देशों में मुसलमान संख्या 1,05,21,20,000 है। 54,64,00,000 इस्लाम धर्मावलंबी अन्य देशों में रहते हैं। ख्रिस्ती व इस्लाम दोनों मजहब लश्करी मजहब हैं। धर्मान्तरण इन मजहबों का मुख्य स्त्रोत है। Baptism की व्याख्या करते हुए Collins Concise Dictionary  के अनुसार Baptize  करने वाला व्यक्ति Baptist  है। John the Baptist, The cousin and fore runner of JESUS whom he baptize. Denoting or characteristic of any Christian sector of Bepatist. 
ख्रिस्ती धर्म में सर्वप्रथम बैपटिस्ट संत जॉन थे। वे ईसा के समकालीन होने के साथ ईसा के लिये एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे। अगर हम भारतीय वाङ्मय में प्राचार्य सुनीति कुमार चाटुर्ज्या व डाक्टर हेम चंद्र जोशी भाषा विज्ञानी द्वारा की खोज का सटीक अनुशीलन करें। संस्कृत भाषा का शब्द ‘जह्नु’ जिन्होंने गंगा को पी डाला था जिसके कारण गंगा को जाह्नवी भी कहा जाता है यह जह्नु शब्द रोम पहुंच कर सैंट जोन बन गया। ख्रिस्ती मतावलंबिता में जलाभिषेक अथवा जल स्नान एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय जह्नु व रोम साम्राज्य के जोन्ह पर भाषा विज्ञानी विश्लेषण हो। ख्रिस्ती मजहब पर भारतीयता का कितना प्रभाव है इस पर ऐतिहासिक अनुसंधान आज के अंतरिक्ष विज्ञान के जरिये किया जाये। 
  ख्रिस्ती मजहब के समानांतर सेमेटिक परिवार का दूसरा महत्त्वपूर्ण मजहब इस्लाम है जो एकेश्वर वादी मजहब है। अल्लाह या खुदा एकमात्र परमात्मा स्वरूप है। पैगम्बर मोहम्मद उस एकमात्र अल्लाह या खुदा तक पहुंचने का पैगम्बर है। ईश्वर का पैगाम पैगम्बर के जरिये इस्लाम मतावलंबी अनुभूति करते हैं। एक ईश्वर, एक नबी या पैगम्बर मोहम्मद तथा एक ग्रंथ कुरआन यही इस्लाम मजहब की विशेषता है। इस सेमेटिक मजहबी प्रवाह की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी यहूदी मजहब है जिसके अनुयायियों की संख्या 140 लाख तथा जिनका विश्व मजहबी खाते में अस्तित्त्व मात्र 0.2 प्रतिशत है। पी. ईश्वर 2012 की सर्वेक्षण रिपोर्ट जो 19 दिसंबर 2012 को जारी हुई तदनुसार विश्व मजहबी सांख्यिकी के बारे में विश्लषणकर्त्ता समाज की राय में तथा 2500 जनगणनाओं सर्वेक्षणों विश्व जनसांख्यिकी रजिस्टर के मुताबिक इस धरती में 202 अरब ख्रिस्ती, विश्व जनसंख्या का 32 प्रतिशत, 106 अरब मुस्लिम विश्व जनसंख्या का 23 प्रतिशत, एक अरब हिन्दू विश्व जनसंख्या का 15 प्रतिशत है। इतर धर्मावलंबियों में पचास करोड़ बौद्ध विश्व जनसंख्या का 7 प्रतिशत हैं। विश्व मजहबी खांचे में सेमेटिक व हेमेटिक दो मजहबी मार्ग हैं। हेमेटिक मजहबी मार्ग का सबसे पुराना बटोही सनातन धर्म माना जाता है। इस मजहब की कोई एक खास पुस्तक कोई धर्माधीश या पैगम्बर या कोई एक परमात्म शक्ति नहीं है। संत विनोबा भावे का मत - ‘श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापिहि’ इस परम्परागत मजहब या धर्म का मूल स्त्रोत है। यह धर्म परनिंदा सम पातक नाहीं इस मत का पोषक है। इस धर्म के मानने वाले आधुनिक युग के प्रमुख ‘हिन्दू’ महात्मा गांधी थे। उन्हें टाल्स्टाय ने हिन्दू संज्ञा दी। महात्मा गांधी का अस्पृश्यता निवारण अभियान एक अद्वितीय विमर्श था। उन्हें सर्वपल्ली राधाकृष्णन की इस सम्मति से संबल मिला कि अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है। अस्पृश्यता की ही तरह धर्मान्तरण भी क्या हिन्दू शास्त्र सम्मत विधा है ? यह खोजे जाने की तात्कालिक राष्ट्रीय जरूरत है। भारत में जनसंख्या के मजहबी ढांचे पर सरसरी निगाह डालने पर यही प्रतीति होती है कि विश्व के इस पुरातन मुल्क में धर्म या धारणा शक्ति व्यक्ति प्रधान है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वधर्म दूसरे व्यक्ति के स्वधर्म से कुछ न कुछ भिन्नता लिये हुए है। यही धरती के ध्वनि शास्त्र के प्रथम पथ प्रदर्शक ध्वन्यालोक का मत है  - भिन्न रूचिर्हि लोकः। इस जीव जगत में प्रत्येक जीव की रूचि भिन्नता ही श्लाघनीय है। हिन्दू धर्म के नाम से विश्व प्रसिद्ध हिन्दुस्तानी जीवन पद्धति अपनाने वाले लोगों की संख्या आज दुनियां के मजहबी खांचे में तीसरे पायदान पर है। सरसरी निगाह से देखने पर लगता है कि क्षेत्र, तीर्थ, देश, काल के अनुसार अपने को ढालने वाली हिन्दू जीवन शैली ‘स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मोे भयावहः’ का सिद्धांत मानने वाली जीवन पद्धति है। जब इजरायल अपने देशवासियों के लिये हिब्रू भाषा को पुनर्जीवित कर रहा था उसकी नव बस्ती निर्माण योजना से प्रभावित होकर भारत में रूर्बन सोसाइटी अवधारणा का अभ्युदय हुआ। आज भारत सरकार डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्य स्मृति में रूर्बन मिशन का संकल्प लेती है। रूर्बन मिशन का पूर्वज रूर्बन सोसाइटी वाला विचार था जिसे पंडित नेहरू के समर्थन से सहकारिता व विकेन्द्रित आर्थिकी के पुरोधा वैकुंठ ल. मेहता ने अपने दो सहयोगियों के भगीरथ प्रयास से डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई बिहार में संकल्पित किया। रूर्बन सोसाइटी के विचार पोखर झबेर भाई पी. पटेल और विश्वनाथ एन. टेकुमल्ला थे। सघन क्षेत्र योजना के अंतर्गत यह कार्यक्रम 1953-54 से 1963-64 तक एक सफल अभियान के रूप में चला। इसका एक केन्द्र बिजनौर जिले के ताजपुर नामक स्थान में भी था जिसका संचालन स्वतंत्रता सेनानी हिफुजरहमान करते थे। हिफुजरहमान उस इलाके के विधायक रहे चौधरी खूब सिंह के करीबी राजनीतिज्ञ सह स्वतंत्रता सेनानी थे और चौधरी खूब सिंह के बहनोई को जीजा जी कह कर संबोधित करते थे। ये तीनों स्वातंत्र्य वीर थे। पारस्परिक सौहार्द था पर मजहब अलग अलग थे। चौधरी मूलतः मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा क्षेत्र के चौहान राजपूत थे। अपनी बिरादरी में उनके नेतृत्त्व की धाक व साख थी। उत्तर प्रदेश का कांग्रेस नेतृत्त्व भी उन्हें महत्त्व देता था। ठाकुरद्वारा निवासी होने के कारण उनकी नजदीकी पंडित पंत के साथ थी। पंडित पंत उन्हें राजनीतिक कारणों और कानूनी पेचिदगियों के कारण द्वितीय सार्वदेशिक निर्वाचन के समय कांग्रेस का टिकट नहीं दे पाये इसलिये उन्हें कहीं न कहीं जोड़ने की मंशा ने सघन क्षेत्र योजना वाली रूर्बन सोसाइटी के कार्य में लगाने के लिये पंडित पंत ने वैकुंठ ल. मेहता उत्तर प्रदेश में सहकारिता के जरिये ग्रामोद्योग फैलाना चाहते थे। उन्हें हिन्दी भाषी कार्यकर्त्ताओं की जरूरत थी। उन्होंने हिफुजरहमान के घने दोस्त को तेल घानी उद्यमिता संवर्धन के लिये दिल्ली में तैनाती दे दी। हिफुजरहमान व चौधरी में हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर आत्मीयतापूर्वक बात होती। चौधरी कहते - हिफुजरहमान अगर सारे मुसलमान हिन्दू हो जायें तो हिन्दू-मुस्लिम समस्या हल हो जायेगी। हिफुजरहमान कहते - चौधरी बात आपकी सोलह आने ठीक है पर यह तो बताओ कि हिन्दू तो जातिवादी समाज है। हमें किस खाने में रखोगे ? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, रोटी-बेटी संबंध का क्या होगा ? स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन विफल होगया। आर्यसमाज में केवल प्रकाशवीर शास्त्री रह गये हैं जो तर्क करते हैं। सारे आर्यसमाजी फिर मूर्तिपूजक होगये। हिफुजरहमान कहते - हिन्दू धर्म में धर्मान्तरण स्वीकार ही नहीं है। कोई और उपाय करो। गांधी का रास्ता अपनाओ। मजहब की दीवार को ऊँचा मत करो। यह ब्लागर उन दोनों की बात सुनता रहता था। हिफुजरहमान कहते - पंडित जी तुम्हीं बताओ। मैं सही हूँ या जीजा चौधरी ठीक कहते हैं ? वास्तविकता तो हिफजुरहमान के वक्तव्य में है। हिन्दू धर्म में इतर धर्मावलंबियों को धर्मान्तरित कर अपने धर्म में मिलाने का - घर वापसी वाला कोई शास्त्रसम्मत विधान नहीं है इसलिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उनके इतर सामाजिक और शैक्षिक आनुषांगिक संगठनों को चाहिये कि वे हिन्दू धर्म शास्त्र ज्ञाताओं से मालूम करें कि क्या हिन्दू धर्म धर्मान्तरण को शास्त्र सम्मत मानता है। यदि उत्तर नहीं में हो तो विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, बजरंग दल को चाहिये कि यत्र तत्र घर वापसी या शुद्धि आंदालनों के बजाय सुप्रीम कोर्ट से याचना करें कि क्या हिन्दू धर्म में धार्मिक मतान्तरण हिन्दू धर्म शास्त्र प्रावधानों के अनुसार अनुमन्य है ?
  हिन्दू धर्म से इस्लाम धर्म व ख्रिस्ती धर्म में धर्मान्तरण का क्रम पिछले एक हजार वर्ष से निरंतर चालू है। इसके बावजूद भी विश्व मजहबी समाज में हिन्दू धर्मानुयायियों की संख्या एक अरब से ज्यादा है। वैटिकन व मक्का शरीफ की भांति हिन्दू धर्म का कोई एक निश्चित क्षेत्र कोई मसीहा अथवा पैगम्बर और कोई एक एकमात्र ग्रंथ नहीं है। हिन्दू धर्म का सार अगर समझना हो तो महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत् महापुराण के अंतर्गत उद्धव गीता को समझना होगा। कवि ने विदेह जनक से कहा -
खं वायुमग्निं सलिलम् महीं च, ज्योतीषि सत्वानि दिशो द्रुमादि न्।
सरित् समुप्रांश्च हरेः शरीरम्, यत् किंच भूतम् प्रणमेदमन्यः।।
  यह समूचा संसार - ब्रह्माण्ड ही ईश्वर है। ईश्वर के अस्तित्त्व संत एकनाथ ने अपने एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंगों के जरिये पुष्टिमार्गी भक्ति का जो स्त्रोत भारत को मराठी भाषा के जरिये दिया, श्रीमद्भगवदगीता का ज्ञानेश्वरी रूप जिसे संत ज्ञानेश्वर ने उपलब्ध कराया, विश्व हिन्दू परिषद सहित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सभी आनुषंगिक संगठनों को चाहिये कि वे देशव्यापी बहस करें कि क्या हिन्दू धर्म दूसरे धर्मों से अपने में मिलाने के धर्मान्तरण की शास्त्रोक्त इजाजत देता है ? यदि बहस का फैसला में नहीं में आता है भारत की वर्तमान भाजपा नीत नरेन्द्र मोदी सरकार को राष्ट्रपति - भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सम्मति लेकर घर वापसी या शुद्धि मुहिम को रोकने का निर्देश दें। भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि व्यक्ति को अपना कर्त्तव्य पथ बदलना वाजिब नहीं है। जिन लोगों के पूर्वजों ने अत्याचार, लोभ या मोह के कारण अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम या ईसाईयत का वरण किया उनके वंशधरों को घर वापसी या शुद्धि के नाम पर फिर हिन्दू धर्म की चौखट में लाना धर्मान्तरण है। जब हम ईसाई मिशनरियों अथवा इस्लाम के आकर्षण से धर्म परिवर्तन को उचित नहीं मानते हैं निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं कि कोई हिन्दू ईसाईयत या इस्लाम का वरण न करे चूंकि हिन्दू धर्मशास्त्रों में धर्मान्तरण का कोई प्रावधान है ही नहीं इसलिये ईसाईयों या मुसलमानों को पुनः हिन्दू धर्म में प्रवेश देना धर्मशास्त्रों के अनुकूल नहीं है अतः ऐसे प्रयासों को संबल सहारा नहीं देना चाहिये। 

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